Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास टिकैतनगर-बाराबंकी में चल रहा है, दर्शन कर लाभ लेवें |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

०१. गतिमार्गणा के अन्तर्गत नरक गति में नारकी जीवों का काल निरूपण

ENCYCLOPEDIA से
ALKA JAIN (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित १९:५०, ६ फ़रवरी २०१५ का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


विषय सूची

गतिमार्गणा के अन्तर्गत नरक गति में नारकी जीवों का काल निरूपण

Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg
Images (1)ccv.jpg


अथ चतुर्थोमहाधिकार:

मंगलाचरणं
उपजातिछंद-
सिद्धिप्रदाः षोडशभावना याः, तीर्थंकरैः प्राक् खलु भवितास्ताः।
प्रवर्तयन्ते भुवि धर्मतीर्थं, तास्तांश्च नित्यं प्रणुमः स्वसिद्धयै।।१।।
अथ स्वात्मोपलब्धिलक्षणसिद्धगतिविरहित-चतुर्गतिप्रतिपादकः चतुःसप्तति सूत्रैः कालानुगमे चतुर्थो महाधिकारः प्रारभ्यते। तत्र शारीरिक-मानसिक-आगन्तुक-दुःखपराकाष्ठालक्षणनरकगतिनामान्तराधिकारे षड्भिरन्तरस्थलैः चतुर्दशसूत्रैः व्याख्यानं क्रियते। तत्र तावत् प्रथमस्थले सामान्येन नारकमिथ्या-दृष्टिकालप्रतिपादनत्वेन ‘‘आदेसेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं द्वितीयस्थले सासादनमिश्रनारक-कालकथनमुख्यत्वेन ‘‘सासण’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनु तृतीयस्थले असंयतनारकाणां कालप्रतिपादनत्वेन ‘‘असंजद’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनंतरं चतुर्थस्थले पृथिवीसप्तसु मिथ्यादृष्टिनारकाणां कालनिरूपणत्वेन ‘‘पढमाए’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत्पश्चात् पंचमस्थले आसामेव पृथिवीनां सासादनमिश्रगुणस्थानकालप्ररूपणत्वेन ‘‘सासण’’इत्यादिसूत्रमेकं। ततः परं षष्ठस्थले सर्वासु पृथिवीषु असंयतनारकाणां सम्यक्त्वकालप्ररूपणत्वेन ‘‘असंजद’’ इत्यादिसूत्रत्रयं इति समुदायपातनिका।
अधुना मार्गणायां तावन्नरकगतौ मिथ्यादृष्टिकालनिरूपणाय सूत्रमवतरति-आदेसेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइएसु मिच्छादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।३३।।
नरकगतौ सर्वकालं मिथ्यादृष्टिव्युच्छेदाभावात्।
एकजीवापेक्षया सूत्रमवतार्यते-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।३४।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-
एकः सम्यग्मिथ्यादृष्टिरसंयतसम्यग्दृष्टिर्वा पूर्वमपि बहुवारान् मिथ्यात्वपरिणतः संक्लेशं पूरयित्वा मिथ्यादृष्टिर्जातः। सर्वजघन्यमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा विशुद्धो भूत्वा सम्यक्त्वं सम्यग्मिथ्यात्वं वा प्रतिपन्नः। एवं मिथ्यादृष्टेर्जघन्यकालः गतः।
उत्कृष्टकालापेक्षया सूत्रमवतार्यते-उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि।।३५।।
एकः तिर्यङ् मनुष्यो वा सप्तमपृथिव्यां उत्पन्नः। तत्र मिथ्यात्वेन सह त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि स्थित्वा नरकान्निर्गतः। लब्धोऽत्रोत्कृष्टकालः। एवं प्रथमस्थले सामान्यनारकमिथ्यादृष्टिकालकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
संप्रति नारकसासादन-मिश्रकालनिरूपणाय सूत्रमवतरति-सासणसम्मादिट्ठी सम्मामिच्छादिट्ठी ओघं।।३६।।
एतयोः कालप्ररूपणा गुणस्थानवत् ज्ञातव्या।
एवं द्वितीयस्थले सासादनमिश्रनारककालकथनेन एकं सूत्रं गतं।
नारकासंयतसम्यग्दृष्टिनानाजीवकालनिरूपणाय सूत्रमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।३७।।
नरकगतौ असंयतसम्यग्दृष्टिविरहितकालाभावात्।
एकजीवापेक्षया कालप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।३८।।
यः कश्चित् पूर्वं बहुवारं सम्यक्त्वे परिवर्तनं कृत्वा स एव जीवः पुनः मिथ्यादृष्टिः सम्यग्मिथ्यादृष्टिर्वा विशुद्धो भूत्वा सम्यक्त्वं प्रतिपन्नः। तत्र सर्वलघु-अंतर्मुहूर्तं स्थित्वा सम्यग्मिथ्यात्वं मिथ्यात्वं वा गतः। एवं नरकगति सम्यग्दृष्टिजघन्यकालप्ररूपणा कृता।

