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ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक


ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक एवं पूजा

इस ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक को ज्येष्ठ के महीने में भगवान ऋषभदेव के मस्तक पर मिट्टी या सोने के कलशे में जल भर के किया जाता है| दिनांक 08 मई 2020 से प्रतिदिन जम्बूदीप-हस्तिनापुर के तीन मूर्ति मंदिर में विराजमान इस युग के ज्येष्ठ तीर्थंकर भगवान आदिनाथ तीर्थंकर का अभिषेक किया जा रहा है जिसका प्रसारण पारस चैनल पर प्रातः 6 बजे से दिखाया जाता है | प्राचीन परम्परानुसार गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के पावन सानिध्य में कुंवारी बालिकाओं के नाम से मात्र 1100/- रुपए की राशि में प्रत्येक रविवार को यह अवसर प्राप्त करें | साथ में शांतिधारा एवं मनोकामना सिद्धि विधान का भी पुण्य लाभ भी प्राप्त होगा | निम्न मोबाइल नंबर पर अपने नाम दे सकते हैं, पारस चैनल के सीधे प्रसारण में आपका नाम घोषित किया जायेगा |

-सम्पर्क करें- 9717331008, 7906961165, 7895712431, 7060049160

ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक एवं पूजा देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक को खोलिए

श्री ज्येष्ठ जिनवर अभिषेक - श्री ज्येष्ठ जिनवर पूजा

Jyeshth Jinvar Abhishek
केशलोच


भगवान श्रेयांसनाथ


भगवान श्रेयांसनाथ परिचय

पुष्करार्धद्वीपसम्बन्धी पूर्व विदेह क्षेत्र के सुकच्छ देश में सीता नदी के उत्तर तट पर क्षेमपुर नाम का नगर है। उसमें नलिनप्रभ नाम का राजा राज्य करता था। एक समय सहस्राम्रवन में श्री अनन्त जिनेन्द्र पधारे। उनके धर्मोपदेश से विरक्तमना राजा बहुत से राजाओं के साथ दीक्षित हो गया। ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके समाधिमरणपूर्वक अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में अच्युत नाम का इन्द्र हुआ।

गर्भ और जन्म

इसी जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में सिंहपुर नगर का स्वामी इक्ष्वाकुवंश से प्रसिद्ध ‘विष्णु' नाम का राजा राज्य करता था। उसकी वल्लभा का नाम सुनन्दा था। ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन श्रवण नक्षत्र में उस अच्युतेन्द्र ने माता के गर्भ में प्रवेश किया। सुनन्दा ने नौ मास बिताकर फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन तीन ज्ञानधारी भगवान को जन्म दिया। इन्द्र ने उसका नाम ‘श्रेयांसनाथ' रखा।

श्रेयांसनाथ भगवान का परिचय

पॉवर पॉइंट प्रजेंटेशन


कुछ नए प्रजेंटेशन्स

सम्यग्ज्ञान पत्रिका


भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ


भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष मनाएँ

(चैत्र कृ. नवमी-१० मार्च २०१८ से चैत्र कृ. नवमी-२९ मार्च २०१९)
प्रेरणा-भारतगौरव दिव्यशक्ति शारदे माँ गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी
        
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आज हम सभी वर्तमान विश्व में उपस्थित आतंकवाद, हिंसा, विनाश, अशांति, परस्पर शत्रुता, विद्वेष, बदला लेने की भावना आदि विकृतियों से ग्रसित हो रही मानवता को दृष्टिगत कर रहे हैं। ‘अहिंसामयी शाश्वत धर्म’ का शीतल जल ही इन अग्नि ज्वालाओं के उपशमन में सहयोगी हो सकता है, यही तीर्थंकर भगवन्तों की सदाकाल से देशना रही है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से की गई धर्माराधना, मंत्रानुष्ठान, विधि-विधान भी सम्पूर्ण वातावरण को प्रभावित करके क्षेम-सुभिक्ष-शांति-सौहार्द की स्थापना करने में अत्यन्त कार्यकारी होते हैं, यह परम सत्य है।

      इन्हीं विश्वकल्याणकारी भावनाओं से ओतप्रोत होकर भारतगौरव, दिव्यशक्ति, परम उपकारी परमपूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ऋषभगिरि-मांगीतुंगी में विराजमान विश्व के सर्वाधिक उत्तुंग १०८ फुट भगवान ऋषभदेव के श्रीचरणों में स्थित होकर भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती, चैत्र कृ. नवमी, १० मार्च २०१८ के पावन अवसर पर ‘भगवान ऋषभदेव विश्वशांति वर्ष’ मनाने की प्रेरणा प्रदान की है, जो आने वाली ऋषभ जयंती, चैत्र कृ. नवमी, २९ मार्च २०१९ तक हम सबको व्यक्तिगत शांति, सामाजिक शांति, राष्ट्रीय शांति एवं विश्वशांति हेतु जागृत होकर अपना-अपना योगदान प्रदान करने हेतु कटिबद्ध कर रहा है। आइये हम भी विश्वशांति के इस महा आयोजन में किसी न किसी रूप में अपना सहयोग प्रदान कर पुण्यलाभ प्राप्त करें।

