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हस्तलिखित ग्रन्थ संरक्षण:आधुनिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में

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हस्तलिखित ग्रन्थ संरक्षण:आधुनिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में

सतेन्द्र कुमार जैन
शोधछात्र,जैन अनुशीलन केंद्र,राजस्थान विश्वविद्यालय- जयपुर (राज०)

सारांश

प्राचीन ऋषियों, मुनियों द्वारा रचित ग्रंथ ज्ञान के अजस्र स्रोत हैं। विभिन्न शास्त्र भण्डारों में संरक्षित इन पांडुलिपियों की सुरक्षा वर्तमान की आवश्यकता है। प्रस्तुत आलेख में पांडुलिपि संरक्षण की विभिन्न रीतियों, अनुवाद, प्रकाशन भौतिक एवं रसायनिक संरक्षण, उनकी उपादेयता, सावधानियाँ, सीमायें आदि वर्णित हैं।

प्राचीन समय से ज्ञान की धारा अविरल रूप से प्रवाहित हो रही है। पूर्व भगवन्तों ने इसी ज्ञान को बढ़ाने के लिये अपना सम्पूर्ण जीवन साधना में व्यतीत कर दिया। भगवान् आदिनाथ से भगवान् महावीर तक यह ज्ञान व्याख्यान शैली में प्रसारित होता रहा, परन्तु भगवान् महावीर और उनकी शिष्य परम्परा में जम्बूस्वामी के बाद इस ज्ञान की कमी देखी गई। धीरे-धीरे यह श्रुत परम्परा लुप्त प्राय: होने लगी इसीलिए जिन आचार्यों के पास जितना श्रुत था। उन्होंने अपने शिष्यों को वह ज्ञान दिया, परन्तु काल के प्रभाव से उन मुनिराजों के मानस पटल पर वह ज्ञान स्थिर नहीं रह सका फलस्वरूप मुनि संघों ने इस ज्ञान को लिपिबद्ध करने का निर्णय लिया, जो अभूर्तपूर्व निर्णय साबित हुआ। इसी निर्णय के परिणाम स्वरूप हस्तलिखित ग्रन्थों का आविर्भाव हुआ तथा मुनि संघों ने इस ज्ञान को संरक्षित करने का पूरा प्रयत्न किया।

जैन आचार्यों ने जो ज्ञान मानव जीवन को समर्पित किया, वह जीवन भर की कठोर साधना का प्रतिफल है।जिन्हें हस्तलिखित ग्रन्थों के नाम से जाना जाता है।दिगम्बर जैन आगमों में सबसे प्रचीन ग्रन्थ आचार्य गुणधर द्वारा रचित कषायपाहुड है जिसे पेज्जदोसपाहुड भी कहा जाता है। इसके पश्चात् आचार्य भूतबलि एवं आचार्य पुष्पदन्त के द्वारा रचित षट्खण्डगम ग्रन्थ उपलब्ध होता है जो कर्नाटक के मूडबिद्री स्थान में सुरक्षित है इनका कन्नड़ अनुवाद कार्य श्रवणबेलगोला के राष्ट्रीय प्राकृत अध्ययन एवं संशोधन संस्थान में कार्यान्वित है। संभवहै कि पहले कषायपाहुड ग्रन्थ से भी प्रचीन ग्रन्थ उपलब्ध हो, परन्तु मुगलकालीन साम्प्रदायिक द्वेष के कारण हमारे आचार्यों के अथव् परिश्रम को आग में समाप्त कर दिया गया हो तथा कुछ इस प्रकार के शास्त्र आज भी प्राचीन ग्रन्थालयों में काल कवलित किये जा रहे हो जिनकी ओर हमारी समाज का ध्यान ही नहीं जा रहा है। जिस प्रकार प्राचीन समय में ग्रन्थ का संरक्षण होता था। उसी प्रकार आधुनिक समय में भी ग्रन्थ का संवक्षण कर कसते हैं। परन्तु इस प्रकार का संरक्षण दीर्धकालीन नहीं कहा जा सकता क्योंकि हस्तलिखित ग्रंथों का काल निर्धारित है वह कभी न कभी काल कवलित होगी। इसके संरक्षण के लिये मार्ग हैं।

