ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ

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मुम्बई विहार
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सोलहकारण पर्व

सोलह भावना

प्रस्तुति - आर्यिका चन्दनामती माताजी
श्रेयोमार्गानभिज्ञानिह भवगहने जाज्ज्वलद्दु:खदाव-

स्कन्धे चंक्रम्यमाणानतिचकितमिमानुद्धरेर्यं वराकान्।।
इत्यारोहत्परानुग्रहरसविलसद्भावनोपात्तपुण्य-

प्रक्रान्तैरेव वाक्यै: शिवपथमुचितान् शास्ति योऽर्हन् स नोऽव्यात् ।।१।।

अर्थ-इस संसाररूपी भीषण वन में दु:खरूपी दावानल अग्नि अतिशय रूप से जल रही हैं। जिसमें श्रेयोमार्ग-अपने हित के मार्ग से अनभिज्ञ हुए ये बेचारे प्राणी झुलसते हुए अत्यंत भयभीत होकर इधर-उधर भटक रहे हैं। ‘‘मैं इन बेचारों को इससे निकालकर सुख में पहुँचा दूँ’’। पर के ऊपर अनुग्रह करने की इस बढ़ती हुई उत्कृष्ट भावना के रस विशेष से तीर्थंकर सदृश पुण्य संचित कर लेने से दिव्यध्वनिमय वचनों के द्वारा जो उसके योग्य मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं वे अर्हंतजिन हम लोगों की रक्षा करें। ‘कर्मारातीन् जयतीति जिन:’ कर्मरूपी शत्रुओं को जो जीतते हैं वे जिन कहलाते हैं। ‘जिनो देवता अस्येति जैन:’ और जिनदेव जिसके देवता हैं-उपास्य हैं वे जैन कहलाते हैं। जिनेन्द्र देव के इस जैनशासन में प्रत्येक भव्य प्राणी को परमात्मा बनने का अधिकार दिया गया है। धर्म के नेता अनंत तीर्थंकरो ने अथवा भगवान महावीर स्वामी ने मोक्षमार्ग के दर्शक ऐसा मोक्षमार्ग के नेता बनने के लिए उपाय बतलाया है। इसी से आप इस जैनधर्म की विशालता व उदारता का परिचय प्राप्त कर सकते हैं। इस उपाय में सोलहकारण भावनायें भानी होती हैं और इनके बल पर अपनी प्रवृत्ति सर्वतोमुखी, सर्वकल्याणमयी, सर्व के उपकार को करने वाली बनानी होती है।

‘‘दर्शनविशुद्धिविनयसंपन्नता शीलव्रतेष्वनतिचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधिर्वैयावृत्त्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य’’।।२४।।

दर्शनविशुद्धि, विनयसंपन्नता, शीलव्रतेष्वननतिचार, अभीक्ष्णज्ञानोपयोग, संवेग, शक्तितस्त्याग, शक्तितस्तप, साधुसमाधि, वैयावृत्यकरण, अरिहंतभक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभक्ति, आवश्यक अपरिहाणि, मार्गप्रभावना और प्रवचनवत्सलत्व ये सोलहकारण भावनायें तीर्थंकर प्रकृति के आस्रव के लिये हैं अर्थात् इनसे तीर्थंकर प्रकृति का बंध हो जाता है। इन सोलह भावनाओं में से दर्शनविशुद्धि का होना अत्यंत आवश्यक है। अन्य सभी भावनायें हों अथवा कुछ कम भी हों फिर भी तीर्थंकर प्रकृति का बंध हो सकता है अथवा किन्हीं एक, दो आदि भावनाओं के साथ सभी भावनायें अविनाभावी हैं तथा अपायविचय धर्मध्यान भी विशेष रूप से तीर्थंकर प्रकृति बंध के लिए कारण माना गया है। वैसे यह ध्यान तपो भावना में ही अंतर्भूत हो जाता है ।

वर्षायोग स्थापना

वर्षायोग स्थापना

(चातुर्मास स्थापना)

श्रीमते वर्धमानाय, नमो नमितविद्विषे।
यज्ज्ञानान्तर्गगतं भूत्वा, त्रैलोक्यं गोष्पदायते।।१।।

जैन मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक और क्षुल्लिका आदि चतुर्विध संघ वर्षा ऋतु में एक जगह रहने का नियम कर लेते हैं, अन्यत्र विहार नहीं करते हैं इसलिए इसे वर्षायोग कहा है तथा सामान्यतया श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक इन चार महीनेपर्यंत एक जगह रहना होता है अत: इसे चातुर्मास भी कहते हैं।

