वीर निर्वाण संवत 2544 सभी के लिए मंगलमयी हो - इन्साइक्लोपीडिया टीम

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22 अक्टूबर को मुंबई महानगर पोदनपुर से पू॰ गणिनी ज्ञानमती माताजी का मंगल विहार मांगीतुंगी की ओर हो रहा है|

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ


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💎 विहार अपडेट💐


🙏 जय जिनेन्द्र🙏

🕉भारत गौरव 🌹ऋषभगिरी प्रणेता,शारदे माँ,400 ग्रंथ की रचियता, वात्सल्यमूर्ति,💎 रत्नत्रय निर्झरणी💐परम पूज्य गणिनीप्रमुख 💎🌈🕉आर्यिकारत्न 1⃣0⃣5⃣ श्री ज्ञानमती माताजी एवं ससंघ का सूरत से होकर मांगीतुंगी के लिए मंगल विहार हो रहा है। जैसा आपको विदित है कि भांडुप के जैनम हॉल में आज 22-10-2017 पूज्य गुरु माँ का प्रवेश हुआ। पूज्य गुरु माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने का भांडुप वासियो को एक और अनोखा मौका मिला है। पूज्य गुरु माँ का 23-10-2017 के भांडुप के जैनम हाल में प्रवास हो रहा है।

दिनांक 24-10-2017 को प्रातः 7 बजे भांडुप से ठाणे के लिए मंगल विहार होगा।

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दिनांक - 24-10-2017 को भांडुप जैनम हॉल से ठाणे के लिए प्रातः 7 बजे मंगल विहार होगा। पूज्य गुरु माँ 24 Oct एवं 25 Oct 2017 को ठाणे में प्रवास होगा।

स्थान - तिलक बैंक्वेट हॉल,मानपाड़ा नाका, टीकू जीनू वाड़ी रोड, मेट्रो हॉस्पिटल के सामने, गोडबन्दर रोड, ठाणे वेस्ट

आप सभी धर्म प्रेमी पधारकर धर्म लाभ लेवे।

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सेमिनार की परिभाषा


सेमिनार की परिभाषा मेरी दृष्टि में

आर्यिका श्री चंदनामती माताजी
मुम्बई में २३ से २५ जुलाई २०१७ तक आयोजित

National Seminar On Jain Dharma में आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने
सेमिनार-SEMINAR
का हिन्दी-अंग्रेजी में विवरण निम्न प्रकार से बताकर विद्वानों को आनंद विभोर कर दिया |
से - सेवा धर्म समाज की, आगम के अनुकूल।
यही प्रमुख उद्देश्य है, जैनधर्म का मूल।।१।।
मि - मिलकर धर्मप्रभावना, करो सभी विद्वान।
वर्गोदय को तज करें, सर्वोदय उत्थान।।२।।
ना - नाम से नहिं गुण से सहित, णमोकार हैं मंत्र।
इसका खूब प्रचार हो, नमूँ परमपद पंच।।३।।
- रत्न तीन जग में कहे, देव शास्त्र गुरु धाम।

रत्नत्रय इनसे मिलें, इन पद करें प्रणाम।।४।।

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सम्पादकीय


‘‘दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम’’ के उद्घाटन अवसर पर प्रस्तुत

Professional की सही परिभाषा मेरी दृष्टि में
-आर्यिका चन्दनामती

    जैसे सरोवर की शोभा कमल से होती है, पक्षी की शोभा उसके पंखों से है, भोजन की शोभा नमक से होती है, नारी की शोभा शील से होती है, सुन्दर गीत सुरीले कंठ से सुशोभित और आकर्षक बन जाता है, सर्वोदयी विश्वधर्म भी अहिंसा के पालन से ही शोभायमान एवं विश्ववंद्य होता है, भारत की शोभा आध्यात्मिक संतों से वृद्धिंगत होती है उसी प्रकार हमारे धर्मप्राण भारतीय समाज की शोभा विशिष्ट बुद्धिजीवियों से है।

    आप सभी दिगम्बर जैन समाज के विशेष बुद्धिजीवी व्यक्तित्व के रूप में पधारे हैं। आज की यह Conference मुम्बई DJPF अर्थात् Digambar Jain Professional Forum दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम के द्वारा organized है। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से निर्मित इस फोरम के सभी Executive Members विशेष आशीर्वाद एवं बधाई के पात्र हैं। उन्हें इस फोरम के द्वारा आगे निरन्तर सामाजिक संगठन-एकता एवं जैनधर्म के संरक्षण आदि के कार्य करते हुए अपनी युवा शक्ति का सृजनात्मक (Constructive) परिचय देना है।