१. हस्तलिखित ग्रन्थों का संपादन करके उनका दीर्घकालीन संरक्षण करना।

२. हस्तलिखित ग्रंथों को वैज्ञानिक विधि से रसायन द्वारा संरक्षित करना।

प्रथम मार्ग के द्वारा हस्तलिखित ग्रंथो का सम्पादन कार्य करने से वह पाठकगणों के दृष्टिगोचर होगें तथा उससे पाठकगण उनका प्रकाशन बार-बार कराकर उसका संरक्षण करते रहेंगे। हस्तलिखित ग्रन्थ संपादन के अन्तर्गत सर्वेक्षण, सूचीकरण,सम्पादन, अनुवाद, आदि अनेक कार्य सम्मिलित हो गये हैं। अत: हस्तलिखित ग्रन्थ के सम्पादन के लिये भाषा, लिपि, व्याकरण और संस्कृति के ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान की भी जानकारी आवश्यक हो गई है हस्तलिखित ग्रंथ सम्पादन में व्यवस्थित सिद्धांतों का अनुसरण करना पडता है। क्योंकि हस्तलिखित ग्रन्थ का सम्पादन कार्य पाण्डुलिपि विज्ञान के अन्तर्गत आता है। हस्तलिखित पाण्डुलिपियों के संरक्षण के लिये सर्वप्रथम हमें पाण्डुलिपियों की खोज करनी पड़ती है। उसके लिए सर्वेक्षण के द्वारा हमें पाण्डुलिपियों के सम्पादन में प्राचीन पाण्डुलिपियों का सहयोग मिलेगा।

वर्तमान समय में केन्द्र सरकार के द्वारा हस्तलिखित पाण्डुलिपियों का सर्वेक्षण कराया जा रहा है जिसमें कार्यरत व्यक्ति प्रत्येक मंदिरों ग्रंथागारों सार्वजनिक स्थानों पर उसका सर्वेक्षण करके उन पाण्डुलिपियों का सम्पूर्ण परिचय प्राप्त करते हैं। एवं जिसमें पाण्डुलिपियों का समय, लेखक, भाषा, श्लोक संख्या, लिपि आदि का ज्ञान प्राप्त करते हैं तथा उनकी सूची तैयार करते हैं। वर्तमान में कुछ विद्वानों द्वारा जैन गंरथ भण्डारों की सूचियाँ तैयार की गई हैं जिसमें ग्रन्थ का विषय, ग्रन्थ का काल, लेखक, लिपि, भाषा इत्यादि की जानकारी दी गई है। आज वर्तमान समय में कुछ सूचियाँ उपलब्ध हैं जिनमें जैन ग्रंथ भण्डारों का परिचय प्राप्त होता है। कन्नड़ ताडपत्रीय ग्रन्थ सूची, भारतीय ज्ञानपीठ-काशी, सम्पादक- पं. भुजबली शास्त्री, मूडबिद्री, १९४८ रास्थान के ग्रन्थ भण्डारो की सूची, ५ भाग, डाँ. कस्तूरचन्द कासलीवाल, जयपुर दिल्ली जिन गंरथावली, पं. कुन्दनलाल जैन, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली जिनरत्नकोश, एच. डी. बेलणकर, पूना, १९४४ वैटलॉग ऑफ जैसलमेर गं्रथ भण्डार, बडौदा-१९२९ दिगम्बर जैन ग्रन्थों का वैâललॉग, भण्डारकर इन्स्टीट्यूट, पूना जैन साहित्य का इतिहास, पं. नाथूराम ‘प्रेमी’ वैटलॉग ऑफ संस्कृत एण्ड प्राकृत मैन्युस्क्रिप्ट इन सी.पी.एण्ड बरार,१९२६ भट्टारकीय दिगम्बर जैन ग्रंथ भण्डार-नागौर, डॉ. पी. सी. जैन, जयपुर जैन सिद्धान्त भवन आरा की ग्रंथ सूची, सम्पादक डाँ, गोकुलचन्द जैन-आरा कन्नड़ एवं प्राकृत हस्तप्रतिलिपियों की वर्णात्मक सूची, सम्पादक-बी. एस. सण्णय्या, श्रवण बेलगोला-२००३ अनेकान्त ग्रंथावली, अनेकान्त ज्ञान मंदिर शोधसंस्थान, बीना प्राकृत एवं जैन विद्या-शोध संदर्भ, डॉ. कपूरचंद जैन, खतौली इत्यादि कुछ सूचियों प्राप्त होती है।जिनमें विषय के अनुसार विभाग किया गया है। कन्नड़ प्रांतीय ताड़पत्रीय ग्रन्थ सूची में मूड़बिद्री कारकल अलियूरू के ताड़पत्रीय ग्रन्थों का विभाजन विषय के अनुसार किया गया है। राजस्थान के जैन ग्रन्थ भण्डार नामक पुस्तक में डॉ.कस्तूरचन्द कासलीवाल ने इन ग्रन्थ भण्डारों को जिलों में विभक्त किया है।जिसमें जिले के अन्य स्थानों पर भी ग्रन्थ भण्डारों का नाम अंकित किया है। राजस्थान में ग्रन्थों का अपार भण्डार है, जो जैसलमेर, उदयपुर, भरतपुर, नागौर, अलवर, जयपुर, कोटा, जोधपुर, बूंदी, आमेर इत्यादि प्रमुख स्थानों में प्राप्त होता है। राजस्थान के इन ग्रन्थ भण्डारों में ताड़पत्र की पाण्डुलिपियों की दृष्टि से जैसलमेर का वृहद्ज्ञान भण्डार अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है, किन्तु कागज पर लिखित पाण्डुलिपियों की दृष्टि से नागौर बीकानेर जयपुर व अजमेर के शास्त्र भण्डार उल्लेखनीय हैं। राजस्थान के ग्रन्थ भण्डारों के सूची पत्रों के प्रकाशन की दिशा में थोड़ा बहुत कार्य अवश्य हुआ है पर वह पर्याप्त नहीं है। जैन सिद्धांत भवन ग्रन्थावली, जैन सिद्धान्त भवन आरा से दो भागों में प्रकाशित हुई है।

