ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सूर्य- चन्द्र के विमानों में स्थित जिनमंदिर का वर्णन

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सूर्य, चन्द्र के विमानों में स्थित जिनमंदिर का वर्णन

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सभी ज्योतिर्देवों के विमानों में बीचोंबीच में एक-एक जिनमंदिर है और चारों ओर ज्योतिर्वासी देवों के निवास स्थान बने हैं।

विशेष —प्रत्येक विमान की तटवेदी चार गोपुरों से युक्त है। उसके बीच में उत्तम वेदी सहित राजांगण है। राजांगण के ठीक बीच में रत्नमय दिव्य कूट है। उस कूट पर वेदी एवं चार तोरण द्वारों से युक्त जिन चैत्यालय (मंदिर) हैं। वे जिनमंदिर मोती एवं सुवर्ण की मालाओं से रमणीय और उत्तम वङ्कामय किवाड़ों से संयुक्त दिव्य चन्द्रोपकों से सुशोभित हैं। वे जिन भवन देदीप्यमान रत्नदीपकों से सहित अष्ट महामंगल द्रव्यों से परिपूर्ण वंदनमाला, चमर, क्षुद्र घंटिकाओं के समूह से शोभायमान हैं। उन जिन भवनों में स्थान-स्थान पर विचित्र रत्नों से निर्मित नाट्य सभा, अभिषेक सभा एवं विविध प्रकार की क्रीड़ाशालायें बनी हुई हैं।

वे जिन भवन समुद्र के सदृश गंभीर शब्द करने वाले मर्दल, मृदंग, पटह आदि विविध प्रकार के दिव्य वादित्रों से नित्य शब्दायमान हैं। उन जिन भवनों में तीन छत्र, िंसहासन, भामण्डल और चामरों से युक्त जिन प्रतिमायें विराजमान हैं।

उन जिनेन्द्र प्रासादों में श्री देवी व श्रुतदेवी यक्षी एवं सर्वाण्ह व सानत्कुमार यक्षों की मूर्तियाँ भगवान के आजू-बाजू में शोभायमान होती हैं। सब देव गाढ़ भक्ति से जल, चंदन, तंदुल, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप और फलों से परिपूर्ण नित्य ही उनकी पूजा करते हैं।

चन्द्र के भवनों का वर्णन

इन जिन भवनों के चारों ओर समचतुष्कोण लम्बे और नाना प्रकार के विन्यास से रमणीय चन्द्र के प्रासाद होते हैं। इनमें कितने ही प्रासाद मकत वर्ण के, कितने ही कुंद पुष्प, चन्द्र, हार जैसे वर्ण वाले, कोई सुवर्ण सदृश वर्ण वाले व कोई मूंगा जैसे वर्ण वाले हैं। इन भवनों में उपपाद मंदिर, स्नानगृह, भूषणगृह, मैथुनशाला, क्रीड़ाशाला, मंत्रशाला एवं आस्थान शालायें (सभा भवन) स्थित हैं। वे सब प्रासाद उत्तम परकोटों से सहित, विचित्र गोपुरों से संयुक्त, मणिमय तोरणों से रमणीय, विविध चित्रमयी दीवालों से युक्त, विचित्र-विचित्र उपवन वापिकाओं से शोभायमान , सुवर्णमय विशाल खंभों से सहित और शयनासन आदि से परिपूर्ण हैं। वे दिव्य प्रासाद धूप की गंध से व्याप्त होते हुये अनुपम एवं शुद्ध रूप, रस, गंध और स्पर्श से विविध प्रकार के सुखों को देते हैं।

तथा इन भवनों में कूटों से विभूषित और प्रकाशमान रत्नकिरण-पंक्ति से संयुक्त ७-८ आदि भूमियाँ (मंजिल) शोभायमान होती है। इन चन्द्र भवनों में सिंहासन पर चन्द्र देव रहते हैं। एक चन्द्र देव की ४ अग्रमहिषी (प्रधान देवियाँ) होती हैं। चन्द्राभा, सुसीमा, प्रभंकरा, अर्चिमालिनी—इन प्रत्येक देवी के ४-४ हजार परिवार देवियाँ हैं। अग्र देवियाँ विक्रिया से ४-४ हजार प्रमाण रूप बना सकती हैं। एक-एक चन्द्र के परिवार देव-प्रतीन्द्र (सूर्य), सामानिक, तनुरक्ष, तीनों परिषद्, सात अनीक, प्रकीर्णक, आभियोग्य और किल्विषक, इस प्रकार ८ भेद हैं। इनमें प्रतीन्द्र १ तथा सामानिक आदि संख्यात प्रमाण देव होते हैं। ये देवगण भगवान के कल्याणकों में आया करते हैं। राजांगण के बाहर विविध प्रकार के उत्तम रत्नों से रचित और विचित्र विन्यास रूप विभूति से सहित परिवार देवों के प्रासाद होते हैं।

