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ॐ ह्रीं शनिग्रहारिष्टशांतिकराय श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय नम:।

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ
श्रवणबेलगोला 12 फरवरी भाग-1
श्रवणबेलगोला 12 फरवरी भाग-2
श्रवणबेलगोला 12 फरवरी भाग-3

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मस्तकाभिषेक 2018
भगवान बाहुबली

भगवान बाहुबली

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भरत चक्रवर्ती छ: खण्ड की दिग्विजय करके आ रहे थे। उनका चक्ररत्न अयोध्या के बाहर ही रुक गया। मंत्रियों ने बताया कि महाराज आपके भाई आपके वश में नहीं हैं। चक्रवर्ती ने दूत को अपने अट्ठानवे भाइयों के पास भेज दिया। उन लोगों ने भगवान ऋषभदेव के पास जाकर मुनि दीक्षा ले ली। पुन: भरत ने एक दूत बाहुबली के पास भेजा। बाहुबली भी चक्रवर्ती के अधीन नहीं हुए। तब दोनों तरफ से युद्ध की तैयारियाँ हो गर्इं।
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चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत
चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत
-गणिनी ज्ञानमती

व्रत विधि-अनादिकाल से सभी संसारी प्राणी चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते आ रहे हैंं। उन चौरासी लाख योनि के भ्रमण से छूटने के लिए यह ‘‘चौरासी लाख योनिभ्रमण निवारण व्रत’’ है। इसके करने से व प्रतिदिन इन योनियों के भ्रमण से छूटने की भावना करते रहने से अवश्य ही हम और आप इन संसार परिभ्रमण के दु:खों से छुटकारा प्राप्त करेंगे।

इन चौरासी लाख योनियों का विवरण इस प्रकार है-१. नित्य निगोद, २. इतरनिगोद, ३. पृथ्वीकायिक, ४. जलकायिक, ५. अग्निकायिक व ६. वायुकायिक इन एकेन्द्रिय जीवों के प्रत्येक की सात-सात लाख योनियां मानी गयी हैं। अत: ६²७·४२ लाख योनियाँ हुई हैं। पुन: वनस्पतिकायिक की दश लाख योनियाँ हैं। पुन: विकलत्रय अर्थात् दो इंन्द्रिय, तीन इन्द्रिय व चार इन्द्रिय जीवों की प्रत्येक की दो-दो लाख योनियाँ हैं। अत: ३²२·६ लाख भेद हुए। पुन: देव, नारकी व पंचेन्द्रिय तिर्यंचों की चार-चार लाख योनियाँ हैं। ये ३²४·१२ लाख हुए। पुन: मनुष्यों की चौदह लाख योनियाँ हैं। इस प्रकार (४२०००००±१००००००±६०००००±१२०००००± १४०००००·८४०००००) योनियों के भेद हैं। इनके संक्षेप मेें १४ प्रकार से विभाजित चौदह मंत्र दिये गये हैं। उत्कृष्ट विधि यह है कि नित्यनिगोद के सात लाख योनियों का एकमंत्र है। इसके सात व्रत करना, ऐसे ही इतर निगोद के सात, पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुकायिक के भी ७-७ व्रत करने से ४२ व्रत हो जाते हैं। ऐसे ही वनस्पतिकायिक के १० व्रत करने से १० हुए। ऐसे ही दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय व चार इन्द्रिय के २-२ व्रत करने से ६ व्रत होते हैं। पुन: देव, नारकी व पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के ४-४ व्रत करने से १२ हुए एवं मनुष्यों की चौदह लाख के १-१ व्रत से १४ व्रत हुए। इस प्रकार ४२±१०±६±१२±१४·८४ व्रत हो जाते हैं। इनमें नित्य निगोद के ७ व्रत, इतर निगोद के ७ व्रत, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु के ७-७ व्रत ऐसे ४२ व्रत होंगे। इनमें सात-सात व्रतों में वहीं मंत्र ७-७ बार लिया जायेगा। ऐसे वनस्पतिकायिक के १० व्रतों में वनस्पतिकायिक का ही मंत्र दश व्रतों में होगा। ऐसे ही सभी में समझना। ऐसे ८४ व्रत हो जाते हैं।

