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मूल जैन संस्कृति : अपरिग्रह - 1

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मूल जैन संस्कृति : अपरिग्रह

अपरिग्रह से तात्पर्य है—मात्र ‘‘स्व’’ और ऐसे ‘स्व’ से जिसमें पर—परिग्रह का विकल्प ही न हो। अरहन्त—तीर्थंकर अपरिग्रही—पूर्ण दिगम्बर हैं ‘स्व’ में विराजमान और ‘स्व’ में विराजमान और ‘स्व’ रूप में स्थित भी। ज्ञान रूप आत्मा के सिवाय उनका स्व—तत्त्व अन्य कुछ नहीं—वे ज्ञाता दृष्टा कहलाते हैं सो भी परकीय दृष्टि से ही। क्योंकि उनमें पर की कल्पना को अवकाश ही नहीं होता। जो पदार्थ उनके ज्ञान में प्रतिबिम्बित होते हैं वे भी अपनी पदार्थ की सत्ता मात्र से ही प्रतिबिम्बित होते हैं; केवली के ज्ञान से उन पदार्थों की सत्ता का तादात्म्य नहीं; मात्र ज्ञेय—ज्ञायक भाव है और वह भी व्यवहारी है, क्योंकि स्व वस्तु किसी विकल्प या कथन की चीज नहीं, मात्र अनुभव की चीज है—सर्वथा अनुभव की। आश्चर्य है कि उक्त वस्तु—स्थिति में भी हम स्वत्व—दिगम्बरत्व—अपिरग्रहत्व के अर्थ से अजान हैं और दिगम्बरत्व या अपरिग्रहत्व को मात्र बाह्य—शरीरादि के आधार पर पहिचानने में लगे हुए हैं; मात्र निर्वस्त्र को दिगम्बर मान रहे हैं और उसे अपरिग्रही कह रहे हैं। खैर, कोई हर्ज नहीं; हम निर्वस्त्र को अपरिग्रही या दिगम्बर मानते रहें पर वस्त्र का भाव अवश्य हृदयंगम करें : वस्त्र (वेष्टन) आवरण का द्योतक है जो असलियत को आच्छादित करता है; उसे प्रकट नहीं होने देता। उक्त भाव में स्व—रूप से भिन्न सभी दिशाएँ वस्त्र से आच्छादित जैसी हैं; स्वस्त्र रूप ही है। इसी आच्छादन करने वाले सत्त्व को जैन—दर्शन में परिग्रह नाम से सम्बोधित किया गया है और इससे मुक्त रहने का पाठ दिया गया है। इस दर्शन में अपरिग्रही को पूज्य माना है क्योंकि वह ही निर्दोष है और वह ही स्व–स्वभावी सर्वज्ञ दशा में स्थित होने में समर्थ है। कहा भी है—

‘यस्तु न निर्दोष: स न सर्वज्ञ:।

आवरण रागादयोदोषास्तेभ्यो निष्क्रान्तत्वं हि निर्दोषत्वम्।’

जो निर्दोष नहीं है वह सर्वज्ञ नहीं है और रागादि अन्तरंग व धनादि बहिरंग आवरणों—परिग्रहों से रहित होना ही निर्दोषपना है और जैनागम में शुद्धात्मा को ही निर्दोष कहा है—

‘स त्वमेवासि निर्दोषो युक्ति शास्त्राविरोधिवाक्।’

