Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|

प्रतिदिन पारस चैनल पर 6.00 बजे सुबह देखें पूज्य गणिनी प्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के लाइव प्रवचन

पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी ससंघ पोदनपुर बोरीवली में विराजमान है।

गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की पूजन

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पूज्य गणिनीप्रमुखश्री ज्ञानमती माताजी की पूजन

'
DSC06666 (Small).JPG


रचयित्री-आर्यिका चन्दनामती

Cloves.jpg
Cloves.jpg


-स्थापना-

पूजन करो जी-

श्री गणिनी ज्ञानमती माताजी की, पूजन करो जी।

जिनकी पूजन करने से, अज्ञान तिमिर नश जाता है।

जिनकी दिव्य देशना से, शुभ ज्ञान हृदय बस जाता है।।

उनके श्री चरणों में, आह्वानन स्थापन करते हैं।

सन्निधीकरण विधीपूर्वक, पुष्पांजलि अर्पित करते हैं।।

पुष्पांजलि अर्पित करते हैं।.......

पूजन करो जी,

श्री गणिनी ज्ञानमती माताजी की पूजन करो जी।।

ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती मात: ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।

ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती मात: ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।

ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती मात:! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्।

-अष्टक-

ज्ञानमती जी नाम तुम्हारा, ज्ञान सरित अवगाहन है।

तेरी पावन प्रतिभा लखकर, मेरा मन भी पावन है।।

मुझ अज्ञानी ने माँ जबसे, तेरी छाया पाई है।

तब से दुनिया की कोई छवि, मुझको लुभा न पाई है।।

ज्ञानामृत जल पीने हेतू, तव पद में मेरा मन है।

तेरी पावन प्रतिभा लखकर, मेरा मन भी पावन है।।१।।

Jal.jpg
Jal.jpg


ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे जलं निर्वपामीति स्वाहा।



चंदन और सुगंधित गंधों, की वसुधा पर कमी नहीं।

लेकिन तेरी ज्ञान सुगन्धी, से सुरभित है आज मही।।

उसी ज्ञान की सौरभ लेने, को आतुर मेरा मन है।

तेरी पावन प्रतिभा लखकर, मेरा मन भी पावन है।।२।।

Chandan.jpg
Chandan.jpg


ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।



जग के नश्वर वैभव से, मैंने शाश्वत सुख था चाहा।

पर तेरे उपदेशों से, वैराग्य हृदय मेरे भाया।।

अक्षय सुख के लिए मुझे, तेरा प्रवचन ही साधन है।

तेरी पावन प्रतिभा लखकर, मेरा मन भी पावन है।।३।।

Akshat 1.jpg
Akshat 1.jpg


ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।



कामदेव ने निज बाणों से, जब युग को था ग्रसित किया।

तुमने अपनी कोमल काया, लघुवय में ही तपा दिया।।

इसीलिए तव पद में आकर, शान्त हुआ मेरा मन है।

तेरी पावन प्रतिभा लखकर, मेरा मन भी पावन है।।४।।

Pushp 1.jpg
Pushp 1.jpg


ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।



मानव सुन्दर पकवानों से, अपनी क्षुधा मिटाते हैं।

लेकिन उनके द्वारा भी नहिं, भूख मिटा वे पाते हैं।।

आत्मा की संतृप्ति हेतु , तव वाणी मेरा भोजन है।

तेरी पावन प्रतिभा लखकर, मेरा मन भी पावन है।।५।।

Sweets 1.jpg
Sweets 1.jpg


ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।



विद्युत के दीपों से जग ने, गृह अंधेर मिटाया है।

ज्ञान का दीपक लेकर तुमने, अन्तरंग चमकाया है।।

घृत का दीपक लेकर माता, हम करते तव प्रणमन है।

तेरी पावन प्रतिभा लखकर, मेरा मन भी पावन है।।६।।

Diya 3.jpg
Diya 3.jpg


ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे दीपं निर्वपामीति स्वाहा।



कर्मों ने ही अब तक मुझको, यह भव भ्रमण कराया है।

तुमने उन कर्मों से लड़कर, त्याग मार्ग अपनाया है।।

धूप जलाकर तेरे सम्मुख, हम करते तव पूजन हैं।

तेरी पावन प्रतिभा लखकर, मेरा मन भी पावन है।।७।।

Dhoop 1.jpg
Dhoop 1.jpg


ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे धूपं निर्वपामीति स्वाहा।



कितने खट्टे मीठे फल को, मैंने अब तक खाया है।

तुमने माँ जिनवाणी का, अनमोल ज्ञानफल खाया है।।

तव पूजनफल ज्ञाननिधी, मिल जावे यह मेरा मन है।

तेरी पावन प्रतिभा लखकर, मेरा मन भी पावन है।।८।।

Almonds.jpg
Almonds.jpg


ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे फलं निर्वपामीति स्वाहा।



पिच्छि कमण्डलुधारी माता, नमन तुम्हें हम करते हैं।

अष्ट द्रव्य का थाल सजाकर, अघ्र्य समर्पण करते हैं।।

युग की पहली ज्ञानमती के, चरणों में अभिवन्दन है।

तेरी पावन प्रतिभा लखकर, मेर मन भी पावन है।।९।।

Arghya.jpg
Arghya.jpg


ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्रीज्ञानमती मात्रे अघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।



