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पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ ऋषभदेवपुरम्-मांगीतुंगी में विराजमान है ।

प्रतिदिन पारस चैनल के सीधे प्रसारण पर प्रातः 6 से 7 बजे तक प.पू.आ. श्री चंदनामती माताजी द्वारा जैन धर्म का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त करें |

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सम्मेद शिखर वन्दना
वर्षायोग स्थापना पर विशेष प्रवचन

लाइव टी वी
प्रमुख विषय


जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



ज्योतिष-वास्तु एवं मंत्र विद्या· जैन भूगोल· जैन इतिहास· श्रावक संस्कार· ग्रन्थ भण्डार

षट्खण्डागम सिद्धांत चिंतामणि टीका प्रवचन


प्रवचन-1
प्रवचन-2
प्रवचन-3

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षट्खण्डागम ग्रन्थराज भजन
सम्मेदशिखर वंदना


सम्मेदशिखर टोंक वंदना

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तीर्थराज सम्मेदशिखर है, शाश्वत सिद्धक्षेत्र जग में।
एक बार जो करे वन्दना, वह भी पुण्यवान सच में।।
ऊँचा पर्वत पार्श्वनाथ हिल, नाम से जाना जाता है।
जिनशासन का सबसे पावन, तीरथ माना जाता है।।१।।
जब प्रत्यक्ष करें यात्रा, उस पुण्य का वर्णन क्या करना।
लेकिन प्रतिदिन भी परोक्ष में, गिरि का ध्यान किया करना।।
आँख बन्दकर करो कल्पना, मेरी यात्रा शुरू हुई।
प्रात:काल चले सब यात्री, जय जयकारा शुरू हुई।।२।।
एक हाथ में छड़ी दूसरे, में चावल की झोली है।
ज्यादातर सब पैदल हैं, पर किसी-किसी की डोली है।।
कभी न चलने वाले भी, हिम्मत कर पर्वत चढ़ते हैं।
पारस प्रभु के पास पहुँचने, हेतु कदम बढ़ चलते हैं।।३।।
चढ़ते-चढ़ते आठ किलोमीटर, का पथ जब तय होता।
दायें हाथ तरफ तब इक, चौपड़ा कुंड दर्शन होता।।
वहाँ दिगम्बर जिनमंदिर, संस्कृति की अमिट धरोहर है।
पार्श्वनाथ चन्द्रप्रभु बाहुबलि की मूर्ति मनोहर हैं।।४।।

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शिविर आयोजन


गर्भ संस्कार शिविर

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बच्चों को सुसंस्कारित बनाने का सबसे उपयुक्त समय उसका गर्भकाल है। गर्भधारण काल में माता का चिंतन, चरित्र और व्यवहार तीनों ही उसके उदर में पह रहे बच्चे को प्रभावित करती हैं। गर्भस्थ शिशु को संस्कारित व शिक्षित करने का प्रमाण हमें धर्म ग्रंथों में मिलता ही है, कई वैज्ञानिक भी इस बात से सहमत हैं।
इसी लक्ष्य को लेकर दक्षिण भारत वीर महिला मंडल द्वारा ३१ अगस्त २०१८ को प्रातः से ऋषभदेवपुरम् ,मांगीतुंगी में पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के पावन सानिध्य में गर्भ संस्कार शिविर का आयोजन किया गया है |
गर्भसंस्कार की क्रिया पूज्य माताजी द्वारा मंत्रोच्चारणपूर्वक सम्पन की जाएगी | सभी गर्भवती महिलाएं ३० अगस्त २०१८ के मध्याह्न में ऋषभदेवपुरम् ,मांगीतुंगी पधारे यहाँ आवास एवं भोजन सभी प्रकार की व्यवस्था रहेगी | अतः इस आयोजन का अधिक से अधिक लाभ लें ऐसा निवेदन है |


