ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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विश्व की सबसे बड़ी जैन प्रतिमा - भगवान ऋषभदेव
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मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र में फरवरी २०१६ में सम्पन्न हुआ विश्व का सबसे बड़ा जैन महोत्सव
मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र ९९ करोड़ महामुनियों की निर्वाणस्थली के रूप में विश्व प्रसिद्ध है, जिसे दक्षिण के लघु सम्मेदशिखर पर्वत के रूप में भी जैन समाज में मान्यता प्राप्त है।
सम्प्रेरिका
यह तीर्थ ९ लाख वर्ष पूर्व भगवान मुनिसुव्रतनाथ के तीर्थ काल से पूज्यता को प्राप्त है क्योंकि भगवान राम, हनुमान, सुग्रीव, सुडील, गव, गवाक्ष, नील, महानील आदि ९९ करोड़ महामुनियों ने जैनेश्वरी दीक्षा धारण करके दक्षिण भारत के इस पर्वत से कठोर तपश्चरण के साथ मोक्षधाम प्राप्त किया था। अत: तभी से सिद्धक्षेत्र के रूप में आज तक मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र की महिमा जन-जन के द्वारा गाई जाती है। इस पर्वतराज पर २ चूलिकाएँ हैं, जिनमें एक मांगीगिरि और दूसरी
मार्गदर्शन
तुंगीगिरि के नाम से प्रसिद्ध है। इस पर्वत पर हजारों वर्ष प्राचीन जिनप्रतिमाएँ, यक्ष-यक्षणियों की मूर्तियाँ, शुद्ध-बुद्ध मुनिराज के नाम से दो गुफाओं में भगवान मुनिसुव्रतनाथ एवं भगवान नेमिनाथ की प्रतिमाएँ आदि विराजमान हैं। साथ ही तलहटी में भी भगवान पार्श्वनाथ जिनमंदिर, मूलनायक भगवान आदिनाथ जिनमंदिर, भगवान मुनिसुव्रतनाथ जिनमंदिर, मानस्तंभ आदि निर्मित हैं।
कुशल नेतृत्व

सन् १९९६ में पूज्य माताजी ससंघ का चातुर्मास मांगीतुंगी जी में हुआ और उन्होंने मांगीतुंगी पर्वत पर अखण्ड पाषाण में भगवान ऋषभदेव की १०८ फुट उत्तुुंग विशालकाय जिनप्रतिमा निर्माण की प्रेरणा प्रदान की। पूज्य माताजी की प्रेरणा के उपरांत समस्त सरकारी कार्यवाही पूर्ण करके ३ मार्च २००२ में पर्वत पर मूर्ति निर्माण हेतु शिलापूजन समारोह का भव्य आयोजन सानंद सम्पन्न हुआ। आज समाज के समक्ष इस मूर्ति निर्माण का कार्य पूरा हो गया है, जब हमारे समक्ष साक्षात भगवान आदिनाथ की 108 फीट की मूर्ति है और ११ फरवरी २०१६ से १७ फरवरी २०१६ तक इस मूर्ति के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव अंतर्राष्ट्रीय स्तर के भव्य आयोजन के साथ सानन्द सम्पन्न हुआ।..पूरा पढ़े
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अहिंसा धर्म सर्वोपरि धर्म


