Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


डिप्लोमा इन जैनोलोजी कोर्स का अध्ययन परमपूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा प्रातः 6 बजे से 7 बजे तक प्रतिदिन पारस चैनल के माध्यम से कराया जा रहा है, अतः आप सभी अध्ययन हेतु सुबह 6 से 7 बजे तक पारस चैनल अवश्य देखें|

१८ अप्रैल से २३ अप्रैल तक मांगीतुंगी सिद्धक्ष्रेत्र ऋषभदेव पुरम में इन्द्रध्वज मंडल विधान आयोजित किया गया है |

२५ अप्रैल प्रातः ६:४० से पारस चैनल पर पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी के द्वारा षट्खण्डागम ग्रंथ का सार प्रसारित होगा |

बीस तीर्थंकर पूजा

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
==
बीस तीर्थंकर पूजा
BEES TITHANKAR.jpg
[विद्यमान बीस तीर्थंकर व्रत में]
-स्थापना—गीताछंद-
Cloves.jpg
Cloves.jpg

सीमंधरादिक बीस तीर्थंकर विदेहों में रहें।

जिनकी सभा में आज भी, भविवृंद निज कल्मष दहें।।

उन विद्यमान जिनेश की, मैं नित करूँ आराधना।

पूजन करूँ अतिभक्ति से, निजतत्त्व की ही साधना।।१।।

ॐ ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थसीमंधरादिविद्यमानिंवशति-तीर्थंकरसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।

ॐ ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थसीमंधरादिविद्यमानिंवशति-तीर्थंकरसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।

ॐ ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थसीमंधरादिविद्यमानिंवशति-तीर्थंकरसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

अथाष्टकं-स्रग्विणी छंद

पद्मद्रह का सलिल गंधवासित लिया।

नाथ चरणाब्ज में तीन धारा किया।।

बीस तीर्थंकरों की करूँ अर्चना।

हो प्रभू भक्ति से मोह की वंचना।।१।।

Jal.jpg
Jal.jpg

ॐ ह्रीं श्री सीमंधरादिविद्यमानिंवशतितीर्थंकरेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा।

गंध कर्पूर चंदन घिसा के लिया।

आप पादाब्ज में चर्च के अर्चिया।।

बीस तीर्थंकरों की करूँ अर्चना।

हो प्रभू भक्ति से मोह की वंचना।।२।।

Chandan.jpg
Chandan.jpg

ॐ ह्रीं श्री सीमंधरादिविद्यमानिंवशतितीर्थंकरेभ्यो चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

कौमुदी धौत तंदुल लिये थाल में।

आप पादाग्र में पुंज को धार मैं।।

बीस तीर्थंकरों की करूँ अर्चना।

हो प्रभू भक्ति से मोह की वंचना।।३।।

Akshat 1.jpg
Akshat 1.jpg

ॐ ह्रीं श्री सीमंधरादिविद्यमानिंवशतितीर्थंकरेभ्यो अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।

मौलसिरि मालती पुष्प ताजे लिये।

कामशर के जयी आपको अर्पिये।।

बीस तीर्थंकरों की करूँ अर्चना।

हो प्रभू भक्ति से मोह की वंचना।।४।।

Pushp 1.jpg
Pushp 1.jpg

ॐ ह्रीं श्री सीमंधरादिविद्यमानिंवशतितीर्थंकरेभ्यो पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

पूड़ियाँ लड्डुकादी भरे थाल में।

पूजते भूख व्याधी नशे हाल में।।

बीस तीर्थंकरों की करूँ अर्चना।

हो प्रभू भक्ति से मोह की वंचना।।५।।

Sweets 1.jpg
Sweets 1.jpg

ॐ ह्रीं श्री सीमंधरादिविद्यमानिंवशतितीर्थंकरेभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

ज्योति कर्पूर की ध्वांतहर जगमगे।

दीप से अर्चते ज्ञान ज्योती जगे।।

बीस तीर्थंकरों की करूँ अर्चना।

हो प्रभू भक्ति से मोह की वंचना।।६।।

Diya 3.jpg
Diya 3.jpg

ॐ ह्रीं श्री सीमंधरादिविद्यमानिंवशतितीर्थंकरेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

धूप दशगंध खेऊं सदा अग्नि में।

कर्म संपूर्ण हों भस्म तुम भक्ति में।।

बीस तीर्थंकरों की करूँ अर्चना।

हो प्रभू भक्ति से मोह की वंचना।।७।।

Dhoop 1.jpg
Dhoop 1.jpg

ॐ ह्रीं श्री सीमंधरादिविद्यमानिंवशतितीर्थंकरेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

आम अंगूर नींबू बिजौरा लिया।

मोक्षफलहेतु प्रभु आपको अर्पिया।।

बीस तीर्थंकरों की करूँ अर्चना।

हो प्रभू भक्ति से मोह की वंचना।।८।।

Almonds.jpg
Almonds.jpg

ॐ ह्रीं श्री सीमंधरादिविद्यमानिंवशतितीर्थंकरेभ्यो फलं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्घ में रत्न सुंदर मिले हैं भले।

पूजते आपको स्वात्म निधियाँ मिलें।।

बीस तीर्थंकरों की करूँ अर्चना।

हो प्रभू भक्ति से मोह की वंचना।।९।।

Arghya.jpg
Arghya.jpg

ॐ ह्रीं श्री सीमंधरादिविद्यमानिंवशतितीर्थंकरेभ्यो अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतीधारा करूँ, नाथ पादाब्ज में।

