ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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गणिनी प्रमुख आर्यिकाश्री ज्ञानमती माताजी ससंघ द्वारा महाराष्ट्र तीर्थ दर्शन की झलकियाँ

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मुम्बई विहार


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सभी भक्तों के लिए खुशखबरी

भगवान पार्श्वनाथ के मोक्षगमन से पवित्र तिथि श्रावण सप्तमी को सभी जैन जैन बंधू धूमधाम से मनाते हुये अपने-अपने जिनमंदिर एवं भगवान पार्श्वनाथ की कल्याणक भूमियो जैसे-वाराणसी: अहिच्छत्र सम्मेदशिखर आदि तीर्थो पर जाकर विशेष उत्साह पूर्वक लाडू चढ़ाते है|इस वर्ष यह पर्व 29 जुलाई 2017 को आ रहा है|अत:इस दिन आप सभी इस पर्व को मनाकर सातिशय पुण्य का बंध करें |

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सोलह भावना


सोलह भावना

प्रस्तुति - आर्यिका चन्दनामती माताजी
श्रेयोमार्गानभिज्ञानिह भवगहने जाज्ज्वलद्दु:खदाव-

स्कन्धे चंक्रम्यमाणानतिचकितमिमानुद्धरेर्यं वराकान्।।
इत्यारोहत्परानुग्रहरसविलसद्भावनोपात्तपुण्य-

प्रक्रान्तैरेव वाक्यै: शिवपथमुचितान् शास्ति योऽर्हन् स नोऽव्यात् ।।१।।

अर्थ-इस संसाररूपी भीषण वन में दु:खरूपी दावानल अग्नि अतिशय रूप से जल रही हैं। जिसमें श्रेयोमार्ग-अपने हित के मार्ग से अनभिज्ञ हुए ये बेचारे प्राणी झुलसते हुए अत्यंत भयभीत होकर इधर-उधर भटक रहे हैं। ‘‘मैं इन बेचारों को इससे निकालकर सुख में पहुँचा दूँ’’। पर के ऊपर अनुग्रह करने की इस बढ़ती हुई उत्कृष्ट भावना के रस विशेष से तीर्थंकर सदृश पुण्य संचित कर लेने से दिव्यध्वनिमय वचनों के द्वारा जो उसके योग्य मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं वे अर्हंतजिन हम लोगों की रक्षा करें। ‘कर्मारातीन् जयतीति जिन:’ कर्मरूपी शत्रुओं को जो जीतते हैं वे जिन कहलाते हैं। ‘जिनो देवता अस्येति जैन:’ और जिनदेव जिसके देवता हैं-उपास्य हैं वे जैन कहलाते हैं। जिनेन्द्र देव के इस जैनशासन में प्रत्येक भव्य प्राणी को परमात्मा बनने का अधिकार दिया गया है। धर्म के नेता अनंत तीर्थंकरो ने अथवा भगवान महावीर स्वामी ने मोक्षमार्ग के दर्शक ऐसा मोक्षमार्ग के नेता बनने के लिए उपाय बतलाया है। इसी से आप इस जैनधर्म की विशालता व उदारता का परिचय प्राप्त कर सकते हैं। इस उपाय में सोलहकारण भावनायें भानी होती हैं और इनके बल पर अपनी प्रवृत्ति सर्वतोमुखी, सर्वकल्याणमयी, सर्व के उपकार को करने वाली बनानी होती है।

‘‘दर्शनविशुद्धिविनयसंपन्नता शीलव्रतेष्वनतिचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधिर्वैयावृत्त्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य’’।।२४।।

