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21 फरवरी को मध्यान्ह 1 बजे लखनऊ विश्वविद्यालय में पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगल प्रवचन।

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जैन वाङ्मय में अष्टमंगल-एक विवेचन

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जैन वाङ्मय में अष्टमंगल-एक विवेचन

१. प्ररोचना

भारतीय परम्परा मंगल और मांगलिक वस्तुओं के सृजन, सम्वद्र्धन और संपादन में सन्यास है। ऐहिक जीवन में पूर्ण मंगल की संस्थापना कर, उसको भोगकर पारलौकिक मंगल में पूर्ण प्रतिष्ठित हो जाना प्रत्येक भारतीय का संकल्प होता है। ‘‘जीवेम शरद: शतम्’’ की रमणीय भावना से विभूषित ऋषि-परम्परा वहां जाना चाहती है, जहाँ शोक, दु:ख, मोह का नामोनिशान भी नहीं रहता, सिर्पक रमणीयता का, दिव्यह्लादकता का, परमानन्द और परममोद का साम्राज्य अवशिष्ट रहता है वहां जन्म, मृत्यु, जरा और जीर्णता पूर्णत: जीर्ण शीर्ण हो जाती है, नित्य महोत्सव ही अवशेष रहता है, जो चिरनवीन होता है।

तदेव रम्यं रुचिरं नवं नवं, तदेव शाश्वत् महतो महोत्सवम्।
तदेव शोकार्णव शोषणं नृणां, सदूत्तमश्लोक यशोऽनुगीयते।।

२. मंगल—विमर्श

‘मगि-गत्यर्थ:’ धातु से मंगतेरलच् से अचल् (अल) प्रत्यय होकर मंगल, नपुंसकलिंग में ‘मंगलम’ शब्द बनता है। अभिप्रेतार्थसिद्धि: मंगलम् अर्थात् अभिप्रेत अर्थ की सिद्धि मंगल है। प्रशस्त का नित्य आचरण और अप्रशस्त का विसर्जन मंगल है—

प्रशस्ताचरणं नित्यमप्रशस्तविसर्जनम्।
एतद्धि मंगलं प्रोत्तं ऋषिभिस्तत्वदर्शिभि:।।

‘मगि सर्पणे’ धातु से भी अलच् प्रत्यय करने पर मंगल शब्द निष्पन्न होता है। मंगति सर्पति पापानि इति जिससे पाप दूर भाग जाते हैं, वह मंगल है। विष्णुपुराणकार का अभिमत है—

अशुभानि निराचष्टे तनोतिशुभसन्ततिम्।
स्मृतिमात्रेण यत् पुंसां ब्रह्मा तन्मंगलं विदु:।।

अर्थात् सारे अशुभों का विनाश तथा शुभ—परम्परा का विस्तार जिसके स्मरण मात्र से होता है, वह ब्रह्म मंगल है। जैनाचार्य यतिवृषभ ने ‘तिलोयपण्णत्ति’ में लिखा है—

गालयदि विणासयदे घादेदि दहेदि हंति सोधयदे।
विद्धसेदि मलाइं जम्हा तम्हा य मंगलं भणिदं।।

अर्थात् जो पाप मलों को गालित करता है, विनष्ट करता है, घटित करता है, जलाता है, मार देता है, शोधित करता है और विध्वंस करता है, उसे मंगल कहते हैं। मंगं नारकादिषु पवंडंतं सो लाति मंगलं। लाति गेण्हइ त्ति वुत्तं भवति। अर्थात् नारकादि में गिरते हुए को जो बचाता है, वह मंगल है। मंगं सुखं लातीति मंगलम्। मलं गालयति विनाशयति इति मंगलम्। अर्थात् जो सुख को लाता है, पाप मल का विनाश करता है वह मंगल है। इस प्रकार जो पाप विनाशक, पाप प्रक्षालक, सुखकारक, परमाह्लादक है, उसे मंगल कहते हैं।

३. मंगल के पर्याय

कोश ग्रंथों में मंगल के अनेक पर्यायों का उल्लेख मिलता है। जैसे—भावुक, भव्य, कल्याण, भविक, शुभ, क्षेत्र, प्रशस्त, भद्र, स्वश्रेयस् , शिव, अरिष्ट कुशल, भद्र, शस्त। भागवत पुराण में अनेक पर्यायों का निर्देश है—

मंगलाय च लोकानां क्षेमाय च भवाय य।।

वैद्यक रत्नमाला में अनेक नामों का उच्चारण है—

कल्याणं मंगलं क्षेमं शातं शम्र्मं शिवं शुभम्।

अमरकोशकार ने अमरकोश में विभिन्न नामों का वर्णन किया है—

नन्दथुरानन्द शम्र्मं शात सुखानि च

श्वश्रेयसं शिवं भद्रं कल्याणं मंगलं शुभम्।

भावुवं भविवं भव्यं कुशलं क्षेम शस्तम् ।।

४. शास्त्रों में मांगलिक द्रव्य

भारत के प्राचीन शास्त्रों में अनेक मांगलिक द्रव्यों का उल्लेख है, जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार उदिष्ट है। पूर्ण कुंभ, द्विज (ब्राह्मण), वेश्या, शुक्लधान्य, दर्पण, दही, मधु, ताजा पुष्प, दूर्वा, श्वेत अक्षत, वृषभ, गजेन्द्र, तुरग, प्रज्वलित अग्नि, सोना, पर्ण, पके हुए फल, नारी, प्रदीप, उत्तममणि, मुक्ता, पुष्पमाला, चन्दन आदि का दर्शन मंगल माना जाता है। राजहंस, मयूर, खज्जन, शुक, पिक, कबूतर, शंख, चक्रवाक, काली गाय, श्वेतचमर वाली चंवरीगाय, वत्सयुक्ता धेनु और पताका आदि दक्षिण भाग में शुभदायक है—

ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी अन्य मंगलद्रव्यों का उल्लेख है। दिव्याभरणभूषित पति एवं पुत्रों से सम्पन्न साध्वी, नारी, शुक्लपुष्प, माला, धान्य खंजन आदि शुभ है। दक्षिण भाग में प्रज्वलित अग्नि, विप्र, वृषभ, गज, वत्सप्रयुक्ता, धेनु, राजहंस, वेश्या, पुष्पमाला, पताका, दधि, पायस मणि, सुवर्ण, रजत, मुक्तामणि, चन्दन, घृत, फल, लाजा, दर्पण, श्वेतकमल, कमलवन आदि शुभ मांगलिक वस्तुएँ हैं। मांगलिक वस्तुओं में दूर्वा, दधि, घी, जलपूर्ण कुंभ, सवत्सा धेनु, वृषभ, सुवर्ण, गोबर से युक्त भूमि, स्वस्तिक, अक्षत, मधु, ब्राह्मणकन्या, श्वेतपुष्प, शमी, हुताशन, चन्दन, सूर्यबिम्ब और अश्वत्थवृक्ष आदि का उल्लेख है। बौद्ध वाङ्मय के ललितविस्तर एवं दिव्यावदान में अनेक मांगलिक द्रव्यों का निर्देश मिलता है। जैन वाङ्मय में इनका प्रभूत वर्णन है।

५. अष्ट मंगल

भारतीय परम्पराओं में किंचित् भेद मात्र से आठ मंगल द्रव्यों का उल्लेख मिलता है। वैदिक परम्परा के अनेक ग्रंथों में अष्टमंगल का उल्लेख है—

मृगराजो वृषो नाग: कलसो व्यंजनन्तथा।
वैजयन्ती तथा भेरी दीप इत्यष्टमंगलम्।।

अर्थात् मृगराज (सिंह) वृषभ, श्रेष्ठ हाथी या श्रेष्ठ सर्प, कलश, व्यंजन (शुभलक्षण), वैजयन्ती, भेरी तथा दीप ये आठ मंगल होते हैं। किंचित अंतर मात्र से अष्टमंगल का अन्यत्र भी उल्लेख मिलता है—

लोकेऽस्मिन् मंगलान्यष्टौ ब्राह्मण्ये गोर्हुताशन:।
हिरण्यं सर्पिरादित्य आपो राजा तथाष् टम:।।

अर्थात् ब्राह्मण, गौ (गाय और वृषभ), प्रज्जवलित अग्नि, हिरण्य सर्पि (घृत) सूर्य, जल और राजा ये आठ मंगल हैं।

६. जैन वाङ् मय में अष्टमंगल

जैन वाङ्मय में अनेक मांगलिक द्रव्यों का निर्देश मिलता है, जिनमें आठ प्रमुख हैं—स्वस्तिक, श्रीवत्स, नन्द्यावत्र्त, वर्धमानक, भद्रासन, कलश, मत्स्य और दर्पण। इन्हें ही अष्टमंगल, प्राकृत में अट्ठमंगल कहा जाता है। भगवतीसूत्र में सर्वप्रथम आठ मंगलों का निर्देश मिलता है—सोत्थिय सिरिवच्छ—नंदियावत्त—वद्धमाणग—भद्दासण—कलस—मच्छदप्पणा।’’ मेघकुमार की पुरुषसहस्रवाहिनी (हजार पुरुषों द्वारा ले जायी जाने वाली) शिविका के सामने अष्टमंगल का उल्लेख है—तं जहां सोवित्थय—सिरिवच्छं। अर्थात् स्वस्तिक, श्रीवत्स, नन्द्यावत्र्त, वद्र्धमानक, भद्रासन, कलश, मत्स्य और दर्पण। औपपातिक सूत्र में अशोकवरपादप के ऊपर आठ मंगलों का निर्देश है। हस्तिरत्न पर आरूढ भिंभिसार पुत्र के अभिषेक काल में सामने आठ मंगल यथाक्रम से रखे गए थे।

औपपातिक सूत्र में ही अष्ट मंगलों के स्वरूप विषयक कुछ विशेषण पदों का भी उल्लेख हुआ है। श्रेष्ठ अशोक वृक्ष के ऊपर बने ये अष्ट मंगल जात्यरत्नों के बने हुए, सुन्दर, कोमल, मलारहित, रजरहित, घसे हुए, मार्जित किए हुए, निरूपम एवं सुन्दर प्रकाश से युक्त दर्शनीय एवं रमणीय थे। राजप्रश्नीयसूत्र में औपपातिक सूत्र के समान ही अष्टमंगल का स्वरूप विवृणित है। सूर्याभदेव का विमान अष्टमंगलों से सुशोभित था। सिद्धायतन में विद्यमान जिन प्रतिमाओं के सामने अष्टमंगल बने हुए थे। जीवाजीवाभिगमसूत्र में तोरणद्वारों पर अष्टमंगलों से की रचना का वर्णन प्राप्त है (एक प्रसादावतंसक श्रेष्ठ भवन) अष्टमंगलों से सुशोभित था। दिगम्बर साहित्य में अनेक स्थलों पर अष्टमंगल का निर्देश मिलता है। तिलोयपण्णत्ति में उल्लिखित हैं—भिंगारकलसदप्पणचामर धयवियणछत्तसुपयट्ठा अर्थात् भृंगार, कलश, दर्पण, चंवर, ध्वजा, बीजना और सुप्रतिष्ठ—ये आठ मंगलद्रव्य हैं। जैन पुराणों में अनेक स्थल पर मांगलिक द्रव्यों का निरूपण मिलता है। छत्र, चमर, ध्वजा, भंगार (झारी) कलश, सुप्रतिष्ठक (ठौना) दर्पण और व्यंजन (व्यंजन) आदि मांगलिक द्रव्य हैं, जिनसे पाण्डुकशिलाविभूषित रहती है। समवसरण के गोपुरद्वार भी इससे अलंकृत रहते हैं। इस प्रकार आगम साहित्य में अनेक स्थलोंपर अष्टमंगलों का वर्णन मिलता है। जैन पुराणों, चरितकाव्यों एवं महाकाव्यों में भी अष्टमंगल का वर्णन मिलता है।