अहिंसा धर्म सर्वोपरि धर्म है

एक गाँव में एक झील थी, वहाँ बहुत सारी मछलियाँ निवास करती थीं, उस झील के अंदर अनेक बड़ी मछलियों में से एक मछली को सबकी सेवा करने के कारण रानी मछली बना दिया गया, बहुत दिन तक रानी मछली के रूप में उसने झील का आनन्द लिया। एक दिन उस रानी मछली के मन में समुद्र की रानी बनने का विचार आया, झील के पास से ही समुद्र की ओर रास्ता जाता था। एक दिन वह बिना किसी को बताए वहाँ चली गयी। समुद्र में जाकर जब नीचे की ओर गई तो देखती है कि दो-चार मछलियाँ उसकी ओर भागकर आ रही हैं। रानी मछली उनसे और मछलियों के न दिखने का कारण पूछती है तो समुद्र की मछलियों ने बताया कि यहाँ रहने वाली मछलियाँ मछुवारों के डर से समुद्र के नीचे जाकर बैठ जाती हैं। झील की रानी मछली ने जब समुद्र की रानी बनने का प्रस्ताव रखा तो उन मछलियों ने उसे सुझाव दिया कि अगर आप सुख-शांति से रहना चाहती हैं तो अपनी झील में वापस चली जाइए वर्ना यहाँ तो किसी भी समय आप भी काल के गाल में चली जायेंगी। वह अभी चिन्तन कर ही रही थी कि इतनी देर में उसने देखा कि सारी मछलियों में भगदड़ मच गई है, क्योंकि मछुवारे आ गये थे। उन मछलियों ने रानी मछली से कहा कि अब आपके लिए कोई सहारा नहीं है, रानी मछली घबराकर अपनी प्राणरक्षा करती हुई जल्दी-जल्दी झील में आई और अपनी मछलियों से सारी बात बताकर अपनी भूल स्वीकार की और प्रसन्न होकर रहने लगी। और पढ़ें ....

णमोकार मंत्र की महिमा


णमोकार मंत्र की महिमा

(सिद्धान्तचिन्तामणि टीका के आधार से)
मंगलाचरण

सिद्धान् सिद्ध्यर्थमानम्य, सर्वास्रैलोक्यमूध्र्वगान्।

इष्टः सर्वक्रियान्तेऽसौ, शान्तीशाहृदि धार्यते।।१।।

अर्थात् त्रैलोक्य शिखर सिद्धशिला पर विराजमान अनन्त सिद्ध परमेष्ठियों को नमस्कार करके जो समस्त क्रियाओं के अन्त में इष्ट—विशेष रूप से मान्य स्वीकार किए गये हैं, ऐसे श्री शान्तिनाथ भगवान मेरे इस अपने हृदय में धारण (विराजमान) किये जाते हैं।

समस्त क्रियाओं के अन्त से यहाँ अभिप्राय यह है कि साधु और श्रावकों की नैमित्तिक क्रियाओं में शान्ति भक्ति करना आवश्यक होता है। श्रावकजन दैनिकपूजा के अन्त में प्रतिदिन शांतिभक्ति पढ़ते हैं और वृहत् पूजा विधानों के अन्त में भी शान्तिभक्ति पढ़कर शान्तिपाठ करने की विधि है। इसी प्रकार मुनि, आर्यिका आदि के लिए नित्य ही ‘‘अभिषेक वन्दनाक्रिया’’ में सिद्ध, पंचगुरु भक्ति के बाद शान्तिभक्ति पढ़ने का विधान है तथा वृहत्सामायिक विधि से सामायिक करने पर उसमें शान्तिभक्ति करनी होती है। इनके अतिरिक्त अष्टमी क्रिया, नन्दीश्वर क्रिया, वर्षायोग प्रतिष्ठापन-निष्ठापन क्रिया, पाक्षिक-चातुर्मासिक, सांवत्सरिक आदि प्रतिक्रमण को करने में, साधु-सल्लेखना, पंचकल्याणक आदि क्रियाओं के अन्त में शान्ति भक्ति आवश्यक रूप से पढ़ी जाती है। और पढ़ें....