इस वर्षायोग को ग्रहण करने की तथा इसे समाप्त करने की तिथियाँ कौन सी हैं? ‘‘आषाढ़ सुदी चतुर्दशी की पूर्वरात्रि में सिद्धभक्ति आदि विधिपूर्वक इस वर्षायोग को साधुजन ग्रहण करें और कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की पिछली रात्रि में विधिपूर्वक उस वर्षायोग को समाप्त कर देवें।

आगे इसी शास्त्र में और भी विशेष बताते हैं कि-

‘‘श्रमण संघ हेमंत आदि ऋतुओं में अर्थात् मगसिर, पौष आदि महीनों में किसी गाँव, नगर आदि एक स्थान पर एक-एक महीने तक रह सकता है पुन: वह आषाढ़ मास में वर्षायोग करने के स्थान पर पहुँच जावे और मगसिर मास पूर्ण हो जाने पर वहाँ नहीं ठहरे अर्थात् मगसिर के बाद अन्यत्र विहार कर जावे तथा प्रयोजनवश भी श्रावण कृष्णा चतुर्थी का उल्लंघन न करे अर्थात् किसी विशेष कारणवश यदि साधु संघ आषाढ़ सुदी चतुर्दशी को वर्षायोग स्थान पर नहीं पहुँच सके तो श्रावणवदी चतुर्थी तक भी वहाँ पहुँचकर वर्षायोग स्थापना करे, ऐसा विधान है किन्तु इस चतुर्थी का उल्लंघन करना उचित नहीं है। और पढ़ें...

उपासक धर्म

उपासक धर्म

आद्य जिन— श्री ऋषभदेव भगवान् तथा राजा श्रेयांस ये दोनों क्रम से व्रतविधि और दानविधि के आदि प्रवर्तक पुरुष हैं। अणुव्रत और महाव्रत आदि व्रतविधि का प्रचारक इस युग के आदि में सर्वप्रथम भगवान् ऋषभदेव ने किया है। और दानविधि का प्रचार भगवान को आहार दान देकर राजा श्रेयांस ने किया है। इसलिये ये दोनों महापुरुष व्रत और दान के आदि प्रवर्तक माने गये हैं। इनका परस्पर संबंध होने पर ही यहाँ भरतक्षेत्र में धर्म की स्थिति हुई है।

सम्यगदर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनों को ‘धर्म’ कहते हैं । यह धर्म ही मुक्ति का मार्ग है जो कि प्रमाण से सिद्ध है। जो जीव रत्नत्रयस्वरूप इस मोक्षमार्ग में संचार नहीं करते हैं उनके लिये मोक्षस्थान तो दूर है ही, उनका संसार अतिशय लंबा—बहुत बड़ा हो जाता है। अर्थात् रत्नत्रय से रहित जीव अनंत काल तक इस चतुर्गतिरूप संसार में ही परिभ्रमण किया करते हैं।

यह धर्म संपूर्णधर्म— परिपूर्ण और देशधर्म — एकदेश के भेद से दो प्रकार का है। इनमें से प्रथम भेद में दिगंबर मुनि रहते हैं और द्वितीय भेद में गृहस्थ—श्रावक रहते हैं। वर्तमान में भी उस रत्नत्रयस्वरूप धर्म की प्रवृत्ति उसी मार्ग से— पूर्णधर्म और देशधर्मरूप से हो रही है। इसीलिये देशधर्म के अनुयायी गृहस्थ भी धर्म के कारण माने जाते हैं। तात्पर्य यही है कि गृहस्थधर्म भी मोक्षमार्ग है— मोक्ष का कारण है। सर्वथा निरर्थक, व्यर्थ अथवा हेय नहीं हैं। अन्यथा भगवान् आदिनाथ, भगवान, शांतिनाथ, सम्राट् भरत, मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्र आदि महापुरुष गृहस्थाश्रम में प्रवेश क्यों करते ?

‘इस समय यहाँ इस कलिकाल—पंचमकाल में मुनियों का निवास जिनालय में हो रहा है और उन्हीं के निमित्त से धर्म एवं दान की प्रवृत्ति है। इस प्रकार मुनियों की स्थिति, धर्म और दान इन तीनों के मूल कारण गृहस्थ श्रावक हैं’। और पढ़ें...

