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प्रतिदिन पारस चैनल पर 6.00 बजे सुबह देखें पूज्य गणिनी प्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी के लाइव प्रवचन

पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी ससंघ पोदनपुर बोरीवली में विराजमान है।

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जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ

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पिच्छि कमण्डलु

पिच्छि : कमण्डलु

णिप्पिच्छे णत्थि णिव्वाणं
आचार्य कुन्दकुन्द
—आचार्य विद्यानन्द मुनि जी

दिगम्बर मुनि के पास संयम तथा शौच के उपकरण के रूप में पिच्छि और कमण्डलु होते हैं। सर्वथा नग्न एवं अपरिग्रहमहाव्रती मुनि की चर्या की निर्दोषता के रक्षार्थ इन्हें रखने की शास्त्राज्ञा है। मानों, पिच्छि और कमण्डलु मुनि के स्वावलम्बन के दो हाथ हैं। प्रतिलेखनशुद्धि के लिए पिच्छि की नितान्त आवश्यकता है और पाणि—पाद—प्रक्षालन के लिए, शुद्धि के लिए कमण्डलु वांछनीय है। पिच्छिका मयूरपंखों से बनायी जाती है, अन्य पंख पिच्छि के लिए उपादेय नहीं माने गये। क्योंकि मुनियों के लिए िंहसा, चौर्य, परिग्रह आदि सर्वथा निषिद्ध हैं और मयूरपंख ही ऐसे सुलभ हैं जिन्हें वह उल्लिखित दोषों से बचते हुए ग्रहण कर सकता है। (सकते हैं)। वह इस प्रकार कि मयूर वर्ष में एक बार अपनी जीर्ण पक्षावली का त्याग कर नवीन प्राप्त करता है अत: समय पर बिना हिंसा उसे प्राप्त किया जा सकता है। वनों में विचरते हुए, मुनियों को वृक्षों के नीचे पुष्कल परिमाण में स्वयं पतित पंख अनायास मिल जाते हैं। ये पंख स्वयं मयूर द्वारा परित्यक्त अथच भूमिपतित होते हैं। अत: इन्हें ग्रहण करने में चौर्यदोष भी नहीं लगता। तीसरी बात यह है कि प्रतिवर्ष और पुष्कल मात्रा में अनायास मिलते रहने से, यह आवश्यक नहीं कि इनको बटोर कर, संगृहीत कर आगामी वर्षों के लिए संचित किया जाए जिससे कि परिग्रहदोष की सम्भावना हो। इसके अतिरिक्त मयूरपिच्छ का लवभाग (बालमय अग्रभाग) इतना मृदु होता है कि प्रतिलेखन से किसी सूक्ष्म जन्तु की हिंसा भी नहीं होती। स्वयं मयूरी के पंख भी पिच्छि के निमित्त उपादान नहीं हो सकते। एक जाति के

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सेमिनार की परिभाषा

सेमिनार की परिभाषा मेरी दृष्टि में

आर्यिका श्री चंदनामती माताजी
मुम्बई में २३ से २५ जुलाई २०१७ तक आयोजित

National Seminar On Jain Dharma में आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी ने
सेमिनार-SEMINAR
का हिन्दी-अंग्रेजी में विवरण निम्न प्रकार से बताकर विद्वानों को आनंद विभोर कर दिया |
से - सेवा धर्म समाज की, आगम के अनुकूल।
यही प्रमुख उद्देश्य है, जैनधर्म का मूल।।१।।
मि - मिलकर धर्मप्रभावना, करो सभी विद्वान।
वर्गोदय को तज करें, सर्वोदय उत्थान।।२।।
ना - नाम से नहिं गुण से सहित, णमोकार हैं मंत्र।
इसका खूब प्रचार हो, नमूँ परमपद पंच।।३।।
- रत्न तीन जग में कहे, देव शास्त्र गुरु धाम।

रत्नत्रय इनसे मिलें, इन पद करें प्रणाम।।४।।

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सम्पादकीय

‘‘दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम’’ के उद्घाटन अवसर पर प्रस्तुत

