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नंदीश्वर द्वीप के जिनमंदिर

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नंदीश्वर द्वीप के जिनमंदिर

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इदानीं नन्दीश्वद्वीपं सविशेषं प्रतिपादयन् तावत्तस्य वलयव्यासमाह—

आदीदो खलु अट्ठमणंदीसरदीववलयविक्खंभो। सयसमहियतेवट्ठीकोडी चुलसीदिलक्खा ये१।।९६६।।
आदितः खलु अष्टमनन्दीश्वरद्वीपवलयविष्कम्भः। शतसमधिकत्रिषष्टिकोटिः चतुरशीतिलक्षश्च।।९६६।।
आदीदो। जम्बूद्वीपादारभ्याष्टमनन्दीश्वरद्वीपवलयविष्कम्भः शतसमधिकत्रिषष्टिकोटिचतुरशीतिलक्षयो-जनप्रमितः खलु १६३८४००००० एतावत्कथं नन्दीश्वरद्वीपसहितप्राक्तनद्वीपसमुद्राणां संख्या १५ कृत्वा रूऊणाहियपदमित्यादिना कृते सति भवति।।९६६।।
अथात्र दिव्चतुष्टयस्थितानां पर्वतानामाख्यां संख्यामवस्थानं च निरूपयति—
एक्कचउक्कट्ठं जणदहिमुहरइयरणगा पडिदिसम्हि। मज्झे चउदिसवावीमज्झे तब्बाहिरदुकोणे।।९६७।।
एकचतुष्काष्टाञ्जनदधिमुखरतिकरनगाः प्रतिदिशं। मध्ये चतुर्दिग्वापीमध्ये तद्बाह्यद्विकोणे।।९६७।।
एक्क। प्रतिदिशं मध्ये चतुर्दिकस्थवापीमध्ये तद्वापीबाह्यद्विकोणे च यथासंख्यं एक चतुष्काष्टसंख्याकाः अञ्जनदधिमुखरतिकराख्याः नगा नन्दीश्वरद्वीपे ज्ञातव्याः।।९६७।।
अथ तद्गिरीणां वर्णं परिमाणं च प्रतिपादयति—
अंजणदहिकणयणिहा चुलसीदिदहेक्कजोयणसहस्सा। वट्टा वासुदएणय सरिसा बावण्णसेलाओ।।९६८।।
अञ्जनदधिकनकनिभाः चतुरशीतिदशैकयोजनसहस्राः। वृत्ताः व्यासोदयेन सदृशाः द्वापञ्चाशच्छैलाः।।९६८।।
अंजण। अञ्जनादयस्त्रयः पर्वताः यथासंख्यं अञ्जनदधिकनकाभाः तेषां प्रमाणं चतुरशीतिसहस्र ८४००० दशसहस्रै १०००० एकसहस्र १००० योजनानि। ते च वृत्ताः व्यासोदयेन सदृशाः सर्वे मिलित्वा द्वापञ्चाशच्छैला ५२ भवन्ति।।९६८।।
इदानीं तद्वापीनां नामानि गाथाद्वयेनाह—
णंदा णंदवदी पुण णंदुत्तर णंदिसेण अरविरया। गयवीदसोगविजया वईजयंती जयंती य।।९६९।।
अवराजिदा य रम्मा रमणीया सुप्पभा य पुव्वादी। रयणतडा लक्खपमा चरिमा पुण सव्वदोभद्दा।।९७०।।
नन्दा नन्दवती पुनः नन्दोत्तरा नन्दिषेणा अरविरजे। गतवीतशोकाविजयाः वैजयन्ती जयन्ती च।।९६९।।
अपराजिता च रम्या रमणीया सुप्रभा च पूर्वादितः। रत्नतट्यः लक्षप्रमाः चरमा पुनः सर्वतोभद्रा।।९७०।।
णंदा। नन्दा नन्दवती पुनर्नन्दोत्तरा नन्दिषेणा अरजा विरजा गतशोका वीतशोका विजय वैजयन्ती जयन्ती च।।९६९।।
अवरा। अपराजिता च रम्या रमणीया सुप्रभा च चरमा पुनः सर्वतोभद्राः। एताः सर्वा रत्नतट्यो लक्षयोजनप्रमिताः पूर्वदिग्भागादितो ज्ञातव्याः।।९७०।।
अनन्तरं तासां वापीनां स्वरूपमाह—
सव्वे समचउरस्सा टंकुक्किण्णा सहस्समोगाढ़ा। वेदियचउवण्णजुदा जलयरउम्मुकजलपुण्णा।।९७१।।