जघन्यविधि में इन चौदह मंत्रों के चौदह व्रत भी कर सकते हैं। अपनी शक्ति के अनुसार व्रत में उत्कृष्ट विधि में उपवास करना है। मध्यम विधि में अल्पाहार, जल, रस, दूध, फल आदि लेकर करना चाहिए तथा जघन्य विधि में दिन में एक बार शुद्ध भोजन करके अर्थात् ‘एकाशन’ करके भी व्रत किया जा सकता है। व्रत के दिनों में अर्हंत भगवान की अथवा चौबीसी तीर्थंकरों की प्रतिमा का या किन्हीं एक भी तीर्थंकर भगवान की प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक करें। पुन: चौबीस तीर्थंकर पूजा या अर्हंत पूजा करके जाप्य करें। मंत्र की १०८ जाप्य में सुगंधित पुष्प या लवंग या पीले पुष्पों से अथवा जपमाला से भी मंत्र जप सकते हैं। व्रत के दिन पूजा व मंत्र जाप्य आवश्यक है। इस व्रत के करने से क्रम-क्रम से संसार के भी उत्तम-उत्तम सुख प्राप्त होंगे पुन: चतुर्गति के दु:खों से छुटकारा प्राप्त कर नियम से २-४ आदि भवों में अपनी आत्मा को परमात्मा बनाकर सिद्धशिला को प्राप्त करना है। समुच्चय मंत्र- ॐ ह्रीं चतुरशीतिलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:। (इन छह मंत्रों में से १-१ मंत्र सात-सात व्रतों में जपना है)

१. ॐ ह्रीं नित्यनिगोदजीवानां सप्तलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:।

२. ॐ ह्रीं इतरनिगोदजीवानां सप्तलक्षयोनिपरिभ्रमणविनाशकाय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:।


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न्यायसार
तत्त्व समीक्षा: तत्त्व विचार

चार्बाक पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु इन चार भूतों को ही चार तत्त्व मानता है इन भूत चतुष्टय से ही आत्मा इन्द्रिय ज्ञान और मन आदि की उत्पत्ति मानता है इसलिए जड़वादी है।

बौद्ध कहता है कि आकाश, चित्त संतान की उत्पत्ति तथा चित्तसंतान की उच्छित्ति ये तीन तत्त्व असंस्कृत तथा नित्य है। बाकी सब तत्व संस्कृत, क्षणिक, कर्ता से रहित हैं। (विश्व तत्त्व.पृ. २८५)

एवं इनके यहां रूप, वेदना, विज्ञान, संज्ञा और संस्कार ये पांच स्कंध माने गये हैं, इन पांच स्कंधों से ही सब कार्य होते हैं। और तो क्या इनके समूह से ही इन्होंने आत्मा की उत्पत्ति मानी है। जब तक इनकी समष्टि रहती है तभी तक मनुष्य का अस्तित्व रहता है। इस संघात के अतिरिक्त आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है। (भारतीयद. पृ.९०)


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ज्ञानमती माताजी का गृह त्याग और क्षुल्लिका जीवन

