"श्री सिद्ध परमेष्ठी पूजा" के अवतरणों में अंतर

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साधक आराधक भव्यों के, भव भव के दु:ख हर लेते हैं।।
 
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इस लोक के सब सौख्य पा, सर्वार्थसिद्धि को वरें।
 
इस लोक के सब सौख्य पा, सर्वार्थसिद्धि को वरें।
 
फिर ‘ज्ञानमती’ आर्हंत्यलक्ष्मी, पाय शिवकांता वरें।।१।।
 
फिर ‘ज्ञानमती’ आर्हंत्यलक्ष्मी, पाय शिवकांता वरें।।१।।
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१६:४८, १ जुलाई २०२० का अवतरण

श्री सिद्ध परमेष्ठी पूजा

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Ī

अथ स्थापना-शंभु छंद
सिद्धी के स्वामी सिद्धचक्र, सब जन को सिद्धी देते हैं।
साधक आराधक भव्यों के, भव भव के दु:ख हर लेते हैं।।
निज शुद्धात्मा के अनुरागी, साधूजन उनको ध्याते हैं।
स्वात्मैक सहज आनंद मगन, होकर वे शिव सुख पाते हैं।।१।।
-दोहा-
सिद्धों का नित वास है, लोक शिखर शुचि धाम।
नमूँ नमूँ सब सिद्ध को, सिद्ध करो मम काम।।२।।
मनुज लोक भव सिद्धगण, त्रैकालिक सुखदान।
आह्वानन कर मैं जजूँ, यहाँ विराजो आन।।३।।

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ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धसमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।
अथाष्टकं-गीता छंद
क्षीरांबुधी का सलिल उज्ज्वल, स्वर्णझारी में भरूँ।
निज कर्म मल प्रक्षालने को, जिन चरण धारा करूँ।।
कर सप्त प्रकृती घात क्षायिक, शुद्ध समकितवान जो।
नर लोक भव सब सिद्ध त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।१।।

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ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
कर्पूर चंदन गंध सुरभित स्वर्णद्रव सम लायके।
भव ताप शीतल हेतु जिनवर पाद चर्चूं आयके।।
त्रिभुवन प्रकाशी ज्ञान केवल सूर्य रश्मीवान जो।
नर लोक भव सब सिद्ध त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।२।।

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ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
शशि रश्मि सम उज्ज्वल अखंडित शुद्ध अक्षत लायके।
अक्षय सुपद के हेतु जिनवर, अग्र पुंज चढ़ायके।।
जगदर्शि केवल दरश संयुत सिद्ध महिमावान जो।
नर लोक भव सब सिद्ध त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।३।।

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ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
मल्ली चमेली वकुल आदिक, पुष्प सुंदर लायके।
भव मल्ल विजयी जिन चरण में हर्ष युक्त चढ़ायके।।
जिनराज वीर्य अनन्त से युतकर्म अंतिम हान जो।
नर लोक भव सब सिद्ध त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।४।।

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ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
मिष्ठान्न पूरणपोलिका लाडू इमरती लायके।
भव-भव क्षुधा से दूर जिनवर, पाद अग्र चढ़ायके।।
सूक्ष्मत्व गुण संयुक्त फिर भी सब जगत का भान जो।
नर लोक भव सब सिद्ध त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।५।।

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ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कर्पूर दीपक ज्योति जगमग, रत्नदीपक में दिपे।
जिन आरती से निज हृदय, में ज्ञान की ज्योति दिपे।।
अवगाहन गुण युत तथा दें सर्व को स्थान जो।
नर लोक भव सब सिद्ध त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।६।।

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ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
दश गंध धूप सुगंध लेकर, अग्नि में खेऊँ अबे।
सब अष्ट कर्म प्रजाल हेतू, सिद्ध गुण सेवूँ सबे।।
गुण अगुरुलघु से युक्त भी, लोकाग्र पे नित थान जो।
नर लोक भव सब सिद्ध त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।७।।

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ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
अंगूर अमृत फल श्रीफल, सरस अमृत सम लिया।
प्रभु मोक्षफल के हेतु तुम पद, अग्र में अर्पण किया।।
सुख पूर्ण अव्याबाध युत अतिशय अतीन्द्रियवान जो।।
नर लोक भव सब सिद्ध त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।८।।

