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आचार्य श्री वीरसागर काव्य कथानक


आचार्य श्री वीरसागर काव्य कथानक भाग-१
आचार्य श्री वीरसागर काव्य कथानक भाग-२
आचार्य श्री वीरसागर काव्य कथानक भाग-३
आचार्य श्री वीरसागर काव्य कथानक भाग-४

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आचार्य शांतिसागर मुनि दीक्षा शताब्दी वर्ष 2019-2020


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4 वर्ष 9 महीने की निर्जरा जैन द्वारा धर्म प्रभावना
तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय


तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय मुरादाबाद में जैन मंदिर

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जैनेश्वरी दीक्षा


जैनेश्वरी दीक्षा - मुनि श्री आत्म्मीय सागर जी (दीक्षा पूर्व - नवनीत भैय्या)
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नवग्रह शांति चालीसा


नवग्रह शांति चालीसा

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चौबीसों तीर्थेश हैं,जग के तारणहार |
नितप्रति भक्ती मैं करूँ,मन मंदिर में धार ||
उनमें से नौ जिनप्रभू,नवग्रह स्वामी जान|
श्री जिनसागर सूरिकृत,ग्रन्थ करें व्याख्यान ||
उन नवग्रह के स्वामि का,चालीसा सुखकार|
ग्रह अरिष्ट को दूर कर,देता शांति अपार ||
-चौपाई -
जय जय वीतराग तीर्थंकर,हे प्रभुवर!तुम सर्व हितंकर||१||
निज पर का उत्थान किया है,आत्मा में ही रमण किया है||२||
आठ कर्म को नाशा तुमने,सिद्धपती कहलाए तबसे ||३||
जो जन भक्ति भाव से ध्याते,दुःख संकट सब ही मिट जाते||४||

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नवग्रह सम्बंधित अन्य चालीसा पढें

शान्तिनाथ भगवान का परिचय


शान्तिनाथ भगवान का परिचय
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==परिचय==

इसी जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में रत्नपुर नाम का नगर है। उस नगर का राजा श्रीषेण था, उसके सिंहनन्दिता और अनिन्दिता नाम की दो रानियाँ थीं। इन दोनों के इन्द्रसेन और उपेन्द्रसेन नाम के दो पुत्र थे। उसी नगर की सत्यभामा नाम की एक ब्राह्मण कन्या अपने पति को दासी पुत्र जानकर उसे त्याग कर राजा के यहाँ अपने धर्म की रक्षा करते हुए रहने लगी थी। किसी एक दिन राजा श्रीषेण ने अपने घर पर हुए आदित्यगति और अरिंजय नाम के दो चारण मुनियों को पड़गाहन कर स्वयं आहारदान दिया और पंचाश्चर्य प्राप्त किये तथा दश प्रकार के कल्पवृक्षों के भोग प्रदान करने वाली उत्तरकुरू भोगभूमि की आयु बाँध ली। दान देकर राजा की दोनों रानियों ने तथा दान की अनुमोदना से सत्यभामा ने भी उसी उत्तम भूमि की आयु बाँध ली। सो ठीक ही है क्योंकि साधुओं के समागम से क्या नहीं होता ?

किसी समय इन्द्रसेन की रानी श्रीकांता के साथ अनन्तमति नाम की एक साधारण स्त्री आई थी उसके साथ उपेन्द्रसेन का स्नेह समागम हो गया। इस निमित्त को लेकर बगीचे में दोनों भाईयों का युद्ध शुरू हो गया। राजा इस युद्ध को रोकने में असमर्थ रहे, साथ ही अत्यन्त प्रिय अपने इन पुत्रों के अन्याय को सहन करने में असमर्थ रहे अत: वे विषपुष्प सूँघ कर मर गये, वही विषपुष्प सूँघ कर दोनों रानियाँ और सत्यभामा भी प्राणरहित हो गर्इं तथा धातकीखंड के पूर्वार्ध भाग में जो उत्तर कुरू प्रदेश है उसमें राजा तथा सिंहनन्दिता दोनों दम्पत्ती हुए और अनिन्दिता नाम की रानी आर्य तथा सत्यभामा उसकी स्त्री हुई, इस प्रकार वे सब वहाँ भोगभूमि के सुखों को भोगते हुए सुख से रहने लगे।


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पंचकल्याणक सम्मेद शिखर जी


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द्रव्यसंग्रह


परमपूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न श्री चंदनामती माताजी द्वारा पारस चैनल के माध्यम से द्रव्यसंग्रह का अध्ययन कराया जा रहा है ।