६.१
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स्वस्तिक शब्द दो शब्दों के मेल से बना है—स्वस्तिक और क। सु उपसर्गपूर्वक ‘अस—भुवि’ धातु से सावसे: सूत्र से ति प्रत्यय स्वस्ति बनता है। आशीर्वाद, क्षेम, पुष्पादि को स्वस्ति कहते हैं मंगल, निरूपद्रव, पापप्रक्षालनादि स्वस्ति है। स्वस्ति का प्रथम श्रवण की मंगलवाचक माना जाता है। आचार्य भगुरि ने स्वस्ति उपपद को मंगल, आशीर्वाद, पापविनाशकादि अर्थों में स्वीकार किया है—स्वस्ति मंगलाशीर्वादपापनिर्णेजनादिष्विति।’’ अमरकोशकार में लिखा है स्वस्त्याशी:, क्षेत्रपुण्यादौ प्रकर्षे लंघनेऽपि स्वस्तिपूर्वक ‘वै शब्दे’ धातु से क (अ) प्रत्यय होकर ‘स्वस्तिक’ है। स्वस्ति शब्द से स्वार्थ में क प्रत्यय करने पर भी स्वस्तिक शब्द बनता है। ‘स्वस्तिक क्षेमं कायति इति’ अर्थात् जो क्षेम, मंगल पुण्य का विस्तार करता है, पाप का विनाशक है, वह स्वस्तिक शब्द बनता है। जो मंगलकारक हो वह स्वस्तिक है। तण्डुलादि मांगलिक द्रव्यों के द्वारा मंगलसंवद्र्धन और अमंगलविनाश के लिए मांगलिक चिह्न की रचना आज भी की जाती है।

स्वस्तिक प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति सभ्यता और जनमानस का अभिन्न अंग रहा है। वैदिक साहित्य से लेकर आज तक के सभी सांस्कृतिक आचार्यों, मनीषियों और प्रज्ञापुरुषों ने स्वस्तिक की महत्ता को रेखांकित किया है। वेदों में ‘ऊँ स्वस्ति’ से उच्चरित अनेक मंत्रों द्वारा विभिन्न प्रकार के देवों की अभ्यर्थना की जाती है। आज भी स्वस्तिवाचक मंत्र आस्तिक समाज का अभिन्न अंग बना हुआ है। वेद में यह मंत्र उदिष्ट है—

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:।
स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।।

अन्यत्र भी अनेक मंत्रों में स्वस्ति शब्द का प्रयोग हुआ है। स्वस्तिक अनेक देवों का प्रतीक माना जाता है। बेन्जामिन रोलैण्ड ई. टामस तथा वासुदेवशरण अग्रवाल आदि कलाविदों ने स्वस्तिक को सूर्यदेव का प्रतीक माना है। यह ब्रह्मा का भी प्रतीक है। चतुरानन ब्रह्मा स्वस्तिक की चार भुजाओं के प्रतीक है। जैन परम्परा में स्वस्तिक सिद्ध का प्रतीक है। जैनदर्शन के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार उसे दूसरा जन्म प्राप्त होता है। चार योनियाँ—देव, मनुष्य, तिर्यंच और नरक है। सिद्ध पुरुष इन चार योनियों के आवागमन से सर्वथा मुक्त होता है। इसी दार्शनिक मान्यता का प्रतीक स्वस्तिक है। मध्यबिन्दु से प्रारंभ चार भुजाएँ पुनर्जन्म की चार अवस्थाओं के प्रतीक हैं, किन्तु सिद्ध पुरुष इनसे मुक्त होता है। स्वस्तिक की चार भुजाओं की मुड़ी रेखाएँ व्यक्त करती हैं कि सिद्धावस्था को प्राप्त पुरुष के लिए आवागमन की ये अवस्थाएँ बंद विंâवा समाप्त हो गयी हैं। सिद्ध शब्द स्मरण एवं उच्चारण मंगल के साथ दृष्टि मंगलात्मक भी है। उसी तरह स्वस्तिक स्मरण, उच्चारण और दर्शन त्रिविध रूप से मंगलात्मक है, इसलिए सिद्ध का प्रतीक है। यह सातवें तीर्थंकर सुपाश्र्वनाथ का प्रमुख चिह्न है।

अद्र्धमागधी आगम साहित्य में यह स्वस्तिक शब्द सोत्थिय, सोवत्थिय आदि अनेक रूपों में मिलता है। अष्टमंगलों में यह प्रथम स्थान पर परिगणित है। स्वस्तिक का बौद्ध धर्म से भी निकट का संबंध रहा है। बौद्ध ग्रंथ—ललितविस्तर एवं दिव्यावदान में शुभ चिह्नों का वर्णन मिलता है। ललितविस्तर में एक सील पर अनेक शुभ प्रतीकों के साथ स्वस्तिक का भी उल्लेख है। दिव्यादानव में भी अन्य चिह्नों के साथ स्वस्तिक का उल्लेख है, जो भगवान् बुद्ध के चिह्न हैं— ततो भगवता चक्रस्वस्तिकेन नन्द्यावर्तेन जालावनद्धेनानेकपुण्यशतनिर्जातेन भीतानामाश्वासकरेण पृथिवी परभृष्टा।

कलाओं में स्वस्तिक

कलाओं में अनेक स्थलों पर स्वस्तिक का उल्लेख का अंकन है। वस्तुकला से इसका स्वस्तिक संबंध रहा है। स्वस्तिक एक श्रेष्ठ गृह को भी कहते हैं। तोरण, गोपुर, वेदिका भद्रासनादि पर भी स्वस्तिक का अंकन किया जाता था। श्रेष्ठ पुरुषों का एक चिह्न स्वस्तिक भी है। भगवान् महावीर के हाथ पर स्वस्तिक का चिह्न था।

६.२
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श्रीवत्स शब्द दो शब्दों के मेल से बना है—श्री और वत्स। ‘श्रीयुत्तं वत्सं वक्षों यस्य’ अर्थात् श्री लक्ष्मी युक्त वक्षस्थल जिसका है वह श्रीवत्स है। भगवान विष्णु का चिह्नविशेष है। श्री ऐश्वर्य, विभूति, सम्पन्नता, शोभा, चारुता, सम्पत्ति, सृजन आदि का प्रतीक है। वत्स का अर्थ है सन्तान, बछड़ा, बच्चा, बालक आदि। श्री की कृपा पात्र जो है, वह श्रीवत्स है, जहां पर शोभा सम्पन्न अनन्त सुख का चिर अधिवास हो वह श्रीवत्स है। अपने जागरुक पुरुषार्थ, अप्रमत्त प्रयत्न, शोभा चारुता के द्वारा पुरुष श्रीवत्स हो जाता है। यही कारण है कि महापुरुषों के प्रमुख लक्षण में श्रीवत्स प्रमुख है। भगवान विष्णु, श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान अर्हत्, महात्मा बुद्ध आदि श्रीवत्स लक्षण से लक्षित हुए हैं।