अथ चतुर्थ महाधिकार प्रारंभ

मंगलाचरण

श्लोकार्थ-सिद्धि पद को प्रदान करने वाली सोलहकारण भावनाएं हैं, इन भावनाओं को तीर्थंकर भगवान् पूर्व जन्म में भावित करके तीर्थंकर अवस्था में धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करते हैं। ऐसी उन सोलहकारण भावनाओं को तथा उनकी भावना भाने वाले तीर्थंकर भगवन्तों को हम स्वात्मा की सिद्धि के लिए नमस्कार करते हैं।।१।।

स्वात्मा की उपलब्धि लक्षण वाली सिद्धगति से विरहित चतुर्गति का प्रतिपादन करने वाला चौहत्तर (७४) सूत्रों के द्वारा कालानुगम नाम का चतुर्थ महाधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से जहाँ शारीरिक, मानसिक, आगन्तुक आदि दु:ख पराकाष्ठा-चरमसीमा को प्राप्त हैं ऐसी नरक गति नाम के प्रथम अन्तराधिकार में छह अन्तस्र्थलों के द्वारा चौदह सूत्रों में व्याख्यान करेंगे। उनमें से प्रथम स्थल में सामान्य से मिथ्यादृष्टि नारकी जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु ‘‘आदेसेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके आगे द्वितीय स्थल में सासादन और मिश्र गुणस्थानवर्ती नारकियों का काल बतलाने वाला ‘‘सासण’’ इत्यादि एक सूत्र है। उसके पश्चात् तृतीय स्थल में असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियों का काल कथन करने हेतु ‘‘असंजद’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ स्थल में सात नरकपृथिवियों में मिथ्यादृष्टि नारकियों का काल निरूपण करने वाले ‘‘पढमाए’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् पंचमस्थल में इन्हीं सातों नरक पृथिवियों के नारकियों का सासादन और मिश्रगुणस्थान में काल का प्ररूपण करने वाला ‘‘सासण’’ इत्यादि एक सूत्र है। उसके आगे छठे स्थल में सभी पृथिवियों के असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियों का सम्यक्त्वकाल प्ररूपण करने की मुख्यता वाले ‘‘असंजद’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है।

अब मार्गणा के अन्तर्गत सर्वप्रथम नरकगति में मिथ्यादृष्टि जीवों का काल निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

आदेश की अपेक्षा गतिमार्गणा के अनुवाद से नरकगति में नारकियों में मिथ्यादृष्टि जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।३३।।

हिन्दी टीका-नरकगति में सर्वकाल मिथ्यादृष्टि जीवों के व्युच्छेद का अभाव पाया जाता है। अर्थात् वहाँ मिथ्यादृष्टि जीवों का सद्भाव सदैव पाया जाता है।

अब एक जीव की अपेक्षा कथन करने हेतु सूत्र का अवतार किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

एक जीव की अपेक्षा नारकी मिथ्यादृष्टि का जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त है।।३४।।

हिन्दी टीका-एक सम्यग्मिथ्यादृष्टि अथवा असंयतसम्यग्दृष्टि जीव जो कि पहले भी बहुत बार मिथ्यात्व को परिणत हो चुका है, संक्लेश को पूरित करके मिथ्यादृष्टि हो गया। वहाँ पर सर्व जघन्य अन्तर्मुहूर्त काल रहकर, विशुद्ध होकर, सम्यक्त्व को अथवा सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। इस प्रकार से मिथ्यादृष्टि के जघन्यकाल की प्ररूपणा हुई।

