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पू० गणिनी श्रीज्ञानमती माताजी ससंघ मांगीतुंगी के (ऋषभदेव पुरम्) में विराजमान हैं |

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ


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वृहत्पल्य व्रत विधि


वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत की तिथियाँ, व्रतों के नाम एवं माहात्म्य

तिथि व्रत का नाम फल

पौष कृष्णा ३ पंक्तिमान छह पल्य उपवास

पौष कृष्णा १२ सूर्य सात पल्य उपवास

पौष सुदी ५ पराक्रम नौ पल्य उपवास

पौष सुदी ११ जयपृथु दस पल्य उपवास

माघ कृष्णा २ अजित आठ पल्य उपवास

माघ कृष्णा ५ स्वयंप्रभ ग्यारह पल्य उपवास

माघ कृष्णा १५ रत्नप्रभ बारह पल्य उपवास

माघ सुदी ४ चतुर्मुख तेरह पल्य उपवास

माघ सुदी ७ शील चौदह पल्य उपवास

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"खानदान और खानपान शुद्धि का महत्त्व


'खानदान और खानपान शुद्धि का महत्त्व-
-पं. शिवचरनलाल जैन, मैनपुरी (उ.प्र.)
वन्दे धर्मतीर्थेशं, श्रीपुरुदेवपरम् जिनम्।

दानतीर्थेशश्रेयासं चापि शुद्धिप्रदायकम्।।
जातिकुलशुद्धिमादाय, अशनपानपवित्रताम्।

परमस्थानसंप्राप्ता: विजयन्तु परमेष्ठिन:।।स्वोपक्ष।।

मैं धर्मतीर्थ, व्रत तीर्थकर्ता उत्कृष्ट प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान और शुद्धि प्रदायक दानतीर्थेश श्रेयांस को प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने जाति, कुल शुद्धि और भोजनपान की शुद्धि प्राप्त कर सप्त परमस्थानों सहित मोक्षपद को प्राप्त किया है, वे परमेष्ठी जयवन्त हों। मानव जीवन में खानदान और खानपान शुद्धि का अत्यधिक महत्व है । नि:श्रेयस और लौकिक अभ्युदय दोनों ही दृष्टियों से यह मान्य है । प्रत्यक्ष, आगम और अनुमान तीनों ही प्रमाणों से यह प्रमाणित होता है । यह सर्वत्र दृष्टिगत होता है कि प्राय: उच्च वर्ण, जाति, गोत्र-कुल वाले श्रेष्ठ कार्यों को सम्पादित करते हुए प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं। ज्ञान, ध्यान, तप की योग्यता भी श्रेष्ठ खानदान की अपेक्षा रखती है । मोक्षमार्ग में इसकी अनिवार्यता है

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सेमिनार


सेमिनार की परिभाषा मेरी दृष्टि में

आर्यिका श्री चंदनामती माताजी
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मुम्बई में २३ से २५ जुलाई २०१७ तक आयोजित

National Seminar On Jain Dharma में आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने
सेमिनार-SEMINAR

का हिन्दी-अंग्रेजी में विवरण निम्न प्रकार से बताकर विद्वानों को आनंद विभोर कर दिया |



से - सेवा धर्म समाज की, आगम के अनुकूल।
यही प्रमुख उद्देश्य है, जैनधर्म का मूल।।१।।
मि - मिलकर धर्मप्रभावना, करो सभी विद्वान।
वर्गोदय को तज करें, सर्वोदय उत्थान।।२।।
ना - नाम से नहिं गुण से सहित, णमोकार हैं मंत्र।
इसका खूब प्रचार हो, नमूँ परमपद पंच।।३।।
- रत्न तीन जग में कहे, देव शास्त्र गुरु धाम।
रत्नत्रय इनसे मिलें, इन पद करें प्रणाम।।४।।

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गाय की रक्षा और हमारा कर्तव्य


