ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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प्रथामाचार्य श्री शांतिसागर महाराज की प्राचीन शिष्या परम पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी के ससंघ सानिध्य में मुंबई के जैनम हाँल में दशलक्षण पर्व के शुभ अवसर पर 24 कल्पद्रुम महामंडल विधान का आयोजन धूमधाम से मनाया जायेगा|सभी महानुभाव विधान का लाभ लेकर पुण्य लाभ अर्जित करें|
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इस मंत्र की जाप्य दो दिन 24 और 25 तारीख को करे |

सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं वैय्यावृत्त्यकरण भावनायै नमः"

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ
जिनमुखावलोकन व्रत
जिनमुखावलोकन व्रत विधि

आचार्य कहते है कि प्रात:काल जिनेन्द्रदेव का मुखावलोकन करना चाहिए|

किंनाम जिनमुखावलोकनं व्रतम्? को विधि:? जिनमुखदर्शनानन्तरमाहारो यस्मिन् तज्जिनमुखावलोकनं नामैतत् निरवधि व्रतम्। इदं व्रतं भाद्रपदमासे करणीयम्, प्रोषधोपवासानन्तरं पारणा पुन: प्रोषधोपवास:, एवमेव प्रकारेण मासान्तपर्यन्तमिति।

अर्थ-जिनमुखावलोकन व्रत किसे कहते हैं? इसकी विधि क्या है? आचार्य उत्तर देते हैं कि प्रात:काल जिनेन्द्रमुख देखने के अनन्तर आहार ग्रहण करना जिनमुखावलोकन व्रत है। यह निरवधि व्रत होता है। यह व्रत भाद्रपद मास में किया जाता है। प्रथम प्रोषधोपवास, अनन्तर पारणा, पुन: प्रोषधोपवास पश्चात् पारणा, इसी प्रकार मासान्त तक उपवास और पारणा करते रहना चाहिए

विवेचन-जिनमुखावलोकन व्रत के संबंध में दो मान्यताएँ प्रचलित हैं। प्रथम मान्यता इसे एक वर्ष पर्यन्त करने की है और दूसरी मान्यता एक मास तक करने की। प्रथम मान्यता के अनुसार यह व्रत भाद्रपद मास से आरंभ होकर श्रावण मास में पूरा होता है और द्वितीय मान्यता के अनुसार भाद्रपद मास की कृष्ण प्रतिपदा से आरंभ होकर इस मास की पूर्णिमा को समाप्त हो जाता है। एक वर्ष तक करने का विधान करने वालों के मत से वर्ष में कुल ३६ उपवास और एक मास का विधान मानने वालों के मत से एक मास में १५ उपवास करने चाहिए।
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सम्यग्ज्ञान
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सम्यग्ज्ञान

वर्ष 1965 में, श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चातुर्मास के दौरान, सर्वोच्च जैन साध्वी परम पूज्य 105 गणिनी प्रमुख आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने पूरी संरचना को देखा .. गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के बारे में... बेटी 'मैना' का जन्म माँ मोहिनीदेवी से हुआ था। यूपी के बाराबंकी जिले के श्री छोटेलाल जैन की पत्नी मोहिनी देवी, 9.15 बजे आश्विन शुक्ला पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) के रूप में यूपी के बाराबंकी जिले का पहला मुद्दा यानी 1934 का 22 अक्टूबर। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से 1974 में दिगंबर जैन त्रिलोक संस्थान द्वारा मासिक पत्रिका "सम्यकज्ञान" शुरू किया गया था। तब से, इस प्रकाशन में लाखों भक्तों के पथ के माध्यम से 4 अनुयोग, शास्त्र, लेख, विभिन्न समाचार और बहुत कुछ के माध्यम से रोशन करना निरंतर है| सम्यग्ज्ञान पत्रिका पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें ..

