ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ

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मुम्बई विहार


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मोह का नाश


मोह का नाश कैसे हो ?

मोह को नाश करने के लिए कारणभूत जिनेन्द्रदेव का उपदेश है, उस उपदेश को अर्थात् जिनेन्द्रदेव की वाणी को प्राप्त करके भी पुरुषार्थ ही अर्थ क्रियाकारी है। बिना पुरुषार्थ के मोह का नाश नहीं किया जा सकता है-

जो मोहरागदोसे णिहणदि उवलब्भ जोण्हमुवदेसं।
सो सव्वदुक्खमोक्खं पावदि अचिरेण कालेण१।। ८८।। (प्रवचनसार)


अर्थ
जो जिनेन्द्रदेव के उपदेश को प्राप्त करके मोह, राग द्वेष का हनन करता है वह अल्प काल में सर्व दु:खों से छुटकारा पा लेता है। श्री अमृतचंद्र सूरि कहते हैं- वास्तव में इस दीर्घ संसार में जैसे तैसे बहुत ही मुश्किल से श्री जिनेश्वर का उपदेश मिलता है जो कि तीक्ष्ण तलवार की धार के समान है, जो महापुरुष इस उपदेशरूपी तीक्ष्ण तलवार से मोह, राग और द्वेषरूपी अपने अंतरंग शत्रुओं का सफाया कर देते हैं वे ही जीव संसार के दु:खों से छूट जाते हैं। चूँकि हाथ में तलवार रहते हुये उसका फल यही है कि शत्रु पर प्रहार करना। यदि हाथ में तलवार रहते हुये भी कोई अपने शत्रु का वार सहता रहे और उसका सामना न कर सके या उसे न मार सके तो उसके हाथ में रखी हुई तलवार का क्या उपयोग हुआ ?

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स्वाध्याय


तीर्थों के विकास की आवश्यकता

द्वारा- गणिनी ज्ञानमती माताजी

वैदिक संस्कृति में संगम को अर्थात् नदियों को तीर्थ मानकर उनमें स्नान करने को पाप प्रक्षालित करने का एक माध्यम माना गया है, पर जैन संस्कृति के अनुसार तीर्थंकर भगवंतों की कल्याणक भूमियों को तीर्थ मानकर उनकी वंदना-पूजा-अर्चना करने से निश्चित ही पापो का क्षालन हो जाता है। वर्तमान तीर्थंकर भगवन्तों की जन्मभूमियाँ तो अधिकांशतः नगरों में ही हैं, पर निर्वाणभूमियाँ पहाड़ों पर हैं। नदियों में स्नान करने के स्थान पर जिनेन्द्र भगवान की भक्तिरूपी गंगा में अवगाहन करने से समस्त पापकर्मों का धुलना हमारे महान आचार्यों ने वर्णित किया है।

प्रयाग में सन् २००१ में विशाल महाकुंभ का आयोजन हुआ था, मैं उस समय प्रयाग में ही थी। वहाँ के विशिष्ट कार्यकर्ता विशेष निवेदन करके मुझे वहाँ ले गये। माघ वदी अमावस्या (२४ जनवरी) को उनका मुख्य स्नान था और माघ वदी चतुर्दशी (२३ जनवरी) को आदिब्रह्मा भगवान ऋषभदेव का निर्वाणकल्याणक था, तब मैंने प्रेरणा दी कि भगवान ऋषभदेव के नाम से वहाँ पर पाण्डाल बने, पूजन विधान हो, भगवान का मस्तकाभिषेक हो, निर्वाणलाडू चढ़े, तो ही हमारे जाने की सार्थकता है।पुण्योदय से विशाल भीड़ के बीच सारे कार्यक्रम बहुत ही धर्मप्रभावनापूर्वक सम्पन्न हुए, निर्वाण कल्याणक के उपलक्ष्य में वहाँ उपस्थित संतों-महंतों एवं विश्व हिन्दू परिषद-बजरंग दल आदि के सैकड़ों कार्यकर्ताओं द्वारा १००८ निर्वाणलाडू चढ़ाये गये। वि.हि.प. की नवम् संसद में लगातार २-३ दिन तक लगभग १०,००० संतों-महंतों और लाखों की भीड़ के मध्य उद्बोधन देने के लिए मुझसे प्रार्थना की गयी तब मैंने कहा कि इक्ष्वाकुवंशीय श्रीराम के पूर्वज आदिब्रह्मा भगवान ऋषभदेव थे। भगवान ऋषभदेव के इक्ष्वाकु वंश में ही आगे सूर्यवंश में श्रीराम का अयोध्या में जन्म हुआ था, इसलिए अयोध्या की रक्षा मात्र राम जन्मभूमि की ही वरन् ऋषभ जन्मभूमि की भी रक्षा है। और पढ़ें...

