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मिथ्यात्व, व्यसन, पाप, कषाय

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मिथ्यात्व, व्यसन, पाप, कषाय

विषय परिचय—जिनेन्द्र प्रभु की वाणी को धारण करने के पूर्व मिथ्यात्व, व्यसन, पाप एवं कषायों का स्वरूप समझकर उनका त्याग करना आवश्यक है। इस पाठ में इन्हीं चारों के भेद, उपभेद, हानि आदि का सविस्तार विवेचन २८ प्रश्नोत्तरों में किया गया है।

मिथ्यात्व

प्रश्न १. मिथ्यात्व किसे कहते हैं ?

उत्तर—विपरीत—खोटी मान्यता / श्रद्धा को मिथ्यात्व अथवा मिथ्यादर्शन कहते हैं।

प्रश्न २. मिथ्यात्व के कितने भेद हैं ? उत्तर—मिथ्यात्त्व के दो भेद हैं— १. अगृहीत मिथ्यात्व—दूसरों के उपदेश के बिना मिथ्यात्व कर्म के उदय से जो जीवादि तत्त्वों का विपरीत श्रद्धान होता है, वह अगृहीत मिथ्यात्व है। जैसे—यह शरीर मेरा है। २. गृहीत मिथ्यात्व—दूसरे के उपदेश से प्रभावित होकर रागी—व्देषी देवी—देवताओं की आराधना करना गृहीत मिथ्यात्व है। जैसे—जिन शासन में वर्णित देवी—देवताओं के अतिरिक्त मिथ्यात्वी रागी—व्देषी देवी—देवताओं की आराधना से सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। ऐसा मानना गृहीत मिथ्यात्व है।

प्रश्न ३. गृहीत मिथ्यात्व के पाँच भेद कौन—कौन से हैं ?

उत्तर—१. एकान्त मिथ्यात्व—वस्तु के किसी एक धर्म को स्वीकार करके शेष समस्त धर्मों का लोप करना एकान्त मिथ्यात्व है। जैसे—वस्तु नित्य अथवा क्षणिक ही है। २. विपरीत मिथ्यात्व—वस्तु स्वरूप के विपरीत श्रद्धान को विपरीत मिथ्यात्व कहते हैं। जैसे—परिग्रहधारी को साधु मानना। ३. विनय मिथ्यात्व—सब देवताओं और सब धर्मों पर समान आदर भाव रखना विनय मिथ्यात्व है। ४. संशय मिथ्यात्व—किसी भी एक पक्ष को स्वीकार नहीं करना जैसे—हिंसा में धर्म है अथवा अहिंसा में धर्म है यह संशय मिथ्यात्व है। ५. अज्ञान मिथ्यात्व—हित—अहित का कुछ भी विवेक—ज्ञान नहीं होना अज्ञान मिथ्यात्व है।

प्रश्न ४. सात तत्त्वों के विषय में जीव का भूल क्या है ?

उत्तर—साता तत्त्वों के विषय में जीव की भूल निम्न है— १. जीव तत्त्व विषयक भूल—शरीर को ही जीव मानना। २. अजीव तत्त्व विषयक भूल—शरीर के जन्म, मरण को जीव का जन्म करण मानना। ३. आस्रव तत्त्व विषयक भूल—रागादि को सुख का कारण मानना। ४. बन्ध तत्त्व विषयक भूल—शुभ कर्म के फल में राग एवं अशुभ कर्म के फल में व्देष करना। ५. संवर तत्त्व विषयक भूल—आत्मा के हितकारी वैराग्य—ज्ञान हैं उनको कष्टकारी मानना। ६. निर्जरा तत्त्व विषयक भूल–अपनी शक्ति को भूलकर इच्छाओं का निरोध नहीं करना। ७. मोक्ष तत्त्व विषयक भूल—मोक्ष को आकुलता से सहित मानना।

प्रश्न ५. अगृहीत मिथ्याज्ञान और अगृहीत मिथ्याचारित्र किसे कहते हैं ?

उत्तर—सात तत्त्वों के विपरीत श्रद्धान पूर्वक जो ज्ञान होता है, उसे अगृहीत मिथ्याज्ञान कहते हैं और अगृहीत मिथ्यादर्शन और ज्ञान के साथ पञ्चेन्द्रिय के विषयों में होने वाली प्रवृत्ति को अगृहीत मिथ्या चारित्र कहते हैं।

प्रश्न ६. किनकी सेवा करने से गृहीत मिथ्यात्व का पोषण होता है ?