विश्वशांति वर्ष मनाने की रूपरेखा-

(१) विश्वशांति हेतु जाप्य (मंत्र-ॐ ह्रीं विश्वशांतिकराय श्री ऋषभदेवाय नम:)
(२) भगवान ऋषभदेव मण्डल विधान
(३) णमोकार महामंत्र अथवा भक्तामर महास्तोत्र का अखण्ड पाठ (अपने समयानुसार)
(४) भगवान ऋषभदेव पर संगोष्ठी

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पीठाधीश रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी का परिचय


स्वस्तिश्री कर्मयोगी पीठाधीश रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी का अंतरंग एवं बहिरंग परिचय

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समाज में सामान्य श्रावकों की संख्या एवं भूमिका अवश्य ही समाज के विकास के लिए लाभदायक सिद्ध होती है। लेकिन कुछ अद्भुत प्रतिभासम्पन्न विरले महामनाओं की खोज की जावे, तो समाज में ऐसे पुरुष जिन्हें महापुरुष की संज्ञा दी जा सकती है, वे बहुत कम संख्या में ही मिलते हैं। यह बात भी निश्चित है कि हर काल एवं समय में समाज, धर्म एवं संस्कृति के उत्थान हेतु ऐसे महानुभावों का अस्तित्व अवश्य ही देखने को मिलता है। इसी श्रृँखला में इस वर्तमानकालीन युग को भी अनेक विभूतियाँ प्राप्त हुईं और इस बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दी में भी अनेक निष्काम सेवा के धनी महानुभावों ने समाज की सेवा करके इसका विकास किया।

इस श्रृंखला में बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज का महान व्यक्तित्व एवं कृतित्व इस समाज द्वारा कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता है क्योंकि उन्होंने जैन संस्कृति के संरक्षण में जो अवदान दिये हैं, वे सदा अतुल्य ही रहेंगे। आगे इसी परम्परा के चमकते सितारे के रूप में हमें पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी का वरदहस्त प्राप्त हुआ और उनके द्वारा वर्तमान में की गई धर्मप्रभावना एवं संस्कृति संरक्षण के कार्य समाज के समक्ष उपस्थित हैं। ऐसी पूज्य माताजी के उपकारों से भी यह समाज कभी उऋण नहीं हो सकता। और भी धर्म के प्रति विभिन्न समर्पित व्यक्तित्वों ने अपना समाज विकास हेतु योगदान दिया, उनमें एक हैं स्वस्तिश्री कर्मयोगी पीठाधीश रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी।
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दिव्यध्वनि


विपुलाचल पर्वत पर प्रथम दिव्यध्वनि खिरी

भगवान महावीर का समवसरण बन गया था किन्तु भगवान की दिव्यध्वनि नहीं खिरी थी। जब प्रभु का श्रीविहार होता था तब समवसरण विघटित हो जाता था एवं प्रभु का श्रीविहार आकाश में अधर होता था। देवगण भगवान के श्रीचरण कमलों के नीचे-नीचे स्वर्णमयी सुगंधित दिव्य कमलों की रचना करते रहते थे पुनः जहाँ भगवान रुकते, अर्धनिमिष मात्र में कुबेर आकाश में अधर ही समवसरण बना देता था। हरिवंश पुराण में आया है कि छ्यासठ दिन तक मौन से विहार करते हुए प्रभु राजगृह में पहुँचे-

षट्षष्टिदिवसान् भूयो मौनेन विहरन् विभुः।
आजगाम जगत्ख्यातं जिनो राजगृहं पुरम् ।।६१।।
आरुरोह गिरिं तत्र विपुलं विपुलश्रियम्।
प्रबोधार्थं स लोकानां भानुमानुदयं यथा।।६२।।

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जैन तीर्थ


जम्बूद्वीप हस्तिनापुर

तीर्थंकर जन्मभूमियों के इतिहास में यह प्रथम अवसर था, जब भगवान शांतिनाथ-कुंथुनाथ-अरहनाथ जैसे तीन-तीन पद के धारी महान तीर्थंकरों की साक्षात् जन्मभूमि हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर ग्रेनाइट पाषाण की 31-31 फुट उत्तुंग तीन विशाल प्रतिमाएं अत्यन्त मनोरम मुद्राकृति में निर्मित करके राष्ट्रीय स्तर के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के साथ विराजमान की गईं। 11 फरवरी से 21 फरवरी 2010 तक यह आयोजन भव्यतापूर्वक सम्पन्न हुआ, जिसमें देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर पुण्य अर्जित किया। समापन के तीन दिवसों में तीनों भगवन्तों का ऐतिहासिक महामस्तकाभिषेक महोत्सव भी सम्पन्न हुआ। पूरा पढ़ें ...

आज का दिन - २६ मई २०२० (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक २६ मई २०२०
तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ४
दिन- मंगलवार
वीर निर्वाण संवत- २५४६
विक्रम संवत- २०७७

सूर्योदय ०५.४६
सूर्यास्त १९.०१


अथ ज्येष्ठ मास फल विचार

भगवान धर्मनाथ - मोक्ष कल्याणक

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