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ॐ ह्रीं केवलज्ञान कल्याणक प्राप्ताय श्री ऋषभदेव जिनेन्द्राय नमः |

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रिषभ देव के समवसरण की भजन
भगवान बाहुबली

भगवान बाहुबली

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भरत चक्रवर्ती छ: खण्ड की दिग्विजय करके आ रहे थे। उनका चक्ररत्न अयोध्या के बाहर ही रुक गया। मंत्रियों ने बताया कि महाराज आपके भाई आपके वश में नहीं हैं। चक्रवर्ती ने दूत को अपने अट्ठानवे भाइयों के पास भेज दिया। उन लोगों ने भगवान ऋषभदेव के पास जाकर मुनि दीक्षा ले ली। पुन: भरत ने एक दूत बाहुबली के पास भेजा। बाहुबली भी चक्रवर्ती के अधीन नहीं हुए। तब दोनों तरफ से युद्ध की तैयारियाँ हो गर्इं।
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चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत
चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत
-गणिनी ज्ञानमती

व्रत विधि-अनादिकाल से सभी संसारी प्राणी चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते आ रहे हैंं। उन चौरासी लाख योनि के भ्रमण से छूटने के लिए यह ‘‘चौरासी लाख योनिभ्रमण निवारण व्रत’’ है। इसके करने से व प्रतिदिन इन योनियों के भ्रमण से छूटने की भावना करते रहने से अवश्य ही हम और आप इन संसार परिभ्रमण के दु:खों से छुटकारा प्राप्त करेंगे।

इन चौरासी लाख योनियों का विवरण इस प्रकार है-१. नित्य निगोद, २. इतरनिगोद, ३. पृथ्वीकायिक, ४. जलकायिक, ५. अग्निकायिक व ६. वायुकायिक इन एकेन्द्रिय जीवों के प्रत्येक की सात-सात लाख योनियां मानी गयी हैं। अत: ६²७·४२ लाख योनियाँ हुई हैं। पुन: वनस्पतिकायिक की दश लाख योनियाँ हैं। पुन: विकलत्रय अर्थात् दो इंन्द्रिय, तीन इन्द्रिय व चार इन्द्रिय जीवों की प्रत्येक की दो-दो लाख योनियाँ हैं। अत: ३²२·६ लाख भेद हुए। पुन: देव, नारकी व पंचेन्द्रिय तिर्यंचों की चार-चार लाख योनियाँ हैं। ये ३²४·१२ लाख हुए। पुन: मनुष्यों की चौदह लाख योनियाँ हैं। इस प्रकार (४२०००००±१००००००±६०००००±१२०००००± १४०००००·८४०००००) योनियों के भेद हैं। इनके संक्षेप मेें १४ प्रकार से विभाजित चौदह मंत्र दिये गये हैं। उत्कृष्ट विधि यह है कि नित्यनिगोद के सात लाख योनियों का एकमंत्र है। इसके सात व्रत करना, ऐसे ही इतर निगोद के सात, पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुकायिक के भी ७-७ व्रत करने से ४२ व्रत हो जाते हैं। ऐसे ही वनस्पतिकायिक के १० व्रत करने से १० हुए। ऐसे ही दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय व चार इन्द्रिय के २-२ व्रत करने से ६ व्रत होते हैं। पुन: देव, नारकी व पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के ४-४ व्रत करने से १२ हुए एवं मनुष्यों की चौदह लाख के १-१ व्रत से १४ व्रत हुए। इस प्रकार ४२±१०±६±१२±१४·८४ व्रत हो जाते हैं। इनमें नित्य निगोद के ७ व्रत, इतर निगोद के ७ व्रत, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु के ७-७ व्रत ऐसे ४२ व्रत होंगे। इनमें सात-सात व्रतों में वहीं मंत्र ७-७ बार लिया जायेगा। ऐसे वनस्पतिकायिक के १० व्रतों में वनस्पतिकायिक का ही मंत्र दश व्रतों में होगा। ऐसे ही सभी में समझना। ऐसे ८४ व्रत हो जाते हैं।

