ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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प्रथामाचार्य श्री शांतिसागर महाराज की 62 वीं पुण्यतिथि (भाद्रपद शुक्ला दुतिया) 23 अगस्त को मुंबई के जैनम हाल में पूज्य गणिनी ज्ञानमती माता जी के सानिध्य में मनायी जाएगी जैन धर्मावलंबी अपने-अपने नगरों में विशेष रूप से इस पुण्यतिथि को मनाकर सातिशय पुण्य का बंध करें|
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इस मंत्र की जाप्य दो दिन 22 और 23 तारीख को करे |

सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं साधुसमाधि भावनायै नमः"

सम्यग्दर्शन ही धर्म का मूल है

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सम्यग्दर्शन ही धर्म का मूल है

(दर्शनपाहुड़ के आधार से) जिस प्रकार से मकान का मूल आधार नींव है और वृृक्ष का मूल आधार पाताल तक गई हुई उसकी जड़ें हैं उसी प्रकार से धर्म का मूल आधार सम्यग्दर्शन है क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना धर्मरूपी मकान अथवा धर्मरूपी वृक्ष ठहर नहीं सकता है। जीवरक्षारूप आत्मा का परिणाम दया है, वह दया ही धर्म का लक्षण है। तीर्थंकर देव ने तथा अन्य केवलज्ञानियों ने अपने गणधर, चक्रवर्ती, इन्द्र आदि शिष्यों को यही उपदेशा है। इसे अपने कानों से सुनकर सम्यग्दर्शन जिसके पास नहीं है वह धर्मात्मा वैâसे हो सकता है और जो धर्मात्मा नहीं है वह वंदना या नमस्कार का पात्र कैसे हो सकता है। सम्यग्दर्शन शून्य मनुष्य को तो आहारदान आदि भी नहीं देना चाहिए। क्योंकि कहा भी है- ‘‘मिथ्यादृग्भ्योददद्दानं दाता मिथ्यात्ववर्धक:।’’ मिथ्यादृष्टियों को दान देने वाला दाता मिथ्यात्व को बढ़ाने वाला है। अब प्रश्न यह होता है कि सम्यग्दर्शन से रहित मनुष्य कौन है ? उसका उत्तर यह है कि जो तीर्थंकर परमदेव की प्रतिमा नहीं मानते हैं, पुष्पादि सामग्री से उनकी पूजा नहीं करते हैं वे मिथ्यादृष्टि हैं। जो कहते हैं कि पंचमकाल में मुनि नहीं होते हैं, व्रतों से क्या प्रयोजन है ? आत्मा का ही पोषण करना चाहिए उसे दु:ख नहीं देना चाहिए। मयूर पंख की बनी पिच्छी सुन्दर नहीं होती है सूत की पिच्छिका ही ग्राह्य है मयूरपंख की पिच्छिका से तो हिंसा होती है। शासन देवता पूजनीय नहीं हैं। आत्मा ही देव है अन्यत्र कोई देव नहीं है। भगवान महावीर के बाद आठ केवली हुए हैं न कि तीन। महापुराण आदि विकथायें हैं, इत्यादि प्रकार से जो उत्सूत्र कथन करने वाले हैं वे मिथ्यादृष्टि हैं क्योंकि जिनागम में जिनप्रतिमाओं के दर्शन, वंदन, नमस्कार आदि की बहुत ही महिमा बताई है। आचार्यों ने कहा है कि जिस प्रकार चिंतामणि आदि रत्न अचेतन होकर भी फलदायी हैं वैसे ही जिनेन्द्रदेव की कृत्रिम व अकृत्रिम प्रतिमाओं के दर्शन से निकाचित मिथ्यात्व आदि कर्मोंे के सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं तथा उनकी पूजा में अष्टद्रव्य सामग्री में पुष्प, चंदन, नैवेद्य, दीप, धूप, फल आदि का स्पष्ट कथन है। रामचंद्र आदि महापुरुषों ने पुष्पादि से जिनप्रतिमाओं की पूजा की है, जिनपूजा का फल अचिन्त्य है। इसके लिए मेंढक का उदाहरण सर्वजन सुप्रसिद्ध ही है।

उसी प्रकार से इस पंचमकाल में मुनि हैं, होते हैं और होंगे ही।

श्रीगुणभद्र सूरि ने भी कहा है-जो स्वयं मोह को छोड़कर कुलपर्वतों के समान पृथ्वी का उद्धार करने वाले हैं, समुद्र के समान स्वयं धन की इच्छा से रहित होकर रत्नों के स्वामी हैं, आकाश के समान व्यापक होने से किन्हीं के द्वारा स्पष्ट न होकर विश्व की विश्रांति के कारण हैं, ऐसे अपूर्व गुणों के धारक प्राचीन मुनियों के निकट में रहने वाले कितने ही साधु आज भी विद्यमान हैं। श्री सोमदेव सूरि ने भी कहा है कि-

‘कलौ काले चले चित्ते देहे चान्नादि कीटके।’ एतच्चित्रं यदद्यापि जिनरूपधरा नरा:।।

यह कलिकाल है, मनुष्यों का चित्त अत्यंत चंचल है और शरीर अन्न का कीड़ा बना हुआ है। बड़े आश्चर्य की बात है कि आज भी जिनमुद्रा के धारक दिगम्बर साधु दिख रहे हैं। श्री कुन्दकुन्द देव ने भी मोक्षपाहुड़ में कहा है कि-

भरहे दुस्समकाले धम्मज्झाणं हवेइ साहुस्स।’ तं अप्पसहावठिदे ण हु मण्णइ सो वि अण्णाणी।।

भरतक्षेत्र में इस दु:षम काल में साधुओं को धर्मध्यान होता है, वे आत्मा के स्वभाव में स्थित होते हैं किन्तु ऐसा जो नहीं मानते हैं वे अज्ञानी हैं। उसी प्रकार से व्रतों के माहात्म्य का वर्णन श्री कुंदकुंद के शब्दों में ही देखिए-‘व्रतों से स्वर्ग को प्राप्त करना अच्छा है किन्तु अव्रती रहकर नरक जाना अच्छा नहीं है१।’ दूसरी बात यह है कि व्रती नियम से स्वर्ग ही जाता है अन्य तीन गतियों में नहीं जाता। कहा भी है- अणुव्रत और महाव्रत को प्राप्त करने वाला जीव देवायु का ही बंध करता है अन्य तीन आयु का नहीं। हां, महाव्रती तो कदाचित् द्रव्यादि सामग्री के अनुवूâल होने से मोक्ष प्राप्त कर लेता है लेकिन आज इस काल में मोक्ष संभव नहीं है। उसी प्रकार से कायक्लेश आदि तप के द्वारा आत्मा को क्लेश पहुंचाने का भी जैनशासन में कथन है। प्रकारांतर से देखा जाए तो सम्यग्दृष्टि शरीर से भिन्न आत्मा की श्रद्धा करने वाले हैं अत: शरीर आदि के क्लेश में आत्मा को दु:खी नहीं मानते हैं तभी तो वे केशलोंच, उपवास आदि से शरीर के शोषण में लगे रहते हैं। इसी प्रकार से श्री कुंदकुंददेव ने मूलाचार में मयूरपिच्छी के पांच गुण बतलाए हैं और मुनियों को उसी के लेने का विधान किया है, सूतादि की पिच्छी नहीं मानी है। यथा-धूलि और पसीना को ग्रहण नहीं करना, मृदु होना, सुकुमार होना, लघु-वजन में हल्की होना जिसमें ये पांच गुण होते हैं ऐसी मयूर पंखों की पिच्छी जीवदया का साधन होने से संयम का उपकरण है। जैनाचार्यों ने शासन देवता को भी उनके योग्य अघ्र्य आदि देकर पूजने का विधान किया है, हां! जिनेन्द्रदेव सदृश वे उपासनीय नहीं हैं। उसी प्रकार से जब तक आत्मा शुद्धोपयोग में स्थिर होने में असमर्थ है तब तक के लिए पंचपरमेष्ठी परमदेव माने गये हैं उनकी वंदना, ध्यान करना आदि का महामुनियों के लिए भी विधान है। श्री गौतमस्वामी ने स्वयं ही चैत्यभक्ति में पंचपरमेष्ठी, कृत्रिम-अकृत्रिम प्रतिमाओं की विशेष भक्ति-वंदना की है। भगवान महावीर के बाद गौतमस्वामी, सुधर्माचार्य और जम्बूस्वामी ये तीन ही अनुबद्ध केवली हुए हैं। महापुराण आदि कथायें प्रथमानुयोग के अन्तर्गत होने से विकथायें नहीं हैं, ऐसा समझना चाहिए।

कहने का तात्पर्य यही हुआ कि

जो ज्ञान के मद में मदांध होकर उत्सूत्र प्ररूपणा करने लगते हैं वे मिथ्यादृष्टि हैं, मान्य नहीं हैं, उनके वचन सुनना भी नहीं चाहिए। पुन: नमस्कार की बात तो बहुत ही दूर है। जैनशासन के ज्ञाता को यथाशक्य उनका प्रतिकार करते हुए जिनागम के अनुसार निर्दोष कथन करना चाहिए। ‘जो सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट हैं वे भ्रष्ट कहे जाते हैं क्योंकि सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट जीवों को निर्वाण प्राप्त नहीं हो सकता है। चारित्र से भ्रष्ट तो सिद्ध हो सकते हैं परन्तु सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट सिद्ध नहीं हो सकते हैं।२’ दर्शनप्राभृत की इस तृतीय गाथा में श्री कुंदकुंददेव सम्यग्दर्शन की महत्ता को बतलाते हुए ही ऐसा कह रहे हैं। उसके सही अभिप्राय को समझना आवश्यक है। जो मनुष्य सम्यग्दर्शन से च्युत हो जाते हैं वे कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन काल तक संसार में परिभ्रमण कर सकते हैं, जो अनन्तकाल के सदृश बहुत ही बड़ा माना गया है। जैसे कि मरीचिकुमार सम्यक्त्व से च्युत होकर असंख्यातों भवों तक एकेन्द्रियादि दुर्गतियों में भटकता रहा है। यही कारण है कि आचार्यदेव सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट को दीर्घसंसारी मान रहे हैं किन्तु जो सम्यग्दृष्टि तो हैं कारणवश चारित्र से भ्रष्ट हैं अर्थात् या तो उन्होंने अण्ुाव्रत-महाव्रत लिया ही नहीं है इसलिए चारित्र से शून्य हैं तो भी वे सम्यग्दृष्टि होने के नाते संसार, शरीर और भोगों से उदासीन रहते हैं इसलिए किसी न किसी दिन वे चारित्र ग्रहण कर मोक्ष को प्राप्त कर ही लेंगे क्योंकि सम्यग्दृष्टि यदि चारित्रमोह के तीव्रोदय से चारित्र ग्रहण नहीं कर पाते हैं तो भी वे चारित्रधारी साधुओं की, व्रतिकों की निंदा कथमपि नहीं करते हैं और जो चारित्रधारियों की निन्दा या उपेक्षा करते हैं वे सम्यग्दृष्टि ही नहीं हैं ऐसा समझना। अथवा यदि कदाचित् कोई सम्यग्दृष्टि अणुव्रती-महाव्रती बनकर उन व्रतों में दोष लगा देता है या कदाचित् उन व्रतों को भंग कर देता है तो भी वह कालांतर में गुरु से प्रायश्चित लेकर या पुनर्व्रत ग्रहण कर पुनर्दीक्षा आदि लेकर श्ुाद्ध हो जाता है तो उसे मोक्ष का अधिकारी माना जा सकता है न कि चारित्रभ्रष्ट में ही क्योंकि रत्नत्रय की पूर्णता ही मोक्ष का कारण है मात्र सम्यग्दर्शन अकेला नहीं है यह बात अन्यत्र ग्रन्थों में वर्णित है। यहां समझने की बात यही है कि चारित्र से भ्रष्ट या शून्य मनुष्य सम्यक्त्व के प्रभाव से बहुत जल्दी ही अपने चारित्र को सुधार सकता है किन्तु सम्यक्त्व से भ्रष्ट हो जाने के बाद तो यदि वह निगोद आदि पर्याय में, एकेन्द्रिय आदि स्थावर योनियों में चला गया तो उसे वहां समझाने वाला कौन मिलेगा ? टीकाकार