पवार पॉइंट प्रजेंटेशन


कुछ नए प्रजेंटेशन्स

सम्यग्ज्ञान पत्रिका


भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ


भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ

(चैत्र कृ. नवमी-१० मार्च २०१८ से चैत्र कृ. नवमी-२९ मार्च २०१९)
प्रेरणा-भारतगौरव दिव्यशक्ति शारदे माँ गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी
        
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आज हम सभी वर्तमान विश्व में उपस्थित आतंकवाद, हिंसा, विनाश, अशांति, परस्पर शत्रुता, विद्वेष, बदला लेने की भावना आदि विकृतियों से ग्रसित हो रही मानवता को दृष्टिगत कर रहे हैं। ‘अहिंसामयी शाश्वत धर्म’ का शीतल जल ही इन अग्नि ज्वालाओं के उपशमन में सहयोगी हो सकता है, यही तीर्थंकर भगवन्तों की सदाकाल से देशना रही है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से की गई धर्माराधना, मंत्रानुष्ठान, विधि-विधान भी सम्पूर्ण वातावरण को प्रभावित करके क्षेम-सुभिक्ष-शांति-सौहार्द की स्थापना करने में अत्यन्त कार्यकारी होते हैं, यह परम सत्य है।

      इन्हीं विश्वकल्याणकारी भावनाओं से ओतप्रोत होकर भारतगौरव, दिव्यशक्ति, परम उपकारी परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ऋषभगिरि-मांगीतुंगी में विराजमान विश्व के सर्वाधिक उत्तुंग १०८ फुट भगवान ऋषभदेव के श्रीचरणों में स्थित होकर भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती, चैत्र कृ. नवमी, १० मार्च २०१८ के पावन अवसर पर ‘भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष’ मनाने की प्रेरणा प्रदान की है, जो आने वाली ऋषभ जयंती, चैत्र कृ. नवमी, २९ मार्च २०१९ तक हम सबको व्यक्तिगत शांति, सामाजिक शांति, राष्ट्रीय शांति एवं विश्वशांति हेतु जागृत होकर अपना-अपना योगदान प्रदान करने हेतु कटिबद्ध कर रहा है। आइये हम भी विश्वशांति के इस महा आयोजन में किसी न किसी रूप में अपना सहयोग प्रदान कर पुण्यलाभ प्राप्त करें।

विश्वशांति वर्ष मनाने की रूपरेखा-

(१) विश्वशांति हेतु जाप्य (मंत्र-ॐ ह्रीं विश्वशांतिकराय श्री ऋषभदेवाय नम:)
(२) भगवान ऋषभदेव मण्डल विधान
(३) णमोकार महामंत्र अथवा भक्तामर महास्तोत्र का अखण्ड पाठ (अपने समयानुसार)
(४) भगवान ऋषभदेव पर संगोष्ठी

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शाश्वत तीर्थराज अयोध्या


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संस्कृति का ऐतिहासिक संरक्षण

जैनधर्म में अयोध्या तीर्थ की महिमा अपरम्पार बताई गई है। जिस भूमि पर प्रत्येक काल में चौबीसों तीर्थंकर भगवन्तों के जन्म होवें, तो ऐसी महान तीर्थभूमि का अतिशय और उसकी रज में बसे तीर्थंकर भगवन्तों के परमाणु का प्रताप कितना अधिक हो सकता है, इस बात का अनुभव स्वत: ही किया जा सकता है। तभी तो तीर्थंकर भगवन्तों की शाश्वत जन्मभूमि अयोध्या की वंदना करने हेतु भक्तजन अनेक बार अयोध्या आकर अपनी आत्मा को पवित्र करते हैं और मनुष्य जीवन को सफल मानते हैं। यद्यपि हुण्डावसर्पिणी कालदोष के कारण वर्तमान काल में भगवान आदिनाथ, भगवान अजितनाथ, भगवान अभिनंदननाथ, भगवान सुमतिनाथ एवं भगवान अनंतनाथ, इन पाँच तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में हुआ है, लेकिन यह शाश्वत जन्मभूमि अयोध्या समस्त जैन समाज के लिए अत्यन्त श्रद्धा का केन्द्र है।

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समवसरण विंशतिका


समवसरण विंशतिका

-प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी

-दोहा-

सरस्वती लक्ष्मी जहाँ, नितप्रति करें प्रणाम।
पुण्यमयी उस धाम का, समवसरण है नाम।।

समवसरण का स्वरूप
छंद-विष्णुपद (कहाँ गये चक्री-बारहभावना)
जहाँ पहुँचते ही दर्शक का पाप शमन होता।
जहाँ पहुँचते ही मानी का मान गलन होता।।
सबको शरण प्रदाता वह ही समवसरण माना।
जिनवर की उस धर्मसभा को नमूँ परमधामा।।१।।

