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पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ जम्बूद्वीप हस्तिनापुर में विराजमान है ।

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हस्तिनापुर

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हस्तिनापुर

उत्तरप्रदेश के मेरठ ज़िले में स्थित हस्तिनापुर तीर्थ अनेक ऐतिहासिक घटनाओं से प्रसिद्ध वर्तमान में जैन तीर्थ के रूप में जाना पहचाना जाता है ।यहाँ भगवान शान्तिनाथ - कुन्थुनाथ - अरहनाथ के चार- चार कल्याणक हुए हैं ।महाभारत क़ालीन यादें यहाँ की सर्वाधिक महत्व पूर्ण स्मृतियाँ हैं । सन् १९७४ से यहाँ पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के पदार्पण के पश्चात् हस्तिनापुर की काया पलट गई और आज जम्बूद्वीप रचना निर्माण के कारण विश्वप्रसिद्ध पर्यटन स्थल बन गया है । कहते हैं कि सन् १९४८ में भारत के प्रधानमंत्री स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उजड़े हुए हस्तिनापुर को पुनः बसाया था जो कि ‘‘हस्तिनापुर सेन्ट्रल टाउन’’ के नाम से जाना जाता है। वहाँ आज लगभग २० हजार की जनसंख्या है एवं शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, डाक व्यवस्था, आवागमन सुविधा आदि के समस्त साधन वहाँ सरकार की ओर से उपलब्ध हैं। टाउनेरिया की सक्रियता से हस्तिनापुर कसबे की सारी जनता प्रसन्नतापूर्वक अपना जीवन यापन करती है। यहाँ हिन्दू-मुसलमान, पंजाबी-बंगाली सभी जाति के लोग जातीय एकता के साथ अपने-अपने धर्म एवं ईश्वर की उपासना करते हैं।

इतिहास

ऐतिहासिक तीर्थक्षेत्र हस्तिनापुर अयोध्या के समान ही अत्यन्त प्राचीन एवं पवित्र माना जाता है। जिस प्रकार जैन पुराणों के अनुसार अयोध्या नगरी की रचना देवों ने की थी, उसी प्रकार युग के प्रारंभ में हस्तिनापुर की रचना भी देवों द्वारा की गयी थी। अयोध्या में वर्तमान के पाँच तीर्थंकरों ने जन्म लिया तो हस्तिनापुर को शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरहनाथ इन तीन तीर्थंकरों को जन्म देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इतना ही नहीं, इन तीनों जिनवरों के चार-चार कल्याणक (गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान) हस्तिनापुर में इन्द्रों ने मनाए हैं ऐसा वर्णन जैन ग्रंथों में है। आज से लगभग पौन पल्य ६६ लाख ८६ हजार ५२९ वर्ष पूर्व हस्तिनापुर के राजा विश्वसेन की महारानी ऐरादेवी की पवित्र कुक्षि से ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी के दिन सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ ने जन्म लिया था। पुन: राजा सूरसेन की महारानी श्रीकांता ने वैशाख शुक्ला एकम् तिथि में सत्रहवें तीर्थंकर कुन्थुनाथ को जन्म दिया तथा राजा सुदर्शन की महादेवी मित्रसेना के पवित्र गर्भ से मगशिर शु. १४ को १८वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ का जन्म हुआ था। इस प्रकार तीन बार यहाँ पर १५-१५ मास तक कुबेर ने अगणित रत्नों की वृष्टि की थी अत: रत्नगर्भा नाम से सार्थक यह भूमि प्राणिमात्र को रत्नत्रय धारण करने की प्रेरणा प्रदान करती है। ये तीनों तीर्थंकर चक्रवर्ती और कामदेव पदवी के धारक भी थे। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को एक वर्ष ३९ दिन के उपवास के पश्चात् हस्तिनापुर में ही युवराज श्रेयांस एवं राजा सोमप्रभ ने इक्षुरस का प्रथम आहार दिया था। उस समय भी वहाँ पर देवों द्वारा पंचाश्चर्य वृष्टि की गई थी एवं सम्राट् चक्रवर्ती भरत ने अयोध्या से हस्तिनापुर जाकर राजा श्रेयांस का सम्मान करके उन्हेंं ‘‘दानतीर्थ प्रवर्तक’’ की पदवी से अलंकृत किया था। पुराण ग्रंथों में वर्णन आता है कि भरत ने उस प्रथम आहार की स्मृति में हस्तिनापुर की धरती पर एक स्तूप का निर्माण करवाया था। आज तो उसका कोई अवशेष देखने को नहीं मिलता है किन्तु इससे यह ज्ञात होता है कि धर्मतीर्थ एवं दानतीर्थ की प्रशस्ति का उल्लेख उसमें अवश्य होगा। काल के थपेड़ों में वह इतिहास आज समाप्तप्राय हो गया किन्तु हस्तिनापुर एवं उसके आसपास में इक्षु-गन्ने की हरी-भरी खेती आज भी इस बात का परिचय कराती है कि कोड़ाकोड़ी वर्ष पूर्व भगवान के द्वारा आहार में लिया गया गन्ने का रस वास्तव में अक्षय हो गया है। इसीलिए उस क्षेत्र में अनेक शुगर पैक्ट्री तथा व्रेâशर गुड, खांड और चीनी बनाकर देश के विभिन्न नगरों में भेजते हैं। इसी प्रकार से हस्तिनापुर की पावन वसुन्धरा पर रक्षाबन्धन कथानक, महाभारत का इतिहास, मनोवती की दर्शन प्रतिज्ञा की प्रारम्भिक कहानी, राजा अशोक व रोहिणी का कथानक आदि प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध हुए हैं। जिनका वर्णन प्राचीन ग्रंथों में प्राप्त होता है और हस्तिनापुर नगरी की ऐतिहासिकता सिद्ध होती है।