Professional की सही परिभाषा मेरी दृष्टि में
-आर्यिका चन्दनामती

    जैसे सरोवर की शोभा कमल से होती है, पक्षी की शोभा उसके पंखों से है, भोजन की शोभा नमक से होती है, नारी की शोभा शील से होती है, सुन्दर गीत सुरीले कंठ से सुशोभित और आकर्षक बन जाता है, सर्वोदयी विश्वधर्म भी अहिंसा के पालन से ही शोभायमान एवं विश्ववंद्य होता है, भारत की शोभा आध्यात्मिक संतों से वृद्धिंगत होती है उसी प्रकार हमारे धर्मप्राण भारतीय समाज की शोभा विशिष्ट बुद्धिजीवियों से है।

    आप सभी दिगम्बर जैन समाज के विशेष बुद्धिजीवी व्यक्तित्व के रूप में पधारे हैं। आज की यह Conference मुम्बई DJPF अर्थात् Digambar Jain Professional Forum दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम के द्वारा organized है। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से निर्मित इस फोरम के सभी Executive Members विशेष आशीर्वाद एवं बधाई के पात्र हैं। उन्हें इस फोरम के द्वारा आगे निरन्तर सामाजिक संगठन-एकता एवं जैनधर्म के संरक्षण आदि के कार्य करते हुए अपनी युवा शक्ति का सृजनात्मक (Constructive) परिचय देना है।

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ज्ञानमती माताजी की पूजन

पूज्य गणिनीप्रमुखश्री ज्ञानमती माताजी की पूजन

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रचयित्री-आर्यिका चन्दनामती

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-स्थापना-
पूजन करो जी-
श्री गणिनी ज्ञानमती माताजी की, पूजन करो जी।
जिनकी पूजन करने से, अज्ञान तिमिर नश जाता है।
जिनकी दिव्य देशना से, शुभ ज्ञान हृदय बस जाता है।।
उनके श्री चरणों में, आह्वानन स्थापन करते हैं।
सन्निधीकरण विधीपूर्वक, पुष्पांजलि अर्पित करते हैं।।
पूजन करो जी,
श्री गणिनी ज्ञानमती माताजी की पूजन करो जी।।
ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती मात: ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती मात: ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती मात:! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्।

-अष्टक-

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02.खानदान और खानपान शुद्धि का महत्त्व

खानदान और खानपान शुद्धि का महत्त्व

-पं. शिवचरनलाल जैन, मैनपुरी (उ.प्र.)
वन्दे धर्मतीर्थेशं, श्रीपुरुदेवपरम् जिनम्।

दानतीर्थेशश्रेयासं चापि शुद्धिप्रदायकम्।।
जातिकुलशुद्धिमादाय, अशनपानपवित्रताम्।

परमस्थानसंप्राप्ता: विजयन्तु परमेष्ठिन:।।स्वोपक्ष।।

मैं धर्मतीर्थ, व्रत तीर्थकर्ता उत्कृष्ट प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान और शुद्धि प्रदायक दानतीर्थेश श्रेयांस को प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने जाति, कुल शुद्धि और भोजनपान की शुद्धि प्राप्त कर सप्त परमस्थानों सहित मोक्षपद को प्राप्त किया है, वे परमेष्ठी जयवन्त हों। मानव जीवन में खानदान और खानपान शुद्धि का अत्यधिक महत्व है । नि:श्रेयस और लौकिक अभ्युदय दोनों ही दृष्टियों से यह मान्य है । प्रत्यक्ष, आगम और अनुमान तीनों ही प्रमाणों से यह प्रमाणित होता है । यह सर्वत्र दृष्टिगत होता है कि प्राय: उच्च वर्ण, जाति, गोत्र-कुल वाले श्रेष्ठ कार्यों को सम्पादित करते हुए प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं। ज्ञान, ध्यान, तप की योग्यता भी श्रेष्ठ खानदान की अपेक्षा रखती है ।

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दीपावली पूजन
दीपावली पूजन विधि भाग 1
दीपावली पूजन विधि भाग 2
दीपावली पूजन विधि भाग 3
डिप्लोमा इन जैनोलोजी

