ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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दसलक्षण पर्व के शुभ अवसर पर मांगी तुंगी सिद्ध क्षेत्र पर 6 सितम्बर से 16 सितम्बर तक होने वाले कल्पद्रुम विधान में सभी धर्मानुरागी बंधु ज्यादा से ज्यादा संख्या में भाग लेवें

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विश्व की सबसे बड़ी जैन प्रतिमा - भगवान ऋषभदेव
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मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र में फरवरी २०१६ में सम्पन्न हुआ विश्व का सबसे बड़ा जैन महोत्सव
सप्तम पट्टाचार्य
मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र ९९ करोड़ महामुनियों की निर्वाणस्थली के रूप में विश्व प्रसिद्ध है, जिसे दक्षिण के लघु सम्मेदशिखर पर्वत के रूप में भी जैन समाज में मान्यता प्राप्त है।
सम्प्रेरिका
यह तीर्थ ९ लाख वर्ष पूर्व भगवान मुनिसुव्रतनाथ के तीर्थ काल से पूज्यता को प्राप्त है क्योंकि भगवान राम, हनुमान, सुग्रीव, सुडील, गव, गवाक्ष, नील, महानील आदि ९९ करोड़ महामुनियों ने जैनेश्वरी दीक्षा धारण करके दक्षिण भारत के इस पर्वत से कठोर तपश्चरण के साथ मोक्षधाम प्राप्त किया था। अत: तभी से सिद्धक्षेत्र के रूप में आज तक मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र की महिमा जन-जन के द्वारा गाई जाती है। इस पर्वतराज पर २ चूलिकाएँ हैं, जिनमें एक मांगीगिरि और दूसरी
मार्गदर्शन
तुंगीगिरि के नाम से प्रसिद्ध है। इस पर्वत पर हजारों वर्ष प्राचीन जिनप्रतिमाएँ, यक्ष-यक्षणियों की मूर्तियाँ, शुद्ध-बुद्ध मुनिराज के नाम से दो गुफाओं में भगवान मुनिसुव्रतनाथ एवं भगवान नेमिनाथ की प्रतिमाएँ आदि विराजमान हैं। साथ ही तलहटी में भी भगवान पार्श्वनाथ जिनमंदिर, मूलनायक भगवान आदिनाथ जिनमंदिर, भगवान मुनिसुव्रतनाथ जिनमंदिर, मानस्तंभ आदि निर्मित हैं।
कुशल नेतृत्व

सन् १९९६ में पूज्य माताजी ससंघ का चातुर्मास मांगीतुंगी जी में हुआ और उन्होंने मांगीतुंगी पर्वत पर अखण्ड पाषाण में भगवान ऋषभदेव की १०८ फुट उत्तुुंग विशालकाय जिनप्रतिमा निर्माण की प्रेरणा प्रदान की। पूज्य माताजी की प्रेरणा के उपरांत समस्त सरकारी कार्यवाही पूर्ण करके ३ मार्च २००२ में पर्वत पर मूर्ति निर्माण हेतु शिलापूजन समारोह का भव्य आयोजन सानंद सम्पन्न हुआ। आज समाज के समक्ष इस मूर्ति निर्माण का कार्य पूरा हो गया है, जब हमारे समक्ष साक्षात भगवान आदिनाथ की 108 फीट की मूर्ति है और ११ फरवरी २०१६ से १७ फरवरी २०१६ तक इस मूर्ति के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव अंतर्राष्ट्रीय स्तर के भव्य आयोजन के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ।..पूरा पढ़े

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पंचामृत अभिषेक


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सोलहकारण पर्व


सोलहकारण पर्व

प्रतिवर्ष सोलहकारण पर्व भाद्रपद कृष्णा प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर आश्विन कृष्णा प्रतिपदा तक मनाया जाता है। सामान्यत: यह पर्व ३१ दिन का होता है। इस पर्व में सोलहकारण भावनाओं का चिन्तन किया जाता है। शास्त्रों में १६ भावनायें कही गई हैं। इन भावनाओं से तीर्थंकर नामकर्म प्रकृति का बंध होता है। इस कर्मप्रकृति के उदय से समवशरण एवं पंचकल्याण रूप विभूति प्राप्त होती है। इन भावनाओं का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है—

