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पू० गणिनी श्रीज्ञानमती माताजी ससंघ मांगीतुंगी के (ऋषभदेव पुरम्) में विराजमान हैं |

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ


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विहार अपडेट


मंगल पदार्पण

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धर्मप्रेमी गुरुभक्तों!

हम सभी के महान पुण्योदय से सर्वोच्च जैन साध्वी गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का महाराष्ट्र तीर्थ यात्रा हेतु मंगल विहार सानंद सम्पन्न हुआ।

पूज्य माताजी संघ ने पूरे 9 माह में लगभग 1500 किमी. की तीर्थ यात्रा करके अनेक तीर्थों के दर्शन का पुण्य अर्जित किया। साथ में पूज्य माताजी के सान्निध्य में औरंगाबाद, नाशिक, मुम्बई, सूरत जैसे महानगरों में ऐतिहासिक धर्मप्रभावना के अनेकानेक आयोजन सम्पन्न हुवे।

इस महाराष्ट्र तीर्थ यात्रा को सम्पन्न करते हुए पूज्य माताजी का मंगल पदार्पण 7 दिसम्बर को प्रातः 8 बजे ऋषभदेवपुरम-माँगीतुँग़ी में हो गया है ।

अतः आप सभी भक्तगण दिसंबर में आकर पुण्य लाभ अर्जित करे, ऐसा निवेदन है।

निवेदक-108 फ़ुट भगवान ऋषभदेव मूर्ति निर्माण कमेटी-माँगीतुँग़ी।

"खानदान और खानपान शुद्धि का महत्त्व


'खानदान और खानपान शुद्धि का महत्त्व-
-पं. शिवचरनलाल जैन, मैनपुरी (उ.प्र.)
वन्दे धर्मतीर्थेशं, श्रीपुरुदेवपरम् जिनम्।

दानतीर्थेशश्रेयासं चापि शुद्धिप्रदायकम्।।
जातिकुलशुद्धिमादाय, अशनपानपवित्रताम्।

परमस्थानसंप्राप्ता: विजयन्तु परमेष्ठिन:।।स्वोपक्ष।।

मैं धर्मतीर्थ, व्रत तीर्थकर्ता उत्कृष्ट प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान और शुद्धि प्रदायक दानतीर्थेश श्रेयांस को प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने जाति, कुल शुद्धि और भोजनपान की शुद्धि प्राप्त कर सप्त परमस्थानों सहित मोक्षपद को प्राप्त किया है, वे परमेष्ठी जयवन्त हों। मानव जीवन में खानदान और खानपान शुद्धि का अत्यधिक महत्व है । नि:श्रेयस और लौकिक अभ्युदय दोनों ही दृष्टियों से यह मान्य है । प्रत्यक्ष, आगम और अनुमान तीनों ही प्रमाणों से यह प्रमाणित होता है । यह सर्वत्र दृष्टिगत होता है कि प्राय: उच्च वर्ण, जाति, गोत्र-कुल वाले श्रेष्ठ कार्यों को सम्पादित करते हुए प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं। ज्ञान, ध्यान, तप की योग्यता भी श्रेष्ठ खानदान की अपेक्षा रखती है । मोक्षमार्ग में इसकी अनिवार्यता है

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सम्पादकीय


‘‘दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम’’ के उद्घाटन अवसर पर प्रस्तुत

Professional की सही परिभाषा मेरी दृष्टि में
-आर्यिका चन्दनामती

    जैसे सरोवर की शोभा कमल से होती है, पक्षी की शोभा उसके पंखों से है, भोजन की शोभा नमक से होती है, नारी की शोभा शील से होती है, सुन्दर गीत सुरीले कंठ से सुशोभित और आकर्षक बन जाता है, सर्वोदयी विश्वधर्म भी अहिंसा के पालन से ही शोभायमान एवं विश्ववंद्य होता है, भारत की शोभा आध्यात्मिक संतों से वृद्धिंगत होती है उसी प्रकार हमारे धर्मप्राण भारतीय समाज की शोभा विशिष्ट बुद्धिजीवियों से है।