डिप्लोमा इन जैनोलोजी

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वृहत्पल्य व्रत विधि

वृहत्पल्य व्रत विधि

जिस किसी ने मनुष्य जन्म प्राप्त करके यदि पल्य विधान नाम का व्रत किया है, वह भव्य है, यह बात निश्चित है। यह व्रत श्रवण मात्र से ही असंख्यात भवों के पापों का नाश कर देता है और तत्काल ही स्वर्गमोक्ष को भी देने वाला है। वृषभदेव भगवान ने पहले इस पल्य विधान का कथन किया है। उसी प्रकार वीर जिनेन्द्र के निकट में गौतम आदि महर्षियों ने भी इसे कहा है। इस विधान के पढ़ने से सहस्रगुणा फल होता है और इसका अनुष्ठान करने से उत्तम अनन्त केवलज्ञान प्राप्त होता है। इस व्रत के अनुषंगिक फल चक्रीपद और इन्द्रपद भी प्राप्त होते हैं किन्तु मुख्यरूप से इसका फल निर्मल तीर्थंकर पद प्राप्त करना ही है।’

वृहत्पल्य व्रत की तिथियाँ, व्रतों के नाम एवं माहात्म्य

तिथि व्रत का नाम फल

आश्विन सुदी ६ सूर्यप्रभा एक पल्य उपवास

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वीर निर्वाण संवत्सर पूजा

वीर निर्वाण संवत्सर पूजा

(नव वर्ष की पूजा)
रचयित्री-आर्यिका चन्दनामती
(दीपावली के दूसरे दिन कार्तिक शु. एकम को यह पूजन करके अपने वर्ष को मंगलमय करें)

स्थापना-शंभु छंद
श्री वीरप्रभू को वन्दन कर, उनके शासन को नमन करूँ।
नववर्ष हुआ प्रारंभ वीर, निर्वाण सुसंवत् नमन करूँ।।
यह संवत् हो जयशील धरा पर, यही प्रार्थना जिनवर से।
इस अवसर पर प्रभु पूजन कर, प्रारंभ करूँ नवजीवन मैं।।
ॐ ह्रीं नववर्षाभिनन्दनकारक श्रीमहावीर-जिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं नववर्षाभिनन्दनकारक श्रीमहावीर-जिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।

ॐ ह्रीं नववर्षाभिनन्दनकारक श्रीमहावीरजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।

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दीपावली-पूजा विधि

दीपावली-पूजा विधि

भगवान महावीर सब ओर से भव्यों को सम्बोध कर पावा नगरी पहुँचे और वहाँ ‘‘मनोहर उद्यान’’ नाम के वन में विराजमान हो गये। जब चतुर्थकाल में तीन वर्ष साढ़े आठ माह बाकी थे, तब स्वाति नक्षत्र में कार्तिक अमावस्या के दिन प्रातःकाल (उषाकाल) के समय अघातिया कर्म को नाश कर भगवान कर्म बन्धन से मुक्त होकर मोक्षधाम को प्राप्त हो गये। इन्द्रादि देवों ने आकर उनके शरीर की पूजा की। उस समय देवों ने बहुत भारी देदीप्यमान दीपकों की पंक्ति से पावा नगरी को सब तरफ से प्रकाशयुक्त कर दिया। उस समय से लेकर आज तक लोग प्रतिवर्ष दीपमालिका द्वारा भगवान महावीर की पूजा करने लगे।१ उसी दिन सायंकाल में श्री गौतमस्वामी को केवलज्ञान प्रगट हो गया, तब देवों ने आकर गंधकुटी की रचना करके गौतमस्वामी की एवं केवलज्ञान की पूजा की। इसी उपलक्ष्य में लोग सायंकाल में दीपकों को जलाकर पुनः नयी बही आदि का मुहूर्त करते हुए गणेश और लक्ष्मी की पूजा करने लगे हैं। वास्तव में ‘‘गणानां ईशः गणेशः· गणधरः’’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार बारह गणों के अधिपति गौतम गणधर ही गणेश हैं ये विघ्नों के नाशक हैं और उनके केवलज्ञान विभूति की पूजा ही महालक्ष्मी की पूजा है।

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टेंशन का उपचार मेडीसिन नहीं मेडीटेशन है

