Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


खुशखबरी ! पू० गणिनी श्रीज्ञानमती माताजी ससंघ कतारगाँव में भगवान आदिनाथ मंदिर में विराजमान हैं|

मुख्यपृष्ठ

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


जैन इनसाइक्लोपीडिया
जैन विश्वकोश
जैनधर्म के ज्ञान का महासागर




डिप्लोमा इन जैनोलोजी

आनलाइन फॉर्म भरने के लिए यहाँ क्लिक करें...
स्पेशल प्रवचन - जैन भूगोल

लाइव टी वी
प्रमुख विषय


जैन धर्म· चौबीस तीर्थंकर भगवान· णमोकार महामंत्र· स्वाध्याय करें· गैलरी· जिनेन्द्र भक्ति· जैन तीर्थ ·



ज्योतिष-वास्तु एवं मंत्र विद्या· जैन भूगोल· जैन इतिहास· श्रावक संस्कार· ग्रन्थ भण्डार

गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ


अन्य चैनलों से समाचार झलक देखें

💎 विहार अपडेट💐


🙏 जय जिनेन्द्र🙏

    बड़े हर्ष से सूचित किया जाता है कि सकल दिगम्बर जैन समाज सूरत द्वारा गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का अभिनंदन एवम दिगम्बर जैन एकता सम्मेलन का भव्य आयोजन l*
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

  • रविवार 26 नवंबर २०१७*
  • दोहपर 1:०० बजे से*
  • स्थल : सूरत इंटरनेशनल एक्सिबिशन एंड कॉन्वेनेन्शन सेंटर सरसाना*

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

  • निवेदक:- सकल दिगम्बर जैन समाज,सूरत*

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

  • आप सभी भक्तजनो का ह्रदय से अभिनन्दन करते हुए इस महामहोत्सव में सपरिवार पधारने* *हेतु आमंत्रित करता है।*

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

।।जय जिनेन्द्र।।

आज का प्रवचन


17 नवम्बर 2017

सूरत शहर में ज्ञान की गंगा में अवगाहन करते भक्त-

पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ सूरत शहर में सभी भक्तों को ज्ञान की गंगा में अवगाहन करा रही हैं। पूज्य माताजी अपने प्रवचन में समयसार का पाठ सभी भक्तों को पढ़ाती हैं। समयसार की बात सुनकर आत्मा से भिन्न सब कुछ समझ लेती हैं। वात्सल्य की वर्षा में वसुधैव कुटुम्बकम् का पाठ पढ़ाती हैं।

पूजय चंदनामती माताजी ने माताजी के व्यक्तित्व के बारे में बताया कि माताजी एक विशाल नदी की तरह है, जहाँ पर हर प्राणी आकर अपनी प्यास बुझाता है। जहाँ पर संतों की छाया होती है, वहाँ पर सिर्फ पुण्य ग्रहण किया जाता है। जहाँ जीवन में पुण्य का उदय होता है, बिना मांगे आध्यात्मिक और भौतिक सम्पत्ति मिल जाया करती है। अगर पुण्य का उदय होता है, तो जंगल में भी रोटी मिल जाया करती है, अगर पाप का उदय होता है, तो

पूज्य चंदनामती माताजी ने बहुत ही सुंदर कथानक सुनाया-

एक बार की बात है भाई, इक बालक का जन्म हुआ।

जीवदया के फलस्वरूप में उसका जीवन धन्य हुआ।।

एक बालक अपनी माँ के गर्भ में आया, उसका पिता परदेश चला गया। अपने मित्र के घर में छोड़ दिया। अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए |

और पढ़े

सम्पादकीय


‘‘दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम’’ के उद्घाटन अवसर पर प्रस्तुत

Professional की सही परिभाषा मेरी दृष्टि में
-आर्यिका चन्दनामती

    जैसे सरोवर की शोभा कमल से होती है, पक्षी की शोभा उसके पंखों से है, भोजन की शोभा नमक से होती है, नारी की शोभा शील से होती है, सुन्दर गीत सुरीले कंठ से सुशोभित और आकर्षक बन जाता है, सर्वोदयी विश्वधर्म भी अहिंसा के पालन से ही शोभायमान एवं विश्ववंद्य होता है, भारत की शोभा आध्यात्मिक संतों से वृद्धिंगत होती है उसी प्रकार हमारे धर्मप्राण भारतीय समाज की शोभा विशिष्ट बुद्धिजीवियों से है।