इसी निर्दोषता को लक्ष्य कर १८ दोषों को भी स्थूल रूप में दर्शाया गया है—

‘छुहतण्हभीरुरोसो रागो मोहो चिंता जरा रुजा मिच्चू।

स्वेदं खेदं मदो रइ विम्हियणिद्दा जणु व्वेगो।।

—नियमसार ६

जम्बूद्वीवपण्णत्ति और द्रव्यसंग्रह टीका आदि में भी इन दोषों का खुलासा है और ये सभी दोष स्व—स्वभाव न होने से पर—परिग्रह हैं—जिनसे आत्मा की अनन्त शक्ति आच्छादित होती है। हम यहाँ जैन मान्य उस अपरिग्रह की बात कर रहे हैं जिसमें जैनत्व व्याप्त होकर निवास करता है और जिससे जीवित रहता है। परिग्रह की बढ़वारी करते जैनी बने रहने का प्रयत्न करना मुर्दे में हवा देकर उसे जीवित मानने जैसा है। मृत—शरीर वायु से पूâल सकता है, हिल भी सकता हैं पर वह हिलना उसका जीवित होना नहीं होता; मात्र पौद्गालिक क्रिया होती है। ऐसे ही परिग्रह की बढ़वारी के प्रति जागृत जीव की बाह्य—पर क्रियाएँ भी जैनत्व की साधिका नहीं। क्योंकि सारा का सारा जैनत्व परिग्रह की हीनता में समाहित है, फिर चाहे वह परिग्रह हीनता अिंहसा में आती हो, सत्य या अचौर्य आदि में आती हो। यदि अिंहसादि के मूल में अपरिग्रह की भानवा नहीं तो सब व्यर्थ है और यहाँ अपरिग्रहत्व से तात्पर्य राग—द्वैषादि कषायों के कृश करने से और बाह्य—संग्रह की मर्यादा और त्याग आदि से हैं। स्मरण रखना चाहिए कि सब व्रत—क्रियाएँ आदि भी तभी सार्थक हैं जब वे अपरिग्रह की भावना और अपरिग्रही क्रियाओं से अपरिग्रह की पुष्टि के लिए हों।

हमारी भूल रही है कि हम अन्य व्रत आदि की क्रियाओं को (वह भी दिखावा रूप में) जैनत्व का रूप देने में आसक्त रहे हैं और अपरिग्रह की आसक्ति से नाता तोड़े हुए हैं। आज देश का जन—जन दु:खी है वह भी परिग्रह की ज्यादती या लौकिक अनिवार्य र्पूितयों के अभाव में दु:खी हैं। हिंसादि सभी प्रवृत्तियाँ भी परिग्रह से तथा परिग्रह की बढ़वारी के लिए ही की जा रही हैं। आश्चर्य है कि सरकार ने भी परिग्रह की बढ़वारी को किन्हीं अपराधों की परिधियों में नहीं बांधा। भारतीय दण्डसंहिता में हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील के लिए जैसे दंड निर्धारित हैं, वैसे परिग्रह की बढ़वारी को रोक के लिए शायद ही कोई धारा हो। यदि सरकार ने जैन मूल—संस्कृति अपरिग्रहत्व से नाता जोड़ा होता—अति—परिग्रहियों के लिए दण्ड विधान करती होती तो देश को त्रास से काफी हद तक छुटकारा मिला होता। तब न हर कोई हर किसी के भाग पर कब्जा करता होता और न ही टैक्सों की चोरी आदि जैसी बाढ़ें ही आई होतीं। व्यक्ति की संचय सीमा निश्चित होती और परिवार भी तदनुसार निर्धारित—परिमाण में संग्रह कर पाते। इससे एक घर संपदा से अनाप—शनाप भरा और दूसरा सम्पदा से सर्वथा खाली न होता। जैसा कि वर्तमान में चल रहा है और जो जनसाधारण की परेशानी का कारण बन रहा है। अस्त।