दर्शनविशुद्धि, विनयसंपन्नता, शीलव्रतेष्वननतिचार, अभीक्ष्णज्ञानोपयोग, संवेग, शक्तितस्त्याग, शक्तितस्तप, साधुसमाधि, वैयावृत्यकरण, अरिहंतभक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभक्ति, आवश्यक अपरिहाणि, मार्गप्रभावना और प्रवचनवत्सलत्व ये सोलहकारण भावनायें तीर्थंकर प्रकृति के आस्रव के लिये हैं अर्थात् इनसे तीर्थंकर प्रकृति का बंध हो जाता है। इन सोलह भावनाओं में से दर्शनविशुद्धि का होना अत्यंत आवश्यक है। अन्य सभी भावनायें हों अथवा कुछ कम भी हों फिर भी तीर्थंकर प्रकृति का बंध हो सकता है अथवा किन्हीं एक, दो आदि भावनाओं के साथ सभी भावनायें अविनाभावी हैं तथा अपायविचय धर्मध्यान भी विशेष रूप से तीर्थंकर प्रकृति बंध के लिए कारण माना गया है। वैसे यह ध्यान तपो भावना में ही अंतर्भूत हो जाता है ।

भगवान पार्श्वनाथ


भगवान पार्श्वनाथ का सचित्र जीवन

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पोदनपुर में महाराजा अरविन्द अपनी राजसभा में स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान थे। उनके विश्वभूति नामक मंत्री ने राज्य के कुशल समाचार बताकर महाराज से जिनदीक्षा की आज्ञा मांगते हुए अपने पुत्र कमठ और मरुभूति को महाराज के चरणों में समर्पित कर दिया। उन मंत्रिवर के दीक्षा लेते ही महाराज अरविन्द ने उनके दोनों पुत्रों को परम्परागत मंत्री पद पर नियुक्त कर दिया। पुन: एक दिन राजा अरविन्द अपने शत्रु राजा वङ्कावीर्य को जीतने हेतु चतुरंगिणी सेना के साथ मरुभूति मंत्री को लेकर युद्ध करने चल पड़े और कमठ कुमार मंत्री पर पोदनपुर के राज्य की सम्पूर्ण व्यवस्था डाल दी। कमठ जो कि स्वभाव से ही कुटिल परिणामी दुष्टात्मा था, वह समय पाकर मंत्री पद में अत्यन्त निरंकुश हो गया और सर्वत्र अन्याय का साम्राज्य फैला दिया। किसी समय मंत्री कमठ ने अपने छोटे भाई मरुभूति की पत्नी वसुंधरी को अप्सरा के समान सुन्दर देखकर उसके साथ जबर्दस्ती दुराचार किया। राजा के वापस आने पर जब उन्हें यह पता चला तो उनकी आज्ञा से कोतवाल ने कमठ का सिर मुंडा कर मुंह काला करके उसे गधे पर बिठाकर सारे शहर में घुमा कर देश से निकाल दिया। उस दण्ड से अपमानित होकर कमठ एक तापस आश्रम में जाकर हाथ में पत्थर की शिला लेकर खड़ा होकर तपश्चरण करने लगा। इधर मरुभूति अपने भाई के वियोग से दुखी हो उसे मनाकर वापस लाने हेतु आश्रम में गया और कमठ के पैरों में गिरकर क्षमायाचना करने लगा किन्तु क्रोधी कमठ ने उसके सिर पर पत्थर की शिला पटक दी अत: मरुभूति तुरंत वहीं मर गया और आत्र्तध्यान से मरकर वह सल्लकी वन में हाथी बनकर जन्मा।

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दीक्षा जयंती


अद्वितीय गुरु की अद्वितीय शिष्या-आर्यिका श्री चंदनामती माताजी का 28 वाँ दीक्षा दिवस'

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जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रथम शिष्या 'प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी' ने अपने दीक्षित जीवन के 28 वर्ष पूज्य माताजी के चरण सानिध्य में रहकर पूर्ण किये है|मुंबई समाज के लिए यह बहुत ही हर्ष का विषय है| ऐसी प्रज्ञा गुणों से उज्ज़वल पूज्य माताजी की दीक्षा जयंती भांडुप जैन समाज वालों को मनानें का सुनहरा अवसर प्राप्त हो रहा है|सभी लोग जैनम हाल में आकर दीक्षा जयंती मनाये|

