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डिप्लोमा इन जैनोलोजी कोर्स का अध्ययन परमपूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा प्रातः 6 बजे से 7 बजे तक प्रतिदिन पारस चैनल के माध्यम से कराया जा रहा है, अतः आप सभी अध्ययन हेतु सुबह 6 से 7 बजे तक पारस चैनल अवश्य देखें|

१८ अप्रैल से २३ अप्रैल तक मांगीतुंगी सिद्धक्ष्रेत्र ऋषभदेव पुरम में इन्द्रध्वज मंडल विधान आयोजित किया गया है |

२५ अप्रैल प्रातः ६:४० से पारस चैनल पर पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी के द्वारा षट्खण्डागम ग्रंथ का सार प्रसारित होगा |

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भगवान मुनिसुव्रतनाथ के जन्म व तप कल्याणक पर विशेष अभिषेक

लाइव टी वी
प्रमुख विषय

जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



ज्योतिष-वास्तु एवं मंत्र विद्या· जैन भूगोल· जैन इतिहास· श्रावक संस्कार· ग्रन्थ भण्डार

गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ
अयोध्याजी 10 मार्च भाग-1
अयोध्याजी 10 मार्च भाग-2
अयोध्याजी 10 मार्च भाग-3
मांगी तुंगी 18 फरवरी 2016-1
मांगी तुंगी 18 फरवरी 2016-2

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मस्तकाभिषेक 2018

तीर्थ विकास क्रम जारी है, अब सम्मेदशिखर की बारी है...

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सम्मेदशिखर से प्रथम मोक्षगामी भगवान अजितनाथ की 31 फुट उत्तुंग प्रतिमा 16 अप्रैल 2018 को स्थापित हुई |

सर्वोच्च जैन साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा से तीर्थंकर जन्मभूमियों एवं अनेक प्राचीन तीर्थभूमियों के विकास क्रम में 108 फुट भगवान ऋषभदेव प्रतिमा, मांगीतुंगी के उपरांत अब शाश्वत तीर्थ सम्मेदशिखर जी में तीर्थ विकास का ऐतिहासिक बिगुल बजने जा रहा है।

चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की दक्षिण से उत्तर यात्रा को सदैव के लिए अविस्मरणीय बनाते हुए पूज्य माताजी ने सम्मेदशिखर जी में "आचार्य श्री शांतिसागर धाम" विकसित करने की प्रेरणा प्रदान की है।

इस तीर्थ विकास के क्रम में 16 अप्रैल 2018 को कमलासन सहित 31 फुट उत्तुंग भगवान अजितनाथ स्वामी की विशाल खड्गासन प्रतिमा क़्रेन द्वारा वेदी पर स्थापित कर दी गई है। यह प्रतिमा लाल ग्रेनाइट के पाषाण में अति सुन्दर और मनोहारी निर्मित हुई है। लाल ग्रेनाइट सर्वोच्च क्वालिटी का पाषाण माना जाता है, जिसकी लाइफ सर्वाधिक आँकी जाती है।

अत: संस्कृति संरक्षण हेतु दूरदृष्टिकोण रखने वाली पूज्य माताजी की प्रेरणा से यह तीर्थ भी शीघ्र विकास को प्राप्त होगा और आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज द्वारा बताई गई आर्ष परम्परा सदैव दिग्दिगंत बनकर जीवंत रहेगी, यही विश्वास है।

आर्ष परम्परा जयवंत हो, आचार्य श्री शांतिसागर जयवंत हो।
कैसा है कल्पद्रुम मंडल विधान

कैसा है कल्पद्रुम मंडल विधान

लेखिका - आर्यिका श्री चंदनामती माताजी

अकलंक—समझ में नहीं आता निकलंक। आज कल्पदु्रम मंडल विधान की बड़ी धूम मची हुई है। यह कौन सी पूजा है आज तक तो उसका नाम कभी सुना नहीं था ?

