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विश्वशांति महावीर मण्डल विधान का आयोजन ऋषभदेवपुरम्-मांगीतुंगी (नासिक) महा. में दशलक्षण पर्व में 14 से 24 सितम्बर 2018

‘‘ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमसंयमधर्माङ्गाय नम:’’

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उत्तम संयम धर्म - १९-०९-२०१८

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जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



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प्रवचन सोलहकारण भावना विशेष


दर्शन विशुध्दि भावना
विनय-सम्पन्नता भावना
शील-व्रत अनतिचार भावना
दशलक्षण व्रत


दशलक्षण व्रत विधि

दशलाक्षणिकव्रते भाद्रपदमासे शुक्ले श्रीपंचमीदिने प्रोषध: कार्य:, सर्वगृहारम्भं परित्यज्य जिनालये गत्वा पूजार्चनादिकञ्च कार्यम्। चतुर्विंशतिकां प्रतिमां समारोप्य जिनास्पदे दशलाक्षणिकं यन्त्रं तदग्रे ध्रियते, ततश्च स्नपनं कुर्यात्, भव्य: मोक्षाभिलाषी अष्टधापूजनद्रव्यै: जिनं पूजयेत्। पंचमीदिनमारभ्य चतुर्दशीपर्यन्तं व्रतं कार्यम्, ब्रह्मचर्यविधिना स्थातव्यम्। इदं व्रतं दशवर्षपर्यन्तं करणीयम्, ततश्चोद्यापनं कुर्यात्। अथवा दशोपवासा: कार्या:। अथवा पंचमीचतुर्दश्योरुपवासद्वयं शेषमेकाशनमिति केषाञ्चिन्मतम्, तत्तु शक्तिहीनतयाङ्गीकृतं न तु परमो मार्ग:।

अर्थ-दशलक्षण व्रत भाद्रपद मास में शुक्लपक्ष की पंचमी से आरंभ किया जाता है। पंचमी तिथि को प्रोषध करना चाहिए तथा समस्त गृहारम्भ का त्यागकर जिनमंदिर में जाकर, पूजन-अर्चन, अभिषेक आदि धार्मिक क्रियाएँ सम्पन्न करनी चाहिए। अभिषेक के लिए चौबीस भगवान की प्रतिमाओं को स्थापन कर उनके आगे दशलक्षण यंत्र स्थापित करना चाहिए। पश्चात् अभिषेक क्रिया सम्पन्न करनी चाहिए। मोक्षाभिलाषी भव्य अष्ट द्रव्यों से भगवान जिनेन्द्र का पूजन करता है। यह व्रत भादों सुदी पंचमी से भादों सुदी चतुर्दशी तक किया जाता है। दसों दिन ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है।
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मंगल सन्देश


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दशधर्म भजन


भजन-६ उत्तम संयम धर्म


तर्ज—बाबुल की दुआएं......


उत्तम संयम के पालन से, मानव को शिव का द्वार मिले।
निज मन पे नियंत्रण करने से, रत्नत्रय का भंडार मिले।।टेक.।।

पारसमणि को पाना जैसे, दुर्लभ ही नहीं अतिदुर्लभ है।
वैसे ही संयमरूपी मणि को, पाना भी अतिदुर्लभ है।।
यदि मिल जावे वह रत्न तो समझो, मोक्षपंथ साकार मिले।
निज मन पे नियंत्रण करने से, रत्नत्रय का भंडार मिले।।१।।

इन्द्रिय संयम प्राणी संयम से, संयम द्वैविध माना है।
इनका पालन करने वालों को, शिवपद निश्चित पाना है।।
श्रावक को भी िंकचित् संयम, पालन से सुख आधार मिले।
निज मन पे नियंत्रण करने से, रत्नत्रय का भंडार मिले।।२।।
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दशलक्षण भक्ति:


दशलक्षण भक्ति:

(वसंततिलका छंदः)

योगी क्षमागुणमयो भुवनैकबंधुः।
क्रोधं निहत्य निज शांतरसे निमग्नः।।
स्वात्मैकजन्यपरमामृतसंप्रतृप्तः।
तं योगिनं हृदि दधे परमां क्षमां च।।१।।

