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प्रतिदिन पारस चैनल पर पू॰ श्री ज्ञानमती माताजी षट्खण्डागम ग्रंथ का सार भक्तों को अपनी सरस एवं सरल वाणी से प्रदान कर रही है|

प.पू.आ. श्री चंदनामती माताजी द्वारा जैन धर्म का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त करें | 6 मई 2018 से प्रतिदिन पारस चैनल के सीधे प्रसारण पर प्रातः 6 से 7 बजे तक |

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जैन इनसाइक्लोपीडिया
जैन विश्वकोश
जैनधर्म के ज्ञान का महासागर



बाल विकास पाठ ७-पूज्य चंदनामती माताजी के प्रवचन

लाइव टी वी
प्रमुख विषय


जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



ज्योतिष-वास्तु एवं मंत्र विद्या· जैन भूगोल· जैन इतिहास· श्रावक संस्कार· ग्रन्थ भण्डार

षट्खण्डागम सिद्धांत चिंतामणि टीका प्रवचन


प्रवचन-1
प्रवचन-2
प्रवचन-3

और प्रवचन देखें


षट्खण्डागम ग्रन्थराज भजन


जैनधर्म के प्रारंभिक ज्ञान हेतु शिक्षण

(Teaching For The Basic Knowledge of Jainism)
द्वारा—प्रज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न चन्दनामती

पाठ १४-देवदर्शन विधि

मंदिर के दरवाजे में प्रवेश करते ही बोलें-ॐ जय जय जय, नि:सही नि:सही नि:सही। नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु। भगवान के सामने खड़े होकर दोनों हाथ जोड़कर बोलें- णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।। भगवान की तीन प्रदक्षिणा देवें। बँधी मुट्ठी से अँगूठा भीतर करके चावल के पुँज चढ़ावें।

भगवान के सामने अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु ऐसे पाँचों पद बोलते हुए क्रम से बीच में, ऊपर, दाहिनी तरफ, नीचे और बार्इं तरफ ऐसे पाँच पुँज चढ़ावें।

सरस्वती के सामने प्रथमं करणं चरणं द्रव्यं नम: ऐसे बोलकर क्रम से चार लाइन से पुँज चढ़ावें।

गुरू के सामने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र ऐसे बोलकर क्रम से तीन पुँज लाइन से चढ़ावें। पुन: हाथ जोड़कर निम्न स्तोत्र बोलें-

हे भगवन्! नेत्रद्वय मेरे, सफल हुये हैं आज अहो।

तव चरणांबुज का दर्शन कर, जन्म सफल है आज अहो।।

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कैसा है कल्पद्रुम मंडल विधान


कैसा है कल्पद्रुम मंडल विधान

लेखिका - आर्यिका श्री चंदनामती माताजी

अकलंक—समझ में नहीं आता निकलंक। आज कल्पदु्रम मंडल विधान की बड़ी धूम मची हुई है। यह कौन सी पूजा है आज तक तो उसका नाम कभी सुना नहीं था ?

निकलंक—हाँ भैय्या! बात तो यही है। काफी दिनों से पोस्टरों में मैं पढ़ रहा था कि जम्बू्द्वीप हस्तिनापुर में कोई कल्पद्रुम मंडल विधान होेने जा रहा है लेकिन अभी जब मैं मम्मी के साथ पू० ज्ञानमती माताजी के दर्शन करने हस्तिनापुर गया तो वहाँ सब कुछ देख सुनकर बहुत ही सन्तोष हुआ।

अकलंक—अच्छा,तो क्या तुमने वह विधान करके देखा है ?

निकलंक—हाँ हाँ, अरे भाई! उसे तो देखकर इतना आनन्द आया कि घर वापस आने का मन ही नहीं कर रहा था।

अकलंकतब तो तुम्हें सब कुछ पता चल गया होगा कि इस विधान में क्या—क्या होता है ? पूरा पढ़ें...


अहिंसा प्रधान मेरी इण्डिया महान है...
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अहिंसा प्रधान मेरी इण्डिया महान है।
इण्डिया में जन्मे महावीर और राम हैं।
यहाँ की पवित्र माटी बनीं चन्दन, उसे करो सब नमन।। टेक.।।
जहाँ कभी बहती थीं दूध की नदियाँ।
वहाँ अब करुणा की माँग करे दुनिया।।
अत्याचार पशुओं पे होगा कब खतम, उसे करो सब नमन।।१।।

प्रभु महावीर का अमर संदेश है।
लिव एण्ड लेट लिव का दिया उपदेश है।।
मानवों की मानवता की यही पहचान है।
जाने जो पराए को भी निज के समान है।।
तभी अहिंसा का होगा सच्चा पालन, उसे करो सब नमन।।२।।