टेंशन का उपचार मेडीसिन नहीं मेडीटेशन है

—आचार्य विनम्रसागर जी महाराज

वर्तमान युग में जितने ज्यादा साधन सुविधाएँ उपलब्ध हुई उतना जीवन स्तर का विकास तो हुआ लेकिन आदमी आलसी और कमजोर होता गया। इस कमजोरी का एक लक्षण टेंशन भी है। साहसी और धैर्यवान प्राणी मुसीबतों में घबराते नहीं है उनसे डटकर मुकाबला करते हैं और कमजोर आदमी टेंशन कर बैठता है जिससे बी. पी. हाई और हार्ट अटैक जैसी घटनाएँ जीवन में घटित हो जाती हैं। कई लोग इसका उपचार कराते हुए कई प्रकार की दवाईयाँ खाते हैं लेकिन वे दवाईयाँ मन को बेहोश करने की होती हैं, मन को विस्तृत करने की नहीं होती। टेंशन का उपचार तभी होगा जब मन विशाल होगा, मन की विशालता धर्म के माहौल में होगी। खोज करें तो पाएँगे कि सबसे बड़ा विशाल मन कोई धर्मी का ही हुआ है और भविष्य में भी एक पक्षपात रहित धर्मी का ही होगा। मन में यदि सीमित वस्तुएँ समाती हैं तो मन विशाल नहीं होता और जब मन असीमित के लिए दौड़ लगाता है तो मन चेतन के साथ मिलकर अनंत के महल को छूने लगता है। टेंशन तभी होता है जब असीमित की चाह में सीमित हाथ लगे अथवा हम ज्यादा की आकांक्षा रखें और उपलब्ध कम हो सके टेंशन की मूल जड़ है हम जैसा चाहते हैं वैसा न होना अथवा अपेक्षा की उपेक्षा होना। इसे केवल आत्मध्यान के बल से ही मिटाया जा सकता है, कोई दवाईयों से नहीं।

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भगवान महावीर निर्वाणभूमि-पावापुरी जल मंदिर

पावापुरी में सरोवर के मध्य स्थित जल मंदिर ही भगवान महावीर की निर्वाणभूमि है। श्री पूज्यपाद आचार्य ने निर्वाणभक्ति में कहा है-

पद्मवनदीर्घिकाकुल-विविधद्रुमखण्डमण्डिते रम्ये।

पावानगरोद्याने व्युत्सर्गेण स्थितः स मुनिः।।१६।।
कार्तिककृष्णस्यान्ते स्वातावृक्षे निहत्य कर्मरजः।
अवशेषं संप्रापद्-व्यजरामरमक्षयं सौख्यम् ।।१७।।
परिनिर्वृतं जिनेन्द्रं, ज्ञात्वा विबुधा ह्यथाशु चागम्य।
देवतरुरक्तचंदन - कालागुरुसुरभिगोशीर्षैः ।।१८।।
अग्नीन्द्राज्जिनदेहं मुकुटानलसुरभिधूपवरमाल्यैः।
अभ्यच्र्य गणधरानपि, गता दिवं खं च वनभवने।।१९।।

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दिगम्बर जैन आम्नाय में मंत्र व्यवस्था

दिगम्बर जैन आम्नाय में मंत्र व्यवस्था

डाॅ. सविता जैन(सम्पादिका-आदित्य आदेश)-उज्जैन- म०प्र०
सारांश
द्वादशांग जिनवाणी के बारहवें दृष्टिवादांग के १४ पूर्वों में १०वाँ विद्यानुवाद पूर्व है जो तंत्र,मंत्र एवं यंत्र से सम्बद्ध है। आज भी मानव अलौकिक एवं आध्यामिक शक्तियों की आराधना में मंत्रों का प्रयोग करता है किन्तु मंत्र क्या हैं? मंत्रों का स्वरूप एवं उपयोग सा हो? क्या दिगम्बर आगम परम्परा में मंत्रों की साधना एवं धर्मप्रभावना के निमित्त उनके प्रयोग की अनुमति है? क्या पौराणिक सन्दर्भों में आचार्यों द्वारा इनके प्रयोगों का विवरण मिलता है? इन प्रश्नों के समाधान के साथ ही मंत्रों के उपयोग, विधि-निषेधों की संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत आलेख में की गई है।

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आज का दिन - १८ अक्टूबर २०१७ (भारतीय समयानुसार)
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दिनाँक 18 अक्टूबर,2017
तिथी- कार्तिक कृष्णा 14
दिन-बुधवार
वीर निर्वाण संवत- 2543
विक्रम संवत- 2073

सूर्योदय 06.21
सूर्यास्त 17.58

छोटी दिपावली

सर्वार्थ सिद्धि 06.37 से 30.28 तक

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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार
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