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ॐ ह्रीं केवलज्ञान कल्याणक प्राप्ताय श्री विमलनाथ जिनेन्द्राय नमः |

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ


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पंचम कल में पहला स्वर्णिम
चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत


चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत
-गणिनी ज्ञानमती

व्रत विधि-अनादिकाल से सभी संसारी प्राणी चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते आ रहे हैंं। उन चौरासी लाख योनि के भ्रमण से छूटने के लिए यह ‘‘चौरासी लाख योनिभ्रमण निवारण व्रत’’ है। इसके करने से व प्रतिदिन इन योनियों के भ्रमण से छूटने की भावना करते रहने से अवश्य ही हम और आप इन संसार परिभ्रमण के दु:खों से छुटकारा प्राप्त करेंगे।

इन चौरासी लाख योनियों का विवरण इस प्रकार है-१. नित्य निगोद, २. इतरनिगोद, ३. पृथ्वीकायिक, ४. जलकायिक, ५. अग्निकायिक व ६. वायुकायिक इन एकेन्द्रिय जीवों के प्रत्येक की सात-सात लाख योनियां मानी गयी हैं। अत: ६²७·४२ लाख योनियाँ हुई हैं। पुन: वनस्पतिकायिक की दश लाख योनियाँ हैं। पुन: विकलत्रय अर्थात् दो इंन्द्रिय, तीन इन्द्रिय व चार इन्द्रिय जीवों की प्रत्येक की दो-दो लाख योनियाँ हैं। अत: ३²२·६ लाख भेद हुए। पुन: देव, नारकी व पंचेन्द्रिय तिर्यंचों की चार-चार लाख योनियाँ हैं। ये ३²४·१२ लाख हुए। पुन: मनुष्यों की चौदह लाख योनियाँ हैं। इस प्रकार (४२०००००±१००००००±६०००००±१२०००००± १४०००००·८४०००००) योनियों के भेद हैं। इनके संक्षेप मेें १४ प्रकार से विभाजित चौदह मंत्र दिये गये हैं। उत्कृष्ट विधि यह है कि नित्यनिगोद के सात लाख योनियों का एकमंत्र है। इसके सात व्रत करना, ऐसे ही इतर निगोद के सात, पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुकायिक के भी ७-७ व्रत करने से ४२ व्रत हो जाते हैं। ऐसे ही वनस्पतिकायिक के १० व्रत करने से १० हुए। ऐसे ही दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय व चार इन्द्रिय के २-२ व्रत करने से ६ व्रत होते हैं। पुन: देव, नारकी व पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के ४-४ व्रत करने से १२ हुए एवं मनुष्यों की चौदह लाख के १-१ व्रत से १४ व्रत हुए। इस प्रकार ४२±१०±६±१२±१४·८४ व्रत हो जाते हैं। इनमें नित्य निगोद के ७ व्रत, इतर निगोद के ७ व्रत, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु के ७-७ व्रत ऐसे ४२ व्रत होंगे। इनमें सात-सात व्रतों में वहीं मंत्र ७-७ बार लिया जायेगा। ऐसे वनस्पतिकायिक के १० व्रतों में वनस्पतिकायिक का ही मंत्र दश व्रतों में होगा। ऐसे ही सभी में समझना। ऐसे ८४ व्रत हो जाते हैं।

जघन्यविधि में इन चौदह मंत्रों के चौदह व्रत भी कर सकते हैं। अपनी शक्ति के अनुसार व्रत में उत्कृष्ट विधि में उपवास करना है। मध्यम विधि में अल्पाहार, जल, रस, दूध, फल आदि लेकर करना चाहिए तथा जघन्य विधि में दिन में एक बार शुद्ध भोजन करके अर्थात् ‘एकाशन’ करके भी व्रत किया जा सकता है। व्रत के दिनों में अर्हंत भगवान की अथवा चौबीसी तीर्थंकरों की प्रतिमा का या किन्हीं एक भी तीर्थंकर भगवान की प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक करें। पुन: चौबीस तीर्थंकर पूजा या अर्हंत पूजा करके जाप्य करें। मंत्र की १०८ जाप्य में सुगंधित पुष्प या लवंग या पीले पुष्पों से अथवा जपमाला से भी मंत्र जप सकते हैं। व्रत के दिन पूजा व मंत्र जाप्य आवश्यक है। इस व्रत के करने से क्रम-क्रम से संसार के भी उत्तम-उत्तम सुख प्राप्त होंगे पुन: चतुर्गति के दु:खों से छुटकारा प्राप्त कर नियम से २-४ आदि भवों में अपनी आत्मा को परमात्मा बनाकर सिद्धशिला को प्राप्त करना है। समुच्चय मंत्र- ॐ ह्रीं चतुरशीतिलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:। (इन छह मंत्रों में से १-१ मंत्र सात-सात व्रतों में जपना है)

