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जैन विश्वकोश
जैनधर्म के ज्ञान का महासागर


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०४/०८/२०२० को गणिनी ज्ञानमती माताजी गुणानुवाद वक्तव्य अनुपमा जैन ग्वालियर द्वारा
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जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



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और देखें...

चातुर्मास सूची 2020


चतुर्मास सूची 2020
आचार्य परमेष्ठि स्थान
आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज ससंघ रेवती रेंज, इंदौर (म.प्र.)
आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज ससंघ बेलगांव (कर्णाटक)
आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज ससंघ (दक्षिण) सतना (म.प्र.)
गणधराचार्य श्री कुंथु सागर जी महाराज ससंघ कुंथुगिरी (महाराष्ट्र)
गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ससंघ पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ (म.प्र.)
गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज ससंघ भिण्ड (म.प्र.)
गणाचार्य श्री सिद्धांत सागर जी महाराज ससंघ बेला जी, दमोह (म.प्र.)
आचार्य श्री संभव सागर जी महाराज ससंघ त्रियोग आश्रम, श्री सम्मेद शिखर जी (झारखण्ड)
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गृह त्याग और क्षुल्लिका जीवन


गृह त्याग और क्षुल्लिका जीवन

बहुत दिनों पूर्व जब मैं छोटी थी और कैलाश भी ५-७ वर्ष का छोटा सा ही था तब मैंने एक दिन उसे कुछ समझाकर कहा था कि-

‘‘देखो कैलाश! तुम मेरे सच्चे भाई तब हो, कि जब मेरे समय पर मेरे काम आओ, अतः कभी यदि किसी समय मैं तुमसे कुछ मेरा विशेष काम कहूँ तो अवश्य ही कर देना।’’ कैलाश ने भी मेरी बात मान ली और तब मैंने उस छोटी सी वय में ‘‘वचन’’ ले लिया था।

उस समय वह वचन मुझे याद आ गया था अतः मैंने कैलाश को एकांत में बुलाया और वह पुराना वचन याद दिलाते हुए कहा-

‘‘भैया कैलाश! आज तुम मेरा एक काम कर दो बस मैं कृतार्थ हो जाऊँगी।’’

कैलाश ने जिज्ञासा व्यक्त की-‘‘कौन सा काम जीजी.......?’’

मैंने कहा-‘‘तुम मेरे साथ बाराबंकी चले चलो। देखो! मुझे अकेली तो भेज नहीं सकते हैं अतः तुम्हें मेरे साथ चलना पड़ेगा.....।’’

कैलाश पहले तो कुछ हिचकिचाया, फिर उस वचन को याद कर बोला- ‘‘अच्छा जीजी! मैं चलूँगा.....।’’

मैं रात भर महामंत्र का स्मरण करती रही। मुझे नींद तो बिल्कुल ही न के बराबर आई थी।

ब्रह्ममुहूर्त में चार बजे उठी, महामंत्र जपा और सोते हुए तथा पकड़ कर मेरे को चिपके हुए रवीन्द्र को धीरे-धीरे अपने से अलग किया।

उसके माथे पर प्यार का, दुलार का हाथ फेरकर उसे अपना अन्तिम भगिनीस्नेह दिया और मैं धीरे से खटिया से नीचे उतर आई।

धीरे-धीरे ही नीचे जाकर सामायिक, स्नान आदि से निवृत्त होकर मन्दिर के दर्शन करने चली गई। वहाँ जाकर प्रभु पार्श्वनाथ की प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर खड़ी होकर प्रार्थना करने लगी- ‘‘हे तीन लोक के नाथ! जैसे आपने कमठ के उपसर्गों को सहन कर संकट मोचन ‘पार्श्वनाथ’ यह नाम पाया है वैसे ही मुझे भी संकटों को, उपसर्गों को सहन करने की शक्ति दो और मेरे मनोरथ को सफल करो......।’’