कोश वाङ् मय में श्रीवत्स

अमरकोश में विष्णु के अनेक नामों में श्रीवत्सलांछन को गिनाया गया है। आचार्यों ने इसे विशेष रोमावर्त कहा है, जिससे वक्ष श्री से युक्त हो जाता है। हेमचन्द्र ने भगवान विष्णु के वक्ष पर अंकित चिह्न विशेष को श्रीवत्स कहा है—अंक श्रीवत्सो ! टीकाकार का अभिमत है— श्रया युक्तों वत्सो वक्षोऽनेन श्रीवत्स: रोमावर्तविशेष:। हलायुधकोश में निर्दिष्ट है—स तु वक्षस्य शुक्लवर्णदक्षिणावर्त लोमावली। यही कारण है कि महापुरुषों के प्रधान लक्षण में श्रीवत्स की गणना की गई है। जैन तीर्थंकरों के प्रमुख चिह्नों में श्रीवत्स भी एक है। बृहत्संहिता एवं मानसार के अनुसार—

आजानुलम्बबाहु: श्रीवत्सांक: प्रशान्तमूर्तिश्च।

दिग्वासास्तरुणो रूपवांश् श्च कार्योऽर्हतां देव:।।
निराभरणसर्वांगं निर्वस्त्राड्गं मनोहरम्।

सर्ववक्षस्थले हेमवर्णश्रीवत्सलांछनम्।।

जैन अद्र्धमागधी आगम औपपातिक सूत्र में भगवान महावीर के वक्षलक्षण के रूप में श्रीवत्स का उल्लेख है—सिरिवच्छंकियं वच्छे।’’ उनके हाथ पर स्वस्तिक का भी चिह्न था। प्रवचनसारोद्धार नामक ग्रंथ में तीर्थंकरों के चिह्नों में श्रीवत्सादि का भी उल्लेख है। विष्णु रामादि के श्रेष्ठ चिह्नों में श्रीवत्स का उल्लेख अनेक बार मिलता है। रामायण में श्रीराम विष्णु के अवतार माने गए हैं तथा उन्हें श्रीवत्सवक्ष कहा गया है—

श्रीवत्सवक्षो नित्यश्रीरजय्: शाश्वतो ध्रुव:।
मानुषं रूपमास्थाय विष्णु: सत्यपराक्रम:।।

महाभारत में श्रीवत्स विषयक एक बड़ी ही रोचक घटना वर्णित है। श्रीरुद्र और श्रीनारायण के बीच युद्ध होता है। युद्ध के बाद जब संधि हुई तो श्री नारायण ने श्रीरुद्र से कहा कि आपके शूल से अंकित मेरे वक्षस्थल का यह चिह्न आज से श्रीवत्स होगा तथा मेरे हाथ से जो आपके कण्ठ में चिह्न अंकित हो गया है, उससे आप श्रीकण्ठ कहलायेंगे—

अद्यप्रभृति श्रीवत्स: शूलांकोऽयं भविष्यति।
मम पाण्यंकितश्चापि श्रीकण्ठस्त्वं भविष्यसि।।

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण के वक्ष:स्थल पर श्रीवत्स सुशोभित था—श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभिकौस्तुभम्।’’ महाकवि कालिदास ने श्रीविष्णु के वक्षस्थल पर विद्यमान श्रीवत्स का सुन्दर वर्णन किया है। रघुवंश में आया है—

प्रभानुलिप्तश्रीवत्सं लक्ष्मीविभ्रमदर्पणम्।
कौस्तुभाख्यामपां सारं विभ्राणं बृहतोरसा।।

कुमारसंभव में प्रथम विधाता (श्री विष्णु) को श्रीवत्स युक्त बताया गया है—

तमभ्यगच्छत प्रथमो विधाता श्रीवत्सलक्ष्मा पुरुषश्चसाक्षात्

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार श्रीवत्सांकित मनुष्य राजा, चक्रवर्ती, सम्राट्, श्रेष्ठदानी, धर्मरक्षक एवं धर्मप्रवर्तक होता है। श्रीवत्सांकित पुरुष यज्ञ दानादि में निपुण तथा धनधान्य सम्पन्न होता है। स्त्री के किसी भी अंग में यह चिह्न हो तो वह रानी बनती है।

जैन प्रतिमा विज्ञान और श्रीवत्स

जैन कला में सबसे प्राचीन तीर्थंकर मूर्तियों पर रीवत्स का चिह्न अंकित मिलता है। मथुरा से प्राप्त होने वाली तीर्थंकर की मूर्तियों के वक्षस्थल पर प्राप्त श्रीवत्सलांछन शुंगयुगीन श्रीवस्त का अलंकृत रूप है। मथुरा में मिली ऐसी जैन तीर्थंकरों की १७ मूर्तियाँ मथुरा के पुरातात्विक संग्रहालय में तथा १४ लखनऊ के राज्य संग्रहालय में हैं। इनके वक्ष पर अंकित श्रीवत्स कुषाण तथा गुप्तकालीन अपने स्वरूप विकास पर अच्छा प्रकाश डालते हैं। विदिशा क्षेत्र में मिली तीर्थंकर मूर्तियों पर भी वैसा ही चिह्न है। मथुरा संग्रहालय की वद्र्धमान की एक आदमकद प्रतिमा के वक्ष पर श्रीवत्स का सुन्दर मध्यमणि के समान चिह्न अंकित है, जिसका स्वरूप लगभग कमल पुष्प जैसा है। लखनऊ के राज्य संग्रहालय की एक जैन प्रतिमा पर कमल जैसा श्रीवत्स अंकित है। अन्यत्र भी एतद्विषयक प्रभूत सामग्री उपलब्ध होती है।

६.३.
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नन्द्यावर्त शब्द नन्दि और आवर्त दो शब्दों के मल से बना है। नन्दि जनको आवर्तों यत्र:। मांगलिक गृह को नन्द्यावर्त कहते हैं। अमरकोशकार ने ईश्वरसद्यविशेष को नन्द्यावर्त कहा है—स्वस्तिक: सर्वतोभद्रो नन्द्यावर्तादयोऽपि च। विच्छंदक प्रभेदाहि भवंति ईश्वरसद्यनाम।

अभिधान चिन्तामणि में में अठारहवें तीर्थंकर अर का चिह्न विशेष नन्द्यावर्त बताया गया है। वहीं पर विशिष्ट ढंग से बने हुए धनवानों के गृह को नन्द्यावर्त कहा है। वृक्ष का एक नाम नन्द्यावर्त है।

मोनीयरविलिम्स ने संस्कृत—अंग्रेजी कोश में निम्न अर्थों की ओर निर्देश किया है—King diagram, anything so formed, a palace or temple, a species of large fish, the holy fig & tree any trace, a kind of shell, attitude in dancing.