१. ॐ ह्रीं नित्यनिगोदजीवानां सप्तलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:।

२. ॐ ह्रीं इतरनिगोदजीवानां सप्तलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:।


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चलो सब मांगीतुंगी चलो


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चलो भक्तों चलो , मांगीतुंगी चलो ,जाकर दर्शन किया तो मजा आ गया |
बड़े बाबा के दर ,बड़ी माता के दर , जाकर दर्शन किया तो मजा आ गया |

🕉भारत गौरव 🌹ऋषभगिरी प्रणेता, वत्सल्यमूर्ति💐परम पूज्य गणिनीप्रमुख 💎🌈🕉आर्यिकारत्न 1⃣0⃣5⃣ श्री ज्ञानमती माताजी एवं प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ससंघ* *मांगीतुंगी में विराजमान है।

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पूज्य गुरु माँ के सानिध्य में ऋषभगिरी एवं ऋषभदेवपुरम मांगीतुंगी में 1⃣0⃣8⃣ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा का द्वितीय प्रतिष्ठापना महोत्सव विभिन्न कार्यक्रम के साथ आयोजित किया गया है।

-मंगलकार्यक्रम-

२२ जनवरी, प्रात: ९ बजे - झण्डारोहण
🌈💎🌹🌈💎🌹🌈💎🌹🌈👏
२६ जनवरी, प्रात: ६ बजे - अभिषेक, शांतिधारा
२६ जनवरी, मध्यान्ह २ बजे - भगवान ऋषभदेवमण्डलविधान

🌈💐👭👫👬🌹🌷💐🙏🌈👏
२७ जनवरी, प्रात: ९ बजे - १०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा के चरणों का अभिषेक एवं वृहद् शांतिधारा
२७ जनवरी, रात्रि ७ बजे -सांस्कृतिक कार्यक्रम

🌈👏🙏🌈👏🙏🌈👏🙏🌈👏
२८ जनवरी, प्रात: ६ से ७ बजे -नवग्रह के ९ तीर्थंकर भगवन्तों का वृहद् पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा
२८ जनवरी, प्रात: ९ बजे - १०८ फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा के चरणों का अभिषेक एवं वृहद् शांतिधारा
२८ जनवरी, मध्यान्ह ३ बजे -प्रतिष्ठापना महोत्सव की धर्मसभा एवं १०८ थाल से पूजन


आप सभी अधिक से अधिक पधारकर धर्म लाभ लेवे ऐसा निवेदन है |
सेमिनार


सेमिनार की परिभाषा मेरी दृष्टि में

मुम्बई में २३ से २५ जुलाई २०१७ तक आयोजित

National Seminar On Jain Dharma
में आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने
सेमिनार-SEMINAR
का हिन्दी-अंग्रेजी में विवरण निम्न प्रकार से

बताकर विद्वानों को आनंद विभोर कर दिया-
आर्यिका श्री चंदनामती माताजी
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से - सेवा धर्म समाज की, आगम के अनुकूल।

यही प्रमुख उद्देश्य है, जैनधर्म का मूल।।१।।
मि - मिलकर धर्मप्रभावना, करो सभी विद्वान।
वर्गोदय को तज करें, सर्वोदय उत्थान।।२।।
ना - नाम से नहिं गुण से सहित, णमोकार हैं मंत्र।
इसका खूब प्रचार हो, नमूँ परमपद पंच।।३।।
- रत्न तीन जग में कहे, देव शास्त्र गुरु धाम।

रत्नत्रय इनसे मिलें, इन पद करें प्रणाम।।४।।
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कतिपय ऐतिहासिक प्रमुख तीर्थ


यहाँ कुछ प्रमुख ऐतिहासिक तीर्थों से आपको परिचित कराया जा रहा है। इन तीर्थों को दो भागों में विभक्त किया गया है-(१) उत्तर भारत के तीर्थ (२) दक्षिण भारत के तीर्थ। प्रथमत: आप पढ़ेंगे उत्तर भारत के तीर्थों के बारे में-