क्रम संख्या, ग्रन्थ संख्या, ग्रन्थ का नाम, लेखक का नाम, टीकाकार का नाम, कागज या ताड़पत्र, लिपि और भाषा, आकार सेमी. पत्र संख्या, प्रत्येक पत्र की पंक्ति संख्या एवं प्रत्येक पंक्ति की अक्षर संख्या, पूर्ण-अपूर्ण, स्थिति तथा समय विशेष की जानकारी तथा दूसरे भाग में हस्तलिखित ग्रन्थों की सूची उपलब्ध हैं।२ इसी क्रम में सर्वेक्षण तथा सूचीकेरण के पश्चात् सम्पादन का कार्य अत्यावश्यक है। सम्पूर्ण सामग्री प्राप्त होने के पश्चात् यदि सम्पादक में सम्पादन कला का अभाव होता है तो वह श्रेष्ठ सम्पादन कार्य नहीं कर सकता है। हस्तलिखित पाण्डुलिपियों के सम्पादन कार्य में पाण्डुलिपि विज्ञान का अध्ययन अत्यावश्यक है। पाण्डुलिपि सम्पादन में सम्पादक को प्राचीन लेखक के विचारों का ज्ञान, साहित्य का ज्ञान, इतिहास और पुरातत्व का ज्ञान, विभिन्न कालों की समाज और संस्कृति का ज्ञान होना भी अत्यावश्यक है। हस्तलिखित पाण्डुलिपि का महत्व, इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से भी बहुत अधिक है। पुरातत्व की बहुत सी समस्याएँ हस्तलेखन विज्ञान के द्वारा सुलझायी जाती हैं। जब तक पुरातत्व के विद्वानों को यह पता न हो कि यह लिखावट अथवा लिपि किस समय की है तब तक वह पुरातत्व की सामग्री का मूल्यांकन नहीं कर पाते। इसी प्रकार इतिहास के कई तथ्य इस पाण्डुलिपि के माध्यम से उजागर किये जाते हैं। विभिन्न राजाओं के नाम, वंश एवं उनके क्रिया कलापों का विवरण पाण्डुलिपि के अध्ययन से प्राप्त होता है। पाण्डुलिपि का विशेष अध्ययन आजकल के पुस्तकालय विज्ञान अथवा हस्तलेखागार आदि के लिये भी उपयोगी है। हस्तलिखित पाण्डुलिपि का विभिन्न दृष्टिकोणों से विशेष महत्त्व है। पाण्डुलिपियों से विभिन्न कालों की समाज और संस्कृति का भी ज्ञान किया जाता है। उस समय के रहन—सहन, खानपान, सामाजिक उत्सव, लोक कलाओं आदि विभिन्न विषयों की जानकारी प्राचीन पाण्डुलिपियों में अंकित होती है। जिसका अच्छे सम्पादन कार्य से पता चलता है तथा दूसरी ओर विभिन्न युगों की संस्कृति को प्रस्तुत करने में भी वह सहयोगी होती है।

पाण्डुलिपि सम्पादन में सम्पादक को कुछ बातों की जानकारी प्राप्त करना अत्यावश्यक है। लेखक, कवि, टीकाकार, भौतिक, सामग्री, लिपि एवं लिपिकार के विषय में स्पष्ट ज्ञान कर लेना चाहिये। इससे पाण्डुलिपि सम्पादन में विशेष सहायता मिलती है। पाण्डुलिपियों में लेखक के संबंध में विभिन्न प्रकार के साधनों से जानकारी प्राप्त कर यह प्रयत्न किया जाता है कि इस ग्रंथ को लिखने वाला कवि अथवा आचार्य कौन है। लेखक की जानकारी हो जाने से पाण्डुलिपि को पढ़ने और समझने में सुविधा होती है क्योंकि लेखक की अन्य रचनाओं आदि से उसकी शैली, भाषा, विषय आदि का अनुमान हो जाता है। जिससे उसकी नई रचना की पाण्डुलिपि के सम्पादन में सरलता रहती है। प्राचीन समय में लेखक शुभाशुभ का विशेष ध्यान रखता था। लेखन सामग्री में अच्छी सामग्री का प्रयोग करता था। जिससे वह पाण्डुलिपि दीर्घकाल तक चल सके। ग्रंथ लेखन में मुहूर्त विचार, ग्रंथ की बनावट पर विचार, लेखनी के रंग तथा बनावट पर विचार, कच्ची, पक्की स्याही का विचार किया जाता था। स्याही पर औषधि इत्यादि भी डाली जाती थी। जिससे दीर्घकाल तक ग्रंथ की कीटाणुओं से सुरक्षा हो सके। जिनमें लेखन कला प्रारम्भ की जाती थी वह पत्र भुर्जपत्र, तेजपत्र, स्वर्णपत्र, ताम्रपत्र केतकीपत्र, मार्तण्डपत्र, रौप्यपत्र, बटपत्र इत्यादि पत्र होते थे। इन पत्रों को समय अलग—अलग है। वर्तमान में कागज का प्रयोग १४ वीं शताब्दी में पश्चिम में हुआ था। उसी प्रकार ग्रंथ संरक्षण दीर्घकाल तक होता रहे इसलिये लेखनी के विषय में शुभाशुभ का विवेचन मिलता है।