१. दर्शनविशुद्धि—इस भावना का होना आवश्यक है। क्योंकि इसके न होने पर और शेष सबके अथवा कुछ के होने पर भी तीर्थंकर प्रकृति का बंध नहीं होता है। दर्शन शब्द का अर्थ है यथार्थ श्रद्धान अर्थात् जिनेन्द्रदेव द्वारा बताये गये मार्ग का २५ दोषों से रहित और अंगों से सहित पूर्ण श्रद्धान करना ही दर्शन विशुद्धि भावनाहै।

२. विनयसम्पन्नता—सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र एवं वीर्य की, इनके कारणों की तथा इनके धारकों की विनय करना तथा आयु में ज्येष्ठ जनों का यथायोग्य आदर करना विनय सम्पन्नता कहलाती है।

३. शीलव्रतेषु अनतिचार—अहिंसा आदि पाँच व्रत हैं तथा इनका क्रोधादि कषायों से रहित पालन करना शील कहलाता है। व्रत और शीलों का निर्दोष रीति से पालन करना ही शीलव्रतेशु अनतिचार है।

४. अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग—सदैव ज्ञानाभ्यास में लगे रहना अभीक्षण ज्ञानोपयोग है। जो व्यक्ति निरन्तर धार्मिक ज्ञानाभ्यास करता है, उसके हृदय में मोह रूपी महान् अन्धकार निवास नहीं करता है। ...और पढ़ें

ज्योतिष


जैनागम में ज्योतिष

जैन मत के अनुसार यह ब्रह्माण्ड अनंत हैं। सदा से हैं, और सदा रहेगा। काल के अनुसार परिवर्तनशील हैं और रहेगा। इसी प्रकार ज्योतिष भी ब्रह्माण्ड की तरह अनादि है। सदा से है और रहेगा । और काल की गणना का मुख्य बिन्दु ही यह ज्योतिष शास्त्र ही है। जैन मान्यता से बीस कोडा कोडी सागर का एक कल्पकाल बताया गया है। इस के दो भाग होते हैं। एक अवसर्पिणी और दूसरा उत्सर्पिणी काल यह दोनों काल क्रमशः से आते जाते रहते हैं । इनके छः भाग होते हैं - क्रमशः - 1. सुषमा-सुषमा 2.सुषमा 3. सुषम दुःषमा4. दुःषम-सुषमा 5. दुःषम6. अति दुःषमा । ऐसे अवसर्पिणी काल के 6 भेद हैं। इसी प्रकार इनके उलटे क्रम से उत्सर्पणी काल के छः भेद हैं - 1.अति दुःषमा 2.दुःषमा3. दुःषम-सुषमा4. सुषम दुःषमा 5. सुषमा 6.सुषम-सुषमा होते हैं। दस कोडा-कोडी सागर प्रमाण का अवसर्पण तथा दस कोडा कोडी की आयु प्रमाण का उत्सर्पणी काल होता है। इन में अवसर्पणी में आयु - बल आदि की हानि और उत्सर्पणी काल में आयु - बलादि की वृद्धि होती है । इस समय जैन ज्योतिष के अनुसार 1 .सुषम -सुषमा 2. सुषमा 3 .सुषम दुःषमा 4 .दुःषम सुषमा हो व्यतीत हो चुके हैं और पंचम काल दुःषम काल चल रहा है। जो कि 21 हजार वर्ष का है। इसके बाद छठा काल अति दुषम काल आएगा। सुषम दुःषम जघन्य भोग भूमि काल के समय में 14 कुलकर (मनु) होते हैं । जब दिपांग जाति के कल्पवृक्षों का लोप हुआ तो सूर्य चन्द्रमा दिखलाई पडे। ...पूरा पढ़ें