जिनेन्द्र का लघुनन्दन


जिनेन्द्र का लघुनन्दन-श्रावक

‘श्रावक’ शब्द सामान्य ‘गृहस्थ’ शब्द से ऊँचा, अर्थ—गम्भीर और भावपूर्ण है। श्रावक शब्द का अर्थ शिष्य या सुनने वाला भी है। जैन और बौद्ध परंपरा के अनुसार‘श्रावक’ वह है जो सद्धर्म पर श्रद्धा रखता है, गृहस्थोचित व्रत या दायित्वों का निष्ठापूर्वक पालन करता है, पाप—क्रियाओं से दूर रहता है और अपनी सीमा में आत्म—कल्याण के पथ पर चलते हुए श्रमणों या भिक्षुओं की उपासना करता है—उनके आत्मकल्याण में सहायक होता है; विवेकी और क्रियावान् होता है। कविवर बनारसीदास ने श्रावक को ‘जिनेन्द्र का लघुनन्दन’ कहकर उसे गौरव के शिखर पर चढ़ा दिया है। ऐसा सम्यग्दृष्टिसंपन्न श्रावक गृहस्थ होते हुए भी संसार—प्रपंच में लिप्त नहीं होता—‘गेही पै गृह में न रचै ज्यों जलतैं भिन्न कमल है’। श्रावक अर्थात् सम्यक् श्रवण करने वाला, प्राणों से श्रवण करने वाला, समग्र चेतना से श्रवण करने वाला।

काल—प्रवाह के थपेड़े खाते—खाते आज श्रावक शब्द का अर्थ—गौरव भले ही खो गया हो, लेकिन तब भी वह शुचिर्भूत, शालीन, पवित्र, सरस, प्रतीतिपूर्ण निर्भय, निरामय, स्फटिकवत् निर्मल—स्वच्छ जीवन का र्कीितकेश है। तीर्थंकरों के धर्मसंघ का संवाहक श्रावक ही होता है, वही धर्मरथ की धुरी होता है। परम श्रावकत्व की पराकाष्ठा तक पहुँचे बिना मुनिधर्म के तपोमार्ग पर आरोहण संभव ही नहीं है। मुनि की प्रतिष्ठा का आधार श्रावक ही है। और पढ़ें...

मानव लोक


मानव लोक

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जहाँ तक जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल ये द्रव्य पाये जाते हैं उसे लोकाकाश कहते हैं। इस लोक से परे चारों तरफ अनंत अलोकाकाश है। इस लोक के तीन भेद हैं— ऊध्र्वलोक, मध्यलोक और अधोलोक। अधोलोक में नारकी जीव रहते हैं और ऊध्र्वलोक में देवों का निवास है तथा मध्यलोक में मनुष्य, तिर्यंच और देव भी रहते हैं। यह लोक पुरुषकार है। मध्यलोक— इसमें कटिभाग के समान मध्यलोक है इसका विस्तार एक राजू प्रमाण है और ऊँचाई निन्यान्वे हजार चालीस योजन मात्र है। इस राजू प्रमाण—क्षेत्र में असंख्यात द्वीप, समुद्र हैं। इसमें ठीक बीच में सर्वप्रथम द्वीप का नाम जंबूद्वीप है। यह एक लाख योजन विस्तृत गोलाकार (थाली के समान) है। इसे चारों ओर से वेष्टित कर, दो लाख योजन विस्तृत लवण समुद्र हैं। इसे वेष्टित लवण समुद्र हैं । इसे वेष्टित कर घातकीखंड द्वीप है। इसे वेष्टित कर पुष्करवर द्वीप है। ऐसे ही द्वीप को घेरे हुये समुद्र और समुद्र को घेरे हुये द्वीप आगे—आगे दूने—दूने विस्तार वाले होते चले गये हैं। अंतिम द्वीप का नाम स्वयंभूरमणद्वीप और समुद्र का नाम भी स्वयंभूरमण है। मनुष्यलोक— यह मनुष्यलोक ढाई द्वीप और दो समुद्र तक ही है। तृतीय पुष्कर द्वीप के बीच में वलयाकार मानुषोत्तर पर्वत है। इस पर्वत के इधर तक आधे द्वीप में और पहले के दो द्वीप में ही मनुष्य रहते हैं। इस मानुषोत्तर पर्वत के बाहर मनुष्य नहीं जा सकता है। इसलिये प्रथम जम्बूद्वीप, द्वितीय धातकीखंड और आधे पुष्कर द्वीप को मिलाकर ढाई द्वीप होते हैं। प्रथम जम्बूद्वीप एक लाख योजन का , लवण समुद्र दोनों तरफ २—२ लाख, धातकीखंड दोनों तरफ ४—४ लाख, कालोद समुद्र दोनों तरफ ८—८ लाख और आधा पुष्कर द्वीप दोनों तरफ ८—८ लाख। ये सब मिलकर १±२±२±४±४±८±८±८±८ · ४५ लाख योजन का यह मनुष्यलोक है। ...पूरा पढ़ें

