ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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परम पू. ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में सिद्धचक्र महामंडल विधान (आश्विन शुक्ला एकम से आश्विन शुक्ला नवमी तक) प्रारंभ हो गया है|

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ


शारदा व्रत


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शारदा व्रत

शारदा-सरस्वती की आराधना, उपासना, भक्ति आदि से भव्यजीव समीचीन ज्ञान की वृद्धि करते हुए परम्परा से श्रुतकेवली, केवली पद को प्राप्त करेंगे। यह व्रत ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष में एकम से आषाढ़ कृष्णा एकम तक सोलह दिन करना है। इसी प्रकार आश्विन मास में शुक्ला एकम से कार्तिक कृ. एकम तक पुन: माघ मास में शुक्ला एकम से फाल्गुन कृ. एकम तक, ऐसे वर्ष में तीन बार व्रत करना है। इस व्रत में शास्त्रों की पूजा-द्वादशांग जिनवाणी की पूजा, सरस्वती की मूर्ति की पूजा जिनके मस्तक पर भगवान अर्हंतदेव की मूर्ति विराजमान हैं ऐसी सरस्वती-शारदा देवी की पूजा करना।

इस व्रत में ज्येष्ठ शु. ५, आश्विन शु. ५ और माघ शु. ५ को व्रत, उपवास या एकाशन करना और उन दिनों विशेषरूप से सरस्वती की आराधना करना है तथा शेष दिनों में एक बार अन्न का भोजन करना, शक्ति के अनुसार दूसरी बार अल्पाहार-फल-दूध, औषधि आदि लेना चाहिए। रात्रि में चतुर्विध आहार का त्याग करना है। प्रतिदिन सरस्वती के साथ-साथ महालक्ष्मी देवी की तथा चक्रेश्वरी, पद्मावती आदि शासन देवियों की भी आराधना करना है।

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शारदा पक्ष के ४ व्रत


शारदा पक्ष के ४ व्रत होते हैं।

नवरात्रि, नवदेवता, चारित्रमाला व शारदा व्रत-

नवरात्रि व्रत-यह व्रत आश्विन शुक्ला एकम् से आश्विन शुक्ला नवमी तक किया जाता है।

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नवदेवता व्रत-

नवदेवता व्रत का दूसरा नाम रूपार्थवल्लरी व्रत है। यह आश्विन शुक्ला एकम् से आश्विन शुक्ला नवमी तक किया जाता है|

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चारित्र माला वृत-

आश्विन शुक्ला पूर्णिमा-शरद पूर्णिमा को उपवास करके यह वृत किया जाता है|

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शारदा व्रत-

सरस्वती की आराधना, उपासना, भक्ति आदि से भव्यजीव समीचीन ज्ञान की वृद्धि करते हुए परम्परा से श्रुतकेवली, केवली पद को प्राप्त करेंगे। यह व्रत ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष में एकम् से आषाढ़ कृष्णा एकम् से सोलह दिन करना है।

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सम्पादकीय


‘‘दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम’’ के उद्घाटन अवसर पर प्रस्तुत

Professional की सही परिभाषा मेरी दृष्टि में
-आर्यिका चन्दनामती

    जैसे सरोवर की शोभा कमल से होती है, पक्षी की शोभा उसके पंखों से है, भोजन की शोभा नमक से होती है, नारी की शोभा शील से होती है, सुन्दर गीत सुरीले कंठ से सुशोभित और आकर्षक बन जाता है, सर्वोदयी विश्वधर्म भी अहिंसा के पालन से ही शोभायमान एवं विश्ववंद्य होता है, भारत की शोभा आध्यात्मिक संतों से वृद्धिंगत होती है उसी प्रकार हमारे धर्मप्राण भारतीय समाज की शोभा विशिष्ट बुद्धिजीवियों से है।

    आप सभी दिगम्बर जैन समाज के विशेष बुद्धिजीवी व्यक्तित्व के रूप में पधारे हैं। आज की यह Conference मुम्बई DJPF अर्थात् Digambar Jain Professional Forum दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम के द्वारा organized है। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से निर्मित इस फोरम के सभी Executive Members विशेष आशीर्वाद एवं बधाई के पात्र हैं। उन्हें इस फोरम के द्वारा आगे निरन्तर सामाजिक संगठन-एकता एवं जैनधर्म के संरक्षण आदि के कार्य करते हुए अपनी युवा शक्ति का सृजनात्मक (Constructive) परिचय देना है।
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रसोई घर की शुद्धि में महिलाओं की भूमिका