वास्तु


वायव्य कोण का महत्व

नारायण श्री कृष्ण ने अपने मुखारविन्द से वास्तु शास्त्र में भूखण्ड, फ्लैट, बंगला, कोठी आदि में उत्तर पश्चिम की जहाँ संधि होती है उस कोण को वायव्य कोण कहा है। वायव्य कोण की जानकारी देते हुए बताया गया है कि वायव्य कोण का अधिपत्य वायुदेव और ग्रह चंद्र हैं। इनका प्रभाव उस कक्ष में रहने वाले को अतिशीघ्र बाहर निकलने का मानस बनाने में सहायक होता है।

वायव्य कोण एवं अतिथि कक्ष

अतिथि देवो भव:। अतिथि शब्द की गूँज कर्ण इंद्रिय को अति प्रिय लगती है। अतिथि का मतलब जिनके आने और जाने की तिथि निश्चित न हो। सही मायने में अतिथि ऋषिगण एवं मुनिवर ही हैं । निग्र्रन्थ मुनियों के लिए अतिथि शब्द उपर्युक्त है। अतिथि कक्ष आंतरिक सज्जा बनाते समय कुछ विशेष बातें ध्यान रखनी चाहिए। अतिथि कक्ष दूसरे सब कक्षों से सुन्दर एवं साज—सज्जा से परिपूर्ण होना चाहिए। अतिथि को यथाशक्ति आदर व सम्मान दिया जाता है। सद्गृहस्थ अपने बेड़रूम को खाली कर देता है एवं अतिथि को सम्मान से उसमें सोने के लिए निवेदन करता है। कहने का मुख्य उद्देश्य है कि अतिथि को पूर्णरुपेण सम्मान एवं सुविधा प्रदान करना । आज भी भारत वर्ष की संस्कृति में पुत्री को पराया धन माना जाता है। ...पूरा पढ़ें

पर्यूषण पर्व


पर्यूषण पर्व और हमारा कर्तव्य

परम पवित्र पर्यूषण पर्व के शुभावसर पर हमारे पाठकों का हम हार्दिक अभिनन्दन करते है। आत्म शुद्धि के इस पर्व पर हम श्रावकों का क्या कर्तव्य है— इस प्रश्न पर हम इस लेख में विचार करेंगे। आत्मशुद्धि जैन पर्वों की प्रमुख विशेषता है। इसके लिए क्रोध, मान, माया तथा लोभ रूप कषायों को हटाकर सम्यक् श्रद्धा, ज्ञान और आचरण को जीवन में उतारा जाता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह के द्वारा अपनी शुद्धि की जाती है। वाणी में स्याद्वाद, विचारों में अनेकान्तवाद और आचार में प्रतिष्ठापना की जाती है। आत्म साधना करते समय उत्तम क्षमा,उत्तम मार्दव आदि सदगुणों का विकास तथा क्रोधादि विकारों के शमन हेतु व्रत, उपवास, एकाशन, दर्शन, पूजन, भक्ति, स्वाध्याय, संयम पालन, इच्छा निरोध, तत्व चिन्तन, तत्वाभ्यास, उपदेश श्रवण आदि प्रधान कृत्य किये जाते हैं। इन्हीं के द्वारा आत्मा के अन्दर राग—द्वेषादिक विकारों को शान्त कर आत्मा से उत्तरोत्तर समता की ही अभिवृद्धि की जाती है। आत्मा को शोधन कर इसे पवित्र और निर्मल बनाया जाता है।