उत्तर भारत के प्रमुख ऐतिहासिक तीर्थ

उत्तरप्रदेश-उत्तराखंड-

ऋषभांचल-

ऋषभांचल अतिशय तीर्थक्षेत्र है। यहाँ भव्य जिनालय हैं। यात्रियों के आवास व भोजन की सुविधा है। यह स्थान दिल्ली-मेरठ मुख्य मार्ग पर अवस्थित है। यहाँ समय-समय पर ध्यान योग शिविरों का आयोजन किया जाता है। प्रतिवर्ष विकलांग एवं नेत्र शिविर और धार्मिक शिविर लगते हैं। यात्रियों की सुविधार्थ आवास और भोजन की व्यवस्था है।

बड़ागाँव-

यहाँ भव्य जिनालय में भगवान पाश्र्वनाथ की मूलनायक प्रतिमा अतिशयकारी एवं प्राचीन है। यहाँ मनौती मनाने वाले भक्तों की भीड़ रहती है। यात्रियों की सुविधार्थ आवास व भोजन की समुचित व्यवस्था है। यह स्थान दिल्ली-सहारनपुर रोड व रेल लाइन पर खेकड़ा स्टेशन से जुड़ा है। वहाँ रोड के तिराहे और स्टेशन पर जीप-टैम्पो उपलब्ध रहते हैं। मंदिर की बस भी मिलती है। यहाँ अनेक नवनिर्माण हो रहे हैं।

.और देखें

पढ़ें- हस्तिनापुर में जन्मे तीर्थंकरों के परिचय


महानुभावों! आज मैं आपको तीन तीर्थंकरों-सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ, सत्रहवें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ एवं अट्ठारहवें तीर्थंकर भगवान अरनाथ के जीवन से परिचित कराती हूँ जिनके गर्भ-जन्म-तप और ज्ञान ये चार-चार कल्याणक हस्तिनापुर की पावन धरती पर हुए तथा सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ये तीनों ही महापुरुष तीर्थंकर होने के साथ ही साथ चक्रवर्ती और कामदेवपद के भी धारी हुए हैं।

सर्वप्रथम आप जाने भगवान शांतिनाथ का जीवन परिचय-

कुरुजांगल देश की हस्तिनापुर राजधानी में कुरुवंशी राजा विश्वसेन राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम ऐरावती था। भगवान शांतिनाथ के गर्भ में आने के छह महीने पहले से ही इन्द्र की आज्ञा से हस्तिनापुर नगर में माता के आंगन में रत्नों की वर्षा होने लगी और श्री, ह्री, धृति आदि देवियाँ माता की सेवा में तत्पर हो गर्इं। भादों वदी सप्तमी के दिन भरणी नक्षत्र में रानी ने गर्भ धारण किया। उस समय स्वर्ग से देवों ने आकर तीर्थंकर महापुरुष का गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया और माता-पिता की पूजा की।

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अष्टसहस्री पढ़ें


  • 🌸🌸📖जैन न्याय के सर्वोच्च ग्रंथ " _अष्टसहस्री_ " के अध्ययन का स्वर्णिम अवसर देखें पारस चैनल प्रतिदिन प्रातः 6 से 7 बजे तक अष्टसहस्री ग्रंथराज का पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के मुखारविंद से अध्यापन एव खोलकर स्वाध्याय करें .
वृहत्पल्य व्रत विधि


वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत की तिथियाँ, व्रतों के नाम एवं माहात्म्य

तिथि व्रत का नाम फल

पौष कृष्णा ३ पंक्तिमान छह पल्य उपवास

पौष कृष्णा १२ सूर्य सात पल्य उपवास

पौष सुदी ५ पराक्रम नौ पल्य उपवास

पौष सुदी ११ जयपृथु दस पल्य उपवास

माघ कृष्णा २ अजित आठ पल्य उपवास

माघ कृष्णा ५ स्वयंप्रभ ग्यारह पल्य उपवास

माघ कृष्णा १५ रत्नप्रभ बारह पल्य उपवास

माघ सुदी ४ चतुर्मुख तेरह पल्य उपवास

माघ सुदी ७ शील चौदह पल्य उपवास

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चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण स्तुति


चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण स्तुति

चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत करने वाले महानुभाव इस स्तुति को अवश्य पढ़े
-आर्यिका चन्दनामती
तर्ज-सन्त साधु बनके बिचरूँ..........

