ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ

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मुम्बई विहार


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मानव लोक


मानव लोक

जहाँ तक जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल ये द्रव्य पाये जाते हैं उसे लोकाकाश कहते हैं। इस लोक से परे चारों तरफ अनंत अलोकाकाश है। इस लोक के तीन भेद हैं— ऊध्र्वलोक, मध्यलोक और अधोलोक। अधोलोक में नारकी जीव रहते हैं और ऊध्र्वलोक में देवों का निवास है तथा मध्यलोक में मनुष्य, तिर्यंच और देव भी रहते हैं। यह लोक पुरुषकार है। मध्यलोक— इसमें कटिभाग के समान मध्यलोक है इसका विस्तार एक राजू प्रमाण है और ऊँचाई निन्यान्वे हजार चालीस योजन मात्र है। इस राजू प्रमाण—क्षेत्र में असंख्यात द्वीप, समुद्र हैं। इसमें ठीक बीच में सर्वप्रथम द्वीप का नाम जंबूद्वीप है। यह एक लाख योजन विस्तृत गोलाकार (थाली के समान) है। इसे चारों ओर से वेष्टित कर, दो लाख योजन विस्तृत लवण समुद्र हैं। इसे वेष्टित लवण समुद्र हैं । इसे वेष्टित कर घातकीखंड द्वीप है। इसे वेष्टित कर पुष्करवर द्वीप है। ऐसे ही द्वीप को घेरे हुये समुद्र और समुद्र को घेरे हुये द्वीप आगे—आगे दूने—दूने विस्तार वाले होते चले गये हैं। अंतिम द्वीप का नाम स्वयंभूरमणद्वीप और समुद्र का नाम भी स्वयंभूरमण है। मनुष्यलोक— यह मनुष्यलोक ढाई द्वीप और दो समुद्र तक ही है। तृतीय पुष्कर द्वीप के बीच में वलयाकार मानुषोत्तर पर्वत है। इस पर्वत के इधर तक आधे द्वीप में और पहले के दो द्वीप में ही मनुष्य रहते हैं। इस मानुषोत्तर पर्वत के बाहर मनुष्य नहीं जा सकता है। इसलिये प्रथम जम्बूद्वीप, द्वितीय धातकीखंड और आधे पुष्कर द्वीप को मिलाकर ढाई द्वीप होते हैं। प्रथम जम्बूद्वीप एक लाख योजन का , लवण समुद्र दोनों तरफ २—२ लाख, धातकीखंड दोनों तरफ ४—४ लाख, कालोद समुद्र दोनों तरफ ८—८ लाख और आधा पुष्कर द्वीप दोनों तरफ ८—८ लाख। ये सब मिलकर १±२±२±४±४±८±८±८±८ · ४५ लाख योजन का यह मनुष्यलोक है। और पढ़ें...