सोलहकारण व्रत

सोलहकारण व्रत

मेघमालाषोडशकारणञ्चैतद्द्वयं समानं प्रतिपद्दिनमेव द्वयोरारम्भं मुख्यतया करणीयम्। एतावान् विशेष: षोडशकारणे तु आश्विनकृष्णा प्रतिपदा एव पूर्णाभिषेकाय गृहीता भवति, इति नियम:। कृष्णपंचमी तु नाम्न एव प्रसिद्धा।

अर्थ-मेघमाला और षोडशकारण व्रत दोनों ही समान हैं। दोनों का आरंभ भाद्रपद कृष्णा प्रतिपदा से होता है परन्तु षोडशकारण व्रत में इतनी विशेषता है कि इसमें पूर्णाभिषेक आश्विन-कृष्णा प्रतिपदा को होता है, ऐसा नियम है। कृष्णा पंचमी तो नाम से ही प्रसिद्ध है।

जम्बूद्वीप संबंधी भरतक्षेत्र के मगध (बिहार) प्रांत में राजगृही नगर है। वहाँ के राजा हेमप्रभ और रानी विजयावती थी। इस राजा के यहाँ महाशर्मा नामक नौकर था और उनकी स्त्री का नाम प्रियंवदा था। इस प्रियंवदा के गर्भ से कालभैरवी नामक एक अत्यन्त कुरुपी कन्या उत्पन्न हुई कि जिसे देखकर माता-पितादि सभी स्वजनों तक को घृणा होती थी।

एक दिन मतिसागर नामक चारणमुनि आकाशमार्ग से गमन करते हुए उसी नगर में आये, तो उस महाशर्मा ने अत्यन्त भक्ति सहित श्री मुनि को पड़गाह कर विधिपूर्वक आहार दिया और उनसे धर्मोपदेश सुना। पश्चात् जुगल कर जोड़कर विनययुक्त हो पूछा-हे नाथ! यह मेरी कालभैरवी नाम की कन्या किस पापकर्म के उदय से ऐसी कुरुपी और कुलक्षणी उत्पन्न हुई है, सो कृपाकर कहिए? तब अवधिज्ञान के धारी श्री मुनिराज कहने लगे, वत्स! सुनो-
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श्रावक संस्कार निर्देशिका
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दशलक्षण पर्व

दशलक्षण पर्व

जैनशासन में दो प्रकार के पर्व माने हैं - १. अनादि पर्व , २. सादि पर्व ।

जो पर्व किसी के द्वारा शुरू नहीं किये जाते हैं ,प्रत्युत अनादिकाल से स्वयं चले आ रहे हैं और अनंतकाल तक चलते रहेंगे वे अनादिपर्व कहे जाते हैं ।
जो पर्व किन्हीं महापुरुषों की स्मृति में प्रारंभ होते हैं , वे सादिपर्व होते हैं ।
इस परिभाषा के अनुसार सोलहकारण - दशलक्षण - अष्टान्हिका ये तीन अनादि पर्व कहलाते हैं । इनमें से यहाँ दशलक्षण पर्व के संदर्भ में जानना है कि यह अनादिनिधन पर्व वर्ष में तीन बार आता है ।
१. भादों के महीने में । २. माघ के महीने में । ३. चैत्र के महीने में ।
इन तीनों महीनों में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि से चतुर्दशी तक दश दिनों में दशलक्षण पर्व मनाया जाता है ।
दशलक्षण पर्व में जिन दश धर्मों की आराधना की जाती है , उनके नाम इस प्रकार हैं -
१. उत्तम क्षमा २. उत्तम मार्दव ३. उत्तम आर्जव ४. उत्तम सत्य ५. उत्तम शौच ६. उत्तम संयम ७. उत्तम तप ८. उत्तम त्याग ९. उत्तम आकिंचन्य १०. उत्तम ब्रम्हचर्य ।