उत्तर—मिथ्यादृष्टि कुगुरु, कुदेव और कुधर्म की सेवा करने से गृहीत मिथ्यात्व का पोषण अर्थात् दर्शनमोहनीय कर्म मजबूत होता है।

प्रश्न ७. कुगुरु, कुदेव, कुधर्म का स्वरूप क्या है ?

उत्तर—१. कुगुरु–जो मन में राग—द्वेष रखते हैं, बहिरंग में धन, वस्त्र, परिग्रह आदि से प्रेम रखते हैं, खोटे वेष धारण करके अपने को श्रेष्ठ कहने वाले कुगुरु हैं। २. कुदेव—जिनके अंतरंग में राग—द्वेष का सद्भाव है, जिनकी पहचान स्त्री, गदा, धनुष आदि अस्त्र से होती है ऐसे वीतरागता से रहित कुदेव हैं। ३. कुधर्म—जिन कार्यो को करने से राग—द्बेष उत्पन्न होते हैं, अपने और दूसरे के प्राणों को दु:ख होता है तथा त्रस—स्थावर जीवों का घात हो, उस क्रिया को कुधर्म कहते हैं।

प्रश्न ८. गृहीत मिथ्याज्ञान और गृहीत मिथ्याचारित्र किसे कहते हैं ?

उत्तर—एकान्तवाद के पोषक, इन्द्रियों के विषयों का पोषण करने वाले शास्त्रों को पढ़ना गृहीत मिथ्याज्ञान है। ख्याति, लाभ, पूजा, प्रतिष्ठा की इच्छा रखकर अनेक प्रकार से शारीरिक कष्ट पहुँचाने वाला आत्मा और शरीर के भेदविज्ञान से रहित व्रताचरण आदि क्रियाएँ करना गृहीत मिथ्याचारित्र है।व्यसन

प्रश्न ९. व्यसन किसे कहते हैं और कितने होते हैं ?

उत्तर—बुरी आदतों को व्यसन कहते हैं। बुरी आदतें मनुष्य को लौकिक, पारलौकिक संकटों में डाल देती हैं। व्यसनों में फंसा मनुष्य पथभ्रष्ट होकर आथिॅक हानि के साथ शारीरिक हानि को भी उठाता है। व्यसन सात हैं। १. जुआ खेलना—बिना परिश्रम के अधिक धन कमाने की लालसा से ध्युतक्रिडा करना, सट्टा लगाना, लाटरी खेलना आदि। २. मांसाहार—मांस भक्षण, अण्डे, मुर्गे आदि का सेवन। ३. मद्य—शराब पीना, गांजा, भांग, अफीम, चरस, धूम्रपान आदि मादक पदार्थों का सेवन। ४. वेश्यावृत्ति—वेश्यावृत्ति करना। ५. शिकार—अपने मनोरंजन के लिए जीवों का घात करना। ५. चोरी—दूसरे के धन आदि का हरण करना। ७. परस्त्री सेवन—अपनी स्त्री के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों से यौन सम्पकॅ रखना।

प्रश्न १०. धर्मधारण करने के लिए व्यक्ति को सर्वप्रथम क्या करना चाहिये ?

उत्तर—धर्मधारण करने के लिए व्यक्ति को सर्वप्रथम सप्त व्यसनों का त्याग करना चाहिए। व्यसनी को जिनवाणी सुनने की भी पात्रता नहीं है।

प्रश्न ११. पाप किसे कहते हैं और कितने होते हैं ?

उत्तर—जिस कार्य को करने से आत्मा का पतन होता है अथवा जो हमें शुभ कार्यों में नहीं लगने देता है, ऐसे इहलोक एवं परलोक में कष्ट देने वाले कार्यों को पाप कहते हैं। पाप पाँच होते हैं—१. हिंसा, २. झूठ, ३. चोरी, ४. कुशील, ५. परिग्रह।

प्रश्न १२. हिंसा किसे कहते हैं और कौन से कारणों जीव हिंसा करता है ?