जघन्यविधि में इन चौदह मंत्रों के चौदह व्रत भी कर सकते हैं। अपनी शक्ति के अनुसार व्रत में उत्कृष्ट विधि में उपवास करना है। मध्यम विधि में अल्पाहार, जल, रस, दूध, फल आदि लेकर करना चाहिए तथा जघन्य विधि में दिन में एक बार शुद्ध भोजन करके अर्थात् ‘एकाशन’ करके भी व्रत किया जा सकता है। व्रत के दिनों में अर्हंत भगवान की अथवा चौबीसी तीर्थंकरों की प्रतिमा का या किन्हीं एक भी तीर्थंकर भगवान की प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक करें। पुन: चौबीस तीर्थंकर पूजा या अर्हंत पूजा करके जाप्य करें। मंत्र की १०८ जाप्य में सुगंधित पुष्प या लवंग या पीले पुष्पों से अथवा जपमाला से भी मंत्र जप सकते हैं। व्रत के दिन पूजा व मंत्र जाप्य आवश्यक है। इस व्रत के करने से क्रम-क्रम से संसार के भी उत्तम-उत्तम सुख प्राप्त होंगे पुन: चतुर्गति के दु:खों से छुटकारा प्राप्त कर नियम से २-४ आदि भवों में अपनी आत्मा को परमात्मा बनाकर सिद्धशिला को प्राप्त करना है। समुच्चय मंत्र- ॐ ह्रीं चतुरशीतिलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:। (इन छह मंत्रों में से १-१ मंत्र सात-सात व्रतों में जपना है)

१. ॐ ह्रीं नित्यनिगोदजीवानां सप्तलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:।

२. ॐ ह्रीं इतरनिगोदजीवानां सप्तलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:।


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न्यायसार
तत्त्व समीक्षा: तत्त्व विचार

चार्बाक पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु इन चार भूतों को ही चार तत्त्व मानता है इन भूत चतुष्टय से ही आत्मा इन्द्रिय ज्ञान और मन आदि की उत्पत्ति मानता है इसलिए जड़वादी है।

बौद्ध कहता है कि आकाश, चित्त संतान की उत्पत्ति तथा चित्तसंतान की उच्छित्ति ये तीन तत्त्व असंस्कृत तथा नित्य है। बाकी सब तत्व संस्कृत, क्षणिक, कर्ता से रहित हैं। (विश्व तत्त्व.पृ. २८५)

एवं इनके यहां रूप, वेदना, विज्ञान, संज्ञा और संस्कार ये पांच स्कंध माने गये हैं, इन पांच स्कंधों से ही सब कार्य होते हैं। और तो क्या इनके समूह से ही इन्होंने आत्मा की उत्पत्ति मानी है। जब तक इनकी समष्टि रहती है तभी तक मनुष्य का अस्तित्व रहता है। इस संघात के अतिरिक्त आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है। (भारतीयद. पृ.९०)


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सेमिनार

सेमिनार की परिभाषा मेरी दृष्टि में

मुम्बई में २३ से २५ जुलाई २०१७ तक आयोजित

National Seminar On Jain Dharma
में आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने
सेमिनार-SEMINAR
का हिन्दी-अंग्रेजी में विवरण निम्न प्रकार से

बताकर विद्वानों को आनंद विभोर कर दिया-
आर्यिका श्री चंदनामती माताजी
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से - सेवा धर्म समाज की, आगम के अनुकूल।

यही प्रमुख उद्देश्य है, जैनधर्म का मूल।।१।।
मि - मिलकर धर्मप्रभावना, करो सभी विद्वान।
वर्गोदय को तज करें, सर्वोदय उत्थान।।२।।
ना - नाम से नहिं गुण से सहित, णमोकार हैं मंत्र।
इसका खूब प्रचार हो, नमूँ परमपद पंच।।३।।
- रत्न तीन जग में कहे, देव शास्त्र गुरु धाम।