श्री श्रुतसागर आचार्य ने भी चारित्रभ्रष्ट में

महाराज श्रेणिक आदि का उदाहरण रखा है। राजा श्रेणिक चारित्र से भ्रष्ट होकर चारित्र से हीन थे और सम्यक्त्व से सहित थे अत: केवली के पादमूल में तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके आगे तीर्थंकर होने वाले हैं। ऐसे ही पुष्पडाल मुनि का उदाहरण लिया जा सकता है कि जो द्रव्य से चारित्रवान होते हुए भाव से पत्नी के साथ भोगों की आकांक्षा लिए हुए थे। उनको भी वारिषेण मुनि ने स्थितिकरण करके सच्चे भावलिंगी चारित्रवान बना दिया था, अथवा श्री समन्तभद्र स्वामी जैसे महामुनि का ही उदाहरण लीजिए। गुरु की आज्ञा से भस्मक जैसी महाव्याधि को दूर करने के लिए ही उन्होंने अन्य वेष धारण किया था। सम्यक्त्व के प्रभाव से ही चन्द्रप्रभु भगवान की मूर्ति प्रगट कर देने की योग्यता रखने वाले श्री समन्तभद्र स्वामी सम्यग्दर्शन से सहित थे इसीलिए उन्होंने पुन: चारित्र ग्रहण कर लिया था और वे मोक्ष के अधिकारी माने गये हैं। इसलिए ‘चारित्र भ्रष्ट सिद्ध हो जाते हैं इस कथन से यहां पर ब्रह्मचर्य आदि से भ्रष्ट व्रती या मुनि को नहीं लेना चाहिए क्योंकि महाव्रत में भ्रष्ट हुए मुनि तो सम्यग्दृष्टि न रहकर मिथ्यादृष्टि ही हो जायेंगे। उत्कृष्ट मुनिपद में या व्रती पद में अनर्गल चेष्टा करने वाले तो महापापी ही माने जायेंगे। भगवान आदिनाथ के समय दीक्षा लेकर नग्न वेष में फल खाकर नदी का पानी पीकर अनर्गल चर्या करते हुए साधुओं को देखकर वनदेवता ने स्पष्ट निषेध किया था कि तुम इस निग्र्रंथ दिगम्बर वेष में रहकर यह अनर्गल चेष्टा मत करो यह तीन लोक पूज्य अर्हन्त मुद्रा है। तब उन साधुओं ने तापसियों के नाना वेष बनाकर ही पाखण्ड मत चलाया था। इससे स्पष्ट है कि दिगम्बर वेश में अनर्गल चर्या कथमपि ग्राह्य नहीं है। वास्तव में छियानवे हजार रानियों का भोग करने वाला चक्रवर्ती, पंचमगुणस्थानवर्ती निर्दोष श्रावक कहा जाता है और वह दान, पूजादि सत्कर्म करने से पुण्यवान है किन्तु ब्रह्मचारी के वेष में रहकर यदि कोई परस्त्री का सेवन कर लेता है तो वह पापी, व्यभिचारी नीच कहलाता है। वह व्रती श्रावक या अव्रती सम्यग्दृष्टि की कोटि में नहीं आ सकता है क्योंकि अनर्गल चेष्टा होने से वह मिथ्यादृष्टि है, धर्म से शून्य है। पद विरुद्ध क्रिया करने से सम्यग्दृष्टि संज्ञा उसे वैâसे आ सकती है ? इसलिए यहां पर चारित्रभ्रष्ट से चारित्रहीन अर्थ लेना ही उपयोगी है और जब वह चारित्र ग्रहण कर लेता है तभी मोक्ष प्राप्त कर लेता है चारित्र बिना नहीं। टीकाकार का कहना है कि इसलिए श्रावकों के लिए दान, पूजा आदि सत्क्रियाओं का निषेध कभी नहीं करना चाहिए। सदैव आस्तिक्य भाव से सहित रहना चाहिए। आगे कहते हैं-

‘जो सम्यक्त्वरूपी रत्न से भ्रष्ट हैं

वे बहुत प्रकार के शास्त्रों को जानते हुए भी आराधना से रहित हैं अत: वे वहीं के वहीं भ्रमण करते रहते हैं।’१ टीकाकार कहते हैं कि जो मनुष्य सम्यक्त्व रूपी रत्न से शून्य होकर दान, पूजा आदि प्रशस्त कार्यों का निषेध करते हैं वे तर्वâ, व्याकरण, छन्द, अलंकार, साहित्य और सिद्धान्त आदि ग्रन्थों को जानते हुए भी जिनेन्द्र भगवान के वचनों की श्रद्धारूप आराधना से शून्य होने के कारण नरक, निगोद आदि दुर्गतियों में ही घूमते रहते हैं। आराधना के चार भेद हैं-दर्शन आराधना, ज्ञान आराधना, चारित्र आराधना और तप आराधना। इनमें से जब तक सम्यग्दर्शन नहीं है तब तक पहली आराधना ही नहीं है तो पुन: आगे की आराधनाओं के न मिलने से वह मनुष्य अनंत संसार में ही भ्रमण करता रहता है। टीकाकार का कहना है कि जो मनुष्य दान, पूजा आदि प्रशस्त क्रियाओं का निषेध करके अनर्गल उपदेश देते हैं वे सम्यग्दृष्टि नहीं हैं अत: उनके कोई भी आराधना नहीं है। वास्तव में श्रावक को निश्चयरूप आत्मधर्म की प्राप्ति हो नहीं सकती है, वह शुद्ध आत्मतत्त्व की श्रद्धा करते हुए भी शुद्ध आत्मतत्त्व का अनुभव और ध्यान कर नहीं सकता है अतएव उसके लिए ग्यारह प्रतिमाओं की चर्यारूप व्यवहार धर्म ही उपादेय है। वह एकदेश चारित्र के बल से ही अपनी आत्मशक्ति को बढ़ाता है अत: वह जब तक गृहस्थ है तब तक उसे दान, पूजा आदि क्रियाओं को करना ही है। आचार्यों ने श्रावक के पूजा, दान, शील और उपवास ये चार धर्म माने हैं। यदि कोई इन क्रियाओं का निषेध करते हैं तो वे उत्सूत्र प्ररूपणा करने से मिथ्यादृष्टि ही हैं ऐसा अर्थ फलित होता है। अत: आगम के अनुवूâल चर्या करते हुए उसी के अनुरूप उपदेश देकर अपने सम्यक्त्वरूपी रत्न को सुरक्षित रखना चाहिए। सम्यग्दर्शन से रहित मनुष्य अच्छी तरह उग्र-उग्र तपश्चरण करते हुए भी हजार करोड़ वर्षों में भी बोधि को नहीं प्राप्त कर पाते हैं।२ जो मनुष्य सम्यग्दर्शन से पतित हैं वे भले ही कठिन से कठिन मासोपवास आदि विशिष्ट तपों का आचरण करते हैं तो भी हजार करोड़ वर्षों में भी सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्ररूप रत्नत्रय से युक्त बोधि को नहीं प्राप्त कर पाते हैं अर्थात् सम्यक्त्व के बिना अनंतकाल पुरुषार्थ करके भी मुक्ति को नहीं प्राप्त किया जा सकता है, ऐसा समझ करके निश्चय धर्म में प्रधानभूत दान, पूजा आदि व्यवहार धर्म को नहीं छोड़ना चाहिए। तात्पर्य यही है कि निश्चय धर्म को प्राप्त कराने के लिए कारणभूत ऐसा व्यवहार धर्म सर्वथा उपादेय है क्योंकि मुनियों के लिए तो निश्चय धर्म की प्राप्ति तक ही वह साधन माना गया है लेकिन श्रावकों के लिए तो पंचसूना के पाप को हल्का करने के लिए दान, पूजादि क्रियायें अवश्य करने योग्य ही हैं। यदि कोई श्रावक पद में रहकर भी दान, पूजा को छोड़कर अपने आपको गुरु कहलाकर पूजा कराने लगता है या दान, पूजादि को हेय कहकर छोड़ने का उपदेश देने लगता है तो वह आचार्यों के कथनानुसार सम्यग्दृष्टि नहीं है। ‘जो भव्य जीव सम्यक्त्व, ज्ञान, दर्शन, बल और वीर्य को वृद्धिंगत करते हुए कलिकाल के कलुषित पाप से रहित होते हैं वे सभी महापुरुष शीघ्र ही उत्कृष्ट ज्ञानी हो जाते हैं।’३ जिन वचन में श्रद्धा रखना सम्यक्त्व है, जिनागम का पठन-पाठन आदि करना ज्ञान है, पदार्थ की सामान्य सत्ता का अवलोकन होना दर्शन है, अपनी शारीरिक शक्ति को नहीं छिपाना बल है और आत्मा की शक्ति का नाम वीर्य है। जिन के ये गुण वृद्धिंगत हो रहे हैं वे भव्य जीव हैं, वे ही कलिकाल में प्रगट हुए नाना प्रकार से मिथ्यात्वरूप पाप से बच सकते हैं।