विशेषरूप से भादों के महीने में पूरे देश के अन्दर यह दशलक्षण पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है और इन दश दिनों में लोग खूब व्रत- उपवास भी करते हैं तथा समाज में अनेक प्रकार के धार्मिक- सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं ।
प्राचीन परम्परा के अनुसार दशलक्षण के दश दिनों में तत्त्वार्थसूत्र ग्रन्थ की १-१ अध्याय के वाचन - प्रवचन की भी परम्परा रहती है ।
इस इन्साइक्लोपीडिया में ",अमूल्य प्रवचन" नामकी श्रेणी में तत्त्वार्थसूत्र के सुन्दर प्रवचन दशों अध्याय के हैं , उनका उपयोग भी आप कर सकते हैं ।
इसी संदर्भ में श्रेणी:दशलक्षण_पर्व_से_संबंधित_सामग्री एवं तत्त्वार्थसूत्र के दशों अध्याय की प्रश्नोत्तरी आदि कुछ सामग्री प्रस्तुत की जा रही है । आप सभी इसे विभिन्न रूप में प्रयोग करके धर्मलाभ प्राप्त करें यही मंगल कामना है ।
दस लक्षण धर्म सम्बंधित भजन सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें यहाँ दशधर्मों से संबंधित

आर्यिका चंदनामती
आश्चर्य
भविष्य में बनाने की योजना

फन_स्टेशन...

आज का प्रवचन--24 अगस्त ...
उठो भव्य खिल रही है उषा तीर्थ वंदना स्तवन करो

आर्त रौद्र दुध्र्यान छोड़कर श्री जिनवर का ध्यान करो - पूज्य चंदनामती माताजी ने कहा-भव्यात्माओं! आपको प्रतिदिन नींद से जगाने का पुरुषार्थ किया जाता है, साधु ऐसे अकारण बंधु है, जो नींद से नहीं मोहनींद से उठते हैं। कल सभी लोगों ने समाधि सम्राट आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की पुण्यतिथि बहुत ही धूमधाम से मनाई गई। जैनधर्म एक ऐसी कला है जो जीने की कला के साथ मरने की कला भी सिखाता है। युवा धर्म की शक्ति जागृत है, सम्राट चन्द्रगुप्त का सपना साकार करने के लिए। यह युवा संतों की वाणी का ही प्रभाव है। पूज्य ज्ञानमती माताजी ने कल अपने उद्बोधन में कहा कि युवा शक्ति ऐसी शक्ति है जो देश की संस्कृति, भारत की संस्कृति, धर्म और धर्मायतन की रक्षा करेगी। पंचमकाल में धर्म और धर्मायतन की रक्षा करने वाली युवा पीढ़ी होगी। पूज्य माताजी ने कहा-आज त्रिलोक तीज व्रत है। इस व्रत में त्रिकाल चौबीसी की आराधना की जाती हैं कहीं-कहीं पर इसे रोट तीज भी कहते हैं। शास्त्र में त्रिलोक तीज है। माताजी के गुरु आचार्य श्रीशांतिसागर जी महाराज का गुणानुवाद जितने भी शब्दों में किया जाये, उतना कम है, ऐसे गुरु को हम श्रद्धा से नमन करते हैं। सभी भक्तों से प्रेरणा है कि आचार्यश्री का इसी तरह गुणानुवाद करते रहें, यही मंगल प्रेरणा है। रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी ने कहा कि जैनशासन में दो प्रकार के पर्व माने हैं-सादि पर्व, अनादि पर्व। जो पर्व किसी के द्वारा शुरू नहीं किये जाते हैं, प्रत्युत अनादिकाल से स्वयं चले आ रहे हैं और अनंतकाल तक चलते रहेंगे। वे अनादिपर्व कहलाते हैं। दशलक्षण पर्व, सोलहकारण आष्टान्हिक ये तीन अनादि पर्व हैं। ये भाद्रशुक्ला पंचमी से चौदश तक दशलक्षण पर्व मनाया जाता है। इसमें दश धर्मों की आराधना की जाती है। इन दश दिनों में खूब व्रत-उपवास भी करते हैं तथा समाज में अनेक प्रकार के धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। आप सभी लोग धर्मलाभ प्राप्त करें, यही मंगल कामना है।

कुछ खास

समुच्चय भजन

तर्ज—चाँद मेरे आ जा रे......