निकलंक—हाँ भैय्या! बात तो यही है। काफी दिनों से पोस्टरों में मैं पढ़ रहा था कि जम्बू्द्वीप हस्तिनापुर में कोई कल्पद्रुम मंडल विधान होेने जा रहा है लेकिन अभी जब मैं मम्मी के साथ पू० ज्ञानमती माताजी के दर्शन करने हस्तिनापुर गया तो वहाँ सब कुछ देख सुनकर बहुत ही सन्तोष हुआ।

अकलंक—अच्छा,तो क्या तुमने वह विधान करके देखा है ?

निकलंक—हाँ हाँ, अरे भाई! उसे तो देखकर इतना आनन्द आया कि घर वापस आने का मन ही नहीं कर रहा था।

अकलंकतब तो तुम्हें सब कुछ पता चल गया होगा कि इस विधान में क्या—क्या होता है ? पूरा पढ़ें...

सुमतिनाथ भगवान
सुमतिनाथ भगवान
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परिचय

धातकीखंडद्वीप में मेरूपर्वत से पूर्व की ओर स्थित विदेहक्षेत्र में सीता नदी के उत्तर तट पर पुष्कलावती नाम का देश है। उसकी पुंडरीकिणी नगरी में रतिषेण नाम का राजा था। किसी दिन राजा ने विरक्त होकर अपना राज्य पुत्र को देकर अर्हन्नन्दन जिनेन्द्र के समीप दीक्षा लेकर ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और दर्शनविशुद्धि आदि कारणों से तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके वैजयन्त विमान में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया।

गर्भ और जन्म

वैजयन्त विमान से च्युत होकर वह अहमिन्द्र इसी भरतक्षेत्र के अयोध्यापति मेघरथ की रानी मंगलावती के गर्भ में आया, वह दिन श्रावण शुक्ल द्वितीया का था। तदनन्तर चैत्र माह की शुक्ला एकादशी के दिन माता ने सुमतिनाथ तीर्थंकर को जन्म दिया।
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भगवान् महावीर

वैज्ञानिक भगवान महावीर

    विचार की दृष्टि से जिनाणी विज्ञान है और आचार की दृष्टि से आत्म विकास का मार्ग। जाति, व्यक्ति, सम्प्रदाय आदि संकीर्ण विचारों से परे भगवान् महावीर ने Science of Creation and Spiritual Evoluation का विकास जनकल्याण हेतु किया ‘नानस्स सारो आसरो’ के उद्घोष के साथ सर्वदर्शी सर्वज्ञ भगवान महावीर ने सहस्रों वर्ष पूर्व मानव समाज को संदेश दिया - ‘उप्पने ईवा विग्नेईवा, ध्रुवेई वा’ इस संसार का सत् है। भगवान के इन शब्दों में ज्ञान और साधना का इतना गूढ़ और गंभीर संदेश था कि गणधरों ने चौदह पूर्वों की रचना कर डाली। साथ में यथार्थता, तथा प्राकृतिक नियमों पर आधारित एक ऐसे धर्म की स्थापना हो गयी जिसमें जन्म-मृत्यु, सुख-दु:ख, आदि मानवीय समस्याओं का समाधान ईश्वर द्वारा न होकर स्वयं मनुष्य द्वरा किया जाता है। ईसा की सोलहवीं शताब्दी में युरोप में भगवान महावीर के इस निमय को Law of Conservation of Mass and Energy के नाम से प्रस्तुत कर आधुनिक विज्ञान की नीव रख दी। इसी नियम के कारण वैज्ञानिक युरोप में औद्योगिक क्रांति लाने में सफल हो गये। इस प्रकार विज्ञान के वास्तविक संस्थापक भगवान महावीर हैं, परन्तु पश्चिम जगत के साथ-साथ भारतीय भी इस ऐतिहासिक तथ्य से अनभिज्ञ हैं।

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दिगम्बर-परम्परा में गौतम स्वामी