समवसरण के स्वामी
तीर्थंकर प्रभु तप करके बनते केवलज्ञानी।
वे ही बन अरिहंत कहाते समवसरण स्वामी।।
इन्द्राज्ञा से धनकुबेर रचता इक धर्मसभा।
नमूँ उसे नश जाती जिससे भव की पूर्ण व्यथा।।२।।

मानस्तंभ का महत्व
समवसरण की चार दिशा में मानस्तंभ बने।
जिनवर से बारह गुणिते ऊँचे अप्रतिम घने।।
मुख्यद्वार में जाते ही उनका दर्शन होता।
नमूँ वही मानस्तंभ जहाँ मिथ्यात्व वमन होता।।३।।

चैत्यप्रासाद भूमि
प्रथम कोट जो धूलिसाल उससे आगे भूमी।
चैत्यभवन एवं महलों से सहित प्रथम भूमी।।
देव मनुज क्रीड़ा करते वहाँ जाते पुण्यात्मा।
जिनप्रतिमा युत चैत्य भूमि को नमें महानात्मा।।४।।

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पंचकल्याणक हस्तिनापुर


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ज्ञानमती माताजी के चातुर्मास


भारत गौरव गणिनी प्रमुख आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी के

दीक्षित जीवन के 67 चातुर्मास (1953-2019)

*वर्ष 1953 टिकैत नगर (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1954 जयपुर (राजस्थान)

*वर्ष 1955 महेश्वर (महाराष्ट्र)

*वर्ष 1956 जयपुर (खानिया)

*वर्ष 1957 जयपुर (खानिया)

*वर्ष 1958 ब्यावर (राजस्थान)

*वर्ष 1959 अजमेर (राजस्थान)

*वर्ष 1960 सुजानगढ़ (राजस्थान)

*वर्ष 1961 सीकर (राजस्थान)

*वर्ष 1962 लाडनूं (राजस्थान)

*वर्ष 1963 कोलकाता (पश्चिम बंगाल)

*वर्ष 1964 हैदराबाद (आंध्र प्रदेश)

*वर्ष 1965 श्रवणबेलगोला (कर्नाटक)

*वर्ष 1966 सोलापुर (महाराष्ट्र)

*वर्ष 1967 सनावद (मध्य प्रदेश)

*वर्ष 1968 प्रतापगढ़ (राजस्थान)

*वर्ष 1969 जयपुर (राजस्थान)

*वर्ष 1970 टोंक (राजस्थान)

*वर्ष 1971 अजमेर (राजस्थान)

*वर्ष 1972 दिल्ली (पहाड़ी धीरज)

*वर्ष 1973 दिल्ली (नजफगढ़)

*वर्ष 1974 दिल्ली (लाल मंदिर)

*वर्ष 1975 हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर)

*वर्ष 1976 खतौली (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1977 हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर)

*वर्ष 1978 हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर)

*वर्ष 1979 दिल्ली (मोरी गेट)

*वर्ष 1980 दिल्ली (कूचा सेठ)

*वर्ष 1981 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1982 दिल्ली (मोदी धर्मशाला)

*वर्ष 1983 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1984 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1985 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1986 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1987 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1988 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1989 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1990 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1991 सरधना (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1992 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1993 अयोध्या (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1994 टिकैतनगर (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1995 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1996 मांगी तुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 1997 दिल्ली (लाल मंदिर)

*वर्ष 1998 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1999 दिल्ली (कनॉट प्लेस)

*वर्ष 2000 दिल्ली (प्रीत विहार)

*वर्ष 2001 दिल्ली (अशोक विहार)

*वर्ष 2002 प्रयाग इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 2003 कुंडलपुर-नालंदा (बिहार)

*वर्ष 2004 कुंडलपुर-नालंदा (बिहार)

*वर्ष 2005 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2006 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2007 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2008 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2009 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2010 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2011 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2012 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2013 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2014 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2015 मांगीतुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2016 मांगीतुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2017 मुंबई (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2018 मांगीतुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2019 टिकैतनगर (उ.प्र.)

चातुर्मास के विषय में पढ़ें

आज का दिन - ३० जनवरी २०२० (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक ३० जनवरी २०२०
तिथी- माघ शुक्ल ५
दिन- गुरुवार
वीर निर्वाण संवत- २५४६
विक्रम संवत- २०७६

सूर्योदय ०७.१२
सूर्यास्त १८.०६


अथ माघ मास फल विचार

दशलक्षण व्रत प्रारम्भ
पुष्पांजलि व्रत प्रारम्भ
बसंत पंचमी
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पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी की 86वीं महाजयंती के प्रतिदिन की फोटोज


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