उत्तर—प्रमाद पूर्वक मन, वचन, काय के व्दारा अपने अथवा दूसरे जीवों के प्राणों का घात करनाहिंसा कहलाती है। क्रोध, मान, माया अथवा लोभ से प्रेरित होकर जीव हिंसा के कार्य में लगता है।

प्रश्न १३.हिंसा के कितने भेद हैं और कौन—कौन से ?

उत्तर—हिंसा के चार भेद हैं— १. संकल्पीहिंसा —संकल्प पूर्वक किसी भी प्राणी को मारने का भाव करना संकल्पीहिंसा है। बूचड़खाने की हिंसा , गर्भपात की हिंसा , कीटनाशक के प्रयोग की हिंसा , बलि चढ़ाना, पुतला दहन आदि की हिंसा संकल्पी हिंसा ही है। २. आरंभी हिंसा—मकान निर्माण, भोजन निर्माण, मकान की सफाई, शरीर की सफाई, वस्त्र आदि की सफाई करने में जो स्थावर जीवों का घात होता है, वह आरंभीहिंसा कहलाती है। ३. उध्योगीहिंसा — कृषि, व्यापार एवं सरकारी सेवा करने में जो हिंसा होती है, वह उध्योगीहिंसा है। ४. विरोधी हिंसा—स्वयं की रक्षा, परिवार की रक्षा, समाज, संस्कृति एवं धर्म की रक्षा हेतु जो हिंसा होती है वह विरोधीहिंसा कहलाती है। अथवा द्रव्यहिंसा और भावहिंसा के भेद से हिंसा के दो भेद हैं। १. द्रव्य हिंसा—कसी भी जीव का घात करना द्रव्य हिंसा है। २. भाव हिंसा—आत्मा के अन्तर राग—व्देष, मोह आदि विकारी परिणामों की उत्पत्ति होना भावहिंसा है।

प्रश्न १४. गृहस्थ एवं साधु कौन सी हिंसा के त्यागी होते हैं ?

उत्तर—गृहस्थ संकल्पीहिंसा का त्यागी पूर्ण रूप से होता है किन्तु अन्यहिंसा ओं का त्याग तो नहीं कर सकता है किन्तु हर कार्य विवेक पूर्वक करता है। साधु समस्त प्रकार की हिंसा के पूर्ण त्यागी होते हैं।

प्रश्न १५. असत्य (झूठ) पाप किसे कहते हैं ?

उत्तर—जैसा देखा हो, जैसा सुना हो, वैसा न कहकर अन्यथा कहना झूठ है अथवा ऐसा सत्य भी झूठ की श्रेणी में ही आता है जिससे स्व—पर का घात होता है।

प्रश्न १६. चोरी पाप किसे कहते हैं ?

उत्तर—दूसरों की रखी हुई, भूली हुई, गिरी हुई, वस्तु को स्वयं ग्रहण करना अथवा उठाकर दूसरों को देना चोरी कहलाते हैं।

प्रश्न १७. कुशील पाप किसे कहते हैं ?

उत्तर—जिनका परस्पर में विवाह हुआ है, ऐसे स्त्री पुरुष को एक दूसरे को छोड़कर अन्य स्त्री—पुरुषों का एक दूसरे के प्रति राग भाव से सम्बन्ध होना कुशील पाप कहलाता है।

प्रश्न १८. परिग्रह पाप किसे कहते हैं ?

उत्तर—जमीन, मकान, धन, धान्य, सोना, चाँदी आदि पदार्थों के प्रति तीव्र आसक्ति भाव होना परिग्रह पाप कहलाता है।

प्रश्न १९. पाँचों पापों का फल कया हैं ?

उत्तर—पापी व्यक्ति को सामाजिक स्तर पर, राजनीतिक स्तर पर, इहलोक में भी अनेक प्रकार के दण्ड दिये जाते हैं परलोक में नरक, तिर्यञ्च आदि दुर्गतियों में जाकर अनेक प्रकार के कष्ट उठाना पड़ते हैं। कषाय

प्रश्न २०. कषाय किसे कहते हैं ?

उत्तर—जो आत्मा को संसार में परिभ्रमण कराती है, चारित्र गुण का घात करती है एवं आत्मा के अंदर कलुषित खोटे परिणाम उत्पन्न करती है, उसे कषाय कहते हैं।

प्रश्न २१.कषाय के कितने भेद हैं और कौन—कौन से ?