वर्षायोग स्थापना का समय व विधि

जैन मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक और क्षुल्लिका आदि चतुर्विध संघ वर्षा ऋतु में एक जगह रहने का नियम कर लेते हैं, अन्यत्र विहार नहीं करते हैं इसलिए इसे वर्षायोग कहा है तथा सामान्यतया श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक इन चार महीनेपर्यंत एक जगह रहना होता है अत: इसे चातुर्मास भी कहते हैं।
प्रश्न : इस वर्षायोग को ग्रहण करने की तथा इसे समाप्त करने की तिथियाँ कौन सी हैं?
उत्तर : आषाढ़ सुदी चतुर्दशी की पूर्वरात्रि में सिद्धभक्ति आदि विधिपूर्वक इस वर्षायोग को साधुजन ग्रहण करें और कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की पिछली रात्रि में विधिपूर्वक उस वर्षायोग को समाप्त कर देवें।
विधि :
पूर्व दिशा की तरफ मुख करके वर्षायोग का प्रतिष्ठापन करने के लिए ‘‘यावन्ति जिनचैत्यानि’’ इत्यादि श्लोक का पाठ करना चाहिए पुन: आदिनाथ भगवान और दूसरे अजितनाथ भगवान इन दोनों का ही स्वयंभू स्तोत्र बोलकर अंचलिका सहित चैत्यभक्ति करनी चाहिए। यह पूर्व दिशा की तरफ की चैत्य-चैत्यालय की वंदना है। इसी प्रकार दक्षिण, पश्चिम और उत्तर की तरफ की वंदना भी क्रम से करनी चाहिए।

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सम्मेदशिखर चालीसा


सम्मेदशिखर चालीसा

दोहा

सिद्धिप्रिया की प्राप्ति हित, नमन करूँ सब सिद्ध।
क्रम से भव को काटकर, होऊँ पूर्ण समृद्ध।।१।।
सिद्धक्षेत्र शाश्वत कहा, गिरि सम्मेद महान।
जहाँ अनन्तानंत प्रभु, ने पाया शिवधाम।।२।।
सम्मेदाचल तीर्थ का, चालीसा सुखकार।
पढ़ें सुनें जो भव्यजन, क्रम से हों भव पार।।३।।
चौपाई
जय हो श्री सम्मेद शिखर की, जय हो उस शाश्वत गिरिवर की।।१।।
हों जयवन्त बीस ये जिनवर, सिद्ध बने थे जो तीर्थंकर।।२।।
इस हुण्डावसर्पिणी युग में, चार जिनेश्वर अन्य स्थल से।।३।।
मोक्ष प्राप्त कर सिद्ध बन गए, वे तीरथ भी पूज्य बन गए।।४।।
लेकिन भूत भावि कालों में, यहीं से मुक्त हुए अरु होंगे।।५।।
यही अटल सिद्धान्त नियम है, सिद्धिवधू का यह उपवन हैै।।६।।
कोड़ाकोड़ि मुनीश्वर आते, इस पर्वत पर ध्यान लगाते।।७।।
टोंक-टोंक से मोक्ष पधारे, घाति अघाती कर्म विडारे।।८।।
इसीलिए गिरि की रजपावन, है वहाँ का कण-कण मनभावन।।९।।
यात्रा यद्यपि बहुत कठिन है, यात्री होता फिर भी धन्य है।।१०।।

गर्भ कल्याणक विशेष : श्रावण कृष्ण दशमी


भगवान कुन्थुनाथ

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कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर में कौरववंशी काश्यप गोत्रीय महाराज सूरसेन राज्य करते थे। उनकी पट्टरानी का नाम श्रीकान्ता था। उस पतिव्रता देवी ने देवों के द्वारा की हुई रत्नवृष्टि आदि पूजा प्राप्त की थी। श्रावण कृष्ण दशमी के दिन रानी ने सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र को गर्भ में धारण किया। उस समय इन्द्रों ने आकर भगवान का गर्भमहोत्सव मनाया और माता की पूजा करके स्वस्थान चले गये।

आरती नवग्रह स्वामी...


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तर्ज-चाँद मेरे आ जा रे............

आरती नवग्रह स्वामी की-२
ग्रह शांति हेतू तीर्थंकरों की, सब मिल करो आरतिया।।टेक.।।
आत्मा के संग अनादी, से कर्मबंध माना है।
उस कर्मबंध को तजकर, परमातम पद पाना है।
आरती नवग्रह स्वामी की।।१।।

निज दोष शांत कर जिनवर, तीर्थंकर बन जाते हैं।
तब ही पर ग्रहनाशन में, वे सक्षम कहलाते हैं।
आरती नवग्रह स्वामी की।।२।।

जो नवग्रह शांती पूजन, को भक्ति सहित करते हैं।
उनके आर्थिक-शारीरिक, सब रोग स्वयं टरते हैं।
आरती नवग्रह स्वामी की।।३।।

कंचन का दीप जलाकर, हम आरति करने आए।
‘‘चन्दनामती’’ मुझ मन में, कुछ ज्ञानज्योति जल जाए।।
आरती नवग्रह स्वामी की।।४।।

परिचय


श्री पार्श्वनाथ चालीसा


श्री पार्श्वनाथ चालीसा

शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करूँ प्रणाम।

उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम।।
सर्व साधु और सरस्वती, जिन मंदिर सुखकार।