रसोई घर की शुद्धि में महिलाओं की भूमिका

जैन धर्म में भगवान् महावीर ने २ प्रकार के मार्ग बतलाये हैं मुनि मार्ग और गृहस्थ मार्ग । ये दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं अर्थात् दोनों के सम्मिलन से ही मोक्ष का मार्ग साकार हो सकता है । जहाँ पूर्ण महाव्रत रूप मुनिधर्म साक्षात् मोक्ष का दिग्दर्शन कराता है वहीं बारह व्रत या पाँच अणुव्रत रूप एक देश त्याग रूप श्रावक धर्म भी परम्परा से मोक्ष की सिद्धि कराने वाला है । अनादि काल से दोनो ही धर्म चले आ रहे हैं । यदि गृहस्थ न हो तो मुनिचर्या का पालन नहीं हो सकता तथा यदि मुनि न होते तो मिथ्यात्व अंधकार में डूबे हूये संसारी प्राणियों को सम्यक्त्व की साधना करने का अवसर न प्राप्त होता। संसार के दु:खो से भयभीत हुआ प्राणी जब शाँति की खोज में महामुनियों की शरण में आता है तो सबसे पहले वे उसे मुनि धर्म का उपदेश देते हैं । जैसा कि पुरुषार्थ सिद्धयुपाय में आचार्य अमृतचन्द्र सूरि ने कहा है—

यो यतिधर्ममकथयन्नुपदिशति गृहस्थधर्ममल्पमति।

तस्य भगवत्प्रवचने प्रदर्शितं निग्रहस्थानम्।।

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धार्मिक पहेली


वीडियो-4

धार्मिक पहेली

१. मंत्रों में जो महामंत्र है, सुख पाने का एक यंत्र है।
उसी मंत्र का नाम बताओ, शुद्ध बोलकर हमें सुनाओ।।

उत्तर — णमोकार महामंत्र । जो इस प्रकार है णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं

२. अर्हत् सिद्धाचार्य उपाध्याय, साधु जी को हम नित ध्याँय।
सहीं मूलगुण सबके बोलो, कर्म काट मुक्ती पट खोलो।।

उत्तर— अरिहंत परमेष्ठी ४६ सिद्ध परमेष्ठी ८ आचार्य परमेष्ठी ३६ उपाध्याय परमेष्ठी २५ साधु परमेष्ठी २८

३. रामचन्द्र की जीवन गाथा, पढ़े सुने जो शिव सुख पाता ।
पद्म पुराण ग्रन्थ पथदाता, किसने रचा बताओ भ्राता।।

उत्तर— श्री रविषेण आचार्य

४. उमास्वामी मुनिवर की रचना, दशाध्याय पढ़ पाप से बचना।
कुल सूत्रों की गणना गाओ, तथा ग्रन्थ नाम बताअो ।।

उत्तर— ग्रन्थ का नाम तत्वार्थसूत्र कुल सूत्र ३५७

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नवरात्रि व्रत


डिप्लोमा इन जैनोलोजी


डिप्लोमा इन जैनोलोजी

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आज का प्रवचन ...16 सितम्बर


प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के प्रथम प्रमुख शिष्य आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज की ६०वीं पुण्यतिथि मनाएँ

पूज्य चंदनामती माताजी ने सर्वप्रथम प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज एवं उनके प्रमुख प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी महाराज के पावन चरणों में विनम्र भक्तिभाव समर्पित करते हुए एवं ज्ञानमती माताजी के सान्निध्य में वीरसागर महाराज की ६०वीं पुण्यतिथि (आश्विन कृ. अमावस्या)-२० सितम्बर को मुम्बई-भाण्डुप के जैनम हॉल के अंदर सभी देशवासियों को मनाने की प्रेरणा प्रदान करते हुए उनके चारित्र पर प्रकाश डाला|

-आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज का जन्म औरंगाबाद जिले के अन्तर्गत वीरग्राम नामक गांव में है। वहां के श्रेष्ठी रामसुख जी गंगवाल उनकी पत्नी भरगुबाई, इनके पुत्र हीरालाल नाम से प्रसिद्ध हुए।

इनका जन्म आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा, ईसवी सन् १८७६ में हुआ। जिस आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को लोग गुरुपूर्णिमा भी कहते हैं।