वर्तमान स्थिति

प्राचीन इतिहास

हस्तिनापुर नगरी भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ तीन तीर्थंकरों की जन्मभूमि है। इससे पूर्व युग की आदि में सर्वप्रथम भगवान ऋषभदेव को राजा श्रेयांस ने नवधाभक्तिपूर्वक पड़गाहन कर इक्षुरस का आहार दिया था। तभी से अक्षयतृतीया पर्व मनाया जाता है। ऐसी अनेक ऐतिहासिक घटनाएँ इस पावन तीर्थ से सम्बद्ध हैं। रक्षाबंधन पर्व, महाभारत का युद्ध, रोहिणी व्रत की कथा, मनोवती की दर्शन कथा आदि अनेक पौराणिक कथानक इस धरती से ही प्रसिद्ध हुए हैं। प्राचीन समय से यहाँ भगवान शांतिनाथ का मंदिर निर्मित था किन्तु जब पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से यहाँ जम्बूद्वीप की रचना का निर्माण हुआ, तब से वहाँ की काया ही पलट गई और विश्व के कोने-कोने में हस्तिनापुर का नाम प्रचलित हो गया। पूज्य अभयमती माताजी ने अपनी लेखनी से इस पुस्तक के माध्यम से यहाँ का प्राचीन इतिहास लिखा है। साथ ही हस्तिनापुर तीर्थ की पूजा, यहाँ की घटनाओं से संबंधित रक्षाबंधन पूजा, विष्णुकुमार महामुनि पूजा, पंचमेरु पूजा, नंदीश्वर पूजा, समवसरण पूजा आदि को लिखकर तीर्थ के प्रति अपने भक्ति सुमन अर्पित किये हैं। भगवान शांतिनाथ चालीसा, भजन, आरती भी प्रकाशित हैं। इस पुस्तक के द्वारा तीर्थ की सभी प्राचीन घटनाओं से परिचित हों यही उद्देश्य लेकर पूज्य अभयमती माताजी ने यह पुस्तक पाठकों तक पहुँचाई है। भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ तीर्थंकरत्रय भगवान हमें शांति प्रदान करें, यही मंगल भावना है।

