ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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प्रथामाचार्य श्री शांतिसागर महाराज की 62 वीं पुण्यतिथि (भाद्रपद शुक्ला दुतिया) 23 अगस्त को मुंबई के जैनम हाल में पूज्य गणिनी ज्ञानमती माता जी के सानिध्य में मनायी जाएगी जैन धर्मावलंबी अपने-अपने नगरों में विशेष रूप से इस पुण्यतिथि को मनाकर सातिशय पुण्य का बंध करें|
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इस मंत्र की जाप्य दो दिन 22 और 23 तारीख को करे |

सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं साधुसमाधि भावनायै नमः"

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ


जिनमुखावलोकन व्रत


जिनमुखावलोकन व्रत विधि

आचार्य कहते है कि प्रात:काल जिनेन्द्रदेव का मुखावलोकन करना चाहिए|

किंनाम जिनमुखावलोकनं व्रतम्? को विधि:? जिनमुखदर्शनानन्तरमाहारो यस्मिन् तज्जिनमुखावलोकनं नामैतत् निरवधि व्रतम्। इदं व्रतं भाद्रपदमासे करणीयम्, प्रोषधोपवासानन्तरं पारणा पुन: प्रोषधोपवास:, एवमेव प्रकारेण मासान्तपर्यन्तमिति।

अर्थ-जिनमुखावलोकन व्रत किसे कहते हैं? इसकी विधि क्या है? आचार्य उत्तर देते हैं कि प्रात:काल जिनेन्द्रमुख देखने के अनन्तर आहार ग्रहण करना जिनमुखावलोकन व्रत है। यह निरवधि व्रत होता है। यह व्रत भाद्रपद मास में किया जाता है। प्रथम प्रोषधोपवास, अनन्तर पारणा, पुन: प्रोषधोपवास पश्चात् पारणा, इसी प्रकार मासान्त तक उपवास और पारणा करते रहना चाहिए

विवेचन-जिनमुखावलोकन व्रत के संबंध में दो मान्यताएँ प्रचलित हैं। प्रथम मान्यता इसे एक वर्ष पर्यन्त करने की है और दूसरी मान्यता एक मास तक करने की। प्रथम मान्यता के अनुसार यह व्रत भाद्रपद मास से आरंभ होकर श्रावण मास में पूरा होता है और द्वितीय मान्यता के अनुसार भाद्रपद मास की कृष्ण प्रतिपदा से आरंभ होकर इस मास की पूर्णिमा को समाप्त हो जाता है। एक वर्ष तक करने का विधान करने वालों के मत से वर्ष में कुल ३६ उपवास और एक मास का विधान मानने वालों के मत से एक मास में १५ उपवास करने चाहिए।
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सम्यग्ज्ञान


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सम्यग्ज्ञान

वर्ष 1965 में, श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चातुर्मास के दौरान, सर्वोच्च जैन साध्वी परम पूज्य 105 गणिनी प्रमुख आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने पूरी संरचना को देखा .. गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के बारे में... बेटी 'मैना' का जन्म माँ मोहिनीदेवी से हुआ था। यूपी के बाराबंकी जिले के श्री छोटेलाल जैन की पत्नी मोहिनी देवी, 9.15 बजे आश्विन शुक्ला पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) के रूप में यूपी के बाराबंकी जिले का पहला मुद्दा यानी 1934 का 22 अक्टूबर। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से 1974 में दिगंबर जैन त्रिलोक संस्थान द्वारा मासिक पत्रिका "सम्यकज्ञान" शुरू किया गया था। तब से, इस प्रकाशन में लाखों भक्तों के पथ के माध्यम से 4 अनुयोग, शास्त्र, लेख, विभिन्न समाचार और बहुत कुछ के माध्यम से रोशन करना निरंतर है| सम्यग्ज्ञान पत्रिका पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें ..