    आप सभी दिगम्बर जैन समाज के विशेष बुद्धिजीवी व्यक्तित्व के रूप में पधारे हैं। आज की यह Conference मुम्बई DJPF अर्थात् Digambar Jain Professional Forum दिगम्बर जैन प्रोफेशनल फोरम के द्वारा organized है। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से निर्मित इस फोरम के सभी Executive Members विशेष आशीर्वाद एवं बधाई के पात्र हैं। उन्हें इस फोरम के द्वारा आगे निरन्तर सामाजिक संगठन-एकता एवं जैनधर्म के संरक्षण आदि के कार्य करते हुए अपनी युवा शक्ति का सृजनात्मक (Constructive) परिचय देना है।

और पढ़ें...
अहिंसा अणुव्रत की कहानी


अहिंसा अणुव्रत की कहानी

Vv8.jpg

हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पाँचों पापों के अणु अर्थात् एकदेश त्याग को अणुव्रत कहते हैं। अहिंसा अणुव्रत-मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना से संकल्पपूर्वक (इरादापूर्वक) किसी त्रस जीव को नहीं मारना अहिंसा अणुव्रत है। जीव दया का फल चिंतामणि रत्न की तरह है, जो चाहो सो मिलता है।

काशी के राजा पाक शासन ने एक समय अपनी प्रजा को महामारी कष्ट से पीड़ित देखकर ढिंढोरा पिटवा दिया कि नंदीश्वरपर्व में आठ दिन पर्यंत किसी जीव का वध न हो। इस राजाज्ञा का उल्लंघन करने वाला प्राणदण्ड का भागी होगा। वहीं का धर्म नाम का एक सेठपुत्र राजा के बगीचे में जाकर राजा के खास मेढ़े को मारकर खा गया। जब राजा को इस घटना का पता चला, तब उन्होंने उसे शूली पर चढ़ाने का आदेश दिया।


.और पढ़ें

(६) महाभारत का युद्ध एवं पाण्डवों की लक्ष्यसिद्धि


किसी समय एक विद्वान् राजगृह नगर के राजदरबार में उत्तम रत्नों की भेंट लेकर जरासंध अर्धचक्री के पास गया और नमस्कार किया, तब राजा जरासंध ने पूछा—‘‘तुम कहाँ से आए हो और यह रत्न कहाँ से लाए हो’’ ? उत्तर में उसने कहा राजन् ! ‘द्वारिका में नेमिप्रभु के साथ श्रीकृष्ण राजा राज्य करते हैं। श्री नेमि तीर्थंकर के गर्भ में आने के पहले से लेकर पन्द्रह मास तक वहाँ देवों ने रत्न बरसाए थे उनमें के ये रत्न हैं, मैं वहीं से आपके दर्शनार्थ आया हूँ। यह सुनते ही जरासंध चक्री भड़क उठे और युद्ध के लिए प्रयाण कर दिया तथा दुर्योधन आदि राजाओं के पास समाचार भेज दिए। दुर्योधन बहुत ही प्रसन्न हुआ उसने सोचा यह पांडवों को समाप्त करने का अच्छा अवसर हाथ लगा है। जरासंध ने द्वारावती में दूत भेजा, वह दूत जाकर बोला—हे यादवों! आपको चक्री ने कहलाया है कि आप देश छोड़कर इस महासमुद्र में कैसे रहते हैं ? आप लोग गर्व छोड़कर चक्री जरासंध की सेवा करें। तब बलभद्र व्रुद्ध होकर बोले—श्रीकृष्ण को छोड़कर अन्य चक्रवर्ती भला और कौन है ? तथा दूत को फटकार कर निकाल दिया। यह सुनकर राजा जरासंध सेना के साथ युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र में आ गया।


और पढ़ें...

