"तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिकालकार के आधार पर व्रतों के अतिचारों की समीक्षा" के अवतरणों में अंतर

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देव, गुरु, संघ, आत्मा आदि की साक्षीपूर्वक जो हिंसादि पापों का परित्याग किया जाता है, उसे वत कहते हैं । पाँचों पापों का यदि एकदेश, आशिक या साल त्याग किया जाता है, तो उसे अणुव्रत कहते हैं और यदि सर्वदेश त्याग किया जाता है, तो उसे महाव्रत कहते हैं । पाप पांच होते हैं,  .अत: उनके त्याग रूप अणुव्रत और महाव्रत भी पांच-पांच हैं । इस व्यवस्था के अनुसार महावतों के धारक मुनि और अणुव्रतों के धारक श्रावक कहलाते हैं । पांचों अणुव्रत श्रावक के शेष व्रतों के और पांचों महाव्रत मुनियों के शेष व्रतों के मूल आधार हैं, अतएव उन्हें मूलवत या मूलगुण भी कहा जाता है । मूलव्रतों की रक्षा के लिये जो अन्य व्रतादि धारण किये जाते उन्हें उत्तरगुण में के और निर्दिष्ट किये कहा जाता है । इसके अनुसार मूल श्रावक पांच मूलगुण सात उत्तरगुण गये हैं । कुछ आचार्यो ने उत्तर गुणों को ' शीलवत ' की संज्ञा भी दो हैं । कालान्तर में श्रावक के मूलगुणों की संख्या पांच से बढकर ८ हो गई । अर्थात् ५ अणुव्रतों के साथ तीन मकारों ( मद्य, मांस, मधु) के सेवन का त्याग करना अष्टमूलगुण कहलाने लगे। कुछ समय उपरान्त पांच पापों का स्नान पांच उदुम्बर फलों ने ले लिया और नये अष्टमूलगुण माने जाने लगे जो वर्तमान में भी अधिकतर माने जाते हैं ।
 
देव, गुरु, संघ, आत्मा आदि की साक्षीपूर्वक जो हिंसादि पापों का परित्याग किया जाता है, उसे वत कहते हैं । पाँचों पापों का यदि एकदेश, आशिक या साल त्याग किया जाता है, तो उसे अणुव्रत कहते हैं और यदि सर्वदेश त्याग किया जाता है, तो उसे महाव्रत कहते हैं । पाप पांच होते हैं,  .अत: उनके त्याग रूप अणुव्रत और महाव्रत भी पांच-पांच हैं । इस व्यवस्था के अनुसार महावतों के धारक मुनि और अणुव्रतों के धारक श्रावक कहलाते हैं । पांचों अणुव्रत श्रावक के शेष व्रतों के और पांचों महाव्रत मुनियों के शेष व्रतों के मूल आधार हैं, अतएव उन्हें मूलवत या मूलगुण भी कहा जाता है । मूलव्रतों की रक्षा के लिये जो अन्य व्रतादि धारण किये जाते उन्हें उत्तरगुण में के और निर्दिष्ट किये कहा जाता है । इसके अनुसार मूल श्रावक पांच मूलगुण सात उत्तरगुण गये हैं । कुछ आचार्यो ने उत्तर गुणों को ' शीलवत ' की संज्ञा भी दो हैं । कालान्तर में श्रावक के मूलगुणों की संख्या पांच से बढकर ८ हो गई । अर्थात् ५ अणुव्रतों के साथ तीन मकारों ( मद्य, मांस, मधु) के सेवन का त्याग करना अष्टमूलगुण कहलाने लगे। कुछ समय उपरान्त पांच पापों का स्नान पांच उदुम्बर फलों ने ले लिया और नये अष्टमूलगुण माने जाने लगे जो वर्तमान में भी अधिकतर माने जाते हैं ।
  
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ऊर्ध्वव्यतिक्रम, अधोव्यतिक्रम, तिर्यग्व्यतिक्रम, क्षेत्रवृद्धि और स्मृत्यन्तराधान ये पांच अतिचार दिग्विरमणव्रत के हैं । ' सीमित की जा चुकी दिशा की अवधि का उल्लंघन कर देना अतिक्रम कहा जाता है । विशेष रूप से अतिक्रम करना व्यतिक्रम है ।
 
