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22 अक्टूबर को मुंबई महानगर पोदनपुर से पू॰ गणिनी ज्ञानमती माताजी का मंगल विहार मांगीतुंगी की ओर हो रहा है|

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ


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आज का प्रवचन 18 अक्टूबर


दीपावली पर्व

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कैसे मनाये दीपावली

प्रातःकाल की मंगल बेला है सभी भक्तगण गणिनी ज्ञानमती माताजी का मंगल प्रवचन सुनने के लिए निद्रा का परित्याग करते है सभी श्रोतागण कहते है, कि पूज्य माताजी पारस चैनल के माध्यम से सभी देशवासियो को नई-नई ज्ञानभरी बातों से ओतप्रोत कराती है|आज प्रज्ञाश्रमणी चंदनामती माताजी ने सर्वप्रथम अपनी मधुरवाणी से उषावंदना से सभी श्रोता को निद्रा से जाग्रत कराया,तत्पश्चात माताजी ने सभी देशवासियो को दीपावली मनाने कि प्रेरणा दी,कैसे मनाये दीपावली| दीपावली की पावन बेला है,यह रोशनी का त्यौहार हर वर्ष मनाया जाता है यह त्यौहार अध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है|

जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों की परम्परा में जिन अन्तिम तीर्थंकर महावीर स्वामी के प्रभाव से जैन धर्म पुष्पित, पल्लवित व प्रसारित हुआ, उनका महानिर्वाण (मोक्ष) वर्तमान बिहार राज्य के पावापुरी (पावापुर) नामक स्थान पर हुआ। महास्वामी महावीर के महानिर्वाण का समय आ लगा है, ऐसा इन्द्रजीत को आभास हुआ तो उन्होंने समवसरण की रचना की। महावीर स्वामी ने पावानगरी के एक टीलेनुमा स्थान पर स्थित तालाब के मध्य अपनी देह त्यागी। इन्द्रादि देवों ने उनका अग्नि संस्कार किया। महावीर निर्वाण दिवस के दिन अमावस्या की रात्रि को दीपोत्सव मनाया गया। इसी दिन महावीर स्वामी के प्रमुख गौतम गणधर स्वामी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी। तब से लेकर तक भव्यजन सम्पूर्ण जैन समाज के लोग भगवान का महोत्सव मनाते हैं|ऐसे में सब लोग दीपक जलाकर मन के अंदर रोशनी भरते है|

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सेमिनार की परिभाषा


सेमिनार की परिभाषा मेरी दृष्टि में

आर्यिका श्री चंदनामती माताजी
मुम्बई में २३ से २५ जुलाई २०१७ तक आयोजित

National Seminar On Jain Dharma में आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने
सेमिनार-SEMINAR
का हिन्दी-अंग्रेजी में विवरण निम्न प्रकार से बताकर विद्वानों को आनंद विभोर कर दिया |
से - सेवा धर्म समाज की, आगम के अनुकूल।
यही प्रमुख उद्देश्य है, जैनधर्म का मूल।।१।।
मि - मिलकर धर्मप्रभावना, करो सभी विद्वान।
वर्गोदय को तज करें, सर्वोदय उत्थान।।२।।
ना - नाम से नहिं गुण से सहित, णमोकार हैं मंत्र।
इसका खूब प्रचार हो, नमूँ परमपद पंच।।३।।
- रत्न तीन जग में कहे, देव शास्त्र गुरु धाम।

रत्नत्रय इनसे मिलें, इन पद करें प्रणाम।।४।।

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सम्पादकीय


‘‘दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम’’ के उद्घाटन अवसर पर प्रस्तुत

Professional की सही परिभाषा मेरी दृष्टि में
-आर्यिका चन्दनामती

    जैसे सरोवर की शोभा कमल से होती है, पक्षी की शोभा उसके पंखों से है, भोजन की शोभा नमक से होती है, नारी की शोभा शील से होती है, सुन्दर गीत सुरीले कंठ से सुशोभित और आकर्षक बन जाता है, सर्वोदयी विश्वधर्म भी अहिंसा के पालन से ही शोभायमान एवं विश्ववंद्य होता है, भारत की शोभा आध्यात्मिक संतों से वृद्धिंगत होती है उसी प्रकार हमारे धर्मप्राण भारतीय समाज की शोभा विशिष्ट बुद्धिजीवियों से है।