दशलक्षण पर्व

दशलक्षण पर्व

जैनशासन में दो प्रकार के पर्व माने हैं - १. अनादि पर्व , २. सादि पर्व ।

जो पर्व किसी के द्वारा शुरू नहीं किये जाते हैं ,प्रत्युत अनादिकाल से स्वयं चले आ रहे हैं और अनंतकाल तक चलते रहेंगे वे अनादिपर्व कहे जाते हैं ।
जो पर्व किन्हीं महापुरुषों की स्मृति में प्रारंभ होते हैं , वे सादिपर्व होते हैं ।
इस परिभाषा के अनुसार सोलहकारण - दशलक्षण - अष्टान्हिका ये तीन अनादि पर्व कहलाते हैं । इनमें से यहाँ दशलक्षण पर्व के संदर्भ में जानना है कि यह अनादिनिधन पर्व वर्ष में तीन बार आता है ।
१. भादों के महीने में । २. माघ के महीने में । ३. चैत्र के महीने में ।
इन तीनों महीनों में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि से चतुर्दशी तक दश दिनों में दशलक्षण पर्व मनाया जाता है ।
दशलक्षण पर्व में जिन दश धर्मों की आराधना की जाती है , उनके नाम इस प्रकार हैं -
१. उत्तम क्षमा २. उत्तम मार्दव ३. उत्तम आर्जव ४. उत्तम सत्य ५. उत्तम शौच ६. उत्तम संयम ७. उत्तम तप ८. उत्तम त्याग ९. उत्तम आकिंचन्य १०. उत्तम ब्रम्हचर्य ।

विशेषरूप से भादों के महीने में पूरे देश के अन्दर यह दशलक्षण पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है और इन दश दिनों में लोग खूब व्रत- उपवास भी करते हैं तथा समाज में अनेक प्रकार के धार्मिक- सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं ।
प्राचीन परम्परा के अनुसार दशलक्षण के दश दिनों में तत्त्वार्थसूत्र ग्रन्थ की १-१ अध्याय के वाचन - प्रवचन की भी परम्परा रहती है ।
इस इन्साइक्लोपीडिया में ",अमूल्य प्रवचन" नामकी श्रेणी में तत्त्वार्थसूत्र के सुन्दर प्रवचन दशों अध्याय के हैं , उनका उपयोग भी आप कर सकते हैं ।
इसी संदर्भ में यहाँ दशधर्मों से संबंधित एवं तत्त्वार्थसूत्र के दशों अध्याय की प्रश्नोत्तरी आदि कुछ सामग्री प्रस्तुत की जा रही है । आप सभी इसे विभिन्न रूप में प्रयोग करके धर्मलाभ प्राप्त करें यही मंगल कामना है ।

आर्यिका चंदनामती
समाचार
गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के मंगल विहार के मनोरम क्षण

🍀पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मुम्बई महानगर में धर्मप्रभावना के लिए मंगल भ्रमण चल रहा है। इसी श्रृंखला में 20 जून को पूज्य माताजी पोदनपुर तीर्थ से भायंदर पश्चिम में पधारीं। यहाँ पर उनके पावन सान्निध्य में जैन ज्योतिर्लोक, द्रव्य संग्रह,सामायिक आदि का शिविर और जैन ज्योतिर्लोक विधान सम्पन्न हुआ है। शिविर में पूूज्य माताजी ने अपने मुखार विंद से सभी को अध्ययन कराया जिससे सबको बहुत ही आनंद की अनुभूति हुई। शिविर में सभी ने चन्द्रलोक की यात्रा करके जैन भूगोल और खगोल के बारे में ज्ञान प्राप्त किया। दिनांक 25 जून को भायंदर से विहार करके मीरा रोड तथा उसके पश्चात् बोरीवली मंडपेश्वर मंदिर में पूज्य माताजी का प्रवास रहेगा। वहाँ पर भी भक्तों को धर्मलाभ प्राप्त होगा।

🍀अष्टान्हिका पर्व में श्री सिद्धचक्र विधान दिनांक १ से ९ तक श्री पोदनपुर तीर्थ बोरीवली में होगा

🍀माताजी की चातुर्मास स्थापना ७ जुलाई को पोदनपुर तीर्थ,बोरीवली पर होगी सभा दोपहर ३ बजे एवं चातुर्मास की विधि (भक्ति पाठ)रात्रि ९ बजे होगी|