भावो मृदोर्भवति मार्दवधर्म एषः।
अष्टौ मदानपि निरस्य विभाति साधौ।।
वश्यं करोति भुवनं विनयैश्चतुर्धा।
तं योगिनं हृदि दधे वरमार्दवं च।।२।।

मायामपास्य सरलं कुरुते त्रियोगं।
एकाग्रध्यानमपि साम्यतया विधत्ते।।
मुक्तिर्भवेत् ऋजुगतेः खलु तस्य साधोः।

तं योगिनं हृदि दधे परमार्जवं च।।३।।

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दशलक्षण धर्म पूजा


तीर्थंकर ऋषभदेव के दश अवतार


दशलक्षण विशेष


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सोलहकारण विधान पढ़ें


दशलक्षण पर्व


आर्जव धर्म का प्रवचन


मांगीतुंगी सिद्धक्षेेत्र में उमड़ रहा है भक्तों का सैलाब-

मांगीतुंगी ऋषभदेवपुरम् में प्रात:कालीन पारस चैनल के माध्यम से सभी देशवासी एवं दशलक्षण पर्व में पधारे भक्तगण पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ सान्निध्य में बहुत ही हर्षोल्लास के साथ दशलक्षण पर्व मनाया जाता है। सुबह से लेकर शाम तक भक्तगण पुण्य अर्जित कर रहे हैं। रात्रि में पूज्य माताजी की आरती में सभी श्रावकगण झूम उठते हैं। तत्पश्चात् सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता है। पूज्य चंदनामती माताजी ने आर्जव धर्म पर बहुत ही सुमधुर वाणी से भक्तों को ज्ञानार्जन करवाया। आर्जव धर्म के विषय का शुभारंभ हुआ है। ये मन को स्थिर करने वाला है इस भव् में आर्जव धर्म को आचरण में लाओ, उसका पालन करो, इस भव में आर्जव धर्म को धारण करो। पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी ने दशधर्म पुस्तक में हर एक धर्म को बहुत ही सुंदर ढंग से लिखा है। पूज्य माताजी ने सिद्धान्तचिंतामणि टीका के ३५०० पेज लिखकर दिए हैं। आर्यिका सुलोचना के समान ११ अंश की धारिणी है। माताजी कहती हैं-
ऋजुता का भाव आर्जव है, उसे कैसे धारण करें।
मन, वचन, काय को सरल बनाओ ,क्योंकि कुटिलता से तिर्यंच योनि की प्राप्ती होती है।

हे नाथ मेरे स्वामी आपसे वरदान एक चाहूँ।
ऋजुता हृदय में लाकर आर्जव धर्म निभाऊँ।
अनमोल इस रतन को अब न गवाने पाऊँ।
हमने जब क्षमा धारण कर ली, परिणामों में मृदुता धारण की, हे प्राणी सरलता को धारण करो, कुटिलता को छोड़ो।
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व्रत विधि


मेघमाला व्रत

मेघमाला व्रत भादों बदी प्रतिपदा से लेकर आश्विन वदी प्रतिपदा तक ३१ दिन तक किया जाता है। व्रत के प्रारंभ करने के दिन ही जिनालय के आँगन में सिंहासन स्थापित करें अथवा कलश को संस्कृत कर उसके ऊपर थाल रखकर, थाल में जिनबिम्ब स्थापित कर महाभिषेक और पूजन करे। श्वेत वस्त्र पहने, श्वेत ही चन्दोवा बांधे, मेघधारा के समान १००८ कलशों से भगवान का अभिषेक करे। पूजापाठ के पश्चात् ॐ ह्रीं पंचपरमेष्ठिभ्यो नम: इस मंत्र का १०८ बार जाप करना चाहिए।

मेघमाला व्रत में सात उपवास कुल किये जाते हैं और २४ दिन एकाशन करना होता है। तीनों प्रतिपदाओं के तीन उपवास, दोनों अष्टमियों के दो उपवास एवं दोनों चतुर्दशियों के दो उपवास इस प्रकार कुल सात उपवास किये जाते हैं।
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भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ


भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ

(चैत्र कृ. नवमी-१० मार्च २०१८ से चैत्र कृ. नवमी-२९ मार्च २०१९)
प्रेरणा-भारतगौरव दिव्यशक्ति शारदे माँ गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी
        
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आज हम सभी वर्तमान विश्व में उपस्थित आतंकवाद, हिंसा, विनाश, अशांति, परस्पर शत्रुता, विद्वेष, बदला लेने की भावना आदि विकृतियों से ग्रसित हो रही मानवता को दृष्टिगत कर रहे हैं। ‘अहिंसामयी शाश्वत धर्म’ का शीतल जल ही इन अग्नि ज्वालाओं के उपशमन में सहयोगी हो सकता है, यही तीर्थंकर भगवन्तों की सदाकाल से देशना रही है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से की गई धर्माराधना, मंत्रानुष्ठान, विधि-विधान भी सम्पूर्ण वातावरण को प्रभावित करके क्षेम-सुभिक्ष-शांति-सौहार्द की स्थापना करने में अत्यन्त कार्यकारी होते हैं, यह परम सत्य है।

      इन्हीं विश्वकल्याणकारी भावनाओं से ओतप्रोत होकर भारतगौरव, दिव्यशक्ति, परम उपकारी परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ऋषभगिरि-मांगीतुंगी में विराजमान विश्व के सर्वाधिक उत्तुंग १०८ फुट भगवान ऋषभदेव के श्रीचरणों में स्थित होकर भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती, चैत्र कृ. नवमी, १० मार्च २०१८ के पावन अवसर पर ‘भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष’ मनाने की प्रेरणा प्रदान की है, जो आने वाली ऋषभ जयंती, चैत्र कृ. नवमी, २९ मार्च २०१९ तक हम सबको व्यक्तिगत शांति, सामाजिक शांति, राष्ट्रीय शांति एवं विश्वशांति हेतु जागृत होकर अपना-अपना योगदान प्रदान करने हेतु कटिबद्ध कर रहा है। आइये हम भी विश्वशांति के इस महा आयोजन में किसी न किसी रूप में अपना सहयोग प्रदान कर पुण्यलाभ प्राप्त करें।

विश्वशांति वर्ष मनाने की रूपरेखा-

(१) विश्वशांति हेतु जाप्य (मंत्र-ॐ ह्रीं विश्वशांतिकराय श्री ऋषभदेवाय नम:)
(२) भगवान ऋषभदेव मण्डल विधान
(३) णमोकार महामंत्र अथवा भक्तामर महास्तोत्र का अखण्ड पाठ (अपने समयानुसार)
(४) भगवान ऋषभदेव पर संगोष्ठी

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नाटिका


आर्जव धर्म पर मोनो ऐक्टिंग
लेखिका—प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चन्दनामती माताजी
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सूर्पणखा नाम की एक स्त्री रोती हुई मंच पर प्रवेश करती है और सामने राम-लक्ष्मण को देखकर उनके रूप पर मोहित होकर कहती है — ओहो ! ये तो कोई देवपुरुष अथवा कामदेव दिख रहे हैं। इन्हें देखकर मैं तो धन्य हो गई। अब तो अपने ऊपर इन्हें मोहित करने हेतु कुछ मायाजाल बिछाना पड़ेगा।

स्त्रीलगता है सीधी उंगली से घी निकलने वाला नहीं, टेढी उंगली से ही निकालना पड़ेगा। (रोती है.......) गाती है—

चाल चली भई चाल चली, मैंने कैसी चाल चली ।

कभी रामजी निहारें, कभी लक्ष्मण प्यारे, सीता सी सती वनवास चली।
चाल चली भई चाल चली......

आवाज सुनकर सीता आगे आती है और एक कन्या को बैठी देखकर कहती है—

सीताकन्ये! तुम इस घनघोर जंगल में क्यों बैठी रो रही हो ? क्या नाम है तुम्हारा ? कहाँ से आई हो ?