ऊर्ध्वव्यतिक्रम, अधोव्यतिक्रम, तिर्यग्व्यतिक्रम, क्षेत्रवृद्धि और स्मृत्यन्तराधान ये पांच अतिचार दिग्विरमणव्रत के हैं । ' सीमित की जा चुकी दिशा की अवधि का उल्लंघन कर देना अतिक्रम कहा जाता है । विशेष रूप से अतिक्रम करना व्यतिक्रम है ।
पर्वत, वृक्ष, मीनार आदि पर ऊपर चढ़ जाना, नीचे कुआ, बावडी आदि में उतरना और तिर्यक् में बिल, गुफा, सुरंग आदि में प्रवेश
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<Div align=right >'''अनेकान्त जनवरी मार्च २०१३ पेज न ७५ से ८५''' </div>
 
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२०:५०, २० जुलाई २०१७ के समय का अवतरण

तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिकालकार के आधार पर व्रतों के अतिचारों की समीक्षा

देव, गुरु, संघ, आत्मा आदि की साक्षीपूर्वक जो हिंसादि पापों का परित्याग किया जाता है, उसे वत कहते हैं । पाँचों पापों का यदि एकदेश, आशिक या साल त्याग किया जाता है, तो उसे अणुव्रत कहते हैं और यदि सर्वदेश त्याग किया जाता है, तो उसे महाव्रत कहते हैं । पाप पांच होते हैं, .अत: उनके त्याग रूप अणुव्रत और महाव्रत भी पांच-पांच हैं । इस व्यवस्था के अनुसार महावतों के धारक मुनि और अणुव्रतों के धारक श्रावक कहलाते हैं । पांचों अणुव्रत श्रावक के शेष व्रतों के और पांचों महाव्रत मुनियों के शेष व्रतों के मूल आधार हैं, अतएव उन्हें मूलवत या मूलगुण भी कहा जाता है । मूलव्रतों की रक्षा के लिये जो अन्य व्रतादि धारण किये जाते उन्हें उत्तरगुण में के और निर्दिष्ट किये कहा जाता है । इसके अनुसार मूल श्रावक पांच मूलगुण सात उत्तरगुण गये हैं । कुछ आचार्यो ने उत्तर गुणों को ' शीलवत ' की संज्ञा भी दो हैं । कालान्तर में श्रावक के मूलगुणों की संख्या पांच से बढकर ८ हो गई । अर्थात् ५ अणुव्रतों के साथ तीन मकारों ( मद्य, मांस, मधु) के सेवन का त्याग करना अष्टमूलगुण कहलाने लगे। कुछ समय उपरान्त पांच पापों का स्नान पांच उदुम्बर फलों ने ले लिया और नये अष्टमूलगुण माने जाने लगे जो वर्तमान में भी अधिकतर माने जाते हैं ।

इस प्रकार पांचों अणुव्रतों की गणना उत्तरगुणों में होने लगी और सात के स्थान पर बारह उत्तर गुण अथवा बारह व्रत श्रावक के हो गये । किन्तु यह परिवर्तन श्वेताम्बर परम्परा में दृष्टिगोचर नहीं होता है । साधुओं के पाँचों पापों का सवइथा त्याग नवकोटि अर्थात् मन, वचन, काय और कृतकारित अनुमोदना से होता है । अतएव उनके व्रतों में किसी भी प्रकार दोष लगने का अवसरास्थान नहीं होता है । परन्तु श्रावकों के प्रथम तो सभी पापों का सर्वथा त्याग संभव नहीं है, दूसरे प्रत्येक व्यक्ति नवकोटि से स्थूल पापों का भी त्याग नहीं कर सकता । तीसरे प्रत्येक व्यक्ति के आस-पास का वातावरण एक समान नहीं रहता है । इन सब बाह्य कारणों से और प्रत्याख्यानावराग, संज्वलन और नोकषायों के तीव्र उदय से उसके व्रतों में कछ न कछ दोष लगता रहता है । अतएव व्रत की भावना रखते हुए भी प्रमादादि तथा बाह्य परिस्थिति-जनित कारणों से गृहीत व्रतों में दोष लगने का, वत के आशिक रूप सै खण्डित होने का और स्वीकृत व्रत की मर्यादा के उल्लंघन का नाम ही शास्त्रकारों ने अतिचार' ' रखा है । जैसाकि पं. आशाधर जी लिखते हैं- सापेक्षस्य वते हि स्यादतिचारोऽश भंजनमू