आज चारों तरफ अनैतिकता का कडुआ विष व्याप्त है। ईमानदार बनने की बात हास्यास्पद प्रतीत होता है। जो लोग एक विशुद्ध जीवन जीना चाहते हैं, निष्काम, निर्लिप्त रहना चाहते हैं, उनके लिये कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। मूल्यों पर भयावह संकट है, पुराने मूल्य लगभग समाप्त है, नये मूल्यों के लिये कोई राह नहीं है। हिंसा, झूठ तथा भ्रष्टाचार का बोलबाला है। विज्ञान के आविष्कारों ने और भौतिकवाद ने लोभ, लालच औ मिथ्याकर्षणों को भरपूर पनपा दिया है।ऐसी स्थिति में आशा की कोई किरण है तो वह धर्म है। जब संसार के सारे द्वार किसी के लिए बन्द हो जाते हैं तब एक दरवाजा फिर भी खुला रहता है। और वह है धर्म का। धर्म के विषय में धार्मिक पर्व हमें अधिक जागरूक बनाते हैं। ये नास्तिकता को हर लेते है और डावाडोल मनुष्य में उज्ज्वल प्रकाश भर देते है। ...और पढ़ें

वीडियो गैलरी


तरुणसागर मुनिराज के प्रवचन

...अन्य प्रवचन देखें

भाद्रपद में आने वाले व्रतों के जाप्य मंत्र


मेघमाला व्रत जाप्य

ॐ ह्रीं पंचपरमेष्ठिभ्यो नम:।

जिनमुखावलोकन व्रत जाप्य मंत्र

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौ ह्र: असि आ उ सा नम: सर्वसिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा ।

श्रुतस्कंध व्रत जाप्य

ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूतस्याद्वादनयगर्भितद्वादशांगश्रुतज्ञानेभ्यो नम:।

सोलहकारण व्रत जाप्य

1.ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धिभावनायै नमः

2.ॐ ह्रीं विनयसंपन्नताभावनायै नमः

3.ॐ ह्रीं शीलव्रतेश्वनतिचारभावनायै नमः

4.ॐ ह्रीं अभीक्ष्णज्ञानोपयोगभावनायै नमः

5.ॐ ह्रीं संवेगभावनायै नमः

6.ॐ ह्रीं शक्तितस्त्यागभावनायै नमः

7.ॐ ह्रीं शक्तितस्तपभावनायै नमः

8.ॐ ह्रीं साधुसमाधिभावनायै नमः

9.ॐ ह्रीं वैयावृत्यकरणभावनायै नमः

10.ॐ ह्रीं अर्हत्भक्तिभावनायै नमः

11.ॐ ह्रीं आचार्यभक्तिभावनायै नमः

12.ॐ ह्रीं बहुश्रुतभक्तिभावनायै नमः

13.ॐ ह्रीं प्रवचनभक्तिभावनायै नमः

14.ॐ ह्रीं आवश्यकापरिहाणिभावनायै नमः

15.ॐ ह्रीं मार्गप्रभावनाभावनायै नमः

16.ॐ ह्रीं प्रवचनवत्सलत्वभावनायै नमः

कुछ खास


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श्रुतस्कंध व्रत


श्रुतस्कंध व्रत

विधि— भादों मास में भादों कृष्णा प्रतिपदा से लेकर आश्विन कृष्णा प्रतिपदा तक यह व्रत किया जाता है। इसमें एक महिने में उत्कृष्ट १६ उपवास, मध्यम १० और जघन्य ८ उपवास करें। पारणा के दिन यथाशक्ति नीरस या एक- दो आदि रस छोड़कर एक बार भोजन (एकाशन) करें। १६ उपवास करने में प्रतिपदा से एक उपवास, एक पारणा ऐसे आश्विन कृ. प्रतिपदा तक १६ उपवास होंगे। ऐसे ही १० उपवास में कृष्णपक्ष में दूज, पंचमी, अष्टमी, दशमी और चौदश तथा शुक्लपक्ष में भी २,५,८,१० और १४ को उपवास करें। ८ उपवास में भी दो पंचमी, २ अष्टमी, २ दशमी और २ चौदस ऐसे ८ उपवास करें। अथवा शक्ति अनुसार जैसे भी हो, वैसे ये उपवास करें। प्रतिदिन जिनमंदिर में श्रुतस्कंध मंडल बनाकर श्रुतस्कंध विधान पूजन करें। इस व्रत में प्रतिदिन निम्नमंत्र का जाप्य करे-