सूर्पणखा को सीता अपने साथ में राम के समीप ले जाती है। वहाँ सूर्पणखा आकर पहले लक्ष्मण से कहती है—

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सुगंधदशमी व्रत


सुगंधदशमी व्रत

जम्बूद्वीप के विजयार्ध पर्वत की उत्तरश्रेणी में शिवमंदिर नाम का एक नगर है। वहाँ का राजा प्रियंकर और रानी मनोरमा थी सो वे अपने धन, यौवन आदि के ऐश्वर्य में मदोन्मत्त हुए जीवन के दिन पूरे करते थे। धर्म किसे कहते हैं, वह उन्हें मालूम भी न था।

एक समय सुगुप्त नाम के मुनिराज कृश शरीर दिगम्बर मुद्रायुक्त आहार के निमित्त बस्ती में आये, उन्हें देखकर रानी ने अत्यंत घृणापूर्वक उनकी निंदा की और पान की पीक मुनि पर थूंक दी। सो मुनि तो अन्तराय होने के कारण बिना आहार लिए ही पीछे वन में चले गये और कर्मों की विचित्रता पर विचार कर समभाव धारण कर ध्यान में निमग्न हो गये।

परन्तु थोड़े दिन पश्चात् रानी मरकर गधी हुई, फिर सूकरी हुई, फिर कुकरी हुई, फिर वहाँ से मरकर मगध देश के बसंततिलका नगर में विजयसेन राजा की रानी चित्रलेखा की दुर्गन्धा नाम की कन्या हुई। सो इसके शरीर से अत्यन्त दुर्गन्ध निकला करती थी।

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श्री गौतम गणधर वाणी


रत्नत्रय व्रत विधि


रत्नत्रयं तु भाद्रपदचैत्रमाघशुक्लपक्षे च द्वादश्यां धारणं चैकभक्तं च त्रयोदश्यादिपूर्णिमान्तमष्टमं कार्यम्, तदभावे यथाशक्ति काञ्जिकादिकं, दिनवृद्धौ, तदधिकतया कार्यम्, दिनहानौ तु पूर्वदिनमारभ्य तदन्तं कार्यमिति पूर्वक्रमो ज्ञेय:।

अर्थ-रत्नत्रय व्रत भाद्रपद, चैत्र और माघ मास में किया जाता है। इन महीनों के शुक्लपक्ष में द्वादशी तिथि को व्रत धारण करना चाहिए तथा एकाशन करना चाहिए। त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा का उपवास करना, तीन दिन का उपवास करने की शक्ति न हो तो कांजी आदि लेना चाहिए। रत्नत्रय व्रत के दिनों में किसी तिथि की वृद्धि हो तो एक दिन अधिक व्रत करना एवं एक तिथि की हानि होने पर एक दिन पहले से लेकर व्रत समाप्ति पर्यंत उपवास करना चाहिए। यहाँ पर भी तिथि हानि और तिथि वृद्धि में पूर्व क्रम ही समझना चाहिए।

विवेचन-रत्नत्रय व्रत के लिए सर्वप्रथम द्वादशी को शुद्ध भाव से स्नानादि क्रिया करके स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण कर जिनेन्द्र भगवान का पूजन-अभिषेक करे। द्वादशी को इस व्रत की धारणा और प्रतिपदा को पारणा होती है। अत: द्वादशी को एकाशन के पश्चात् चारों प्रकार के आहार का त्याग कर, विकथा और कषायों का त्याग करे। त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को प्रोषध तथा प्रतिपदा को जिनाभिषेकादि के अनन्तर किसी अतिथि या किसी दु:खित-बुभुक्षित को भोजन कराकर एक बार आहार ग्रहण करे। अपने घर में ही अथवा चैत्यालय में जिनबिम्ब के निकट रत्नत्रय यंत्र की भी स्थापना करे।

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आज का दिन - १९ सितम्बर २०१८ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक १९ सितम्बर,२०१८
तिथी- भाद्रपद शुक्ल १०
दिन-बुधवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७५

सूर्योदय ०६.१२
सूर्यास्त १८.१८


अथ भाद्रपद मास फल विचार

सुगन्ध-धूप दशमी
उत्तम संयम धर्म
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०-९ अं
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