इन देवों की आयु का प्रमाण

चन्द्रदेव की उत्कृष्ट आयु — १ पल्य और १ लाख वर्ष की है। सूर्यदेव की उत्कृष्ट आयु — १ पल्य और १ हजार वर्ष की है। शुक्रदेव की उत्कृष्ट आयु — १ पल्य और १०० वर्ष की है। वृहस्पतिदेव की उत्कृष्ट आयु — १ पल्य की है। बुध, मंगल आदि की उत्कृष्ट आयु — आधा पल्य की है। देवों की तथा ताराओं की उत्कृष्ट आयु — चौथाई पल्य की है। तथा ज्योतिष्क देवांगनाओं की आयु अपने-अपने पति की आयु से आधा प्रमाण होती है।

सूर्य के बिम्ब का वर्णन

सूर्य के विमान ३१४७ मील के हैं एवं इससे आधे मोटाई लिये हैं तथा अन्य वर्णन उपर्युक्त प्रकार से चन्द्र के विमानों के सदृश ही है। सूर्य की देवियों के नाम—द्युतिश्रुति, प्रभंकरा, सूर्यप्रभा, अर्चिमालिनी ये चार अग्रमहिषी हैं। इन एक-एक देवियों के चार-चार हजार परिवार देवियाँ हैं एवं एक-एक अग्रमहिषी विक्रिया से चार-चार हजार प्रमाण रूप बना सकती हैं।

बुध आदि ग्रहों का वर्णन

बुध के विमान स्वर्णमय चमकीले हैं। शीतल एवं मंद किरणों से युक्त हैं। कुछ कम ५०० मील के विस्तार वाले हैं तथा उससे आधे मोटाई वाले हैं। पूर्वोक्त चन्द्र, सूर्य विमानों के सदृश ही इनके विमानों में भी जिन मंदिर, वेदी, प्रासाद आदि रचनायें हैं। देवी एवं परिवार देव आदि तथा वैभव उनसे कम अर्थात् अपने-अपने अनुरूप हैं। २-२ हजार आभियोग्य जाति के देव इन विमानों को ढोते हैं।

शुक्र के विमान उत्तम चांदी से निर्मित २५०० किरणों से युक्त हैं। विमान का विस्तार १००० मील का एवं बाहल्य (मोटाई) ५०० मील की है। अन्य सभी वर्णन पूर्वोक्त प्रकार ही है। वृहस्पति के विमान स्फटिक मणि से निर्मित सुन्दर मंद किरणों से युक्त कुछ कम १००० मील विस्तृत एवं इससे आधे मोटाई वाले हैं। देवी एवं परिवार आदि का वर्णन अपने-अपने अनुरूप तथा बाकी मंदिर, प्रासाद आदि का वर्णन पूर्वोक्त ही है।

मंगल के विमान पद्मराग मणि से निर्मित लाल वर्ण वाले हैं। मंद किरणों से युक्त ५०० मील विस्तृत, २५० मील बाहल्ययुक्त हैं। अन्य वर्णन पूर्ववत् है। शनि के विमान स्वर्णमय, ५०० मील विस्तृत एवं २५० मील मोटे हैं। अन्य वर्णन पूर्ववत् है। नक्षत्रों के नगर विविध-विविध रत्नों से निर्मित रमणीय मंद किरणों से युक्त हैं। १००० मील विस्तृत व ५०० मील मोटे हैं। ४-४ हजार वाहन जाति के देव इनके विमानों को ढोते हैं। शेष वर्णन पूर्ववत् है।

ताराओं के विमान उत्तम-उत्तम रत्नों से निर्मित, मंद-मंद किरणों से युक्त १००० मील विस्तृत, ५०० मील मोटाई वाले हैं। इनके सबसे छोटे से छोटे विमान २५० मील विस्तृत एवं इससे आधे बाहल्य वाले हैं।

