ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ

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मुम्बई विहार


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कमल मंदिर, ज्ञानतीर्थ का भव्य उद्घाटन


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स्वाध्याय


ज्ञान का प्रवेशद्वार: स्वाध्याय

स्वाध्याय , सत्संग, पुस्तकों का चयन, लेखन कला, वत्तृत्व कला आदि सभी ज्ञानोपलब्धि की भिन्न—भिन्न पगडंडियाँ हैं। ये सभी एक ही मंजिल पर पहुँचती हैं, जहाँ हमारे व्यक्तित्व का बहुमुखी सर्वंगीण विकास छिपा है। अत: इन सब पर विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता है। हम पहले स्वाध्याय पर ही विचार करेंगे। अध्ययन यदि जीवन की आवश्यकता है तो स्वाध्याय उसकी पूर्ति का आधार है। अध्ययन आँख खोलता है तो स्वाध्याय उसमें ज्योति भरता है । अध्ययन वह डोरी है जिसके सहारे बाल्टी को कुँए में उतारा जाता है और स्वाध्याय कुँए से प्राप्त मीठा जल है। अध्ययन का स्थान सीमित है तो स्वाध्याय जीवन के अंत तक चलने वाली प्रक्रिया है। अध्ययन से डिग्रियाँ, पदवियाँ मिलती हैं। स्वाध्याय से सफलता का द्वार खुलता है। अध्ययन से बुद्धि का विस्तार होता है। स्वाध्याय से बुद्धि का परिष्कार होता है।

स्वाध्याय एक सत्संग है:

सत्संग भी स्वाध्याय का एक पहलू है। स्वाध्याय में सत्संग साथ चलता है। जो स्वाध्याय नहीं कर पाते, वे संतों—ज्ञानियों के सत्संग से ज्ञान की उपलब्धि कर लेते हैं। स्वाध्याय भी अच्छे शास्त्रों व ग्रंथों का सत्संग ही है । सत्संग केवल व्यक्ति का सान्निध्य मात्र नहीं है। अच्छे विचारों के सम्पर्क में रहना तथा श्रेष्ठ पुस्तकों के साथ रहना भी सत्संग है। फिर भी हमारे यहाँ सत्संग को ज्ञानी पुरुषों की समीपता और उसकी उपासना से जोड़ दिया है।

इसी प्रकार लेखन की शक्ति बढ़ाना और वत्तृत्व कला , भाषण देने की क्षमता भी ज्ञानार्जन के साधन हैं। पुस्तकालय तो ज्ञान के मन्दिर ही हैं। यहाँ इन सभी पर चर्चा करना उचित रहेगा। और पढ़ें...

सम्यक्त्व


सम्यक्त्व उत्पत्ति के कारण

अनादिकाल से यह प्राणी संसार में मिथ्यात्व के कारण चतुर्गति के दुःख उठा रहा है। जब पुण्य योग से उसे सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो जाती है तब संसार सीमित हो जाता है। एक बार जीव को सम्यग्दर्शन होने के बाद वह अधिक से अधिक उनंचास (४९) भव में और कम से कम २-३ भव में मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

वह अमूल्य सम्यग्दर्शन क्या चीज है ? इस प्रश्न का उत्तर हमें जानना है। सरल भाषा में दर्शन का अर्थ है देखना और सम्यक का अर्थ है समीचीन रूप से अर्थात वस्तु के स्वरूप को ज्यों का त्यों श्रद्धान करना, उस पर विश्वास करना ही सम्यग्दर्शन है।

जैसे—दृष्टि (आंख) में कोई विकृति आ जाने पर औषधि आदि के द्वारा उसका इलाज किया जाता है और वह विकृति समाप्त होने पर आंखे स्वस्थ हो जाती हैं। उसी प्रकार से आत्मा के दर्शन गुण में अनादिकाल से व्याप्त विकृति को दूर कर देने से सम्यग्दर्शन प्रगट हो जाता है। सम्यग्दर्शन किसको होता है ? कब होता है ? कैसा होता है ? इस विषय से परिचित होना भी आवश्यक है। और पढ़ें...