रत्नत्रय इनसे मिलें, इन पद करें प्रणाम।।४।।
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जैन कहानियाँ

शीलधुरंधर सेठ सुदर्शन

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मुनिराज उस निर्जन वन में एक शिला पर योगमुद्रा में स्थित है । आगम के प्रकाश में अंतःचक्षु के द्वारा वे अपनी आत्मा को देखने का प्रयत्न कर रहे है । ऐसी भयंकर शीत ऋतु में वे नग्न दिगम्बर मुनि धैर्यरूपी कंबल ओढ़ रहे है और आत्मा को अपने शरीर से भिन्न समझकर मन को एकाग्र करने के पुरूषार्थ में तन्मय है । इधर सुभग ग्वाला निकलता है खुले बदन बैठे हुए महासाधु को देख कर मन में सोचने लगता है-

अहो ! ये महात्मा कैसे है इनके पास न लंगोटी है न चादर, ऐसी भयंकर ठंढी में जहाँ घर में बैठकर कंबल में मुह छिपाकर भी दात कड़-कड़ करते है । बाहर निकलते ही हाथ पैर कंपते है । ओह ! सूर्य अस्त हो चुका है, रात्रि पिशाचिनी अपने अंधेरे से सबको ग्रसित करने वाली है । अभी कुछ ही क्षण बाद पसारा भी नहीं दीखेगा । ठंडी- ठंडी हवा चल रही है, अभी तुषार के कण गिरने लगेंगे और देखते ही देखते बरसात के समान वृक्षों के पत्तो से पानी टपकने लगेगा । सुबह होने तक कुहरा छाया रहेगा । बिना वस्त्र के ये बेचारे महात्मा आज की रात कैसे पूरी करेंगें ऐसी ठंडी झेलकर कैसे जीवित रह सकेंगें ?


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पढ़ें- हस्तिनापुर में जन्मे तीर्थंकरों के परिचय

महानुभावों! आज मैं आपको तीन तीर्थंकरों-सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ, सत्रहवें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ एवं अट्ठारहवें तीर्थंकर भगवान अरनाथ के जीवन से परिचित कराती हूँ जिनके गर्भ-जन्म-तप और ज्ञान ये चार-चार कल्याणक हस्तिनापुर की पावन धरती पर हुए तथा सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये तीनों ही महापुरुष तीर्थंकर होने के साथ ही साथ चक्रवर्ती और कामदेवपद के भी धारी हुए हैं।

सर्वप्रथम आप जाने भगवान शांतिनाथ का जीवन परिचय-

कुरुजांगल देश की हस्तिनापुर राजधानी में कुरुवंशी राजा विश्वसेन राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम ऐरावती था। भगवान शांतिनाथ के गर्भ में आने के छह महीने पहले से ही इन्द्र की आज्ञा से हस्तिनापुर नगर में माता के आंगन में रत्नों की वर्षा होने लगी और श्री, ह्री, धृति आदि देवियाँ माता की सेवा में तत्पर हो गर्इं। भादों वदी सप्तमी के दिन भरणी नक्षत्र में रानी ने गर्भ धारण किया। उस समय स्वर्ग से देवों ने आकर तीर्थंकर महापुरुष का गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया और माता-पिता की पूजा की।

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अष्टसहस्री पढ़ें
  • 🌸🌸📖जैन न्याय के सर्वोच्च ग्रंथ " _अष्टसहस्री_ " के अध्ययन का स्वर्णिम अवसर देखें पारस चैनल प्रतिदिन प्रातः 6 से 7 बजे तक अष्टसहस्री ग्रंथराज का पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के मुखारविंद से अध्यापन एव खोलकर स्वाध्याय करें .
बाहुबली चरित्र (काव्य)
वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत की तिथियाँ, व्रतों के नाम एवं माहात्म्य