दशलक्षण पर्व


दशलक्षण पर्व

जैनशासन में दो प्रकार के पर्व माने हैं - १. अनादि पर्व , २. सादि पर्व ।

जो पर्व किसी के द्वारा शुरू नहीं किये जाते हैं ,प्रत्युत अनादिकाल से स्वयं चले आ रहे हैं और अनंतकाल तक चलते रहेंगे वे अनादिपर्व कहे जाते हैं ।
जो पर्व किन्हीं महापुरुषों की स्मृति में प्रारंभ होते हैं , वे सादिपर्व होते हैं ।
इस परिभाषा के अनुसार सोलहकारण - दशलक्षण - अष्टान्हिका ये तीन अनादि पर्व कहलाते हैं । इनमें से यहाँ दशलक्षण पर्व के संदर्भ में जानना है कि यह अनादिनिधन पर्व वर्ष में तीन बार आता है ।
१. भादों के महीने में । २. माघ के महीने में । ३. चैत्र के महीने में ।
इन तीनों महीनों में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि से चतुर्दशी तक दश दिनों में दशलक्षण पर्व मनाया जाता है ।
दशलक्षण पर्व में जिन दश धर्मों की आराधना की जाती है , उनके नाम इस प्रकार हैं -
१. उत्तम क्षमा २. उत्तम मार्दव ३. उत्तम आर्जव ४. उत्तम सत्य ५. उत्तम शौच ६. उत्तम संयम ७. उत्तम तप ८. उत्तम त्याग ९. उत्तम आकिंचन्य १०. उत्तम ब्रम्हचर्य ।

विशेषरूप से भादों के महीने में पूरे देश के अन्दर यह दशलक्षण पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है और इन दश दिनों में लोग खूब व्रत- उपवास भी करते हैं तथा समाज में अनेक प्रकार के धार्मिक- सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं ।
प्राचीन परम्परा के अनुसार दशलक्षण के दश दिनों में तत्त्वार्थसूत्र ग्रन्थ की १-१ अध्याय के वाचन - प्रवचन की भी परम्परा रहती है ।
इस इन्साइक्लोपीडिया में ",अमूल्य प्रवचन" नामकी श्रेणी में तत्त्वार्थसूत्र के सुन्दर प्रवचन दशों अध्याय के हैं , उनका उपयोग भी आप कर सकते हैं ।
इसी संदर्भ में यहाँ दशधर्मों से संबंधित एवं तत्त्वार्थसूत्र के दशों अध्याय की प्रश्नोत्तरी आदि कुछ सामग्री प्रस्तुत की जा रही है । आप सभी इसे विभिन्न रूप में प्रयोग करके धर्मलाभ प्राप्त करें यही मंगल कामना है ।
दस लक्षण धर्म सम्बंधित भजन सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें

आर्यिका चंदनामती
सप्तपरमस्थान व्रत


सप्तपरमस्थान व्रत विधि
सज्जाति: सद्गार्हस्थ्यं पारिव्राज्यं सुरेन्द्रता। साम्राज्यं परमार्हन्त्यं परिनिर्वाणमित्यपि।।

सज्जाति, सद्गार्हस्थ्य, पारिव्राज्य, सुरेन्द्रता, साम्राज्य, आर्हन्त्य और निर्वाण ये सात परम-सर्वोत्तम स्थान माने गये हैं। माता-पिता के वंश परम्परा की शुद्धि सज्जाति है। श्रावकाचार क्रियायुक्त श्रावक सद्गृहस्थ है। रत्नत्रय की पूर्ति हेतु जैनेश्वरी दीक्षा लेना पारिव्राज्य स्थान है। पंडितमरण से समाधिपूर्वक मरण कर देवेन्द्र होना सुरेन्द्रत्व परम स्थान है। वहाँ से च्युत होकर चक्रवर्ती के वैभव को प्राप्त करना साम्राज्य स्थान है। तीर्थंकर पद को प्राप्त करना आर्हन्त्य स्थान है। अनंतर संपूर्ण कर्मों से छूटकर सिद्धपद प्राप्त कर लेना निर्वाण परम स्थान है।

