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सम्यक्त्व का लक्षण:- गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा
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चातुर्मास सूची 2020


चतुर्मास सूची 2020
आचार्य परमेष्ठि स्थान
आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज ससंघ रेवती रेंज, इंदौर (म.प्र.)
आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज ससंघ बेलगांव (कर्णाटक)
आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज ससंघ (दक्षिण) सतना (म.प्र.)
गणधराचार्य श्री कुंथु सागर जी महाराज ससंघ कुंथुगिरी (महाराष्ट्र)
गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी महाराज ससंघ पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ (म.प्र.)
गणाचार्य श्री विराग सागर जी महाराज ससंघ भिण्ड (म.प्र.)
गणाचार्य श्री सिद्धांत सागर जी महाराज ससंघ बेला जी, दमोह (म.प्र.)
आचार्य श्री संभव सागर जी महाराज ससंघ त्रियोग आश्रम, श्री सम्मेद शिखर जी (झारखण्ड)
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भ्रान्तियों का निराकरण


शासनदेवी—देवताओं की पूजा (भ्रान्तियों का निराकरण)

प्रचार्य नरेन्द्र प्रकाश जैन

आजकल कुछ पत्र— पत्रिकाओं में शासनदेवी—देवताओं की मान्यता के विरोध में लेखादि छप रहे हैं उनमें जोर इस बात पर दिया जा रहा है कि हमारे लिए उपासक या वन्दनीय केवल वीतराग जिनेन्द्र देव ही हो सकते हैं। यह ठीक भी है। जैन सिद्धान्त का ‘क—ख—ग’ जानने वाला भी यही कहेगा। हमें भी यही इष्ट है। इससे असहमति व्यक्त करने का अर्थ तो अपने ‘जैनत्व’ पर ही प्रश्न चिह्न लगाना है। कोई शासनदेवों को माने या नहीं भी माने तो इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? जोर—जबर्दस्ती से न तो कोई किसी को उन्हें मानने के लिए विवश कर सकता है और न ही वह अहिंसक मार्ग ही है। ऐसे लेखों को पढ़कर चौंकते हम तब हैं, जब यह पाते हैं कि शासनदेवों का बहाना बनाकर महासभा और मुनियों को कोसा जाता है । क्या शासनदेवों की उत्पत्ति महासभा या मुनियों ने की है? महासभा ने तो अभी अपने जीवन में सौ वसन्त ही पूरे किये हैं, जबकि शासनदेवों, दिक्पालों आदि का अस्तित्व हजारों सालों से मान्य है। अठारहवीं सदी तक किसी ने उन्हें चुनौती भी नहीं दी। यह विवाद भी इधर के दो सौ वर्षों की ही उपज है। जहाँ तक मुनियों की बात है, उनमें भी सभी तो पद्मावती आदि के प्रचारक नहीं हैं और जो हैं भी, क्या वे शासनदेवों को जिनेन्द्र देव के समकक्ष मानने के लिए कहते हैं अथवा अर्हन्त और सिद्ध भगवान की उपासना को गौण करते हुए शासनदेवादि की मान्यता को मुख्यता देते हैं ? इस सन्दर्भ में तटस्थ भाव से चिन्तन करने की आवश्यकता है।

क्रमशः...

उत्तम ध्यान


कौन करते हैं उत्तम ध्यान

ज्ञानार्णव ग्रन्थ में आचार्य श्रीशुभचन्द्र स्वामी ने ध्यान का वर्णन करते हुए कहा है—


शतांशमपि तस्याद्य, न कश्चिद्वक्तुमीश्वरः।
तदेतत्सुप्रसिद्ध्यर्थं, दिगमात्रमिह वण्र्यते।।

अर्थात् द्वादशांग सूत्र में जो ध्यान का लक्षण विस्तार सहित कहा गया है, उसका शतांश—सौवां भाग भी आज कोई कहने में समर्थ नहीं है, फिर भी उसकी प्रसिद्धि के लिए यहाँ दिग्दर्शनमात्र वर्णन किया जाता है।

आर्तध्यान, रौद्रध्यान, धम्र्यध्यान और शुक्लध्यानरूप चार भेद वाले ध्यानों में से प्रथम तो दोनों ध्यान हेय कहे हैं एवं अंतिम दो ध्यानों में से योग्यतानुसार उन्हें प्राप्त करने का उपाय बतलाया है। इसी ग्रंथ में आगे प्रेरणा देते हुए आचार्य कहते हैं—


शार्दूलविक्रीडित छन्द—
ध्याता ध्यानमितस्तदंगमखिलं दृग्बोधवृत्तान्वितं।
ध्येयं तद्गुणदोषलक्षणयुतं नामानि कालः फलम्।।
एतत्सूत्रमहार्णवात्समुदितं यत्प्राव्प्रणीतं बुधैः।
तत्सम्यक्परिभावयन्तु निपुणा अत्रोच्यमानं क्रमात्।।