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🍀पारस चैनल पर देखना ना भूले जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के जैन ज्योतिर्लोक पर विशेष प्रवचन 25 जून 2017 रविवार से प्रातः 6:00 से 7:00 बजे। आप सभी प्रवचन को काॅपी पेन लेकर नोट करे।

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कुछ खास


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विशाल प्रशस्ति पत्र

‘देश में पहली बार दिया गया इतना विशाल प्रशस्ति पत्र-’

भारत गौरव गणिनी प्रमुख आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी का ऐतिहासिक अभिनंदन समारोह मुंबई के आज़ाद मैदान में भव्य स्तर पर मनाया गया।

लगभग ५००० से अधिक भक्तों ने पधारकर इस अभिनंदन समारोह को सफल बनाया और सभी ने पूज्य माताजी का आशीर्वाद प्राप्त किया।

इस अवसर पर पूज्य माताजी के चरणों में समस्त अभिनंदन समिति एवं सकल जैन समाज मुंबई द्वारा "शारदे माँ" उपाधि प्रदान करते हुए १०८ इंच का विशाल प्रशस्ति पत्र सुन्दर ग्रेनाइट पाषाण में उत्कीर्ण करके प्रदान किया गया।

साथ ही मुंबई के लगभग सभी जिनमंदिरों के पदाधिकारियों व ट्रस्टीगण ने भी आपनी अपनी समाज की ओर से अलग अलग लगभग ५० प्रशस्ति पत्र भेंट किए। यह मुंबई ही नहीं अपितु समस्त जैन समाज के इतिहास का अनूठा एवं अतिभव्य अभिनंदन समारोह रहा।

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चारों अनुयोगों का महत्व
चारों अनुयोगों का महत्व
मंगलाचरण
द्वादशांगश्रुतं भाव-श्रुतञ्चाप्युपलब्धये।
चतुरनुयोगाब्धौ मेऽनिशमन्तोऽवगाह्यताम्।।७।।

द्वादशांग श्रुत और भावश्रुत की उपलब्धि के लिये चारों अनुयोगरूपी समुद्र में मेरा मन नित्य ही अवगाहन करता रहे। (जिनेन्द्र भगवान के मुखकमल से निर्गत पूर्वापर विरोधरहित जो वचन हैं उन्हें आगम कहते हैं। उसके ही प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग ये चार भेद हैं। इन चारों अनुयोगों को ‘चार वेद’ भी कहते हैं। ये चारों ही अनुयोग सम्यक्त्व की उत्पत्ति के लिये कारण हैं। सम्यग्दृष्टि के सम्यक्त्व को मल आदि दोषों से रहित निर्दोष करने वाले हैं और उसकी रक्षा करने में भी पूर्ण सहायक हैं। ऐसे ही सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को भी प्रकट करने वाले हैं तथा इनकी वृद्धि और रक्षा करके अंत में समाधि की सिद्धि कराने वाले हैं। ये चारों अनुयोग मोक्षमार्ग में चलने के लिये दीपक हैं। यह अनुपयोगरूप द्रव्यश्रुत ही भावश्रुत के लिये कारण है और यह भावश्रुत केवलज्ञान के लिये बीजभूत है। अतएव इस श्रुतज्ञान की उपासना का फल केवलज्ञान का प्राप्त होना ही है। ‘‘इस शास्त्ररूपी अग्नि में भव्यजीव तपकर विशुद्ध हो जाता है और दुष्टजन अंगार के समान तप्त हो जाते हैं अथवा भस्म के समान भस्मीभूत हो जाते हैं।१’’ अर्थात् वे शास्त्र के अर्थ का अनर्थ करके उसे शस्त्र बना लेते हैं अत: क्रम से और गुरुपरम्परा से शास्त्रों को पढ़ना चाहिये। उनके अर्थ को सही समझकर अपनी आत्मा को शुद्ध कर लेना चाहिए।) ...और पढ़ें

व्यंजन
मीठे व्यंजन

अन्य मीठे व्यंजन...

आज का दिन - २५ जून २०१७ (भारतीय समयानुसार)
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दिनाँक 25 जून,2017
तिथी-आषाढ़ शुक्ला एकम्/द्वितीया
दिन-रविवार
वीर निर्वाण संवत- 2543
विक्रम संवत- 2074

सूर्योदय 05:27
सूर्यास्त 19:14

एकम् क्षय


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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार
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