ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं संवेग भावनायै नमः"

सब छोड़ कुटुम्ब परिवार, अथिर संसार

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सब छोड़ कुटुम्ब परिवार

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तर्ज—चल दिया छोड़ दरबार......

सब छोड़ कुटुम्ब परिवार, अथिर संसार, मोह का नाता,

बन गर्इं ज्ञानमती माता।। टेक.।।
माँ मोहिनि जी हरषाई थीं।
जब घर में बजी बधाई थी।।
पितु छोटेलाल के हृदय हुई सुख साता, बन गर्इं ज्ञानमति माता।।१।।
चन्दा ने अमृत बरसाया।
दिन शरदपूर्णिमा का आया।।
दो चन्द्र चकोर मिलन कैसा मन भाता, बन गर्इं ज्ञानमति माता।।२।।
कैसी सुकुमार अवस्था में।
मैना वैराग्य धरे मन में।।
बोली मेरा नहि जग से कोई नाता, बन गर्इं ज्ञानमती माता।।३।।
पितु मात सभी समझाते थे।
सब भाई बहन मनाते थे।।
नहिं सह सकती तुम भूख प्यास की बाधा, बन गर्इं ज्ञानमती माता।।४।।
मैना बोली सब सह लूँगी।
ब्राह्मी के पथ पर चल लूँगी।।
यह पथ ही तो जग का कल्याण कराता, बन गर्इं ज्ञानमती माता।।५।।
चारित्र चक्रवर्ती गुरुवर।
उन पट पर वीरसिंधु मुनिवर।।
उनकी शिष्या से बढ़ी त्याग की गाथा, बन गर्इं ज्ञानमती माता।।६।।
गणिनी के पद पर शोभ रहीं।
शुभ ज्ञानज्योति प्रद्योत रहीं।।

‘चंदनामती’ वंदना करे जगमाता, बन गर्इं ज्ञानमती माता।।७।।