ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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विश्व की सबसे बड़ी जैन प्रतिमा - भगवान ऋषभदेव
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मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र में फरवरी २०१६ में सम्पन्न हुआ विश्व का सबसे बड़ा जैन महोत्सव

यह महोत्सव बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी का ही नहीं अपितु इस पंचम काल का एक अद्वितीय महोत्सव था, जिसने देश और विदेश की जैन समाज के साथ ही भारत के सम्पूर्ण शासन-प्रशासन को भी अपनी सुगंधि से महकाया है | आज केंद्र-शासन और महाराष्ट्र-शासन में ऋषभगिरि-मांगीतुंगी के 108 फुट भगवान ऋषभदेव की प्रभावना से जैनधर्म की अनादि निधन तीर्थंकर परम्परा का शंखनाद जन-जन तक पहुंचा है | विशेष रूप से अखण्ड पाषाण से निर्मित इस प्रतिमा को जब लंदन के गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल किया गया, तब तो जैनधर्म के इस महात्म्य को सारे देश के विभिन्न नेशनल टी.वी. चैनल्स यथा “आज तक, न्यूज नेशन, जी न्यूज, ए.बी.पी. माजा, डी.डी न्यूज, डी.डी. सहयाद्री चैनल” आदि ने विशेष कवरेज के साथ 108 फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा का समाचार जन-जन में प्रसारित किया | इसके साथ ही देश भर के प्रिंट मीडिया का अर्थात विभिन्न अखबारों के मुख्य पृष्ठों एवम अंतरंग पृष्ठों में भी भगवान ऋषभदेव की गूंज मचने से देश की जैन और जैनेतर जनता को भगवान ऋषभदेव और उनके अहिंसामयी सिद्धांतों का परिचय प्राप्त हुआ है | ..पूरा पढ़े
सप्तम पट्टाचार्य     सम्प्रेरिका    मार्गदर्शन     कुशल नेतृत्व

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आचार्य श्री वीरसागर काव्य कथानक

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ज्ञानामृत


‘‘ज्ञानामृत’’

बीसवीं सदी के प्रथम पट्टाचार्य प्रशान्तमूर्ति आचार्य श्री वीरसागर महाराज

इस भारत वसुन्धरा पर समय-समय पर अनेकों रत्नों ने जन्म लेकर इस धरा को अलंकृत किया है। उनमें से एक श्रेष्ठरत्न आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज हो चुके हैं, जिनसे मैंने आर्यिका दीक्षा को प्राप्त कर महाव्रत से अपने जीवन को पवित्र बनाया है। हैदराबाद राज्य के अन्तर्गत एक औरंगाबाद शहर है, जहाँ पर जैनधर्म के प्रेमी श्रावकगण हमेशा धर्म कार्यों में सक्रिय भाग लिया करते हैं। उसी जिले के अन्तर्गत एक ‘ईर’ नाम का ग्राम है जो छोटा सा ग्राम होते हुए भी ‘‘वीरसागर आचार्य’’ जैसी महान आत्मा को जन्म देने के निमित्त से स्वयं भी महान बन गया है। इस पवित्र सुन्दर ग्राम में श्रावक शिरोमणि सेठ ‘रामसुख’ जी निवास करते थे जो कि ‘खंडेलवाल’ जाति के भूषण गंगवाल गोत्रीय थे। उनकी धर्मपत्नी ‘भागू बाई’ भी पति के अनुरूप धर्मात्मा और सती पतिव्रता थीं। उभय दम्पत्ति सदैव धर्माराधन में अपना काल व्यतीत करते थे। महिलारत्न भागूबाई ने सबसे प्रथम एक पुत्ररत्न को जन्म दिया, वह गुलाब के सुन्दर पुष्प सदृश अपनी यशसुरभि को पैâलाने वाला था इसलिए माता-पिता ने उसका नाम ‘गुलाबचंद’ रख दिया। कुछ दिन बाद माता भागूबाई ने सौभाग्य से स्वप्न में एक उत्तम बैल देखा उस समय उनके उदर में होनहार पुण्यशाली सूरिवर्य वीरसागर का जीव आ गया था।

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साधना


तीनलोक का ध्यान -

ध्यान का लक्षण है चित्त का एकाग्र होना, प्रसन्नमना भव्यात्मा ध्याता-ध्यान करने वाला है। तीर्थंकर भगवान ध्येय-ध्यान करने योग्य-ध्यान के विषय हैं और अतीन्द्रिय सुख-मोक्षसुख प्राप्त होना यह ध्यान का फल है।