गाय की रक्षा और हमारा कर्तव्य

गाय नाम के प्राणी को आज के समय में हर कोई, जल्दी से माता कहने, मानने के लिए तैयार तो हो जाते हैं , परंतु वास्तविक रूप से उसे माता स्वरूप मानकर उसका रक्षण या पालन—पोषण करने के लिए बहुत कम लोग तैयार होते हैं । सुबह में, दोपहर में या शाम को अगर हम चाय, काफी या दूध पीते हैं तो, निश्चित रूप से हमें यह जानना चाहिए की चाय, कॉफी में मिक्स किया हुआ ‘दूध’ गाय, भैंस और बकरी जैसे प्राणियों का होता है, जिसे डेयरी प्रोडक्ट के रूप में दूध उत्पादक डेरी से प्राप्त करते हैं। मनुष्य जाति में स्त्री जब बच्चा पैदा करती है तब उस बच्चे को स्त्री अपने स्तन में से ‘दुग्ध’ रूपी प्रवाही, जो बच्चे के लिए अमृत स्वरूप है—पिलाकर जीवित रखती है। उसी तरह अगर कोई भी मनुष्य किसी प्राणी में मादा (नारी जाती) प्राणी का ‘दुग्ध’ पीता है तो वह मादा प्राणी भी ‘माता’ समान ही कहलाती है। हम मनुष्य लोग हर रोज गाय, भैंस, बकरी जैसे मादा प्राणी के स्तन से निकला हुआ दूध पीते हैं,

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रत्नकरंडश्रावकाचार- प्रथम परिच्छेद


नम: श्री वर्धमानाय निर्धूत कलिलात्मने ।

सालोकानां त्रिलोकानां यद्विद्या दर्पणायते ।।

१. मंगलाचरण

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ज्ञानावरणादिक पापकर्म आत्मा से नष्ट किए जिनने।
उन वीरप्रभु को नमन करूं सालोक—त्रिलोक ज्ञान जिनके।।
जैस चक्षु दर्पण को लख निजमुख अवलोकन करता है।
वैसे केवलज्ञानी आत्मा में सारा जगत झलकता है।।

जिन्होंने सम्पूर्ण कर्म कलंक को धोकर अपनी आत्मा को शुद्ध कर लिया है। केवलज्ञान को प्रकट कर तीनों कालों को प्रत्यक्ष कर लिया है। जिनके केवलज्ञान रूपी दर्पण में तीनों लोक और आलोक स्पष्ट झलकते हैं उन तीर्थंकर श्री वर्धमान स्वामी को मैं नमस्कार करता हूँ।।१।।

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समुच्चय पूजा


नवग्रह अरिष्ट निवारक - समुच्चय पूजा

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-कुसुमलता छंद-
काल अनादी से कर्मों के, ग्रह ने मुझे सताया है।
उनका निग्रह करने का अब, भाव हृदय में आया है।।
इसीलिए ग्रह शान्ती हेतू, पूजा पाठ रचाया है।

तीर्थंकर प्रभु के अर्चन को, मैंने थाल सजाया है।।१।।
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-दोहा-
आह्वानन स्थापना, सन्निधिकरण महान।
अष्टद्रव्य से पूर्व है, यह विधि हुई प्रधान।।२।।

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जैन भूगोल


तीन लोक

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सर्वज्ञ भगवान से अवलोकित अनंतानंत अलोकाकाश के बहुमध्य भाग में ३४३ राजू प्रमाण पुरुषाकार लोकाकाश है। यह लोकाकाश जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल इन पाँचों द्रव्यों से व्याप्त है। आदि और अन्त से रहित-अनादि, अनंत है, स्वभाव से ही उत्पन्न हुआ है। छह द्रव्यों से सहित यह लोकाकाश स्थान निश्चय ही स्वयं प्रधान है। इसकी सब दिशाओं में नियम से अलोकाकाश स्थित है।

इस लोक के ३ भेद हैं—अधोलोक, मध्यलोक और ऊध्र्वलोक

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सूरत विहार


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जीवन की आधारशिला


रिश्ते—जीवन की आधारशिला


‘ जुबां में शराफत की पहचान रखना,
ना टूटे कोई दिल जरा ध्यान रखना,
मुश्किल से मिलते हैं रिश्ते जमीं पर,
रिश्तों का नजरों में सम्मान रखना।’

