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"०१.प्रथम चातुर्मास (सन् १९५६, जयपुर खानिया-राजस्थान)" के अवतरणों में अंतर

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[[श्रेणी:आर्यिका_दीक्षा_के_५१_चातुर्मास]]
 
  
==<center><font color=#FF1493>'''प्रथम चातुर्मास (सन् १९५६, जयपुर खानिया-राजस्थान)'''</font color></center>==
 
 
आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज अत्यन्त मृदुभाषी थे। जब भी आर्यिका ज्ञानमती जी आचार्यश्री के पास जातीं, तो आचार्यश्री माताजी के ज्ञान के क्षयोपशम एवं पठन-पाठन की शैली से बहुत ही प्रसन्नचित्त होते थे।
 
 
यहाँ पर पूज्य आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने अपनी शिष्या क्षुल्लिका जिनमती जी को सागार धर्मामृत, गोम्मट्टसार, परीक्षामुख और न्यायदीपिका का अध्ययन करा दिया।
 
 
चातुर्मास के बाद-आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के संघ का विहार जयपुर में ही प्रमुख मंदिर एवं कॉलोनियों में चलता रहा। जयपुरवासियों ने आचार्यश्री को जयपुर से आगे प्रस्थान ही नहीं करने दिया। समाज की असीम भक्ति देखकर अगला चातुर्मास पुन: खानिया ही करने का आचार्यश्री ने निर्णय करके घोषणा कर दी। फिर तो जयपुर समाज के हर्ष का ठिकाना ही न रहा।
 

०९:०१, २२ अगस्त २०१४ के समय का अवतरण