सर्वाः समचतुरस्राः टज्रेत्कीर्णाः सहस्रमवगाधाः। वेदिकाचतुर्वर्णयुता जलचरोन्मुक्तजलपूर्णाः।।९७१।।
सव्वे। ताः सर्वाः समचतुरस्राष्टज्रेत्कीर्णाः सहस्रयोजनावगाधाः वेदिकाभिश्चतुर्वनैश्च युक्ताः जलचरोन्मुक्तजलपूर्णाः स्युः।।९७१।।
अथ तद्वापीनां वनस्वरूपमाह—
वावीणं पुव्वादिसु असोयसत्तच्छदं च चंपवणं। चूदवणं च कमेण य सगवावीदीहदलवासा।।९७२।।
वापीनां पूर्वदिषु अशोकसप्तच्छदं च चम्पवनं। चूतवनं च क्रमेण च स्वकवापीदीर्घदलव्यासानि।।९७२।।
वावीणं। तद्वापीनां पूर्वादिदिक्षु यथाक्रमेण स्वकीयस्वकीयवापीदीर्घाणि १ ल० तद्दलव्यासानि ५०००० अशोकसप्तच्छदचम्पकचूतवनानि भवन्ति।।९७२।।
इदानीमञ्जनादिगिरीन्द्रेषु प्रत्येकमेवैवं चैत्यालयं प्रतिपादयन् तेषु चतुर्णिकायामरैः कालविशेषाश्रयेण क्रियमाणपूजाविशेषं प्रतिपादयितुं गाथापञ्चकेनाह—
तव्वावण्णणगेसुवि बावण्णजिणालया हवंति तहिं। सोहम्मादी बारसकिंप्पदा ससुरभवणतिया।।९७३।।
गयहयकेसरिवसहे सारसपिकहंसकोकगरुडे य। मयरसिहिकमलपुप्फयविमाणपहुदिं समारूढा।।९७४।।
दिव्वफलपुप्फहत्था सत्थाभरणा सचामराणीया। बहुधयतूरारावा गत्ता कुव्वंति कल्लाणं।।९७५।।
पडिवरिसं आसाढे तह कत्तियफग्गुणे य अट्टमिदो। पुण्णदिणोत्ति यभिक्खं दो द्दो पहरं तु ससुरेहिं।।९७६।।
सोहम्मो ईसाणो चमरो वइरोचणो पदक्खिणदो। पुव्ववरदक्खिणुत्तरदिसासु कुव्वंति कल्लाणं।।९७७।।
तद्द्वापञ्चाशन्नगेष्वपि द्वापञ्चाशज्जिनालया भवन्ति तेषु। सौधर्मादयो द्वादशकल्पेन्द्राः ससुरभवनत्रिकाः।।९७३।।
गजहयकेसरिवृषभान् सारसपिकहंसकोकगरुडान् च। मकरशिखिकमलपुष्पकविमानप्रभृति समारूढाः।।९७४।।
दिव्यफलपुष्पहस्ता शस्ताभरणाः सचामरानीकाः। बहुध्वजतूर्यारावाः गत्वा कुर्वन्ति कल्याणं।।९७५।।
प्रतिवर्षमाषाढे तथा र्काितके फाल्गुने च अष्टमीतः। पूर्णदिनान्तं चाभीक्ष्णं द्वौ द्वौ प्रहरौ तु स्वसुरैः।।९७६।।
सौधर्म ईशानः चमरो वैराचनः प्रदक्षिणतः। पूर्वापरदक्षिणोत्तरदिशासु कुर्वन्ति कल्याणं।।९७७।।
तब्बाव। तेषु द्वापञ्चाश ५२ न्नगेष्वपि द्वापञ्चाश ५२ ज्जिनालया भवन्ति। तेषु इतरसुरैः भवनत्रयदेवैश्च सहिताः सौधर्मादयो द्वादशकल्पेन्द्राः।।९७३।।
गय। गजहयकेसरिवृषभान् सारसपिकहंसकोकगरुडांश्च मकरशिखिकमलपुष्पकविमानप्रभृति समारूढ़ा।।९७४।।
दिव्व। दिव्यफलपुष्पहस्ता शस्ताभरणाः सचामरानीकाः बहुध्वजतूर्यारावाः सन्तो गत्वा ऐन्द्रध्वजादिकल्याणं कुर्वन्ति।।९७५।।
पडि। प्रतिवर्षमाषाढमासे तथा कार्तिकमासे फाल्गुनमासे चाष्टमीत आरभ्य पूर्णिमादिनपर्यन्तमभीक्ष्णं द्वौ द्वौ प्रहरौ स्वस्वसुरैः सह।।९७६।।
सोह। सौधर्म ईशानश्चमरो वैरोचनश्च प्रदक्षिणतः पूर्वापरदक्षिणोत्तरदिशासु कल्याणं पूजां कुर्वन्ति।।९७७।।