पर्व दशलक्षण आया है-२
भक्तों ने प्रभु की भक्ति से अपना, उपवन सजाया है।। पर्व...।। टेक.।।

दशलक्षण का ये बगीचा, कितना सुन्दर लगता है।
भादों शुक्ला पंचमि से, चौदस तक यह सजता है।।
पर्व दशलक्षण आया है।।१।।

कर्मों की विलक्षण गति है, ये सबको नाच नचाते।
इनसे मुक्ती पाने की, युक्ती ये धर्म बताते।।
पर्व दशलक्षण आया है।।२।।

यह पर्व क्षमागुण का शुभ, संदेश लिए आता है।
भव-भव के वैर भुलाकर, मैत्री को सिखलाता है।।
पर्व दशलक्षण आया है।।३।।

मेरे आतम में भी प्रभु, ये धर्म दशों बस जावें।
पारस प्रभु सम कष्टों में, भी धैर्य हृदय बस जावे।।
पर्व दशलक्षण आया है।।४।।

यह धर्म कल्पतरु मुझको, सौभाग्य से प्राप्त हुआ है।
‘‘चन्दनामती’’ नरभव का, अब सच्चा ज्ञान हुआ है।।
पर्व दशलक्षण आया है।।५।।


24 कल्पद्रुम विधान
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२४ कल्पद्रुम महामंडल विधान
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कल्पद्रुम महामंडल विधान का आयोजन 26 अगस्त से सितम्बर 6 तक होगा |

प्रथामाचार्य श्री शांतिसागर महाराजपरंपरा की प्रमुख गणिनी पूज्य ज्ञानमती माताजी ने मुंबई महानगर के भांडुप जैनम हाल में दशलक्षण पर्व के शुभ अवसर पर २४ कल्पद्रुम महामंडल विधान का आयोजन बहुत ही धूमधाम से मनाये जाने कि प्रेरणा सभी भक्तों को प्रदान कर रही हैं| मुंबई महानगर वासियों के लिए बहुत ही सुनहरा अवसर है| कि आपके नगर में ऐसी महान साध्वी का एतिहासिक चातुर्मास हो रहा है|पूज्य माताजी की प्रथम आर्यिका शिष्या प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी जो कि आप सभी को सुबह से लेकर शाम तक अपनी वाणी से सभी को माधुर्यता का रसास्वादन कराती हैं|ऐसा अवसर आप लोग हाथ से ना जाने दें|सभी लोग एक-दूसरे से व्हाट्ज एप के माध्यम से दूसरों को सूचना पहुचाएं|और अपनें मित्रों से कहें|

पूजा रचाएंगे, प्रभु गुण गायेंगे समवसरण के मंडल रचाएंगे आवो करे 24 कल्पद्रुम कि पूजा |

श्री ज्ञानमती माताजी

प्रस्तुति-(इनसाइक्लोपीडिया टीम)