    आप सभी दिगम्बर जैन समाज के विशेष बुद्धिजीवी व्यक्तित्व के रूप में पधारे हैं। आज की यह Conference मुम्बई DJPF अर्थात् Digambar Jain Professional Forum दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम के द्वारा organized है। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से निर्मित इस फोरम के सभी Executive Members विशेष आशीर्वाद एवं बधाई के पात्र हैं। उन्हें इस फोरम के द्वारा आगे निरन्तर सामाजिक संगठन-एकता एवं जैनधर्म के संरक्षण आदि के कार्य करते हुए अपनी युवा शक्ति का सृजनात्मक (Constructive) परिचय देना है।

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नूतन वर्ष-अभिनन्दन


नूतन वर्ष-अभिनन्दन

20 अक्टूबर से प्रारंभ हो रहा वीर निर्वाण नव संवत्सर 2544 आप सभी के लिए मंगलमय हो|
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आज भारत देश में वीर निर्वाण संवत्, विक्रम संवत्, शालिवाहन शक और ईसवी सन् प्रचलित हैं। इनके प्रथम दिवस को वर्ष का प्रथम दिन मानकर नववर्ष की मंगल कामनाएं की जाती हैं। जैन धर्मानुयायी महानुभावों को किस वर्ष का कौन सा दिवस नववर्ष का मंगलदिवस मानना चाहिए? आज ईसवी सन् अत्यधिक प्रचलित है। प्रायः कलेंडर, तिथिदर्पण और डायरियाँ भी इसी सन् से छपने लगी हैं। वास्तव में अंग्रेजों ने अपने भारत पर शासन करके अपना ऐसा प्रभाव छोड़ा है कि उसे मिटाना असंभव है। खैर! कोई बात नहीं,१ जनवरी से ईसवी सन् प्रारंभ होता है। इसे भी मान लीजिये-मना लीजिये कोई बाधा नहीं है।

कर्नाटक, महाराष्ट्र तथा गुजरात में विक्रम संवत् को अधिक महत्व दिया जाता है। मैंने श्रवणबेलगोल में देखा, जो लोग वर्ष भर वहीं रहकर भी चैत्रवदी अमावस्या (दक्षिण व गुजरात के अनुसार फाल्गुन कृ० अमावस्या) की रात्रि में पहाड़ पर जाकर सोते हैं और प्रातः उठते ही भगवान् बाहुबली का दर्शन कर नूतन वर्ष की मंगल कामना करते हुए नीचे उतरते हैंं। चैत्रशुक्ला एकम से विक्रम संवत् का नया वर्ष शुरू होता है। आज पंचांग इसी संवत् से चल रहे हैं। ...और पढ़ें

02.खानदान और खानपान शुद्धि का महत्त्व


खानदान और खानपान शुद्धि का महत्त्व

-पं. शिवचरनलाल जैन, मैनपुरी (उ.प्र.)
वन्दे धर्मतीर्थेशं, श्रीपुरुदेवपरम् जिनम्।

दानतीर्थेशश्रेयासं चापि शुद्धिप्रदायकम्।।
जातिकुलशुद्धिमादाय, अशनपानपवित्रताम्।

परमस्थानसंप्राप्ता: विजयन्तु परमेष्ठिन:।।स्वोपक्ष।।

मैं धर्मतीर्थ, व्रत तीर्थकर्ता उत्कृष्ट प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान और शुद्धि प्रदायक दानतीर्थेश श्रेयांस को प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने जाति, कुल शुद्धि और भोजनपान की शुद्धि प्राप्त कर सप्त परमस्थानों सहित मोक्षपद को प्राप्त किया है, वे परमेष्ठी जयवन्त हों। मानव जीवन में खानदान और खानपान शुद्धि का अत्यधिक महत्व है । नि:श्रेयस और लौकिक अभ्युदय दोनों ही दृष्टियों से यह मान्य है । प्रत्यक्ष, आगम और अनुमान तीनों ही प्रमाणों से यह प्रमाणित होता है । यह सर्वत्र दृष्टिगत होता है कि प्राय: उच्च वर्ण, जाति, गोत्र-कुल वाले श्रेष्ठ कार्यों को सम्पादित करते हुए प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं। ज्ञान, ध्यान, तप की योग्यता भी श्रेष्ठ खानदान की अपेक्षा रखती है ।