    आप सभी दिगम्बर जैन समाज के विशेष बुद्धिजीवी व्यक्तित्व के रूप में पधारे हैं। आज की यह Conference मुम्बई DJPF अर्थात् Digambar Jain Professional Forum दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम के द्वारा organized है। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से निर्मित इस फोरम के सभी Executive Members विशेष आशीर्वाद एवं बधाई के पात्र हैं। उन्हें इस फोरम के द्वारा आगे निरन्तर सामाजिक संगठन-एकता एवं जैनधर्म के संरक्षण आदि के कार्य करते हुए अपनी युवा शक्ति का सृजनात्मक (Constructive) परिचय देना है।

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गाय की रक्षा और हमारा कर्तव्य


गाय की रक्षा और हमारा कर्तव्य

गाय नाम के प्राणी को आज के समय में हर कोई, जल्दी से माता कहने, मानने के लिए तैयार तो हो जाते हैं , परंतु वास्तविक रूप से उसे माता स्वरूप मानकर उसका रक्षण या पालन—पोषण करने के लिए बहुत कम लोग तैयार होते हैं । सुबह में, दोपहर में या शाम को अगर हम चाय, काफी या दूध पीते हैं तो, निश्चित रूप से हमें यह जानना चाहिए की चाय, कॉफी में मिक्स किया हुआ ‘दूध’ गाय, भैंस और बकरी जैसे प्राणियों का होता है, जिसे डेयरी प्रोडक्ट के रूप में दूध उत्पादक डेरी से प्राप्त करते हैं। मनुष्य जाति में स्त्री जब बच्चा पैदा करती है तब उस बच्चे को स्त्री अपने स्तन में से ‘दुग्ध’ रूपी प्रवाही, जो बच्चे के लिए अमृत स्वरूप है—पिलाकर जीवित रखती है। उसी तरह अगर कोई भी मनुष्य किसी प्राणी में मादा (नारी जाती) प्राणी का ‘दुग्ध’ पीता है तो वह मादा प्राणी भी ‘माता’ समान ही कहलाती है। हम मनुष्य लोग हर रोज गाय, भैंस, बकरी जैसे मादा प्राणी के स्तन से निकला हुआ दूध पीते हैं,

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रत्नकरंडश्रावकाचार- प्रथम परिच्छेद


नम: श्री वर्धमानाय निर्धूत कलिलात्मने ।

सालोकानां त्रिलोकानां यद्विद्या दर्पणायते ।।

१. मंगलाचरण

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ज्ञानावरणादिक पापकर्म आत्मा से नष्ट किए जिनने।
उन वीरप्रभु को नमन करूं सालोक—त्रिलोक ज्ञान जिनके।।
जैस चक्षु दर्पण को लख निजमुख अवलोकन करता है।
वैसे केवलज्ञानी आत्मा में सारा जगत झलकता है।।

जिन्होंने सम्पूर्ण कर्म कलंक को धोकर अपनी आत्मा को शुद्ध कर लिया है। केवलज्ञान को प्रकट कर तीनों कालों को प्रत्यक्ष कर लिया है। जिनके केवलज्ञान रूपी दर्पण में तीनों लोक और आलोक स्पष्ट झलकते हैं उन तीर्थंकर श्री वर्धमान स्वामी को मैं नमस्कार करता हूँ।।१।।

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दीपावली पूजन


दीपावली पूजन विधि भाग 1
दीपावली पूजन विधि भाग 2
दीपावली पूजन विधि भाग 3
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भगवान नेमिनाथ का वैराग्य