ब्राह्मणी श्वेतवर्णा च, रक्त वर्णा च क्षत्रिणी,

वैश्यवी पीतवर्णा च, आसुरी श्याम लेखिनी।।
श्वेते सुखं विजानीयात् , रत्तेâ दरिद्रता भवेत्,
पीते च पुष्कला लक्ष्मी, आसुरी क्षयकारिणी।।
चिताग्रे हरते पुत्रमाधो मुखी हरते धनम्।
वामे च हरते विद्यां दक्षिणां लेखिनीं लिखेत्।।
अग्र ग्रन्थिर्हरेदायुर्मध्य ग्रन्थिर्हरेद्धनम्
पृष्ठ ग्रंथिर्हरेत् सर्वं निग्रन्थिं लेखिनीं लिखेत्
नवांगुलभिता श्रेष्ठा अष्टौ वा यदि वाडधिका
लेखिनीं लेखयेन्नित्यं धनं धान्यं समागम:

लेखन के समय लेखक विराम स्थानों का भी विशेष ध्यान रखता था। किस अक्षर पर विराम लिया जाए कि हानि न हो इसलिये घ, झ, ट, ड, त, प, ब, ल, व, श इन वर्णों के अन्त में आने पर लेखक विराम लेता था तथा शेष वर्णों के अन्त में आने पर अशुभ समझ कर विराम नहीं लेता था।५ पाण्डुलिपि का भौतिक विवरण तैयार करते समय यह जानकारी भी प्राप्त की जाती है कि पाण्डुलिपि की लिपि अथवा भाषा क्या है ? बहुत प्राचीन समय की पाण्डुलिपियाँ ब्राह्मी लिपि में लिखी गई थी, जो अब उपलब्ध नहीं होती। आज अधिकतर देवनागरी लिपि की पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध हैं किन्तु प्रान्तीय आधार पर उनकी लिपियाँ भिन्न—ाqभन्न भी हो सकती हैं, जैसे—कन्नड़ लिपि, बंगला लिपि, गुरुमुखी, गुजराजी आदि। इसी तरह पाण्डुलिपियों की भाषा में भी भिन्नता होती है। यह सम्पादक के ज्ञान पर निर्भर करता है कि वह किस भाषा का जानकार है और किस भाषा की पाण्डुलिपियों का सम्पादन कर करता है। पाण्डुलिपि के मूल लेखक, कवि, आचार्य अलग होते थे और पाण्डुलिपि को लिखने वाले लिपिकार अलग होते थे। जिनको लिहिया कहा जाता था जो व्यापारिक दृष्टि से ग्रंथ के लिखने का कार्य करते थे।

सम्पादक को पाण्डुलिपि की रचना को समझने के लिये पाण्डुलिपि का भीतरी परिचय जानना भी आवश्यक है। पाण्डुलिपि लिखते समय लेखक अथवा लिपिकार पाण्डुलिपियों को किस प्रकार तैयार करते थे और उन आधारों पर अपने विषय को कैसे प्रस्तुत करते थे यह जानकारी भी सम्पादक को उपयोगी होती है। सामान्य रूप से एक पाण्डुलिपि में निम्न बातें देखने को मिलती है। जैसे—१. मंगलाचरण, २. अलंकरण, ३. नमस्कार, ४. आशीषवचन, ५. प्रशस्ति, ६. पुष्पिका। पाण्डुलिपियों की इन मुख्य बातों में से आवश्यक नहीं है कि सभी पाण्डुलिपियों में यह सभी प्राप्त हों क्योंकि प्रत्येक लेखक अपनी रुचि के अनुसार भी पाण्डुलिपियों का निर्माण करता था किन्तु प्राय: यह क्रम सभी अपनाते हैं। पाण्डुलिपि लिखने या उसकी रचना करने में जिन सामान्य बातों का ध्यान रखा जाता था, उसी को पाण्डुलिपि की रचना प्रक्रिया कहा गया है। पाण्डुलिपि लिखने में जो सामान्य जानकारी प्राप्त होती है, उनमें से निम्न बातें प्रमुख हैं १. लेखन दशा

