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वर्षायोग स्थापना विधि भाग-१
बेसिक डिप्लोमा इन जैनोलोजी ऑनलाइन फॉर्म
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प्रमुख विषय


जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



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शिक्षाप्रद कथाएं


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इन्द्रध्वज विधान


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Basic Knowledge of Jainism


चातुर्मास स्थापना वर्षायोग धर्म विकास की आधारशिला हैं


स्मरण करूं जिनदेव का,

गुरू को उर में धार
जिनवाणी को ध्याय के,
नमन करूं शतबार
पानी से पूछा गया कैसा तेरा रंग

जैसी संगति मिल गई, वैसा मेरा रंग।।

संत समुदाय हमारे राष्ट्र की सर्वश्रेष्ठ पूंजी है। सर्वश्रेष्ठ धरोहर है। भारत संतों की जन्मभूमि है। भारतीय इतिहास में जैन श्रमणों का सर्वोपरी स्थान रहा है। वर्षायोग— चातुर्मास का प्राचीन नाम है ‘वर्षायोग’ आत्मसाधना हेतु जिसका स्वस्थ सुयोग। वनस्पति कायिक जीवों का विधात न होवे, अहिंसा धर्म की रक्षा हो, सब रहे निरोग!!!

धन्य है हमारे पूर्वाचार्य जिन्होंने वर्षायोग के विज्ञान को अहिंसामूलक धर्म की चाशनी में लपेटकर सहज ही श्रद्धा से मानव के गले में उतार दिया । शरीर मन और आत्मा तीनों तलों पर विरागी साधु को स्वास्थ्य संरक्षण की आध्यात्मिक औषधि थमा दी।

सांसारिक आपाधापी में फंसे मानव भोग— विलासों, भौतिक साधन सुविधाओं , राजनीति और अर्थतंत्र के कलापूर्ण चातुर्य की वैविध्यताओं से ग्रसित प्रमादों की चादर तानकर सोये अविवेकी जन के लिए ये चलते—फिरते तीर्थ (दिगम्बर जैन संत) कुछ समय के लिए ठहर जाते हैं। जागो, उठो चलो........ चातुर्मास एक धर्म पुरूषार्थ का समय है। ऐसे मौकों को चूकना नहीं चाहिए कारण चातुर्मास साल में सिर्फ एक बार आता है। चातुर्मास समर्पण—सेवा व संकल्प का त्यौहार है। यह ध्यान—साधन—प्रभावना का पर्व है। पूरा पढ़ें...

सप्तऋषि व्रत (४ जुलाई से १० जुलाई तक)


सप्तर्षि व्रत(मृत्युंजय व्रत)

आज से लगभग ९ लाख वर्ष पूर्व श्री रामचन्द्र के समय मथुरानगरी के उद्यान में सात महर्षि महामुनि पधारे थे। वहाँ वर्षायोग स्थापित किया था, उनके शरीर से स्पर्शित हवा के प्रभाव से वहाँ पर दैवी प्रकोप-महामारी रोग कष्ट दूर हुआ था। तभी से लेकर आज तक इन सप्तर्षि मुनियों की प्रतिमाएँ मंदिरों में विराजमान कराने की परम्परा चली आ रही है और इनका अभिषेक-भक्ति आदि पूजा की जाती है।

इस व्रत की विधि-आषाढ़ शु. चतुर्दशी से श्रावण कृष्णा पंचमी तक सात दिन यह व्रत करना चाहिए। इन व्रतों के दिन सप्तर्षि मुनियों की प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक करके उन्हीं की पूजा करें। मंत्र निम्न प्रकार हैं-

समुच्चय मंत्र-ॐ ह्रीं अर्हं सुरमन्यु-श्रीमन्यु-श्रीनिचय-सर्वसुन्दर-जयवान-विनयलालस-जयमित्रनाम सप्त महर्षिभ्यो नम:।