दिगम्बर-परम्परा में गौतम स्वामी

-डॉ. अनिल कुमार जैन

जैनों की दिगम्बर एवं श्वेताम्बर दोनों परम्पराओं में गौतम स्वामी का महत्वपूर्ण स्थान है। ये भगवान महावीर के प्रथम गणधर थे। गौतम स्वामी वर्तमान जैन वाङ्मय के आद्य-प्रणेता थे। दिगम्बर आर्ष ग्रंथों में भगवान् महावीर को भाव की अपेक्षा समस्त वाङ्मय का अर्थकर्ता अथवा मूलतंत्र कर्ता अथवा द्रव्य श्रुत का कर्ता बतलाया है और गौतम गणधर को उपतन्त्र कर्ता अथवा द्रव्य श्रुत का कर्ता कहा गया है। भगवान महावीर की दिव्य ध्वनि को सुनकर आपने द्वादशांग की रचना की। जिनवाणी की पूजन में निम्न प्रकार कहा गया है-


‘तीर्थंकर की धुनि, गणधर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञानमयी।

सो जिनवर वाणी, शिवसुखदानी, त्रिभुवन मानी पूज्य भयी।।’’

इसीलिए गौतम गणधर को मंगलाचरण में भी भगवान् महावीर के तुरंत बाद ही स्मरण किया जाता है-


‘‘मंगलम् भगवान् वीरो मंगलम् गौतमो गणी।

मंगलम् कुन्दकुन्दाद्यो, जैन धर्मोस्तु मंगलम् ।।’’

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इन्द्रध्वज विधान की आरती

तर्ज—ॐ जय.............

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ॐ जय श्री सिद्ध प्रभो, स्वामी जय श्री सिद्ध प्रभो।
शत इन्द्रों से वंदित, त्रिभुवन पूज्य विभो।।ॐ जय.....।।टेक.।।
भूत भविष्यत संप्रति, त्रैकालीक कहें।स्वामी..........
नरलोकोद्भव सिद्धा, नंतानंत रहें।।ॐ जय..........।।१।।
मध्यलोक के शाश्वत, मणिमय अभिरामा।स्वामी.......
चारशतक अट्ठावन, अविचल जिनधामा।।ॐ जय.......।।२।।
सबमें जिनवर प्रतिमा, इक सौ आठ कहीं।स्वामी.......
सिद्धन की है उपमा, अनुपम रत्नमयी।।ॐ जय........।।३।।
पूरी आरती पढ़ें...

इन्द्रध्वज विधान पढ़ें
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इकाई ०५ - जैन संस्कृति : पाठ १ - जैन संस्कृति की विशेषताएँ

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वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत की तिथियाँ, व्रतों के नाम एवं माहात्म्य

तिथि व्रत का नाम फल

पौष कृष्णा ३ पंक्तिमान छह पल्य उपवास

पौष कृष्णा १२ सूर्य सात पल्य उपवास

पौष सुदी ५ पराक्रम नौ पल्य उपवास

पौष सुदी ११ जयपृथु दस पल्य उपवास

माघ कृष्णा २ अजित आठ पल्य उपवास

माघ कृष्णा ५ स्वयंप्रभ ग्यारह पल्य उपवास

माघ कृष्णा १५ रत्नप्रभ बारह पल्य उपवास

माघ सुदी ४ चतुर्मुख तेरह पल्य उपवास

माघ सुदी ७ शील चौदह पल्य उपवास

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विश्वशांति वर्ष में क्या क्या करे

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संस्कृत साहित्य के विकास

जैनधर्म के अनुसार तीर्थंकर महापुरुषों की दिव्यध्वनि सात सौ अठारह भाषाओं में परिणत हुई मानी गई है इनमें से अठारह महाभाषाएं मानी गई हैं और सात सौ लघु भाषा हैं। उन महाभाषाओं के अन्तर्गत ही संस्कृत और प्राकृत को सर्वप्राचीन एवं प्रमुख भाषा के रूप में स्वीकृत किया जाता है। संस्कृत जहाँ एक परिष्कृत, लालित्यपूर्ण भाषा है वहीं उसे साहित्यकारों ने ‘देवनागरी’ भाषा कहकर सम्मान प्रदान किया है। अनेक साहित्यकारों द्वारा समय-समय पर इस भाषा में गद्य, पद्य व मिश्रित चम्पू साहित्य लिखकर प्राचीन महापुरुषों और सतियों के चारित्र से लोगों को परिचित कराया है।