टीकाकार का कहना है कि

इस पंचमकाल में जो शौच धर्म से रहित हैं-मलिन हैं, वर्णव्यवस्था का लोप करके चाहे जहां भिक्षा से भोजन ग्रहण कर लेते हैं, मांसाहारी लोगों के यहां भी प्रासुक अन्न ले लेते हैं, म्लेच्छ और श्मशानवासी लोगों के यहां भी भोजन कर लेते हैं वे धर्म से शून्य हैं, पापी हैं और जो देव, शास्त्र, गुरु की पूजा का निषेध करने वाले हैं वे सम्यग्दर्शन से रहित होने से मोक्ष के अधिकारी नहीं हैं। इससे विपरीत शौचधर्म को धारण करने वाले, वर्णसंकर, जातिसंकर, सूतक-पातक आदि दोषों से रहित श्रावक के यहां निर्दोष प्रासुक आहार लेने वाले मुनि ही मोक्षमार्गी हैं। ‘जिसके हृदय में सम्यक्त्वरूपी जल का प्रवाह निरंतर प्रवाहित रहता है उसका कर्मरूपी बालू का बांध बद्ध होने पर भी नष्ट हो जाता है।१’ संसाररूपी संताप का निवारण करने वाला होने से तथा पापरूपी कलंक का प्रक्षालन करने वाला होने से सम्यग्दर्शन निर्मल, शीतल और स्वादिष्ट पानी के समान है। जिस मनुष्य के हृदय में जलपूर के समान सम्यग्दर्शन सदा प्रवाहित रहता है उसके चिरकाल से संचित भी पापकर्मरूपी बालू का बांध नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार कोरे घड़े पर स्थित धूली चिपकती नहीं है उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि से लगा हुआ पापकर्म बंध को प्राप्त नहीं होता है, यह सब सम्यग्दर्शन का ही माहात्म्य है। अत: परदेव को नमस्कार करना भी पाप है क्योंकि हिंसादि पांचों पापों की अपेक्षा मिथ्यात्वी देव को नमस्कार करना महापाप है। तात्पर्य यही है कि जो समीचीन मार्ग पर चलकर सच्चे सुख को प्राप्त कर चुके हैं वे ही सच्चे देव हैं किन्तु स्त्री, भोजन और युद्ध आदि में आसक्त हुए प्राणी ‘देव’ भगवान संज्ञा को नहीं प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि असमीचीन प्राणी को देव मानकर नमस्कार करना मिथ्यात्व है, महापाप है। ‘जो मनुष्य सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट हैं, सम्यग्ज्ञान से भ्रष्ट हैं और सम्यक्चारित्र से भ्रष्ट हैं अर्थात् इन तीनों से शून्य हैं वे भ्रष्टों में भी विशिष्ट भ्रष्ट हैं तथा अन्य मनुष्यों को भी भ्रष्ट कर देते हैं।२’ सम्यग्दर्शन के निसर्गज और अधिगमज की अपेक्षा अथवा निश्चय और व्यवहार की अपेक्षा दो भेद हैं। औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक की अपेक्षा तीन भेद हैं। आज्ञा सम्यक्त्व, मार्ग सम्यक्त्व आदि की अपेक्षा दश भेद हैं। ज्ञान के शब्दशुद्धि, अर्थशुद्धि, उभय शुद्धि, काल शुद्धि, उपधान शुद्धि, विनय शुद्धि, अनिन्हव शुद्धि और बहुमान शुद्धि की अपेक्षा से आठ भेद हैं। चारित्र के पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्ति रूप से तेरह भेद होते हैं। जो इन रत्नत्रय से भ्रष्ट हैं वे अन्य लोगों को भी भ्रष्ट कर देते हैं अथवा यदि श्रावकों के लिए कहा जाए तो श्रावक सम्यग्दर्शन, ज्ञान तथा पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत से बारह व्रतरूप एकदेश चारित्र से भ्रष्ट हैं, वे अन्य अपने आश्रित को भी उन्मार्गगामी ही बनायेंगे।

जो मनुष्य धर्म के अभ्यासी,

संयम, तप, नियम, योग और उत्तरगुणों के धारी महामुनियों के दोष कहते हैं-उनमें मिथ्या दोषों का आरोप करते हैं वे स्वयं तो चारित्र से पतित हैं ही, दूसरों को भी चारित्र से पतित कर देते हैं। धर्म का लक्षण कहते हुए यह गाथा स्मरणीय है-

वत्थु सहावो धम्मो खमादिभावो य दसविहो धम्मो। चारित्तं खलु धम्मो जीवाणं रक्खणं धम्मो।।

वस्तु का स्वभाव धर्म है इस लक्षण के अनुसार आत्मा की वीतराग परिणति ही धर्म है, जो शुद्धोपयोगी महामुनि के अनुभव में ही आती है अथवा उत्तम क्षमा आदि दशलक्षणरूप धर्म है अथवा चारित्र ही धर्म है इस लक्षण के अनुसार भी सामायिक आदि पांच प्रकार का चारित्र धर्म है या पांच महाव्रत आदि रूप तेरह प्रकार का चारित्र धर्म है गृहस्थ का विकलचारित्र तो एकदेश धर्म है जो कि व्यवहार चारित्र ही है। यहां प्रवचनसार के अनुसार तो मोह, क्षोभ से रहित आत्मा की शुद्ध परिणति ही धर्म है जो कि शुक्लध्यान में ही संभव है अथवा जीवों की रक्षा करना धर्म है। यह जीव दया लक्षण धर्म ही आजकल श्रावक और मुनियों में पाया जाता है। बाकी के धर्म तो कुछ-कुछ रूप में ही पाये जाते हैं। पांच स्थावर और एक त्रस ऐसे षट्काय के जीवों की रक्षा करना और पांच इन्द्रिय तथा मन को वश में रखना ये संयम कहलाता है। अनशन, अवमौदर्य, वृत्तपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश ये छह बाह्य तप हैं। प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान ये छह अभ्यन्तर तप हैं। किसी वस्तु का किसी निश्चित समय तक के लिए त्याग करना नियम कहलाता है अथवा षट् आवश्यक क्रियाओं को नियमित समय पर करना नियम है। वर्षाकाल में एक जगह रहना योग है अथवा अध्यात्मध्यान को योग कहते हैं। पद्मनंदि आचार्य ने कहा भी है-

साम्यं स्वास्थ्यं समाधिश्च योगश्चेतोनिरोधनम्। शुद्धोपयोग इत्येते भवन्त्येकार्थवाचका:।।

साम्य, स्वास्थ्य, समाधि, योग, चित्त का निरोध और शुद्धोपयोग ये सब एक अर्थ को कहने वाले शब्द हैं अर्थात् इन सबका एक ही अर्थ होता है जो कि निर्विकल्पध्यान में महामुनियों के शुक्लध्यानरूप से विवक्षित है। ‘गुण’ शब्द से टीकाकार ने चौरासी लाख उत्तर गुणों को लिया है। जो मुनि उपर्युक्त प्रकार से धर्म, संयम आदि से सहित हैं अथवा आज के युग में जो मुनि अपने अट्ठाईस मूलगुणों का पालन करते हैं, नग्न दिगम्बर मुद्रा के धारी हैं, ऐसे मुनियों की जो निन्दा करते हैं, उन्हें द्रव्यलिंगी, मिथ्यात्वी कहते हैं। उनकी पूजा करने का, उन्हें आहार देने का विरोध करते हैं वे मिथ्यादृष्टि हैं, रत्नत्रय से वंचित करने वाले हैं। जो स्वयं अव्रती होकर भी अपने को सद्गुरु कहलाते हैं, अपने पैर पुजवाते हैं और दिगम्बर मुनियों की आलोचना करते हैं वे रत्नत्रय से रहित हैं और उनके अनुयायी भी रत्नत्रय तो क्या सम्यग्दर्शन से भी शून्य ही हैं ऐसा समझना। जिस प्रकार मूल-जड़ के नष्ट हो जाने से वृक्ष की शाखा आदि परिवार की वृद्धि नहीं होती है उसी प्रकार जो जिनदर्शन अर्थात् जिनेन्द्रदेव के मत से अथवा सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट हैं-रहित हैं, वे मूल से ही रहित हैं वे सिद्ध नहीं हो सकते हैं। जिस प्रकार मूल अर्थात् जड़ के होने से वृक्ष के स्कंध, शाखा आदि परिवार का बहुतरूप से विस्तार पैâलता चला जाता है उसी प्रकार से अर्हन्त भगवान का मत अथवा सम्यग्दर्शन मोक्षमार्ग का मूल कहा गया है।१ जिस प्रकार मूल से ही वृक्ष का तना वृद्धि को प्राप्त होता है और मूल से ही वृक्ष की शाखाओं और उपशाखाओं का समूह पत्ते, पुष्प आदि से युक्त होता है उसी प्रकार जिनदर्शन ही रत्नत्रय स्वरूप मोक्षमार्ग को फलित करने वाला है। जो स्वयं तो सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट-रहित है और सम्यग्दृष्टियों को सम्यक्त्व सहित मुनियों को नमस्कार नहीं करते हैं वे अव्यक्तभाषी अथवा गूँगे होते हैं तथा उनके लिए रत्नत्रय की प्राप्ति दुर्लभ है।२