प्रत्येक दिन के प्रत्येक पृथक्-पृथक् मंत्र-

१. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसुरमन्युमहर्षये नम:।

२. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीश्रीमन्युमहर्षये नम:।

३. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीनिचयमहर्षये नम:।

४. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीसर्वसुंदरमहर्षये नम:।

५. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीजयवानमहर्षये नम:।

६. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीविनयलालसमहर्षये नम:।

७. ॐ ह्रीं अर्हं श्रीजयमित्रमहर्षये नम:।

क्रमशः सप्तऋषि व्रत पढ़ें

सप्तऋषि पूजा पढ़ें
गुरू पूर्णिमा महोत्सव


गुरू पूर्णिमा महोत्सव

मनुष्य जीवन में माता पिता और गुरु का महत्व विश्व भर में सर्वोपरि माना जाता है । माता पिता का इसलिये कि वे हमें जन्म देते हैं और गुरु इसलिये कि गुरू ही वास्तव में हमे मानव, इन्सान, मनुष्य बनाते है मनुष्यता, मानवीयता या इन्सानियत के संस्कार देते हैं। इस प्रकार गुरु हमे दूसरी बार जन्म देते हैं।

भारत धर्म तथा संस्कृति प्रधान देश है और भारत ही क्या सारे विश्व में गुरू का स्थान ईश्वर के समान और कहीं कहीं तो ईश्वर से भी प्रथम पूज्यनीय बताया गया है। हमारी संस्कृति उन्हें केवल गुरु नहीं ‘‘ गुरू देव’’ कहती है। जैन धर्म में तो ‘‘गुरू की महिमा वरनी न जाय ‘‘ गुरूनाम जपों मन वचन काय‘‘ कहकर गुरू को पंच परमेष्ठि का स्थान दिया है। देव, शास्त्र, और गुरू की त्रिवेणी में करके ही मोक्ष महल में प्रवेश की पात्रता आती है और उसके फलस्वरूप संसार के आवागमन से मुक्ति मिलती है। गुरू हमारे जीवन से अज्ञान का अन्धकार मिटाकर एक नई दृष्टि देते हैं। उन्हीं की दृष्टि —यष्टि के सहारे हम ‘‘भव—वन’’ से सुरक्षित निकल कर इहलोक और परलोक सुधारते हैं—

अज्ञान तिमिरान्धानां ज्ञानांजन शलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै: श्री गुरूवे नम:।।


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अष्टान्हिका व्रत


अष्टान्हिका व्रत विधि

अष्टान्हिकाव्रतं कार्तिकफाल्गुनाषाढमासेषु अष्टमीमारभ्य पूर्णिमान्तं भवतीति। वृद्धावधिकतया भवत्येव, मध्यतिथिह्रासे सप्तमीतो व्रतं कार्यं भवतीति; तद्यथा सप्तम्यामुपवासोऽष्टम्यां पारणा नवम्यां काञ्जिकं दशम्यामवमौदार्यमित्येको मार्ग: सुगम: सूचित: जघन्यापेक्षया तदादिदिनमारभ्य। पूर्णिमान्तं कार्य: षष्ठोपवास: पद्मदेववाक्यसमादरै: भव्यपुण्डरीक़ै: अन्यथाक्रियमाणे सति व्रतविधिर्नश्येत्। एवं सावधिकानि व्रतानि समाप्तानि।