अर्थात् पूर्वकाल के ज्ञानी पुरुषों ने—पूर्वाचार्यों ने ध्यान करने वाला ध्याता, ध्यान, ध्यान के सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र सहित समस्त अंग, ध्येय तथा ध्येय के गुण-दोष लक्षण सहित ध्यान के नाम, ध्यान का समय और ध्यान का फल ये सब ही जो सूत्ररूप महासमुद्र से प्रगट होकर बुद्धिमानों के द्वारा पूर्व में कहे गए के अनुसार ही यहाँ र्विणत किए हैं। ध्यान के इच्छुक प्राणियों को समुचितरूप से इन सब बातों को जानकर पुरुषार्थ मेंं रत होना चाहिए। ध्यान के इन विशेष अंगों के साथ ही संक्षेप में ध्याता, ध्यान, ध्येय और ध्यान का फल इन चतुष्टयरूप भेदों को प्रमुखता से जानना चाहिए।

क्रमशः...

समता धर्म ही सर्वोपरि


संसार में समता धर्म ही सर्वोपरि है

समता धर्म सुविवेक की ओर ले जाने वाला है तथा अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करने वाला है, और पाप से पुण्य की ओर ले जाने वाला है। भारतीय संस्कृति का अनादिनिधन शाश्वत धर्म है। भावों पर आधारित सर्वोपरि है। मानव से मानवेश्वर बनाने वाला जगत में एकमात्र धर्म है। अष्ट कर्मों के नाश हेतु समता धर्म के अष्ट सूत्रों का पालन करना अनिवार्य रहता है। इन्हीं के माध्यम से मानव समता की ओर बढ़कर मानवेश्वर अर्थात् भगवान बन जाता है। जहाँ आठ हैं वहाँ ठाठ हैं के अष्ट सूत्र हैं—समता, संयम, सुविवेक, सप्रेम, समर्पण, सदाचार, सहकार, शाकाहार। इन्हीं से मानव जीवन का उत्थान होता है। आज हर मानव भौतिकता से त्रस्त हो रहा है। वर्तमान में भौतिक साधनों से छुटकारा पाने के लिये बच्चों को संस्कारित करना परम आवश्यक है। बड़ों की आज्ञा पालन कर अपने भविष्य का निर्माण करना परम आवश्यक है। इन्हीं तत्वों के आधार पर भारतीय संस्कृति संसार में सर्वोपरि रह सकती है।

सत् समता और अहिंसा के मार्ग भगवान बनते हैं और कैवल्य की प्राप्ति से अरिहंत होते हैं। यही जिनेन्द्रिय अनादि निधन से होते आ रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। उक्त आलम्बन ही आगम का सभी वेदों का सार रहा है तथा गीता में परिलक्षित भी हुआ है। यही आत्कल्याण का मार्ग संसार में अपनी भूमिका को दर्शाता है। गीता में जो कर्म सिद्धांत है, वही समता धर्म का सार है जो सदा सदा से सत पथ बतलाता चला आ रहा है।

क्रमशः...

पॉवर पॉइंट प्रजेंटेशन


कुछ नए प्रजेंटेशन्स

सम्यग्ज्ञान पत्रिका


जम्बूद्वीप समाचार


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बारहमासा


गणिनी ज्ञानमती बारहमासा

तेरहद्वीप रचना


आओ जानें ! तेरहद्वीप रचना में क्या-क्या है?

धर्मप्रेमी बंधुओं! हस्तिनापुर की पावन वसुन्धरा पर नवनिर्मित तेरहद्वीप रचना के बारे मेें आपको जिज्ञासा होगी कि यह क्या है ? कहाँ है ? और इसे धरती पर साकार करने का लक्ष्य क्या है ?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको क्रमश: प्राप्त करके तेरहद्वीप की अद्वितीय रचना के दर्शन कर अपूर्व पुण्य संचित करना है। अब सर्वप्रथम जानिये कि तेरहद्वीप रचना क्या है ?

यह जैनधर्म के करणानुयोग ग्रंथों (तिलोयपण्णत्ति, त्रिलोकसार आदि) में वर्णित जैनभूगोल की रचना है। तेरहद्वीप किसी एक द्वीप का नाम नहीं, वरन् प्रथम जम्बूद्वीप से लेकर तेरहवें रुचकवर द्वीप तक तेरहद्वीपों की व्यवस्था इस रचना में दर्शाई गई है। उन तेरहों द्वीपों को अलग-२ घेरकर एक-एक समुद्र भी रहते हैं अत: तेरह समुद्र भी जानना चाहिए।

उन तेरहों द्वीप और समुद्रों के नाम इस प्रकार हैं—

१. जम्बूद्वीप — लवण समुद्र

२. धातकीखंड द्वीप — कालोदधि समुद्र

३. पुष्करवर द्वीप — पुष्करवर समुद्र

४. वारुणीवर द्वीप — वारुणीवर समुद्र

५. क्षीरवर द्वीप — क्षीरवर समुद्र

६. घृतवर द्वीप — घृतवर समुद्र

७. क्षौद्रवर द्वीप — क्षौद्रवर समुद्र

८. नंदीश्वर द्वीप — नंदीश्वर समुद्र

९. अरुणवर द्वीप — अरुणवर समुद्र

१०.अरूणाभास द्वीप — अरूणाभास समुद्र

११.कुण्डलवर द्वीप — कुण्डलवर समुद्र

१२.शंखवर द्वीप — शंखवर समुद्र

१३. रुचकवर द्वीप — रुचकवर समुद्र

क्रमशः...