इसी श्रृंंखला में बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्धकाल एक नई क्रांति के साथ प्रारंभ होकर अनेक साहित्यिक उपलब्धियों के साथ समाज की ओर अग्रसर है। सदैव उत्कृष्ट त्याग, ज्ञान व वैराग्य में प्रसिद्ध जैन समाज में उच्च कोटि के मनीषी लेखक के रूप में आचार्य श्री गुणभद्र स्वामी, कुन्दकुन्द, यतिवृषभ, पूज्यपाद आदि दिगम्बर जैनाचार्यों ने सिद्धान्त, न्याय, अध्यात्म, पुराण आदि ग्रंथ प्राकृत और संस्कृत भाषा में लिखकर जिज्ञासुओं को प्रदान किये किन्तु न जाने किस कारण से विदुषी गणिनी आर्यिका पद को प्राप्त दिगम्बर जैन साध्वियों के द्वारा लिखित कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं होता है। लगभग ढाई सहस्राब्दियों के इतिहास की साक्षी से तो साध्वियों ने ग्रंथलेखन नहीं किया अन्यथा देश के किसी संग्रहालय या पुस्तकालय में उनके कुछ अवशेष तो अवश्य प्राप्त होते।

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खेल में भी कैसा मेल

वीरकुमार-चलो चलें राजकुमार! कुछ देर पार्क में चलकर खेलकूद में ही मनोरंजन किया जाए। राजकुमार-मुझे तो पढ़ाई करनी है वर्ना स्कूल में पिटाई होगी। वैसे भी मेरे पिताजी रोज मुझे यही शिक्षा देते है- खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब। पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाब।। वीरकुमार-यह तो ठीक है मित्र! पढ़ने लिखने से ही व्यक्ति महान बन सकता है। किन्तु हर चीज का अपना—अपना समय होता है। विद्यार्थी जीवन में जहाँ अध्ययन ही जीवन होता है, वहां शारीरिक एवं मानसिक पुष्टता के लिए खेल का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। फिर सायंकाल भोजन के पश्चात् तो अवश्य ही कुछ देर टहलना और खेलना चाहिए ताकि स्वास्थ्य ठीक बना रहे। सुनो राजकुमार! मैंने तो कल एक शास्त्र में पढ़ा कि प्राचीनकाल में एक महाज्ञानी श्रुतकेवली भद्रबाहु भी अपनी बाल्यावस्था में गोली का खेल खेला करते थे। राजकुमार-अरे! तुम कहाँ की बात करते हो ? महापुरुषों का जीवन तो बचपन से ही महानता को लिए हुए होता है, उन्हें इन खेलों से क्या प्रयोजन। वीरकुमार-तुम्हें विश्वास नहीं होता तो मैं तुम्हें उनका चरित्र सुनाता हूँ— पुण्ड्रवद्र्धन देश के कोटीपुर नामक नगर में सोमशर्मा नामक एक ब्राह्मण रहते थे, उनकी पत्नी का नाम श्रीदेवी था। इन दोनों के भद्रबाहु नाम का एक पुत्र था।

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राम का अयोध्या प्रवेश

राम का अयोध्या प्रवेश

      माता कौशल्या सुमित्रा के साथ अपने सतखण्डे महल की छत पर खड़ी हैं और पताका के शिखर पर बैठे हुए कौवे से कहती है-‘‘रे रे वायस! उड़ जा, उड़ जा, यदि मेरा पुत्र राम घर आ जायेगा तो मैं तुझे खीर का खोजन देऊँगी।’’ पागल सदृश हुई कौशल्या को जब कौवे की तरफ से कोई उत्तर नहीं मिलता है तब वह नेत्रों से अश्रु वर्षाते हुए विलाप करने लगती है -