अर्थ-अष्टान्हिका व्रत कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ मासों के शुक्ल पक्षों में अष्टमी से पूर्णिमा तक किया जाता है। तिथि-वृद्धि हो जाने पर एक दिन अधिक करना पड़ता है। व्रत के दिनों के मध्य में तिथि ह्रास होने पर एक दिन पहले से व्रत करना होता है। जैसे मध्य में तिथि ह्रास होने से सप्तमी को उपवास, अष्टमी को पारणा, नवमी को कांजी-छाछ, दशमी को ऊनोदर, एकादशी को उपवास, द्वादशी को पारणा, त्रयोदशी को नीरस, चतुर्दशी को उपवास एवं शक्ति होने पर पूर्णिमा को उपवास, शक्ति के अभाव में ऊनोदर तथा प्रतिपदा को पारणा करनी चाहिए। यह सरल और जघन्य विधि अष्टान्हिका व्रत की है। व्रत की उत्कृष्ट विधि यह है कि अष्टमी से षष्ठोपवास अर्थात् अष्टमी, नवमी का उपवास, दशमी को पारणा, एकादशी और द्वादशी को उपवास, त्रयोदशी को पारणा एवं चतुर्दशी और पूर्णिमा को उपवास और प्रतिपदा को पारणा करनी चाहिए । श्री पद्मप्रभदेव के वचनों का आदर करने वाले भव्य जीवों को उक्त विधि से व्रत करना चाहिए।

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पॉवर पॉइंट प्रजेंटेशन


कुछ नए प्रजेंटेशन्स

सम्यग्ज्ञान पत्रिका


जैन तीर्थ


जम्बूद्वीप हस्तिनापुर

तीर्थंकर जन्मभूमियों के इतिहास में यह प्रथम अवसर था, जब भगवान शांतिनाथ-कुंथुनाथ-अरहनाथ जैसे तीन-तीन पद के धारी महान तीर्थंकरों की साक्षात् जन्मभूमि हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर ग्रेनाइट पाषाण की 31-31 फुट उत्तुंग तीन विशाल प्रतिमाएं अत्यन्त मनोरम मुद्राकृति में निर्मित करके राष्ट्रीय स्तर के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के साथ विराजमान की गईं। 11 फरवरी से 21 फरवरी 2010 तक यह आयोजन भव्यतापूर्वक सम्पन्न हुआ, जिसमें देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य अर्जित किया। समापन के तीन दिवसों में तीनों भगवन्तों का ऐतिहासिक महामस्तकाभिषेक महोत्सव भी सम्पन्न हुआ। पूरा पढ़ें ...

वीरशासन दिवस


'वीरशासन दिवस का माहात्म्य

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भव्यात्माओं! अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर की दिव्यध्वनि श्रावण कृष्णा प्रतिपदा के दिन खिरी थी, उन्हीं के धर्मतीर्थ का प्रवर्तन वर्तमान में चल रहा है। उनके धर्म को धारण करने वाले जीव उन्हीं वीर प्रभु के शासन में रह रहे हैं। इसलिए यह श्रावणवदी एकम का दिवस ‘वीर शासन जयंती’ के नाम से सर्वत्र मनाया जाता है।

धवला में श्री वीरसेनाचार्य कहते हैं-

‘पंचशैलपुर (पंचपहाड़ी से शोभित राजगृही के पास) में विपुलाचल पर्वत के ऊपर भगवान महावीर ने भव्यजीवों को अर्थ का उपदेश दिया।

इस अवसर्पिणी कल्पकाल के ‘दु:षमा सुषमा’ नाम के चौथे काल के पिछले भाग में कुछ कम चौंतीस वर्ष बाकी रहने पर वर्ष के प्रथम मास, प्रथम पक्ष और प्रथम दिन में अर्थात् श्रावण कृष्णा एकम् के दिन प्रात:काल के समय आकाश में अभिजित नक्षत्र के उदित रहने पर धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति हुई।।५५-५६।।

श्रावण कृष्णा प्रतिपदा के दिन रुद्रमुहूर्त में सूर्य का शुभ उदय होने पर और अभिजित् नक्षत्र के प्रथमयोग में जब युग की आदि हुई तभी तीर्थ की उत्पत्ति समझना चाहिए।।५७।।

यह श्रावण कृष्णा प्रतिपदा वर्ष का प्रथम मास है और युग की आदि-प्रथम दिवस है। जैसा कि अन्यत्र ग्रंथों में भी कहा है।