मेरी स्मृतियाँ ग्रंथ

बहुत दिनों पूर्व जब मैं छोटी थी और कैलाश भी ५-७ वर्ष का छोटा सा ही था तब मैंने एक दिन उसे कुछ समझाकर कहा था कि-
‘‘देखो कैलाश! तुम मेरे सच्चे भाई तब हो, कि जब मेरे समय पर मेरे काम आओ, अतः कभी यदि किसी समय मैं तुमसे कुछ मेरा विशेष काम कहूँ तो अवश्य ही कर देना।’’
कैलाश ने भी मेरी बात मान ली और तब मैंने उस छोटी सी वय में ‘‘वचन’’ ले लिया था।
उस समय वह वचन मुझे याद आ गया था अतः मैंने कैलाश को एकांत में बुलाया और वह पुराना वचन याद दिलाते हुए कहा-
‘‘भैया कैलाश! आज तुम मेरा एक काम कर दो बस मैं कृतार्थ हो जाऊँगी।’’
कैलाश ने जिज्ञासा व्यक्त की-‘‘कौन सा काम जीजी.......?’’
मैंने कहा-‘‘तुम मेरे साथ बाराबंकी चले चलो। देखो! मुझे अकेली तो भेज नहीं सकते हैं अतः तुम्हें मेरे साथ चलना पड़ेगा.....।’’
कैलाश पहले तो कुछ हिचकिचाया, फिर उस वचन को याद कर बोला-
‘‘अच्छा जीजी! मैं चलूँगा.....।’’
मैं रात भर महामंत्र का स्मरण करती रही। मुझे नींद तो बिल्कुल ही न के बराबर आई थी।
ब्रह्ममुहूर्त में चार बजे उठी, महामंत्र जपा और सोते हुए तथा पकड़ कर मेरे को चिपके हुए रवीन्द्र को धीरे-धीरे अपने से अलग किया।
उसके माथे पर प्यार का, दुलार का हाथ फेरकर उसे अपना अन्तिम भगिनीस्नेह दिया और मैं धीरे से खटिया से नीचे उतर आई।
धीरे-धीरे ही नीचे जाकर सामायिक, स्नान आदि से निवृत्त होकर मन्दिर के दर्शन करने चली गई। वहाँ जाकर प्रभु पार्श्वनाथ की प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर खड़ी होकर प्रार्थना करने लगी-

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जैन कहानियाँ

शीलधुरंधर सेठ सुदर्शन

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मुनिराज उस निर्जन वन में एक शिला पर योगमुद्रा में स्थित है । आगम के प्रकाश में अंतःचक्षु के द्वारा वे अपनी आत्मा को देखने का प्रयत्न कर रहे है । ऐसी भयंकर शीत ऋतु में वे नग्न दिगम्बर मुनि धैर्यरूपी कंबल ओढ़ रहे है और आत्मा को अपने शरीर से भिन्न समझकर मन को एकाग्र करने के पुरूषार्थ में तन्मय है । इधर सुभग ग्वाला निकलता है खुले बदन बैठे हुए महासाधु को देख कर मन में सोचने लगता है-

अहो ! ये महात्मा कैसे है इनके पास न लंगोटी है न चादर, ऐसी भयंकर ठंढी में जहाँ घर में बैठकर कंबल में मुह छिपाकर भी दात कड़-कड़ करते है । बाहर निकलते ही हाथ पैर कंपते है । ओह ! सूर्य अस्त हो चुका है, रात्रि पिशाचिनी अपने अंधेरे से सबको ग्रसित करने वाली है । अभी कुछ ही क्षण बाद पसारा भी नहीं दीखेगा । ठंडी- ठंडी हवा चल रही है, अभी तुषार के कण गिरने लगेंगे और देखते ही देखते बरसात के समान वृक्षों के पत्तो से पानी टपकने लगेगा । सुबह होने तक कुहरा छाया रहेगा । बिना वस्त्र के ये बेचारे महात्मा आज की रात कैसे पूरी करेंगें ऐसी ठंडी झेलकर कैसे जीवित रह सकेंगें ?