इस प्रकार ध्यान, ध्याता, ध्येय और ध्यान का फल इन चारों विषय को समझना चाहिए।

विशेषार्थ-यहाँ ध्येय में तीर्थंकर भगवान को लिया है। इसमें उनसे संबंधित उनकी प्रतिमाएं, जिनमंदिर, पंचपरमेष्ठी आदि तथा ॐ, ह्रीं, अर्हं आदि बीजाक्षर सभी आ जाते हैं। यहाँ तीनलोक का ध्यान विवक्षित है उसमें सभी पूज्य-तीनलोक के नवदेवता आदि आ जायेंगे।

तीनलोक का आकार बनाकर अर्थात् खड़े होकर दोनों पैर फैलाकर कमर पर हाथ रखकर खड़े आकार में तीनलोक का आकार बना लेवें। पुन: चिंतन करना प्रारंभ करें- ...पूरा पढ़ें

वास्तु


स्वस्थ भवन स्वस्थ जीवन

भवन के निर्माण के समय भी यही सिद्धांत लागू होता है। वास्तु शास्त्र के नियमों से बना हुआ मकान घर में सुख—समृद्धि प्रदान करता है।इसके विपरीत जाने से नाना प्रकार की विघ्न बाधाएँ एवं रोगों का आगमन होता रहता है। भवन को शास्त्रों में जीवित माना गया है। जिस प्रकार मानव श्वांस लेता है उसी तरह भवन भी श्वांस लेता है। भवन की रचना में मस्तिष्क, हाथ,पैर, नाभि सभी मार्मिक अंग बनाये जाते हैं। निर्माण करते समय मार्मिक अंगों पर प्रहार हो जाता है तो वे अंग रोग ग्रसत हो जाता है। निर्माण के समय अशुद्ध सामग्रियाँ, गलत भूमि का चयन, अगल—बगल की जमीन अच्छी न होना, निर्माण कार्य में त्रुटि होना, अंग—भंग होना, श्रापित जगह होना इत्यादि का अति महत्व माना गया है। सुजान पुरुषों को इन सबका ध्यान रखते हुए नव निर्माण करना चाहिए। प्राकृतिक सामग्रियों को व्यवहार में लाना चाहिए प्राकृतिक सामग्रियाँ ऊर्जा का स्रोत होती हैं। कृत्रिम सामग्रियों से निर्माण न हो इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।

निर्माण करते समय अज्ञानता वश अच्छे और बुरे दोनों नियमों को हम पालन कर लेते हैं । जिनके फल हमें मिश्रित मिलते हैं। जीव का स्वस्थ रहना एक स्वभाविक स्थिति है। अनेक कारणवश रोग उत्पन्न हो जाते हैं। यह रोग शनै:—शनै: बढ़ते हुए एक जटिल राज रोग धारण कर लेता है। इनको बुलाने में कहीं आपका भवन तो सहायक नहीं। यह मार्मिक विश्लेषण जरूर करना चाहिए। उत्तर और पूर्व दिशा प्राणी के सकारात्मक ऊर्जा एंव आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने का स्रोत है।

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सम्पादकीय


आचार्य श्री वीरसागर महाराज की पुण्य तिथि मनायेंं

आश्विन क्रष्णा अमावस-30 सितम्बर 2016


चारित्रचक्रवर्ती प्रथमाचार्य शांतिसागर महाराज की परम्परा के प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर महाराज की 59 पुण्य तिथि के सन्दर्भ में प्रस्तुत .....

आचार्य श्री वीरसागर काव्य चरित

तर्ज-जिन्दगी एक सफर है........

गुरुपद से है प्रीति लगाना ।

गुरुभक्ति के गीत है गाना ।।

सुन भाई, सुन भाई, सुन भाई...।।टेक.।।

शान्तिसिन्धु आचार्य प्रवर।

उनके पट्टाचार्य प्रवर।।

वीरसागर जी का वर्ष सुहाना ।

गुरुभक्ति के गीत है गाना ।।

सुन भाई, सुन भाई, सुन भाई...।।१।।

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गणिनी ज्ञानमती बारहमासा


गणिनी ज्ञानमती बारहमासा

आश्विन कृष्णा एकम् से आश्विन शुक्ला पूर्णिमा तक गणिनी ज्ञानमती बारहमासा का पाठ करे

'''गणिनी ज्ञानमती माताजी के जन्मजयन्ती के सन्दर्भ में'''...

तर्ज-मुक्तिपथ का पथिक...

बारहमासा सुनो ज्ञानमती मात का,

जिनने निज में समाया सभी मास को।

सारा संसार विषयों का स्वादी बना,

तब ये तज कर चलीं सब विषय आश को।।१।।

चैत्र महिना बसन्ती गुलाबी ऋतू,

जिसको नर नारी कहते हैं अपना हितू।

कृष्ण एकम को तुम क्षुल्लिका बन गर्इं,

षोडशी सोलहकारण व्रती बन गर्इं।

चैत्र का मास सचमुच सफल हो गया,

क्योंकि तुममें समा ही गया मास वो।।१।।

बारहमासा........