      ‘‘हाय पुत्र! तू कहाँ चला गया? ओह!....बेटा! तू कब आयेगा? मुझ मंदभागिनी को छोड़कर कहाँ चला गया?.....’’ इतना कहते-कहते दोनों माताएं मुक्त कंठ से रोने लगती हैं। इसी बीच क्षुल्लक के वेष में अवद्वार नाम के नारद को आते देख उनको आसन देती हैं। बगल में वीणा दबाए नारद माता को रोते देख आश्चर्यचकित हो पूछते हैं -

      ‘‘मातः! दशरथ की पट्टरानी, श्रीराम की सावित्री माँ! तुम्हारे नेत्रों में ये अश्रु कैसे? क्यों?.....कहो, कहो, जल्दी कहो किसने तुम्हें पीड़ा पहुँचाई है?’’ कौशल्या कहती है -

      ‘‘देवर्षि! आप बहुत दिन बाद आये हैं अतः आपको कुछ मालूम नहीं है कि यहाँ क्या-क्या घटनाएं घट चुकी हैं?’’ ‘‘मातः! मैं धातकीखंड में श्री तीर्थंकर भगवान की वंदना करने गया था उधर ही लगभग २३ वर्ष तक समय निकल गया। अकस्मात् आज मुझे अयोध्या की स्मृति होआई कि जिससे मैं आकाश मार्ग से आ रहा हूँ।’’ कुछ शांत चित्त हो अपराजिता ‘सर्वभूतिहित’ मुनि का आगमन, पति का दीक्षा ग्रहण, राम का वनवास, सीताहरण और लक्ष्मण पर शक्ति प्रहार के बाद विशल्या का भेजना यहाँ तक का सब समाचार सुना कर पुनः रोने लगती है और कहती है -

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बाहुबली भगवान

बाहुबली भगवान-

कृतयुग की आदि में अंतिम कुलकर महाराजा नाभिराज हुए हैं। उनकी महारानी मरुदेवी की पवित्र कुक्षि से इस युग के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म हुआ है। वैदिक परम्परा में इन्हें अष्टम अवतार माना गया है। ऋषभदेव के दो रानियाँ थीं-यशस्वती और सुनन्दा। यशस्वती के भरत, वृषभसेन आदि सौ पुत्र हुए और ब्राह्मी नाम की कन्या हुई हैं। सुनन्दा ने बाहुबली नाम के एक पुत्र को और सुंदरी नाम की कन्या को जन्म दिया। वृषभदेव ने ब्राह्मी और सुन्दरी इन दोनों पुत्रियों को सर्वप्रथम विद्याभ्यास कराया। दाहिनी तरफ बैठी हुई ब्राह्मी को अपने दाहिने हाथ से ‘अ आ इ ई’ सिखाई और बायीं तरफ बैठी हुई सुन्दरी को १, २, ३ आदि संख्याएँ लिखकर गणित विद्या सिखाई। ऋषभदेव ने स्वयं ही इन दोनों कन्याओं को सर्व विद्याओं में पारंगत करके साक्षात् सरस्वती का अवतार बना दिया। इसी तरह भरत, बाहुबली आदि एक सौ एक पुत्रों को भी सर्व विद्याओं में, सर्व कलाओं में, सर्व शास्त्रों और शस्त्रों में भी निष्णात बना दिया। ऋषभदेव ने प्रजा को असि, मसि आदि षट् क्रियाओं का उपदेश दिया जिससे प्रजा उन्हें युगादि पुरुष, युगस्रष्टा, विधाता, प्रजापति आदि नामों से पुकारने लगी। किसी समय ऋषभदेव राजपाट से विरक्त हो वन को जाने लगे तब उन्होंने भरत को अयोध्या का राज्य सौंपा और बाहुबली को पोदनपुर का अधिकारी बनाया। इसी तरह अन्य निन्यानवे पुत्रों को भी अन्य देशों का राज्य देकर आप मुनिमार्ग को बतलाने के लिए निग्र्रन्थ दिगम्बर मुनि हो गये।

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आज का दिन - २३ अप्रैल २०१८ (भारतीय समयानुसार)
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दिनाँक २३ अप्रैल,२०१८
तिथी- वैशाख शुक्ल ८
दिन-सोमवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७५

सूर्योदय ०६.०५
सूर्यास्त १८.४५



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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार
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