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जैनधर्म एवं भगवान ऋषभदेव
नम: ऋषभदेवाय, धर्मतीर्थप्रवर्तिने।
सर्वा विद्या-कला, यस्मा-दाविर्भूता महीतले।।१।।

जहाँ यह जीव संसरण करता है, चतुर्गति में परिभ्रमण करता है, उसका नाम ‘‘संसार’’ है। यह संसार ‘‘लोक’’ नाम से भी कहा जाता है-

‘‘लोक्यन्ते’’ अवलोक्यन्ते जीवादिषड्द्रव्याणि अस्मिन्निति लोक:’’

जहाँ पर जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छहों द्रव्य देखे जाते हैं वह लोक है। वह लोक अकृत्रिम, अनादिनिधन है एवं स्वभाव से बना हुआ है, अर्थात् इसे किसी ने बनाया नहीं है। श्री नेमिचंद्रसिद्धान्तचक्रवर्ती कहते हैं-

लोगो अकिट्टिमो खलु, अणाइणिहणो सहावणिव्वत्तो।
जीवाजीवेहिं पुडो, सव्वागासवयवो णिच्चो ।।४।

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अष्टसहस्री पढ़ें
  • 🌸🌸📖जैन न्याय के सर्वोच्च ग्रंथ " _अष्टसहस्री_ " के अध्ययन का स्वर्णिम अवसर देखें पारस चैनल प्रतिदिन प्रातः 6 से 7 बजे तक अष्टसहस्री ग्रंथराज का पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के मुखारविंद से अध्यापन एव खोलकर स्वाध्याय करें .
बाहुबली चरित्र (काव्य)
वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत की तिथियाँ, व्रतों के नाम एवं माहात्म्य

तिथि व्रत का नाम फल

पौष कृष्णा ३ पंक्तिमान छह पल्य उपवास

पौष कृष्णा १२ सूर्य सात पल्य उपवास

पौष सुदी ५ पराक्रम नौ पल्य उपवास

पौष सुदी ११ जयपृथु दस पल्य उपवास

माघ कृष्णा २ अजित आठ पल्य उपवास

माघ कृष्णा ५ स्वयंप्रभ ग्यारह पल्य उपवास

माघ कृष्णा १५ रत्नप्रभ बारह पल्य उपवास

माघ सुदी ४ चतुर्मुख तेरह पल्य उपवास

माघ सुदी ७ शील चौदह पल्य उपवास

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चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण स्तुति

चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण स्तुति

चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत करने वाले महानुभाव इस स्तुति को अवश्य पढ़े
-आर्यिका चन्दनामती
तर्ज-सन्त साधु बनके बिचरूँ..........

मनुज तन से मोक्ष जाने की घड़ी कब आएगी
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।टेक.।।

जैसे सागर में रतन का एक कण गिर जावे यदि।
खोजने पर भी है दुर्लभ वह भी मिल जावे यदि।।
किन्तु भव सागर में गिर आत्मा नहीं तिर पाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।१।।

कहते हैं चौरासि लख योनी में काल अनादि से।
जीव भ्रमता रहता है चारों गति पर्याय में।।
एक बस मानुष गति शिव सौख्य को दिलवाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।२।।

एक इन्द्रिय की बयालिस लाख योनी मानी हैं।
नित्य-इतर निगोद-पृथ्वी-अग्नि-जल और वायु हि हैं।।
इनमें जाकर के कभी नहिं देशना मिल पाएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।३।।

वनस्पतिकायिक की भी दस लाख योनि कहीं गर्इं।
ये सभी मिथ्यात्व बल से योनियाँ मिलती रहीं।।
इनमें ना जाऊँ यदि सम्यक्त्व बुद्धि आएगी।
हे प्रभो! पर्याय मेरी कब सफल हो पाएगी।।४।।