अहिच्छत्र और पार्श्व को, मन मंदिर में धार।।

पारसनाथ जगत हितकारी, हो स्वामी तुम व्रत के धारी।

सुर नर असुर करें तुम सेवा, तुम ही सब देवन के देवा।।
तुमसे करम शत्रु भी हारा, तुम कीना जग का निस्तारा।
अश्वसेन के राजदुलारे, वामा की आँखों के तारे।
काशी जी के स्वामि कहाये, सारी परजा मौज उड़ाये।
इक दिन सब मित्रों को लेके, सैर करन को वन में पहुँचे।
हाथी पर कसकर अम्बारी, इक जंगल में गई सवारी।
एक तपस्वी देख वहाँ पर, उससे बोले वचन सुनाकर।
तपसी! तुम क्यों पाप कमाते, इस लक्कड़ में जीव जलाते।
तपसी तभी कुदाल उठाया, उस लक्कड़ को चीर गिराया।
निकले नाग-नागनी कारे, मरने के थे निकट बिचारे।
रहम प्रभू के दिल में आया, तभी मंत्र नवकार सुनाया।
मरकर वो पाताल सिधाये, पद्मावति धरणेन्द्र कहाये।
तपसी मरकर देव कहाया, नाम कमठ ग्रंथों में गाया।
एक समय श्री पारस स्वामी, राज छोड़कर वन की ठानी।
तप करते थे ध्यान लगाए, इक दिन कमठ वहाँ पर आये।
फौरन ही प्रभु को पहिचाना, बदला लेना दिल में ठाना।

बहुत अधिक बारिश बरसाई, बादल गरजे बिजली गिराई।

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सप्तपरमस्थान व्रत


व्रत प्रारंभ- 11 अगस्त 2018 से 17 अगस्त 2018 तक 
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नोटिस - सप्तपरमस्थान व्रत श्रावण शुक्ला एकम् से प्रारम्भ होता है लेकिन मध्य में दो तिथि सम्मिलित होने से ये व्रत अमावस्या से प्रारम्भ होकर श्रावण शुक्ल सप्तमी तक चलेगा |

सप्तपरमस्थान पूजा

-गीता छंद-

श्री वीतराग जिनेन्द्र को, प्रणमूँ सदा वर भाव से।

श्री सप्तपरमस्थान पूजूँ, प्राप्ति हेतू चाव से।।

आह्वान थापन सन्निधापन, भक्ति श्रद्धा से करूँ।

सज्जाति से निर्वाण तक, पद सप्त की अर्चा करूँ।।१।।

ॐ ह्रीं सप्तपरमस्थानसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।

ॐ ह्रीं सप्तपरमस्थानसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।

ॐ ह्रीं सप्तपरमस्थानसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

अथाष्टक-(चाल-नंदीश्वर श्रीजिनधाम)

जल शीतल निर्मल शुद्ध, केशर मिश्र करूँ।

अंतर्मल क्षालन हेतु, शुभ त्रय धार करूँ।।

मैं सप्तपरमपद हेतु, परमस्थान जजूँ।

सब कर्म कलंक विदूर, परिनिर्वाण भजूँ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री परमब्रह्मणे सप्तपरमस्थानाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

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भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ


भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ

(चैत्र कृ. नवमी-१० मार्च २०१८ से चैत्र कृ. नवमी-२९ मार्च २०१९)
प्रेरणा-भारतगौरव दिव्यशक्ति शारदे माँ गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी
        
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आज हम सभी वर्तमान विश्व में उपस्थित आतंकवाद, हिंसा, विनाश, अशांति, परस्पर शत्रुता, विद्वेष, बदला लेने की भावना आदि विकृतियों से ग्रसित हो रही मानवता को दृष्टिगत कर रहे हैं। ‘अहिंसामयी शाश्वत धर्म’ का शीतल जल ही इन अग्नि ज्वालाओं के उपशमन में सहयोगी हो सकता है, यही तीर्थंकर भगवन्तों की सदाकाल से देशना रही है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से की गई धर्माराधना, मंत्रानुष्ठान, विधि-विधान भी सम्पूर्ण वातावरण को प्रभावित करके क्षेम-सुभिक्ष-शांति-सौहार्द की स्थापना करने में अत्यन्त कार्यकारी होते हैं, यह परम सत्य है।