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ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जल गंध अक्षत पुष्प नेवज, दीप धूप फलादि ले।
अनुपम अनंतानंत गुण युत, सिद्ध को अर्चूं भले।।
हैं सिद्ध चक्र अनादि अनिधन परम ब्रह्म प्रधान जो।
नर लोक भव सब सिद्ध त्रैकालिक जजूँ गुणखान जो।।९।।
ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्य: अनघ्र्यपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।।
-दोहा-
अचिन्त्य महिमा के धनी, परमानंद स्वरूप।
शांतिधारा करत ही, मिले शांति सुखरूप।।१०।।
शांतये शांतिधारा।
कमल केतकी मल्लिका, पुष्प सुगंधित लाय।
तुम पद पुष्पांजलि करूँ, सुख सपंति अधिकाय।।११।।
दिव्य पुष्पांजलि:।
जाप्य-ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नम:।
 (९ बार या १०८ बार)
जयमाला
-दोहा-
सकल सिद्ध परमात्मा, निकल अमल चिद्रूप।
गाऊँ तुम जयमालिका, सिद्धचक्र शिव भूप।।
(चाल-हे दीन बंधु श्रीपति......)
जै सिद्धचक्र मध्यलोक से भये सभी।
जै सिद्धचक्र तीनकाल के कहे सभी।।
जै जै त्रिलोक अग्रभाग पे विराजते।
जै जै अनादि औ अनंत सिद्ध सासते।।१।।
जो जम्बूद्वीप से अनंत सिद्ध हुए हैं।
क्षारोदधी१ से भी अनंत सिद्ध हुए हैं।।
जो धातकी सुद्वीप से भी सिद्ध अनंता।
कालोदधि से पुष्करार्ध से भी अनंता।।२।।
इन ढाई द्वीप से हुए जो भूतकाल में।
जो हो रहे हैं और होंगे भाविकाल में।।
इस विध अनंतानंत जीव सिद्ध हुए है।
जो भव्य को समस्त सिद्धि अर्थ हुए हैं।।३।।
जो घात मोहनीय को सम्यक्त्व लहे हैं।
ज्ञानावरण को घात पूर्ण ज्ञान लहे हैं।।
कर दर्शनावरण विनाश सर्व दर्शिता।
त्रैलोक्य औ अलोक एक साथ झलकता।।४।।
होते कभी न श्रांत चूँकि वीर्य अनंता।
ये सिद्ध सभी अंतराय कर्म के हंता।।
आयू कर्म को नाश गुण अवगाहना धरें।।
जो सर्व सिद्धि के लिए अवगाहना करें।।५।।
अवकाश दान में समर्थ सिद्ध कहाये।
अतएव एक में अनंतानंत समाये।।
फिर भी निजी अस्तित्व लिये सिद्ध सभी है।
पर के स्वरूप में विलीन हो न कभी हैं।।६।।
कर नाम कर्म नाश वे सूक्ष्मत्व गुण धरें।
अर गोत्र कर्म नाश अगुरुलघू गुण वरें।।
वे वेदनी विनाश पूर्ण सौख्य भरे हैं।
निर्बाध अव्याबाध नित्यानंद धरे हैं।।७।।
वे आठ कर्म नाश आठ गुण को धारते।
फिर भी अनंत गुण समुद्र नाम धारते।।
चैतन्य चमत्कार चिदानंद स्वरूपी।
चिंतामणी चिन्मात्र चैत्य रूप अरूपी।।८।।
सौ इंद्र वंद्य हैं त्रिलोक शिखामणी हैं।
सम्पूर्ण विश्व के अपूर्व विभामणी हैं।।
वे जन्म मृत्यु शून्य शुद्ध बुद्ध कहाते।
निर्मुक्त निरंजन सु निराकार कहाते।।९।।
जो सिद्धचक्र की सदा आराधना करें।
संसार चक्र नाश वे शिव साधना करें।।
मैं भी अनंत चक्र भ्रमण से उदास हूूँ।
हो ‘ज्ञानमती’ पूर्ण नाथ आप पास हूूँ।।१०।।
-घत्ता-
जय सिद्ध अनंता, शिवतिय वंâता।
भव दुख हन्ता तुम ध्याऊँ।।
जय जय सुख वंâदन, नित्य निरंजन।
पूजत ही निज सुख पाऊँ।।११।।
ॐ ह्रीं मध्यलोकोद्भवसकलसिद्धपरमेष्ठिभ्यो जयमाला पूर्णार्घंनिर्वपामीति स्वाहा।।
शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:।
-गीता छंद-
श्री सिद्ध चक्र अनंत की, जो नित्य प्रति पूजा करें।
वे विघ्न संकट नाश के, नित सर्व मंगल विस्तरें।।
इस लोक के सब सौख्य पा, सर्वार्थसिद्धि को वरें।
फिर ‘ज्ञानमती’ आर्हंत्यलक्ष्मी, पाय शिवकांता वरें।।१।।
।।इत्याशीर्वाद:।।