जब अप्रत्याख्यानावरण कषाय का तीव्र उदय होता है), तो व्रत जड़ से खण्डित हो जाता है, उसके लिये आचार्यो ने ' अनाचार' कहा है । कल्पना करें कि किसी व्रत के लिये १०० अंक निर्धारित कर दिये जायें तो १ से लेकर ११ तक का व्रत-खण्डन अतिचार की सीमा में आता है, क्योंकि आचायों का मत है कि व्रती के एक प्रतिशत की अपेक्षा भावना व्रतधारण की बनी हुई है । यदि वह एक प्रतिशत की भावना भी न रहे तो वह व्रत खण्डित हो जाने से अनाचार कहा गया है । इस सच्च-ध में आचार्य अमितगति लिखते हैं कि-

क्षतिं मन: शुद्धिविधेरतिक्रमं व्यतिक्रमं शीलव्रतेर्विलंघनमू ।

प्रभोऽतिचारं विषयेषु वर्तनं वदन्त्यनाचारमिहातिसक्ततामू ।

अर्थात् मन के भीतर व्रत सम्बन्धी शुद्धिरूपी बाड़ के उल्लंघन को व्यतिक्रम, विषयों में प्रवृत्ति करने से अतिचार और विषय-सेवन में अति आसक्ति को अनाचार कहा गया है ।

इसके अनुसार १ से ३३ तक के व्रत भंग को अतिक्रम, ३४ से ६६ तक के व्रत भंग को व्यतिक्रम, ६७ से ९९ तक के वत भंग को अतिचार और शत-प्रतिशत व्रत भंग को 'अनाचार जानना चाहिये । परन्तु प्रायश्चित-शास्त्रों के प्रणेताओं ने उक्त चार के साथ ' आभोग ' को बढ़ा करके व्रत भंग के पांच विभाग किये हैं । उनके मत से एक बार व्रत खण्डित करने का नाम अनाचार और व्रत खण्डित होने के बाद शंका रहित होकर उत्कट अभिलाषा के साथ विषय-सेवन का नाम आभोग है । इनके अनुसार १ से २५ तक के व्रत भंग को अतिक्रम, २६ से ५० तक के व्रत भंग को व्यतिक्रम, ५१ से ७५ अंश तक के व्रत भंग को .अतिचार, ७६ से ११ तक व्रतभंग को अनाचार और शत-प्रतिशत व्रत भंग को आभोग समझना चाहिये । इसी विषय को आचार्य एक दृष्टान्त के द्वारा स्पष्ट करते हुए कहते हैं

कोई बूढ़ा बैल धान्य के हरे-भरे किसी खेत को देखकर उसकी बाड़ के समीप बैठा हुआ उसे खाने की मन में इच्छा करता है, यह अतिक्रम है । पुन: वह बैठा-बैठा ही बाड़ के किसी छिद्र से भीतर मुख डालकर एक ग्रास धान्य खाने की अभिलाषा करे तो यह व्यतिक्रम है । अपने स्थान से उठकर और खेत की बाड़ तोडकर भीतर घुसने का प्रयत्न करता है, वह अतिचार है । पुन: खेत में घुसकर एक ग्रास धान्य को खाकर वापिस लौट आवे, तो यह अनाचार नामक दोष है । किन्तु जब वह निःशंक होकर खेत के भीतर घुसकर यथेच्छ घास खाता है और खेत के स्वामी द्वारा डण्डों से पीटे जाने पर भी धान्य खाना नहीं छोड़ता है तो आभोग नामक दोष है ।

श्रावक के जो १२ व्रत बतलाये गये हैं, उनमें से प्रत्येक व्रत के पांच-पांच अतिचार बतलाये हैं, जैसा कि पूज्य आचार्य उमास्वामी तत्त्वार्थसूत्र में लिखते हैं- 'व्रतशीलेषु पंच पंच यथाक्रमद् ' । ।७/२४ । ।