सम्यग्दर्शन के निसर्गज, अधिगमज की अपेक्षा दो भेद हैं।

औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक की अपेक्षा तीन भेद हैं। आज्ञासमुद्भव, मार्गसमुद्भव, उपदेशसमुद्भव, सूत्रसमुद्भव, बीजसमुद्भव, संक्षेपसमुद्भव, विस्तारसमुद्भव, अर्थसमुद्भव, अवगाढ़ और परमावगाढ़ इनकी अपेक्षा दश भेद हैं। इन सम्यक्त्वों से जो भ्रष्ट हैं-रहित हैं, मयूरपिच्छिका, कमण्डलु और जिनशास्त्र इन संयम, शौच और ज्ञान के उपकरणों से रहित हैं, गृहस्थ वेष के धारी हैं अर्थात् स्वयं अव्रती हैं और संयमी सम्यग्दृष्टि मुनियों के चरणयुगलों में नहीं झुकते हैं, उन्हें नमोस्तु कहकर नमस्कार नहीं करते हैं, अभिमान से खड़े रहते हैं, वे अस्पष्टभाषी गूंगे हो जाते हैं अर्थात् बोलने और सुनने में असमर्थ हो जाते हैं पुन: उन्हें लाखों जन्म में बोधि रत्नत्रय की प्राप्ति होना कठिन हो जाता है। जो जानते हुए भी लज्जा, गर्व अथवा भय के कारण उन मिथ्यादृष्टियों के चरणों में पड़ते हैं, उनको भी रत्नत्रय की प्राप्ति नहीं होती है क्योंकि वे पाप की अनुमोदना करने वाले हैं।३ जो जानते हैं कि ये सम्यग्दर्शन से रहित हैं-जिनमुद्रा स्वरूप नग्नत्व, मयूर पिच्छिका, कमंडलु और जैनशास्त्र के ग्रहण से रहित कुलिंगी हैं, गृहस्थ जैसे वस्त्र आदि वेष को धारण करने वाले हैं, साधु होने पर भी वीतराग निग्र्रंथ मुद्रा से रहित हैं अत: नमस्कार के योग्य नहीं हैं, ऐसा जान करके भी यदि लज्जा से, गर्व से या भय से ‘‘यह राजमान्य है, नमस्कार न करने पर कुछ उपद्रव आदि कर देगा’’ इत्यादि भय से नमस्कार करते हैं वे उनके उस पाप की अनुमोदना करने वाले हैं अत: उनके रत्नत्रय की प्राप्ति होना बहुत ही कठिन है। जो मुनि दोनों प्रकार के परिग्रह का त्याग करते हैं, तीनों योगों पर संयम रखते हैं अर्थात् मन, वचन, काय की प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखते हैं, इंद्रियों के वशीभूत हो ज्ञान को मलिन नहीं करते और खड़े होकर भोजन करते हैं उन्हीं के सम्यक्त्व होता है। सम्यक्त्व से ज्ञान होता है, ज्ञान से समस्त पदार्थों की उपलब्धि होती है और समस्त पदार्थों की उपलब्धि अर्थात् जानकारी हो जाने से यह जीव कल्याण तथा अकल्याण को विशेषरूप से जानता है। हित और अहित को जानने वाला मनुष्य दुष्ट स्वभाव को उन्मूलित करता है तथा उत्तम शील, श्रेष्ठ स्वभाव से युक्त होता हुआ शील के फलस्वरूप सांसारिक सुख को प्राप्त होता है और उसके बाद मोक्ष सुख को प्राप्त करता है।४ जिसने श्रेय-सम्यक्त्व और अश्रेय-मिथ्यात्व को समझ लिया है वह दु:शील-दुष्ट स्वभाव विषय कषाय आदिरूप परिणति को उखाड़कर दूर कर देता है, शील से-आत्म परिणति से युक्त मनुष्य शील के फलस्वरूप पहले तो अभ्युदय, देव तथा चक्रवर्ती आदि के सांसारिक सुख को प्राप्त होता है और उसके बाद निर्वाण को प्राप्त कर लेता है। पुनरपि श्री कुन्दकुन्ददेव कहते हैं-

जिणवयणमोसहमिणं विसयसुहविरेयणं अमिदभूयं। जरमरणवाहिहरणं खयकरणं सव्वदुक्खाणं१।

ये जिनेन्द्रदेव के वचन महौषधि हैं,

विषय सुखों का विरेचन कराने वाले हैं, अमृतरूप हैं, जरा और मरणरूप व्याधि को हरण करने वाले हैं तथा सर्व दुःखों का क्षय करने वाले हैं। यहां पर श्री कुंदकुंद देव ने वीतराग सर्वज्ञदेव की वाणी को औषधि की उपमा दी है। जैसे-उत्तम औषधि शरीर के भीतर रुके हुए मल का विरेचन कर व्याधि को दूर करती है, मनुष्य के अकालमरण को दूर कर उसके नाना प्रकार के रोगों का क्षय कर देती है तथा मनुष्य को स्वस्थता प्रदान कर तरुण के समान स्पूâर्तिमान बना देती है उसी प्रकार जिनवाणीरूपी औषधि मनुष्य की आत्मा में विद्यमान पंचेंद्रियों के विषय सुखों से अरुचि कराकर उनका त्याग करा देने से विषय सुखों का विरेचन कराने वाली है, अमृतरूप है, बुढ़ापा और मरणरूपी जो महारोग हैं, उनको भी नष्ट करने वाली है तथा शारीरिक, मानसिक और आगंतुक समस्त दु:खों का क्षय करने वाली है। जो भव्य जीव जिनेन्द्र भगवान के वचनों को पढ़कर या सुनकर हृदय में अवधारण करते हैं पुन: उन वचनों के अनुसार अणुव्रत, महाव्रत आदि चारित्र को धारण कर लेते हैं वे संसार, शरीर और भोगों से विरक्त होकर विषय सुखों को सर्वथा छोड़ देते हैं पुन: चारित्र और तपश्चरण के बल से स्वर्ग सुखों को भोगकर परम्परा से जन्म-मरण को नाशकर मोक्ष सुख को प्राप्त कर लेते हैं। आज तक जितने भी जीव सिद्धपद को प्राप्त हुए हैं, होते हैं और होंगे वह सब जिनवचनरूपी औषधि का ही प्रभाव है, बिना जिनवचन के न किसी को सिद्धि हुई है और न होगी ही, ऐसा विश्वास करके हमेशा जिनवचन का स्वाध्याय करते रहना चाहिए। जैनाचार्यों का कहना है कि यह स्वाध्याय अभ्यंतर तप के अन्तर्गत होने से ‘स्वाध्याय: परमं तप:’ परम श्रेष्ठ तप है। इस काल में केवली भगवान अर्हन्तदेव के दर्शन नहीं हो सकते हैं किन्तु उनकी वाणी का दर्शन, पठन, श्रवण हो सकने से भव्य जीव अपने को पुण्यशाली ही समझते हैं क्योंकि ये जिनवचन भी बड़े सौभाग्य से ही जीवों को उपलब्ध होते हैं। इस जिनवाणी को प्राप्त करके उस पर श्रद्धान करना अपना परम कत्र्तव्य हो जाता है। वर्तमान के उपलब्ध षट्खण्डागम सूत्र ग्रंथ, उनकी धवला आदि टीका में, महाशास्त्र तत्त्वार्थसूत्र, उनकी सर्वार्थसिद्धि, राजवार्तिक, श्लोकवार्तिक आदि टीकायें और समयसार, प्रवचनसार, नियमसार आदि अध्यात्मग्रन्थ तथा रत्नकरण्डश्रावकाचार, दर्शनपाहुड़, चारित्रपाहुड़ आदि सभी ग्रन्थों को भगवान जिनेन्द्रदेव की वाणी का ही अंश मानकर उन पर दृढ़ श्रद्धान करके उनके अनुसार अपनी चर्या को समीचीन बनाना ही श्रावकों का परम कत्र्तव्य है।

एक जिनेन्द्र भगवान का नग्नरूप,

दूसरा उत्कृष्ट श्रावकों का रूप और तीसरा आर्यिकाओं का रूप इस प्रकार जिनशासन में तीन लिंग कहे गये हैं, चौथा लिंग जिनशासन में नहीं है। सकल-विकल के भेद से चारित्र के दो भेद हैं। इनमें से मुनियों के सकल चारित्र होता है। उनका लिंग अर्थात् वेष नग्न दिगम्बर मुद्रा है। परिग्रहत्याग महाव्रत और आचेलक्य मूलगुण के धारक होने से उनके शरीर पर तिलतुषमात्र भी परिग्रह नहीं रहता है। संयम की उपकरण पिच्छी, शौच का उपकरण कमंडलु और ज्ञान का उपकरण शास्त्र इनको वे अपने पास रखते हैं। पिच्छी कमंडलु तो वे प्रतिक्षण अपने पास में रखते ही हैं। विकल चारित्र के धारकों में जो उत्कृष्ट श्रावक हैं, वे ग्यारह प्रतिमाधारी ऐलक या क्षुल्लक के वेष में रहते हैं। ग्यारह प्रतिमाधारकों के दार्शनिक, व्रतिक, सामायिक, प्रोषधोपवासी, सचित्तत्यागी, रात्रिभुक्तिविरत, ब्रह्मचारी, आरम्भविरत, परिग्रहविरत, अनुमतिविरत और उद्दिष्टविरत ये भेद होते हैं। इनमें से प्रारम्भ के ६ प्रतिमा धारकों तक जघन्य श्रावक संज्ञा है, उसके बाद सप्तम, अष्टम और नवमी प्रतिमाधारक मध्यम श्रावक है। इसके ऊपर दशमी प्रतिमाधारी और ग्यारहवीं प्रतिमाधारी उत्कृष्ट श्रावक कहलाते हैं। ग्यारहवीं प्रतिमा धारण करने वाले श्रावक, क्षुल्लक या ऐलक के वेष में रहते हैं। ऐलक कौपीन, पिच्छी और कमंडलु रखते हैं तथा क्षुल्लक एक छोटी चादर भी रखते हैं। ये गुरु के पास निवास करते हैं। श्रावकों के यहां बिना बुलाये अतिथि के समान चर्यावृत्ति से जाकर भोजन करते हैं। दिन में एक बार ही भोजन करते हैं। इस प्रकार से जिनागम में यह दूसरा लिंग उत्कृष्ट श्रावक का बतलाया गया है। आर्यिकायें उपचार से सकल चारित्र की धारक कहलाती हैं। ये एक सपेâद धोती पहनती हैं और पिच्छी, कमण्डलु रखती हैं। इनकी सारी चर्या मुनि के समान रहती है। एक धोती पहनना और बैठकर पात्र में आहार लेना, इतना मात्र ही अन्तर रहता है। इसलिए ग्यारह प्रतिमाओं से ऊपर मुनियों के मूलगुण ही इनके लिए माने गये हैं, इस प्रकार जिनागम में यह तीसरा लिंग है। यहां पर इन तीनों लिंगों में पूज्यता का क्रम विवक्षित नहीं है। सर्वोत्कृष्ट और सर्वपूज्य तो मुनि लिंग है, उसके बाद पूज्यता में आर्यिका लिंग है क्योंकि आर्यिकाओं को उपचार से महाव्रती कहा गया है और ऐलक को जबकि उनके पास लंगोटी मात्र परिग्रह है फिर भी अणुव्रती श्रावक कहा गया है। कारण यही है कि ऐलक उतने मात्र भी परिग्रह को छोड़ सकता है किन्तु आर्यिका १६ हाथ की साड़ी के परिग्रह को छोड़ने में असमर्थ हैं इसलिए आर्यिकायें ऐलक के द्वारा वंद्य हैं जबकि मुनि एक घण्टे का भी यदि दीक्षित है और आर्यिका ५० वर्ष की भी दीक्षित हैं तो भी मुनि को वह नमस्कार करती है। अत: पूज्यता की दृष्टि से पहले मुनिलिंग है, बाद में आर्यिका लिंग है, अनंतर उत्कृष्ट श्रावक का ऐलक, क्षुल्लक लिंग है। कहा भी है-