भगवान नेमिनाथ का वैराग्य


किसी समय युवा नेमिकुमार, बलदेव और नारायण आदि कोटि-कोटि यादवों से भरी हुई ‘कुसुमचित्रा’ नामक सभा में गये। सब राजाओं ने उठकर प्रभु को नमस्कार किया और श्रीकृष्ण ने भी प्रभु की अगवानी कर अपने बराबर बिठाया। उस समय सभी के बल की प्रशंसा होते-होते अनेक राजाओं ने श्रीकृष्ण नारायण के बल को सर्वाधिक बतलाया तब श्री बलभद्र ने कहा कि तीर्थंकर नेमिनाथ का बल नारायण और चक्रवर्ती से भी अधिक है अत: इस सभा में श्री नेमिकुमार से अधिक बलशाली कोई नहीं है। तब श्रीकृष्ण ने नेमिनाथ की तरफ देखा और कहा कि बाहुयुद्ध में परीक्षा क्यों न कर ली जावे। भगवान नेमिनाथ ने उस समय हँसकर कहा—अग्रज ! बाहुयुद्ध की क्या आवश्यकता ? आप मेरी इस कनिष्ठा अँगुली को ही सीधी कर दें। श्रीकृष्ण ने पूरी शक्ति लगा दी किन्तु असफल ही रहे, तब वहाँ श्री नेमिनाथ के बल की प्रशंसा होने लगी।
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जाति और वर्ण


आर्यिका श्री सुपार्श्वमती माताजी ( समाधिस्थ )

शास्त्रकारों ने ‘जाति’ शब्द का प्रयोग तीन अर्थों में किया है। एक अर्थ है-नाम कर्म के उदय से होने वाली जाति, जैसे-गतिजातिशरीरांगोपांग.......इत्यादि। इसके पाँच भेद हैं-१. एकेन्द्रिय जाति, २. द्वीन्द्रिय जाति, ३. त्रीन्द्रिय जाति, ४. चतुरिन्द्रिय जाति, ५. पंचेन्द्रिय जाति। इसमें पंचेन्द्रिय जाति की अपेक्षा मानव, देव, नारकों और पंचेन्द्रिय तिर्यंचों की जाति एक ही है। जाति का दूसरा अर्थ योनि है जिसके कुल चौरासी लाख भेद हैं। सात लाख प्रश्नीकाय, सात लाख जलकाय, सात लाख नित्य-निगोद, दस लाख वनस्पतिकाय, दो लाख दो इन्द्रिय, लाख तीन इन्द्रिय, दो लाख चतुरिन्द्रिय, चार लाख पंचेन्द्रिय पशु, चार लाख देव, चार लाख नारकी, चौदह लाख मनुष्य आदि। आठ मदों में एक जातिमद भी है, इसमें पिता की वंश-शुद्धि को कुल और माता की अन्वयशुद्धि को जाति कहा है। यह जाति का तीसरा अर्थ है।

जैन शास्त्रों में जाति और वर्ण का पृथक्-पृथक् उल्लेख मिलता है। यद्यपि कोई-कोई विचारक दोनों को एक मानते हैं परन्तु आदिपुराण के अनुसार जाति और वर्ण में अन्तर है। एक ही वर्ण के अन्तर्गत कई जातियाँ-उपजातियाँ होती हैं। अत: वर्ण व्यापक और जाति व्याप्य है । वर्ण का आधार आजीविका है और जाति का आधार विवाह संंबंध। इसलिए जिनसेनाचार्य ने जाति व्यवस्था के लिए विवाह संबंधी नियमों का पालन आवश्यक माना है।

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सूरत विहार


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छह सौ साल से देश को जोड़ रही है हिंदी


स्वाधीनता के लिए जब जब आन्दोलन तेज हुआ तब तब हिन्दी की प्रगति का रथ भी तेज गति से आगे बढ़ा। हिन्दी राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक बन गई। स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व जिन नेताओं के हाथों में था, उन्होंने यह पहचान लिया था कि विगत ६००—७०० वर्षों से हिन्दी सम्पूर्ण भारत की एकता का कारक रही है यह संतो , फकीरों, व्यापारियों, तीर्थ यात्रियों, सैनिकों आदि के द्वारा देश के एक भाग से दूसरे भाग तक प्रयुक्त होती रही है। मैं यह बात जोर देकर कहना चाहता हूँ कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा की मान्यता उन नेताओं के कारण प्राप्त हुई जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी। बंगाल के केशवचन्द्र सेन, राजा राम मोहनराय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पंजाब के विपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, गुजरात के स्वामी दयानन्द, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, महाराष्ट्र के लोकमान्य तिलक तथा दक्षिण भारत के सुब्रह्मण्यम भारती, मोटूरि सत्यनारायण आदि नेताओं के राष्ट्रभाषा हिन्दी के सम्बंध में व्यक्त विचारों से मेरे मत की संपुष्टि होती है। हिन्दी भारतीय स्वाभिमान और स्वातंत्र्य चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गई । हिन्दी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक हो गई । इसके प्रचार प्रसार में सामाजिक,धार्मिक तथा राष्ट्रीय नेताओं ने सार्थक भूमिका का निर्वाह किया।