२. पंक्तिबद्धता

३. विराम चिह्न

४. पृष्ठ संख्या

५. संशोधन

६. बीज में धागे का चिन्ह

७. अन्य चिह्न

८. अंकों का लेखन

इस प्रकार पाण्डुलिपि रचना प्रक्रिया के अंतर्गत मूल ग्रंथ के साथ—साथ अनेक बातें भी पाण्डुलिपि के माध्यम से सुरक्षित रखी जाती थी, उनमें आधारभूत सामग्री और चिह्नों का विशेष महत्त्व है। पाण्डुलिपि रचना के अन्तर्गत जो प्रशस्तियाँ प्राप्त होती हैं वे इतिहास और संस्कृति की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत करती हैं। कई पाण्डुलिपियों की रचना के अंतर्गत सुन्दर चित्र भी दिये जाते थे जो विषय से संबंधित होते थे। जैसे—कल्पसूत्र में २४ तीर्थंकरों की प्रमुख घटनायें कलातमक चित्रों में दी गई हैं इन चित्रों का अध्ययन भी विशेष महत्त्व रखता है। इस तरह पाण्डुलिपि की रचना और चिह्न पाण्डुलिपि विकास के लिये महत्त्व रखती हैं। सम्पादन कार्य समाप्त होने के पश्चात् सम्पादित प्रति का अध्ययन बहुत आवश्यक है। सम्पादित ग्रंथ की उपयोगिता तथा महत्त्व है। पाण्डुलिपि रचना के अंतर्गत जो प्रशस्तियाँ प्राप्त होती हैं वे इतिहास और संस्कृति की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत करती हैं। कई पाण्डुलिपियों की रचना के अंतर्गत सुन्दर चित्र भी दिये जाते थे जो विषय से संबंधित होते थे। जैसे—कल्पसूत्र में २४ तीर्थंकरों की प्रमुख घटनायें कलात्मक चित्रों में दी गई हैं इन चित्रों का अध्ययन भी विशेष महत्त्व रखता है। इस तरह पाण्डुलिपि की रचना और चिह्न पाण्डुलिपि विकास के लिये महत्त्व रखती हैं।

सम्पादन कार्य समाप्त होने के पश्चात् सम्पादित प्रति का अध्ययन बहुत आवश्यक है। सम्पादित ग्रंथ की उपयोगिता तथा महत्व का विवेचन अध्यापन के द्वारा ही हो सकता है। अध्ययन करने वाले शोधकर्ता उस पर शोधकार्य करके उसका समीक्षात्मक अध्ययन करके उसकी प्रतियों का उल्लेख करके उस ग्रंथ की उपयोगिता में वृद्धि करते हैं। वर्तमान समय में शोधकर्ता किसी ग्रंथ पर शोधकार्य करते हैं तथा शोधकार्य के समय वह अपने शोधग्रंथ का समीचीन रूप से अध्ययन करता है उसमें प्रतिपादित विषय को स्वविवेक से विवेचित करता है। उस ग्रंथ में यदि काल न दिया गया हो तो वह उस ग्रंथ का काल निर्धारण करता है। उन्हें उनके बाद के ग्रंथों में देखना पड़ता है कि कहीं इसी परम्परा के अन्य आचार्य ने इनका नाम तथा कृति का नाम अपने शास्त्र में तो नहीं दिया है तथा उस शास्त्र में लिखी लिपि का काल निर्धारण करते हैं अथवा मूल प्रति होने पर उसके पत्र का वैज्ञानिक तरीके से परीक्षण कर रसायन द्वारा उसका काल निर्धारित किया जाता है। जैसे—पुरातत्त्व विभाग में पत्थर की प्राचीनता को सिद्ध किया जाता है। उसी प्रकार शास्त्र की प्राचीनता भी सिद्ध की जाती है। पाण्डुलिपि की प्राचीनता का ज्ञान उसकी बनावट, आकार तथा उसमें प्रयुक्त स्याही तथा लेखनी से भी की जा सकती है। ग्रंथ के आकार के विषय में कहा है।

मानं वदये पुस्तकस्य भुणु देवि समासत:,

मानेनापि फलं विद्यादमाने श्रीर्हता भवेत्
हस्तमानं पुष्टि मानं मा बाहु द्वादशांगुलम्,
दशागुलं तथाष्टौ च ततो हीनं न कारयेत्।

अर्थात् परिमाण में पुस्तक हाथ भर, मुट्ठी भर, बारह अंगुली भर, दस अंगुली भर, और आठ अंगुली भर तक हो सकती है इससे कम होने पर श्री हीनता का फल मिलता है।८ इस प्रकार ग्रंथ का सर्वेक्षण, विवरण, सम्पादन, अध्ययन के द्वारा हस्तलिखित ग्रंथों का संरक्षण होता है। ग्रंथ संरक्षण की दूसरी विधि वैज्ञानिक विधि है जिसमें ग्रंथों का रसायन इत्यादि के द्वारा संरक्षित किया जाता है।

