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२२ जून से २४ जून २०१८ तक ऋषभदेवपुरम मांगीतुंगी में लघु पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आयोजित किया गया है |

प्रतिदिन पारस चैनल के सीधे प्रसारण पर प्रातः 6 से 7 बजे तक प.पू.आ. श्री चंदनामती माताजी द्वारा जैन धर्म का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त करें |

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षट्खण्डागम टीका प्रवचन

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जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



ज्योतिष-वास्तु एवं मंत्र विद्या· जैन भूगोल· जैन इतिहास· श्रावक संस्कार· ग्रन्थ भण्डार

षट्खण्डागम सिद्धांत चिंतामणि टीका प्रवचन


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षट्खण्डागम ग्रन्थराज भजन
जैनधर्म के प्रारंभिक ज्ञान हेतु शिक्षण


(Teaching For The Basic Knowledge of Jainism)
द्वारा—प्रज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न चन्दनामती माताजी

पाठ : नवदेवता

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   अरिहंत भगवान के द्वारा कहे गये धर्म को जिनधर्म कहते हैं। इसका मूल जीवदया है। जिनेन्द्र देव द्वारा कहे गये एवं गणधर देव आदि ऋषियों के द्वारा रचे गये शास्त्र को जिनागम कहते हैं। अरिहंत देव की प्रतिमा को जिनचैत्य कहते हैं और जिनमंदिर को चैत्यालय कहते हैं।
जिनमंदिर में जाकर जिन प्रतिमा के दर्शन करने से महान पुण्यबंध होता है। जिनेन्द्र भगवान के दर्शन१करने के विचार मात्र से एक उपवास का फल होता है, मंदिर जाने के लिए उद्यम करने से दो, आरंभ करने से तीन, गमन करने पर चार, कुछ आगे जाने पर पाँच, मध्य में पहुँचने पर पन्द्रह, चैत्यालय का दर्शन होने पर एक मास, मंदिर में पहुँचने पर छह मास, द्वार में प्रवेश करने पर एक वर्ष, प्रदक्षिणा देने पर सौ वर्ष, जिनेन्द्र भगवान का दर्शन करने पर हजार वर्ष के उपवासों का फल होता है, ऐसा जानकर प्रतिदिन देव दर्शन करना चाहिए।

ज्येष्ठ जिनवर पूजा


ज्येष्ठ जिनवर पूजा

[ज्येष्ठ जिनवर व्रत में]
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नाभिराय कुल मण्डन मरुदेवी उर जननं।

प्रथम तीर्थंकर गाये सु स्वामी आदि जिनं।।

ज्येष्ठ जिनेन्द्र न्हवाऊँ सूरज उग्र भणी।

सुवरण कलशा भराऊँ क्षीरसमुद्र भरणी।।१।।

जुगला धर्म निवारण स्वामी ऋषभ जिनम्।

संसार सागर तारण सेविय सुर गहनं।।

ज्येष्ठ जिनेन्द्र न्हवाऊँ सूरज उग्र भणी।

सुवरण कलशा भराऊँ क्षीरसमुद्र भरणी।।२।।

इन्द्र इन्द्रानी देवा देवी बहु मिलनी।

मेरु जिनेन्द्र न्हवायो महोत्सव जै करनी।।

ज्येष्ठ जिनेन्द्र न्हवाऊँ सूरज उग्र भणी।

सुवरण कलशा भराऊँ क्षीरसमुद्र भरणी।।३।।

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चौरासी लाख योनि भ्रमण निवारण व्रत

-गणिनी ज्ञानमती

व्रत विधि-अनादिकाल से सभी संसारी प्राणी चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते आ रहे हैंं। उन चौरासी लाख योनि के भ्रमण से छूटने के लिए यह ‘‘चौरासी लाख योनिभ्रमण निवारण व्रत’’ है। इसके करने से व प्रतिदिन इन योनियों के भ्रमण से छूटने की भावना करते रहने से अवश्य ही हम और आप इन संसार परिभ्रमण के दु:खों से छुटकारा प्राप्त करेंगे।

इन चौरासी लाख योनियों का विवरण इस प्रकार है-१. नित्य निगोद, २. इतरनिगोद, ३. पृथ्वीकायिक, ४. जलकायिक, ५. अग्निकायिक व ६. वायुकायिक इन एकेन्द्रिय जीवों के प्रत्येक की सात-सात लाख योनियां मानी गयी हैं। अत: ६²७·४२ लाख योनियाँ हुई हैं। पुन: वनस्पतिकायिक की दश लाख योनियाँ हैं। पुन: विकलत्रय अर्थात् दो इंन्द्रिय, तीन इन्द्रिय व चार इन्द्रिय जीवों की प्रत्येक की दो-दो लाख योनियाँ हैं। अत: ३²२·६ लाख भेद हुए।