पूज्य चंदनामती माताजी की एवं सभी की गुरुमाता पूज्य आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी, जिन्होंने वीरसागर जी महाराज से आर्यिका दीक्षा ग्रहण करी थी। वे ज्ञानमती माताजी आचार्य वीरसागर जी के गुणों के बारे में बतलाया करती हैं, कि आचार्यश्री में अगणित गुण थे, धीर-वीर परम गंभीर थे। वे कहा करते थे कि जिसने मनुष्य भव पाकर के सम्मेदशिखर की वंदना नहीं की, श्रवणबेलगोला में स्थित बाहुबली की मनोज मूर्ति के दर्शन नहीं किये और गुरुओं में आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के दर्शन नहीं किए, उसने अपना मनुष्य जीवन व्यर्थ ही गंवा दिया। अपने दीक्षा दिवस को कभी मत भूलो, अर्थात् दीक्षा के समय

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वैराग्य के अंकुर


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ज्ञानमती माताजी की बाल्यावस्था का नाम मैना था| सात-आठ वर्ष की उम्र से ही उन्होंने अपनें जीवन में किस तरह से वैराग्य के अंकुर स्फुटित किये थे| आइये पढतें हैं-उनके बाल्यकाल की रोमाँचकारी कहानी|

वैराग्य के अंकुर

जब सात-आठ वर्ष की मेरी अवस्था होगी, घर के बाहर प्रांगण में सभी लड़कियाँ सायंकाल में खेलने आ जातीं। उस समय मैं भी बाहर खेलने के लिए जाना चाहती। माँ से आज्ञा माँगती, तब वे कहतीं-‘‘खेल-कूद कर क्या करना? देखो! यह काम कर लो, यह कर लो, जल्दी निपटकर अभी मन्दिर चलूँगी, वहाँ आरती करूँगी और शास्त्र सुनूँगी।’’ मैं कभी-कभी मन मारकर रह जाती और कभी खुश भी हो जाती। सायंकाल खेल में न जाकर थोड़ी देर बाद माँ के साथ मन्दिर जाती , आरती करती पुनः शास्त्र सुनने बैठ जाती। उस समय मंदिर में कोई पण्डित शास्त्र बाँचते थे या कभी गाँव के ही कोई बड़े पुरुष बाँचते थे।

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श्री ज्ञानमती माताजी


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तर्ज-सावन का महीना....

गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी एवं आर्यिका श्री चंदनामती माताजी का संवाद

चन्दनामती माताजी

तू पूनो का चन्दा, और मैं मावस की रात

बोलो माता मेरा तेरा, हो गया कैसे साथ।।१।।


श्री ज्ञानमती माताजी
मैंने तुझे चखाया, ज्ञानामृत का जो स्वाद।
इसीलिए तो मेरी तेरी, जल्दी बन गई बात।।२।।



चन्दनामती माताजी
जीवन के इन स्वर्ण क्षणों को, नहिं सोचा था बचपन में।
देखा पहली बार तुझे जब, विस्मय होता था मन में।।
मैं क्या जानूँ तेरी, पदवी है जग में ख्यात।

बोलो माता मेरा तेरा, हो गया कैसे साथ।।३।।

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आचार्यश्री वीरसागर महाराज


आचार्यश्री वीरसागर महाराज के दीक्षागुरु एवं इस शताब्दी के प्रथम आचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शान्तिसागर जी महाराज

भारत वसुन्धरा का नयनाभिराम का दर्शन मैसूर राज्य विविध काननों, सरिताओं, पर्वतमालाओं और अट्टालिकाओं से रमणीय है। इसका हृदय बेलगांव मण्डलान्तर्गत भोजग्राम है। दूधगंगा और सुवेदगंगा के निर्मल नीर से संतृप्त भोजग्राम के निवासियों के हृदयाकर्षक मनोज्ञ प्रशान्तचित्त नीतिज्ञ क्षत्रियवंशज पुण्यपुरुष श्री भीमगौंडा की सहर्धिमणी सत्यवती की कुक्षि से आषाढ़ कृष्णा ६ (बुधवार) विक्रम संवत् १९२९ की अर्धरात्रि में तेजस्वी अपूर्व कान्तिमान् सातिशय पुण्यशाली बालक के जन्म लिया।