कौपीनेपि समूच्र्छत्वान्नार्हत्यार्यो महाव्रतम्। अपि भाक्तममूज्र्छत्वात् साटकेप्यार्यिकार्हति१।।३६।।

अहो! आश्चर्य है कि ग्यारहवीं प्रतिमाधारी

ऐलक लंगोटी में ममत्व सहित होने से उपचार से भी महाव्रत के योग्य नहीं है परन्तु आर्यिका एक साड़ी धारण करने पर भी ममत्वरहित होने से उपचार महाव्रत के योग्य है अर्थात् ऐलक उपचार से भी महाव्रती नहीं है किन्तु आर्यिका उपचार से महाव्रती होने से ऐलक से वंद्य है। उत्कृष्ट श्रावक क्षुल्लक के सदृश क्षुल्लिका का वेष है जो कि तृतीय लिंग में ही है। आगे कहते हैं- ‘छह द्रव्य, नौ पदार्थ, पांच अस्तिकाय और सात तत्त्व कहे गये हैं। उनके स्वरूप का जो श्रद्धान करता है उसे सम्यग्दृष्टि समझना चाहिए।२’ जो तीनों कालोें में अपने गुण पर्यायों को प्राप्त करते थे, करते हैं और करेंगे, उन्हें द्रव्य कहते हैं। वे छह होते हैं-जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पाप ये नव पदार्थ कहलाते हैं। जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय ये पांच अस्तिकाय हैं, काल अस्तिकाय नहीं हैं। जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्त्व माने गये हैं। इन द्रव्यों में जीव सचेतन है बाकी पुद्गल आदि पांच द्रव्य अचेतन हैं। उपयोग यह जीव का लक्षण है। इस उपयोग के ज्ञान और दर्शन ऐसे दो भेद हैं। इनमें से ज्ञान के भी मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान ऐसे पांच भेद होते हैं। इनमें से भी प्रत्येक के असंख्यात भेद हो जाते हैं तथा मति, श्रुत और अवधि ये तीन ज्ञान मिथ्यात्व के निमित्त से विपरीत-कुमति, कुश्रुत और कुअवधिरूप भी हो जाते हैं। आजकल प्राय: मनुष्यों में जितना भी ज्ञान का अधिक विस्तार देखा जाता है वह सब कुमतिज्ञान और कुश्रुतज्ञान के अंतर्गत ही है। हां! जब सम्यग्दर्शन प्रगट हो जाता है तब वही ज्ञान मति, श्रुत के रूप में परिणत हो जाता है। दर्शनोपयोग के चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन ये चार भेद होते हैं। ऐसे सभी उपयोग मिलकर बारह भेदस्थ हो जाते हैं। पुद्गल के अणु और स्कंध की अपेक्षा दो भेद हैं। स्कंधों में द्व्यणुक से लेकर महास्कंध पर्यन्त असंख्यातों भेद होते हैं। जिसमें रूप, रस, गंध और स्पर्श पाया जाता है वह पुद्गल है। हम और आप को जो भी दिख रहा है वह सब पुद्गल ही है। यहां तक कि हमारे शरीर, आयु, श्वासोच्छ्वास आदि भी सब पुद्गल से ही बने हुए हैं। जीव पुद्गल को गमन मेें सहकारी, अमूर्तिक, असंख्यात प्रदेशी ऐसा धर्म द्रव्य है। ऐसे ही जीव, पुद्गल को ठहरने में सहकारी, अमूर्तिक, असंख्यात प्रदेशी अधर्मद्रव्य है। जीव, पुद्गल आदि सभी द्रव्यों को अवकाश दान देने में समर्थ आकाश द्रव्य है और सभी द्रव्यों में परिणमन करने मेें सहायक काल द्रव्य है। ऐसे ही सात तत्त्वों में जीव चेतना लक्षण वाला है, अजीव अचेतन है। जीव के रागादि परिणामों को निमित्त करके पौद्गलिक कर्मों का आना आस्रव है। जीव और कर्मों का परस्पर में एक क्षेत्रावगाह सम्बन्ध होना बंध है। कर्मों का आना रुक जाना संवर है, कर्मों का एकदेश निर्जीर्ण होना निर्जरा है और सम्पूर्ण कर्मों का अभाव हो जाना मोक्ष है। इन सभी द्रव्य, पदार्थ, तत्त्व और अस्तिकायों का श्रद्धान करना सम्यक्त्व है। आगे आचार्य श्रीकुंदकुंद देव नयों की विवक्षा से कहते है। जीवादि पदार्थों का श्रद्धान करना व्यवहार नय से सम्यक्त्व है और निश्चयनय से आत्मा का श्रद्धान करना सम्यक्त्व है। अर्थात् जीवादि तत्त्वों का श्रद्धान व्यवहार सम्यक्त्व है और अपनी आत्मा का श्रद्धान निश्चय सम्यक्त्व है।

एवं जिणपण्णत्तं दंसण-रयणं धरेह भावेण। सारं गुणरयणत्तय सोवाणं पढम मोक्खस्स१।।२१।।

इस प्रकार से जिनेन्द्र भगवान द्वारा कहे हुए सम्यग्दर्शनरूप रत्न को हे भव्य जीवों! तुम भावपूर्वक धारण करो। यह सम्यग्दर्शनरूप रत्न उत्तम क्षमा आदि गुणों तथा सम्यग्दर्शन आदि तीन रत्नों में सर्वश्रेष्ठ रत्न है और मोक्षरूपी महल में चढ़ने के लिए पहली सीढ़ी है।

पुनरपि आचार्यदेव कहते हैं-

जं सक्कइ तं कीरइ जं च ण सक्केइ तं च सद्दहणं। केवलिजिणेहिं भणियं सद्दहमाणस्स सम्मत्तं२।।२२।। जो करना शक्य है उसे तो करना चाहिए और जो करना शक्य नहीं है उसका श्रद्धान करना चाहिए, क्योंकि केवली भगवान ने श्रद्धान करने वाले के ही सम्यक्त्व कहा है। यहां पर यह समझना चाहिए कि जो ज्ञानाचार, चारित्राचार और तप आचार करने के लिए दुर्धर हैं, अपनी शक्ति से बाहर है अर्थात् शारीरिक संहनन की हीनता आदि से वर्तमान मेें करना कठिन प्रतीत हो रहा है, उनका श्रद्धान ही करना चाहिए और जो चारित्र पालन करना शक्य है, अणुव्रत आदि रूप से जो पाला जा सकता है उसको अवश्य पालना चाहिए, शक्ति नहीं छिपाना चाहिए। आजकल कुछ लोग चारित्र पालन करने में स्वयं प्रमादी होते हुए चारित्र को ढोंग या पाखंड अथवा यह व्यवहार चारित्र हेय है ऐसा कहकर उपेक्षा कर देते हैं और चारित्र के धारकों की निन्दा, अवहेलना आदि करते हैं, उन्हें द्रव्यलिंगी, पाखंडी, मिथ्यादृष्टि आदि कहते हैं। उनके प्रति ही भगवान वुंâदवुंâददेव का यह उपदेश है कि जितना शक्य हो उतना करो, जो कुछ शक्य न हो उस पर श्रद्धान करो यही सम्यक्त्व है क्योंकि मोक्षमार्ग में अपनी शक्ति को छिपाना भी आत्मवंचना है इसलिए प्रत्येक गृहस्थ का कत्र्तव्य है कि मोक्षमार्ग में अपने आत्मगुणों को वृद्धिंगत करने का ही सतत् पुरुषार्थ करते रहना चाहिए। प्रमाद को छोड़कर संसार के दु:ख से छुड़ाने वाले देवपूजा, गुरुपास्ति आदि आवश्यक क्रियाओं को शक्ति से बाहर न समझ कर यथायोग्य करते ही रहना चाहिए और चारित्रधारी संयमी या देशव्रती श्रावकों की निन्दा न करके उनके गुणों में अनुरक्त होते हुए उनकी प्रशंसा करनी चाहिए, यही गृहस्थ का कत्र्तव्य है। कर्मक्षय के कारण क्या-क्या हैं जो चौंसठ चमरों से सहित हैं, चौंतीस अतिशयों से युक्त हैं, विहार काल में पीछे चलने वाले सेवक तथा अनेक जीवों का हित करने वाले हैं, वे तीर्थंकर परमेदव भव्यों के कर्मक्षय में निमित्त कारण हैं ऐसे तीर्थंकर परमदेव को नमस्कार हो।१ समवसरण में तीर्थंकरदेव के आजू-बाजू में यक्षदेव चौंसठ चमर ढोरते रहते हैं। प्रत्येक तीर्थंकर के जन्म के १० अतिशय, केवलज्ञान के १० अतिशय और देवकृत १४ अतिशय, ऐसे ३४ अतिशय होते हैं। जब तीर्थंकर का श्रीविहार होता है उस समय साथ में पीछे चलने वाले संख्यातों मनुष्य और असंख्यात देवगण अपने स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग सीख लेते हैं। उन तीर्थंकर देव को नमस्कार करने से, उनकी भक्ति विशेष से उस शुक्लध्यान की प्राप्ति होती है जो कि कर्मक्षय का सीधा कारण है अर्थात् जिनेन्द्रदेव की भक्ति से असंख्यात गुणश्रेणीरूप में अशुभ कर्मों की निर्जरा होती है जो कि कर्मों में एकदेश क्षयरूप है तथा परम्परा से संपूर्ण कर्मों का क्षय भी हो जाता है जिससे कि मोक्षसुख की प्राप्ति होती है इसीलिए तो अर्हन्तदेव को भव्यों के कर्मक्षय में कारण माना गया है। पुन: यह प्रश्न होता है कि कर्मक्षय में और क्या-क्या कारण हैं तथा शुक्लध्यान में हेतु क्या हैं ?