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संस्कृत साहित्य के विकास

जैनधर्म के अनुसार तीर्थंकर महापुरुषों की दिव्यध्वनि सात सौ अठारह भाषाओं में परिणत हुई मानी गई है इनमें से अठारह महाभाषाएं मानी गई हैं और सात सौ लघु भाषा हैं। उन महाभाषाओं के अन्तर्गत ही संस्कृत और प्राकृत को सर्वप्राचीन एवं प्रमुख भाषा के रूप में स्वीकृत किया जाता है। संस्कृत जहाँ एक परिष्कृत, लालित्यपूर्ण भाषा है वहीं उसे साहित्यकारों ने ‘देवनागरी’ भाषा कहकर सम्मान प्रदान किया है। अनेक साहित्यकारों द्वारा समय-समय पर इस भाषा में गद्य, पद्य व मिश्रित चम्पू साहित्य लिखकर प्राचीन महापुरुषों और सतियों के चारित्र से लोगों को परिचित कराया है।

इसी श्रृंंखला में बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्धकाल एक नई क्रांति के साथ प्रारंभ होकर अनेक साहित्यिक उपलब्धियों के साथ समाज की ओर अग्रसर है। सदैव उत्कृष्ट त्याग, ज्ञान व वैराग्य में प्रसिद्ध जैन समाज में उच्च कोटि के मनीषी लेखक के रूप में आचार्य श्री गुणभद्र स्वामी, कुन्दकुन्द, यतिवृषभ, पूज्यपाद आदि दिगम्बर जैनाचार्यों ने सिद्धान्त, न्याय, अध्यात्म, पुराण आदि ग्रंथ प्राकृत और संस्कृत भाषा में लिखकर जिज्ञासुओं को प्रदान किये किन्तु न जाने किस कारण से विदुषी गणिनी आर्यिका पद को प्राप्त दिगम्बर जैन साध्वियों के द्वारा लिखित कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं होता है। लगभग ढाई सहस्राब्दियों के इतिहास की साक्षी से तो साध्वियों ने ग्रंथलेखन नहीं किया अन्यथा देश के किसी संग्रहालय या पुस्तकालय में उनके कुछ अवशेष तो अवश्य प्राप्त होते।

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सती मनोवती की दर्शनप्रतिज्ञा

सेठ हेमदत्त के घर की सजावट किसी राजमहल से कम नहीं दिख रही है, कहीं पर मोतियों की झालरें लटक रही हैं, कहीं पर मखमल के चंदोये बंधे हैं। दरवाजों-दरवाजों पर सुन्दर-सुन्दर रत्नों से जड़े हुए तोरण बंधे हुए हैं। कहीं पर रंग-बिरंगी काँच के झरोखे से छन-छन कर आती हुई सूर्य की किरणें इन्द्रधनुष की आभा बिखेर रही हैं तो कहीं पर रेशमी पर्दे आकाशगंगा के समान लहरा रहे हैं। घर और बाहर का भाग चारों तरफ से नगर के नर-नारियों से खचाखच भरा हुआ है। सेठानी हेमश्री आज खुशी से फूली नहीं समा रही हैं, सो ठीक ही है उसके लाडले सातवें पुत्र बुद्धिसेन की शादी होकर घर में अतिशय रूपवती बहू आई हुई है। आज सेठ जी के यहाँ जीमनवार है। बल्लभपुर शहर के सभी स्त्री-पुरुष प्रसन्नमुख दिख रहे हैं, कोई जीमकर जा रहे हैं और कोई आ रहे हैं। गली-गली में धूम मची हुई है। सभी के मुख पर एक ही चर्चा है कि भाई! हेमदत्त सेठ का आखिरी संबंध बहुत अच्छा हुआ है उन्हें बहुत अच्छे समधी मिले हैं। हस्तिनापुर के सेठ महारथ बावन करोड़ दीनारों के धनी हैं, उनकी सुपुत्री मनोवती बहुत ही सुशील कन्या है। उसने भी पूर्वजन्म में महान् पुण्य अर्जित किया होगा जो उसे ऐसा घर और वर मिला है, क्या सुन्दर अनुरूप जोड़ी है?

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गुणस्थान सम्बन्धी प्रश्नोत्तरी

प्रश्न १. गुणस्थान किसे कहते हैं ?