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दीपावली पूजन


दीपावली पूजन विधि भाग 1
दीपावली पूजन विधि भाग 2
दीपावली पूजन विधि भाग 3
डिप्लोमा इन जैनोलोजी


डिप्लोमा इन जैनोलोजी

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वृहत्पल्य व्रत विधि


वृहत्पल्य व्रत विधि

जिस किसी ने मनुष्य जन्म प्राप्त करके यदि पल्य विधान नाम का व्रत किया है, वह भव्य है, यह बात निश्चित है। यह व्रत श्रवण मात्र से ही असंख्यात भवों के पापों का नाश कर देता है और तत्काल ही स्वर्गमोक्ष को भी देने वाला है। वृषभदेव भगवान ने पहले इस पल्य विधान का कथन किया है। उसी प्रकार वीर जिनेन्द्र के निकट में गौतम आदि महर्षियों ने भी इसे कहा है। इस विधान के पढ़ने से सहस्रगुणा फल होता है और इसका अनुष्ठान करने से उत्तम अनन्त केवलज्ञान प्राप्त होता है। इस व्रत के अनुषंगिक फल चक्रीपद और इन्द्रपद भी प्राप्त होते हैं किन्तु मुख्यरूप से इसका फल निर्मल तीर्थंकर पद प्राप्त करना ही है।’

वृहत्पल्य व्रत की तिथियाँ, व्रतों के नाम एवं माहात्म्य

तिथि व्रत का नाम फल

आश्विन सुदी ६ सूर्यप्रभा एक पल्य उपवास

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वीर निर्वाण संवत्सर पूजा


वीर निर्वाण संवत्सर पूजा

(नव वर्ष की पूजा)
रचयित्री-आर्यिका चन्दनामती
(दीपावली के दूसरे दिन कार्तिक शु. एकम को यह पूजन करके अपने वर्ष को मंगलमय करें)

स्थापना-शंभु छंद
श्री वीरप्रभू को वन्दन कर, उनके शासन को नमन करूँ।
नववर्ष हुआ प्रारंभ वीर, निर्वाण सुसंवत् नमन करूँ।।
यह संवत् हो जयशील धरा पर, यही प्रार्थना जिनवर से।
इस अवसर पर प्रभु पूजन कर, प्रारंभ करूँ नवजीवन मैं।।
ॐ ह्रीं नववर्षाभिनन्दनकारक श्रीमहावीर-जिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं नववर्षाभिनन्दनकारक श्रीमहावीर-जिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।

ॐ ह्रीं नववर्षाभिनन्दनकारक श्रीमहावीरजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।