आचार्य शांतिसागर महाराज का अंतिम अमर सन्देश... मानव कल्याण का आधार सत्य और अहिंसाॐ सिद्धाय नम:। समाधि दो प्रकार की है-एक निर्विकल्प समाधि और दूसरी सविकल्प समाधि। गृहस्थ सविकल्प समाधि धारण करता है। मुनि हुए बिना निर्विकल्प समाधि नहीं होगी अतएव निर्विकल्प समाधि पाने के लिए पहले मुनि पद धारण करो। इसके बिना निर्विकल्प समाधि कभी नहीं होगी। निर्विकल्प समाधि हो तो सम्यक्त्व होता है, ऐसा कुन्दकुन्द स्वामी ने कहा है। आत्म-अनुभव के सिवाय नहीं है। व्यवहार सम्यक्त्व खरा (परमार्थ) नहीं है। फूल जैसे फल का कारण है, व्यवहार सम्यक्त्व आत्म-अनुभव का कारण है। आत्म-अनुभव होने पर खरा (परमार्थ) सम्यक्त्व होता है। निर्विकल्प समाधि मुनि पद धारण करने पर होती है। सातवें गुण-स्थान से बारहवें पर्यंत निर्विकल्प समाधि होती है। तेरहवें गुणस्थान में केवलज्ञान होता है, ऐसा शास्त्र में कहा है। यह विचार कर डरो मत कि क्या करें? संयम धारण करो। सम्यक्त्व धारण करो। इसके सिवाय कल्याण नहीं है, संयम और सम्यक्त्व के बिना कल्याण नहीं है। पुद्गल और आत्मा भिन्न हैं, यह ठीक-ठीक समझो। तुम सामान्य रूप से जानते हो, भाई, बन्धु, माता, पिता पुद्गल से संबंधित हैं, उनका जीव से कोई संबंध नहीं है। जीव अकेला है। बाबा (भाइयों)! जीव का कोई नहीं है। जीव भव-भव में अकेला जावेगा। देवपूजन, गुरुपास्ति, स्वाध्याय, संयम, दान और तप ये धर्म कार्य हैं। असि, मसि, कृषि, शिल्प, विद्या, वाणिज्य ये ६ कर्म कहे गये हैं। इनसे होने वाले पापों का क्षय करने को उक्त धर्म क्रिया कही है, इससे मोक्ष नहीं है। मोक्ष किससे मिलेगा? केवल आत्म-चिंतन से मोक्ष मिलेगा और किसी क्रिया से मोक्ष नहीं होता। जिनवाणी का अपूर्व माहात्म्य- भगवान की वाणी पर पूर्ण विश्वास करो, इसके एक-एक शब्द से मोक्ष पा जाओगे। इस पर विश्वास करो। सत्य वाणी यही है कि एक आत्म-चिंतन से सब साध्य है और कुछ नहीं है। बाबा (भाई)! राज्य, सुख, सम्पत्ति, संतति सब मिलते हैं, मोक्ष नहीं मिलता है। मोक्ष का कारण एक आत्म-चिंतन है। इसके बिना सद्गति नहीं होती है। सारांश-‘‘धर्मस्य मूलं दया’’ प्राणी का रक्षण दया है। जिन धर्म का मूल क्या है? ‘‘सत्य और अहिंसा।’’ मुख से सब सत्य-अहिंसा बोलते हैं। मुख से भोजन कहने से क्या पेट भरता है? भोजन किये बिना पेट नहीं भरता है, क्रिया करनी चाहिए। बाकी सब काम होंगे। सत्य अहिंसा पालो। सत्य से सम्यक्त्व है। अहिंसा से दया है। किसी को कष्ट नहीं दो। यह व्यवहार की बात है। सम्यक्त्व धारण करो, संयम धारण करो। इसके बिना कल्याण नहीं हो सकता। और पढ़ें...

श्रुतस्कंध व्रत

श्रुतस्कंध व्रत

विधि— भादों मास में भादों कृष्णा प्रतिपदा से लेकर आश्विन कृष्णा प्रतिपदा तक यह व्रत किया जाता है। इसमें एक महिने में उत्कृष्ट १६ उपवास, मध्यम १० और जघन्य ८ उपवास करें। पारणा के दिन यथाशक्ति नीरस या एक- दो आदि रस छोड़कर एक बार भोजन (एकाशन) करें। १६ उपवास करने में प्रतिपदा से एक उपवास, एक पारणा ऐसे आश्विन कृ. प्रतिपदा तक १६ उपवास होंगे। ऐसे ही १० उपवास में कृष्णपक्ष में दूज, पंचमी, अष्टमी, दशमी और चौदश तथा शुक्लपक्ष में भी २,५,८,१० और १४ को उपवास करें। ८ उपवास में भी दो पंचमी, २ अष्टमी, २ दशमी और २ चौदस ऐसे ८ उपवास करें। अथवा शक्ति अनुसार जैसे भी हो, वैसे ये उपवास करें। प्रतिदिन जिनमंदिर में श्रुतस्कंध मंडल बनाकर श्रुतस्कंध विधान पूजन करें। इस व्रत में प्रतिदिन निम्नमंत्र का जाप्य करे-

‘‘ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूतस्याद्वादनयगर्भितद्वादशांगश्रुतज्ञानेभ्यो नम:।’’

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आज का दिन - २४ अगस्त २०१७ (भारतीय समयानुसार)
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दिनाँक 24 अगस्त,2017
तिथी- भाद्रपद शुक्ला तृतीया
दिन-गुरूवार
वीर निर्वाण संवत- 2543
विक्रम संवत- 2074

सूर्योदय 05:50
सूर्यास्त 19:03


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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार
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