प्राय: हमारे बुजुर्ग हमें बताते रहते हैं कि सामाजिक समरसता के लिये रिश्तों का दृढ़ता से निर्वाह करना आवश्यक है। सुख हो या दु:ख दोनों ही परिस्थितियों में रिश्तों का प्रभाव देखा जाता है। कहते हैं कि सुख यदि रिश्तेदारों के साथ मिलकर बांट लिया जाता है तो उसका आनंद दोगुना हो जाता है और दु:ख के समय रिश्तेदारों का साथ हो तो दु:ख आधा रह जाता है। ये रिश्ते रक्त संबंध के तो होते ही हैं, रिश्तों की प्रगाढ़ता पड़ौसियों में भी बन जाती है, रिश्तों का दायरा जब सामाजिक स्तर पर बढ़ता है तो व्यापक हो जाता है।

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माँ का स्थान सर्वोच्च है


माँ का स्थान सर्वोच्च है

जगत में माँ का स्थान सर्वोच्च है। वे खुशनसीब होते हैं जिन्हें माँ की सेवा करने का अवसर व उसकी मातृछाया में वात्सल्य पाने का सौभाग्य मिलता है। माँ अपनी संतानों के लिए बड़ी पीड़ा सहने के लिए तैयार रहती है। मगर आज की संतान अपनी माँ के प्रति इतना आदर सम्मान नहीं देती है। जो एक दुर्भाग्य का विषय है। ये सच है कि संतान अपनी माँ का कर्ज जीवन भर नहीं चुका पाती मगर अपने माता—पिता की सेवा करके वह उन्हें आदर सम्मान दे सकती है। पुत्र असमर्थ हो या समर्थ, दुर्बल हो या ह्रष्ट पुष्ट, माँ उसकी रक्षा करती है। माता के सिवाय दूसरा कोई विधिपूर्वक या आत्मीयता से उसका पालन पोषण नहीं कर सकता। बच्चों के लिए माँ के समान दूसरी कोई छाया नहीं है अर्थात् माता की छत्रछाया में जो सुख है वह कहीं नहीं है। माँ के तुल्य कोई सहारा नहीं है, माँ सदृश अन्य कोई रक्षक नहीं है तथा माँ के समान दूसरा कोई व्यक्ति नहीं है।

जब भी कस्ती मेरी, मझधार में आ जाती है।

माँ दुआ करते हुए, रव्वाब में आ जाती है।।
एक अंधेरा भाग जो मुंह तेरा काला हो गया।
माँ ने आँखे खोल दी, घर में उजाला हो गया।।
किसी को घर मिला,हिस्से में या दुकान आई।
मैं घर में सबसे छोटा, मेरे हिस्से में माँ आई।।

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चौदह गुणस्थान


चौदह गुणस्थान

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बीस प्ररूपणाओं द्वारा अथवा बीस प्रकरणों का आश्रय लेकर यहाँ जीवद्रव्य का प्ररूपण किया जाता है। ‘‘जीवट्ठाण’’ नामक सिद्धांतशास्त्र में अशुद्ध जीव के १४ गुणस्थान, १४ मार्गणा और १४ जीवसमास स्थानों का जो वर्णन है वही इसका आधार है। संक्षेप रुचि वाले शिष्यों की अपेक्षा से बीस प्ररूपणाओं का गुणस्थान और मार्गणा इन दो ही प्ररूपणाओं में अंतर्भाव हो जाता है अतएव संग्रहनय से दो ही प्ररूपणा हैं अर्थात् गुणस्थान यह एक प्ररूपणा हुई और चौदह मार्गणाओं में जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा और उपयोग इन पाँचों प्ररूपणाओं का अंतर्भाव हो जाता है। जैसे— इंद्रिय मार्गणा और कायमार्गणा में जीवसमास गर्भित हो जाते हैं इत्यादि। इसलिये अभेद विवक्षा से गुणस्थान और मार्गणा ये दो ही प्ररूपणा हैं किन्तु भेद विवक्षा से बीस प्ररूपणाएँ होती हैं।

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आज का दिन - १६ दिसम्बर २०१७ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक १६ दिसम्बर,२०१७
तिथी- पौष कृष्ण १४
दिन-शनिवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७४

सूर्योदय ०६.०१
सूर्यास्त १७.३९

भगवान शीतलनाथ ज्ञान कल्याणक


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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


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