अभक्ष्य


अभक्ष्य किसे कहते हैं?

जो भक्षण करने योग्य न हो, वे अभक्ष्य कहलाते हैं। स्वामी श्री समन्तभद्राचार्य ने अभक्ष्य को बतलाते हुए कहा है-

त्रसहतिपरिहरणार्थम्, क्षौद्रं पिशितं प्रमादपरिहृतये।
मद्यं च वर्जनीयं, जिनचरणौ शरणमुपयातै:।।८४।।


जिनेन्द्रदेव के चरणयुगल की शरण लेने वाले श्रावक त्रस जीवों की हिंसा का परित्याग करने के लिए मधु और मांस का त्याग कर देवें और प्रमाद दूर करने के लिए मद्य का सर्वथा त्याग कर देवें।

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समाचार


गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के मंगल विहार के मनोरम क्षण

भारत गौरव गणिनीप्रमुख 105 *आर्यिका श्रीज्ञानमती माताजी* ससंघ हलाई लोहाना महाजन वाड़ी,मुम्बई में विराजमान है।

दिनांक 24.05.2017 बुधवार प्रातः 6.00 बजे से ज्ञानमती माताजी ससंघ सानिध्य में गुलालवाड़ी मंदिर में *शांतिनाथ भगवान* का ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष चौदस जन्म-तप-मोक्ष कल्याणक के उपलक्ष्य में *शान्तिनाथ भगवान* एवं *स्वर्णिम पार्श्वन्नाथ भगवान* का *भव्य* पंचामृत अभिषेक होगा एवं कार्यक्रम का सीधा प्रसारण पारस चेनल पर होगा।

सभी श्रद्धालु महानुभाव समय पर पहुच कर धर्म लाभ अर्जित करें।

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कुछ खास


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गाय की रक्षा


‘गाय की रक्षा और हमारा कर्तव्य’

गाय नाम के प्राणी को आज के समय में हर कोई, जल्दी से माता कहने, मानने के लिए तैयार तो हो जाते हैं , परंतु वास्तविक रूप से उसे माता स्वरूप मानकर उसका रक्षण या पालन—पोषण करने के लिए बहुत कम लोग तैयार होते हैं । सुबह में, दोपहर में या शाम को अगर हम चाय, काफी या दूध पीते हैं तो, निश्चित रूप से हमें यह जानना चाहिए की चाय, कॉफी में मिक्स किया हुआ ‘दूध’ गाय, भैंस और बकरी जैसे प्राणियों का होता है, जिसे डेयरी प्रोडक्ट के रूप में दूध उत्पादक डेरी से प्राप्त करते हैं। मनुष्य जाति में स्त्री जब बच्चा पैदा करती है तब उस बच्चे को स्त्री अपने स्तन में से ‘दुग्ध’ रूपी प्रवाही, जो बच्चे के लिए अमृत स्वरूप है—पिलाकर जीवित रखती है। उसी तरह अगर कोई भी मनुष्य किसी प्राणी में मादा (नारी जाती) प्राणी का ‘दुग्ध’ पीता है तो वह मादा प्राणी भी ‘माता’ समान ही कहलाती है। हम मनुष्य लोग हर रोज गाय, भैंस, बकरी जैसे मादा प्राणी के स्तन से निकला हुआ दूध पीते हैं,