आचार्यदेव उत्तर देते हुए कहते हैं-

‘‘ज्ञान, दर्शन, तप और चारित्र ये चारों संयम गुण कहलाते हैं। इन चारों के एकत्रित होने पर ही जिनशासन में मोक्ष कहा गया है२।’’ सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्र और सम्यक् तप इन चारों के समायोग से ही जैनशासन में मोक्ष की प्राप्ति बतलाई गई है। इन चारों का समायोग ही संयम गुण कहलाता है। अत: संक्षेप से संयम गुण के द्वारा ही मोक्ष होता है। यहां यह बात ध्यान रखने की है कि ये दर्शन, ज्ञान आदि मिलकर ही मोक्षमार्ग हैं, भिन्न-भिन्न नहीं। श्री वीरनन्दि आचार्य के शिष्य श्री पद्मनन्दि आचार्य ने कहा है-

वनशिखिनि मृतोऽन्ध:-संचरन् वाढमंघ्रि- द्वितय-विकलमूर्तिर्वीक्षमाणोऽपि खंज:। अपि सनयनपादो पादोऽश्रद्दधानश्च तस्मात्। दृगवमचारित्रे: संयुतैरेव सिद्धि:।।१

वन में अग्नि के लग जाने पर अंधा मनुष्य अच्छी तरह चलता हुआ, दोनों पैरों से रहित पंगु मनुष्य देखता हुआ और ‘‘यह अग्नि है’’ इस श्रद्धा से रहित मनुष्य नेत्र और पैरों से सहित होता हुआ भी चूँकि दावानल में जल कर मर जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र इन तीनों के मिलने पर ही मोक्ष प्राप्त होता है अर्थात् जैसे वन में दावानल अग्नि लग गई उस समय अंधा मनुष्य चलते हुए भी मार्ग न देख सकने से जल कर मर गया। पंगु मनुष्य देखते हुए भी चल नहीं सकने से जल गया और नेत्र, पैर सहित भी मनुष्य ‘‘यह अग्नि मुझे जलायेगी’’ ऐसा विश्वास न करने से वहीं पड़ा रहने से मर गया। इसी प्रकार से सम्यग्ज्ञान शून्य मनुष्य अन्धे के समान है। मोक्षमार्ग को नहीं देखता हुआ संसाररूपी वन में जन्ममृत्युरूपी दावानल में झुलस रहा है। सम्यग्चारित्र से हीन मनुष्य पंगु के समान है, सम्यग्ज्ञान के द्वारा सही-सही मार्ग के देखने पर भी मोक्षमार्ग में चल नहीं सकने से संसार में ही भ्रमण करता रहता है और सम्यग्दर्शन शून्य मनुष्य उस संशयालु मनुष्य के समान है जिसके नेत्र और पैर होने पर भी वन में जल जाता है उसी से यह भी संसाररूपी वन में भटकता ही रहता है। इसलिए श्रीकुंदकुंद देव का यही कहना है कि इन तीनों के मिलने से ही रत्नत्रय संज्ञा आती है और इन्हीं में सम्यव्â तप के मिला देने से चार आराधनायें हो जाती हैं। इन चारों का समायोग ही मोक्ष को प्राप्त कराने वाला है। जहाँ पर तीन ही कहे जाते हैं वहां पर सम्यक् चारित्र में ही सम्यक् तप गर्भित समझना चाहिए।

आगे श्री कुंदकुंददेव का कहना है कि-

‘जीव के लिए ज्ञान सार है और ज्ञान से अधिक सम्यक्त्व सार है’ क्योंकि सम्यक्त्व से ही चारित्र होता है और चारित्र से निर्वाण की प्राप्ति होती है। ज्ञान और चारित्र के होने पर भी यदि सम्यक्त्व नहीं है तो वे सम्यग्ज्ञान सम्यक् चारित्र नहीं कहलाते हैं। ज्ञान और चारित्र में सम्यव्âपना लाने वाला सम्यक्त्व ही है इसीलिए यहां पर सम्यक्त्व को सारभूत प्रधान कहा है। क्योंकि- ‘ज्ञान, दर्शन (श्रद्धान), चारित्र और तप, ये चारों जब सम्यक्त्व से सहित हो जाते हैं तभी चारों के योग से जीव सिद्धि को प्राप्त कर लेता है इसमें कोई संदेह नहीं है।२’, किसी को चौदह महाविद्याओं का ज्ञान है जैसा कि इन्द्रभूति गौतम का था। किसी को श्रद्धान है किन्तु सम्यक् श्रद्धान नहीं है और किसी के पास चारित्र तथा तपश्चरण भी है जैसे कि अभव्य मुनि के होते हैं। इन सबके होने पर भी जब तक सम्यक्त्व नहीं हुआ है तब तक किसी भी जीव को इन चारों का योग मोक्ष की प्राप्ति नहीं करा सकता है इसीलिए यह मानना चाहिए कि सम्यक्त्व गुण सर्व गुणों में सारभूत है, प्रधान है, महान है क्योंकि एक वही गुण इन चारों में समीचीनता लाकर इन चारों को मोक्ष का साधन बना देता है अत: यह बात निश्चित हो जाती है कि सम्यक्त्व से रहित ज्ञान, दर्शन आदि युक्ति के कारण नहीं हैं और सहित भी ये चारों पृथक्-पृथक् एक या दो मिलकर भी मुक्ति के कारण नहीं हैं। कहा भी है-

ज्ञानं पंगौ क्रिया चान्धे नि:श्रद्धे नार्थकृद्वयम्। ततो ज्ञानक्रिया श्रद्धात्रयं तत्पदकारणम्।।

पंगु मनुष्य का ज्ञान, अंधे

मनुष्य की क्रिया और श्रद्धाहीन मनुष्य की दोनों ही वस्तुयें कार्यकारी नहीं हैं इसीलिए ज्ञान, क्रिया और श्रद्धा इन तीनों की एकता ही मोक्ष का कारण है। यहां यह बात महत्त्व की है कि दर्शनपाहुड़ में श्रीकुंदकुंददेव सम्यग्दर्शन को ही सारभूत सिद्ध कर रहे हैं, फिर भी उनका कहना है कि बिना चारों के योग के निर्वाण की प्राप्ति नहीं हो सकती है अत: निष्कर्ष यह निकलता है कि सम्यक्त्व गुण प्रधान होते हुए भी केवल उसी के गीत गाने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी। यथाशक्ति चारित्र को ग्रहण करना ही चाहिए। यदि महाव्रत ग्रहण करना कठिन है तो भी अणुव्रती बनना कठिन नहीं है। यह अणुव्रत तो गार्हस्थ्य जीवन में भी जीवों को सुखी, संपन्न और निराकुल, शांत बनाने वाले हैं। मुनिमुद्रा सदा पूज्य है जो मुनि दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तपोविनय में सदा लीन रहते हैं वे ही वंदनीय हैं। दर्शन, ज्ञान, चारित्र ओर तप के भेद से आराधना के चार भेद होते हैं। जो मुनि इन चारों प्रकार की आराधनाओं में निरंतर लगे रहते हैं और अन्य गुणी मनुष्यों के प्रति किसी प्रकार मात्सर्य भाव न रखते हुए उनके गुणों का वर्णन करते हैं वे मुनि नमस्कार के योग्य हैं। ऐसे दिगम्बर मुनियों के स्वाभाविक नग्नरूप को देखकर जो मनुष्य उन्हें नहीं मानते हैं, उल्टा उनके प्रति द्वेष भाव रखते हैं वे संयम को प्राप्त होकर भी मिथ्यादृष्टि हैं। वास्तव में नग्न दिगम्बर मुद्रा सहजोत्पन्न स्वाभाविक मुद्रा है। उसे देखकर जो पुरुष उसका आदर नहीं करता है, प्रत्युत नग्न मुद्रा में अरुचि करता हुआ यह कहता है कि नग्नत्व में क्या रखा है, क्या पशु नग्न नहीं होते ? साथ ही दूसरों के शुभ कार्य में द्वेष रखता है वह दीक्षा को प्राप्त होने पर भी मिथ्यादृष्टि है। श्रीकुंदकुंद देव का स्पष्टतया यही कहना है कि मुनि का वेष सहजोत्पन्न दिगम्बर मुद्रा ही है। जिन्होंने हिंसा आदि पांच पापों का सर्वथा त्याग कर दिया है, वे म्लेच्छ आदि दुष्ट पुरुषों के उपसर्ग से भयभीत होकर किसी प्रकार के आवरण को स्वीकार नहीं करते हैं क्योंकि उपसर्ग के आने पर उसे सहन करना ही मुनि का कत्र्तव्य है। इसी प्रकार जो शीत आदि परीषह सहन नहीं कर सकते हैं तथा जिनके विकार वासनाओं का शमन नहीं हुआ है वे जैनेश्वरी दीक्षा के पात्र नहीं हैं। उन्हें उत्कृष्ट श्रावक-ऐलक, क्षुल्लक के पद में रहकर संयम को पालन करना चािहए, ऐसा आचार्यों का उपेदश है। इसलिए मुनिपद को ग्रहण कर उसी के अनुरूप चर्या करना उचित है। जो देवों से वंदित तथा शील से सहित तीर्थंकर परमदेव के रूप को धारण करने वाले ऐसे नग्न दिगम्बर मुनियों को देखकर स्वयं गर्विष्ट होते हुए उन्हें नमस्कार नहीं करते हैं वे सम्यक्त्व से रहित मिथ्यादृष्टि हैं। तीर्थंकर भगवान भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक देवों के द्वारा वंदनीय हैं तथा शील और व्रतों से विभूषित हैं। इनके नग्नरूप को देखकर अथवा तीर्थंकर देव की नग्नमुद्रा के धारी मुनियों को देखकर जो जैनाभास अथवा अन्यधर्मी लोग गर्व करते हैं, उनकी उपासना नहीं करते हैं, वे सम्यक्त्वरूपी रत्न को गंवा देते हैं, पुन: दीर्घकाल तक संसाररूपी समुद्र में उन्मज्जन-निमज्जन किया करते हैं। उपासकाध्ययन में भी कहा है-