वास्तु


घर का वास्तु कैसा हो

प्रस्तुति - पवन जैन पापड़ीवाल ( वास्तुशास्त्री )- औरंगाबाद ( महाराष्ट्र )

।। श्री वीतरागाय नमः ।।

आज के इस भागदौड की जिंदगी में इन्सान का सबसे बड़ा और सबसे सुंदर सपना (ख्वाब) होता है उसका एक छोटा सा प्यारा सा अपना एक घर ! बहुत बार ऐसा होता है कि अपनी जिंदगी की पूरी कमाई लगाने के बावजूद उसकी जिंदगी की शाम होने तक वो दो,तीन कमरे का ही मकान बना पाता है, लेकिन उसी छोटे से, प्यारे से अपने घर में अगर उसे सुख,शांती, समृद्धि मिले तो उसका मन बागबाग हो उठता है । इस तरह सोचना ये एक सहज (Normal) बात है ।

कुछ लोगों को तो ये सुख मिल पाता है पर कुछ लोग इन खुशियो से कोसों दूर दिखाई देते हैं । कोई गलती न होते हुए भी ईमानदारी से पूरी कोशिश करने के बावजूद उन्हें यह खुशी नही मिल पाती । ऐसे समय हमारी कहीं कोई गलती हो रही है क्या, हम कहीं पर चूक रहे हैं क्या, ये बात मन में आना भी सहज है । हमें हमारे इन सवालों का जवाब मिल सकता है । हमारे प्यारे से घर में जहां हमने सपने देखे, जिस घ रको, वास्तु को हमने अपने हाथो से संजोया,उस वास्तु में किसी प्रकार की त्रुटि रह गई हो तो जिसके बदलाव से हमारा जीवन एक नई मंजिल की ओर अपने कदम बढ़ा सकता है । हमारी एक छोटी सी कोशिश, एक छोटा सा बदलाव हमारी पूरी जिंदगी का रूप पलटकर रख सकता है ।

क्रमश:...

Jain Alphabet


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जैनागम में ज्योतिष


जैनागम में ज्योतिष

- पण्डित श्री गजेन्द्रजैन (ज्योतिषसम्राट् ) फर्रुखनगर, जिला-गुडगांवा (हरियाणा)

जैन मत के अनुसार यह ब्रह्माण्ड अनंत हैं। सदा से हैं, और सदा रहेगा। काल के अनुसार परिवर्तनशील हैं और रहेगा। इसी प्रकार ज्योतिष भी ब्रह्माण्ड की तरह अनादि है। सदा से है और रहेगा । और काल की गणना का मुख्य बिन्दु ही यह ज्योतिष शास्त्र ही है। जैन मान्यता से बीस कोडा कोडी सागर का एक कल्पकाल बताया गया है। इस के दो भाग होते हैं। एक अवसर्पिणी और दूसरा उत्सर्पिणी काल यह दोनों काल क्रमशः से आते जाते रहते हैं । इनके छः भाग होते हैं - क्रमशः - 1. सुषम सुषमा 2.सुषमा 3. सुषम दुःषमा 4. दुःषम सुषमा 5. दुःषम 6. अति दुःषमा । ऐसे अवसर्पिणी काल के 6 भेद हैं। इसी प्रकार इनके उलटे क्रम से उत्सर्पणी काल के छः भेद हैं - 1.अति दुःषमा 2. दुःषमा 3. दुःषम सुषमा4. सुषम दुःषमा 5. सुषमा 6.सुषम सुषमा होते हैं। दस कोडा कोडी सागर प्रमाण का अवसर्पण तथा दस कोडा कोडी की आयु प्रमाण का उत्सर्पणी काल होता है। इन में अवसर्पणी में आयु - बल आदि की हानि और उत्सर्पणी काल में आयु - बलादि की वृद्धि होती है ।

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आज का दिन - २९ सितम्बर २०२० (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक २९ सितम्बर २०२०
तिथी- आश्विन शुक्ल १३
दिन- मंगलवार
वीर निर्वाण संवत- २५४६
विक्रम संवत- २०७७

सूर्योदय ०६.२१
सूर्यास्त १८.१३


अथ आश्विन मास फल विचार



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