ऐसी स्थिति में स्वभावत: एक प्रश्न उठता है कि प्रत्येक व्रत के पांच-पांच ही अतिचार क्यों बतलाये गये हैं? तत्त्वार्थसूत्र की उपलब्ध समस्त दिगम्बर और श्वेताम्बर टीकाओं में इस प्रश्न का कोई उत्तर दृष्टिगोचर नहीं होता है । जिन-जिन श्रावकाचारों में अतिचारों का निरूपण किया गया है उनमें और उनकी टीकाओं में भी इस प्रश्न का कोई भी समाधान नहीं मिलता है । इस सम्बन्ध में डॉ. हीरालाल जैन लिखते हैं- जीतसारसमुच्चय नामक ग्रंथ के अन्त में ' हेमनाभा नामका एक प्रकरण है जिसमें भरत चक्रवर्ती के प्रश्नों का उत्तर भगवान् ऋषभदेव के द्वारा दिलाया गया है भरत के प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान् कहते हैं कि- व्रतों में मानव शुद्धि की हानिरूप अतिक्रम से जो अतिचार लगते हैं, वे अपनी निन्दा करने से दूर हों जाते हैं । व्रतों के स्व-प्रतिपक्ष रूप विषयों की अभिलाषा से जो व्यतिक्रम जनित अतिचार लगते हैं, वे मन के निग्रह करने से शुद्ध हो जाते हैं । व्रतों के आचारण रूप किया में आलस्य करने से अतिचार लगते हैं, उनके त्याग करने से गृहस्थ निर्मल अथवा शुद्ध हो जाता है । व्रतों के अनाचार रूप छन्न भंग को करने से अतिचार लगते हैं, वे तीनों योगों के निग्रह से शुद्ध हो जाते हैं । व्रतों के आभोग जनित व्रत-भंग से जो अतिचार उत्पन्न होते हैं, वे प्रायश्चित-वर्णित नयमार्ग से शुद्ध हो जाते हैं त् इस विवेचन से यह एकदम स्पष्ट हो जाता है कि व्रतभंग के पांच प्रकार हैं, इन्हीं दोषी को ध्यान में रखकर ही यह संभव हो सकता है कि तज्जनित दोष अथवा अतिचार भी पांच ही हो सकते हैं ।

अन्य ग्रंथो में अतिचार

श्रावक धर्म का वर्णन करने वाले जितने नथ हैं, उनमें से व्रतों के अतिचारों का वनन तत्त्वार्थसूत्र और उपासकदशांगसूत्र (श्वेताम्बर गन्ध) में ही सर्वप्रथम दृष्टिगोचर होता है । वही देखा जाय तो श्रावकाचारों में सर्वप्रथम रत्नकरण्डश्रावकाचार में अतिचारों का वर्णन प्राप्त होता है । जब तत्त्वार्थसूत्र में वर्णित अतिचारों की तुलना उपासकदशांगसूत्र में वर्णित अतिचारों से करते हैं तो यह कहना एकदम उचित होगा कि- परस्पर में एक का दूसरे पर प्रभाव नहीं, अपितु एक ने दूसरे के अतिचारों का अपनी भाषा में अनुवाद भी किया है ।

दोनों के अतिचारों में मात्र भोगोपभोग परिमाणव्रत के अतिचारों में अन्तर है । उपासकदशासूत्र में इस व्रत के अतिचार दो प्रकार से बताये गये हैं भोग की अपेक्षा अतिचार और कर्म की अपेक्षा । भोग की अपेक्षा अतिचार तत्त्वार्थसूत्र के समान ही हैं, परन्तु कर्म की अपेक्षा उपासकदशासूत्र में पन्द्रह अतिचार बतलाये गये हैं, जोकि खरकर्म के नाम से प्रसिद्ध हैं और पं. आशाधर जी ने सागार धर्मामृत में जिनका उल्लेख किया है । यदि यहां कोई शंका करे कि इसी तरह आचार्य उमास्वामी ने भी क्यों नहीं बताये? तो इसका समाधान यही हो सकता है कि- पूजा आचार्य उमास्वामी व्रतों के पांच-पांच अतिचारों को वर्णित करने की प्रतिज्ञा पहत्ने ही कर चुके हैं और उपासकदशासूत्रकार ने ऐसी कोई प्रतिज्ञा नहीं की है ।