यहाँ हम यह कहना भी उचित समझते हैं कि जिस ध्यान को तत्त्वार्थ सूत्र के नवम अध्याय के २७ वें सूत्र द्वारा दर्शाया गया है वह ध्यान भी अपरिग्रह मूलक और संवर—निर्जरा का साधक ही है। दूसरे रूप में यह भी कह सकते हैं कि—अपरिग्रहत्व और वह ध्यान समकाल भावी और एक है। वैसा ध्यान तभी होगा जब अपरिग्रहत्व और वह ध्यान समकाल भावी और एक है वैसा ध्यान तभी होगा तब अपरिग्रहत्व होगा—बिना अपरिग्रहत्व के ध्यान कैसा ? प्रसंग गत ध्यान के लक्षण में ‘अपने में रह जाना’। ध्यान है और वही पूर्ण अपरिग्रहत्व है; जैसा कि ध्यान में होता है या होना चाहिए, क्योंकि ध्यान और अपरिग्रहत्व दोनों में अन्यत्वपने का अभाव होने से संवर—निर्जरा है जबकि अन्य िंचताओं से हटकर मन का एक ओर लक्ष्य होने में भी चितन रूप क्रिया विद्यमान होने से आस्रव है—‘कायवांग्मन: कर्मयोग:’ ‘स आस्रव:।’ भले ही मन एकाग्र हो जाए—वह चिन्तन क्रिया तो करेगा ही और जहां चितन रूप क्रिया होगी वहां आस्रव होगा ही। मन की क्रिया (चिन्तन) का नाम ही तो चिंता है। यदि चिंता—चितन क्रिया है तो योग है और योग को आस्रव कहा है, जो निर्जरा—प्रसंग गत ध्यान के लक्षण से मेल नहीं खाता। प्रसंग में तो उसी ध्यान से तात्पर्य है जो संवर—निर्जरा में हेतु हो। हम पुन: स्मरण करा दें कि मन का कार्य चितन है और चितन कर्म होने से आस्रव है। इस विषय में किसी समझौते को खोज कर अन्य निर्णय सर्वथा अशक्य हैं

सभी जानते हैं कि पूज्य उमास्वामी जी ने तत्वार्थसूत्र के छठवें अध्याय से आठवें अध्याय तक आस्रव—बंध का और नवम अध्याय में संवर—निर्जरा का वर्णन किया है। इनमें पहले उन्होंने मन–वचन काय की क्रिया को आस्रव और फिर उसके निरोध को संवर कहा है और इसी प्रसंग में नवम अध्याय में ही तप को संवर और निजरा दोनों का कारण कहा है और ध्यान की गणना तपों में कराई है। इसका भाव यही है कि प्रसंग में ध्यान वही (निरोध) है जो संवर—निर्जरा में कारण हो। ऐसे में ध्यान के शुभ—अशुभ या आर्त–रौद्र जैसे भेदों को इसमें स्थान ही कहाँ है जो उन्हें इस ध्यान में शामिल किया जा सके या प्रसंगगत ध्यान (चिता—निरोध) को शुभ—अशुभ के आस्रव में कारण माना जा सके। वे दोनों और निचली दशा के मनोगत भाव—आर्त—रौद्र तो आस्रव ही हैं।

इसके सिवाय ध्यान के फल का जो वर्णन है और जो स्वामी का वर्णन है उससे भी स्पष्ट पता चलता है कि प्रसंग में ध्यान संवर—निर्जरा का ही कारण है और वह मिथ्यादृष्टि के नहीं होता, इसीलिए धवला में ध्यान के दो ही भेद कहे हैं—धर्मध्यान और शुक्लध्यान। मोह की सर्वोपशमना करने से धर्म ध्यान की और शेष घाति–अघाति का क्षय करने से शुक्ल ध्यान की श्रेणी में रखा गया। यहाँ इतना विशेष समझना चाहिए कि—दोनों ही ध्यानों में ‘आप में रह जाना’ ही सर्वथा इष्ट है—कायवांग्मन की क्रिया करने से तात्पर्य नहीं।

‘अट्ठावीसभेयभिण्णमोहणीयस्ससव्वुवसमावट्आणफलं पुधत्तविदक्क वीचार सुक्कज्झाणं।’ मोहसब्वुवसमो पुण धम्मज्झाणफल।’ तिष्णं—घादिकम्काणं णिम्मूलविणासफलमेयत्तविदक्क अवाचीरज्झाणं।।’’ तिष्णं—घादिकम्माणं णिम्मूलविणासफलमेयत्तविदक्क अवाचीरज्झाणं।।’
—धव. १३, ५, ४, २६ पृ. ८०-८१
‘अघाइ कम्म चउक्कविणासं (चउत्थसुक्कज्झाणफलं)’, वही पृ. ८८।