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शान्तिनाथ भगवान का परिचय


भगवान शांतिनाथ के जन्मकल्याणक के अवसर पर प्रस्तुत -
[ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी-12-6-2018]
शान्तिनाथ भगवान का परिचय
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परिचय

इसी जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में रत्नपुर नाम का नगर है। उस नगर का राजा श्रीषेण था, उसके सिंहनन्दिता और अनिन्दिता नाम की दो रानियाँ थीं। इन दोनों के इन्द्रसेन और उपेन्द्रसेन नाम के दो पुत्र थे। उसी नगर की सत्यभामा नाम की एक ब्राह्मण कन्या अपने पति को दासी पुत्र जानकर उसे त्याग कर राजा के यहाँ अपने धर्म की रक्षा करते हुए रहने लगी थी। किसी एक दिन राजा श्रीषेण ने अपने घर पर आए हुए आदित्यगति और अरिंजय नाम के दो चारण मुनियों को पड़गाहन कर स्वयं आहारदान दिया और पंचाश्चर्य प्राप्त किये तथा दश प्रकार के कल्पवृक्षों के भोग प्रदान करने वाली उत्तरकुरू भोगभूमि की आयु बाँध ली। दान देकर राजा की दोनों रानियों ने तथा दान की अनुमोदना से सत्यभामा ने भी उसी उत्तम भोगभूमि की आयु बाँध ली। सो ठीक ही है क्योंकि साधुओं के समागम से क्या नहीं होता ? किसी समय इन्द्रसेन की रानी श्रीकांता के साथ अनन्तमति नाम की एक साधारण स्त्री आई थी उसके साथ उपेन्द्रसेन का स्नेह समागम हो गया। इस निमित्त को लेकर बगीचे में दोनों भाईयों का युद्ध शुरू हो गया। राजा इस युद्ध को रोकने में असमर्थ रहे, साथ ही अत्यन्त प्रिय अपने इन पुत्रों के अन्याय को सहन करने में असमर्थ रहे अत: वे विषपुष्प सूँघ कर मर गये, वही विषपुष्प सूँघ कर दोनों रानियाँ और सत्यभामा भी प्राणरहित हो गर्इं तथा धातकीखंड के पूर्वार्ध भाग में जो उत्तरकुरू प्रदेश है उसमें राजा तथा सिंहनन्दिता दोनों दम्पत्ती हुए और अनिन्दिता नाम की रानी आर्य तथा सत्यभामा उसकी स्त्री हुई, इस प्रकार वे सब वहाँ भोगभूमि के सुखों को भोगते हुए सुख से रहने लगे।

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ब्रह्मचारी से स्वामी जी तक की प्रेरणादायक यात्रा


ब्रह्मचारी से स्वामी जी तक की प्रेरणादायक यात्रा

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-सुरेश जैन रितुराज, मेरठ
(राष्ट्रीय अध्यक्ष-भारतीय जैन मिलन व अध्यक्ष-दिगम्बर जैन समाज मेरठ)


जम्बूद्वीप को आज कौन नहीं जानता। परमपूज्यनीय आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा से निर्मित जम्बूद्वीप केवल हस्तिनापुर की शान नहीं है, बल्कि पूरे देश में इसे महान् सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहर के रूप में जाना जाता है। हस्तिनापुर जैन धर्मावलम्बियों का सर्वोच्च तीर्थ क्षेत्र है। अजैनों के बीच यह प्रचारित करने में जम्बूद्वीप का उल्लेखनीय योगदान है, यह कहना अतिशयोक्ति न होगी।

जम्बूद्वीप ने जो आयाम स्थापित किये हैं नि:सदेह यह परमपूज्यनीय श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा और आशीर्वाद से प्राप्त किये हैं लेकिन इसकी असाधारण और चमत्कारिक सफलता के पीछे अगर पीठाधीश श्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी का उल्लेख न किया गया, तो शायद यह उचित न होगा ।

मैं माताजी और जम्बूद्वीप से काफी सालों से जुड़ा हुआ हू। मेरठ में श्री प्रेमचंद जैन (तेल वालों) ने कमलानगर (मेरठ) में मंदिर निर्मित किया था और माताजी के पावन सान्निध्य में उसका पंचकल्याणक सम्पन्न हुआ था। मैं पंचकल्याणक का चेयरमैन था। माताजी के सान्निध्य में भगवान ऋषभदेव निर्वाणमहोत्सव समिति का गठन हुआ था, उसका मैं महामंत्री था। इन सभी कार्यों में बाल ब्रह्मचारी श्री रवीन्द्र जी का मुझसे संपर्क रहा था। मैंने तभी उनकी अद्भुत प्रतिभाओं को नजदीक से देखा। रवीन्द्र जी में कार्य करने की क्षमता भी है और जैनधर्म के उत्थान के प्रति ललक भी है। और पढ़ें...