ये गुरुं नैव मन्यंते तदुपास्ति न कुर्वते। अन्धकारो भवेत्तेषामुदितेपि दिवाकरे।।

जो गुरु को नहीं मानते हैं और उनकी उपासना नहीं करते हैं उनके लिए सूर्योदय होने पर भी अंधकार ही बना रहता है। वास्तव में देखा जाए तो मिथ्यात्व ही घोर अंधकार है और सम्यक्त्व का उदय ही सूर्य का प्रकाश है। जब तक दिगम्बर गुरुओं के प्रति श्रद्धा भक्ति नहीं होती है तब तक मोक्षमार्ग की पहली सीढ़ी जो सम्यग्दर्शन है उसका लाभ भी असंभव ही है। कोई गुरुओं के प्रति द्वेष करता रहे और अपने को सम्यग्दृष्टि कहता रहे यह बात संभव नहीं है क्योंकि निग्र्रन्थ दिगम्बर मुद्रा ही मोक्षमार्ग है ऐसा श्री गौतमस्वामी ने स्वयं कहा है-‘‘इमं णिग्गंथ पवयणं, मोक्खमग्गं।’’ इसलिए दिगम्बर मुनि, गुरु ही सदा वंदनीय हैं। अब जो वंदनीय नहीं हैं श्री कुन्दकुन्ददेव उनके बारे में कहते हैं- ‘‘असंयमी की वंदना नहीं करना चाहिए और जो वस्त्ररहित होकर भी असंयमी है वह भी नमस्कार के योग्य नहीं है। ये दोनों ही समान हैं इनमें एक भी संयमी नहीं है।’’ जो संयम को पालन करते हुए भी असंयत हैं अर्थात् वस्त्र धारण किए हुए हैं वे वंदनीय नहीं हैं। ऐसे ही जो वस्त्र रहित होकर भी संयम से रहित हैं-मात्र वेष को धारण करने वाले हैं उनकी चर्या आगम के विरुद्ध हैं, वे भी नमस्कार के योग्य नहीं हैं। जैनागम में पूज्यता संयम से बतलाई गई है, संयम महाव्रती के ही होता है और महाव्रती निर्ग्रन्थ होने से नग्न ही रहता है। जो साधु महाव्रतरूप संयम को लेकर भी वस्त्र धारण करते हैं, वे गृहस्थ के समान ही असंयमी हैं अत: वे वंदना के योग्य नहीं हैं। इसी प्रकार जो नग्न होकर भी वास्तविक संयम से रहित है, आगम की मर्यादा से बाह्य है, वह भी असंयमी है अत: नमस्कार के योग्य नहीं है। यद्यपि संयमासंयम के धारक ऐलक, क्षुल्लक और ब्रह्मचारी आदि भी गृहस्थ के द्वारा वंदनीय होते हैं तथापि यहां गुरु का प्रकरण होने से उनकी विवक्षा नहीं की गई है। यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि पंचमगुणस्थानवर्ती श्रावक अपने पद के अनुसार जो व्रत ग्रहण करते हैं उनका वे ठीक तरह से पालन करते हैं अत: वस्त्र सहित होने पर भी उसे असंयमी नहीं कहा जाता है किन्तु संयमासंयमी नहीं कहा जाता है पर जो पंच महाव्रत का नियम लेकर भी वस्त्र धारण करते हैं वे अपने गृहीत संयम से च्युत होने के कारण असंयमी कहे जाते हैं। इस गाथा में श्रीकुन्दकुन्द स्वामी ने द्रव्य संयम और भावसंयम दोनों को उपादेय बतलाया है। अपनी मान्यता के अनुसार संयम के धारक होने पर भी जो सवस्त्र हैं उनके द्रव्यसंयम भी नहीं हैं वे अवंदनीय हैं। साथ ही वस्त्र रहित होने से जो द्रव्य संयम के धारक हैं किन्तु यदि उनके भाव संयम नहीं हैं तो वे भी वंदनीय नहीं हैं क्योंकि मोक्ष प्राप्ति के लिए द्रव्य शुद्धि और भावशुद्धि दोनों ही आवश्यक हैं। यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि यदि किसी मुनि का द्रव्यसंयम निर्दोष है और भाव संयम नहीं है उसकी परीक्षा हम और आपको कर सकना असंभव है अत: यह विषय अवधिज्ञानी मुनि और केवली भगवान के ही गम्य है अत: द्रव्यसंयम को देखकर द्रव्य वेषधारी मुनि को नमस्कार करना, उन्हें आहारदान देना श्रावकों का कत्र्तव्य है। उदाहरण के लिए संघ में रहते हुए पुष्पडाल मुनि द्रव्यसंयमी थे भावसंयमी नहीं थे किन्तु श्रावकों द्वारा उन्हें नमस्कार किया जाना, आहार दिया जाना चालू था बल्कि संघस्थ मुनियों में भी वंदना, प्रतिवंदना चालू थी। हां, जैसे अभव्यसेन मुनि की चर्या में सदोषता देख कर क्षुल्लक ने उन्हें नमस्कार नहीं किया अत: नमस्कार करने न करने में बाह्य चर्या ही द्रष्टव्य है न कि अंत:परिणाम।

आगे श्री कुन्दकुन्ददेव स्वयं कहते हैं-

न शरीर की वंदना की जाती है, न कुल की वंदना की जाती है, और न जातियुक्त मनुष्य की वंदना की जाती है। किस गुणहीन की वंदना करूं ? क्योंकि गुणहीन मनुष्य न मुनि हैं और न श्रावक ही हैं। वास्तव में न तो किसी के शरीर की पूजा होती है, न कुल-पितृपक्ष की पूजा होती है, और न जाति-मातृपक्ष ही पूजा जाता है किन्तु संयमगुण की पूजा की जाती है। जिसमें संयम नहीं है वह सुन्दर, स्वस्थ शरीर, उच्च कुल और उच्च जाति वाला होकर भी अपूजनीय ही रहता है। कुन्दकुन्दस्वामी कहते हैं कि मैं किसी भी गुणहीन की वंदना नहीं कर सकता हूँ क्योंकि संयमगुण से भ्रष्ट पुरुष न मुनि ही हैं और न श्रावक ही हैं। तात्पर्य यही है कि गुणवान मुनि ही वंदनीय हैं। पुन: आचार्य कहते हैं- मैं उन मुनियों को नमस्कार करता हूँ जो तप से सहित हैं। साथ ही उनके शील को, गुण को, ब्रह्मचर्य को और मुक्ति प्राप्ति को भी सम्यक्त्व तथा शुद्ध भाव से वंदना करता हूँ। अनशन, अवमौदर्य आदि के भेद से तप के बारह भेद हैं। शील के अठारह हजार भेद होते हैं। गुणों के चौरासी लाख भेद हैं और ब्रह्मचर्य नव बाढ़ की अपेक्षा नौ प्रकार का है। जो तप, शील, गुण और ब्रह्मचर्य से संपन्न है, श्री कुन्दकुन्ददेव ने यहाँ पर उन मुनियों को नमस्कार किया है। ऐसे मुनि ही अपनी साधना से कर्म, नोकर्म और भावकर्म से रहित स्वस्वरूप की उपलब्धिरूप सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं। यह स्व स्वरूपोपलब्धि ही जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य है। इसी को आचार्यदेव ने श्रद्धापूर्वक शुद्ध भाव से नमस्कार किया है। इन महामुनियों के गुणों का स्मरण करने से, उन्हें नमस्कार करने से वे महान गुण अपनी आत्मा में प्रकट होते हैं। यही कारण है कि आचार्य कुन्दकुन्द देव भी ऐसे महर्षियों को ‘‘वंदामि’’ आदि शब्दों के द्वारा भावभक्ति पूर्वक नमस्कार करते हैं। आज के इस निकृष्ट काल में भी उनके प्रतीक नग्न दिगम्बर मुनि विचरण कर रहे हैं। ये निर्दोष महाव्रत को पालने वाले महामुनि तीन लोक में वंद्य हैं, मोक्षमार्ग के सच्चे पथिक हैं, प्रत्येक श्रावक को उनकी भक्ति, पूजा, उपासना करनी ही चाहिए।

जिनेन्द्रदेव का वैभव

‘‘भव्य जीव कल्याणकों के समूह के साथ-साथ सम्यक्त्व को निर्दोष कर लेते हैं पुन: यह सम्यग्दर्शन- रूप रत्न सुर-असुरों से सहित इस संसार में सबके द्वारा पूजा जाता है।’’ गर्भावतार, जन्म, तप, ज्ञान और निर्वाण ये पांच कल्याणक हैं। जो भव्य अपने सम्यक्त्व को निरतिचार-निर्दोष बना लेते हैं उनको ही गर्भावतार आदि पांच कल्याणकों की प्राप्ति होती है। ये कल्याणक तीर्थंकर परमदेव के ही होते हैं। तात्पर्य यह है कि जब जीव सम्यग्दृष्टि होते हैं तभी तीर्थंकर परमदेव होते हैं। तीर्थंकर प्रकृति का बंध करने के लिए दर्शनविशुद्धि का होना अत्यन्त आवश्यक है। देव और दानवों से युक्त इस संसार में यह सम्यग्दर्शन सबके द्वारा पूजा जाता है। यह सम्यग्दर्शन अनघ्र्य रत्न है अत: इसका मूल्य करने कोई भी समर्थ नहीं है। सचमुच में जो सम्यक्त्वरूपी रत्न तीन लोक का स्वामी बनाने में समर्थ है भला उसकी कीमत क्या कोई आंक सकता है। जो उत्तम गोत्र से सहित मनुष्य अपने मानव जन्म को अत्यन्त दुर्लभ समझकर सम्यक्त्वरूपी रत्न को ग्रहण कर लेता है वह अविनाशी तथा मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। जिस प्रकार हाथ से छूटकर महासमुद्र में गिरा हुआ रत्न पाना अत्यन्त दुर्लभ हो जाता है उसी प्रकार उत्तम गोत्र से युक्त मनुष्य जन्म का पाना अत्यन्त दुर्लभ है। इस तरह अनेक दृष्टांतों के द्वारा मनुष्य जन्म की दुर्लभता को विचार करके जो भव्य जीव सम्यक्त्वरूपी महारत्न को प्राप्त कर लेता है वह निज शुद्ध, बुद्ध, सर्वज्ञ, वीतराग स्वभाव से युक्त परमात्मा का श्रद्धान करता है, उसी शुद्ध, बुद्ध परमात्मा का ज्ञान करता है और उसी में तन्मयता को प्राप्त होकर निश्चय चारित्र को प्राप्त करता है अर्थात् निश्चय रत्नत्रय रूप अभेद निर्विकल्प ध्यान में लीन हो जाता है वही अपनी आत्मा से उत्पन्न परमानन्द लक्षण परमसुख को प्राप्त कर लेता है। उसी के घातिया कर्मों का अभाव हो जाने से केवलज्ञान प्रगट हो जाता है और उसी भव्यात्मा के द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म से रहित, ऊध्र्वगमन लक्षण से संयुक्त निर्वाण की प्राप्ति होती है। ऐसे तीर्थंकर महापुरुष ही धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति करते हैं। एक हजार आठ शुभ लक्षणों से युक्त तथा चौंतीस अतिशयों से सहित तीर्थंकर भगवान जब तक यहां विहार करते हैं तब तक उनको स्थावर प्रतिमा कहा गया है।१ तीर्थंकर परमदेव श्रीवृक्ष आदि १०८ लक्षणों से तथा तिल, मसा आदि ९०० व्यंजनों से सहित होते हैं। जन्म के १०, केवलज्ञान के १० और देवकृत १४ ऐसे चौंतीस अतिशयों से संयुक्त होते हैं। इन सबसे युक्त तीर्थंकर जिनेन्द्रदेव जब तक आर्यखण्ड में भव्य जीवों को संबोधते हुए विहार करते रहते हैं तब तक उन्हें स्थावर प्रतिमा कहा जाता है। और जब वे समस्त कर्मों का क्षय करके एक समय में सिद्धशिला की ओर अग्रसर होते हैं तब उन्हें जंगम प्रतिमा कहते हैं। प्रतिमा, प्रतियातना, प्रतिबिम्ब, प्रतिच्छाया और प्रतिकृति ये सब प्रतिमा के पर्यायवाची नाम हैं। व्यवहारनय की अपेक्षा से चंदन, सुवर्ण, महामणि, स्फटिक, पाषाण, धातु आदि से निर्मित प्रतिमा को ‘‘स्थावर प्रतिमा’’ कहते हैं और समवशरण में विराजमान, विहार करने वाले तीर्थंकर परमदेव के शरीर को ‘‘जंगम प्रतिमा’’ कहते हैं। तीर्थंकर भगवान के शरीर में १००८ लक्षण कौन कौन से हैं। सो ही बतलाते हैं- ‘‘श्रीवृक्ष, हाथ पैरों में शंख, कमल, स्वस्तिक, अंकुश, तोरण, चामर, श्वेतछत्र, सिंहासन, ध्वज, दो मछली, दो कलश, कछुआ, चक्र, समुद्र, सरोवर, विमान, भवन, हाथी, स्त्री, पुरुष, सिंह, धनुष, बाण, मेरु, इन्द्र, पर्वत, नदी, पुर, गोपुर, चंद्र, सूर्य, उत्तम, अश्व, व्यजन, बाँसुरी, वीणा, मृदंग, दो पुष्प मालायें, रेशमी वस्त्र, बाजार, कुन्डल आदि सोलह आभूषण, फलों से युक्त उपवन, अच्छी तरह पका हुआ धान का खेत, रत्नद्वीप, वज्र, पृथ्वी, लक्ष्मी, सरस्वती, कामधेनु, बैल, चूड़ामणि, महानिधि, कल्पबेल, सुवर्ण, जंबूवृक्ष, गरुड़ नक्षत्र, तारे, राजभवन, ग्रह, सिद्धार्थ वृक्ष, आठ प्रातिहार्य तथा आठ मंगलद्रव्य आदि इन्हें लेकर १०८ लक्षण होते हैं और तिल, मसा आदि ९०० व्यंजन होते हैं। ये सब मिलाकर १००८ लक्षण कहलाते हैं।२ आठ प्रातिहार्य के नाम-अशोक वृक्ष, पुष्पवृष्टि, दिव्यध्वनि, चामर, सिंहासन, भामण्डल, दुंदुभि और छत्रत्रय, जिनेन्द्रदेव के आठ प्रातिहार्य माने गये हैं।’’ आठ मंगल द्रव्यों के नाम-सुवर्ण झारी, तालपत्र, सुवर्ण कलश, पताका, सुप्रीतिका (ठोना), सपेâद छत्र, दर्पण और चंवर ये आठ मंगलद्रव्य हैं। जिनेन्द्रदेव का वैभव-तीर्थंकरों में जन्म से लेकर देशना हेतु विहार पर्यन्त जो विशेषताएं पाई जाती हैं उन्हें अतिशय कहते हैं। वे चौंतीस हैं- तीर्थंकर महापुरुष के जन्म लेते ही दश अतिशय प्रगट हो जाते हैं। उनके शरीर में पसीना नहीं आता है, मल-मूत्र नहीं होता है, दूध के समान सपेâद रुधिर होता है, उनका समचतुरस्र संस्थान होता है, वज्रवृषभनाराच संहनन होता है, अतिशय सुन्दर रूप होता है, उनके शरीर से अतीव सुगंधि आती है। उनके शरीर में १००८ लक्षण होते हैं, अतुल्य बल वीर्य होता है और वे सबसे प्रिय तथा हितकारी वचन बोलते हैं।