इसी प्रकार तत्त्वार्थसूत्र और रत्नकरण्डश्रावकाचार में वर्णित अतिचारों में कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है । परिग्रह परिमाण व्रत और भोगोपभोग परिमाणव्रत में से तत्त्वार्थसूत्र में परिग्रह परिमाण व्रत के अतिचारों में निश्चित संख्या का अतिक्रमण है और भोगोपभोग परिमाण व्रत के अतिचार मात्र भोग पर ही घटित होते हैं, जबकि व्रत के नामानुसार अतिचार भोग और उपभोग दोनों पर घटित होना चाहिए । रत्नकरण्डश्रावकाचार के कर्त्ता पूज्य आचार्य समन्तभद्र स्वामी जैसे तार्किक आचार्य के हृदय में यह बात खटकी, इसलिये उन्होंने उक्त दोनों व्रतों के नये ही प्रकार से पांच-पांच अतिचारों का निरूपण किया जो कि उपर्युक्त दोनों आपत्तियों से रहित हैं ।

अब आचार्य उमास्वामी द्वारा वर्णित और आचार्य विद्यानन्दि स्वामी द्वारा विवेचित अतिचारों पर प्रकाश डालते हैं, जिससे प्रत्येक श्रावक इनको दूर करके निरतिचार व्रतों का पालन कर सके ।

१. अहिंसाणुव्रत के अतिचार

इस व्रत के पांच अतिचार इस प्रकार हैं- आवागमन के लिये .अभीष्ट देश में जीव को प्रतिंबन्धित करना कशा है । जैसे- हथकड़ी, लेज, रस्सी, सांकल 'आदि बांधना बन्ध है । डण्डा, चाबुक, छड़ी आदि के द्वारा प्राणियों को ताड़ना वध है । जैसे- किसी जानवर को डंडा, चाबुक, लीदसे, बैल आदि से ताड़ना । कान, नाक, अण्डकोष आदि अवयवों को छेदना छेद है । न्यायोचित भार से अधिक बोझ लादना अतिभारारोपण है। उचित समय पर अथवा भूख-प्यास लगने पर खाद्य-पेय पदार्थो का निरोध कर देना, अन्नपान निरोध है ।

यहाँ आचार्यवर विद्यानन्दि स्वामी का आशय यह है कि अहिंसाव्रत के प्रमादयोग से किये गये बन्ध आदि हैं वे ही अतिचार हैं । यदि इनमें प्रमादयोग नहीं है और जीवों का हितकारी है तो वे अतिचार की कोटि में नहीं आते हैं । जैसे- कुआ, गड्ढा आदि में गिरने से रोकने के लिये पशु को रस्सी आदि से बांधना, पागल स्त्री-पुरुष को स्व-पर घात को रोकने के लिये सांकल आदि से बांधना, पागत्न अथवा भूतावेश की चिकित्सा के बेंत या थप्पड़ .आदि से ताड़ना, नाक-कान आदि को दबाना उपद्रवी छात्र का गुरु और माता-पिता आदि के द्वारा पीटा जाना, शत चिकित्सक द्वारा फोड़ा आदि को चीरना आदि, आवश्यकतानुसार उंगली, टांग आदि उपांगों का भी छेद करना हितेच्छु वैद्य द्वारा अन्न-पान रोक देना, गुरुजी अथवा पंडितजी के द्वारा उपवास आदि उपदेश देना ये सब अतिचार की संज्ञा को प्राप्त नहीं होते हैं । इनमें विशेष बात यह है कि विशुद्धि के कारण होने वाले कथ आदि मल नहीं है और सक्लेश के कारण होते हैं तो अहिंसा व्रत के अतिचार हैं । यहां जीव के संपूर्ण प्राणों का वियोग करना वध से तात्पर्य नहीं है । यदि ऐसा (हत्या) करता है तो उससे अहिंसाव्रत का ही नाश हो जाता है । यहां यह विशेष जानना चाहिये कि- इन अतिचारों को कदाचित् जानवरों पर घटाया गया है, परन्तु यहा अन्य भी अपने विवेक से योजित करना चाहिये । जैसे- अपने सेवक अर्थात् नौकर को पूरे समय अपने काम में बांधे रखना, काम सही नहीं करने पर मारना-पीटना, उसके अंगों को छेदन करना, क्षमता से 'अधिक काम करवाना, भोजन के समय अतिरिक्त काम करवाना आदि ये भी अतिचारों में जोडा जाना चाहिये । अपने स्वजनों के प्रति भी यदि ऐसा ही व्यवहार करता है तो वह भी अहिंसाव्रत के अतिचारों में शामिल होगा ।