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नवरात्रि व्रत


व्रतविधि—नवरात्रि व्रत आश्विन शु. एकम से आश्विन शुक्ला नवमी तक किया जाता है। प्रात: स्नानादि कर शुद्ध वस्त्र पहनकर शुद्ध द्रव्य लेकर जिनालय में जाएँ, वहाँ जिनालय की तीन प्रदक्षिणा देकर ईर्यापथ शुद्धिपूर्वक आदिनाथ भगवान की प्रतिमा का पंचामृताभिषेक करें, अष्टद्रव्य से पूजन करें पुन: श्रुत और गणधर की पूजा कर चव्रेâश्वरी यक्षी व गोमुखयक्ष की अर्चना करें।

‘‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं आदिनाथ तीर्थंकराय गोमुखयक्ष-चक्रेश्वरीयक्षी सहिताय नम: स्वाहा।।’’ इस मंत्र की १०८ पुष्पों से जाप्य करें। श्री जिनसहस्रनाम स्तोत्र पढ़कर णमोकार मंत्र की भी जाप्य करना चाहिए, साथ ही आदिनाथ चरित्र और कथा भी पढ़ना चाहिए। यथाशक्ति उपवास आदि करें। व्रत की उत्तम विधि उपवास, मध्यम अल्पाहार व जघन्य एकाशना है। इस प्रकार नौ दिन पूजा करके दसवें दिन विसर्जन करें तथा दस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें। रात्रि जागरण करते हुए समय को व्यतीत करें। पुन: सत्पात्र को आहार दानादि देकर पारणा करें। ९ वर्ष तक इस व्रत को करने के पश्चात् यथाशक्ति उद्यापन करें। उद्यापन में आदिनाथ भगवान की यक्ष-यक्षी सहित प्रतिमा बनवाकर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा करें, चतुर्विध संघ को चार प्रकार का दान देवें, नूतन जिनमंदिर बनवावें, पुराण-ग्रंथों का जीर्णोद्धार करावें और गरीबों को भोजनादि अभयदान देवें। इस प्रकार यह व्रत की विधि है।

कथा—भरतक्षेत्र के अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी दोनों काल सर्वदा प्रचलित हैं। अवसर्पिणी काल में सुषमा-सुषमा, सुषमा, सुषमा-दुषमा, दुषमा-सुषमा, दुषमा और दुषमा-दुषमा ऐसे छ: भेद हैं और उत्सर्पिणी के इनसे उल्टे भेद हैं। अनेकों अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी के बीत जाने पर एक कल्पकाल आता है। भरतक्षेत्र में अवसर्पिणी काल में प्रथम तीन काल में भोगभूमि होती है जिसमें प्राणी के शरीर की कांति, शक्ति आदि कालानुसार क्रम से ह्रास को प्राप्त होते हैं, तीसरे काल में १४ मनु होते हैं, जो प्राणियों को जीवनोपयोगी मार्ग दिखाते हैं इन्हें कुलकर भी कहते हैं, चौथे काल के प्रारंभ में चौदहवें कुलकर होते हैं तब कर्मभूमि प्रारंभ होती है। तब इंद्र की आज्ञा से कुबेर ग्राम, नगर, पुर, पट्टण आदि की रचना करता है और अयोध्या नामक सुन्दर नगर की रचना करता है। उसमें चौदहवें कुलकर महाराजा नाभिराय अपनी महारानी मरुदेवी के साथ सुखपूर्वक काल व्यतीत करते थे।

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कुछ खास


चातुर्मास में क्या करें हम और आप

एक बार फिर चातुर्मास का काल हम सबके बीच है। हमारे पूज्य संतों और साध्वियों की पूरे भारतवर्ष में जगह—जगह भव्य तरीके से चातुर्मास की स्थापना हो चुकी है। चातुर्मास का समय आत्मसाधना व धर्माराधना का काल होता है । अहिंसा धर्म के पालन के लिए हमारे पूज्य संत वर्षाकाल के चार माह में एक स्थान पर रहकर आत्मसाधना और धर्म प्रभावना करते हैं। यह समय साधु और श्रावक दोनों के लिए महत्वपूर्ण होता है। साधुओं का योग मिलने से जैन समाज की लोक प्रभावना में वृद्धि होती है। उनके उपदेश व प्रेरणा से सामाजिक एकता का विकास होता है। स्कूल, अस्पताल, धर्मशाला आदि के निर्माण के द्वार खुलते हैं। चातुर्मास के दौरान जो धर्म की प्रभावना होती है। वह अपने आप में देखने योग्य होती है। साधु के समागम से मानों उस स्थान पर एक नयी स्फूर्ति और जागरूकता देखने को मिलती है। अनेक ऐसे आयोजन इस दौरान परवान चढ़ते हैं जो वाकई प्रशंसनीय होते हैं, लेकिन हमारे पूज्य संतों व श्रावकों को यह भी साथ में ध्यान रखना होगा कि कहीं भी चातुर्मास मात्र प्रदर्शन की भेंट न चढ़ जाये। प्रभावना के चक्कर में साधना कहीं खो न जाए। पिछले चातुर्मास की संख्या को संख्यात्मक वृद्धि करने वाला न साबित हो। नये जोश और जज्बे के साथ एक ऐसी उपलब्धि लेकर यह चातुर्मास जाये कि समाज के लिये सर्दियों तक यादगार बना रहे और साधु की साधना में भी ऐसी वृद्धि हो कि वह अपने रत्नत्रय का पालन कुछ इस तरह करें कि वे अपने मोक्ष मार्ग को जल्द प्राप्त कर सके। ...और पढ़ें