हस्तलिखित ग्रंथों का संरक्षण वैज्ञानिक विधि

संरक्षण प्रत्येक वस्तु का होना आवश्यक है उनमें भी प्राचीन वस्तुओं का संरक्षण तो अत्यावश्यक है क्योंकि प्राचीन वस्तुओं के संरक्षण से हमारी संस्कृति तथा सभ्यता की प्राचीनता ज्ञात होती है। प्राचीनता का ज्ञान शिलालेख और साहित्य के माध्यम से भी होता है। साहित्य में हस्तलिखित साहित्य का संरक्षण बहुत जरूरी है। क्योंकि उनके लोप हो जाने के बाद उनकी पुन: प्राप्त होना असंभव है। इसलिये बहुत से हस्तलिखित ग्रंथों के अंत में संस्कृत का श्लोक उद्धृत होता है।

जलाद् रक्षेत् स्थलाद् रक्षेत् रक्षेत् शिथिल बंधनात्।

मूर्ख हस्ते न दातव्या, एवं वदति पुस्तिका।।
उदकानिल चौरेभ्यो मूक्षकेभ्यो हुताशनात्।
कष्टेन लिखितं शास्त्र यत्नेन परिपालयेत्।

इस श्लोक के माध्यम से हस्तलिखित ग्रंथों को नष्ट करने वाली वस्तुओं के प्रति सावधान रहकर ग्रंथों के संरक्षण की बात कहीं है। कहा है—जल से रक्षा करना चाहिये। स्थल में दीमक आदि जन्तुओं से रक्षा करना चाहिये। अग्नि तथा चूहों से रक्षा करनी चाहिये। ग्रंथ की रक्षा चोरों से भी करना चाहिये। प्राचीनकाल में हस्तलिखित ग्रंथों का पतन वातावरण के कारण तो समय—समय पर होता रहा है परन्तु उससे अधिक पतन विदेशी आक्रमण के कारण भी होता रहा है। विदेशी आक्रमणकारियों ने र्धािमक विद्वेष के कारण मंदिरों, मठों को तो तोड़ा ही साथ में उनमें रखे हस्तलिखित ग्रंथों को भी आग के द्वारा समाप्त कर दिया।१० इस कारण भी हस्तलिखित ग्रंथों की सुरक्षा के लिये ग्रंथागारों का तहखाने में सुरक्षित रखने का निर्णय लिया। जिससे आक्रमणकारियों को यह ज्ञात न हो सके कि ग्रंथागार यहाँ पर सुरक्षित है। विदेशी आक्रमणकारियों में अल्लाउद्दीन का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। टांड जेम्स का कहना है कि खून के प्यासे अल्ला ने दीवारों का तोड़कर ही दम नहीं लिया अपितु उसने मंदिरों का बहुत सा माल नीवों में गड़वा दिया, महल खड़े किये, और अपनी विजय के अंतिम चिह्न स्वरूप उन स्थलों पर गधों से हल चलवा दिया।११ इस कारण से ग्रंथ रख—रखाव के साथ ग्रंथागारों या पोथीभंडारों को भी ऐसे रूप में बनाने की समस्या थी कि आक्रमणकारी को आक्रमण करने का लालच न हो सके इसलिये ग्रंथागारों को तहखाने का स्वरूप दिया गया।।१२ विदेशी आक्रमणकारियों के अलावा आपसी साम्प्रदायिक मतभेद, वैमनस्यता के कारण भी लाखों ग्रंथों की क्षति हुई। उदाहरणार्थ—तपागच्छ और खरतरगच्छ नामक श्वेताम्बर जैनधर्म के मतभेदों के आपसी कलह के कारण ही पुराने लेखों का नाश सर्वाधिक हुआ।

Jaina Granth Bhandars in Rajasthan में कासलीवाल ने बताया है कि अत्यधिक असुरक्षा के कारण ग्रंथ भंडारों को सामान्य पहुँच से बाहर के स्थानों में स्थापित किया। जिससे आक्रमणकारियों का ध्यान इस ओर न जाये। जैसलमेर में प्रसिद्ध जैन भंडार भूगर्भ कक्ष में स्थित है। ग्रंथ भंडार के साथ ही मंदिर में भूगर्भस्थ कक्ष भी बनाये जाते थे, जिनका प्रयोग आक्रमण के समय अत्यधिक किया जाता था। वातावरण से सुरक्षा के पश्चात् आधुनिक विज्ञान के द्वारा वर्तमान में हस्तलिखित ग्रंथों का संरक्षण किया जाता है। यह प्रक्रिया सामान्य मनुष्य के लिये सरल नहीं है। इसके तरीके जिसको आते हैं वह इस वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा पाण्डुलिपियों का संरक्षण कर सकते हैं। हस्तलिखित ग्रंथों के संरक्षण के लिये विज्ञान ने बहुत से उपाय बताये हैं जिनके माध्यम से हम पाण्डुलिपियों को सुरक्षित कर सकते हैं। माइक्रोफिल्म के एक फीते पर कई हजार पृष्ठ उतारे जा सकते हैं। इस प्रकार ग्रंथ की सुरक्षा शीघ्रता से दीर्घकाल के लिये की जा सकती है। इस कार्य पर व्यय अधिक मात्रा में नहीं होता है। परन्तु इस फिल्म को पढ़ने के लिये पठन यंत्र की आवश्यकता होती है जिसमें फिल्म वैमरा भी लगा रहता है। यह पठन—यंत्र बड़े—बड़े पुस्तकालयों या संग्रहालयों में प्राप्त होता है। इसी प्रकार फोटो स्टेट यंत्र से भी फोटो प्रतियाँ प्राप्त कर ग्रंथ की सुरक्षा हो सकती है। वर्तमान में प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों की सुरक्षा का प्रश्न उठता है कि माइक्रोफिल्म तथा फोटो स्टेट से प्राचीन प्रति की नवीन प्रति तो प्राप्त की जा सकती है, परन्तु प्राचीन प्रति की सुरक्षा कैसे हो। इसके लिये वैज्ञानिकों ने कुछ उपाय बताये हैं। भण्डारण भवन को २२० से और २५० से. (७२०—७८० फा.) के बीच तापतान और नमी ४५ और ५५ प्रतिशत के बीच रखी जाये।।