सोलहकारण व्रत


सोलहकारण व्रत

मेघमालाषोडशकारणञ्चैतद्द्वयं समानं प्रतिपद्दिनमेव द्वयोरारम्भं मुख्यतया करणीयम्। एतावान् विशेष: षोडशकारणे तु आश्विनकृष्णा प्रतिपदा एव पूर्णाभिषेकाय गृहीता भवति, इति नियम:। कृष्णपंचमी तु नाम्न एव प्रसिद्धा।

अर्थ-मेघमाला और षोडशकारण व्रत दोनों ही समान हैं। दोनों का आरंभ भाद्रपद कृष्णा प्रतिपदा से होता है परन्तु षोडशकारण व्रत में इतनी विशेषता है कि इसमें पूर्णाभिषेक आश्विन-कृष्णा प्रतिपदा को होता है, ऐसा नियम है। कृष्णा पंचमी तो नाम से ही प्रसिद्ध है।

जम्बूद्वीप संबंधी भरतक्षेत्र के मगध (बिहार) प्रांत में राजगृही नगर है। वहाँ के राजा हेमप्रभ और रानी विजयावती थी। इस राजा के यहाँ महाशर्मा नामक नौकर था और उनकी स्त्री का नाम प्रियंवदा था। इस प्रियंवदा के गर्भ से कालभैरवी नामक एक अत्यन्त कुरुपी कन्या उत्पन्न हुई कि जिसे देखकर माता-पितादि सभी स्वजनों तक को घृणा होती थी।

एक दिन मतिसागर नामक चारणमुनि आकाशमार्ग से गमन करते हुए उसी नगर में आये, तो उस महाशर्मा ने अत्यन्त भक्ति सहित श्री मुनि को पड़गाह कर विधिपूर्वक आहार दिया और उनसे धर्मोपदेश सुना। पश्चात् जुगल कर जोड़कर विनययुक्त हो पूछा-हे नाथ! यह मेरी कालभैरवी नाम की कन्या किस पापकर्म के उदय से ऐसी कुरुपी और कुलक्षणी उत्पन्न हुई है, सो कृपाकर कहिए? तब अवधिज्ञान के धारी श्री मुनिराज कहने लगे, वत्स! सुनो-
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सिद्धचक्र विधान का माहात्म्य


सिद्धचक्र महामंडल विधान का आयोजन 15 अगस्त से 23 अगस्त तक|
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चारित्र चन्द्रिका गणिनी प्रमुख शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी के ससंघ सानिंध्य में सिद्धचक्र महामंडल विधान का आयोजन लाडनू राजस्थान वालों ने माताजी कि प्रेरणा से विधान का आयोजन किया है |विधान का प्रारम्भिकरण भाद्रपद कृष्णा अष्टमी से भाद्र शुक्ला दूज तक होगा |यह विधान बहुत ही चमत्कारिक विधांन है |

‘‘सिद्धचक्र’’ का अर्थ है सिद्धों का समूह। तीनलोक के अग्रभाग पर अनन्तानन्त सिद्ध विराजमान रहते हैं। उन सबको सिद्धचक्र विधान के माध्यम से नमन किया गया है। अष्टान्हिका पर्व में प्राय: सभी जगह सिद्धचक्र विधानों के आयोजन देखे जाते हैं क्योंकि मैना सुन्दरी ने अष्टान्हिका में इसकी विधिवत् आराधना करके अपने पति एवं सात सौ कुष्ठियों का कुष्ठ रोग दूर किया था।

‘‘सिद्ध’’ यह शब्द विशेष मंगलसूचक है। इस पद के नामोच्चारण से अनेक कार्यों की सिद्धि होती है। आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी ने ‘‘जैनेन्द्रप्रक्रिया’’ नामक व्याकरण ग्रंथ का शुभारंभ ‘‘सिद्ध’’ शब्द से किया है। उसका प्रथम सूत्र है-’‘सिद्धिरनेकान्तात्’’ जिसका अर्थ है-अनेकान्त से शब्दों की सिद्धि होती है। इसी प्रकार शर्ववर्म आचार्य ने कातन्त्ररूपमाला में ‘‘सिद्धो वर्णसमाम्नाय:’’ इस सूत्र से शुभारंभ किया है जिसका अर्थ है कि ‘‘वर्णों का समुदाय अनादिकाल से सिद्ध है।’’ ग्रंथ के प्रारंभ में ‘‘सिद्धि’’ एवं ‘‘सिद्ध’’ शब्द का प्रयोग स्वयमेव मंगलाचरण का रूप धारण कर लेता है जिससे कृति का निर्माण निर्विघ्न सम्पन्न होता है। ‘‘सिद्ध’’ शब्द से ‘‘सिद्धान्त’’ बनता है। जिन शास्त्रों-ग्रंथों के अन्त में सिद्धों का वर्णन आता है उसे ‘‘सिद्धान्त’’ कहते हैं। सिद्धान्त शब्द की व्याख्या करते हुए कहा भी है-

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आज का प्रवचन--21 अगस्त ...