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मेघमाला व्रत


मेघमाला व्रत विधि

मेघमाला व्रत भादों बदी प्रतिपदा से लेकर आश्विन वदी प्रतिपदा तक ३१ दिन तक किया जाता है। व्रत के प्रारंभ करने के दिन ही जिनालय के आँगन में सिंहासन स्थापित करें अथवा कलश को संस्कृत कर उसके ऊपर थाल रखकर, थाल में जिनबिम्ब स्थापित कर महाभिषेक और पूजन करे। श्वेत वस्त्र पहने, श्वेत ही चन्दोवा बांधे, मेघधारा के समान १००८ कलशों से भगवान का अभिषेक करे। पूजापाठ के पश्चात् ‘ॐ ह्रीं पंचपरमेष्ठिभ्यो नम:’ इस मंत्र का १०८ बार जाप करना चाहिए।

मेघमाला व्रत में सात उपवास कुल किये जाते हैं और २४ दिन एकाशन करना होता है। तीनों प्रतिपदाओं के तीन उपवास, दोनों अष्टमियों के दो उपवास एवं दोनों चतुर्दशियों के दो उपवास इस प्रकार कुल सात उपवास किये जाते हैं। इस व्रत को पाँच वर्ष तक पालन करने के पश्चात् उद्यापन कर दिया जाता है। इस व्रत की समाप्ति प्रतिवर्ष आश्विन कृष्णा प्रतिपदा को होती है। सोलहकारण का व्रत भी प्रतिपदा को समाप्त किया जाता है, परन्तु इतनी विशेषता है कि सोलहकारण का संयम और शील आश्विन कृष्णा प्रतिपदा तक पालन करना पड़ता है तथा पंचमी को ही इस व्रत की पूर्ण समाप्ति समझी जाती है। यद्यपि पूर्ण अभिषेक प्रतिपदा को ही हो जाता है, परन्तु नाममात्र के लिए पंचमी तक संयम का पालन करना पड़ता है।

मेघमाला व्रत कथा-वत्सदेश की कौशाम्बीपुरी में जब राजा भूपाल राज्य करते थे तब वहाँ पर एक वत्सराज नाम का श्रेष्ठी (सेठ) और उसकी पद्मश्री नाम की सेठानी रहती थी। पूर्वकृत अशुभ कर्म के उदय से उस सेठ के घर में दरिद्रता का वास रहा करता था इस पर भी इसके सोलह (१६) पुत्र और बारह (१२) कन्याएँ थीं।

व्रत विधि एवं कथा पढ़ें
Basic Knowledge of Jainism


णमोकार भजन


तर्ज—तन डोले......

णमोकार बोलो, फिर आँख खोलो, सब कार्य सिद्ध हो जाएँगे,

नर जन्म सफल हो जाएगा।। टेक.।।

प्रात:काल उषा बेला में, बोलो मंगल वाणी।
हर घर में खुशियाँ छाएँगी, होगी नई दिवाली।। हे भाई......
प्रभु नाम बोलो, निजधाम खोलो, सब कार्य सिद्ध हो जाएँगे।
नर जन्म सफल हो जाएगा।। णमोकार ......।।१।।

परमब्रह्म परमेश्वर की, शक्ती यह मंत्र बताता।
णमोकार के उच्चारण से, अन्तर्मन जग जाता।। हे भाई......
नौ बार बोलो, सौ बार बोलो, सब कार्य सिद्ध हो जाएँगे,
नर जनम सफल हो जाएगा।। णमोकार ......।।२।।

ॐ शब्द का ध्यान ‘चंदना-मति’ मन स्वस्थ बनाता।
इसके ध्यान से मानव इक दिन, परमेष्ठी पद पाता।। हे भाई......
नौ बार बोलो, सौ बार बोलो, सब कार्य सिद्ध हो जाएँगे।
नर जनम सफल हो जाएगा।। णमोकार ......।।३।।