अहिंसा के द्वारा ही इण्डिया फी हुई।
ब्रिटिश गवर्नमेंट की जब इति श्री हुई।।
चाहे हों पुराण या कुरान सभी कहते।
अहिंसा के पावन सूत्र सब में हैं रहते।।
यही मेरे देश की कहानी है पुरानी।
अहिंसक देशप्रेमियों की ये निशानी।।
‘चंदनामती’ यह देश ऋषियों का चमन, उसे करो सब नमन।।३।।

भगवान् महावीर


वैज्ञानिक भगवान महावीर

    विचार की दृष्टि से जिनाणी विज्ञान है और आचार की दृष्टि से आत्म विकास का मार्ग। जाति, व्यक्ति, सम्प्रदाय आदि संकीर्ण विचारों से परे भगवान् महावीर ने Science of Creation and Spiritual Evoluation का विकास जनकल्याण हेतु किया ‘नानस्स सारो आसरो’ के उद्घोष के साथ सर्वदर्शी सर्वज्ञ भगवान महावीर ने सहस्रों वर्ष पूर्व मानव समाज को संदेश दिया - ‘उप्पने ईवा विग्नेईवा, ध्रुवेई वा’ इस संसार का सत् है। भगवान के इन शब्दों में ज्ञान और साधना का इतना गूढ़ और गंभीर संदेश था कि गणधरों ने चौदह पूर्वों की रचना कर डाली। साथ में यथार्थता, तथा प्राकृतिक नियमों पर आधारित एक ऐसे धर्म की स्थापना हो गयी जिसमें जन्म-मृत्यु, सुख-दु:ख, आदि मानवीय समस्याओं का समाधान ईश्वर द्वारा न होकर स्वयं मनुष्य द्वरा किया जाता है। ईसा की सोलहवीं शताब्दी में युरोप में भगवान महावीर के इस निमय को Law of Conservation of Mass and Energy के नाम से प्रस्तुत कर आधुनिक विज्ञान की नीव रख दी। इसी नियम के कारण वैज्ञानिक युरोप में औद्योगिक क्रांति लाने में सफल हो गये। इस प्रकार विज्ञान के वास्तविक संस्थापक भगवान महावीर हैं, परन्तु पश्चिम जगत के साथ-साथ भारतीय भी इस ऐतिहासिक तथ्य से अनभिज्ञ हैं।

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शिर्डी ज्ञान तीर्थ पर 5 वां प्रतिष्ठापना महोत्सव


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आरती नवग्रह स्वामी...


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तर्ज-चाँद मेरे आ जा रे............

आरती नवग्रह स्वामी की-२
ग्रह शांति हेतू तीर्थंकरों की, सब मिल करो आरतिया।।टेक.।।
आत्मा के संग अनादी, से कर्मबंध माना है।
उस कर्मबंध को तजकर, परमातम पद पाना है।
आरती नवग्रह स्वामी की।।१।।

निज दोष शांत कर जिनवर, तीर्थंकर बन जाते हैं।
तब ही पर ग्रहनाशन में, वे सक्षम कहलाते हैं।
आरती नवग्रह स्वामी की।।२।।

जो नवग्रह शांती पूजन, को भक्ति सहित करते हैं।
उनके आर्थिक-शारीरिक, सब रोग स्वयं टरते हैं।
आरती नवग्रह स्वामी की।।३।।

कंचन का दीप जलाकर, हम आरति करने आए।
‘‘चन्दनामती’’ मुझ मन में, कुछ ज्ञानज्योति जल जाए।।
आरती नवग्रह स्वामी की।।४।।

बाल विकास भाग: १


षट्खण्डागम ग्रंथ का सार


षट्खण्डागम ग्रंथ-पूज्य ज्ञानमती माताजी द्वारा मिलता है सभी भक्तों को ज्ञान रुपी अमृत -

मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र ऋषभदेव में विराजमान दिव्यशक्ति गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी जिन्होंने १०८ फुट भगवान ऋषभदेव की विशाल मूर्ति पर्वत पर प्रगटाई, ऐसी माताजी जिन्होंने १००-२०० ग्रंथ नहीं बल्कि ४०० से अधिक ग्रंथ लिखे हैं। उनमें से एक षट्खण्डागम ग्रंथ है, जिसकी सिद्धान्तचिंतामणि संस्कृत टीका पूज्य ज्ञानमती माता जी ने किया है |