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नूतन वर्ष-अभिनन्दन


नूतन वर्ष-अभिनन्दन

20 अक्टूबर से प्रारंभ हो रहा वीर निर्वाण नव संवत्सर 2544 आप सभी के लिए मंगलमय हो|
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आज भारत देश में वीर निर्वाण संवत्, विक्रम संवत्, शालिवाहन शक और ईसवी सन् प्रचलित हैं। इनके प्रथम दिवस को वर्ष का प्रथम दिन मानकर नववर्ष की मंगल कामनाएं की जाती हैं। जैन धर्मानुयायी महानुभावों को किस वर्ष का कौन सा दिवस नववर्ष का मंगलदिवस मानना चाहिए? आज ईसवी सन् अत्यधिक प्रचलित है। प्रायः कलेंडर, तिथिदर्पण और डायरियाँ भी इसी सन् से छपने लगी हैं। वास्तव में अंग्रेजों ने अपने भारत पर शासन करके अपना ऐसा प्रभाव छोड़ा है कि उसे मिटाना असंभव है। खैर! कोई बात नहीं,१ जनवरी से ईसवी सन् प्रारंभ होता है। इसे भी मान लीजिये-मना लीजिये कोई बाधा नहीं है।

कर्नाटक, महाराष्ट्र तथा गुजरात में विक्रम संवत् को अधिक महत्व दिया जाता है। मैंने श्रवणबेलगोल में देखा, जो लोग वर्ष भर वहीं रहकर भी चैत्रवदी अमावस्या (दक्षिण व गुजरात के अनुसार फाल्गुन कृ० अमावस्या) की रात्रि में पहाड़ पर जाकर सोते हैं और प्रातः उठते ही भगवान् बाहुबली का दर्शन कर नूतन वर्ष की मंगल कामना करते हुए नीचे उतरते हैंं। चैत्रशुक्ला एकम से विक्रम संवत् का नया वर्ष शुरू होता है। आज पंचांग इसी संवत् से चल रहे हैं। ...और पढ़ें

02.खानदान और खानपान शुद्धि का महत्त्व


खानदान और खानपान शुद्धि का महत्त्व

-पं. शिवचरनलाल जैन, मैनपुरी (उ.प्र.)
वन्दे धर्मतीर्थेशं, श्रीपुरुदेवपरम् जिनम्।

दानतीर्थेशश्रेयासं चापि शुद्धिप्रदायकम्।।
जातिकुलशुद्धिमादाय, अशनपानपवित्रताम्।

परमस्थानसंप्राप्ता: विजयन्तु परमेष्ठिन:।।स्वोपक्ष।।

मैं धर्मतीर्थ, व्रत तीर्थकर्ता उत्कृष्ट प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान और शुद्धि प्रदायक दानतीर्थेश श्रेयांस को प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने जाति, कुल शुद्धि और भोजनपान की शुद्धि प्राप्त कर सप्त परमस्थानों सहित मोक्षपद को प्राप्त किया है, वे परमेष्ठी जयवन्त हों। मानव जीवन में खानदान और खानपान शुद्धि का अत्यधिक महत्व है । नि:श्रेयस और लौकिक अभ्युदय दोनों ही दृष्टियों से यह मान्य है । प्रत्यक्ष, आगम और अनुमान तीनों ही प्रमाणों से यह प्रमाणित होता है । यह सर्वत्र दृष्टिगत होता है कि प्राय: उच्च वर्ण, जाति, गोत्र-कुल वाले श्रेष्ठ कार्यों को सम्पादित करते हुए प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं। ज्ञान, ध्यान, तप की योग्यता भी श्रेष्ठ खानदान की अपेक्षा रखती है ।

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भगवान महावीर निर्वाणभूमि-पावापुरी जल मंदिर


पावापुरी में सरोवर के मध्य स्थित जल मंदिर ही भगवान महावीर की निर्वाणभूमि है। श्री पूज्यपाद आचार्य ने निर्वाणभक्ति में कहा है-