प्राकृत हिन्दी कोश में नन्द्यावर्त (नन्दियावर्त) के निम्नलिखित अर्थ निर्दिष्ट है—स्वस्तिक विशेष, एक लोकपालदेव, क्षुद्रजन्तुविशेष, देवविमानविशेष।

६.४
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‘वर्धच्छेदनपूरणयो:’ धातु से शानच् शप् मुक् (म) करने पर वद्र्धमान बनता है। पुन: वद्र्धमान शब्द से ‘संज्ञायांकन’ पाणिनिसूत्र से कन् (क) प्रत्यय होकर वद्र्धमानक शब्द बनता है। वर्धते इति वर्धमानक अर्थात् जो नित्य वर्धनशील हो या वैसा चिह्न विशेष जो नित्य समृद्धिकारक हो वह धर्ममानक है। स्वार्थ में क प्रत्यय होकर भी वर्धमानक शब्द बनता है। धनिकों या देवों या श्रेष्ठजनों के गृहविशेष को वर्धमानक कहा जाता है। बृहत्संहिता में वद्र्धमानक गृह विशेष का लक्षण निर्दिष्ट है।

प्राचीन काल का एक विख्यात देश का नाम भी वद्र्धमान या वद्र्धमानक है। मार्वâण्डेय पुराण के अनुसार भद्राश्ववर्ष का एक कुलपर्वत विशेष वद्र्धमानक है।’ अमरकोशकार ने वद्र्धमानक को ‘सराव’ कहा है—सरावो वद्र्धमानक:। मोनीयर विलियम्स ने लिखा है—.a dish of saucer of a partic shape. Lid of cover way of joining the hands. a serpent demon, vatious men. प्राकृत—हिन्दी कोश’ के अनुसार अठासी महाग्रहों में एक महाग्रह ज्योतिष्क देवविशेष एक देवविमान शराब व पुरुष वर आरूढ़ पुरुष, स्वस्तिक—पंचक, एक तरह का महल है।

६.५.
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श्रेष्ठ, सुखकारक सिंहासन को भद्रासन कहा जाता है। अमरकोशकार ने सिंहासन या नृपासन को भद्रासन कहा है—्नाृपासनं यत्तद् भद्रासनं सिंहासनं तत्। आचार्य हेमचन्द्र ने राजा के बैठने के आसन को भद्रासन कहा है—भद्रासनं नृपासनम्।

भद्राय लोकहिताय आसनम् भद्रासनम् अर्थात् लोककल्याणक के लिए बनाया गया राजा का आसन भद्रासन है। योगियों के आसन विशेष को ही भद्रासन कहते हैं। मोनीयर विलियम्स ने निम्न अर्थों की ओर निर्देश किया है—a splendid seat, throne, posture of a devotee during meditaion.

बृहत्संहिता में भद्रासन का स्वरूप बताया गया है। वह श्रेष्ठ मणियों, सुवर्णों एवं रत्नों का बना होता था। उस पर मृगचर्म, हस्तिचर्म एवं अन्य प्रकार के श्रेष्ठ एवं सुखस्पर्श गद्दों का प्रयोग किया जाता था। साढ़े तीन हाथ उसकी ऊँचाई होती थी। माण्डलिकों, राज्यविस्तार के इच्छुक राजाओं के लिए वह शुभदायक था। प्रसन्न मन से राजा लोग उस पर बैठते थे। आगम साहित्य में अनेक स्थलों पर भद्रासन का सुन्दर वर्णन मिलता है। राजा बल की पत्नी प्रभावती महास्वप्नों को देखकर राजा के पास जाती है और राजा से सम्मानित होकर नाना प्रकार के मणिरत्नों से खंचित श्रेष्ठ आसन (भद्रासन) पर बैठती है। नानामणिरयणभत्तिचित्तंसि भद्दासणंसि। राजा बल प्रात:काल उठकर पूर्व दिशा की ओर मुंहकर श्रेष्ठ आसन पर बैठता है। श्रेष्ठ आसन पर बैठकर वह नृपति अपने से उत्तर पूर्व भाग में आठ भद्रासनों का निर्माण करता है। वे भद्रासन उत्कृष्ट श्वेत वस्त्रों से आच्छादित थे तथा प्रयोजन सिद्धि हेतु मांगलिक उपचारों (कृत्यों) से युक्त थे। वह पुन: रानी प्रभावती के लिए भी नानामणि रत्नों से खचित, सुकोमल एवं सुन्दर बिछावन एवं आसनों का निर्माण करता है। स्वप्न पाठकों को बुलाकर राजा बल भद्रासनों पर बैठता है। राजा उद्रायण के दाहिने भाग में विद्यमान श्रेष्ठ भद्रासन पर बैठकर पद्यावती तीर्थंकरों के अतिशय—छत्रादि को देखती है। ज्ञाताधर्मकथा में अनेक स्थलों पर भद्रासन का वर्णन है। धारिणी मांगलिक महास्वप्नों को देखकर राजा श्रेणिक के पास निवेदन करने लगती है। राजा श्रेणिक से सम्मानित होकर श्रेष्ठ भद्रासन पर बैठती है। वह भद्रासन नाना प्रकार के मणिरत्नों से खंतिच था। राजा श्रेणिक भी भगवती सूत्र के राजा बल के समान उत्तर पूर्व भाग में आठ भद्रासनों को निर्माण कराता है। वे भद्रासन श्वेत वस्त्रों से आच्छादित एवं सिद्धिदायक मांगलिक उपचारों से युक्त थे।’