आज प्रात:कालीन बेला में प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने उषा वंदना की पंक्तियों को अपनी मधुर वाणी से पारस टी.वी. के माध्यम से सभी दर्शकों को, भक्तों को जगाया। रात्रि के अंधकार को दूर करके सूर्य के प्रकाश से अपना दिवस मंगलमय करना । आपकी सुबह माताजी के दर्शन से होती है, यह बहुत ही हर्ष की बात है। पूज्यज्ञानमती माताजी के सान्निध्य में जैनम हॉल में गर्भ संस्कार शिविर का आयोजन किया गया। डॉ. गीतांजलि शाह ने माताजी की प्रेरणा से शिविर का आयोजन ‘‘श्रावक संस्कार निर्देशिका’’ नाम की पुस्तक है, जो चंदनामती माताजी द्वारा संकलित है, गर्भ के संस्कार महिलाओं पर गर्भसंस्कार की क्रिया माताजी के मंत्रोच्चारणपूर्वक द्वारा हुई। लगभग १०० दम्पत्तियों ने इस कार्यक्रम में आकर संस्कार कराया। पूज्य चारित्रचन्द्रिका गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने सोलहकारण भावना में जो ‘‘आवश्यकपरिहाणि भावना हे, उस पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला। आचार्यदेव कहते हैं- साधुओं की ६ आवश्यक क्रिया मानी है, वे इसमें किसी प्रकार की हानि नहीं करते हैं, दोष नहीं लगाते हैं, निर्दोष पालन करते हुए जो अपनी चर्या का पालन करते हैं। अपनी आत्मा को परमात्मा बनाते हैं, ऐसी भावना को हम नमस्कार करते हैं। श्रावकों की भी ६ आवश्यक क्रिया मानी है। ‘‘देव पूजा, गुरु की उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान। माताजी ने षट्टावश्यक का महत्त्व बहुत ही सुन्दर शब्दों में बताया। एक सूर्य मित्र ब्राह्मण थे, वह नदी में स्नान करके सूर्य को अघ्र्य दे रहे थे। उसकी अंगुलि से रत्नजड़ित अंगूठी गिर गई। वह ब्राह्मण घबरा गया बोला राजा तो हमको चोर समझेगा। उसने सोचा हम क्या करें। वह एक मुनि के पास गया वह था ब्राह्मण, परन्तु वह अवधिज्ञानी दिगम्बर जैन मुनि के पास गया। उसने नमस्कार करके अपनी समस्या बताई। मुनि ने कहा-ब्राह्मण, तुम्हारी अंगूठी वहीं पर कमल पत्ते पर पड़ी है, जहाँ तक सूर्य को अघ्र्य दे रहे थे। ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ। वह अंगूठी लेकर वापस आ गया। बोला महाराज आप मुझे भी यह विद्या सिखा दो। मुनि ने कहा! भव्यात्मन् तुम मेरे जैसे बन जाओ यह विद्या तुम्हें भी मिल जायेगी। उसने स्व्ीकार किया। दीक्षा ग्रहण कर ली। मुनि ने षट्आवश्यक क्रियाएँ बतार्इं। वह इतने निष्णात बन गये कि उन्होंने अनेक प्रकार की विद्या सिद्ध कर ली। मुनि ने कहा-शिष्य अब तुम घर जा सकते हो। वह मुस्कराएँ और बोले मुझे तो आत्मा की निधि को खोलने की विद्या मिल गई है। अब इन विद्यज्ञओं से मुझे कोई लेना-देना नहीं है। मुझे अब अपने घर नहीं, मुझे मोक्षमहलरूपी घर जाना है। यह है षटआवश्यक का महत्तव। आत्मा में जो रत्नत्रय से जड़ित अंगूठी थी, उसको प्राप्त करके उसने अपने मोक्षमार्ग की सिद्धि कर ली। महानुभावों! मुनि बनकर के अपनी षट्आवश्यक क्रिया का पालन करके अपने मोक्षमार्ग प्रशस्त करना एवं जब तक मुनि न बन सको, तब तक श्रावक बनकर श्रावक की षट्क्रिया का पालन करके अपने गृहस्थ जीवन को सफल बनायें, यही मंगल आशीर्वाद है।