उत्तर—मोह और योग के निमित्त से होने वाले आत्मा के अन्तरंग परिणामों को गुणस्थान कहते हैं। गुणस्थान आत्मविकास का दिग्दर्शक हैं। यह एक प्रकार का थर्मामीटर है। जैसे ज्वाराक्रान्त रोगी का तापमान थर्मामीटर व्दारा मापा जाता है, उसी प्रकार आत्मा का आध्यात्मिक विकास या पतन गुणस्थान रूपी थर्मामीटर व्दारा मापा जाता है।

प्रश्न २. गुणस्थान कितने होते हैं ?

उत्तर—गुणस्थान चौदह होते हैं जो निम्न हैं—

  1. मिथ्यात्व
  2. सासादन
  3. मिश्र या सम्यग्मिथ्यात्व
  4. अविरत सम्यक्त्व
  5. देशविरत या संयमासंयम
  6. प्रमत्तसंयत
  7. अप्रमत्तसंयत
  8. अपूर्वकरण
  9. अनिवृत्तिकरण
  10. सूक्ष्मसांपराय
  11. उपशांतमोह
  12. क्षीणमोह
  13. सयोगकेवली
  14. अयोगकेवली।

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बाहुबली भगवान

बाहुबली भगवान-

कृतयुग की आदि में अंतिम कुलकर महाराजा नाभिराज हुए हैं। उनकी महारानी मरुदेवी की पवित्र कुक्षि से इस युग के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म हुआ है। वैदिक परम्परा में इन्हें अष्टम अवतार माना गया है। ऋषभदेव के दो रानियाँ थीं-यशस्वती और सुनन्दा। यशस्वती के भरत, वृषभसेन आदि सौ पुत्र हुए और ब्राह्मी नाम की कन्या हुई हैं। सुनन्दा ने बाहुबली नाम के एक पुत्र को और सुंदरी नाम की कन्या को जन्म दिया। वृषभदेव ने ब्राह्मी और सुन्दरी इन दोनों पुत्रियों को सर्वप्रथम विद्याभ्यास कराया। दाहिनी तरफ बैठी हुई ब्राह्मी को अपने दाहिने हाथ से ‘अ आ इ ई’ सिखाई और बायीं तरफ बैठी हुई सुन्दरी को १, २, ३ आदि संख्याएँ लिखकर गणित विद्या सिखाई। ऋषभदेव ने स्वयं ही इन दोनों कन्याओं को सर्व विद्याओं में पारंगत करके साक्षात् सरस्वती का अवतार बना दिया। इसी तरह भरत, बाहुबली आदि एक सौ एक पुत्रों को भी सर्व विद्याओं में, सर्व कलाओं में, सर्व शास्त्रों और शस्त्रों में भी निष्णात बना दिया। ऋषभदेव ने प्रजा को असि, मसि आदि षट् क्रियाओं का उपदेश दिया जिससे प्रजा उन्हें युगादि पुरुष, युगस्रष्टा, विधाता, प्रजापति आदि नामों से पुकारने लगी। किसी समय ऋषभदेव राजपाट से विरक्त हो वन को जाने लगे तब उन्होंने भरत को अयोध्या का राज्य सौंपा और बाहुबली को पोदनपुर का अधिकारी बनाया। इसी तरह अन्य निन्यानवे पुत्रों को भी अन्य देशों का राज्य देकर आप मुनिमार्ग को बतलाने के लिए निग्र्रन्थ दिगम्बर मुनि हो गये।

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आज का दिन - १८ फ़रवरी २०१८ (भारतीय समयानुसार)
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दिनाँक १८ फरवरी,२०१८
तिथी- फाल्गुन शुक्ल ३
दिन-रविवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७४

सूर्योदय ०७.०२
सूर्यास्त १८.१९

भगवान अरहनाथ - गर्भ कल्याणक

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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार
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