पूज्य चंदनामती माताजी सभी भक्तों को प्रात:काल ६ बजे से पारस चैनल पर बहुत ही सुन्दर कहानी-कथाओं के माध्यम से सभी युवा वर्ग एवं बालक-बालिकाओं को अपनी मधुर वाणी से काव्य कथा सुनाती है, जो बहुत ही रोमांचक लगती है। इस समय माताजी एक कथानक सुना रही है एक ग्वाला बन गया सेठ तत्पश्चात् गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी सभी विद्वान् सुदर्शन एवं भक्तों को षट्खण्डागम का सार बहुत ही सरल और सरस भाषा में बताती हैं। माताजी ने सर्वप्रथम मंगलाचरण बताया-

'सिद्धान् सिद्ध्यर्थ मानम्य, सर्वांस्त्रैलोक्यमूध्र्वगान् इष्ट: सर्वक्रियान्तेसौ, शान्तीशो हृदि घार्यते।।

षट्खण्डागम-पाँच खण्डों पर धवला टीका १६ पुस्तके हैं। इसमें कुल ६८४१ सूत्र हैं।

ग्रंथ का मंगलाचरण णमोकार महामंत्र है। इसका आचार्य श्री पुष्पदंत स्वामी ने नहीं बनाया है, यह महामंत्र अनादिनिधन है। सभी सिद्ध भगवान तीन लोक के मस्तक पर विराजमान हैं। ऐसे सिद्ध भगवान सिद्धि के लिए (आत्मा) की सिद्ध के लिए नमस्कार करके शांतिनाथ भगवान जो सभी क्रियाओं में इष्ट है, प्रसिद्ध है, ऐसे शांतिनाथ भगवान को हृदय में धारण किया।

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वृहत्पल्य व्रत विधि


वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत की तिथियाँ, व्रतों के नाम एवं माहात्म्य

तिथि व्रत का नाम फल

पौष कृष्णा ३ पंक्तिमान छह पल्य उपवास

पौष कृष्णा १२ सूर्य सात पल्य उपवास

पौष सुदी ५ पराक्रम नौ पल्य उपवास

पौष सुदी ११ जयपृथु दस पल्य उपवास

माघ कृष्णा २ अजित आठ पल्य उपवास

माघ कृष्णा ५ स्वयंप्रभ ग्यारह पल्य उपवास

माघ कृष्णा १५ रत्नप्रभ बारह पल्य उपवास

माघ सुदी ४ चतुर्मुख तेरह पल्य उपवास

माघ सुदी ७ शील चौदह पल्य उपवास

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विश्वशांति वर्ष में क्या क्या करे

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सती मनोवती की दर्शनप्रतिज्ञा का चमत्कार


सती मनोवती की दर्शनप्रतिज्ञा

(१)

सेठ हेमदत्त के घर की सजावट किसी राजमहल से कम नहीं दिख रही है, कहीं पर मोतियों की झालरें लटक रही हैं, कहीं पर मखमल के चंदोये बंधे हैं। दरवाजों-दरवाजों पर सुन्दर-सुन्दर रत्नों से जड़े हुए तोरण बंधे हुए हैं। कहीं पर रंग-बिरंगी काँच के झरोखे से छन-छन कर आती हुई सूर्य की किरणें इन्द्रधनुष की आभा बिखेर रही हैं तो कहीं पर रेशमी पर्दे आकाशगंगा के समान लहरा रहे हैं। घर और बाहर का भाग चारों तरफ से नगर के नर-नारियों से खचाखच भरा हुआ है। सेठानी हेमश्री आज खुशी से फूली नहीं समा रही हैं, सो ठीक ही है उसके लाडले सातवें पुत्र बुद्धिसेन की शादी होकर घर में अतिशय रूपवती बहू आई हुई है। आज सेठ जी के यहाँ जीमनवार है। बल्लभपुर शहर के सभी स्त्री-पुरुष प्रसन्नमुख दिख रहे हैं, कोई जीमकर जा रहे हैं और कोई आ रहे हैं। गली-गली में धूम मची हुई है। सभी के मुख पर एक ही चर्चा है कि भाई! हेमदत्त सेठ का आखिरी संबंध बहुत अच्छा हुआ है उन्हें बहुत अच्छे समधी मिले हैं। हस्तिनापुर के सेठ महारथ बावन करोड़ दीनारों के धनी हैं, उनकी सुपुत्री मनोवती बहुत ही सुशील कन्या है। उसने भी पूर्वजन्म में महान् पुण्य अर्जित किया होगा जो उसे ऐसा घर और वर मिला है, क्या सुन्दर अनुरूप जोड़ी है? कोई महिला चर्चा कर रही है, अरी बहन! अपने सेठ हेमदत्त भी छप्पन करोड़ दीनारों के मालिक हैं। इनके बड़े-बड़े व्यापार हैं, ये बड़े नामी जौहरी हैं। सुना है कि इनके नये समधी भी बहुत विख्यात जौहरी हैं। वे भी तो बल्लभपुर शहर में बहुत ही विख्यात पुरुष हैं। दूसरी बोल उठती है, बहन! सम्पत्ति का क्या देखना, बस लड़के को लड़की अनुकूल चाहिए और लड़की को पति अनुकूल चाहिए जिससे उन दोनों का दांपत्य जीवन सुख से चले। फिर यदि पैसा भाग्य में है तो लड़का अपने आप अपने पुरुषार्थ से कमाकर धनी बन जाता है और भाग्य में नहीं है तो कई पीढ़ियों का कमाया हुआ धन भी पता नहीं चलता कि किधर चला जाता है। मैं तो मेरी कन्या के लिए यही सोचा करती हूँ कि इसे पति धर्मात्मा मिले। तीसरी बोलने लगती है सच है बहन, मेरी लड़की का पति दुव्र्यसनी है, सारी बाप की कमाई की पचासों करोड़ सम्पत्ति बरबाद कर दी। मेरी लड़की के गहने जेवर भी बेच कर खा गया। क्या करूँ, मैं तो बहुत दुःखी हूँ। तभी एक महिला बोलने लगती है हाँ सच है बहन! इस मनोवती ने तो खूब ही पुण्य किया होगा, तभी इसे सर्वगुणसम्पन्न पति मिला है। इस प्रकार से शहर में तरह-तरह की मधुर चर्चायें चल रही हैं। और पढ़े