उत्तर—मूलत: कषाय के चार भेद हैं— १. क्रोध—स्व और पर का घात करने वाले क्रूरपरिणाम। २. मान—अहंकार, घमण्ड रूप परिणामों का होना। ३. माया—दूसरों को धोखा देने रूप कुटिल परिणामों का होना। ४. लोभ—बाह्य पदार्थों में एवं शरीर में तीव्र राग रूप परिणाम। प्रत्येक कषाय के अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण एवं संज्वलन के भेद में चार—चार भेद होते हैं। इस प्रकार १६ भेद हो जाते हैं। हास्यादि नो कषायों का योग करने पर कषाय के २५ भेद हो जाते हैं।

प्रश्न २२. अनंतानुबंधी कषाय किसे कहते हैं ?

उत्तर—मिथ्यात्व को अनंत कहा है, मिथ्यात्व के साथ अनंत भवों तक संसार में परिभ्रमण कराने वाली कषाय अनंतानुबंधी कषाय कहलाती है। यह कषाय सम्यक्त्व और चारित्र दोनों गुणों का घात करती है। इसके उदय में जीव सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं कर पाता।

प्रश्न २३. अप्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं ?

उत्तर—जो कषाय देशसंयम का घात करती है अर्थात् प्रकट नहीं होने देती उसे अप्रत्याख्यानावरण कषाय कहते हैं। इसके उदय में जीव श्रावक के व्रत भी ग्रहण नहीं कर पाता।

प्रश्न २४. प्रत्याख्यानावरण कषाय किसे कहते हैं ?

उत्तर—जो कषाय सकल संयम को प्रकट नहीं होने देती, उसे प्रत्याख्यानावरण कषाय कहते हैं। इसके उदय में जीव मुनिव्रत अर्थात् महाव्रतों को ग्रहण नहीं कर पाता।

प्रश्न २५. संज्वलन कषाय किसे कहते हैं ?

उत्तर—जिस कषाय के रहते हुए संकल संयम तो रहता है किन्तु यथाख्यात चारित्र प्रकट नहीं हो पाता उसे संज्वलन कषाय कहते हैं। इसके उदय में जीव आत्मा के स्वरूप में लीन नहीं हो पाता।

प्रश्न २६. कषायों के कार्य एवं जीतने के उपाय क्या हैं ?

उत्तर—क्रोध कषाय प्रीति (प्रेम) को समाप्त कर देती है, क्षमा गुण के व्दारा क्रोध को जीतना चाहिए। मान कषाय विनय गुण को नष्ट कर देती है, विनम्रता के व्दारा मान कषाय को जीतना चाहिए। माया कषाय मित्रता को समाप्त कर देती है, सरलता के व्दारा माया कषाय को जीतना चाहिए। लोभ कषाय समस्त गुणों को समाप्त कर देती है, संतोष गुण के व्दारा लोभ कषाय को जीतना चाहिए।

प्रश्न २७. कषायों का संस्कार काल कितना होता है ?

उत्तर—अनंतानुबंधी कषाय संख्यात, असंख्यात एवं अनंत भवों तक रहती है। अप्रत्याख्यान कषाय ६ माह तक रहती है। प्रत्याख्यान कषाय १५ दिन तक रहती है एवं संज्वलन कषाय अन्तर्मुहूर्त तक रहती हैं।

प्रश्न २८. नो कषाय किसे कहते हैं एवं कितने भेद होते हैं ?

उत्तर—ईषत् (अल्प) कषाय को नोकषाय अथवा कषाय कहते हैं। नोकषाय के ९ भेद होते हैं।

१. हास्य—जिसके उदय में हँसी आती है। २. रति—जिसके उदय में जीव विषयों में राग करता है। ३. अरति—जिसके उदय में जीव देशादि से व्देष करता है। ४. शोक—जिसके उदय में जीव देशादि से व्देष करता है। ५. भय—जिसके उदय में जीव क्लेश उत्पन्न करता है। ६. जुगुप्सा—जिसके उदय में ग्लानि उत्पन्न हो। ७. स्त्रीवेद—जिसके उदय में स्त्री सम्बन्धी भावों को प्राप्त हो। ८. पुरुषवेद—जिसके उदय में पुरुष सम्बन्धी भावों को प्राप्त हो।

९. नपुंसकवेद—जिसके उदय में नपुंसक सम्बन्धी भावों को प्राप्त हो।