अष्टमंगलों में भद्रासन

ज्ञानाधर्मकथा में ही एक स्थल पर अष्टमांगलिक द्रव्यों में भद्रासन का उल्लेख है। सोवत्थिय—सरिवच्छ—नांदियावत्त—वद्धमाणक—भद्दासन—कलस—मच्छ—दप्पणया। प्रश्नव्याकरण में एक स्थल पर भद्रासन का उल्लेख है। औपपातिक में निर्दिष्ट श्रेष्ठ अशोक वृक्ष के आगे अष्टमंगलों में भद्रासन का निर्देश है। यहाँ अष्टमंगलों का सुन्दर चित्रण है। उसके अनेक गुणों का निर्देश है। वे अष्टमंगल सभी प्रकार के श्रेष्ठ रत्नों के बने हुए सुन्दर, स्वच्छ, स्पर्शसुखदायक, रजरहित, निर्मल, निरूपंक, उद्योतयुक्त एवं रमणीय थे। औपपातिक सूत्र में भी अष्टमांगलिक पदार्थों का निर्देश है। राजप्रश्नीय में औपपातिक की तरह भद्रासन के साथ अष्टमांगलिक द्रव्यों का स्वरूप वर्णित है। वहीं पर सूर्याभदेव भद्रासन की विकुर्वणा करता है। सिंहासन के चारों तरफ चार—चार यानि सोलह भद्रासनों की रचना करता है। सूर्याभदेव स्व विरचित यानविमान में भी अष्टमंगल का निर्माण करता है। वहीं पर विभिन्न प्रकार के महलों में अनेक प्रकार के आसनों के साथ रत्नमय भद्रासन का निर्माण करता है। सिद्धायतन में विद्यमान जिनप्रतिमाओं के सामने अष्टमांगलिक द्रव्यों के साथ भद्रासन की रचना भी की गई थी। वहीं पर सूत्र ६५८ से ६६४ तक प्रत्येक में सुधर्मा सभा में भद्रासनों का वर्णन है। जिन पर ऋद्धि सम्पन्न देव, अग्रमहिषियों तथा अन्य प्रकार के देव बैठते हैं। जीवाजीवाभिगम सूत्र में त तोरण द्वारों पर अष्टमंगलों के साथ भद्रासन को अंकित बताया गया है। विजयद्वार के अन्तर्गत अनेक भद्रासनों का उल्लेख है। एक स्थल पर एक श्रेष्ठ भवन (प्रासादावतंक) का वर्णन है। जिसमें अनेक सिंहासनादि सुशोभित हैं। उनके साथ परिवाराभूत भद्रासन भी बने हैं। वहीं अष्टमंगलों के होने का भी उल्लेख है। भद्रासन के साथ मांगलिक ध्वजों का भी होना बताया गया है—भद्दासणाइं उविंर मंलगा झयां। जीवभिगम सूत्र में अन्यत्र भी सिद्धासनों का वर्णन है। अन्य जैन ग्रंथों में अनेक स्थलों पर भद्रासन का वर्णन है। जैनेतर शास्त्रों में भी भद्रासन का स्वरूप निरूपित है।

६.६
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कलश शब्द कलश और कलस दोनों रूपों में मिलता है। कल उपपदपूर्वक शु गतौ धातु से प्रत्यय करने पर कलश शब्द बनता है। कलं धुराव्यक्तशब्द शवति जलपूरणसमये प्राप्नोति ‘अच्’। इत्यर्थ ‘अच् ’ । घट, कुट, निप, कलस, कुम्भ, करीर आदि पर्याय है। कलश शब्द क उपपद पूर्वक लसदीप्तौ धातु से अच् प्रत्यय करने पर भी निष्पन्न होता है। केन जलेन लसति शोभते अर्थात् जो जल से सुशोभित होता है वह कलस है। कालिका पुराण में कलस का सुन्दर निवर्चन प्राप्त है।
कला: कलास्तु देवानामसितास्ता: पृथक् पृथक्।
यत: कृतास्तु कलसास्ततस्ते परिकीर्तिता:।।

सर्वप्रथम सागर मंथन के समय चौदह-रत्नों के साथ अमृत—कलश की उत्पत्ति हुई। उसमें भरे हुए अमृत को थोड़ा—थोड़ा एवं पृथक्—पृथक् देवों ने पान किया, इसलिए उसका नाम कलश पड़ा। वहीं पर नव भेदों का उल्लेख भी है—गोह्य, उपगोह्य, मरुत, मयूख, मनोहा, ऋषिभद्र, तनुशोधक और विजय। क्षितीन्द्र, जलसंभव, पवनोद्भूत, अग्निकलस, यजमान, कोषसंभव, सोम, आदित्य और विजय ये अन्य आठ नाम भी मिलते हैं। पंचमुखी कलस का उल्लेख है। साहित्यिक परम्परा में कलश या पूर्णघट का उल्लेख सर्वप्रथम विश्व के आद्य ग्रन्थ ऋग्वेद में प्राप्त होता है। वहां पर पूर्ण कलश कुंभ, और भद्रकलश आदि रूप में कलश का सुन्दर वर्णन हुआ है। स्मृति साहित्य में अनेक स्थलों पर जलपात्र के रूप में इसका वर्णन मिलता है। स्कन्दपुराण में पार्वती के विवाह के अवसर पर वर्णित मांगलिक चिह्नों में सुवर्णकलश का भी उल्लेख है। मत्स्पुराण में श्रीपर्णी लता सहित पूर्णकुंभ को मुख्य द्वार पर रखकर अक्षत एवं जल से पूजने का विधान है। देवालया और भवनों में भी पद्मयुक्त कलश के अंकन का विधान बताया गया है। कालिदासादि के काव्यों में इसका प्रभूत प्रयोग हुआ है। शकुन्तला के स्तनों को घट से उपमित किया गया है—घटस्त्नप्रस्त्रवनै: व्यवर्धयत्। रघुवंश में सौभाग्य एवं पूर्णता का प्रतीक पूर्णकुम्भ से सुशोभित गृहद्वार का वर्णन है। आचार्य भतृहरि ने उत्कृष्ट युवति के स्तनों की उपमा कनककलश से दी है। अमरुक शतक में ‘स्तनकलश’ शब्द का प्रयोग हुआ है। पंडितराज जगन्नाथ ने कुम्भ शब्द का प्रयोग किया है—इयं सुस्तनी मस्तकन्यस्तकुम्भा। इस प्रकार काव्यकाल में कलश की उदात्तता, पवित्रता और रमणीयता तथा मंगलचारूता के कारण कौमार्यसम्पन्न कन्याओं के स्तनों के लिए कुम्भ, घट, कलश आदि उपमान के रूप में प्रयोग किया गया है। बौद्ध वाङ् मय में कलश के मांगलिक रूप का दर्शन होता है। ललित—विस्तर मे विभिन्न अवसरों पर मांगलिक चिह्नों की सूचियाँ दी गई हैं। बुद्ध की हथेली पर अंकित चिह्नों में स्वस्तिक, शंख, मीन आदि के साथ कलश का भी उल्लेख प्राप्त है। वहीं पर बुद्ध के जन्म के संदर्भ में गंधोदक से भरा हुआ पूर्णकुंभ का भी वर्णन उपलब्ध होता है। जैन वाङ् मय में इसका प्रभूत वर्णन मिलता है। अष्टमांगलिक द्रव्यों में इसका प्रमुख स्थान है। भगवतीसूत्र में अनेक प्रकार के कलशों का उल्लेख है। जामालिक्षत्रियकुमार के सिंहासनाभिषेक महोत्सव काल में अनेक कलशों की स्थापना की गई थी। उनमें आठ सौ सुवर्ण कलश, आठ सौ रुपये (चाँदी के) कलश, आठ सौ मणि कलश, आठ सौ सुवर्ण और चाँदी के मिश्रण से बने कलश, आदि अनेक कलशों का वर्णन है। कलश के मांगलिक जल से उसका स्नान कराया जाता है। शिवभद्रकुमार के राज्याभिषेक समय में भी अनेक प्रकार के मांगलिक कलशों की संस्थापना की गई थी। उद्रायण राजा के अभिषेक काल में भी अनेक मांगलिक कलशों की प्रतिष्ठा की गई थी। इसी प्रकार ज्ञाताधर्मकथा, अंतकृद्दशा, प्रश्नव्याकरण, विपाकसूत्र आदि में अनेक स्थलों पर कलश के मांगलिक रूप का दर्शन होता है।