धर्मोपदेशामृत


धर्मोपदेशामृत

श्री नाभिराजा के पुत्र भगवान् ऋषभदेव जिनेन्द्र जयवंत होवें जो महान् आत्मा होने से महात्मा हैं, कायोत्सर्ग मुद्रा से शरीर को लंबायमान करके स्थिर खड़े हुए हैं। जिनके ऊपर आया हुआ मध्याह्न का तेजस्वी सूर्य ऐसा चमक रहा है मानों कर्मरूपी ईधन को जलाने वाली उदासीनता-वीतरागतारूप वायु के निमित्त से स्फुरायमान समीचीन ध्यानरूपी अग्नि का निकला हुआ देदीप्यमान एक स्फुलिंगा ही हो। भगवान ऋषभदेव दीक्षा लेकर छह माह का योग लेकर ध्यान में खड़े हुए थे। मध्यान्ह में जब उनके मस्तक के ऊपर भाग मेें सूर्य आ जाता था तब ऐसा मालूम पड़ता था कि भगवान जो ध्यान कर रहे हैं वह अग्नि के समान है क्योंकि वह ध्यान ही सर्वकर्मों को जलाने वाला है। भगवान के ध्यान अग्नि का एक स्फुलिंगा ही मानो ऊपर उछलकर चला गया है जो कि सूर्यरूप में प्रकाश फैला रहा है। इससे यह प्रगट होता है कि भगवान के ध्यान का तेज सूर्य से अनंतगुणा ज्योतिस्वरूप है उस ध्यान की एक किरण अर्थात् तिलंगा ही सूर्य जैसा तेजोमय होता है। इस अवसर्पिणी काल के तीसरे सुषमादु:षमा नाम के काल में चौरासी लाख पूर्व तीन वर्ष, आठ मास और एक पक्ष शेष रहने पर आषाढ़ कृष्णा द्वितीया के दिन सर्वार्थसिद्धि से च्युत होकर एक अहमिंद्र देव राजा नाभिराय की रानी मरुदेवी के गर्भ में आ गए। इस गर्भावतार से छह माह पूर्व ही सौधर्म इंद्र की आज्ञा से कुबेर ने माता के आंगन में रत्नों की वर्षा शुरू कर दी थी जो कि भगवान के जन्म होने तक पंद्रह मास तक हुई थी। चैत्र कृष्णा नवमी के दिन भगवान का जन्म हुआ था, इंद्रों ने उसी क्षण बालक तीर्थंकर को महावैभव से सुमेरु पर ले जाकर १००८ कलशों से महाअभिषेक महोत्सव मनाया था। युवावस्था में अंतिम कुलकर पिता श्री नाभिराय ने भगवान की स्वीकृति लेकर इंद्र की अनुमति से राजा कच्छ, सुकच्छ की बहनें यशस्वती और सुनंदा के साथ श्री वृषभदेव का विवाह कर दिया था। प्रथम रानी से भरत आदि सौ पुत्र और ब्राह्मी पुत्री का जन्म हुआ तथा सुनंदा रानी से बाहुबली एवं सुंदरी पुत्री का जन्म हुआ था। श्री ऋषभदेव ने दोनों पुत्रियों को लिपि एवं अंक विद्या से लेकर सर्व शास्त्र विद्या पढ़ाई थी पुत्रों को भी सर्व विद्याओं में पारंगत किया था। प्रजा को असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन षट्कर्मों का उपदेश देकर जीने की कला सिखाई थी। ये प्रथम जिनेन्द्र सुवर्ण वर्ण के थे, पांच सौ धनुष (२००० हाथ) की इनकी ऊँचाई थी। चौरासी लाख वर्ष पूर्व की इनकी आयु थी। उसमें बीस हजार वर्ष पूर्व तो प्रभु के कुमारकाल में व्यतीत हो गये। इसके बाद नीलांजना के नृत्य के समय उसकी अकस्मात् मृत्यु देखकर भगवान विरक्त हुए तब चैत्र वदी नवमी के दिन जैनेश्वरी दीक्षा लेकर प्रभु ध्यान में छह माह के लिए स्थिर खड़े हो गए थे। और पढ़ें...

उपासक धर्म


उपासक धर्म

आद्य जिन— श्री ऋषभदेव भगवान् तथा राजा श्रेयांस ये दोनों क्रम से व्रतविधि और दानविधि के आदि प्रवर्तक पुरुष हैं। अणुव्रत और महाव्रत आदि व्रतविधि का प्रचारक इस युग के आदि में सर्वप्रथम भगवान् ऋषभदेव ने किया है। और दानविधि का प्रचार भगवान को आहार दान देकर राजा श्रेयांस ने किया है। इसलिये ये दोनों महापुरुष व्रत और दान के आदि प्रवर्तक माने गये हैं। इनका परस्पर संबंध होने पर ही यहाँ भरतक्षेत्र में धर्म की स्थिति हुई है।

सम्यगदर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनों को ‘धर्म’ कहते हैं । यह धर्म ही मुक्ति का मार्ग है जो कि प्रमाण से सिद्ध है। जो जीव रत्नत्रयस्वरूप इस मोक्षमार्ग में संचार नहीं करते हैं उनके लिये मोक्षस्थान तो दूर है ही, उनका संसार अतिशय लंबा—बहुत बड़ा हो जाता है। अर्थात् रत्नत्रय से रहित जीव अनंत काल तक इस चतुर्गतिरूप संसार में ही परिभ्रमण किया करते हैं।

यह धर्म संपूर्णधर्म— परिपूर्ण और देशधर्म — एकदेश के भेद से दो प्रकार का है। इनमें से प्रथम भेद में दिगंबर मुनि रहते हैं और द्वितीय भेद में गृहस्थ—श्रावक रहते हैं। वर्तमान में भी उस रत्नत्रयस्वरूप धर्म की प्रवृत्ति उसी मार्ग से— पूर्णधर्म और देशधर्मरूप से हो रही है। इसीलिये देशधर्म के अनुयायी गृहस्थ भी धर्म के कारण माने जाते हैं। तात्पर्य यही है कि गृहस्थधर्म भी मोक्षमार्ग है— मोक्ष का कारण है। सर्वथा निरर्थक, व्यर्थ अथवा हेय नहीं हैं। अन्यथा भगवान् आदिनाथ, भगवान, शांतिनाथ, सम्राट् भरत, मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्र आदि महापुरुष गृहस्थाश्रम में प्रवेश क्यों करते ?