पद्मवनदीर्घिकाकुल-विविधद्रुमखण्डमण्डिते रम्ये।

पावानगरोद्याने व्युत्सर्गेण स्थितः स मुनिः।।१६।।
कार्तिककृष्णस्यान्ते स्वातावृक्षे निहत्य कर्मरजः।
अवशेषं संप्रापद्-व्यजरामरमक्षयं सौख्यम् ।।१७।।
परिनिर्वृतं जिनेन्द्रं, ज्ञात्वा विबुधा ह्यथाशु चागम्य।
देवतरुरक्तचंदन - कालागुरुसुरभिगोशीर्षैः ।।१८।।
अग्नीन्द्राज्जिनदेहं मुकुटानलसुरभिधूपवरमाल्यैः।
अभ्यच्र्य गणधरानपि, गता दिवं खं च वनभवने।।१९।।

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वृहत्पल्य व्रत विधि


वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत की तिथियाँ, व्रतों के नाम एवं माहात्म्य

तिथि व्रत का नाम फल

आश्विन सुदी ६ सूर्यप्रभा एक पल्य उपवास

आश्विन सुदी १३ चन्द्रप्रभा दो पल्य उपवास

कार्तिक कृष्णा ५ कुमारसंभव चार पल्य उपवास

कार्तिक कृष्णा ११ षडशीति आठ पल्य उपवास

कार्तिक कृष्णा १४ पुष्पोत्तर एक हजार पल्य उपवास

कार्तिक सुदी १२ नंदीश्वर दो हजार पल्य उपवास

मगसिर कृष्णा १२ प्रातिहार्य चार हजार पल्य उपवास

मगसिर सुदी ११ जितेन्द्रिय पाँच पल्य उपवास

पौष कृष्णा ३ पंक्तिमान छह पल्य उपवास

पौष कृष्णा १२ सूर्य सात पल्य उपवास

पौष सुदी ५ पराक्रम नौ पल्य उपवास

पौष सुदी ११ जयपृथु दस पल्य उपवास

माघ कृष्णा २ अजित आठ पल्य उपवास

माघ कृष्णा ५ स्वयंप्रभ ग्यारह पल्य उपवास

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ताकि आप रहें सुन्दर और आकर्षक


प्रत्येक युवती की इच्छा होती है कि वह भी सुंदर दिखे और सभी के द्वारा सराही जाए। शुरू से ही सोन्दर्य के प्रति महिलाओं में विशेष आर्कषण रहा है और सुन्दर दिखना उनकी कमजोरी भी रही है। प्रकृति ने भी कोमलता, यौवन एवं मनमोहक रूप केवल स्त्रियों करे ही प्रदान किया है। कुछ महिलाओं की सुंदरता जन्मजात होती है लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिनके साथ प्रकृति ने सौतेला व्यवहार किया है।

कुछ महिलाएं अपने काले रंग की वजह से परेशान हैं तो कुछ अपनी रूखी एवं बेरौनक त्वचा की वजह से। सभी महिलाएं सुंदर एवं आकर्षक दिखना चाहती हैं लेकिन वे यह नहीं समझ पाती कि इसके लिए क्या और कैसे करें क्योंकि आजकल सौंदर्य प्रसाधनों की कोई कमी नहीं है। एक तो ये सौंदर्य एवं प्रसाधन काफी मंहगे मिलते हैं, दूसरे इनमें हानिकारक कैमिकल्स का प्रयोग किया जाता है। प्रारंभ में इनके प्रयोग से त्वचा कोमल एवं सुन्दर दिखती है लेकिन बाद में इनसे त्वचा को नुक्सान ही पहुँचता है। यहाँ हम सौंदर्य वृद्धि के कुछ कारगर नुस्खे आपको बता रहे हैं जिनके प्रयोग से आप भी अपनी सुन्दरता को बढ़ाकर सबकी प्रशंसा का पात्र बन सकती हैंं।

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भगवान के दर्शन से अनेक उपवासों का फल मिलता है