मुक्तावली व्रत


मुक्तावली व्रत

मुक्तावली व्रत दो प्रकार का होता है-लघु और बृहत्। लघु व्रत में नौ वर्ष तक प्रतिवर्ष ९-९ उपवास करने होते हैं। पहला उपवास भाद्रपद शुक्ला सप्तमी को, दूसरा आश्विन कृष्णा षष्ठी को, तीसरा आश्विन कृष्णा त्रयोदशी को, चौथा आश्विन शुक्ला एकादशी को, पाँचवाँ कार्तिक कृष्णा द्वादशी को, छठवाँ कार्तिक शुक्ला तृतीया को, सातवाँ कार्तिक शुक्ला एकादशी को, आठवाँ मार्गशीर्ष कृष्णा एकादशी को और नौवाँ मार्गशीर्ष शुक्ला तृतीया को करना चाहिए। मुक्तावली व्रत में ब्रह्मचर्य सहित अणुव्रतों का पालन करना चाहिए। रात में उपवास के दिन जागरण कर धर्मार्जन करना चाहिए।
‘‘ॐ ह्रीं वृषभजिनाय नम:’’
इस मंत्र का जाप करना चाहिए।

और पढ़े

भगवान पुष्पदंत जन्म - तप कल्याणक (मार्गशीर्ष शुक्ल १)


Pushp bhi 112.jpg
-अथ स्थापना (गीता छंद)-
Cloves.jpg
Cloves.jpg

श्री पुष्पदंतनाथ जिनेन्द्र त्रिभुवन, अग्र पर तिष्ठें सदा।
तीर्थेश नवमें सिद्ध हैं, शतइन्द्र पूजें सर्वदा।।
चउज्ञानधारी गणपती, प्रभु आपके गुण गावते।
आह्वान कर पूजें यहाँ, प्रभु भक्ति से शिर नावते।।
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदंतजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदंतजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।

ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदंतजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

और पढ़े

मैनासुन्दरी का अपनी सासु के साथ वार्तालाप


मैनासुंदरी अपनी सास से कह रही थीं—‘हे माता जी!

आज बारह वर्ष बीत चुके हैं। आपके पुत्र आज तक नहीं आये हैं। उनसे मैंने कह दिया था कि यदि आप कही हुई अपनी निश्चित अवधि तक नहीं आएँगे तो मैं आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर लूँगी। इसलिए आप मुझे अब आज्ञा प्रदान करें, मैं प्रात:काल ही दीक्षा लेऊँगी।’ सास ने कहा— ‘बेटी! कुछ समय और धैर्य धरो, जहाँ तुमने बारह वर्ष निकाले हैं, वहाँ दो-चार दिन क्या भारी हैं? मेरा पुत्र वचन का बहुत ही पक्का है वह अवश्य आयेगा। हो सकता है कुछ कारणवश एक-दो दिन अधिक लग जाएँ?’ मैनासुंदरी ने कहा-

और पढ़े

उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य क्या है


उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य क्या है?

संतोष कुमार-गुरूजी! उत्पाद-व्यय ध्रौव्य क्या चीज है?

गुरूजी-द्रव्य का लक्षण है 'सत' अर्थात विद्यमान रहना | सत का लक्षण है "उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्" अर्थात जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त होता है वह "सत्" है | अब तीनों का लक्षण सुनो-
किसी वास्तु में नवीन पर्याय की उत्पत्ति होना उत्पाद है, उसी द्रव्य कि पूर्व पर्याय का विनाश होना व्यय है और दोनों अवस्थाओं में द्रव्य का बने रहना द्रौव्य है | जैसे-तुमने अंगूठी बनवाई है तो उसमे अंगूठी के पूर्व सुवर्ण कि डली पर्याय का नाश हुआ, अंगूठी पर्याय का उत्पाद हुआ और दोनों अवस्थाओं में सुवर्णपना द्रव्य मौजूद है, यह ध्रौव्य है| ऐसे ही मनुष्य पर्याय का विनाश हुआ, उसी छण में देवायु-देवगति आदि के उदय होने से देव्पर्याय का उत्पाद हुआ और दोनों अवस्ताओं में जीवत्व मौजूद है, वह ध्रौव्य हुआ |


और पढ़ें...