दार्शनिक स्थल

मध्यलोक अकृत्रिम जिन मंदिर निर्माणाधीन: पूज्य माताजी की प्रेरणा से जहाँ जम्बूद्वीप रचना का खुले रूप में निर्माण हुआ है। वहीं उनकी पुरानी रूपरेखानुसार सन् १९९० में तेरह द्वीप के ४५८ अकृत्रिम जिनबिम्बों की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हुई थी पुनः एक विशाल जिनमंदिर का निर्माण लगभग ५ फरवरी १९९३ से प्रारंभ हुआ। मंदिर का निर्माण लगभग पूर्ण हो गया है। अतः उसके अन्दर शास्त्रीय विधि से मध्यलोक के तेरह द्वीपों की सुन्दर अकृत्रिम रचना बनते ही समस्त जिन प्रतिमाएं उसमें विराजमान होंगी और सन् १९६५ में की गई पूज्य माताजी की ध्यान साधना साकार रूप लेकर देश के समक्ष आएगी।

जम्बुद्वीप

सन् १९७४ में जब से हस्तिनापुर की धरा पर परमपूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ने जम्बूद्वीप रचना का शिलान्यास करवाया, तब से तो वहाँ की ख्याति देश-विदेश में फैल गई है। १०१ फुट ऊँचे सुमेरु पर्वत से समन्वित जम्बूद्वीप की रचना में विराजमान २०५ जिनबिम्ब जहाँ श्रद्धालुओं के पापक्षय में निमित्त हैं, वहीं गंगा-सिंधु आदि नदियाँ, हिमवन आदि पर्वत, भरत-ऐरावत आदि क्षेत्र, लवण समुद्र जनमानस के लिए मनोरंजन के साधन भी हैं। बिजली-फौव्वारों की तथा हरियााली की प्राकृतिक शोभा देखने हेतु दूर-दूर से लोग जाकर वहाँ स्वर्ग सुख जैसी अनुभूति करते हैं।

जम्बूद्वीप के उस परिसर में कमल मंदिर ध्यानमंदिर, तीनमूर्ति मंदिर, शान्तिनाथ मंदिर, वासुपूज्य मंदिर, ॐ मंदिर, सहस्रकूट मंदिर, विद्यमान बीस तीर्थंकर मंदिर, भगवान ऋषभदेव मंदिर, ऋषभदेव कीर्तिस्तंभ, ऐतिहासिक कैलाशपर्वत भवन , ज्ञानमती कला मंदिर, जम्बूद्वीप पुस्तकालय, णमोकार महामंत्र बैंक आदि हैं जो भक्तों को भक्ति और ध्यान अध्ययन की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

महत्वपूर्ण दिवस

मेले-हस्तिनापुर तीर्थ पर वर्ष में दिगम्बर-श्वेताम्बर समाज के कई मेले आयोजित होते हैं। जिनमें से कार्तिक पूर्णिमा का मेला सर्वप्रमुख है जिसमें जैन समाज से अतिरिक्त अजैन समाज भी भारी संख्या में पहुँचकर गंगा स्नान करता है इसलिए इस मेले को ‘‘गंगास्नान मेला’’ के नाम से भी जाना जाता है। इसी प्रकार चैत्र कृष्णा एकम (होली मेला), अक्षयतृतीया , ज्येष्ठ वदी चौदस ये हस्तिनापुर के प्रमुख मेले हैं तथा समय-समय पर अन्य आयोजन भी वहाँ होते ही रहते हैं। वर्तमान में हस्तिनापुर पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की तपःसाधना का केन्द्र बनकर संसार की दृष्टि में बस गया है। उनके पावन सानिध्य में केन्द्रीय एवं प्रादेशिक स्तर के अनेक उच्चकोटि के राजनेता पधार चुके हैं यही कारण है कि मेरठ कमिश्नरी का प्रशासन जम्बूद्वीप के नाम से ही श्रद्धावनत है और वहाँ के लघु संकेत पर समस्त सुविधाएं देने को तैयार रहता है।