नमी को नियंत्रित करने के लिये ऐलहाइड्स वैल्शियम, क्लोराइड और सिलिका गैल, जल निष्कासन रासायनिकों को उपयोग कर सकते हैं। २०—२५ घन मीटर क्षमता वाले कक्ष में २—३ किलोग्राम सिलिका भरकर कमरे में कई स्थानों पर ३—४ घंटे के लिये रखना चाहिये तथा पुन: सिलिका गैल खुले पात्रों में गर्म करके रख सकते हैं। पाण्डुलिपियों को सीलन वाले कमरे में नहीं रखना चाहिये। पाण्डुलिपियों को संरक्षित करने के लिये वैज्ञानिकों ने कुछ प्रयोग विधियों का निर्देशन किया है जो दृष्टव्य है—थाईमल चिकित्सा विधि, चोरस चिकित्सा विधि, पूरा पृष्ठ वर्णन चिकित्सा, टिश्यू चिकित्सा, शिप्र चिकित्सा, परतोपचार चिकित्सा।।

इसके संबंध में पहला प्रयत्न यह किया जाये कि इन कीटों की वृद्धि न हो। इसके लिये ग्रंन्थागार में खाने—पीने की चीजों का निषेध किया जाए तथा जहाँ दीवारों में कही दरारे और सेधें बनी हो उन्हें सीमेंट से भरवा दें। इससे कीटों के छिपने के स्थान बंद हो जायेंगे तथा साथ ही साथ नेफ्थलीन की गोलियाँ अलमारियों में हर छ: फीट पर रख दें, इससे कीट भागते हैं। परन्तु डी. डी. टी. पाटोव्यम, सोडियम फ्लोराइड आदि जहरीली दवाईयों का प्रयोग पाण्डुलिपियों के ऊपर न करें। भवन के कोने इत्यादि में कर सकते हैं। यदि इन दवाइयों का छिड़काव ग्रंथों पर हुआ तो ग्रंथ दागयुक्त हो सकते हैं। दूसरे प्रकार के कीटों में पुस्तक कीट आते हैं जो ग्रंथ के भीतर घुसपैठ कर भीतर के भाग को नष्ट कर देते हैं। बेगवोर्म या पुस्तक कीट के लारवे तो ग्रंथ के पन्नों के ऊपर से लेकर दूसरे छोर तक छेद कर देते हैं। लारवा जब उड़ने लगता है तो दूसरे स्थानों पर पुस्तक कीटों को जन्म देता है तथा सोसिड नामक कीट पुस्तकों का जू कहा जाता है यह भीतर ही भीतर पुस्तकों को हानि पहुँचाते हैं। इनकी हानि का पता पुस्तक खोलने पर विदित होता है। इनको दूर करने का उपाय वाष्प चिकित्सा है परन्तु यह वाष्प चिकित्सा घातक गैसों से की जाती है ये गैसें एथीलीन आक्साइड एवं कार्बनडाईआक्साइड हैं। इन्हें मिलाकर वातशून्य वाष्पन करना चाहिये। यह क्रिया व्यय साध्य है। वाष्पन करने की दूसरी विधि सरल है जिसमें कार्बनट्रेटाक्लोराइड और एथेलीन डाइक्लोराइड को मिलाकर वाष्पन किया जाता है। इसमें एक स्टील की आलमारी लेते हैं जिसमें हवा का प्रवेश न हो सके उसके लौह तख्तों में ग्रंथों को खोल कर रख दिया जाता है तो उक्त रसायन को शीशे के जार में एक घन मीटर के लिये १.५ किलोग्राम घोलकर लौह तख्तों के सबसे नीचे तल में रख देते हैं तथा आलमारी बंद कर देते हैं। इसकी गैसें हल्की होती हैं अत: ऊपर की तरफ उठती हैं जिससे ग्रंथ वाष्पित हो जाते हैं। इस प्रकार सात—आठ दिन तक रुग्ण ग्रंथों को वाष्पित करना चाहिये। परन्तु इस क्रिया में जिल्द की संधियों में कीटाणुओं के अंडे छिपे रह जाते हैं इसलिये २०—२१ दिन तक ग्रंथ को वाष्पित करना चाहिये।