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माँ का स्थान सर्वोच्च है


माँ का स्थान सर्वोच्च है

जगत में माँ का स्थान सर्वोच्च है। वे खुशनसीब होते हैं जिन्हें माँ की सेवा करने का अवसर व उसकी मातृछाया में वात्सल्य पाने का सौभाग्य मिलता है। माँ अपनी संतानों के लिए बड़ी पीड़ा सहने के लिए तैयार रहती है। मगर आज की संतान अपनी माँ के प्रति इतना आदर सम्मान नहीं देती है। जो एक दुर्भाग्य का विषय है। ये सच है कि संतान अपनी माँ का कर्ज जीवन भर नहीं चुका पाती मगर अपने माता—पिता की सेवा करके वह उन्हें आदर सम्मान दे सकती है। पुत्र असमर्थ हो या समर्थ, दुर्बल हो या ह्रष्ट पुष्ट, माँ उसकी रक्षा करती है। माता के सिवाय दूसरा कोई विधिपूर्वक या आत्मीयता से उसका पालन पोषण नहीं कर सकता। बच्चों के लिए माँ के समान दूसरी कोई छाया नहीं है अर्थात् माता की छत्रछाया में जो सुख है वह कहीं नहीं है। माँ के तुल्य कोई सहारा नहीं है, माँ सदृश अन्य कोई रक्षक नहीं है तथा माँ के समान दूसरा कोई व्यक्ति नहीं है।

जब भी कस्ती मेरी, मझधार में आ जाती है।

माँ दुआ करते हुए, रव्वाब में आ जाती है।।
एक अंधेरा भाग जो मुंह तेरा काला हो गया।
माँ ने आँखे खोल दी, घर में उजाला हो गया।।
किसी को घर मिला,हिस्से में या दुकान आई।
मैं घर में सबसे छोटा, मेरे हिस्से में माँ आई।।

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चौदह गुणस्थान


चौदह गुणस्थान

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बीस प्ररूपणाओं द्वारा अथवा बीस प्रकरणों का आश्रय लेकर यहाँ जीवद्रव्य का प्ररूपण किया जाता है। ‘‘जीवट्ठाण’’ नामक सिद्धांतशास्त्र में अशुद्ध जीव के १४ गुणस्थान, १४ मार्गणा और १४ जीवसमास स्थानों का जो वर्णन है वही इसका आधार है। संक्षेप रुचि वाले शिष्यों की अपेक्षा से बीस प्ररूपणाओं का गुणस्थान और मार्गणा इन दो ही प्ररूपणाओं में अंतर्भाव हो जाता है अतएव संग्रहनय से दो ही प्ररूपणा हैं अर्थात् गुणस्थान यह एक प्ररूपणा हुई और चौदह मार्गणाओं में जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा और उपयोग इन पाँचों प्ररूपणाओं का अंतर्भाव हो जाता है। जैसे— इंद्रिय मार्गणा और कायमार्गणा में जीवसमास गर्भित हो जाते हैं इत्यादि। इसलिये अभेद विवक्षा से गुणस्थान और मार्गणा ये दो ही प्ररूपणा हैं किन्तु भेद विवक्षा से बीस प्ररूपणाएँ होती हैं।

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आज का दिन - ११ दिसम्बर २०१७ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक ११ दिसम्बर,२०१७
तिथी- पौष कृष्ण ९
दिन-सोमवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७४

सूर्योदय ०६.५८
सूर्यास्त १७.३८



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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


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