पॉवर पॉइंट प्रजेंटेशन


कुछ नए प्रजेंटेशन्स

सम्यग्ज्ञान पत्रिका


इन्द्रध्वज विधान


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जम्बूद्वीप समाचार


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दशलक्षण धर्म पूजा


प्रबन्ध सम्पादक की कलम से


सोलह कारण पर्व


श्रेयोमार्गानभिज्ञानिह भवगहने जाज्ज्वलद्दु:खदाव-
स्कन्धे चंक्रम्यमाणानतिचकितमिमानुद्धरेर्यं वराकान्।।
इत्यारोहत्परानुग्रहरसविलसद्भावनोपात्तपुण्यप्रव्र-

न्तैरेव वाक्यै: शिवपथमुचितान् शास्ति योऽर्हन् स नोऽव्यात्।।१।।

अर्थ-इस संसाररूपी भीषण वन में दु:खरूपी दावानल अग्नि अतिशय रूप से जल रही है। जिसमें श्रेयोमार्ग-अपने हित के मार्ग से अनभिज्ञ हुए ये बेचारे प्राणी झुलसते हुए अत्यंत भयभीत होकर इधर-उधर भटक रहे हैं। ‘‘मैं इन बेचारों को इससे निकाल कर सुख में पहुँचा दूँ।’’ पर के ऊपर अनुग्रह करने की इस बढ़ती हुई उत्कृष्ट भावना के रस विशेष से तीर्थंकर सदृश पुण्य संचित कर लेने से दिव्यध्वनिमय वचनों के द्वारा जो उसके योग्य मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं वे अर्हंतजिन हम लोगों की रक्षा करें।

‘कर्मारातीन् जयतीति जिन:’ कर्मरूपी शत्रुओं को जो जीतते हैं, वे जिन कहलाते हैं। ‘जिनो देवता अस्येति जैन:’ और जिनदेव जिसके देवता हैं-उपास्य हैं वे जैन कहलाते हैं। जिनेन्द्र देव के इस जैनशासन में प्रत्येक भव्य प्राणी को परमात्मा बनने का अधिकार दिया गया है। धर्म के नेता अनंत तीर्थंकरों ने अथवा भगवान महावीर स्वामी ने मोक्षमार्ग के दर्शक ऐसा मोक्षमार्ग के नेता बनने के लिए उपाय बतलाया है। इसी से आप इस जैनधर्म की विशालता व उदारता का परिचय प्राप्त कर सकते हैं। इस उपाय में सोलहकारण भावनाएं भानी होती हैं और इनके बल पर अपनी प्रवृत्ति सर्वतोमुखी, सर्वकल्याणमयी, सर्व के उपकार को करने वाली बनानी होती है।

प्रबंध सम्पादिका (ब्र0 दीपा जैन)

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सती मनोवती की दर्शनप्रतिज्ञा


सती_मनोवती_की_दर्शनप्रतिज्ञा

(१)