‘‘ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूतस्याद्वादनयगर्भितद्वादशांगश्रुतज्ञानेभ्यो नम:।’’

...और पढ़ें

मेघमाला व्रत


मेघमाला व्रत विधि

मेघमाला व्रत भादों बदी प्रतिपदा से लेकर आश्विन वदी प्रतिपदा तक ३१ दिन तक किया जाता है। व्रत के प्रारंभ करने के दिन ही जिनालय के आँगन में सिंहासन स्थापित करें अथवा कलश को संस्कृत कर उसके ऊपर थाल रखकर, थाल में जिनबिम्ब स्थापित कर महाभिषेक और पूजन करे। श्वेत वस्त्र पहने, श्वेत ही चन्दोवा बांधे, मेघधारा के समान १००८ कलशों से भगवान का अभिषेक करे। पूजापाठ के पश्चात् ‘ॐ ह्रीं पंचपरमेष्ठिभ्यो नम:’ इस मंत्र का १०८ बार जाप करना चाहिए। मेघमाला व्रत में सात उपवास कुल किये जाते हैं और २४ दिन एकाशन करना होता है। तीनों प्रतिपदाओं के तीन उपवास, दोनों अष्टमियों के दो उपवास एवं दोनों चतुर्दशियों के दो उपवास इस प्रकार कुल सात उपवास किये जाते हैं। इस व्रत को पाँच वर्ष तक पालन करने के पश्चात् उद्यापन कर दिया जाता है। इस व्रत की समाप्ति प्रतिवर्ष आश्विन कृष्णा प्रतिपदा को होती है। सोलहकारण का व्रत भी प्रतिपदा को समाप्त किया जाता है, परन्तु इतनी विशेषता है कि सोलहकारण का संयम और शील आश्विन कृष्णा प्रतिपदा तक पालन करना पड़ता है तथा पंचमी को ही इस व्रत की पूर्ण समाप्ति समझी जाती है। यद्यपि पूर्ण अभिषेक प्रतिपदा को ही हो जाता है, परन्तु नाममात्र के लिए पंचमी तक संयम का पालन करना पड़ता है। ...और पढ़ें

प्राकृतिक चिकित्सा


उच्च रक्तचाप सिर दर्द का कारण

हमें शरीर के किसी अंग में दर्द होता है तो दर्द निवारक दवा खा लेते हैं। पर शरीर के एक ही हिस्से में बार—बार दर्द हो तो संभल जाना चाहिए क्योंकि इसका कारण गहरा हो सकता है या यह किसी गंभीर बिमारी का संकेत भी हो सकता है। खासकर एक हफ्ते तक लगातार रहने वाले दर्द को डॉक्टर से जांच जरूर करनी चाहिए। आइए जानते हैं कि शरीर के किस हिस्से का दर्द कौन सा संकेत देता है।
पांव की पिछली मांसपेशियों में दर्द — यह सामान्यत: मांसपेशियों में खिंचाव या मुड़ने के कारण होता है। दौड़ने या सख्त जमीन पर कूदने से पैर की मांसपेशियां चोटिल हो जाती है। वहीं लंबे समय तक शारीरिक निष्क्रियता, ज्यादा वजन, धूम्रपान और कुछ दवाओं के चलते पैर की नसों में रक्त के थक्के जम जाते हैं।

पीठ दर्द — पीठ दर्द हमेशा भारी फर्नीचर उठाने और खराब गद्दों पर सोने का कारण नहीं होता है। हमेशा कंधे पर भारी बेग उठाना, हील वाले जूते पहनना, बैठने और झुकने में दिक्कत करने वाले कसे कपड़े भी इसकी वजह हो सकते हैं। ...और पढ़ें

व्यंजन


आज का दिन - २९ अगस्त २०१६ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक 29 अगस्त,2016
तिथी-भाद्रपद कृष्णा द्वादशी
दिन-सोमवार
वीर निर्वाण संवत- 2542
विक्रम संवत- 2073

सूर्योदय 05:56
सूर्यास्त 18.53

सर्वार्थ सिद्धि 09.04 से

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