इसी प्रकार का कीटाणु दीमक है जो सबसे अधिक हानिप्रद कीटाणु है यह ग्रंथ को सम्पूर्ण रूप से नष्ट कर देता है। इसलिये ऐसे मकान में जहाँ दीपक का आक्रमण हो वहाँ ग्रंथ नहीं रखना चाहिये क्योंकि इन्हें शीघ्रता से समाप्त नहीं किया जा सकता। दीमकों की रानी औसतन ३० हजार अंडे प्रतिदिन देती है। इनसे सुरक्षा के लिये ग्रंथों की अलमारियों में कोलातार और क्रियोसट तेल नीचे स्थान में लगा देना चाहिये। यह रसायन का लेप हर छह महीने में एक बार अवश्य करना चाहिये।

उपसंहार—इस प्रकार हस्तलिखित पाण्डुलिपियों का संरक्षण वैज्ञानिक विधि के द्वारा एक निश्चित समय तक किया जा सकता है जब रसायन का काल समाप्त हो जायेगा तो वह पुन: कीट इत्यादि जन्तुओं के द्वारा नष्ट होने लगेगी। इस प्रक्रिया में धन राशि भी लगती है तथा सीमित समय के लिये सुरक्षा हो पाती है इसमें उस हस्तप्रति को कोई एक व्यक्ति ही अध्ययन कर सकता है परन्तु यदि उस हस्तलिखित प्रति का सम्पादन हो जाता है तो वह प्रति सभी पाठकों के हाथ में पहुँच जाएगी तथा उसका अध्ययन, अध्यापन होने लगेगा जिसके माध्यम से हस्तलिखित ग्रंथों का संरक्षण दीर्घकाल के लिये हो जाता है। उसका प्रकाशन बार—बार होता रहता है और वह प्रति पुन: नवीनता के साथ पाठकों को प्राप्त हो जाती है। अत: हस्तलिखित मूलप्रति का संरक्षण तो प्राचीनता की दृष्टि से आवश्यक है ही साथ में उसका सम्पादन, अध्ययन, अध्यापन भी अत्यावश्यक है।

संदर्भ सूची

१. भट्टारकीय ग्रंथों भंडार नागौर, डॉ. पी. सी. जैन जयपुर, विषय सूची भाग—३, पृष्ठ—७, संस्करण—१९८५।

२. जैन सिद्धान्त भवन ग्रंथावली : संपादक—ऋषभचंद जैन फौजदार, प्रकाशक—जैन सिद्धान्त भवन आरा, १९८७ संपादकीय—१३।

३. मध्य कालीन भारतीय कलाएँ और उनका विकास : संपादक—डॉ. रामनाथ, पृष्ठ ६—७, प्रकाशक राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर—१९७३।

४. भारतीय जैन श्रमण संस्कृति अने लेखनकला, संपादक—मुनि पुण्यविजय जी, प्रकाशक सारा भाई मणिलाल नवाब, अहमदाबाद पृष्ठ ३४।

५. पाण्डुलिपि विज्ञान : डॉ. सत्येन्द्र, पृष्ठ—४९, प्रकाशक—राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर, द्वितीय संस्करण—१९८९।

६. भारतीय जैन श्रमण संस्कृति अने लेखनकला, संपादक—मुनि पुण्यविजय जी, पृष्ठ ५७-५८।

७. पाण्डुलिपि विज्ञान, डॉ. सत्येन्द्र, पृष्ठ—३४, ३४, ३५।

८. पाण्डुलिपि विज्ञान, पृष्ठ ४८।

९. पाण्डुलिपि विज्ञान, पृष्ठ १६।

१०. पाण्डुलिपि विज्ञान, पृष्ठ ३३५।

११. पश्चिम भारत की यात्रा : टॉड जेम्स, पृष्ठ—२३७ मंगल प्रकाशन जयपुर।

१२. पश्चिम भारत की यात्रा : पृष्ठ २९८।

१३. पश्चिम भारत की यात्रा : पृष्ठ २९८।

१४. राजस्थान के जैन ग्रंथ भंडार्स, कस्तूरचन्द कासलीवाल, जयपुर, पृष्ठ २३, २४ विषय सूची, संस्करण १९६७।

१५. पाण्डुलिपि विज्ञान : पृष्ठ ३४४।

१६. पाण्डुलिपि विज्ञान, पृष्ठ ३४६।

१७. पाण्डुलिपि विज्ञान, पृष्ठ ३४८।

१८. पाण्डुलिपि विज्ञान, पृष्ठ ३४९।


अर्हत् वचन जनवरी—जून २०१०,पृष्ठ नं. ४१-४९)