अत: यह स्पष्ट है कि यह श्रावण कृष्णा एकम दिवस युग का प्रथम दिवस है। अर्थात् प्रत्येक सुषमा सुषमा, सुषमा आदि कालों का प्रारंभ इस दिवस से ही होता है। इसलिए यह दिवस अनादिनिधन जैन सिद्धांत के अनुसार वर्ष का प्रथम दिवस माना जाता है। अनादिकाल से युग और वर्ष की समाप्ति आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को होती है। युग तथा वर्ष का प्रारंभ श्रावण कृष्णा एकम से होता है। वर्तमान में इसी दिन वीर प्रभु की दिव्यध्वनि खिरने से धर्मतीर्थ का प्रवर्तन इसी दिन से चला है। इसलिए यह दिवस और भी महान होने से महानतम अथवा पूज्यतम हो गया है। पूरा पढ़े...

भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ


भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ

(चैत्र कृ. नवमी-१० मार्च २०१८ से चैत्र कृ. नवमी-२९ मार्च २०१९)
प्रेरणा-भारतगौरव दिव्यशक्ति शारदे माँ गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी
        
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आज हम सभी वर्तमान विश्व में उपस्थित आतंकवाद, हिंसा, विनाश, अशांति, परस्पर शत्रुता, विद्वेष, बदला लेने की भावना आदि विकृतियों से ग्रसित हो रही मानवता को दृष्टिगत कर रहे हैं। ‘अहिंसामयी शाश्वत धर्म’ का शीतल जल ही इन अग्नि ज्वालाओं के उपशमन में सहयोगी हो सकता है, यही तीर्थंकर भगवन्तों की सदाकाल से देशना रही है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से की गई धर्माराधना, मंत्रानुष्ठान, विधि-विधान भी सम्पूर्ण वातावरण को प्रभावित करके क्षेम-सुभिक्ष-शांति-सौहार्द की स्थापना करने में अत्यन्त कार्यकारी होते हैं, यह परम सत्य है।

      इन्हीं विश्वकल्याणकारी भावनाओं से ओतप्रोत होकर भारतगौरव, दिव्यशक्ति, परम उपकारी परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ऋषभगिरि-मांगीतुंगी में विराजमान विश्व के सर्वाधिक उत्तुंग १०८ फुट भगवान ऋषभदेव के श्रीचरणों में स्थित होकर भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती, चैत्र कृ. नवमी, १० मार्च २०१८ के पावन अवसर पर ‘भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष’ मनाने की प्रेरणा प्रदान की है, जो आने वाली ऋषभ जयंती, चैत्र कृ. नवमी, २९ मार्च २०१९ तक हम सबको व्यक्तिगत शांति, सामाजिक शांति, राष्ट्रीय शांति एवं विश्वशांति हेतु जागृत होकर अपना-अपना योगदान प्रदान करने हेतु कटिबद्ध कर रहा है। आइये हम भी विश्वशांति के इस महा आयोजन में किसी न किसी रूप में अपना सहयोग प्रदान कर पुण्यलाभ प्राप्त करें।

विश्वशांति वर्ष मनाने की रूपरेखा-

(१) विश्वशांति हेतु जाप्य (मंत्र-ॐ ह्रीं विश्वशांतिकराय श्री ऋषभदेवाय नम:)
(२) भगवान ऋषभदेव मण्डल विधान
(३) णमोकार महामंत्र अथवा भक्तामर महास्तोत्र का अखण्ड पाठ (अपने समयानुसार)
(४) भगवान ऋषभदेव पर संगोष्ठी

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अक्षय_तृतीया


अक्षय तृतीया-आहार गीत

तर्ज-एक परदेशी...