सूर्य का गमन क्षेत्र

पहले यह बताया जा चुका है कि जम्बूद्वीप १ लाख योजन (१००००० ² ४००० · ४०००००००० मील) व्यास वाला है एवं वलयाकार (गोलाकार) है। सूर्य का गमन क्षेत्र पृथ्वी तल से ८०० योजन (८०० ² ४००० · ३२००००० मील) ऊपर जाकर है। वह इस जम्बूद्वीप के भीतर १८० योजन एवं लवण समुद्र में ३३० योजन है अर्थात् समस्त गमन क्षेत्र ५१० योजन या २०४३१४७ मील है। इतने प्रमाण गमन क्षेत्र में १८४ गलियाँ हैं। इन गलियों में सूर्य क्रमश: एक-एक गली में संचार करते हैं। इस प्रकार जम्बूद्वीप में दो सूर्य तथा दो चन्द्रमा हैं। इस ५१० योजन के गमन क्षेत्र में सूर्य बिम्ब की एक-एक गली योजन प्रमाण वाली है। एक गली से दूसरी गली का अन्तराल २-२ योजन का है। अत: १८४ गलियों का प्रमाण ² १८४ · १४४ योजन हुआ। इस प्रमाण को ५१० योजन गमन क्षेत्र में से घटाने पर ५१० — १४४ · ३६६ योजन कुल गलियों का अंतराल क्षेत्र रहा। ३६६ योजन में एक कम गलियों का अर्थात् गलियों के अन्तर १८३ हैं उसका भाग देने से गलियों के अन्तर का प्रमाण ३६६ ´ १८३ · २ योजन (८००० मील) का आता है। इस अन्तर में सूर्य की १ गली का प्रमाण योजन को मिलाने से सूर्य के प्रतिदिन के गमन क्षेत्र का प्रमाण २ योजन (१११४७ मील) का हो जाता है। इन गलियों में एक-एक गली में दोनों सूर्य आमने-सामने रहते हुये एक दिन रात्रि (३० मुहूर्त) में एक गली के भ्रमण को पूरा करते हैं।

दोनों सूर्यों का आपस में अंतराल का प्रमाण

जब दोनों सूर्य अभयंतर गली में रहते हैं तब आमने-सामने रहने से पहले सूर्य से दूसरे सूर्य का आपस में अन्तर ९९६४० योजन (३९८४६०००० मील) का रहता है एवं प्रथम गली में स्थित सूर्य का मेरू से अन्तर ४४८२० योजन (१७९२८०००० मील) का रहता है। अर्थात् १ लाख योजन प्रमाण वाले जम्बूद्वीप में से जम्बूद्वीप सम्बन्धी, दोनों तरफ के सूर्य के गमन क्षेत्र को घटाने से १००००० — १८० ² २ · ९९६४० योजन आता है तथा इसमें मेरू पर्वत का विस्तार घटाकर शेष को आधा करने से मेरू से प्रथम वीथी में स्थित सूर्य का अन्तर निकलता है। · ४४८२० योजन (१७९२८०००० मील) का होता है।

सूर्य की अभ्यंतर गली की परिधि का प्रमाण

अभ्यन्तर (प्रथम) गली की परिधि१ का प्रमाण ३१५०८९ योजन (१२६०३५६००० मील) है। इस परिधि का चक्कर (भ्रमण) २ सूर्य १ दिन-रात में लगाते हैं। अर्थात् जब १ सूर्य भरत क्षेत्र में रहता है तब दूसरा सूर्य ठीक सामने ऐरावत क्षेत्र में रहता है। जब १ सूर्य पूर्व विदेह में रहता है, तब दूसरा पश्चिम विदेह में रहता है। इस प्रकार उपर्युक्त अंतर से (९९६४० योजन) गमन करते हुये आधी परिधि को १ सूर्य एवं आधी को दूसरा सूर्य अर्थात् दोनों मिलकर ३० मुहूर्त (२४ घण्टे) में १ परिधि को पूर्ण करते हैं। पहली गली से दूसरी गली की परिधि का प्रमाण १७ योजन (४३००००० मील) अधिक है। अर्थात् ३१५०८९ ± १७· ३१५१०६योजन होता है। इसी प्रकार आगे-आगे की वीथियों में क्रमश: १७ योजन अधिक-अधिक होता गया है। यथा—३१५१०६± १७योजन · ३१५१२४योजन प्रमाण तीसरी गली की परिधि है। इसी प्रकार बढ़ते-बढ़ते मध्य की ९२वीं गली की परिधि का प्रमाण—३१६७०२ योजन (१२६६८०८००० मील) है। तथैव आगे वृिंद्धगत होते हुये अंतिम बाह्य गली की परिधि का प्रमाण—३१८३१४ योजन (१२७३२५६००० मील) है।