शांति आत्यंतिकी, शीघ्र हो नाथ में।।१०।।

शांतये शांतिधारा।

कुंद कल्हार जूही, चमेली खिले।

पुष्प अंजलि करूँ, सौख्य संपत मिले।।११।

दिव्य पुष्पांजलि:।

RedRose.jpg

—पूर्णार्घ-कुसुमलता छंद—

Pushpanjali 1.jpg
Pushpanjali 1.jpg

ढाई द्वीप में पाँच मेरु, संबंधित पाँच विदेह महान।

प्रत्येक में चार चार तीर्थंकर विद्यमान सुखखान।।

पंचकल्याणक के सब स्वामी, पंचपरावर्तन से दूर।

मैं पंचांग नमूँ प्रभु करिये, पंचमगति के सुख भरपूर।।१२।।

Pushpanjali 1.jpg
Pushpanjali 1.jpg

ॐ ह्रीं अर्हं श्री सीमंधर-युगमंधर-बाहु-सुबाहु-संजातक-स्वयंप्रभु-ऋषभानन-अनंतवीर्य-सूरिप्रभ-विशालकीर्ति-वङ्काधर-चंद्रानन-चंद्रबाहु-भुजंगम-ईश्वर-नेमीप्रभु-वीरसेन-महाभद्र-देवयश-अजितवीर्यपर्यंतिंवशति-तीर्थंकरेभ्य: पूर्णा निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा।

दिव्य पुष्पांजलि:।

जाप्य—

Jaap.JPG
Jaap.JPG

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं श्रीसीमंधरादिविद्यमाविशंतितीर्थंकरेभ्यो नम:।

जयमाला

—पंच चामर छंद—

जयो जयो जयो जिनेंद्र इंद्रवृंद बोलते।

त्रिलोक में महागुरु सु आप नाम तोलते।।

सुधन्य धन्य धन्य आप साधुवृंद बोलते।

जिनेश आप भक्त ही तो निज किवाड़ खोलते।।१।।

समोसरण में आपके महाविभूतियाँ भरी।

अनेक ऋद्धि सिद्धियाँ सुआप पास में खड़ीं।।

अनंत अंतरंग गुण समूह आप में भरे।

गणीन्द्र औ सुरेंद्र चक्रि आप संस्तुती करें।।२।।

हरिन्मणी के पत्र पद्मराग के सुपुष्प हैं।

अशोक वृक्ष देखते समस्त शोक अस्त हैं।।

अनेक देववृंद पुष्पवृष्टि आप पे करें।

सुगंध वर्ण वर्ण के सुमन खिले खिले गिरें।।३।।

जिनेश आपकी ध्वनी अनक्षरी सुदिव्य है।

समस्त भव्य कर्ण में करे सुअर्थ व्यक्त है।।

न देशना कि चाह है न तालु ओंठ पुट हिलें।

असंख्य जीव के धुनी से चित्तपद्मिनी खिलें।।४।।

सुचामरों कि पंक्तियाँ ढुरें सुसूचना करें।

नमें तुम्हें सुभक्त वे हि ऊध्र्व में गमन करें।।

सुसिंहपीठ आपका अनेक रत्न से जड़ा।

विराजते सुआप हैं अत: महत्त्व है बढ़ा।।५।।

प्रभासुचक्र कोटि सूर्य से अधिक प्रभा धरे।

समस्त भव्य के उसी में सात भव दिखा करें।।

सु देवदुंदुभी सदा गंभीर नाद को करे।

असंख्य जीव का सुचित्त खींच के वहाँ करे।।६।।

सपेâद छत्र तीन जो जिनेश शीश पे फिरें।

प्रभो त्रिलोकनाथ आप सूचना यही करें।।

सुप्रातिहार्य आठ ये हि बाह्य की विभूतियाँ।

सुरेश ने रचे तथापि आप पुण्य राशियाँ।।७।।

Vandana 1.jpg
Vandana 1.jpg

प्रभो तुम्हीं महान मुक्ति बल्लभापती कहे।

प्रभो तुम्हीं प्रधान ईश सर्व विश्व के कहे।।

प्रभो तुम्हें सदा नमें सु भक्ति आप में धरें।

अनंतकाल तक वहीं अनंत सौख्य को भरें।।८।।

—दोहा—

तुम गुण सूत्र पिरोय स्रज, विविध वर्णमय फूल।

धरें वंâठ उन ‘ज्ञानमति’, लक्ष्मी हो अनुकूल।।

ॐ ह्रीं श्रीसीमंधरादििंवशतितीर्थंकरेभ्यो जयमाला पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा।

दिव्य पुष्पांजलि:।

—गीता छंद—

जो विहरमाण जिनेन्द्र बीसों, का सदा अर्चन करें।

वे भव्य निज के ही गुणों का, नित्य संवद्र्धन करें।।

इस लोक के सुख भोग के, फिर सर्वकल्याणक धरें।

स्वयमेव केवल ‘ज्ञानमति’ हो, मुक्तिलक्ष्मी वश करें।।१।।

Vandana 2.jpg

।। इत्याशीर्वाद:।।