बाल विकास प्रतियोगिता


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राम का अयोध्या प्रवेश


राम का अयोध्या प्रवेश

      माता कौशल्या सुमित्रा के साथ अपने सतखण्डे महल की छत पर खड़ी हैं और पताका के शिखर पर बैठे हुए कौवे से कहती है-‘‘रे रे वायस! उड़ जा, उड़ जा, यदि मेरा पुत्र राम घर आ जायेगा तो मैं तुझे खीर का खोजन देऊँगी।’’ पागल सदृश हुई कौशल्या को जब कौवे की तरफ से कोई उत्तर नहीं मिलता है तब वह नेत्रों से अश्रु वर्षाते हुए विलाप करने लगती है -

      ‘‘हाय पुत्र! तू कहाँ चला गया? ओह!....बेटा! तू कब आयेगा? मुझ मंदभागिनी को छोड़कर कहाँ चला गया?.....’’ इतना कहते-कहते दोनों माताएं मुक्त कंठ से रोने लगती हैं। इसी बीच क्षुल्लक के वेष में अवद्वार नाम के नारद को आते देख उनको आसन देती हैं। बगल में वीणा दबाए नारद माता को रोते देख आश्चर्यचकित हो पूछते हैं -

      ‘‘मातः! दशरथ की पट्टरानी, श्रीराम की सावित्री माँ! तुम्हारे नेत्रों में ये अश्रु कैसे? क्यों?.....कहो, कहो, जल्दी कहो किसने तुम्हें पीड़ा पहुँचाई है?’’ कौशल्या कहती है -

      ‘‘देवर्षि! आप बहुत दिन बाद आये हैं अतः आपको कुछ मालूम नहीं है कि यहाँ क्या-क्या घटनाएं घट चुकी हैं?’’ ‘‘मातः! मैं धातकीखंड में श्री तीर्थंकर भगवान की वंदना करने गया था उधर ही लगभग २३ वर्ष तक समय निकल गया। अकस्मात् आज मुझे अयोध्या की स्मृति होआई कि जिससे मैं आकाश मार्ग से आ रहा हूँ।’’ कुछ शांत चित्त हो अपराजिता ‘सर्वभूतिहित’ मुनि का आगमन, पति का दीक्षा ग्रहण, राम का वनवास, सीताहरण और लक्ष्मण पर शक्ति प्रहार के बाद विशल्या का भेजना यहाँ तक का सब समाचार सुना कर पुनः रोने लगती है और कहती है -

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नवग्रह शांति विधान पढ़ें


आज का दिन - २४ मई २०१८ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक २४ मई,२०१८
तिथी- प्रथम ज्येष्ठ शुक्ल १०
दिन-गुरुवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७५

सूर्योदय ०५.४७
सूर्यास्त १८.५८



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18 अप्रैल 2018 ऋषभदेवपुरम - इन्द्रध्वज विधान का दृश्य


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तीर्थंकर माता के सोलह स्वप्न

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