नंदीश्वर द्वीप के जिनमंदिर

अब नन्दीश्वर द्वीप का सविशेष वर्णन करते हुए सर्वप्रथम उसका वलय व्यास कहते हैं—

गाथार्थ :— जम्बूद्वीप से प्रारम्भ कर आठवें नन्दीश्वर द्वीप पर्यन्त का वलय व्यास एक सौ त्रेसठ करोड़ चौरासी लाख योजन प्रमाण है।।९६६।।

विशेशार्थ :— जम्बूद्वीप से प्रारम्भ कर नन्दीश्वर द्वीप का वलय व्यास एक सौ त्रेसठ करोड़ चौरासी लाख योजन प्रमाण है। इतना प्रमाण वैâसे होता है ? जम्बूद्वीप से नन्दीश्वर द्वीप पर्यन्त के समस्त द्वीप समुद्रों की संख्या १५ है। इसे ‘‘रूऊणाहिय पदमिद’’ गाथा ३०९ के नियमानुसार पद (गच्छ) स्वरूप करके पद में से एक कम करके (१५—१)· अवशेष १४ का विरलन कर प्रत्येक के ऊपर दो का अज्र् देय स्वरूप देकर परस्पर में गुणा कर, लब्ध में से ० (शून्य) घटा देने पर तथा ५ शून्यों से सहित करने पर नन्दीश्वर द्वीप का वलय व्यास १६३८४००००० योजन प्रमाण है। यथां—पद १५ — १ · १४ २/१ २/१ २/१ २/१ २/१ २/१ २/१ २/१ २/१ २/१ २/१ २/१ २/१ २/१ · १६३८४ अंक प्राप्त हुए इन्हें ५ शून्यों से सहित कर एक शून्य घटा देने पर (१६३८४००००० — ०) · १६३८४००००० योजन नन्दीश्वर द्वीप के वलय व्यास का प्रमाण प्राप्त होता है।

आगे इस द्वीप की चारों दिशाओं में स्थित पर्वतों के नाम, संख्या और अवस्थान का निरूपण करते हैं—

गाथार्थ :— नन्दीश्वर द्वीप की प्रत्येक दिशा के मध्य में एक, चारों दिशा सम्बन्धी बावड़ियों के मध्य में चार और बावड़ियों के बाह्य दो दो कोनों में एक-एक अर्थात् ८ क्रमशः अञ्जन, दधिमुख और रतिकर नाम के पर्वत हैं।।९६७।।