जब उन्हें केवलज्ञान प्रगट होता है

तब दश अतिशय प्रगट हो जाते हैं। जहां भगवान का समवशरण रहता है वहां से चार सौ कोश तक सुभिक्ष रहता है, भगवान का आकाश में अधर गमन होता है, किसी भी प्राणी का वध नहीं होता है, तीर्थंकर केवली कवलाहार नहीं करते हैं, उन पर उपसर्ग नहीं होता है, चारों दिशाओं में उनका मुख दिखता है, वे सब विद्याओं के स्वामी होते हैं, उनकी छाया नहीं पड़ती है, नेत्रों की पलवेंâ नहीं झपकती हैं तथा उनके नख और केश भी नहीं बढ़ते हैं। तभी केवली भगवान के देवकृत १४ अतिशय प्रगट हो जाते हैं। भगवान की सर्वार्ध मागधी भाषा होती है। इसका अभिप्राय यह है कि दिव्यध्वनि का अर्धभाग तो भगवान की भाषा है जो मगध देश की भाषा स्वरूप होता है और आधा भाग समस्त भाषाओं का रहता है इसलिए उनकी भाषा को सर्वार्धमागधी भाषा कहते हैं। भाषा में उस प्रकार का परिणमन मगध देशों के सन्निधान में होता है। इसलिए उसमें देवोपुनीत-देवकृतपना घटित होता है। दूसरे अतिशय में भगवान को केवलज्ञान होने पर सर्व जनता में आपस में मैत्रीभाव हो जाता है, तीसरे में सब ऋतुओं के फल और पूâल एक साथ आ जाते हैं। चतुर्थ अतिशय में पृथ्वी दर्पण के समान रत्नमयी हो जाती है, पांचवे अतिशय में मंद सुगंध वायु अनुवूâल दिशा से चलने लगती है, छठे अतिशय में सब लोगों को परम आनंद होता है, सातवें में मंद सुगंध वायु आगे-आगे एक योजन तक भूमि को साफ करती हुई धूलि कंटक आदि को दूर कर देती है, आठवें में मेघकुमार देव सुगंधियुक्त जल की वर्षा करते हैं, नौवें अतिशय में सुवर्ण की कलिकाओं और पद्मराग मणिमय केसर से सुशोभित एक योजन विस्तार वाला कमल होता है ऐसे ही चौदह कमल और होते हैं अर्थात् एक कमल भगवान के चरण के नीचे और सात-सात कमल आगे-पीछे होते हैं। इस तरह पन्द्रह-पन्द्रह कमलों की पन्द्रह पंक्तियां रहती हैं। दशवें अतिशय में पृथ्वी पर अठारह प्रकार के धान्य उत्पन्न हो जाते हैं अर्थात् सर्वत्र हरी-भरी खेती लहलहाने लगती है। ग्यारहवें अतिशय में दिशायें और आकाश धूली, धूमिका तथा दिग्दाह आदि दोषों से रहित हो जाती हैं। बारहवें अतिशय में ज्योतिष्क, व्यंतर तथा भवनवासी देव सौधर्मेन्द्र की आज्ञा से सब देवों का आह्वान करते हैं, तेरहवें अतिशय में भगवान के आगे-आगे आकाश में धर्मचक्र चलता है और चौदहवें अतिशय में अष्टमंगल द्रव्य रहते हैं। सुवर्ण की झारी, तालपत्र, सुवर्णकलश, पताका, सुप्रीतिका, सपेâद छत्र, दर्पण और चमर ये आठ मंगल द्रव्य हैं, प्रत्येक मंगल द्रव्य एक सौ आठ-एक सौ आठ रहते हैं। इस प्रकार ये चौदह अतिशय देवोपुनीत कहलाते हैं। तीर्थंकर भगवान के ये चौंतीस अतिशय होते हैं, आठ महाप्रातिहार्य होते हैं। अशोक वृक्ष का होना, देवों द्वारा पुष्पवृष्टि का किया जाना, तीनों संध्याकालों में छह-छह घटिका पर्यन्त दिव्यध्वनि का खिरना, चौंसठ चामरों का ढुराया जाना, रत्नमयी सिंहासन का होना, भामंडल का होना, साढ़े बारह करोड़ प्रकार के दुन्दुभि बाजों का बजाया जाना और तीन छत्र का होना ये प्रातिहार्य कहलाते हैं।

ऐसे ही अर्हन्त भगवान के चार अनंत चतुष्टय होते हैं,

जिनके नाम हैं-अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतसुख और अनंतवीर्य। इस प्रकार से ३४ अतिशय, ८ प्रातिहार्य और ४ अनंतचतुष्टय मिला कर ४६ गुण अर्हन्त परमेष्ठी के होते हैं। जो भव्यजीव निर्मल सम्यग्दर्शन को धारण करते हैं वे ही पंचकल्याणक से सुशोभित ऐसे उत्तम अर्हन्त जिनेन्द्रदेव के वैभव को प्राप्त कर लेते हैं। बारह प्रकार के तप से युक्त मुनि चारित्र के बल से अपने कर्मों का क्षय करके पद्मासन और कायोत्सर्ग इन दो प्रकार के व्युत्सर्गों से शरीर का त्याग करते हुए सर्वोत्कृष्ट निर्वाण को प्राप्त हुए हैं। जो मुनि सम्यग्दर्शन से सहित हैं वे ही बारह प्रकार के तपों का अनुष्ठान करके अपने कर्मों की निर्जरा कर सकते हैं और वे ही तपश्चरण के अंतिम भेदरूप शुक्लध्यान के बल से यथाख्यातचारित्र को प्राप्त कर सकते हैं। पुन: वे ही पद्मासन या खड्गासन मुद्रा में स्थित होकर योगों का निरोध करके संपूर्ण कर्मों का क्षय कर निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं। आज तक जितने भी महापुरुष इस प्रकार से निर्वाण को प्राप्त हुए हैं, वर्तमान में भी अन्य-विदेहक्षेत्रों से निर्वाण प्राप्त कर रहे हैं और जो भी भविष्यकाल मेें निर्वाण प्राप्त करेंगे, यह सब सम्यग्दर्शन का प्रभाव ही समझना चाहिए क्योंकि बिना सम्यग्दर्शन के तीन काल में निर्वाण की प्राप्ति असंभव है। यहां यह बात भी ध्यान में रखने की है कि दिगम्बर जैन संप्रदाय के अनुसार पद्मासन या खड्गासन मुद्रा से ही केवलज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है अन्य आसनों से नहीं। हां, अन्य कुक्कुटासन, मकरासन आदि आसनों से जो ध्यान करने का उपदेश आगम में मिलता है, उसे धर्मध्यान का ही अभ्यास समझना चाहिए।

इस दर्शनपाहुड़१ में श्री कुन्दकुन्द देव ने सम्यग्दर्शन का वर्णन करते हुए संक्षेप से उसके माहात्म्य का वर्णन किया है। श्री श्रुतसागर सूरि ने इसकी टीका करते हुए बहुत कुछ विस्तार किया है जो कि प्रत्येक भव्य जीवों के लिए पठनीय और मननीय है।