तिथि व्रत का नाम फल

पौष कृष्णा ३ पंक्तिमान छह पल्य उपवास

पौष कृष्णा १२ सूर्य सात पल्य उपवास

पौष सुदी ५ पराक्रम नौ पल्य उपवास

पौष सुदी ११ जयपृथु दस पल्य उपवास

माघ कृष्णा २ अजित आठ पल्य उपवास

माघ कृष्णा ५ स्वयंप्रभ ग्यारह पल्य उपवास

माघ कृष्णा १५ रत्नप्रभ बारह पल्य उपवास

माघ सुदी ४ चतुर्मुख तेरह पल्य उपवास

माघ सुदी ७ शील चौदह पल्य उपवास

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चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण स्तुति

चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण स्तुति

चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत करने वाले महानुभाव इस स्तुति को अवश्य पढ़े
-आर्यिका चन्दनामती
तर्ज-सन्त साधु बनके बिचरूँ..........

मनुज तन से मोक्ष जाने की घड़ी कब आएगी
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।टेक.।।

जैसे सागर में रतन का एक कण गिर जावे यदि।
खोजने पर भी है दुर्लभ वह भी मिल जावे यदि।।
किन्तु भव सागर में गिर आत्मा नहीं तिर पाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।१।।

कहते हैं चौरासि लख योनी में काल अनादि से।
जीव भ्रमता रहता है चारों गति पर्याय में।।
एक बस मानुष गति शिव सौख्य को दिलवाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।२।।

एक इन्द्रिय की बयालिस लाख योनी मानी हैं।
नित्य-इतर निगोद-पृथ्वी-अग्नि-जल और वायु हि हैं।।
इनमें जाकर के कभी नहिं देशना मिल पाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।३।।

वनस्पतिकायिक की भी दस लाख योनि कहीं गर्इं।
ये सभी मिथ्यात्व बल से योनियाँ मिलती रहीं।।
इनमें ना जाऊँ यदि सम्यक्त्व बुद्धि आएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।४।।

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संस्कृत साहित्य के विकास

जैनधर्म के अनुसार तीर्थंकर महापुरुषों की दिव्यध्वनि सात सौ अठारह भाषाओं में परिणत हुई मानी गई है इनमें से अठारह महाभाषाएं मानी गई हैं और सात सौ लघु भाषा हैं। उन महाभाषाओं के अन्तर्गत ही संस्कृत और प्राकृत को सर्वप्राचीन एवं प्रमुख भाषा के रूप में स्वीकृत किया जाता है। संस्कृत जहाँ एक परिष्कृत, लालित्यपूर्ण भाषा है वहीं उसे साहित्यकारों ने ‘देवनागरी’ भाषा कहकर सम्मान प्रदान किया है। अनेक साहित्यकारों द्वारा समय-समय पर इस भाषा में गद्य, पद्य व मिश्रित चम्पू साहित्य लिखकर प्राचीन महापुरुषों और सतियों के चारित्र से लोगों को परिचित कराया है।

इसी श्रृंंखला में बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्धकाल एक नई क्रांति के साथ प्रारंभ होकर अनेक साहित्यिक उपलब्धियों के साथ समाज की ओर अग्रसर है। सदैव उत्कृष्ट त्याग, ज्ञान व वैराग्य में प्रसिद्ध जैन समाज में उच्च कोटि के मनीषी लेखक के रूप में आचार्य श्री गुणभद्र स्वामी, कुन्दकुन्द, यतिवृषभ, पूज्यपाद आदि दिगम्बर जैनाचार्यों ने सिद्धान्त, न्याय, अध्यात्म, पुराण आदि ग्रंथ प्राकृत और संस्कृत भाषा में लिखकर जिज्ञासुओं को प्रदान किये किन्तु न जाने किस कारण से विदुषी गणिनी आर्यिका पद को प्राप्त दिगम्बर जैन साध्वियों के द्वारा लिखित कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं होता है। लगभग ढाई सहस्राब्दियों के इतिहास की साक्षी से तो साध्वियों ने ग्रंथलेखन नहीं किया अन्यथा देश के किसी संग्रहालय या पुस्तकालय में उनके कुछ अवशेष तो अवश्य प्राप्त होते।