यह व्रत श्रावण सुदी प्रतिपदा से श्रावण सुदी सप्तमी तक किया जाता है। व्रत के दिन अभिषेक, जाप्य, कथा श्रवण, दान आदि कार्यों को करना चाहिए। सातों दिन एक ही वस्तु का सेवन किया जाता है। विधिवत् व्रत करने के उपरांत उद्यापन किया जाता है।

इस व्रत का फल उत्तम जाति, ऐश्वर्य, गार्हस्थ्य, उत्तम तप, इन्द्र पद, चक्रवर्ती पद, अर्हंत पद की प्राप्ति होती है। संसार में निर्वाण ही श्रेष्ठ पद है। इस व्रत से यह सातवाँ परमपद भी प्राप्त हो जाता है। यह व्रत लौकिक अभ्युदय के साथ-साथ निर्वाण पद को भी देने वाला है।

प्रतिपदा से लेकर सप्तमी तक निम्नलिखित जाप्य क्रम से करना चाहिए।

१. ॐ ह्रीं अर्हं सज्जातिपरमस्थानप्राप्तये श्री ऋषभजिनेन्द्राय नम:।

२. ॐ ह्रीं अर्हं सद्गृहस्थपरमस्थानप्राप्तये श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय नम:।

३. ॐ ह्रीं अर्हं पारिव्राज्यपरमस्थानप्राप्तये श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय नम:।

४. ॐ ह्रीं अर्हं सुरेन्द्रपरमस्थानप्राप्तये श्री पाश्र्वनाथजिनेन्द्राय नम:।

५. ॐ ह्रीं अर्हं साम्राज्यपरमस्थानप्राप्तये श्री शीतलनाथजिनेन्द्राय नम:।

६. ॐ ह्रीं अर्हं आर्हन्त्यपरमस्थानप्राप्तये श्री शांतिनाथजिनेन्द्राय नम:।

७. ॐ ह्रीं अर्हं निर्वाणपरमस्थानप्राप्तये श्री महावीरजिनेन्द्राय नम:।

श्रावण शुक्ला तृतीया चतुर्थी सम्मलित होने के कारण इस वर्ष यह व्रत श्रावण क्रष्णा अमावस (23जुलाई )से प्रारंभ होकर 29जुलाई श्रावण शुक्ला सप्तमी तक चलेगा |
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कुछ खास



मुम्बई शहर का जगा भाग्य- सर्वोच्च साध्वी का मिला 65 वाँ चातुर्मास

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सम्मेदशिखर टोंक वन्दना


‘सम्मेद शिखर वंदना-’


तीर्थराज सम्मेदशिखर है, शाश्वत सिद्धक्षेत्र जग में।
एक बार जो करे वन्दना, वह भी पुण्यवान सच में।।
ऊँचा पर्वत पार्श्वनाथ हिल, नाम से जाना जाता है।
जिनशासन का सबसे पावन, तीरथ माना जाता है।।१।।
जब प्रत्यक्ष करें यात्रा, उस पुण्य का वर्णन क्या करना।
लेकिन प्रतिदिन भी परोक्ष में, गिरि का ध्यान किया करना।।
आँख बन्दकर करो कल्पना, मेरी यात्रा शुरू हुई।
प्रात:काल चले सब यात्री, जय जयकारा शुरू हुई।।२।।
एक हाथ में छड़ी दूसरे, में चावल की झोली है।
ज्यादातर सब पैदल हैं, पर किसी-किसी की डोली है।।
कभी न चलने वाले भी, हिम्मत कर पर्वत चढ़ते हैं।
पारस प्रभु के पास पहुँचने, हेतु कदम बढ़ चलते हैं।।३।।
चढ़ते-चढ़ते आठ किलोमीटर, का पथ जब तय होता।
दायें हाथ तरफ तब इक, चौपड़ा कुंड दर्शन होता।।
वहाँ दिगम्बर जिनमंदिर, संस्कृति की अमिट धरोहर है।
पार्श्वनाथ चन्द्रप्रभु बाहुबलि की मूर्ति मनोहर हैं।।४।।
उस मन्दिर में रुककर अपने, प्रभु का दर्शन कर लेना।
सुन्दर बनी धर्मशाला में, इच्छा हो तो ठहर लेना।।
मंदिर दर्शन करके फिर, यात्रा प्रारंभ करो अपनी।
बायें हाथ चलो चढ़ कर जहाँ, गौतम स्वामी टोंक बनी।।५।।