भीमगौंडा के समस्त परिजन पुरजन प्रथम पुत्र सुदेवगोंडा की बाल—लीलाओं से प्रसन्न थे। प्रसन्नता की बेला में ही द्वितीय पुत्र प्राप्ति से प्रसन्नता की बाढ़ आ गयी। इस दिवस के अनन्तर नामकरण संस्कार में सातगौंडा नाम रखा गया। सातगौंडा बालक ने दूज के चन्द्र की भाँति सबकी अपनी ओर आर्किषत किया। शनै:—शनै: वृद्धि को प्राप्त करते हुए विविध गुणों से स्वयं को अलंकृत कर लिया था। मधुर और मितभाषी सातगौंडा की प्रकृति

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रात्रि भोजन : एक वैज्ञानिक दृष्टि


रात्रि भोजन : एक वैज्ञानिक दृष्टि

सूर्य, प्रकृति और भोजन

अहिंसा का प्रतिरूप है क्षमा

सूर्य प्रकाश में अल्ट्रावायलेट किरणें एवं इन्प्ररेड अदृश्य किरणें होती हैं जो वातावरण को सूक्ष्म जीवाणु रहित बनाती हैं।

दिन में ऑक्सीजन की उपलब्धता (अवशोषण) अधिक होता है।

सूर्य प्रकाश में विटामिन ‘डी’ का निर्माण होता है।
सूर्य प्रकाश में भोजन के चायपचय प्रक्रिया में वृद्धि होती है।
दिवा भोजन से खनिज पदार्थों के संश्लेषण में वृद्धि होती है।
सूर्य प्रकाश में रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है।

विज्ञान कितनी भी तरक्की क्यों न कर ले परन्तु वह प्रकृति के नियम और वस्तु के स्वभाव को नहीं बदल सकता। वह रात को दिन और दिन को रात में परिर्वितत नहीं कर सकता। रात्रि में कितना भी प्रकाश कर लो, परन्तु रात्रि का वातावरण तो रात्रि जैसा ही रहेगा। जैसे रात्रि में कुमुदिनी खिलेगी, कमल बंद होंगे, कीड़े—मकोड़े, कृत्रिम प्रकाश में आएंगे ही, प्रकृति में कार्बन डाइआक्साइड (सी. ओ.टू.) गैस की वृद्धि होगी ही और सूर्य में जो ऊर्जा प्रदान करने, आक्सीजन में वृद्धि करने, भोजन आदि पचाने की शक्ति और अन्य गुण धर्म पैदा करने वाले तत्व हैं वे सूर्य से ही मिलेंगे, चाँद तारों से नहीं। और पढ़े

गणिनी ज्ञानमती बारहमासा


गणिनी ज्ञानमती बारहमासा का पाठ आश्विन कृष्णा एकम से लेकर आश्विन शुक्ला पूर्णिमा तक पूज्य चंद्नामती ने पढनें की प्रेरणा दी|आश्विन मास के शरद पूर्णिमा सन 1934 में ज्ञानमती माताजी का जन्म हुवा|इसलिए यह महीना बहुत ही पवित्र समझना चाहिए|इसमें शारदा पक्ष में सरस्वती की आराधना करके अपनें ज्ञान की वृद्धि करतें हैं|पूज्य माताजी तो साक्षात् सरस्वती की प्रतिमूर्ति है| जिन्हीने अपने 65 वर्ष के दीक्षित जीवन में तपस्या की है,उन्होंने 12 महीनों को अपनें ज्ञान और चारित्र की तपस्या से किस प्रकार व्यतीत किया है| गणिनी ज्ञानमती बारहमासा का पाठ करके हम सभी अपनें जीवन को ज्ञान और चारित्र से सुरभित करें|

तर्ज-मुक्तिपथ का पथिक...


बारहमासा सुनो ज्ञानमती मात का,
जिनने निज में समाया सभी मास को।
सारा संसार विषयों का स्वादी बना,
तब ये तज कर चलीं सब विषय आश को।।१।।

चैत्र महिना बसन्ती गुलाबी ऋतू,
जिसको नर नारी कहते हैं अपना हितू।

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आज का दिन - २२ सितम्बर २०१७ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक 22 सितम्बर,2017
तिथी- आश्विन शुक्ल 2
दिन-शुक्रवार
वीर निर्वाण संवत- 2543
विक्रम संवत- 2073

सूर्योदय 06.13
सूर्यास्त 18.16

रवि योग 24.37 से

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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


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