भगवान महावीर केवलज्ञान भूमि ज्रम्भिका तीर्थक्षेत्र चालीसा

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भगवान महावीर केवलज्ञान भूमि ज्रम्भिका तीर्थक्षेत्र चालीसा


-दोहा-

वर्तमान शासनपती, महावीर भगवान |
चौबिसवें तीर्थेश को,शत-शत करूं प्रणाम ||१||
कुण्डलपुर है जन्मभू, दीक्षा वहीं महान |
ऋजुकूला नदि के निकट,ग्राम ज्रम्भिका जान ||२||
केवलज्ञान हुआ जहां, पुण्यमयी स्थान |
चालीसा कह तीर्थ का, प्राप्त करूं शिवधाम ||३||

-चौपाई-

जय हो जिनवर महावीर की, जय जय पंचकल्याण तीर्थ की ||१||
गर्भ जन्म तप भूमि प्रभू की, कुंडलपुर अतिशायी नगरी ||२||
ग्राम ज्रम्भिका में प्रभु तिष्ठे , ध्यानारूढ वहाँ अविचल थे ||३||
बारह वर्ष कठिन तप करते, कर्म घातिया नाशा उनने ||४||
आत्मा का अब भान हो गया, प्रभु को केवलज्ञान हो गया ||५||
इन्द्राज्ञा से धनपति आया, सुन्दर समवसरण रचवाया ||६||
समवसरण की दिव्य सभा में, गंधकुटी में जिनवर सोहें ||७||
उस स्थल का तब क्या कहना, नहीं किसी से कोई तुलना ||८||
अधर विराजे थे जब वीरा, नहीं खिरी ध्वनि सभी अधीरा ||९||
द्वादश सभा लगी अति भारी , श्री जिनवर की मूरत न्यारी ||१०||
प्रभु दर्शन करते भव्यात्मन ,रचना लख थे तृप्त सभी मन ||११||
प्रभु विहार थे करते जाते , देव चरण तल कमल खिलाते ||१२||
इन्द्र चला किंकर बन संग में, ऐसे कर छ्यासठ दिन निकले ||१३||
इन्द्रराज चिंतित था भारी, अन्वेषण की करी तैयारी ||१४||
समझ गया गणधर अभाव है, चला इन्द्र गौतम के पास है ||१५||
ब्राम्हण नामक उस नगरी में, एकत्रित विद्वत्समूह में ||१६||
इन्द्रभूति का ज्ञान देखकर, इन्द्र स्वयं भी था अचरज मन ||१७||
गौतम से जब प्रश्न किया था, किंकर्तव्यमूढ़ गौतम था ||१८||
बोला चलो तुम्हारे गुरु संग, मैं उत्तर देता हूँ तत्क्षण ||१९||
राजगृही में गिरि विपुलाचल, पहुंचा समवसरण के अंदर ||२०||
मानस्तम्भ देखकर मानी, मानभंग करने की ठानी ||२१||
जय जयकार उचारें गौतम ,वीरप्रभू के शिष्य बने अब ||२२||
वे गौतम गणधर कहलाए, दिव्यध्वनी प्रभुवर प्रगटायें ||२३||
जन-जन में तब खुशियाँ छाई, मानो सबने थी निधि पाई ||२४||
जिस धरती पर वीरप्रभू को, केवलज्ञान रमा ने परणा ||२५||
तीर्थ ज्रम्भिका ओर बंधु अब, ज्ञानमती माता ने देखा ||२६||
जीर्णोद्धार हुआ तीरथ का, भाग्य उदय हो गया भूमिका ||२७||
बड़ी एक मूरत पधराया, भव्य पंचकल्याण कराया ||२८||
सुन्दर मंदिर वहाँ बना है, केवलज्ञान कथा कहता है ||२९||
जो भी भक्त राजगृह आते, भागलपुर चम्पापुर जाते ||३०||
इस तीरथ की यात्रा करते,आत्मा के सब कल्मष हरते||३१||
महावीर प्रभु की मनहारी , मूर्ति लगे भक्तों को प्यारी ||३२||
जिनसंस्कृति के उद्गमस्थल, ये ही तीर्थ कहे धरती पर ||३३||
इनका वंदन करो सभी जन, करो सभी आत्मा को पावन ||३४||
जैनजगत का बड़ा पुण्य है, जिसे मिला इक ज्ञानसूर्य है ||३५||
जिनशासन जिनसे आलोकित,कीर्ति प्रसारित है दिन-दिन नित||३६||
अवध की वह अनमोल मणी हैं , कहलाईं वह मात बड़ी हैं ||३७||
गणिनीप्रमुख ज्ञानमति माता, बालसती जो हैं विख्याता ||३८||
जहाँ दृष्टि गुरु माँ की पड़ती, वह धूली चन्दन है बनती ||३९||
केवलज्ञान भूमि को प्रणमूँ ,ज्ञानमती माँ को अभिनंदूं ||४०||

-दोहा-

तीर्थ ज्रम्भिका को नमूँ , पावन तीरथराज |
मम आत्मा हो ज्ञानमय , इच्छा यह प्रभु पास ||१||
‘इंदु’ ज्ञानरवि उदित हो, मिट जाय भवक्लेश |
सिद्धिधाम मुझको मिले, जहां नहीं संक्लेश ||२||