विशेषार्थ :— नन्दीश्वर द्वीप की प्रत्येक दिशा के मध्य भाग में अञ्जन नाम का एक-एक पर्वत है। इस पर्वत की चारों दिशाओं में चार बावड़ियाँ हैं जिनके मध्य में दधिमुख नाम का एक-एक अर्थात् ४ दधिमुख पर्वत हैं तथा इन बावड़ियों के दो-दो बाह्य कोनों पर एक-एक अर्थात् आठ रतिकर पर्वत हैं। इस प्रकार एक दिशा में (अञ्जन १, दधिमुख ४ और रतिकर ८) · १३ पर्वत और ४ बावड़ियाँ हैं अतः चारों दिशाओं में (अञ्जन ४, दधिमुख १६ और रतिकर ३२) · ५२ पर्वत और ४ बावड़ियाँ हैं।

अब उन पर्वतों के वर्ण और प्रमाण का प्रतिपादन करते हैं—

गाथार्थ :— अञ्जन, दधिमुख और रतिकर पर्वत यथाक्रम अञ्जन, दधि और स्वर्ण सदृश वर्ण वाले हैं। ये क्रमशः चौरासी हजार, दस हजार और एक हजार योजन प्रमाण वाले हैं। इनका उदय (उँचाई) और व्यास सदृश है। आकार गोल है। इस प्रकार ये बावन पर्वत हैं।।९६८।।

विशेषार्थ :— चार अञ्जन पर्वत अञ्जन-कज्जल सदृश, १६ दधिमुख पर्वत दधि सदृश (श्वेत) और ३२ रतिकर पर्वत तपाए हुए स्वर्ण सदृश वर्ण वाले हैं। अञ्जन पर्वतों की उँचाई एवं भूमुख व्यास ८४००० योजन, दधिमुखों का १०००० योजन और रतिकरों का १००० योजन है अर्थात् इन पर्वतों की जितनी उँचाई है, उतनी ही नीचे ऊपर चौड़ाई है। ये खड़े हुए ढोल के सदृश गोल आकार वाले हैं। इनकी सम्पूर्ण संख्या ५२ है।

अब उन वापियों के नाम दो गाथाओं द्वारा कहते हैं—

गाथार्थ :— पूर्वादि चारों दिशाओं में क्रमशः नन्दा, नन्दवती, नन्दोत्तरा, नन्दिषेणा, अरजा, विरजा, गतशोका, वीतशोका, विजया, वैजयन्ती, जयन्ती, अपराजिता, रम्या, रमणीया, सुप्रभा और सर्वतोभद्रा रत्नमय तट से युक्त ये सर्व वापिकाएँ एक लाख योजन प्रमाण वाली हैं।।९६९-९७०।।

विशेषार्थ :— नन्दीश्वर द्वीप की पूर्व दिशा में नन्दा, नन्दवती, नन्दोत्तरा और नन्दिषेणा ये चार वापिकाएँ हैं। दक्षिण दिशा में अरजा, विरजा, गतशोका और वीतशोका; पश्चिम दिशा में विजया, वैजयन्ती, जयन्ती और अपराजिता तथा उत्तर दिशा में रम्या, रमणीया, सुप्रभा और सर्वतोभद्रा ये चार वापिकाएँ हैं। इन सब वापिकाओं के तट रत्नमय हैं तथा ये १००००० योजन प्रमाण वाली हैं।

अब उन वापिकाओं का स्वरूप कहते हैं—

गाथार्थ :— वे सर्व वापिकाएँ समचतुरस्र, टज्रेत्कीर्ण, एक हजार योजन अवगाह युक्त, चार-चार वनों से सहित, जलचर जीवों से रहित और जल से परिपूर्ण हैं।।९७१।।