यदि कोई शंका करता है कि ये अतिचार किस कारण से होते हैं? तो उसका समाधान देते हुए आचार्य लिखते हैं कि - संक्लेश परिणाम के वश से ये अतिचार उत्पन्न होते हैं । एक देश भंग और एकदेश क्षरण हो जानै से उक्त अतिचार होते हैं। इसी प्रकार सभी व्रतों के अतिचारों में जोड लेना चाहिये ।

२. सत्याणुव्रत के अतिचार

सत्याणुव्रत के पांच .अतिचार इस प्रकार हैं - मिथ्याप्रवर्तन, .अन्यथाप्रवतन कराने वाले उपदेश देना मिथ्योपदेश हैँ । जैसे- बौद्ध धर्म का पक्ष लेकर सर्वथा क्षणिक एकान्त में प्रवृत्ति करा देना सर्वथा नित्य एकान्त में प्रवृत्ति करा देना अथवा समीचीन शास्त्रों का अन्य प्रकार से निरूपण कर देना आदि । संवृत अर्थात् ढके हुए अथवा गुप्त क्रिया विशेष का जो दूसरों की हानि करने के लिये प्रकाशित कर देना रहोभ्याख्यान है । जैसे- स्त्री-पुरुषों द्वारा एकान्त में की गयी अथवा कही गई क्रियाविशेष को गुप्तरीति से जानकर अन्य लोगों के समक्ष प्रकट कर देना । अन्य के द्वारा नहीं कहे गये विषय को उसने इस प्रकार कहा था अथवा किया था ऐसे उगने के लिये जो द्वेषवश लिख दिया जाता है, वह कूटलेखक्रिया है । जैसे- उस मनुष्य ने मरते समय यों अमुक को इतना भाग देने के लिये कहा था अथवा इस प्रकार 'अंगचेष्टा की थी । अपने अभिप्राय के अनुसार कुछ भी मनचाहा लिख दिया जाता है । सोना-चांदी आदि की धरोहर किसी महाजन के पास रख देने पर पुन: संख्या अथवा परिमाण भूल गये स्वामी का अल्पसंख्यक द्रव्य मांगने पर हीन दला के धरोहर की स्वीकृति को न्यासापहार कहा है । जैसे कि किसी महाजन के पास सौ मोहरों की धरोहर जमा करने वाले भोले व्यक्ति द्वारा भूल जाने से १० मोहरें मांगने पर जानते हुए भी उसे १० ही मोहरें देने को तैयार हो जाता है । अर्थ, प्रकरण, अगविकार, भ्रूविक्षेप आदि से दूसरों की गुप्त चेष्टा को देखकर ईर्ष्या, लोभ आदि के वश होकर जो अन्य लोगों के समक्ष प्रकट कर देना है वह साकारमंत्रभेद है ।

यहाँ विशेष यह जानना चाहिये कि ये अतिचार कषाय की तीव्रता के कारण लोभ अथवा ईर्ष्या के वश से ही होते हैं । यदि कोई व्यक्ति अहिंसा के स्थान पर हिंसा का उपदेश देता है तो वह यही विचार करता है कि जैसे जैन पण्डित जैन शास्त्रों का उपदेश देते हैं, वैसे ही मैंने भी वेदों के अनुसार हिंसा का उपेदश दिया है, डाकुओं के अनुसार धनिकों को लूटने का उपदेश दिया है, कोई? मनमानी बात नहीं की है । इसी प्रकार पति-पत्नि के रहल की बातें जो कही हैं वे सब पूर्णरूपेण सत्य हैं, कोई झूठ थोड़े ही है, जैसा जाना अथवा समझा वैसा ही तो बताया है ।