ॐ नम: सिद्धेभ्य: ॐ नम: सिद्धेभ्य: ॐ नम: सिद्धेभ्य:। आप लोग मंदिर में प्रवेश करते ही ॐ जय-जय-जय, नि:सही-नि:सही-नि:सही नमोऽस्तु-नमोऽस्तु-नमोऽस्तु बोलते हैं। इसमें ॐ जय और नमोऽस्तु का अर्थ तो लगभग सभी को पता होता है किन्तु ‘नि:सही’ का अर्थ प्राय: लोगों को ज्ञात नहीं होता। नि:सही का वास्तविक अर्थ है कहीं भी प्रवेश करते समय वहाँ के अधिष्ठाता देव से पूछना। प्राय: प्रत्येक स्थान के कोई न कोई अधिष्ठाता देव होते हैं चाहे मंदिर हो या मकान, पर्वत हो या गुुफा, सरोवर हो या नदी-समुद्र आदि। श्रावकों को तो केवल मंदिरों में प्रवेश करते हुए नि:सही शब्द का प्रयोग करना बतलाया है किन्तु साधुओं के लिए आचार ग्रंथों मे उनकी तेरह क्रियाओें के अन्तर्गत असही और नि:सही ये दो क्रियाएं बताई हैं, जिन्हें उनको अहोरात्रि (दिन-रात) हर समय करने पड़ते हैं। आपने नि:सही शब्द तो सुना और प्रयोग किया है किन्तु असही शब्द तो शायद सुना ही नहीं होगा। जैसे नि:सही शब्द मंदिर या मकान में प्रवेश करते समय बोला जाता है, वैसे ही असही शब्द वहाँ से वापस जाते (बाहर निकलते) समय बोला जाता है। इसका मतबल होता है कि उस मंदिर या वसतिका के अधिष्ठाता जो भूत व्यंतरदेव हैं, उनसे पूछकर या उन्हें सूचित करके प्रवेश करना तथा उनसे कहकर ही वापस बाहर निकलना । और पढ़े

टेंशन का उपचार मेडीसिन नहीं मेडीटेशन है


टेंशन का उपचार मेडीसिन नहीं मेडीटेशन है

—आचार्य विनम्रसागर जी महाराज

वर्तमान युग में जितने ज्यादा साधन सुविधाएँ उपलब्ध हुई उतना जीवन स्तर का विकास तो हुआ लेकिन आदमी आलसी और कमजोर होता गया। इस कमजोरी का एक लक्षण टेंशन भी है। साहसी और धैर्यवान प्राणी मुसीबतों में घबराते नहीं है उनसे डटकर मुकाबला करते हैं और कमजोर आदमी टेंशन कर बैठता है जिससे बी. पी. हाई और हार्ट अटैक जैसी घटनाएँ जीवन में घटित हो जाती हैं। कई लोग इसका उपचार कराते हुए कई प्रकार की दवाईयाँ खाते हैं लेकिन वे दवाईयाँ मन को बेहोश करने की होती हैं, मन को विस्तृत करने की नहीं होती। टेंशन का उपचार तभी होगा जब मन विशाल होगा, मन की विशालता धर्म के माहौल में होगी। खोज करें तो पाएँगे कि सबसे बड़ा विशाल मन कोई धर्मी का ही हुआ है और भविष्य में भी एक पक्षपात रहित धर्मी का ही होगा। मन में यदि सीमित वस्तुएँ समाती हैं तो मन विशाल नहीं होता और जब मन असीमित के लिए दौड़ लगाता है तो मन चेतन के साथ मिलकर अनंत के महल को छूने लगता है। टेंशन तभी होता है जब असीमित की चाह में सीमित हाथ लगे अथवा हम ज्यादा की आकांक्षा रखें और उपलब्ध कम हो सके टेंशन की मूल जड़ है हम जैसा चाहते हैं वैसा न होना अथवा अपेक्षा की उपेक्षा होना। इसे केवल आत्मध्यान के बल से ही मिटाया जा सकता है, कोई दवाईयों से नहीं।

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दिगम्बर जैन आम्नाय में मंत्र व्यवस्था


दिगम्बर जैन आम्नाय में मंत्र व्यवस्था

डाॅ. सविता जैन(सम्पादिका-आदित्य आदेश)-उज्जैन- म०प्र०
सारांश
द्वादशांग जिनवाणी के बारहवें दृष्टिवादांग के १४ पूर्वों में १०वाँ विद्यानुवाद पूर्व है जो तंत्र,मंत्र एवं यंत्र से सम्बद्ध है। आज भी मानव अलौकिक एवं आध्यामिक शक्तियों की आराधना में मंत्रों का प्रयोग करता है किन्तु मंत्र क्या हैं? मंत्रों का स्वरूप एवं उपयोग सा हो? क्या दिगम्बर आगम परम्परा में मंत्रों की साधना एवं धर्मप्रभावना के निमित्त उनके प्रयोग की अनुमति है? क्या पौराणिक सन्दर्भों में आचार्यों द्वारा इनके प्रयोगों का विवरण मिलता है? इन प्रश्नों के समाधान के साथ ही मंत्रों के उपयोग, विधि-निषेधों की संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत आलेख में की गई है।

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आज का दिन - २३ अक्टूबर २०१७ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक २३ अक्टूबर,२०१७
तिथी-कार्तिक शुक्ल ४
दिन-सोमवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७४

सूर्योदय ०६:३०
सूर्यास्त १७:५१


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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


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