सेठ हेमदत्त के घर की सजावट किसी राजमहल से कम नहीं दिख रही है, कहीं पर मोतियों की झालरें लटक रही हैं, कहीं पर मखमल के चंदोये बंधे हैं। दरवाजों-दरवाजों पर सुन्दर-सुन्दर रत्नों से जड़े हुए तोरण बंधे हुए हैं। कहीं पर रंग-बिरंगी काँच के झरोखे से छन-छन कर आती हुई सूर्य की किरणें इन्द्रधनुष की आभा बिखेर रही हैं तो कहीं पर रेशमी पर्दे आकाशगंगा के समान लहरा रहे हैं। घर और बाहर का भाग चारों तरफ से नगर के नर-नारियों से खचाखच भरा हुआ है। सेठानी हेमश्री आज खुशी से फूली नहीं समा रही हैं, सो ठीक ही है उसके लाडले सातवें पुत्र बुद्धिसेन की शादी होकर घर में अतिशय रूपवती बहू आई हुई है। आज सेठ जी के यहाँ जीमनवार है। बल्लभपुर शहर के सभी स्त्री-पुरुष प्रसन्नमुख दिख रहे हैं, कोई जीमकर जा रहे हैं और कोई आ रहे हैं। गली-गली में धूम मची हुई है। सभी के मुख पर एक ही चर्चा है कि भाई! हेमदत्त सेठ का आखिरी संबंध बहुत अच्छा हुआ है उन्हें बहुत अच्छे समधी मिले हैं। हस्तिनापुर के सेठ महारथ बावन करोड़ दीनारों के धनी हैं, उनकी सुपुत्री मनोवती बहुत ही सुशील कन्या है। उसने भी पूर्वजन्म में महान् पुण्य अर्जित किया होगा जो उसे ऐसा घर और वर मिला है, क्या सुन्दर अनुरूप जोड़ी है? कोई महिला चर्चा कर रही है, अरी बहन! अपने सेठ हेमदत्त भी छप्पन करोड़ दीनारों के मालिक हैं। इनके बड़े-बड़े व्यापार हैं, ये बड़े नामी जौहरी हैं। सुना है कि इनके नये समधी भी बहुत विख्यात जौहरी हैं। वे भी तो बल्लभपुर शहर में बहुत ही विख्यात पुरुष हैं। दूसरी बोल उठती है, बहन! सम्पत्ति का क्या देखना, बस लड़के को लड़की अनुकूल चाहिए और लड़की को पति अनुकूल चाहिए जिससे उन दोनों का दांपत्य जीवन सुख से चले। फिर यदि पैसा भाग्य में है तो लड़का अपने आप अपने पुरुषार्थ से कमाकर धनी बन जाता है और भाग्य में नहीं है तो कई पीढ़ियों का कमाया हुआ धन भी पता नहीं चलता कि किधर चला जाता है। मैं तो मेरी कन्या के लिए यही सोचा करती हूँ कि इसे पति धर्मात्मा मिले। तीसरी बोलने लगती है सच है बहन, मेरी लड़की का पति दुव्र्यसनी है, सारी बाप की कमाई की पचासों करोड़ सम्पत्ति बरबाद कर दी। मेरी लड़की के गहने जेवर भी बेच कर खा गया। क्या करूँ, मैं तो बहुत दुःखी हूँ। तभी एक महिला बोलने लगती है हाँ सच है बहन! इस मनोवती ने तो खूब ही पुण्य किया होगा, तभी इसे सर्वगुणसम्पन्न पति मिला है। इस प्रकार से शहर में तरह-तरह की मधुर चर्चायें चल रही हैं।

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अक्षय_तृतीया


अक्षय तृतीया-आहार गीत

तर्ज-एक परदेशी...

प्रभु ऋषभदेव का आहार हो रहा,
हस्तिनापुरी में जयजयकार हो रहा।।
प्रथम प्रभू का प्रथम पारणा, प्रथम बार जब हुआ महल में।।हुआ..।।
पंचाश्चर्य की वृष्टि हुई थी, चौके का भोजन अक्षय हुआ तब।।
अक्षय....।।
भक्ती में विभोर सब संसार हो रहा,
हस्तिनापुर में जयजयकार हो रहा।।प्रभू........।।१।।
भरत ने नगरि अयोध्या से आकर, श्रेयांस का सम्मान किया था।।
श्रेयांस....।।
दानतीर्थ के प्रथम प्रवर्तक, कहकर उन्हें बहुमान दिया था।।बहुमान....।।
राजा के महलों में मंगलाचार हो रहा,
हस्तिनापुर में जयजयकार हो रहा।।प्रभू........।।२।।
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सोलहकारण भावना


सोलहकारण भावना

जिनको बार-बार भाया जाए, उन्हें भावना कहते हैं। संख्या में १६ होने से इन्हें सोलहकारण भावना कहते हैं। ये तीर्थंकरप्रकृति का बंध कराने में कारण हैं।