पंचकल्याणक


पंचकल्याणक

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इस भरतक्षेत्र के आर्य खंड में चतुर्थ काल में हमेशा २४ तीर्थंकरों का अवतार होता रहता है। कोई भी महापुरुष तीर्थंकर के पादमूल में रहकर दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण्सा भावनाओं को भाते हैं और उनके प्रसाद से तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके स्वर्गों में देवपद को प्राप्त कर लेते हैं। उन तीर्थंकर होने वाले के मत्र्यलोक में गर्भावतार के छह माह पूर्व ही माता के आंगन में इंद्र की आज्ञा से कुबेर रत्नों की वर्षा करने लगता है। श्री, ह्री धृति, लक्ष्मी, कीर्ति आदि निन्यानवे१ विद्युत्कुमारी और दिक्कुमारी देवियाँ भी छह माह पूर्व ही बड़े हर्ष से वहाँ आ जाती हैं। और जिनेंद्रदेव के होनहार माता—ाqपता को नमस्कार करके अपने आने का कारण निवेदन करती हैं। पुन: नाना प्रकार से माता कर सेवा में तत्पर हो जाती हैं। कोई माता के गुणों का गान करती हैं, कोई पैर दबाती हैं। कोई दिव्य भोजन की व्यवस्था करती हैं, कोई छत्र लगाती हैं, कोई चमर ढोरती हैं, कोई तलवार, चक्र और स्वर्णमयी बेंत हाथ में लेकर द्वारपाल का काम करती हैं। ...पूरा पढ़ें

समाचार


गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के मंगल विहार के मनोरम क्षण

आज* दि. २४-०४-२०१७ को माताजी का ससंघ का विहार ज्ञानतीर्थ- दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र शिर्डी से *कोपरगॉंव में भव्य आगमन के साथ हुआ ।* आहारचर्या, दोपहर का सामायिक एवं सायंकाल की आरती होकर रात्रि विश्राम यहाँ होगा

  • कल* दि. २५-०४-२१७, मंगलवार को कोपरगॉंव से विहार होकर *जय भवानी स्कूल ( वावी गॉंव २ कि.मी से पहले ) के लिए होगा*

आहारचर्या, दोपहर का सामायिक यहाँ होगी।

माताजी का विहार ज्ञानतीर्थ शिर्डी से कोपरगॉंव, वावी, सिन्नर, नासिक रोड, गजपंथा सिद्धक्षेत्र से मुंबई के लिए विहार होगा ।

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कुछ खास


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जैनदर्शन और ईश्वर


‘जैनदर्शन और ईश्वर’

कतिपय विचारक जैनदर्शन को इसलिए ‘नास्तिक दर्शन’ कहते हैं कि ‘यह दर्शन ईश्वर को नहीं मानता’– किन्तु उनका यह चिन्तन नितान्त भ्रामक एवं दुराग्रहपूर्ण है; क्योंकि जैनदर्शन ईश्वर को मानता है। आत्मा के पर्यायगत विकास की परिपूर्णता को ही जैनदर्शन में परमात्मा या ईश्वर माना गया है तथा इस विकास की चौदह श्रेणियाँ मानी हैं, जिन्हें जैनदर्शन में ‘चौदह गुणस्थान’ कहा गया है। इतना स्पष्ट एवं वैज्ञानिक चिन्तन, व निरूपण होने के बाद भी यह कथन क्यों प्रस्तुत हुआ? यह बिन्दु विचारणीय है।