ण च ण्वपयत्थविसयरुइ–पच्च सद्धाहि विणाज्झाणं संभवदि, वही पृ. ६५।

अट्ठाईस प्रकार के मोहनीय की सर्वोपशमना होने पर उसमें स्थित रखना पृथक्त्ववितर्कवीचार नामक शुक्ल ध्यान का फल है। मोह की उपशमना करना धर्म ध्यान का फल है। तीन घातिया कर्मों का विनाश करना एकत्ववितर्क शुक्ल ध्यान का फल है। चार अघातिया कर्मों का विनाश चतुर्थ शुक्ल ध्यान का फल है। नव–पदार्थों की रुचि (श्रद्धा) के बिना ध्यान नहीं हो सकता अर्थात् सम्यग्दृष्टि ही ध्यान का अधिकारी है।

सूत्र में ध्यान के स्वामी के निर्देश से तो यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि प्रसंग में आचार्य को ध्यान का वही लक्षण इष्ट था जिसके द्वारा संवर निर्जरा होकर मोक्ष प्राप्त होता हो। यदि आचार्य को उक्त प्रसंग में आस्रवरूप मन की क्रिया (एकाग्रत्व रूप ही सही) अर्थ अभीष्ट होता तो वे सूत्र में ‘उत्तम संहननस्य’ पद को भी स्थान न देते, क्योंकि चितन रूपी ध्यान तो साधारण सभी संहनन वालों और मिथ्यादृष्टियों तक को भी सदा काल रहता है।

जब हम ध्यान के लक्षण—सूत्र पर विचार करते हैं तो सूत्र में एकाग्र चितानिरोध, ऐसा पद भी मिलता है। इसमें ‘एकाग्र चिंतन’ से विदित होता है कि एकाग्र—एक को मुख्य लक्ष्य कर उसका चितवन करना ध्यान है। जरा सोचिए, जब एक वस्तु मुख्य कर ली तब वहां अन्य वस्तु के प्रवेश को अवकाश ही कहां रहा ? यदि अन्य को अवकाश (स्थान) है तो एकाग्रपना कैसे ? एकाग्र होने का अर्थ ही यह है कि जिसमें अन्य का विकल्प हट गया हो और जब अन्य स्वाभाविक हट गया तब ‘निरोध’ शब्द ही व्यर्थ पड़ जाता है। ऐसे में यदि आचार्य ऐसा कहते कि ‘एकाग्रह िंचता ध्यानम्’ तब भी काम चल सकता था। इससे मन की क्रिया (एकाग्र प्रवृत्ति) को बल भी मिल सकता था और चारों धर्मध्यान भी ध्यान की परिभाषा में आ जाते। फिर यदि आचार्य को कहना ही था तो वे ‘निरोध’ के स्थान पर ‘रोध’ शब्द से भी काम चला सकते थे। क्योंकि सूत्र ग्रंथ में वैयाकरण लोग आधी मात्रा के कम होने पर भी ‘पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरण:’। ऐसा मालूम होता है कि यह संवर—निर्जरा सम्बन्धी ध्यान के प्रसंग में आचार्य श्री को एक का चितवन और अन्य चितवन का रोध ऐसा अर्थ इष्ट नहीं था, इसलिए उन्होंने रोध के स्थान पर ‘निरोध’ शब्द का प्रयोग किया और निरोध का अर्थ है—नि:शेषेण—पूर्णरूपेण रोध। सभी प्रकार से सभी रति की क्रियाओं का रोध।

‘निरोध’ को तुच्छाभाव मान उसके निराकरणार्थ किसी चिंतन को पुष्ट करने में लगे लोगों को राजर्वाितककार ने स्पष्ट रूप में संकेत दिया है कि निरोध तुच्छाभाव नहीं अपितु भावान्तर रूप है। ‘अभावो निरोध इति चेत्: न,....... विवक्षार्थविषयावगमस्वभावसामथ्र्यापेक्षया सदेवेति।—उत्कृष्ट ध्यान की अवस्था में आत्मा को लक्ष्य बनाकर चिन्ता (मन की क्रिया) का निरोध किया जाता है और वहां आत्मा का लक्ष्य आत्मा ही होता है—अन्य नहीं। यह भी ध्यान रहे कि इस उत्कृष्ट ध्यान के प्रसंग में ‘अग्र’ शब्द भी आत्मावाची है। आचार्य यह भी कहते हैं कि ध्यान स्व—वृत्ति (आत्म—वृत्ति) होता है—इसमें बाह्य िंचताओं से निवृत्ति होती है—अङ्गतीत्यग्रमात्मेत्यर्थ:। द्रव्यार्थ—तयैकिंस्मन्नात्यन्यग्रे चिननिरोधो ध्यानम्। तत: स्व—वृत्तित्वात् बाह्यध्येय प्राधान्यापेक्षा निर्वितता भवति।’—इससे यह भी फलित होता है कि जहाँ अग्रशब्द अर्थवाची है अर्थात् जहाँ द्रव्य—परमाणु या भाव—परमाणु या अन्य किसी अर्थ में चित्तवृत्ति को केन्द्रित करने को ‘ध्यान’ नाम से कहा गया है; वहाँ ‘ध्यान’ शब्द का लक्ष्य शुक्ल ध्यान के दो पायों तक सीमित है।