मनुज तन से मोक्ष जाने की घड़ी कब आएगी
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।टेक.।।

जैसे सागर में रतन का एक कण गिर जावे यदि।
खोजने पर भी है दुर्लभ वह भी मिल जावे यदि।।
किन्तु भव सागर में गिर आत्मा नहीं तिर पाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।१।।

कहते हैं चौरासि लख योनी में काल अनादि से।
जीव भ्रमता रहता है चारों गति पर्याय में।।
एक बस मानुष गति शिव सौख्य को दिलवाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।२।।

एक इन्द्रिय की बयालिस लाख योनी मानी हैं।
नित्य-इतर निगोद-पृथ्वी-अग्नि-जल और वायु हि हैं।।
इनमें जाकर के कभी नहिं देशना मिल पाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।३।।

वनस्पतिकायिक की भी दस लाख योनि कहीं गर्इं।
ये सभी मिथ्यात्व बल से योनियाँ मिलती रहीं।।
इनमें ना जाऊँ यदि सम्यक्त्व बुद्धि आएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।४।।

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फोटोज


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ऋषभदेव भगवान


कृतयुग की आदि में अंतिम कुलकर महाराजा नाभिराज हुए हैं। उनकी महारानी मरुदेवी की पवित्र कुक्षि से इस युग के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म हुआ है। वैदिक परम्परा में इन्हें अष्टम अवतार माना गया है। ऋषभदेव के दो रानियाँ थीं-यशस्वती और सुनन्दा। यशस्वती के भरत, वृषभसेन आदि सौ पुत्र हुए और ब्राह्मी नाम की कन्या हुई हैं। सुनन्दा ने बाहुबली नाम के एक पुत्र को और सुंदरी नाम की कन्या को जन्म दिया। वृषभदेव ने ब्राह्मी और सुन्दरी इन दोनों पुत्रियों को सर्वप्रथम विद्याभ्यास कराया। दाहिनी तरफ बैठी हुई ब्राह्मी को अपने दाहिने हाथ से ‘अ आ इ ई’ सिखाई और बायीं तरफ बैठी हुई सुन्दरी को १, २, ३ आदि संख्याएँ लिखकर गणित विद्या सिखाई। ऋषभदेव ने स्वयं ही इन दोनों कन्याओं को सर्व विद्याओं में पारंगत करके साक्षात् सरस्वती का अवतार बना दिया। इसी तरह भरत, बाहुबली आदि एक सौ एक पुत्रों को भी सर्व विद्याओं में, सर्व कलाओं में, सर्व शास्त्रों और शस्त्रों में भी निष्णात बना दिया। ऋषभदेव ने प्रजा को असि, मसि आदि षट् क्रियाओं का उपदेश दिया जिससे प्रजा उन्हें युगादि पुरुष, युगस्रष्टा, विधाता, प्रजापति आदि नामों से पुकारने लगी। किसी समय ऋषभदेव राजपाट से विरक्त हो वन को जाने लगे तब उन्होंने भरत को अयोध्या का राज्य सौंपा और बाहुबली को पोदनपुर का अधिकारी बनाया। इसी तरह अन्य निन्यानवे पुत्रों को भी अन्य देशों का राज्य देकर आप मुनिमार्ग को बतलाने के लिए निग्र्रन्थ दिगम्बर मुनि हो गये।

अनेक वर्षों बाद भरत महाराज के दरबार में एक साथ तीन संदेशवाहक आते हैं। एक कहता है-राजन्! आपके पूज्य पिता ऋषभदेव को केवलज्ञान प्रगट हुआ है। दूसरा कहता है-राजाधिराज! आपकी आयुधशाला में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ है पुन: तीसरा समाचार पुत्ररत्न की उत्पत्ति का आता है। इन हर्षवर्धक तीनों समाचारों को एक साथ सुनकर भरतराज मन में विचार करने लगे कि पहले कौन सा उत्सव मनाना चाहिए। पुन: वे सोचते हैं पहले केवलज्ञान उत्सव की पूजा करना अत: वे भगवान ऋषभदेव के समवसरण में पहुँचकर भगवान की पूजा करके दिव्य उपदेश श्रवण करते हैं। उसी समय भरत के तीसरे भाई वृषभसेन आकर दीक्षा लेकर भगवान के प्रथम गणधर हो जाते हैं। बहन ब्राह्मी-सुन्दरी भी आर्यिका दीक्षा लेकर आर्यिकाओं में प्रमुख बन जाती हैं।

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गुणस्थान सम्बन्धी प्रश्नोत्तरी


प्रश्न १. गुणस्थान किसे कहते हैं ?

उत्तर—मोह और योग के निमित्त से होने वाले आत्मा के अन्तरंग परिणामों को गुणस्थान कहते हैं। गुणस्थान आत्मविकास का दिग्दर्शक हैं। यह एक प्रकार का थर्मामीटर है। जैसे ज्वाराक्रान्त रोगी का तापमान थर्मामीटर व्दारा मापा जाता है, उसी प्रकार आत्मा का आध्यात्मिक विकास या पतन गुणस्थान रूपी थर्मामीटर व्दारा मापा जाता है।

प्रश्न २. गुणस्थान कितने होते हैं ?