वस्तुत: बात यह है कि जैनदर्शन में परमात्मा या ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ परमपूज्य ‘सत्ता’ तो मानी गयी है, किन्तु उसे सांसारिक किसी भी पदार्थ या कार्य का कत्र्ता नहीं माना गया; प्रत्युत निस्पृह एवं तटस्थ ज्ञाता (सर्वज्ञ) माना गया है। अब जो लोग ईश्वर का अर्थ ‘सांसारिक कार्यों एवं समस्त चराचर पदार्थों के कत्र्ता’ के रूप में लेते हैं, उनके प्रेम में जैनाभिमत ईश्वर का स्वरूप फिट नहीं बैठता है; अत: वे कहते है कि जैनदर्शन ईश्वर को नहीं मानता है। किसी भी प्रपंच में रुचि न लेकर तटस्थ ज्ञाता-दृष्टामात्र स्वरूपवाला ईश्वर शायद उन्हें पसन्द नहीं आया होगां उन्होंने सोचा कि ‘भला जो न हमारा कुछ भला कर सके, न हमारे शत्रु का कुछ बिगाड़ सके, न पूजा से प्रसनन हो और न निंदा से खेद खिन्न या कुपित- भला ऐसे ईश्वर से हमें क्या फायदा ?’ उन्हें तो ऐसा ही ईश्वर चाहिए था, जो भक्तों की पुकार पर दौड़ा चला आये और उनके कष्टों का निवारण करें। यह सब कुछ जैनाभमित ईश्वर में था नहीं; अत: उन्होंने उसे ईश्वर मानने से ही इंकार कर दिया और जैनों को ‘अनीश्वरवादी नास्तिक’ कह दिया। अस्तु, ईश्वर के वास्तविक आदर्श स्परूप एवं जैनदर्शन की ईश्वर विषयक दृष्टि का संक्षेपत: अनुशीलन यहाँ प्रस्तुत है।

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जिन पूजा पद्धति


जिन पूजा पद्धति

जिन—अभिषेक और जिनपूजा, मंदिर की आध्यात्मिक प्रयोगशाला के दो जीवंत प्रयोग हैं। भगवान की भव्य प्रतिमा को निमित्त बनाकर उनके जलाभिषेक से स्वयं को परमपद में अभिषिक्त करना अभिषेक का प्रमुख उद्देश्य है। पूजा, जिन—अभिषेकपूर्वक ही संपन्न होती है, ऐसा हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा श्रावक को उपदेश दिया गया है। पूजा के प्रारंभ में किन्हीं तीर्थंकर की प्रतिमा के सामने पीले चांवलों द्वारा भगवान के स्वरूप को दृष्टि के समक्ष लाने का प्रयास करना आव्हानन है। उनके स्वरूप को हृदय में विराजमान करना स्थापना है, और हृदय में विराजे भगवान के स्वरूप के साथ एकाकार होना सन्निधिकरण है। द्रव्य पूजा का अर्थ सिर्पâ इतना नहीं है कि अष्ट द्रव्य र्अिपत कर दिए और न ही भाव—पूजा का यह अर्थ है कि पुस्तक में लिखी पूजा को पढ़ लिया। पूजा तो गहरी आत्मीयता के क्षण हैं। वीतरागता से अनुराग और गहरी तल्लीनता के साथ श्रेष्ठ द्रव्यों को सर्मिपत करना एवं अपने अहंकार और ममत्व भाव को विर्सिजत करते जाना ही सच्ची पूजा है। साधुजन निष्परिग्रही हैं इसलिए उनके द्वारा की जाने वाली पूजा / भक्ति में द्रव्य का आलंबन नहीं होता लेकिन परिग्रही गृहस्थ के लिए परिग्रह के प्रति ममत्वभाव के परित्याग के प्रतीक रूप श्रेष्ठ अष्ट द्रव्य का विसर्जन अनिवार्य है। पूजा हमारी आंतरिक पवित्रता के लिए है। इसलिए पूजा के क्षणों में और पूजा के उपरांत सारे दिन पवित्रता बनी रहे, ऐसी कोशिश हमारी होना चाहिए। पूजा और अभिषेक जिनत्व के अत्यन्त सामीप्य का एक अवसर है। इसलिए निरन्तर इंद्रिय और मन को जीतने का प्रयास करना और जिनत्व के समीप पहुँचना हमारा कर्तव्य है। ...और पढ़ें

व्यंजन


मीठे व्यंजन

अन्य मीठे व्यंजन...

आज का दिन - २५ अप्रैल २०१७ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक 25 अप्रैल,2017
तिथी-वैसाख कृष्ण चतुर्दशी
दिन-मंगलवार
वीर निर्वाण संवत- 2543
विक्रम संवत- 2073

सूर्योदय ०५:२५
सूर्यास्त १८:३३

पंचक समाप्त

सर्वार्थ सिद्धि योग
अमृत सिद्धि योग

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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


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परिमार्जित क्ष त्र ज्ञ श्र अः


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