कौरव-पाण्डव


कुरुवंश परम्परा— कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर में परम्परागत कुरुवंशियों का राज्य चला आ रहा था। उन्हीं में शान्तनु नाम के राजा हुए। उनकी ‘‘सबकी’’ नाम की रानी से पाराशर नाम का पुत्र हुआ। रत्नपुर नगर के ‘‘जन्हु’’ नामक विद्याधर राजा की ‘‘गंगा’’ नाम की कन्या थी। विद्याधर राजा ने पाराशर के साथ गंगा का विवाह कर दिया। इन दोनों के गांगेय—भीष्माचार्य नाम का पुत्र हुआ। जब गांगेय तरुण हुआ तब पाराशर राजा ने उसे युवराज पद दे दिया।

किसी समय राजा पाराशर ने यमुना नदी के किनारे क्रीड़ा करते समय नाव में बैठी सुन्दर कन्या देखी और उस पर आसक्त होकर धीवर से उसकी याचना की किन्तु उस धीवर ने कहा कि आपके पुत्र गांगेय को राज्य पद मिलेगा तब मेरी कन्या का पुत्र उसके आश्रित रहेगा अत: मैं कन्या को नहीं दूँगा। राजा वापस घर आकर चितित रहने लगे। किसी तरह गांगेय को पिता की चिंता का पता चला। तब वे धीवर के पास जाकर बोले कि तुम अपनी कन्या को मेरे पिता को ब्याह दो, मैं वचन देता हूँ कि आपकी पुत्री का पुत्र ही राज्य करेगा फिर भी धीवर ने कहा कि आपके पुत्र, पौत्र कब चैन लेने देंगे तब गांगेय ने उसी समय आजन्म ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया और धीवर को सन्तुष्ट कर दिया। और पढ़े

गुरुभक्ति की महिमा


गुरुभक्ति की महिमा

गुरुभक्त्या वयं सार्ध-द्वीपद्वितयवर्तिनः।

वंदामहे त्रिसंख्योन, नवकोटिमुनीश्वरान् ।।

ढाईद्वीप में तीन कम नव करोड़ मुनिराज हैं, उन सभी को गुरुभक्तिपूर्वक मेरा नमस्कार होवे।

गुरुभक्ति से क्या होता है? आचार्यों ने बताया है-

‘‘गुरुभक्ति संजमेण य, तरंति संसार सायरं घोरं’’

‘गुरुभक्ति से संयम प्राप्त होता है जो हमें घोर संसार सागर से पार कराने में सहायक है।’ ऐसी गुरुभत्ति इस पंचमकाल में भव्य श्रावकों के लिए कल्पवृक्ष के समान फल को देने वाली है। यह नियम है कि जब तक धर्म है, तब तक गुरु हैं और जब तक गुरु हैं, तब तक धर्म है। परस्पर में दोनों का संबंध जुड़ा हुआ है।

और पढ़े

आज का दिन - २४ नवम्बर २०१७ (भारतीय समयानुसार)


Icon.jpg तिथीदर्पण Icon.jpg

दिनाँक २४ नवम्बर,२०१७
तिथी- मार्गशीर्ष शुक्ल ६
दिन-शुक्रवार
वीर निर्वाण संवत- २५४४
विक्रम संवत- २०७४

सूर्योदय ०६.४८
सूर्यास्त १७.३७

सर्वार्थ सिद्धि योग १०/04 से

Calender.jpg



यदि दिनांक सूचना सही नहीं दिख रही हो तो कॅश मेमोरी समाप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें

गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


Spl (48).jpg
फोटो - ऑडियो एवं वीडियो गैलरी


.....अन्य फोटोज देखें . .....ऑडियो श्रंखला के लिए क्लिक करें . .....वीडियो श्रंखला के लिए क्लिक करें


०-९ अं
परिमार्जित क्ष त्र ज्ञ श्र अः


कुल पृष्ठ- २७,२२०   •   देखे गये पृष्ठ- ५५,४२,०११   •   कुल लेख- ८३७   •   कुल चित्र- 14965




"http://hi.encyclopediaofjainism.com/index.php?title=मुख्यपृष्ठ&oldid=101098" से लिया गया