एक बात और। ध्यान तक तप है और तप शब्द से आत्म—लक्ष्य के सिवाय अन्य का परिहार इष्ट है। इसी भाव में इच्छा निरोध को तप नाम दिया गया है—

‘तिण्णं रयणाणभाविब्भावट्ठमिच्छा निरोहो।’
—ध. १३, ५, ४, २२, ५४
‘समस्तभावेच्छात्यागेन स्व—स्वरूपे प्रतपनं, विजयनं तप:।’
—प्रव. सा. ता. वृ. ७९/१०००/१२

उक्त इच्छानिरोध में स्व और पर के भेद का संकेत भी नहीं है जिससे कि स्व की इच्छा को भी ग्राह्य माना जा सके। यहाँ तो ऐसा ही मानना पड़ेगा कि ध्यान में सभी प्रकार की इच्छाओं (मन की क्रियाओं) का अभाव ही आचार्य को इष्ट है और वे आत्मा में आत्मा के होने को ही उत्कृष्ट ध्यान मानते हैं जो अपरिग्रहरूप है।

किन्हीं मनीषियों ने हमें एक पदार्थ को मुख्य बनाकर उसके चिन्तन में (मन का) रोध करना.... मन को ठहरा लेना ध्यान है’ ऐसा अर्थ भी बतलाया है यानि उनके मत में निरोध का अर्थ मन का स्थापित करना है। ऐसे मनीषियों को धवला में आये ‘निरोध’ शब्द के अर्थ पर विचार करना चाहिए और यह भी सोचना चाहिए कि मन को लगाने की क्रिया से आस्रव होगा या संवर—निर्जरा ? एक स्थान पर धवला में निरोध के अर्थ को इस भाँति स्पष्ट किया गया है—

‘को जोग णिरोहो ? जोग विणासो।’

उवयारेण जोगो चिन्ता, तिस्से एयग्गेण
णिरोहा विणासो जम्मि तं ज्झाणमिदि।’

—वही पृ. ८५-६

योग का निरोध क्या है ? योग का विनाश। उपचार से चिन्ता का नाम योग है ? उस चिन्ता का एकाग्ररूप से जिसमें विनाश हो जाता है वह ध्यान है। किसी (एक की भी) चिन्ता में लगे रहना, प्रसंग गत ध्यान नहीं और ना ही उस चिन्ता में लगे रहने में, उससे संवर और निर्जरा ही है। यदि संवर निर्जरा है भी तो वह अन्य प्रवृत्ति से निवृत्ति मात्र के कारण और उसी अनुपात में है; ध्यान (क्रिया) से नहीं; वहां ध्यान नाम तो मात्र उपचार है। ऊपर के पूरे विवेचन से स्पष्ट होता है कि धवला निर्दिष्ट दो ध्यानों के प्रकाश में ध्यान वही है जो संवर—निर्जरा का हेतु हो ? सि. च. नेमीचन्द्राचार्य जी ने जो ‘दुविहं पि मोक्खहेउ’ रूप में दो ध्यानो को प्ररूपित किया है उनमें ‘पणतीस सोलछप्पणचदुदुगमेगं’ तथा पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ जैसे परावलम्बी ध्यानों को मोक्षमार्ग में परम्परित कारण होने से व्यवहार—ध्यानरूप और ‘बहिरब्भन्तरकिरियारोहो’ और रूपातीत जैसे स्वावलम्बी ध्यान को निश्चय ध्यान रूप कहा है। यदि हम विचारें तो धवलाकार के शब्दों से यह बात सर्वथा मेल खाली दिखती है—