कुछ खास


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आवश्यकापरिहाणि भावना


आवश्यकापरिहाणि भावना अवश्य करना अवश्य करना जो भी कर्म आवश्यक हैं नहीं छोड़ना आवश्यक को अपने अच्छे कर्तव्यों को आवश्यकापरिहाणि भावना है साधु हों या श्रावक हों दोनों के छह-छह आवश्यक हैं दोनों प्रतिदिन पालन करके बनते शिवपथ के साधक हैं कुछ लोग आसक्त भाव से भी आवश्यक कार्य करते हैं वह भी व्यर्थ नहीं जाता क्योंकि वे भी उनका फल तो चरवते हैं|

एक सूर्य मित्र ब्राह्मण की रत्नजड़ित इक अंगूठी नदी में गिर गई स्नान करते और सूर्यदेवता को जल चढ़ाते हुए वह चिंतित हो गुरुवर्य दिगम्बर मुनि के पास गया अवधिज्ञानी मुनिवर से ज्ञात हो गया अंगूठी का पुन: लाभ हो गया प्रभावित हो गुरु से यह विद्या सीखने आया गुरु ने उसे मुनि बनाया आवश्यकों का पालन कराया फिर उसे घर जाने को कहा अरे कहाँ! उसने नहीं जाने को कहा क्योंकि पा गया वह आत्म तत्त्व आवश्यकापरिहाणि भावना का सारतत्त्व बंधुओं! आप भी सदा अपने व्यवहारिक एवं धार्मिक कर्तव्यों का सदा पालन करना माता-पिता की सेवा करना परिवार को सहिष्णुता एवं धैर्य का पाठ पढ़ाते हुए एकता-संगठन के सूत्र में बांधे रखना यही है आवश्यक कर्तव्य तुम्हारा।

२४ कल्पद्रुम महामंडल विधान


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कल्पद्रुम महामंडल विधान का आयोजन 26 अगस्त से सितम्बर 6 तक होगा |

प्रथामाचार्य श्री शांतिसागर महाराजपरंपरा की प्रमुख गणिनी पूज्य ज्ञानमती माताजी ने मुंबई महानगर के भांडुप जैनम हाल में दशलक्षण पर्व के शुभ अवसर पर २४ कल्पद्रुम महामंडल विधान का आयोजन बहुत ही धूमधाम से मनाये जाने कि प्रेरणा सभी भक्तों को प्रदान कर रही हैं| मुंबई महानगर वासियों के लिए बहुत ही सुनहरा अवसर है| कि आपके नगर में ऐसी महान साध्वी का एतिहासिक चातुर्मास हो रहा है|पूज्य माताजी की प्रथम आर्यिका शिष्या प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी जो कि आप सभी को सुबह से लेकर शाम तक अपनी वाणी से सभी को माधुर्यता का रसास्वादन कराती हैं|ऐसा अवसर आप लोग हाथ से ना जाने दें|सभी लोग एक-दूसरे से व्हाट्ज एप के माध्यम से दूसरों को सूचना पहुचाएं|और अपनें मित्रों से कहें|

पूजा रचाएंगे, प्रभु गुण गायेंगे समवसरण के मंडल रचाएंगे आवो करे 24 कल्पद्रुम कि पूजा |

आज का दिन - २२ अगस्त २०१७ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक 22 अगस्त,2017
तिथी- भाद्रपद शुक्ला प्रतिपदा
दिन-मंगलवार
वीर निर्वाण संवत- 2543
विक्रम संवत- 2074

सूर्योदय 05:50
सूर्यास्त 19:03


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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


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