इसलिए प्रत्यक्ष रूप से नहीं, तो भी परोक्ष रूप से वे सभी मादा प्राणी हमारे लिए ‘मां’ समान ही बन जाते हैं। और जिस तरह हम हमारी जनेता माँ की रक्षा करने के लिए तत्पर रहते हैं, उसी तरह गाय, भैंस , बकरी इत्यादि तृण भक्षी प्राणी का हमें संरक्षण करना चाहिए। (न की उसे मारना चाहिए।)

इन सभी प्राणियों में भी वैज्ञानिक परीक्षण के अनुसार गाय का दूध, दही, घी इत्यादि दूसरे प्राणियों की अपेक्षा गुणकारी और मनुष्य शरीर के लिए आरोग्य प्रद और औषधीय गुण वाला जाना गया है। वैसे तो गाय नाम के प्राणी (इसमें गाय, सांड, और बलद ये सब गाय नाम प्राणी से ही जाने जाते हैं।) का मल—मूत्र भी वैज्ञानिक मतानुसार लाभदायक है। वैसे भी गाय के मूूत्र में से गौमूत्र युक्त औषधियां आज बनती हैं ।

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चारों अनुयोगों का महत्व


चारों अनुयोगों का महत्व
मंगलाचरण
द्वादशांगश्रुतं भाव-श्रुतञ्चाप्युपलब्धये।
चतुरनुयोगाब्धौ मेऽनिशमन्तोऽवगाह्यताम्।।७।।

द्वादशांग श्रुत और भावश्रुत की उपलब्धि के लिये चारों अनुयोगरूपी समुद्र में मेरा मन नित्य ही अवगाहन करता रहे। (जिनेन्द्र भगवान के मुखकमल से निर्गत पूर्वापर विरोधरहित जो वचन हैं उन्हें आगम कहते हैं। उसके ही प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग ये चार भेद हैं। इन चारों अनुयोगों को ‘चार वेद’ भी कहते हैं। ये चारों ही अनुयोग सम्यक्त्व की उत्पत्ति के लिये कारण हैं। सम्यग्दृष्टि के सम्यक्त्व को मल आदि दोषों से रहित निर्दोष करने वाले हैं और उसकी रक्षा करने में भी पूर्ण सहायक हैं। ऐसे ही सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को भी प्रकट करने वाले हैं तथा इनकी वृद्धि और रक्षा करके अंत में समाधि की सिद्धि कराने वाले हैं। ये चारों अनुयोग मोक्षमार्ग में चलने के लिये दीपक हैं। यह अनुपयोगरूप द्रव्यश्रुत ही भावश्रुत के लिये कारण है और यह भावश्रुत केवलज्ञान के लिये बीजभूत है। अतएव इस श्रुतज्ञान की उपासना का फल केवलज्ञान का प्राप्त होना ही है। ‘‘इस शास्त्ररूपी अग्नि में भव्यजीव तपकर विशुद्ध हो जाता है और दुष्टजन अंगार के समान तप्त हो जाते हैं अथवा भस्म के समान भस्मीभूत हो जाते हैं।१’’ अर्थात् वे शास्त्र के अर्थ का अनर्थ करके उसे शस्त्र बना लेते हैं अत: क्रम से और गुरुपरम्परा से शास्त्रों को पढ़ना चाहिये। उनके अर्थ को सही समझकर अपनी आत्मा को शुद्ध कर लेना चाहिए।) ...और पढ़ें

व्यंजन


मीठे व्यंजन

अन्य मीठे व्यंजन...

आज का दिन - २६ मई २०१७ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक 26 मई,2017
तिथी-ज्येष्ठ शुक्ला एकम्
दिन-शुक्रवार
वीर निर्वाण संवत- 2543
विक्रम संवत- 2074

सूर्योदय ०५:२५
सूर्यास्त १८:३३


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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


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परिमार्जित क्ष त्र ज्ञ श्र अः


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