पंचकल्याणक


पंचकल्याणक

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इस भरतक्षेत्र के आर्य खंड में चतुर्थ काल में हमेशा २४ तीर्थंकरों का अवतार होता रहता है। कोई भी महापुरुष तीर्थंकर के पादमूल में रहकर दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण्सा भावनाओं को भाते हैं और उनके प्रसाद से तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके स्वर्गों में देवपद को प्राप्त कर लेते हैं। उन तीर्थंकर होने वाले के मत्र्यलोक में गर्भावतार के छह माह पूर्व ही माता के आंगन में इंद्र की आज्ञा से कुबेर रत्नों की वर्षा करने लगता है। श्री, ह्री धृति, लक्ष्मी, कीर्ति आदि निन्यानवे१ विद्युत्कुमारी और दिक्कुमारी देवियाँ भी छह माह पूर्व ही बड़े हर्ष से वहाँ आ जाती हैं। और जिनेंद्रदेव के होनहार माता—ाqपता को नमस्कार करके अपने आने का कारण निवेदन करती हैं। पुन: नाना प्रकार से माता कर सेवा में तत्पर हो जाती हैं। कोई माता के गुणों का गान करती हैं, कोई पैर दबाती हैं। कोई दिव्य भोजन की व्यवस्था करती हैं, कोई छत्र लगाती हैं, कोई चमर ढोरती हैं, कोई तलवार, चक्र और स्वर्णमयी बेंत हाथ में लेकर द्वारपाल का काम करती हैं। ...पूरा पढ़ें

भगवान ऋषभदेव के पंचकल्याणक महोत्सव की झलकियाँ


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कुछ खास


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जैनदर्शन और ईश्वर


‘जैनदर्शन और ईश्वर’

कतिपय विचारक जैनदर्शन को इसलिए ‘नास्तिक दर्शन’ कहते हैं कि ‘यह दर्शन ईश्वर को नहीं मानता’– किन्तु उनका यह चिन्तन नितान्त भ्रामक एवं दुराग्रहपूर्ण है; क्योंकि जैनदर्शन ईश्वर को मानता है। आत्मा के पर्यायगत विकास की परिपूर्णता को ही जैनदर्शन में परमात्मा या ईश्वर माना गया है तथा इस विकास की चौदह श्रेणियाँ मानी हैं, जिन्हें जैनदर्शन में ‘चौदह गुणस्थान’ कहा गया है। इतना स्पष्ट एवं वैज्ञानिक चिन्तन, व निरूपण होने के बाद भी यह कथन क्यों प्रस्तुत हुआ? यह बिन्दु विचारणीय है।