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विशेष


मेरी स्मृतियाँ के विषय में

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संघ के शिष्य-शिष्याओं तथा समाज के वरिष्ठ श्रेष्ठी, विद्वान् एवं कार्यकर्ताओं के विशेष आग्रह पर पूज्य माताजी ने अपने दीर्घ जीवन की आत्मकथा लिखी है। यह एक श्रमसाध्य कार्य था,
भूली बिसरी स्मृतियों को याद कर उन्हें लिपिबद्ध करना और वह भी पाठकों की दृष्टि से। इसे लिखते समय माताजी के मस्तिष्क पर बहुत जोर पड़ा। तब यह एक छोटी पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ, पुन: आगे की स्मृतियों सहित मोटा ग्रंथ सन् १९९० मेें लिखा गया, उसके बाद सन् २००४ में १४ वर्षों की स्मृतियों को संक्षेप में दर्शाया गया है। राजधानी दिल्ली में वी. नि. सं. २५०८,
सन् १९८२ में इसे लिखना प्रारंभ किया। हस्तिनापुर में वी.नि. सं. २५०९, सन् १९८३ में लिखकर पूर्ण किया। इस ग्रंथ में अपने बाल्यकाल से (सन् १९४० से) तो सभी घटनाओं को
दर्शाया ही है। साथ ही देशकाल की परिस्थितियों पर भी दृष्टिपात किया है। यह केवल आत्मकथा का ग्रंथ ही नहीं है अपितु विगत ६०-६५ वर्षों का दिगम्बर जैन समाज का इतिहास है।
इन विगत वर्षों में हुई विशेष घटनाओं को भी अपने अनुभवों के आधार पर अंकित किया है। इस ग्रंथ को पढ़कर न जाने कितने भव्य जीवों ने अपने कर्तव्यों एवं वैराग्य का पथ प्रशस्त किया है।
एक बार प्रत्येक स्वाध्यायी को यह ग्रंथ अवश्य ही पढ़ना चाहिए।

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मोक्ष सप्तमी


भगवान श्री पार्श्वनाथ जिनपूजा

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अथ स्थापना

(तर्ज-गोमटेश जय गोमटेश मम हृदय विराजो........)

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पार्श्वनाथ जय पार्श्वनाथ, मम हृदय विराजो-२
हम यही भावना भाते हैं, प्रतिक्षण ऐसी रुचि बनी रहे।
हो रसना में प्रभु नाममंत्र, पूजा में प्रीती घनी रहे।।हम०।।
हे पार्श्वनाथ आवो आवो, आह्वान आपका करते हैं।
हम भक्ति आपकी कर करके, सब दुख संकट को हरते हैं।।
प्रभु ऐसी शक्ती दे दीजे, गुण कीर्तन में मति बनी रहे।।हम०।।

ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेंद्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेंद्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।

ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेंद्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

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व्यंजन


मीठे व्यंजन

अन्य मीठे व्यंजन...

आज का दिन - २८ जुलाई २०१७ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक 28 जुलाई,2017
तिथी- श्रावण शुक्ला 6
दिन-शुक्रवार
वीर निर्वाण संवत- 2543
विक्रम संवत- 2074

सूर्योदय 05:42
सूर्यास्त 19:13

श्री नेमिनाथ जी जन्म एवं तप कल्याणक

रवि योग 29.39 तक

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गुरु माँ का महाराष्ट्र दर्शन हेतु मंगल विहार


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फोटो - ऑडियो एवं वीडियो गैलरी


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