३. अचौर्याणुव्रत के अतिचार

इसके अतिचार निम्न हैं - चोरी करने वाले व्यक्ति को मन, वचन .और काय से अन्न पुरुष से करवाता है, एवं अन्य पुरुष से कृत ,कारित और अनुमोदना के अनुसार प्रेरणा करता है, वह स्तेनप्रयोग है । चोर द्वारा लाये गये चोरी के सामान कम मूल्य में ग्रहण कर लेना तदाह्तादान है । जैसे- किसी चोर ने कीमती हार चुराया उससे अत्यन्त अल्पदाम में खरीद लेना । राज्य के विरुद्ध होते हुए भी उरतिक्रम करना, विरुद्धराज्यातिक्रम है । अतिक्रम अर्थात् उचित रीति से अन्य प्रकार अन्याय से देना अथवा लेना छै । जैसे- टैक्स बचाना, ट्रेन कां टिकट नहीं लेना, .आधा टिकट लेना आदि । झूठे नाप-तौल आदि से क्रय-विक्रय का प्रयोग करना हीनाधिकमानोन्मान है । जैसे- नापने-तौलने के लिये काष्ठ-धातु आदि के निर्मित सेर, ढइया, पंसेरी 'आदि अथवा तराजू के पाव, किलो आदि एवं गज, फुट आदि को कम अथवा ज्यादा अपने अभिप्राय से रखता है । ग्रहण करते समय अधिक वजन रखता है और देते समय कम वजन रखता है । यहां भिन्न-भिन्न प्रकारों से होने वाली नाप-तौली का ग्रहण किया जाना चाहिये । दूसरों को उगने के लिये कृत्रिम वस्तुओं को वास्तविक वस्तुओं में मिलाकर व्यापार करना, प्रतिरूपक व्यवहार है । जैसे- सोने में पीतल, दूध में चूना, काली मिर्च में पपीता के बीज आदि मिलाकर बेचना ।

यहाँ विशेष यह जानना चाहिये कि सरकार की गलत नीतियों का विरोध करना विरुद्ध राज्यातिक्रम नहीं है । जैसे- बूचड़खाने, गलत कर निर्धारण नीति, अनुचित मंहगाई और तानाशाही आदि का विरोध करना ।

४. ब्रह्मचर्याणुव्रत के अतिचार

इसके अतिचार निम्न हैं - अन्य किसी का अथवा उसके लड़के-लड़कियों का विवाह कराना परविवाहकरण है । सातावेदनीय कर्म और चारित्र मोहनीय कर्म का उदय हो जाने से विवाह क्रिया द्वारा बंध जाना विवाह है, अन्य किसी का विवाह परविवाह है। इत्वरिका परिगृहीता गमन, इत्वरिका अपरिगृहीता गमन । परपुरुष के समीप गमन करने की आदत को धारण करने वाली स्त्री इत्वरी कही गई है । क प्रत्यय से खोटे भावों को रखने वाली कुत्सिता है । किसी नियत स्वामी के द्वारा गृहीत है वह परिगृहीता है और नियत स्वामी के द्वारा गृहीत नहीं की गई है वह परिगृहीता है । इस प्रकार जो इत्वरिका परिगहीता और इत्वरिका अपरिगृहीता अर्थात् वेश्या अथवा पुंश्चली स्त्रियों के मनोहर अंगों का निरीक्षण, हास्य, सराग भाषण करना, हाथ, भ्रकुटी, आख आदि से संकेत करना आदि रागवशात्( अनेक रमण कुचेष्टायें करना दूसरा और तीसरा अतिचार है । कामसेवन के अंगों के अतिरिक्त अंगों में क्रीड़ा करना अनंगक्रीड़ा है । रतिक्रिया में अतिशय प्रवृद्ध परिणाम होना कामतीवाभिनिवेश है । अर्थात् कामक्रीड़ा में संतुष्ट नहीं होने पर अनवरत प्रवृत्ति करना अतिचार है ।