प्रभु ऋषभदेव का आहार हो रहा,
हस्तिनापुरी में जयजयकार हो रहा।।
प्रथम प्रभू का प्रथम पारणा, प्रथम बार जब हुआ महल में।।हुआ..।।
पंचाश्चर्य की वृष्टि हुई थी, चौके का भोजन अक्षय हुआ तब।।
अक्षय....।।
भक्ती में विभोर सब संसार हो रहा,
हस्तिनापुर में जयजयकार हो रहा।।प्रभू........।।१।।
भरत ने नगरि अयोध्या से आकर, श्रेयांस का सम्मान किया था।।
श्रेयांस....।।
दानतीर्थ के प्रथम प्रवर्तक, कहकर उन्हें बहुमान दिया था।।बहुमान....।।
राजा के महलों में मंगलाचार हो रहा,
हस्तिनापुर में जयजयकार हो रहा।।प्रभू........।।२।।
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प्रबन्ध सम्पादक की कलम से



विषय - इंद्रध्वज विधान की जानिए महिमा

हस्तिनापुर तीर्थ पर अष्टानिक पर्व में चल रहा इंद्रध्वज महामंडल विधान-

बंधुओं!  हस्तिनापुर की धरा को देखकर शायद ऐसा सोचने पर मजबूर हो जाता कि यह मध्यलोक है या स्वर्ग ? यहां सुबह से लेकर रात्रि तक ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से हर दिन पूजा अभिषेक नए-नए विधानो की रचना पूज्य माताजी ने की है वह विधान भी सभी भक्त लोग करके बहुत ही सुख की अनुभूति करते हैं आचार्य कुंदकुंद देव के अनुसार तो दानम पूजा मुख्य अर्थात श्रावक के लिए दान और पूजन यह दोनों नित्य के आवश्यक कर्तव्य है इसलिए पूजन करना यह श्रावक का आवश्यक कार्य होना ही चाहिए इसके अतिरिक्त अनेकानेक मंडल विधान की पूजा की जाती हैं जिसमें सर्वोत्कृष्ट एवं अचिंत्य फल प्रदायक ऐसा यह इंद्र ध्वज ध्वज नामक विधान है जिसकी रचना पूज्य करने प्रमुख ज्ञानमती माताजी ने सन 1976 में 3 माह के अंत समय में की समय में की जिसे देखकर अवश्य ही आश्चर्य प्रतीत होता है इस विधान में 50 पूजाएं हैं और सभी पूजाओं के पद अलग-अलग शब्दों में लिखना बहुत ही विद्वता एवं भाषाविद की बात है इस इंद्रध्वज विधान में मध्यलोक के सभी कृत्रिम चैत्यालयों की पूजा की जाती है मध्यलोक के बीचो बीच में सुमेरु बीच में  पर्वत है उसमें 16 चैत्यालय हैं| 

यह इंद्र ध्वज विधान जब भक्तजन करते हैं तो विधान करने वाले एवं श्रोताओं को अतिशय रूप से मंत्रमुग्ध करने वाला सिद्ध होता है इसका महत्व अचिंत यह अकथनीय है इस इंद्रध्वज की महिमा सुनिए सन 1976 में जब पूज्य माता जी ने यह यह ने यह यह विधान पूर्ण किया उसके कुछ दिन बाद विधान का पूरा बस्ता जो कि अच्छी तरह से गांठ लगा हुआ था वह बस्ता बंदर उठा ले गया उस समय माताजी खतौली उत्तर प्रदेश में विराजमान थी और सभी श्रावण एकदम घबरा गए संघ की बहने व श्रावक लोग रोटी ले जाकर बंदर को देने लगे बहुत ही परिश्रम करने के पश्चात वह बस्ता बंदर ने ऊपर से गिरा दिया बस्ते की गांठ पूज्य माता जी ने ऐसी लगाई थी कि बस्ता सुरक्षित ऊपर से नीचे सराफा बाजार में गिरा तक सभी लोग बहुत ही प्रसन्न हुए और उसी दिन इंद्रध्वज विधान का चमत्कार जान लिया ऐसा इंद्रध्वज विधान अष्टानिक पर्व में हो रहा है सभी लोग यह विधान पारस चैनल के माध्यम से देख कर पुण्य लाभ अर्जित करें एवं मनोवांछित फल की प्राप्ति भी होगी यही भगवान से प्रार्थना है|