वस्तुत: बात यह है कि जैनदर्शन में परमात्मा या ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ परमपूज्य ‘सत्ता’ तो मानी गयी है, किन्तु उसे सांसारिक किसी भी पदार्थ या कार्य का कत्र्ता नहीं माना गया; प्रत्युत निस्पृह एवं तटस्थ ज्ञाता (सर्वज्ञ) माना गया है। अब जो लोग ईश्वर का अर्थ ‘सांसारिक कार्यों एवं समस्त चराचर पदार्थों के कत्र्ता’ के रूप में लेते हैं, उनके प्रेम में जैनाभिमत ईश्वर का स्वरूप फिट नहीं बैठता है; अत: वे कहते है कि जैनदर्शन ईश्वर को नहीं मानता है। किसी भी प्रपंच में रुचि न लेकर तटस्थ ज्ञाता-दृष्टामात्र स्वरूपवाला ईश्वर शायद उन्हें पसन्द नहीं आया होगां उन्होंने सोचा कि ‘भला जो न हमारा कुछ भला कर सके, न हमारे शत्रु का कुछ बिगाड़ सके, न पूजा से प्रसनन हो और न निंदा से खेद खिन्न या कुपित- भला ऐसे ईश्वर से हमें क्या फायदा ?’ उन्हें तो ऐसा ही ईश्वर चाहिए था, जो भक्तों की पुकार पर दौड़ा चला आये और उनके कष्टों का निवारण करें। यह सब कुछ जैनाभमित ईश्वर में था नहीं; अत: उन्होंने उसे ईश्वर मानने से ही इंकार कर दिया और जैनों को ‘अनीश्वरवादी नास्तिक’ कह दिया। अस्तु, ईश्वर के वास्तविक आदर्श स्परूप एवं जैनदर्शन की ईश्वर विषयक दृष्टि का संक्षेपत: अनुशीलन यहाँ प्रस्तुत है।

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जिन पूजा पद्धति


जिन पूजा पद्धति

जिन—अभिषेक और जिनपूजा, मंदिर की आध्यात्मिक प्रयोगशाला के दो जीवंत प्रयोग हैं। भगवान की भव्य प्रतिमा को निमित्त बनाकर उनके जलाभिषेक से स्वयं को परमपद में अभिषिक्त करना अभिषेक का प्रमुख उद्देश्य है। पूजा, जिन—अभिषेकपूर्वक ही संपन्न होती है, ऐसा हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा श्रावक को उपदेश दिया गया है। पूजा के प्रारंभ में किन्हीं तीर्थंकर की प्रतिमा के सामने पीले चांवलों द्वारा भगवान के स्वरूप को दृष्टि के समक्ष लाने का प्रयास करना आव्हानन है। उनके स्वरूप को हृदय में विराजमान करना स्थापना है, और हृदय में विराजे भगवान के स्वरूप के साथ एकाकार होना सन्निधिकरण है। द्रव्य पूजा का अर्थ सिर्पâ इतना नहीं है कि अष्ट द्रव्य र्अिपत कर दिए और न ही भाव—पूजा का यह अर्थ है कि पुस्तक में लिखी पूजा को पढ़ लिया। पूजा तो गहरी आत्मीयता के क्षण हैं। वीतरागता से अनुराग और गहरी तल्लीनता के साथ श्रेष्ठ द्रव्यों को सर्मिपत करना एवं अपने अहंकार और ममत्व भाव को विर्सिजत करते जाना ही सच्ची पूजा है। साधुजन निष्परिग्रही हैं इसलिए उनके द्वारा की जाने वाली पूजा / भक्ति में द्रव्य का आलंबन नहीं होता लेकिन परिग्रही गृहस्थ के लिए परिग्रह के प्रति ममत्वभाव के परित्याग के प्रतीक रूप श्रेष्ठ अष्ट द्रव्य का विसर्जन अनिवार्य है। पूजा हमारी आंतरिक पवित्रता के लिए है। इसलिए पूजा के क्षणों में और पूजा के उपरांत सारे दिन पवित्रता बनी रहे, ऐसी कोशिश हमारी होना चाहिए। पूजा और अभिषेक जिनत्व के अत्यन्त सामीप्य का एक अवसर है। इसलिए निरन्तर इंद्रिय और मन को जीतने का प्रयास करना और जिनत्व के समीप पहुँचना हमारा कर्तव्य है। ...और पढ़ें

आज का दिन - २४ फ़रवरी २०१७ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक 24 फरवरी,2017
तिथी-फाल्गुन कृष्ण 13
दिन-शुक्रवार
वीर निर्वाण संवत- 2543
विक्रम संवत- 2073

सूर्योदय 07.07
सूर्यास्त 18.04

सर्वार्थ सिद्धि 06.55 से

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