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पूज्य आर्यिका ज्ञानमती कृत नियमसार-स्याद्वाद चंद्रिका टीका-एक दृष्टि

सारांश

जैन वाङ्मय के प्रकाशन के क्षेत्र में अपनी लौह लेखनी के द्वारा पूज्य १०५ गणिनी आर्यिकारत्न श्री ज्ञानमती माताजी ने कीर्तिमान स्थापित किया है। अभीक्ष्णज्ञानोपयोगी एवं प्रतिमूर्ति रूप उनके अकथित श्रम से चतुरनुयोगी विपुल साहित्य का सृजन हुआ है। निम्न पंक्तियाँ उन पर सटीक रूप से चरितार्थ होती हैं-

बहते ही जाओ, बहते ही जाओ, जहाँ तक धार हो।

सहते ही जाओ, सहते ही जाओ, जहाँ तक कर्मोदय की मार हो।
ढोते ही जाओ, ढोते ही जाओ, जहाँ तक कर्तव्य का भार हो।

लिखते ही जाओ, लिखते ही जाओ, जहाँ तक विकल्प के उस पार हो, निर्विकल्प का द्वार हो।।

पूज्य माताजी का प्राकृत, संस्कृत तथा हिन्दी आदि लोकभाषाओं तथा व्याकरण, छन्द, अलंकार, न्याय, दर्शन, सिद्धांत आदि विषयों पर अधिकार है। वे संस्कृत भाषा में धाराप्रवाह लेखनी चलाने में समर्थ हैं। यही कारण है कि उनकी पावन लेखनी से मौलिक ग्रंथ, टीका, अनुवाद तथा स्तोत्र आदि श्रेष्ठ साहित्य की रचना हुई है। हर्ष का विषय है कि इसी संस्कृत भाषा के टीकाक्रम में विश्ववन्द्य आचार्य कुन्दकुन्द के अध्यात्म ग्रंथ नियमसार पर माताजी ने पूर्व में हिन्दी पद्यानुवाद सहित टीका लिखने के पश्चात् संस्कृत भाषा में ‘स्याद्वाद चन्द्रिका’ नामक टीका का प्रणयन किया जो वस्तुत: वर्तमान में प्रशंसनीय कार्य है। मैंने प्रस्तुत टीका पर ‘एक अनुशीलन’ रूप शोध ग्रंथ लिखा जो दिनाँक ३ अप्रैल २००५ में दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर से प्रकाशित भी हुआ। उसमें विस्तार से माताजी द्वारा प्रकटित विषयों का खुलासा करने का सुयोग मुझे प्राप्त हुआ। पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी की प्रेरणास्वरूप यह कार्य सम्पन्न हुआ।


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गुणस्थान सम्बन्धी प्रश्नोत्तरी

प्रश्न १. गुणस्थान किसे कहते हैं ?

उत्तर—मोह और योग के निमित्त से होने वाले आत्मा के अन्तरंग परिणामों को गुणस्थान कहते हैं। गुणस्थान आत्मविकास का दिग्दर्शक हैं। यह एक प्रकार का थर्मामीटर है। जैसे ज्वाराक्रान्त रोगी का तापमान थर्मामीटर व्दारा मापा जाता है, उसी प्रकार आत्मा का आध्यात्मिक विकास या पतन गुणस्थान रूपी थर्मामीटर व्दारा मापा जाता है।

प्रश्न २. गुणस्थान कितने होते हैं ?

उत्तर—गुणस्थान चौदह होते हैं जो निम्न हैं—

  1. मिथ्यात्व
  2. सासादन
  3. मिश्र या सम्यग्मिथ्यात्व
  4. अविरत सम्यक्त्व
  5. देशविरत या संयमासंयम
  6. प्रमत्तसंयत
  7. अप्रमत्तसंयत
  8. अपूर्वकरण
  9. अनिवृत्तिकरण
  10. सूक्ष्मसांपराय
  11. उपशांतमोह
  12. क्षीणमोह
  13. सयोगकेवली
  14. अयोगकेवली।

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स्वसमय और परसमय

स्वसमय और परसमय -

त्रिशला-जीजी! आज तुमने जो आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के द्वारा किये गये समयसार के उपदेश में स्वसमय-परसमय का विवेचन सुना है, उसे हमें एक बार पुन: समझाओ?