१. दर्शनविशुद्धि-पच्चीस मल दोष रहित विशुद्ध सम्यग्दर्शन को धारण करना।

२. विनयसम्पन्नता-देव, शास्त्र, गुरु तथा रत्नत्रय की विनय करना।

३. शील व्रतों में अनतिचार-व्रतों और शीलों में अतिचार नहीं लगाना।

४. अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग-सदा ज्ञान के अभ्यास में लगे रहना।

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ज्ञानमती माताजी के चातुर्मास


भारत गौरव गणिनी प्रमुख आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी के

दीक्षित जीवन के 67 चातुर्मास (1953-2019)

*वर्ष 1953 टिकैत नगर (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1954 जयपुर (राजस्थान)

*वर्ष 1955 महेश्वर (महाराष्ट्र)

*वर्ष 1956 जयपुर (खानिया)

*वर्ष 1957 जयपुर (खानिया)

*वर्ष 1958 ब्यावर (राजस्थान)

*वर्ष 1959 अजमेर (राजस्थान)

*वर्ष 1960 सुजानगढ़ (राजस्थान)

*वर्ष 1961 सीकर (राजस्थान)

*वर्ष 1962 लाडनूं (राजस्थान)

*वर्ष 1963 कोलकाता (पश्चिम बंगाल)

*वर्ष 1964 हैदराबाद (आंध्र प्रदेश)

*वर्ष 1965 श्रवणबेलगोला (कर्नाटक)

*वर्ष 1966 सोलापुर (महाराष्ट्र)

*वर्ष 1967 सनावद (मध्य प्रदेश)

*वर्ष 1968 प्रतापगढ़ (राजस्थान)

*वर्ष 1969 जयपुर (राजस्थान)

*वर्ष 1970 टोंक (राजस्थान)

*वर्ष 1971 अजमेर (राजस्थान)

*वर्ष 1972 दिल्ली (पहाड़ी धीरज)

*वर्ष 1973 दिल्ली (नजफगढ़)

*वर्ष 1974 दिल्ली (लाल मंदिर)

*वर्ष 1975 हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर)

*वर्ष 1976 खतौली (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1977 हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर)

*वर्ष 1978 हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर)

*वर्ष 1979 दिल्ली (मोरी गेट)

*वर्ष 1980 दिल्ली (कूचा सेठ)

*वर्ष 1981 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1982 दिल्ली (मोदी धर्मशाला)

*वर्ष 1983 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1984 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1985 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1986 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1987 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1988 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1989 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1990 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1991 सरधना (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1992 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1993 अयोध्या (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1994 टिकैतनगर (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1995 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1996 मांगी तुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 1997 दिल्ली (लाल मंदिर)

*वर्ष 1998 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1999 दिल्ली (कनॉट प्लेस)

*वर्ष 2000 दिल्ली (प्रीत विहार)

*वर्ष 2001 दिल्ली (अशोक विहार)

*वर्ष 2002 प्रयाग इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 2003 कुंडलपुर-नालंदा (बिहार)

*वर्ष 2004 कुंडलपुर-नालंदा (बिहार)

*वर्ष 2005 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2006 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2007 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2008 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2009 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2010 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2011 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2012 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2013 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2014 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2015 मांगीतुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2016 मांगीतुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2017 मुंबई (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2018 मांगीतुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2019 टिकैतनगर (उ.प्र.)

चातुर्मास के विषय में पढ़ें

आज का दिन - ८ अगस्त २०२० (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक ८ अगस्त २०२०
तिथी- भाद्रपद कृष्ण ५
दिन- शनिवार
वीर निर्वाण संवत- २५४६
विक्रम संवत- २०७७

सूर्योदय ०६.०३
सूर्यास्त १९.०२


अथ भाद्रपद मास फल विचार



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पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी की 86वीं महाजयंती के प्रतिदिन की फोटोज


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