कौरव-पाण्डव


कौरव-पाण्डव

कुरुवंश परम्परा— कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर में परम्परागत कुरुवंशियों का राज्य चला आ रहा था। उन्हीं में शान्तनु नाम के राजा हुए। उनकी ‘‘सबकी’’ नाम की रानी से पाराशर नाम का पुत्र हुआ। रत्नपुर नगर के ‘‘जन्हु’’ नामक विद्याधर राजा की ‘‘गंगा’’ नाम की कन्या थी। विद्याधर राजा ने पाराशर के साथ गंगा का विवाह कर दिया। इन दोनों के गांगेय—भीष्माचार्य नाम का पुत्र हुआ। जब गांगेय तरुण हुआ तब पाराशर राजा ने उसे युवराज पद दे दिया।

किसी समय राजा पाराशर ने यमुना नदी के किनारे क्रीड़ा करते समय नाव में बैठी सुन्दर कन्या देखी और उस पर आसक्त होकर धीवर से उसकी याचना की किन्तु उस धीवर ने कहा कि आपके पुत्र गांगेय को राज्य पद मिलेगा तब मेरी कन्या का पुत्र उसके आश्रित रहेगा अत: मैं कन्या को नहीं दूँगा। राजा वापस घर आकर चितित रहने लगे। किसी तरह गांगेय को पिता की चिंता का पता चला। तब वे धीवर के पास जाकर बोले कि तुम अपनी कन्या को मेरे पिता को ब्याह दो, मैं वचन देता हूँ कि आपकी पुत्री का पुत्र ही राज्य करेगा फिर भी धीवर ने कहा कि आपके पुत्र, पौत्र कब चैन लेने देंगे तब गांगेय ने उसी समय आजन्म ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया और धीवर को सन्तुष्ट कर दिया।

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माताजी की काव्य वार्ता


गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी एवं आर्यिका श्री चंदनामती माताजी की काव्य वार्ता

चन्दनामती

तू पूनो का चन्दा, और मैं मावस की रात।

बोलो माता मेरा तेरा, हो गया कैसे साथ।।१।।

श्री ज्ञानमती माताजी

मैंने तुझे चखाया, ज्ञानामृत का जो स्वाद।

इसीलिए तो मेरी तेरी, जल्दी बन गई बात।।२।।

चन्दनामती

जीवन के इन स्वर्ण क्षणों को, नहिं सोचा था बचपन में।

देखा पहली बार तुझे जब, विस्मय होता था मन में।।

मैं क्या जानूँ तेरी, पदवी है जग में ख्यात।

बोलो माता मेरा तेरा, हो गया कैसे साथ।।३।

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मांगीतुंगी तीर्थ में


ज्ञानमती माता आई मांगीतुंगी तीर्थ में

 
ज्ञानमती माता आई मांगीतुंगी तीर्थ में |

मानो माँ ब्राम्ही पिता के समीप में ||टेक.||

सन् उन्निस सौ छियानवे में ,मांगीतुंगी आई मात ये |

ऋषभदेव की मूर्ति प्रेरणा , दी माता ने जगी चेतना ||

उन्ही जिनवर के निकट आई मात तीर्थ पे |

मानो माँ ब्राम्ही आई पिता के समीप में ||ज्ञानमती.||1||

प्रतिमा बन अब पूर्ण हुई है , दुनिया में प्रभु जय गुंज रही है |

पहला महोत्सव उनका आया , स्वर्ग के सद्रश आनंद आया छाया | ।

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कार्टून वीडियो


आज का दिन - २८ सितम्बर २०१६ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक २८ सितम्बर,२०१५
तिथी- आश्विन कृष्ण एकम
दिन-सोमवार
वीर निर्वाण संवत- २५४१
विक्रम संवत- २०७२

सूर्योदय ०५.२०
सूर्यास्त १९.१२

सोलहकारण व्रत समाप्त


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