मार्ग निर्देश

जम्बूद्वीप के प्रमुख द्वार तक प्रतिदिन दिल्ली और मेरठ की १०-१५ रोडवेज बसें सुबह से शाम तक यात्रियों को लाती और वहाँ से ले जाती हैं। वहाँ उतर कर कल्पवृक्ष द्वार में घुसते ही हर नर-नारी के मुँह से सर्वप्रथम यही निकलता है कि-‘‘ऐसा लगता है स्वर्ग में आ गए’’। पुनः वहाँ भ्रमण करने के पश्चात् वे लोग परिसर की स्वच्छता का गुणगान करते नहीं थकते हैं। पूरे स्थल पर कहीं कागज का एक टुकड़ा भी पड़ा नहीं दिखता जो वहाँ के सौन्दर्य में बाधक हो। इन सबसे प्रभावित होकर ही उत्तरप्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग ने जम्बूद्वीप रचना के चित्र से हस्तिनापुर की पहचान बनाते हुए विभाग द्वारा प्रकाशित फोल्डर में लिखा है-

jambudweep is the.......has today blossomed into a man-made heaven of unparallel superlatives and natural wonders.

हस्तिनापुर तीर्थक्षेत्र पर पहुँचने वाले प्रत्येक तीर्थयात्री के लिए जम्बूद्वीप स्थल पर लगभग २०० कमरे हैं जिनमें से अधिकतर डीलक्स फ्लैट और अनेक कोठियाँ भी आधुनिक सुविधायुक्त हर समय तैयार रहते हैं। आवास सुविधा के साथ-साथ शुद्ध निःशुल्क विशाल भोजनालय अपने अतिथियों की सुबह से शाम तक सेवा में तत्पर हैं। जगह-जगह पानी की सुविधा हेतु जलपरी, वाटरवूâलर, हैण्डपम्प, नल आदि उपलब्ध हैं।

इन सबके अतिरिक्त वहाँ नित्य ही नवनिर्माण का कार्य चालू रहता है। सुन्दर पक्की सड़वेंâ, हरे-हरे लॉन, पूâलों के उद्यान, झूले, नाव, खेल के मैदान, बच्चों की रेल, ऐरावत हाथी आदि परिसर की शोभा में चार चाँद लगाते हैं। कभी-कभी बिजली न होने पर यात्री देर रात तक रुककर जम्बूद्वीप के लाइट-फौव्वारे की शोभा देखकर ही वापस जाने की इच्छा रखते हैं।

हस्तिनापुर पूजा

यह भी देखे हस्तिनापुर तीर्थ पूजा

हस्तिनापुर में आये हुए यात्री भगवान् की पूजा अर्चना करते हैंहस्तिनापुर - Hastinaapura. Name of the country of king somprabh & brother shreyans, where Lord Rishabhdev took first food intake after one year’s fasting. The birth place of Tirthankars (Jaina Lords) shantinath kunthunath, Arahnath and two Chakravatirs (emperors). Presently a great pilgrimage place with the construction of Jambudvip constructed on the inspiration of Ganini Aryika Shri Gyanmati Mataji. कुरुजांगल देष की राजधानी। राजा सोमप्रभ एवं उनके भाई श्रेयांस ने यहाॅ भगवान वृषभदेव के एक वर्ष निराहार रहने के पश्चात् इक्षु रस के द्वारा प्रथम, आहार कराया था। तीर्थकर शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ, चक्रवर्ती सुभौम व सनत्कुमार की जन्म नगरी। वर्तमान मे यहाॅ पर गणिनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से जम्बूद्वीप नामक भव्य तीर्थ का निर्माण किया गया है जिसमे जंबूद्वीप, कमलमंदिर आदि अनेक सुन्दर रचनाएं निर्मित है।