-शेरछंद-

हे माँ तू ज्ञान गंग की पवित्र धार है।

तेरे समक्ष गंगा की लहरें बेकार हैं।।

उस धार की कुछ बूँदों से जलधार मैं करूँ।

वह ज्ञान नीर मैं हृदय के पात्र में भरूँ।।

शांतये शांतिधारा।



स्याद्वाद अनेकान्त के उद्यान में माता।

बहुविध के पुष्प खिले तेरे ज्ञान में माता।।

कतिपय उन्हीं पुष्पों से मैं पुष्पांजलि करूँ।

उस ज्ञानवाटिका में ज्ञान की कली बनूँ।।

RedRose.jpg


दिव्य पुष्पांजलिं क्षिपेत्।



जयमाला

-दोहा-

ज्ञानमती को नित नमूँ, ज्ञान कली खिल जाय।

ज्ञानज्योति की चमक में, जीवन मम मिल जाय।।अर्घ्य

धुन- नागिन.....

हे बालसती, माँ ज्ञानमती, हम आए तेरे द्वार पे,

शुभ अर्घ्य संजोकर लाए हैं।।

शरद पूर्णिमा दिन था सुन्दर, तुम धरती पर आईं ।

सन् उन्निस सौ चौंतिस में माँ, मोहिनि जी हर्षाईं ।। माता...।।

थे पिता धन्य, नगरी भी धन्य, मैना के इस अवतार पे,

शुभ अर्घ्य संजोकर लाए हैं।।१।।



बाल्यकाल से ही मैना के, मन वैराग्य समाया।

तोड़ जगत के बंधन सारे,छोड़ी ममता माया।।माता....।।

गुरु संग मिला, अवलम्ब मिला, पग बढ़े मुक्ति के द्वार पे,

 शुभ अर्घ्य संजोकर लाए हैं।।२।।



शान्तिसिन्धु की प्रथम शिष्यता, वीरसिन्धु ने पाई।

उनकी शिष्या ज्ञानमती जी ने ,ज्ञान की ज्योति जलाई।।माता....।।

शिवरागी की, वैरागी की, ले दीप सुमन का थाल रे,

शुभ अर्घ्य संजोकर लाए हैं।।३।।



माता तुम आशीर्वाद से, जम्बूद्वीप बना है।

हस्तिनापुर की पुण्यधरा पर, कैसा अलख जगा है।।माता....।।

ज्ञान ज्योति चली, जग भ्रमण करी, तेरे ही ज्ञान आधार पे,

 शुभ अघ्र्य संजोकर लाए हैं।।४।।



तीर्थ अयोध्या, मांगीतुंगी का विकास करवाया।

फिर प्रयाग में तपस्थली का, नूतन तीर्थ बनाया।। माता.....।।

प्रभु समवसरण, रथ हुआ भ्रमण, श्री ऋषभदेव के नाम का,

शुभ अर्घ्य संजोकर लाए हैं।।५।।



कुण्डलपुर तीरथ विकास की, नई प्रेरणा आई।

महावीर की जन्मभूमि में, अगणित खुशियाँ छाईं ।।माता...।।

महावीर ज्योति, रथ से उद्योत, कर दिया पुनः संसार को,

 शुभ अर्घ्य संजोकर लाए हैं।।६।।



तीर्थंकर की जन्मभूमियों, का विकास करवाया।

पाश्र्वनाथ के उत्सव का फिर, तुमने बिगुल बजाया।।माता.......।।

संदेश दिया, उपदेश दिया, भावना हुई साकार है,

शुभ अर्घ्य संजोकर लाए हैं।।७।।

Vandana 1.jpg
Vandana 1.jpg


यथा नाम गुण भी हैं वैसे, तुम हो ज्ञान की दाता।

तुम चरणों में आकर के हर, जनमानस हर्षाता।।माता....।।

साहित्य सृजन, श्रुत में ही रमण, कर चलीं स्वात्म विश्राम पे,

     शुभ अर्घ्य संजोकर लाए हैं।।८।।



गणिनी माता के चरणों में, यही याचना करते ।

कहे ‘‘चन्दनामती’’ ज्ञान की , सरिता मुझमें भर दे।।माता.....।।

ज्ञानदाता की, जगमाता की, वन्दना करूँ शतबार मैं,

शुभ अर्घ्य संजोकर लाए हैं।।९।।



-दोहा-

लोहे को सोना करे, पारस जग विख्यात।

तुम जग को पारस करो, स्वयं ज्ञानमती मात।।१०।।

ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती मात्रे जयमाला पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

- शंभुछंद-

जो गणिनी ज्ञानमती माता की, करें सदा पूजा रुचि से।

वे ज्ञानामृत से निज मन को, पावन कर अभिसिंचित करते।।

इस शरदपूर्णिमा के चन्दा की, ज्ञानरश्मियाँ बढ़ें सदा।

‘‘चन्दनामती’’ युग युग तक यह, आलोक जगत को मिले सदा।।

Vandana 2.jpg


।। इत्याशीर्वाद:, पुष्पांजलि: ।।