यहाँ कोई शंका करता है कि कोई दीक्षित, अतिबाला, तिर्यञ्चनी, चित्र, अनेक अनेक स्त्रियाँ अथवा इसके विपरीत पुरुषों में भी ऐसा ही जानना आदि के साथ रतिक्रिया के भाव रखता है तो इसे कौन से अतिचार में रखा जाय तो इसका समाधान करते हुए आचार्य विद्यानन्दि स्वामी कहते हैं कि- उपर्युक्त स्त्री अथवा पुरुषों में कामभाव को कामतीव्राभिनिवेश में माना जायेगा, क्योंकि कामभाव के अतिरेक में ही ऐसे परिणाम होते हैं ।

५. परिग्रह परिमाणव्रत के अतिचार

क्षेत्र-वास्तु के परिमाण का अतिक्रम 'अर्थात् उल्लंघन करना प्रथम अतिचार है। धान्य उत्पत्ति के स्थान को क्षेत्र और निवास स्नान को वास्तु कहते हैं । हिरण्य और सुवर्ण के परिमाण का अतिक्रमण करना द्वितीय अतिचार है । व्यवहार में क्रय-विक्रय के उपयोगी वस्तु का विनियम करने वाले पदार्थ हिरण्य कहलाते हैं । जैसे- चांदी, मोहर, गिन्नी, सिक्का आदि । धन-धान्य के परिमाण का अतिक्रम करना तृतीय अतिचार है । गेहूँ चावल आदि धान्य हैं । गाय, भैंस, हाथी, घोड़ा आदि धन हैं । संख्या निश्चित किये गये दासी-दासों का अतिक्रम करना चतुर्थ अतिचार है । वस्त्र, बर्तन, गाड़ी, पलँग आदि वस्तुएँ कुप्य में गर्भित हो जाते हैं । इनका अतिक्रम करना पंचम अतिचार है ।

यहाँ विशेष यह जानना चाहिये कि सीमा करने वाली दीवार अथवा बाड़ आदि हटाकर दूसरे घर अथवा खेत को मिला लेने से, लोभ के वश से सीमा से अधिक सोना-चांदी आदि होने रिश्तेदारों अथवा परिचितों को यह कहकर देना कि जब जरूरत होगी तब वापस ले लूंगा, अन्य किसी को धन-धान्य इसलिये दे देता है कि अपने पास रखे धान्यादि को बेच दूंगा अथवा भोग कूर लूगा तब वापस ले लूंगा, गाय, घोड़ी, दासियां, चाकर आदि में गर्भवाली की अपेक्षा अथवा कुछ समय पश्चात् अपने व्रत को यथावस्थित कर लूंगा, ऐसा विचार कर निश्चित की गई संख्या का अतिक्रम अर्थात् उल्लंघन कर देता है । अत: अतिचार हो जाते हैं क्योंकि तीव्रलोभ का चारों ओर से आवेश होने से प्रतिज्ञात प्रमाणों का भूल जाना संभव हो जाता है ।

आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने इसके पांचों अतिचार भिन्न प्रकार से निरूपित किये हैं जो इस प्रकार हैं- अतिवाहन, अतिसंग्रह, विस्मय, अतित्नोभ और अतिभारवहन । ये पांचों अतिचार संतोष को घातने में एकदेश रूप से अनुकूल होते हैं, इसलिये अतिचार माने गये हैं ।

इस प्रकार ये पांचों अणुव्रतों के अतिचार हैं । अब तीन गुणव्रतों के अतिचारों को कहते हैं –

६ दिग्व्रत के अतिचार

ऊर्ध्वव्यतिक्रम, अधोव्यतिक्रम, तिर्यग्व्यतिक्रम, क्षेत्रवृद्धि और स्मृत्यन्तराधान ये पांच अतिचार दिग्विरमणव्रत के हैं । ' सीमित की जा चुकी दिशा की अवधि का उल्लंघन कर देना अतिक्रम कहा जाता है । विशेष रूप से अतिक्रम करना व्यतिक्रम है ।

पर्वत, वृक्ष, मीनार आदि पर ऊपर चढ़ जाना, नीचे कुआ, बावडी आदि में उतरना और तिर्यक् में बिल, गुफा, सुरंग आदि में प्रवेश


पं आलोक कुमार जैन
अनेकान्त जनवरी मार्च २०१३ पेज न ७५ से ८५