आरती नवग्रह स्वामी...


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तर्ज-चाँद मेरे आ जा रे............

आरती नवग्रह स्वामी की-२
ग्रह शांति हेतू तीर्थंकरों की, सब मिल करो आरतिया।।टेक.।।
आत्मा के संग अनादी, से कर्मबंध माना है।
उस कर्मबंध को तजकर, परमातम पद पाना है।
आरती नवग्रह स्वामी की।।१।।

निज दोष शांत कर जिनवर, तीर्थंकर बन जाते हैं।
तब ही पर ग्रहनाशन में, वे सक्षम कहलाते हैं।
आरती नवग्रह स्वामी की।।२।।

जो नवग्रह शांती पूजन, को भक्ति सहित करते हैं।
उनके आर्थिक-शारीरिक, सब रोग स्वयं टरते हैं।
आरती नवग्रह स्वामी की।।३।।

कंचन का दीप जलाकर, हम आरति करने आए।
‘‘चन्दनामती’’ मुझ मन में, कुछ ज्ञानज्योति जल जाए।।
आरती नवग्रह स्वामी की।।४।।

बाल विकास भाग: २


लघु पंचकल्याणक प्रतिष्ठा


भगवान चन्द्रप्रभु लघु पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव

स्थान—श्री ऋषभदेवपुरम-मांगीतुंगी
(नासिक) महाराष्ट्र
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धर्मानुरागी बंधुओ ! आपको जानकर प्रसनता होगी कि ऋषभदेवपुरम-मांगीतुंगी में पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के सानिध्य में आठवें तीर्थंकर भगवान चन्द्रप्रभु पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव दिनांक २२ जून से २४ जून २०१८ तक सम्पन किया जा रहा है | इस प्रतिष्ठा महोत्सव में आप सपरिवार सादर आमंत्रित है |

-मंगल कार्यक्रम-
  • २२ जून २०१८ : ध्वजारोहण एवं गर्भकल्याणक
  • २३ जून २०१८ : जन्मकल्याणक एवं दीक्षा कल्याणक
  • २४ जून २०१८ : केवलज्ञान एवं मोक्षकल्याणक


निवेदक : भगवान श्री १०८ फुट विशालकाय दिगम्बर जैन मूर्ति निर्माण कमेटी, ऋषभदेवपुरम-मांगीतुंगी (नासिक) महा.


वृहत्पल्य व्रत विधि


वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत की तिथियाँ, व्रतों के नाम एवं माहात्म्य

तिथि व्रत का नाम फल

पौष कृष्णा ३ पंक्तिमान छह पल्य उपवास

पौष कृष्णा १२ सूर्य सात पल्य उपवास

पौष सुदी ५ पराक्रम नौ पल्य उपवास

पौष सुदी ११ जयपृथु दस पल्य उपवास

माघ कृष्णा २ अजित आठ पल्य उपवास

माघ कृष्णा ५ स्वयंप्रभ ग्यारह पल्य उपवास

माघ कृष्णा १५ रत्नप्रभ बारह पल्य उपवास

माघ सुदी ४ चतुर्मुख तेरह पल्य उपवास

माघ सुदी ७ शील चौदह पल्य उपवास

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भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ


भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ

(चैत्र कृ. नवमी-१० मार्च २०१८ से चैत्र कृ. नवमी-२९ मार्च २०१९)
प्रेरणा-भारतगौरव दिव्यशक्ति शारदे माँ गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी
        
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आज हम सभी वर्तमान विश्व में उपस्थित आतंकवाद, हिंसा, विनाश, अशांति, परस्पर शत्रुता, विद्वेष, बदला लेने की भावना आदि विकृतियों से ग्रसित हो रही मानवता को दृष्टिगत कर रहे हैं। ‘अहिंसामयी शाश्वत धर्म’ का शीतल जल ही इन अग्नि ज्वालाओं के उपशमन में सहयोगी हो सकता है, यही तीर्थंकर भगवन्तों की सदाकाल से देशना रही है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से की गई धर्माराधना, मंत्रानुष्ठान, विधि-विधान भी सम्पूर्ण वातावरण को प्रभावित करके क्षेम-सुभिक्ष-शांति-सौहार्द की स्थापना करने में अत्यन्त कार्यकारी होते हैं, यह परम सत्य है।