६.७.
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‘मद् धातु से ‘ऋतन्यजीति’ सूत्र से स्यन् (स्य) प्रत्यय करने पर मत्स्य शब्द निष्पन्न होता है। माद्यन्ति लोकाऽनेनेति। जिससे संसार प्रसन्न होता है। मत्स्य दृष्टिरमणीय होता है। जल की स्वच्छता उसका कार्य है। भगवान विष्णु का प्रथमावतार मत्स्य ही है। लोकमंगल के लिए भगवान ने मत्स्य का रूप धारण किया।

शास्त्रों में निर्दिष्ट मांगलिक द्रव्यों में मत्स्य का स्थान है। जैन अष्टमंगल में मत्स्य है। आगम साहित्य में अनेक स्थलों पर निर्दिष्ट अष्टमंगलों की सूची में मत्स्य का उल्लेख है। भारतीय कला विशेषत: वास्तुकला में मत्स्यांकन का प्रभूत उपयोग प्राप्त है।

६.८
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‘दृप् संदीपने’ धातु से ‘णिच् ’ और नन्दिग्रपचादिभ्यो ल्युणिन्यच: सूत्र से ल्यु प्रत्यय करने पर दर्पण बनता है। दर्पयति सन्दीपयति इति दर्पण: अर्थात् जो संदीपित करता है, दिखा देता है, वह दर्पण है। मुकुट, आदर्श, आत्मादर्श आदि पर्याय शब्द हैं। जो पापरूप दर्प का विनाशक है। मंगलकारक है वह दर्पण है। राजवल्लभ के अनुसार यह आयु, लक्ष्मी, यश, शोभा, स्मृद्धि का कारक है।

दर्पण देखकर यात्रारंभ मंगलदायक माना जाता है। शास्त्रों में मांगलिक द्रव्यों के साथ दर्पण का भी उल्लेख है। आगम ग्रंथों में अनेक स्थलों पर अष्टमांगलिक द्रव्यों में तथा स्वतन्त्र रूप से भी दर्पण का उल्लेख है। इस प्रकार अष्टमांगलिक द्रव्यों में स्वस्तिक, श्रीवस्त, नन्द्यावर्त, वद्र्धमानक, भद्रासन, कलश, मत्स्य दर्पण आदि का संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत किया गया। इनके अतिरिक्त भी अन्य मांगलिक द्रव्य, ब्राह्मण, अग्नि, शंख, कमल, दूर्वा, अक्षत, दही आदि हैं, उनका भी यथासंभव वर्णन विवेचन किया जाना वांक्ष्य है।

७. अष्टमंगल में आठ संख्या का महत्त्व

अब प्रश्न होता है कि मांगलिक द्रव्य तो अनेक हैं, लेकिन अष्ट का ही ग्रहण क्यों किया गया। आठ की संख्या का क्या महत्त्व है ? इस संदर्भ में अष्ट संख्या विचारणीय है।

अष्ट शब्द की व्युत्पत्ति ‘अशू व्याप्तौ’ धातु से तुट् एवं कन् प्रत्यय करने पर अष्ट शब्द निष्पन्न होता है। जो सर्वत्र परिव्याप्त होता है, वह अष्ट है। संसार में जितने भी अष्ट संख्या वाचक पदार्थ हैं वे सब सर्वशक्तिमान, ऐश्वर्यवान एवं विभूतिमय हैं। कुछ अष्टसंख्यावाचक पदार्थों का नामोल्लेख इस प्रकार है—

