Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास टिकैतनगर-बाराबंकी में चल रहा है, दर्शन कर लाभ लेवें |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

०१८.सुलोचना ने जिनमंदिर व जिनप्रतिमाएँ बनवार्इं

ENCYCLOPEDIA से
Jainudai (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित २२:५३, १८ जुलाई २०१७ का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सुलोचना ने जिनमंदिर व जिनप्रतिमाएँ बनवार्इं

कारयन्ती जिनेन्द्रार्चाश्चित्रा मणिमयीर्बहूः। तासां हिरण्मयान्येव विश्वोपकरणान्यपि।।१७३।।

तत्प्रतिष्ठाभिषेकान्ते महापूजाः प्रकुर्वती। मुहुः स्तुतिभिरथ्र्याभिः स्तुवती भक्तितोऽर्हतः।।१७४।।
ददती पात्रदानानि मानयन्ती महामुनीन्। शृण्वती धर्ममाकण्र्य भावयन्ती मुहुर्मुहुः।।१७५।।
आप्तागमपदार्थांश्च प्राप्तसम्यक्त्वशुद्धिका। अथ फाल्गुननन्दीश्वरेऽसौ भक्त्या जिनेशिनाम्।।१७६।।
विधायाष्ठाह्निकीं पूजामभ्यच्र्यार्चा यथाविधि। कृतोपवासा तन्वङ्गी शेषां दातुमुपागता।।१७७।।
नृपं सिंहासनासीनं सोऽप्युत्थाय कृताञ्जलिः। तद्दत्तशेषामादाय निधाय शिरसि स्वयम्।।१७८।।
उपवासपरिश्रान्ता पुत्रिके त्वं प्रयाहि ते। शरणं पारणाकाल इति कन्यां व्यसर्जयत्।।१७९।।

उस सुलोचना ने श्री जिनेन्द्रदेव की अनेक प्रकार की रत्नमयी बहुत सी प्रतिमाएँ बनवाई थीं और उनके सब उपकरण भी सुवर्ण ही के बनवाये थे। प्रतिष्ठा तथा तत्सम्बन्धी अभिषेक हो जाने के बाद वह उन प्रतिमाओं की महापूजा करती थी, अर्थपूर्ण स्तुतियों के द्वारा श्री अर्हंन्तदेव की भक्तिपूर्वक स्तुति करती थी, पात्र दान देती थी, महामुनियों का सम्मान करती थी, धर्म सुनती थी तथा धर्म को सुनकर आप्त, आगम और पदार्थों का बार-बार चिन्तवन करती हुई सम्यग्दर्शन की शुद्धता को प्राप्त करती थी। अथानन्तर-फाल्गुन महीने की अष्टान्हिका में उसने भक्तिपूर्वक श्री जिनेन्द्रदेव की अष्टाह्रिकी पूजा की, विधिपूर्वक प्रतिमाओं की पूजा की, उपवास किया और वह कृशांगी पूजा के शेषाक्षत देने के लिए सिंहासन पर बैठे हुए राजा अकम्पन के पास गयी। राजा ने भी उठकर और हाथ जोड़कर उसके दिए हुए शेषाक्षत लेकर स्वयं अपने मस्तक पर रखे तथा यह कहकर कन्या को विदा किया कि हे पुत्रि, तू उपवास से खिन्न हो रही है अब घर जा, यह तेरे पारणा का समय है।।१७३ से १७९।।

(आदिपुराण पर्व ४३ ,पृ॰ ३६८ ३६९)