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दीपावली-पूजा विधि


टेंशन का उपचार मेडीसिन नहीं मेडीटेशन है


टेंशन का उपचार मेडीसिन नहीं मेडीटेशन है

—आचार्य विनम्रसागर जी महाराज

वर्तमान युग में जितने ज्यादा साधन सुविधाएँ उपलब्ध हुई उतना जीवन स्तर का विकास तो हुआ लेकिन आदमी आलसी और कमजोर होता गया। इस कमजोरी का एक लक्षण टेंशन भी है। साहसी और धैर्यवान प्राणी मुसीबतों में घबराते नहीं है उनसे डटकर मुकाबला करते हैं और कमजोर आदमी टेंशन कर बैठता है जिससे बी. पी. हाई और हार्ट अटैक जैसी घटनाएँ जीवन में घटित हो जाती हैं। कई लोग इसका उपचार कराते हुए कई प्रकार की दवाईयाँ खाते हैं लेकिन वे दवाईयाँ मन को बेहोश करने की होती हैं, मन को विस्तृत करने की नहीं होती। टेंशन का उपचार तभी होगा जब मन विशाल होगा, मन की विशालता धर्म के माहौल में होगी। खोज करें तो पाएँगे कि सबसे बड़ा विशाल मन कोई धर्मी का ही हुआ है और भविष्य में भी एक पक्षपात रहित धर्मी का ही होगा। मन में यदि सीमित वस्तुएँ समाती हैं तो मन विशाल नहीं होता और जब मन असीमित के लिए दौड़ लगाता है तो मन चेतन के साथ मिलकर अनंत के महल को छूने लगता है। टेंशन तभी होता है जब असीमित की चाह में सीमित हाथ लगे अथवा हम ज्यादा की आकांक्षा रखें और उपलब्ध कम हो सके टेंशन की मूल जड़ है हम जैसा चाहते हैं वैसा न होना अथवा अपेक्षा की उपेक्षा होना। इसे केवल आत्मध्यान के बल से ही मिटाया जा सकता है, कोई दवाईयों से नहीं।

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भगवान महावीर निर्वाणभूमि-पावापुरी जल मंदिर


पावापुरी में सरोवर के मध्य स्थित जल मंदिर ही भगवान महावीर की निर्वाणभूमि है। श्री पूज्यपाद आचार्य ने निर्वाणभक्ति में कहा है-

पद्मवनदीर्घिकाकुल-विविधद्रुमखण्डमण्डिते रम्ये।

पावानगरोद्याने व्युत्सर्गेण स्थितः स मुनिः।।१६।।
कार्तिककृष्णस्यान्ते स्वातावृक्षे निहत्य कर्मरजः।
अवशेषं संप्रापद्-व्यजरामरमक्षयं सौख्यम् ।।१७।।
परिनिर्वृतं जिनेन्द्रं, ज्ञात्वा विबुधा ह्यथाशु चागम्य।
देवतरुरक्तचंदन - कालागुरुसुरभिगोशीर्षैः ।।१८।।
अग्नीन्द्राज्जिनदेहं मुकुटानलसुरभिधूपवरमाल्यैः।
अभ्यच्र्य गणधरानपि, गता दिवं खं च वनभवने।।१९।।

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दिगम्बर जैन आम्नाय में मंत्र व्यवस्था


दिगम्बर जैन आम्नाय में मंत्र व्यवस्था

डाॅ. सविता जैन(सम्पादिका-आदित्य आदेश)-उज्जैन- म०प्र०
सारांश
द्वादशांग जिनवाणी के बारहवें दृष्टिवादांग के १४ पूर्वों में १०वाँ विद्यानुवाद पूर्व है जो तंत्र,मंत्र एवं यंत्र से सम्बद्ध है। आज भी मानव अलौकिक एवं आध्यामिक शक्तियों की आराधना में मंत्रों का प्रयोग करता है किन्तु मंत्र क्या हैं? मंत्रों का स्वरूप एवं उपयोग सा हो? क्या दिगम्बर आगम परम्परा में मंत्रों की साधना एवं धर्मप्रभावना के निमित्त उनके प्रयोग की अनुमति है? क्या पौराणिक सन्दर्भों में आचार्यों द्वारा इनके प्रयोगों का विवरण मिलता है? इन प्रश्नों के समाधान के साथ ही मंत्रों के उपयोग, विधि-निषेधों की संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत आलेख में की गई है।

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आज का दिन - १९ अक्टूबर २०१७ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक 19 अक्टूबर,2017
तिथी- कार्तिक कृष्णा अमावस्या
दिन-गुरूवार
वीर निर्वाण संवत- 2543
विक्रम संवत- 2073

सूर्योदय 06.21
सूर्यास्त 17.58

बड़ी दिपावली
वर्षा योग निष्ठापन
सांय प्रदोष बेला में दीपावली पूजन

श्री महावीर निर्वणोत्सव प्रातः

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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


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फोटो - ऑडियो एवं वीडियो गैलरी


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०-९ अं
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