– ब्र० कु० दीपा जैन


ज्ञानमती माताजी के चातुर्मास


भारत गौरव गणिनी प्रमुख आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी के

दीक्षित जीवन के 67 चातुर्मास (1953-2019)

*वर्ष 1953 टिकैत नगर (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1954 जयपुर (राजस्थान)

*वर्ष 1955 महेश्वर (महाराष्ट्र)

*वर्ष 1956 जयपुर (खानिया)

*वर्ष 1957 जयपुर (खानिया)

*वर्ष 1958 ब्यावर (राजस्थान)

*वर्ष 1959 अजमेर (राजस्थान)

*वर्ष 1960 सुजानगढ़ (राजस्थान)

*वर्ष 1961 सीकर (राजस्थान)

*वर्ष 1962 लाडनूं (राजस्थान)

*वर्ष 1963 कोलकाता (पश्चिम बंगाल)

*वर्ष 1964 हैदराबाद (आंध्र प्रदेश)

*वर्ष 1965 श्रवणबेलगोला (कर्नाटक)

*वर्ष 1966 सोलापुर (महाराष्ट्र)

*वर्ष 1967 सनावद (मध्य प्रदेश)

*वर्ष 1968 प्रतापगढ़ (राजस्थान)

*वर्ष 1969 जयपुर (राजस्थान)

*वर्ष 1970 टोंक (राजस्थान)

*वर्ष 1971 अजमेर (राजस्थान)

*वर्ष 1972 दिल्ली (पहाड़ी धीरज)

*वर्ष 1973 दिल्ली (नजफगढ़)

*वर्ष 1974 दिल्ली (लाल मंदिर)

*वर्ष 1975 हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर)

*वर्ष 1976 खतौली (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1977 हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर)

*वर्ष 1978 हस्तिनापुर (प्राचीन मंदिर)

*वर्ष 1979 दिल्ली (मोरी गेट)

*वर्ष 1980 दिल्ली (कूचा सेठ)

*वर्ष 1981 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1982 दिल्ली (मोदी धर्मशाला)

*वर्ष 1983 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1984 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1985 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1986 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1987 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1988 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1989 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1990 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1991 सरधना (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1992 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1993 अयोध्या (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1994 टिकैतनगर (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 1995 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1996 मांगी तुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 1997 दिल्ली (लाल मंदिर)

*वर्ष 1998 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 1999 दिल्ली (कनॉट प्लेस)

*वर्ष 2000 दिल्ली (प्रीत विहार)

*वर्ष 2001 दिल्ली (अशोक विहार)

*वर्ष 2002 प्रयाग इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

*वर्ष 2003 कुंडलपुर-नालंदा (बिहार)

*वर्ष 2004 कुंडलपुर-नालंदा (बिहार)

*वर्ष 2005 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2006 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2007 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2008 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2009 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2010 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2011 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2012 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2013 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2014 हस्तिनापुर (जंबूद्वीप)

*वर्ष 2015 मांगीतुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2016 मांगीतुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2017 मुंबई (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2018 मांगीतुंगी (महाराष्ट्र)

*वर्ष 2019 टिकैतनगर (उ.प्र.)

चातुर्मास के विषय में पढ़ें

आज का दिन - ४ जुलाई २०२० (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक ०४ जुलाई २०२०
तिथी- आषाढ़ शुक्ल १४
दिन- शनिवार
वीर निर्वाण संवत- २५४६
विक्रम संवत- २०७७

सूर्योदय ०५.२८
सूर्यास्त १९.२१


अथ आषाढ़ मास फल विचार

चतुर्मास स्थापना

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पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी की 86वीं महाजयंती के प्रतिदिन की फोटोज


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