      इन्हीं विश्वकल्याणकारी भावनाओं से ओतप्रोत होकर भारतगौरव, दिव्यशक्ति, परम उपकारी परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ऋषभगिरि-मांगीतुंगी में विराजमान विश्व के सर्वाधिक उत्तुंग १०८ फुट भगवान ऋषभदेव के श्रीचरणों में स्थित होकर भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती, चैत्र कृ. नवमी, १० मार्च २०१८ के पावन अवसर पर ‘भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष’ मनाने की प्रेरणा प्रदान की है, जो आने वाली ऋषभ जयंती, चैत्र कृ. नवमी, २९ मार्च २०१९ तक हम सबको व्यक्तिगत शांति, सामाजिक शांति, राष्ट्रीय शांति एवं विश्वशांति हेतु जागृत होकर अपना-अपना योगदान प्रदान करने हेतु कटिबद्ध कर रहा है। आइये हम भी विश्वशांति के इस महा आयोजन में किसी न किसी रूप में अपना सहयोग प्रदान कर पुण्यलाभ प्राप्त करें।

विश्वशांति वर्ष मनाने की रूपरेखा-

(१) विश्वशांति हेतु जाप्य (मंत्र-ॐ ह्रीं विश्वशांतिकराय श्री ऋषभदेवाय नम:)
(२) भगवान ऋषभदेव मण्डल विधान
(३) णमोकार महामंत्र अथवा भक्तामर महास्तोत्र का अखण्ड पाठ (अपने समयानुसार)
(४) भगवान ऋषभदेव पर संगोष्ठी

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जीव दया की कहानी


जीव दया की कहानी -

लेखिका-प्रज्ञाश्रमणी चंदनामती माताजी

तर्ज -ये परदा हटा दो ....

सुनो जीवदया की कहानी , इक मछुवारे की जुबानी ,

इक मछली को दे जीवन इसने जीवन पाया था |
the story of compossion , is called indian tradition
one fisherman had given once the life to the fish .

इक मुनि से नियम लिया था , पालन द्रढ़ता से किया था |
he took the vow from munivar , and followed till while life .that vow became very fruitful in fisherman 's life .
अब आगे शुरू होती है कहानी एक मछुवारे की -

जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव |
गुरुवर की सत्संग सभा में , मछुवारा आया प्रवचन सुनने |
गुरुदर्शन का भाव था उसमें , माँगा आशीर्वाद था उसने ||
बोला मै पापी गुरुदेव , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव -२ ||१ ||
गुरु वचनों की महिमा निराली , निकट जो जाता जाता न खाली |
कितनों की गुरु ने विपदा टाली , धीवर की क्या कहूँ कहानी ||
देख रहा वह मुनि का तेज , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव ||२ ||
गुरु ने दिव्यज्ञान से जाना , धीवर की किस्मत पहचाना |
छोटा सा इक नियम दे दिया , उसका बेड़ा पार कर दिया ||
भवदधितारक हैं गुरुदेव , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव ||३ ||
क्या था नियम यह सुन लो भाई , पहली मछली जो जाल में आई |
उसको प्राणदान दे देना , कुछ तो पुण्य अर्जित कर लेना ||
धर्म अहिंसा है सबसे श्रेष्ठ , जय गुरुदेव बोलो जय जय गुरुदेव ||४ ||

आगे क्या होता है ?


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बाल विकास प्रतियोगिता


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श्री ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक


श्री ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक

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इस ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक को ज्येष्ठ के महीने में भगवान ऋषभदेव के मस्तक पर मिटटी या सोने के कलशे में जल भर के किया जाता है|

 
-दोहा-
भोगभूमि के अंत में, हुआ आदि अवतार।
आदिब्रह्म आदीश ने, किया जगत उद्धार।।
-शेर छंद-
जय जय प्रभो वृषभेश ने अवतार जब लिया।
इंद्रों ने अयोध्या को स्वर्गसम बना दिया।।
सुरपति ने मेरु पे जिनेन्द्र न्हवन किया था।
क्षीरोदधी का जल परम पवित्र हुआ था।।१।।

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आज का दिन - २१ जून २०१८ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक २१ जून,२०१८
तिथी- द्वितीय ज्येष्ठ शुक्ल ९
दिन-गुरुवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७५

सूर्योदय ०५.२७
सूर्यास्त १९.२७



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तीर्थंकर माता के सोलह स्वप्न

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०-९ अं
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