उत्तर—गुणस्थान चौदह होते हैं जो निम्न हैं—

  1. मिथ्यात्व
  2. सासादन
  3. मिश्र या सम्यग्मिथ्यात्व
  4. अविरत सम्यक्त्व
  5. देशविरत या संयमासंयम
  6. प्रमत्तसंयत
  7. अप्रमत्तसंयत
  8. अपूर्वकरण
  9. अनिवृत्तिकरण
  10. सूक्ष्मसांपराय
  11. उपशांतमोह
  12. क्षीणमोह
  13. सयोगकेवली
  14. अयोगकेवली।

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स्वसमय और परसमय


स्वसमय और परसमय -

त्रिशला-जीजी! आज तुमने जो आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के द्वारा किये गये समयसार के उपदेश में स्वसमय-परसमय का विवेचन सुना है, उसे हमें एक बार पुन: समझाओ?

मालती-सुनो! मैं विस्तृत विवेचन के साथ तुम्हें समझाती हूँ।

जीवो चरित्तदंसणणाणट्ठिउ तं हि ससमयंजाण।

पुग्गलकम्म पदेशट्ठियं च तं जाण परसमयं।।

अर्थात् जो जीव दर्शन, ज्ञान और चारित्र में स्थित रहा है, हे शिष्य! उसे तुम निश्चय से स्वसमय जानो और जो जीव पुद्गल कर्म के प्रदेशों में स्थित है, उसे तुम परसमय जानो।’’

तात्पर्यवृत्ति नाम की टीका में श्री जयसेनाचार्य ने पहले जीव का लक्षण बतलाया है कि जो शुद्धनिश्चयनय से शुद्ध-बुद्ध एक स्वभावरूप निश्चयप्राण के द्वारा उसी प्रकार अशुद्धनिश्चयनय से क्षायोपशमिक (मति, श्रुतज्ञान, चक्षु, अचक्षुदर्शनरूप) अशुद्ध भाव प्राणों के द्वारा और असद्भूतव्यवहारनय की अपेक्षा से यथासंभव द्रव्य प्राणों से जीता है, जीवेगा और भूतकाल में जीता था, वह जीव कहलाता है। इस कथन की दृष्टि से देखा जाये, तो सभी जीव शुद्धनिश्चयनय से शुद्ध, बुद्ध एक चैतन्यस्वरूप ही हैं। चाहे वे एकेन्द्रिय हों या अभव्यजीव हों।

त्रिशला-तो क्या मेरी आत्मा भी शुद्ध है?

मालती-हाँ! अवश्य, हमारी-तुम्हारी सभी की आत्माएँ शुद्ध निश्चयनय से शुद्ध ही हैं, इसमें कोई भी संदेह नहीं है। यही जीव जब मुनि अवस्था में पहुँचकर ध्यान में स्थित होता है, उस समय विशुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वभाव वाले अपनी परमात्मा में जो रुचि है, वह सम्यग्दर्शन है, उसी निज परमात्मा में जो रागादि स्वसंवेदन ज्ञान है, वही सम्यग्ज्ञान है, तथैव उसी निज परमात्मा में निश्चल अनुभूतिरूप जो अवस्था है, वही वीतराग चारित्र है। इन उपर्युक्त लक्षण वाले निश्चयरत्नत्रय अथवा अभेदरत्नत्रय के द्वारा परिणत हुए जीव पदार्थ को हे शिष्य! तुम स्वसमय जानो और जो कर्मोदय से जनित नर-नारकादि अवस्थाएँ हैं, पूर्वोक्त निश्चयरत्नत्रय के अभाव से जब जीव उसमें स्थित रहता है, तब उसे परसमय जानो। इसका निष्कर्ष यह निकला कि चतुर्थ, पंचम और छठे गुणस्थानवर्ती मुनि भी निश्चयरत्नत्रय में स्थित नहीं हैं अत: वे परसमय ही हैं किन्तु सातवें गुणस्थान से लेकर आगे के जीव जब वीतराग निर्विकल्प ध्यान में स्थित होते हैं, तभी वे स्वसमयरूप कहलाते हैं।


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आज का दिन - २३ जनवरी २०१८ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक २३ जनवरी,२०१८
तिथी- माघ शुक्ल ६
दिन-मंगलवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७४

सूर्योदय ०७.१२
सूर्यास्त १८.०३

भगवान विमलनाथ - ज्ञान कल्याणक

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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


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