मालती-सुनो! मैं विस्तृत विवेचन के साथ तुम्हें समझाती हूँ।

जीवो चरित्तदंसणणाणट्ठिउ तं हि ससमयंजाण।

पुग्गलकम्म पदेशट्ठियं च तं जाण परसमयं।।

अर्थात् जो जीव दर्शन, ज्ञान और चारित्र में स्थित रहा है, हे शिष्य! उसे तुम निश्चय से स्वसमय जानो और जो जीव पुद्गल कर्म के प्रदेशों में स्थित है, उसे तुम परसमय जानो।’’

तात्पर्यवृत्ति नाम की टीका में श्री जयसेनाचार्य ने पहले जीव का लक्षण बतलाया है कि जो शुद्धनिश्चयनय से शुद्ध-बुद्ध एक स्वभावरूप निश्चयप्राण के द्वारा उसी प्रकार अशुद्धनिश्चयनय से क्षायोपशमिक (मति, श्रुतज्ञान, चक्षु, अचक्षुदर्शनरूप) अशुद्ध भाव प्राणों के द्वारा और असद्भूतव्यवहारनय की अपेक्षा से यथासंभव द्रव्य प्राणों से जीता है, जीवेगा और भूतकाल में जीता था, वह जीव कहलाता है। इस कथन की दृष्टि से देखा जाये, तो सभी जीव शुद्धनिश्चयनय से शुद्ध, बुद्ध एक चैतन्यस्वरूप ही हैं। चाहे वे एकेन्द्रिय हों या अभव्यजीव हों।

त्रिशला-तो क्या मेरी आत्मा भी शुद्ध है?

मालती-हाँ! अवश्य, हमारी-तुम्हारी सभी की आत्माएँ शुद्ध निश्चयनय से शुद्ध ही हैं, इसमें कोई भी संदेह नहीं है। यही जीव जब मुनि अवस्था में पहुँचकर ध्यान में स्थित होता है, उस समय विशुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वभाव वाले अपनी परमात्मा में जो रुचि है, वह सम्यग्दर्शन है, उसी निज परमात्मा में जो रागादि स्वसंवेदन ज्ञान है, वही सम्यग्ज्ञान है, तथैव उसी निज परमात्मा में निश्चल अनुभूतिरूप जो अवस्था है, वही वीतराग चारित्र है। इन उपर्युक्त लक्षण वाले निश्चयरत्नत्रय अथवा अभेदरत्नत्रय के द्वारा परिणत हुए जीव पदार्थ को हे शिष्य! तुम स्वसमय जानो और जो कर्मोदय से जनित नर-नारकादि अवस्थाएँ हैं, पूर्वोक्त निश्चयरत्नत्रय के अभाव से जब जीव उसमें स्थित रहता है, तब उसे परसमय जानो। इसका निष्कर्ष यह निकला कि चतुर्थ, पंचम और छठे गुणस्थानवर्ती मुनि भी निश्चयरत्नत्रय में स्थित नहीं हैं अत: वे परसमय ही हैं किन्तु सातवें गुणस्थान से लेकर आगे के जीव जब वीतराग निर्विकल्प ध्यान में स्थित होते हैं, तभी वे स्वसमयरूप कहलाते हैं।


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आज का दिन - ११ फ़रवरी २०१८ (भारतीय समयानुसार)
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दिनाँक ११ फरवरी,२०१८
तिथी- फाल्गुन कृष्ण ११
दिन-रविवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७४

सूर्योदय ०७.०५
सूर्यास्त १८.१६

भगवान आदिनाथ - ज्ञान कल्याणक
भगवान श्रेयांसनाथ - जन्म - तप कल्याणक

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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार
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