  1. योग के अष्ट अंग—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धरणा, ध्यान, समाधि।
  2. अष्ट वसु (एक प्रकार के देव समूह)—आप, ध्रुव, सोम, घर या धव, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास।
  3. अष्ट शिवमूर्ति पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आकाश, सूर्य, चन्द्रमा तथा यज्ञ।
  4. अष्ट दिग्गज।
  5. अष्टसिद्धि—अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और कामावसायिता।
  6. अष्ट ब्रह्मश्रुति।
  7. अष्ट व्याकरण—इन्द्र, चन्द्र, काशकृत्स्न्य, आपिशली, शाकटायन आदि।
  8. अष्ट दिग्पाल—आठों दिशाओं के आठ दिशापाल—इन्द्र, अग्नि, यम, नैऋत, वरुण, मरुत, कुबेर और ईश।
  9. अष्ट अहि।
  10. अष्टकुलाद्रि आठ कुलपर्वत—महेन्द्र, मलय, मन्दर, सह्य, शुक्तिमान ऋक्षपर्वत, विन्ध्य, परियात्र।
  11. अष्ट— ऋषभ, जीवाक, भेद, महाभेद, ऋद्धि, वृद्धि, काकोली, क्षीरकाकोली।
  12. अष्टांग प्रणाम—शरीर के आठ अंगों द्वारा किया जाने वाला प्रणाम—दो जानु, दो पैर, दो हाथ, वक्षस्थल, बुद्धि शिर, वाणी और दृष्टि से किया जाने वाला प्रणाम।
  13. अष्ट मैथुन—आठ प्रकार के संभोग रस—स्मरण, कीर्तन, क्रीड़ा—प्रेक्षण, गुह्यभाषण, संकल्प, अध्यवसाय और क्रियानिष्पत्ति।
  14. अष्टाध्यायी—आठ अध्यायों वाला व्याकरण ग्रंथ।
  15. अष्ठनृपकत्र्तव्य—राजा के आठ कत्र्तव्य—ग्रहण, विसर्जन, प्रैष, निषेध, अर्थवचन, व्यवहार कार्य (न्याय) दण्डशुद्धि और सदा प्रजानुरक्त।
  16. अष्ट गुण—श्रेष्ठ ब्राह्मण के आठ गुण—सभी जीवों पर दया, क्षांति, अनसूया, शौच, अनायास, मंगल, अकृपणता और निस्पृह।
  17. अष्टदलकमल—सभी कमलों के श्रेष्ठ आठ दलों वाला कमल।
  18. चिकित्साशास्त्र के आठ अंग—शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमरभृत्य, अगदतंत्र, रसायनतंत्र, वाजीकरणतंत्र।
  19. सूर्य के अष्ट अघ्र्य—जल, दुग्ध, कुशाग्रभाग, घृत, दधि, लालकरवीर और चन्दन।
  20. अष्ट धातु—स्वर्ण, रुप्य (चांदी) ताम्र, रंग, जस्ता, सीसा लौह, पारा।
  21. अष्ट रत्न—पुष्पराग, माणिक्य, इन्द्रनील, गोमेद, वैदूर्य, मौक्तिक, विद्रुम।
  22. अष्ट रस—साहित्सशास्त्र के आठ रस—शृंगार, हास, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स एवं अद्भुत।

इस प्रकार उपर्युक्त उद्धरणों से अष्ट शब्द की महनीयता सिद्ध है, इसलिए अष्टमंगल का ग्रहण हुआ।

—सन्दर्भ ग्रंथ—

१. भागवत पुराण, १२, १२, ४९, २. उ. सू. ५७० ३. शब्दकल्पद्रुम ३, पृ. ५६४ ४. तिलोयपण्णत्ति १—९ ५. दशवैकालिक चूर्णि पृ. १५ ६. धवलापुराण १, पृ. ३१—३३ ७. भागवत पुराण ५. १४.३४ ८. शब्दकल्पद्रुम ३, पृ. ५०४ ९. अमर कोश १.१.४.४.३ १०. ब्रह्मवैवर्तपुराण गणपति खण्ड १ अ. ६ ११. ब्रह्मवैवत्र्त पुराण, श्रीकृष्ण जन्म खण्ड अध्याय ७०) मत्स्यसूक्तमहातन्त्र (पटल ४३) १२. शब्दकल्प भाग—१, पृ. १४८ १३. वही, १, पृ. १४८ १४. वही, ९, पृ. २०४ १५. ज्ञाता सूत्र १.७. १४३ १६. औपपातिक सूत्र १२ १७. वही, ६४ १८. वही, १२ १९. राजप्रश्नीय सूत्र ४९ २०. वही, २९१ २१. जीवाजीवाभिगम ३. २८९ २२. तिलोयपण्णत्ति ४—१९७९ २३. महापुराण १३.९१, १५.४३७—४३, २२.१८५, २१०, पद्मपुराण २.१३७ २४. उत्तराध्ययन सूत्र ४.१८० २५. शब्दकोश ५ पृ. ४८९ २६. वही, ३.४.३. २७. ऋग्वेद १.८९.६ सामवेद १८७५ तै. आ. १.१.१ २८. अभिधान चिन्तामणि कोश १.२७.४७ २९. ललितविस्तर अध्याय २१, पृ. २३२ ३०. दिव्यादानव, मैत्रेयावदान, ३ पृ. ३४ ३१. औपपातिक सूत्र, १६ ३२. अभिधान चिन्तामणि, २.१३६ ३३. बृहत्संहिता ५८/४५ ३४. मानसार ५५/४६ ३५. औपातिक सूत्र, १६ ३६. युद्ध १११.१३ ३७. भागवत पुराण १०.३.९. ३८. रघुवंश १०.१० ३९. कुमारसंभव ७/४३ ४०. अभिधान चिन्तामणि, १.४८ ४१. वही, ४.१८ ४२. बृहत्संहिता ५३/३३ ४३. मार्वण्डेय पुराण ५९.१२ ४४. अमरकोश २.९.३२ ४५. प्राकृत हिन्दी कोश, पृ. ७१० ४६. अमरकोश २.८.२.३१ ४७. अभिधान चिन्तामणि ३.३८० ४८. शब्दकल्प भा. ३ पृ. ४ ४९. बृहतसंहिता अध्याय ४८ ५०. भगवती सूत्र ११.१३३ ५१. वहीं, ११.१३८ ५२. ज्ञातासूत्र १.१.१९ ५३. वही, १.१.२५ ५४. वही, १.१.१४३ ५५. प्रश्न व्याकरण ४.४ ५६. औपपातिक सूत्र, १२, ६४ ५७. राजप्रश्नीय सूत्र ११, औप. सूत्र, १२ ५८. जीवाजीवानगम ३.२८९ ५९. वही, ३.३७० ६०. कालिका पुराण ८७ ६१. शब्दकल्पद्रुम—२ पृ. ५७ ६२. ऋग्वेद ३.३२.१५ ६३. वही, १.११६.७ ६४. वही, १०.३२.९ ६५. स्कन्ध १.२४.२३ ६६. मत्स्पुराण २५५.१९ ६७. वही, २५५.५ ६८. रघुवंश, ५०.६३ ६९. भृतहरि १.९७,३.२० ७०. अमरुक शतक, ५४ ७१. ललित. अ. २१ पृ. २३२ ७२. वही, ७.७१७३ भगवती, ९.१८२ ७४. वही, ११.६ ७५. वहीं, १३.११५ ७६. शब्दकोश २, पृ.६८८।

डाॅ. हरिशंकर पांडेय अध्यक्ष—प्राकृत एवं जैनागम विभाग सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

( प्राचीन तीर्थ जीर्णोद्धार पत्रिका - सितंबर , २०१३ से )