‘इस समय यहाँ इस कलिकाल—पंचमकाल में मुनियों का निवास जिनालय में हो रहा है और उन्हीं के निमित्त से धर्म एवं दान की प्रवृत्ति है। इस प्रकार मुनियों की स्थिति, धर्म और दान इन तीनों के मूल कारण गृहस्थ श्रावक हैं’। और पढ़ें...


समाचार


गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के मंगल विहार के मनोरम क्षण
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कुछ खास


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विशाल प्रशस्ति पत्र


‘देश में पहली बार दिया गया इतना विशाल प्रशस्ति पत्र-’

भारत गौरव गणिनी प्रमुख आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी का ऐतिहासिक अभिनंदन समारोह मुंबई के आज़ाद मैदान में भव्य स्तर पर मनाया गया।

लगभग ५००० से अधिक भक्तों ने पधारकर इस अभिनंदन समारोह को सफल बनाया और सभी ने पूज्य माताजी का आशीर्वाद प्राप्त किया।

इस अवसर पर पूज्य माताजी के चरणों में समस्त अभिनंदन समिति एवं सकल जैन समाज मुंबई द्वारा "शारदे माँ" उपाधि प्रदान करते हुए १०८ इंच का विशाल प्रशस्ति पत्र सुन्दर ग्रेनाइट पाषाण में उत्कीर्ण करके प्रदान किया गया।

साथ ही मुंबई के लगभग सभी जिनमंदिरों के पदाधिकारियों व ट्रस्टीगण ने भी आपनी अपनी समाज की ओर से अलग अलग लगभग ५० प्रशस्ति पत्र भेंट किए। यह मुंबई ही नहीं अपितु समस्त जैन समाज के इतिहास का अनूठा एवं अतिभव्य अभिनंदन समारोह रहा।

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चारों अनुयोगों का महत्व


चारों अनुयोगों का महत्व
मंगलाचरण
द्वादशांगश्रुतं भाव-श्रुतञ्चाप्युपलब्धये।
चतुरनुयोगाब्धौ मेऽनिशमन्तोऽवगाह्यताम्।।७।।

द्वादशांग श्रुत और भावश्रुत की उपलब्धि के लिये चारों अनुयोगरूपी समुद्र में मेरा मन नित्य ही अवगाहन करता रहे। (जिनेन्द्र भगवान के मुखकमल से निर्गत पूर्वापर विरोधरहित जो वचन हैं उन्हें आगम कहते हैं। उसके ही प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग ये चार भेद हैं। इन चारों अनुयोगों को ‘चार वेद’ भी कहते हैं। ये चारों ही अनुयोग सम्यक्त्व की उत्पत्ति के लिये कारण हैं। सम्यग्दृष्टि के सम्यक्त्व को मल आदि दोषों से रहित निर्दोष करने वाले हैं और उसकी रक्षा करने में भी पूर्ण सहायक हैं। ऐसे ही सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को भी प्रकट करने वाले हैं तथा इनकी वृद्धि और रक्षा करके अंत में समाधि की सिद्धि कराने वाले हैं। ये चारों अनुयोग मोक्षमार्ग में चलने के लिये दीपक हैं। यह अनुपयोगरूप द्रव्यश्रुत ही भावश्रुत के लिये कारण है और यह भावश्रुत केवलज्ञान के लिये बीजभूत है। अतएव इस श्रुतज्ञान की उपासना का फल केवलज्ञान का प्राप्त होना ही है। ‘‘इस शास्त्ररूपी अग्नि में भव्यजीव तपकर विशुद्ध हो जाता है और दुष्टजन अंगार के समान तप्त हो जाते हैं अथवा भस्म के समान भस्मीभूत हो जाते हैं।१’’ अर्थात् वे शास्त्र के अर्थ का अनर्थ करके उसे शस्त्र बना लेते हैं अत: क्रम से और गुरुपरम्परा से शास्त्रों को पढ़ना चाहिये। उनके अर्थ को सही समझकर अपनी आत्मा को शुद्ध कर लेना चाहिए।) ...और पढ़ें

आज का दिन - २३ जून २०१७ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक 23 जून,2017
तिथी-आषाढ़ कृष्णा चतुर्दशी
दिन-शुक्रवार
वीर निर्वाण संवत- 2543
विक्रम संवत- 2074

सूर्योदय 05:27
सूर्यास्त 19:14

रोहिणी व्रत

णमोकार व्रत

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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


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