      इन्हीं विश्वकल्याणकारी भावनाओं से ओतप्रोत होकर भारतगौरव, दिव्यशक्ति, परम उपकारी परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ऋषभगिरि-मांगीतुंगी में विराजमान विश्व के सर्वाधिक उत्तुंग १०८ फुट भगवान ऋषभदेव के श्रीचरणों में स्थित होकर भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती, चैत्र कृ. नवमी, १० मार्च २०१८ के पावन अवसर पर ‘भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष’ मनाने की प्रेरणा प्रदान की है, जो आने वाली ऋषभ जयंती, चैत्र कृ. नवमी, २९ मार्च २०१९ तक हम सबको व्यक्तिगत शांति, सामाजिक शांति, राष्ट्रीय शांति एवं विश्वशांति हेतु जागृत होकर अपना-अपना योगदान प्रदान करने हेतु कटिबद्ध कर रहा है। आइये हम भी विश्वशांति के इस महा आयोजन में किसी न किसी रूप में अपना सहयोग प्रदान कर पुण्यलाभ प्राप्त करें।

विश्वशांति वर्ष मनाने की रूपरेखा-

(१) विश्वशांति हेतु जाप्य (मंत्र-ॐ ह्रीं विश्वशांतिकराय श्री ऋषभदेवाय नम:)
(२) भगवान ऋषभदेव मण्डल विधान
(३) णमोकार महामंत्र अथवा भक्तामर महास्तोत्र का अखण्ड पाठ (अपने समयानुसार)
(४) भगवान ऋषभदेव पर संगोष्ठी

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जीव दया की कहानी


जीव दया की कहानी -

लेखिका-प्रज्ञाश्रमणी चंदनामती माताजी

तर्ज -ये परदा हटा दो ....

सुनो जीवदया की कहानी , इक मछुवारे की जुबानी ,

इक मछली को दे जीवन इसने जीवन पाया था |
the story of compossion , is called indian tradition
one fisherman had given once the life to the fish .

इक मुनि से नियम लिया था , पालन द्रढ़ता से किया था |
he took the vow from munivar , and followed till while life .that vow became very fruitful in fisherman 's life .
अब आगे शुरू होती है कहानी एक मछुवारे की -

जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव |
गुरुवर की सत्संग सभा में , मछुवारा आया प्रवचन सुनने |
गुरुदर्शन का भाव था उसमें , माँगा आशीर्वाद था उसने ||
बोला मै पापी गुरुदेव , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव -२ ||१ ||
गुरु वचनों की महिमा निराली , निकट जो जाता जाता न खाली |
कितनों की गुरु ने विपदा टाली , धीवर की क्या कहूँ कहानी ||
देख रहा वह मुनि का तेज , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव ||२ ||
गुरु ने दिव्यज्ञान से जाना , धीवर की किस्मत पहचाना |
छोटा सा इक नियम दे दिया , उसका बेड़ा पार कर दिया ||
भवदधितारक हैं गुरुदेव , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव ||३ ||
क्या था नियम यह सुन लो भाई , पहली मछली जो जाल में आई |
उसको प्राणदान दे देना , कुछ तो पुण्य अर्जित कर लेना ||
धर्म अहिंसा है सबसे श्रेष्ठ , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव ||४ ||

आगे क्या होता है ?


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बाल विकास प्रतियोगिता


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चौबीस तीर्थंकर वन्दना


चौबीस तीर्थंकर वन्दना

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आवो हम सब करें वंदना, चौबीसों भगवान की।
तीर्थंकर बन तीर्थ चलाया, उन अनंत गुणवान की।।

जय जय जिनवरं-४

आदिनाथ युग आदि तीर्थंकर, अजितनाथ कर्मारि हना।
संभवजिन भव दु:ख के हर्ता, अभिनंदन आनंद घना।।
सुमतिनाथ सद्बुद्धि प्रदाता, पद्मप्रभु शिवलक्ष्मी दें।
श्री सुपाश्र्व यम पाश विनाशा, चन्द्रप्रभू निज रश्मी दें।।
केवलज्ञान सूर्य बन चमके, त्रिभुवन तिलक महान की।। तीर्थं.।।१।।

जय जय जिनवरं-४

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नवग्रह शांति विधान पढ़ें


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आज का दिन - २० अगस्त २०१८ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक २० अगस्त,२०१८
तिथी- श्रावण शुक्ल १०
दिन-सोमवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७५

सूर्योदय ०५.५६
सूर्यास्त १८.५2


अथ श्रावण मास फल विचार

अक्षय फल दसमी
अक्षय निधि व्रत प्रारम्भ
मेला तिजारा जी
Calender.jpg



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फोटो - ऑडियो एवं वीडियो गैलरी


मांगीतुंगी में ऋषभदेव पुरम में भगवान ऋषभदेव पंचकल्याणक प्रतिष्ठा लघु

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