विशेषार्थ :— वे सर्व वापिकाएँ एक लाख योजन लम्बी और एक लाख योजन चौड़ी अर्थात् समचतुरस्र आकार वाली हैं। टज्रेत्कीर्ण अर्थात् ऊपर नीचे एक सदृश हैं। उनकी गहराई १००० योजन प्रमाण है, ये वेदिकाएँ चारों दिशाओं में एक-एक वन अर्थात् प्रत्येक चार-चार वनों से संयुक्त हैं। ये जलचर जीवों से रहित और जल से परिपूर्ण हैं।

अब उन वापिकाओं के वनों का स्वरूप कहते हैं—

गाथार्थ :— उन वापिकाओं की पूर्वादि दिशाओं में क्रमशः अपनी वापी की दीर्घता के सदृश लम्बे (१००००० यो०) और लम्बाई के अर्धप्रमाण चौड़े (५०००० यो०) अशोक, सप्तच्छद, चम्पक और आम्र के वन हैं।।९७२।।

अब अञ्जनादि प्रत्येक पर्वत के ऊपर एक-एक चैत्यालय का प्रतिपादन करते हुए आचार्य उन चैत्यालयों में चतुर्निकाय देवों द्वारा कालविशेष में की हुई पूजाविशेष को पाँच गाथाओं द्वारा कहते हैं—

गाथार्थ :— उस नंदीश्वरद्वीप में बावन पर्वतों पर बावन ही जिनालय हैं, उनमें अन्य कल्पवासी देवों और भवनत्रिक देवों सहित सौधर्मादि बारह कल्पों के इन्द्र, हाथी, घोड़ा, िंसह, बैल, सारस, कोयल, हंस, चकवा, गरुड़, मगर, मोर, कमल और पुष्पक विमान आदि पर समारूढ़ हो (अपने परिवार देवों सहित) हाथों में दिव्य फल और दिव्य पुष्प धारण कर प्रशस्त आभरणों, चामरों, सेनाओं, ध्वजाओं एवं वादित्रों के शब्दों से संयुक्त होते हुए, नन्दीश्वर द्वीप में जाकर प्रत्येक वर्ष की आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास की अष्टमी से प्रारम्भ कर पूर्णिमा पर्यन्त निरन्तर दो-दो पहर तक कल्याण अर्थात् ऐन्द्रध्वज आदि पूजन करते हैं।।९७३-९७६।।

किस प्रकार करते हैं ?—

गाथार्थ :— सौधमेन्द्र, ईशानेन्द्र, चमर और वैरोचन ये प्रदक्षिणारूप से पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में पूजा करते हैं।।९७७।।

विशेषार्थ :— नन्दीश्वर द्वीप के (४ ± १६ ± ३२) · ५२ पर्वतों पर ५२ ही जिनमन्दिर हैं। उनमें अन्य देवों और भवनत्रिक के साथ सौधर्मादि कल्पों के बारह इन्द्र हाथी, घोड़ा, सिह, बैल, सारस, कोयल, हंस, चकवा, गरुड़, मगर, मोर, कमल और पुष्पक विमान आदि पर आरूढ़ हो, हाथों में दिव्य फल एवं पुष्प धारण कर प्रशस्त आभरणों, चामरों, सेनाओं, ध्वजाओं एवं वादित्रों के शब्दों से सहित होते हुए नन्दीश्वर द्वीप जाकर प्रत्येक वर्ष की आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास की अष्टमी से प्रारम्भ कर पूर्णिमा पर्यन्त निरन्तर दो-दो पहर तक पूजा करते हैं।

प्रथम युगल के सौधर्मैशान एवं असुरकुमारों के चमर और वैरोचन ये चारों इन्द्र प्रदक्षिणा रूप से पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर दिशाओं में पूजा करते हैं अर्थात् पूर्व दिशा में पूजन करने वाले देव जब दक्षिण में आते हैं तब दक्षिण दिशा वाले देव पश्चिम में और पश्चिम वाले उत्तर में तथा उत्तर दिशा वाले पूर्व में आकर ऐन्द्रध्वज आदि महापूजा करते हैं।