अन्तोमुहुत्तमेत्तं चिन्तावत्थाणमेगवत्थुम्हि।

छदुमत्थाणं झाणं ‘जोगणिरोहो’ जिणाणं तु।।

(उद्धृत)

एक वस्तु में अन्तर्मुहूर्तकाल चिंता अवस्थानरूप ध्यान छस्थों का ध्यान है और योगनिरोध रूप निश्चय ध्यान अर्हन्त भगवान का ध्यान है आदि। ऊपर के प्रसंग से यह भी स्पष्ट है कि जिन्हें आर्त और रौद्र ध्यान के नामों से सम्बोधित किया जा रहा है वे सम्यग्दृष्टि के लिए न तो व्यवहार ध्यान हैं और ना ही वे निश्चय की परिभाषा में आते हैं। अपितु यह कहा जाय कि वे सर्वथा अव्याहार्य और जीव की दशा की अनिश्चिति में कारण हैं, तो अधिक उपयुक्त होगा—यत: वे मित्थ्याभाव हैं।

साधारणत: ‘ध्यान’ शब्द ऐसा है जो जन साधारण में चिंता या चितन के अर्थ में प्रसिद्ध हैं—‘ध्यै चितायाम्’। इसलिए लोग इस शब्द को विचार करने जैसे अर्थ में लगा बैठाते हैं। लोगों को समझना चाहिए कि यदि सर्वथा विचार—चिन्तन ही ध्यान होता तो आचार्य शुक्ल ध्यान की ऊपरी श्रेणियों में विचार—चिन्तन ही ध्यान होता तो आचार्य शुक्ल ध्यान की ऊपरी श्रेणियों में विचार का वहिष्कार न करते जैसा कि उन्होंने किया है। वे कहते हैं—‘अवीचारं द्वितीयं।’ दूसरा एकत्ववितर्क नामा शुक्ल ध्यान विचार रहित है (तीसरा और चौथा शुक्ल ध्यान भी विचार रहित है। विज्ञपुरुष इस बात को भलीभाँति जानते हैं कि—‘विचारोऽर्थ व्यंजननयो संक्रान्ति:।’ अर्थ और व्यंजन में विचारों की पलटती दशा संक्रान्ति कहलाती है और वीचार व विचार दोनों शब्द एकार्थक है यानी जब यह जीव अर्थ का विचार करते—करते कभी पर्याय पर चला जाता है और कभी अर्थ पर चला जाता है तब उस पलटने की दशा को संक्रान्ति कहा जाता है और वह ऊपरी अवस्थाओं में नहीं है। अब सोचिाए ! कि जब मन का अर्थ चिन्तन है और चिन्तन में पलटना अवश्यभावी है। यदि पलटना नहीं तो चिंतन कैसा ? वह तो कूटस्थपना ही है और यदि मन कुंटस्थ है तो वह मन कैसा ? फिर यदि मन संक्रान्ति नहीं करता तो वहां कौन सी क्रिया करता है वह क्रिया ‘आस्रव’ क्यों नहीं ? जब कि आचार्य ने मन, वचन या काय की क्रिया को आस्रव कहा है ?

उक्त सभी परिस्थितियों से हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि—उक्त ध्यान में मन लगाना नहीं पड़ता, अपितु मन को हटाना पड़ता है और इस मन को हटाना ही—पर से निवृत्ति करना ही अपरिग्रह है जौर जैन दर्शन को यही निवृत्ति इष्ट है। फलत:—इस मायने में उत्कृष्ट ध्यान और अपरिग्रह दोनों एक ही श्रेणी में ठहरते हैं और ऐसा किए बिना ‘तपसा निर्जरा च’ सूत्र की सार्थकता भी नहीं बनती और जिन—दशा तथा मुक्ति भी नहीं बनती।


पं. पदमचन्द शास्त्री
जैन प्रचारक अगस्त २०१४