अब उत्कृष्टकाल की अपेक्षा सूत्र अवतरित किया जाता है-

सूत्रार्थ-

एक जीव की अपेक्षा नारकी मिथ्यादृष्टि का उत्कृष्ट काल तेंतीस सागरोपम है।।३५।।

हिन्दी टीका-एक तिर्यंच अथवा मनुष्य सातवीं पृथिवी में उत्पन्न हुआ। वहाँ पर मिथ्यात्व के साथ तेंतीस सागरोपम काल रहकर बाहर निकला। इस प्रकार नारकी मिथ्यादृष्टि के तेंतीस सागरोपम उत्कृष्ट काल उपलब्ध हुआ।

इस प्रकार प्रथम स्थल में सामान्य नारकियों का मिथ्यात्वकाल कथन करने की मुख्यता वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब सासादन और मिश्र गुणस्थानवर्ती नारकियों का काल निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकी जीवों का एक और नाना जीवों की अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट काल ओघ के समान है।।३६।।

हिन्दी-इन दोनों गुणस्थानवर्ती नारकियों की कालप्ररूपणा गुणस्थान के समान जानना चाहिए। इस प्रकार द्वितीयस्थल में सासादन और मिश्र गुणस्थानवर्ती नारकियों का काल बतलाने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ। अब असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियों में नाना जीवों की अपेक्षा काल का निरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है।

सूत्रार्थ-

असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।३७।।

हिन्दी टीका-नरकगति में असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों से विरहित काल का अभाव है। अर्थात् सातों नरकों में सम्यग्दर्शन के निमित्त उपस्थित रहने के कारण वहाँ सदैव कोई न कोई सम्यग्दृष्टि रहते ही हैं इसीलिए कोई काल सम्यग्दृष्टियों से रहित नहीं होता है।

अब एक जीव की अपेक्षा काल का प्ररूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

एक जीव की अपेक्षा असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी का जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त है।।३८।।

हिन्दी टीका-एक मिथ्यादृष्टि अथवा सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव जो सम्यक्त्व में पहले बहुत बार परिवर्तन कर चुका है पुन: विशुद्ध हो करके सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। वहाँ पर सर्व लघु अन्तर्मुहूर्त काल रह करके सम्यग्मिथ्यात्व को अथवा मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। इस प्रकार से नरकगति में असंयतसम्यग्दृष्टि के जघन्यकाल की प्ररूपणा हुई।

अस्यैव उत्कृष्टकालकथनाय सूत्रमवतरति-

अस्यैव उत्कृष्टकालकथनाय सूत्रमवतरति-उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि।।३९।।

सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-
एकः तिर्यङ् मनुष्यो वा अष्टाविंशतिप्रकृतिसत्कर्मी मिथ्यादृष्टिः सप्तमायां पृथिव्यां उत्पन्नः। षट्पर्याप्तिभिः पर्याप्तकः (१) विश्रान्तः (२) विशुद्धो (३) वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपन्नः। पुनः अंतर्मुहूर्तावशेषायुःस्थित्यां मिथ्यात्वं गतः () आयुर्बन्धं कृत्वा (५) अंतर्मुहूर्तं विश्राम्य (६) ततः निर्गतः। एवं षडन्तर्मुहूर्तैः ऊनानि त्रसस्त्रिंशत्सागरोपमानि असंयतसम्यग्दृष्टेः उत्कृष्टकालः।
एवं तृतीयस्थले सामान्यनारकसम्यग्दृष्टिकालप्ररूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति सप्तस्वपिपृथिवीषु मिथ्यादृष्टिनानाजीवकालकथनाय सूत्रमवतरति-पढमाए जाव सत्तमाए पुढवीए णेरइएसु मिच्छादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।४०।।
सूत्रं सुगममेतत्।
जघन्यकालनिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।४१।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-यः कश्चित् पूर्वं बहुवारं मिथ्यात्वं गतः एष मिथ्यात्वचरो जीव: स्व-स्वपृथिवीषु स्थितासंयतसम्यग्दृष्टिः सम्यग्मिथ्यादृष्टिर्वा पुनः परिणामनिमित्तेन मिथ्यात्वं गतः। सर्वजघन्यमंतर्मुहूर्तं स्थित्वा पूर्वोक्तगुणस्थानयोरन्यतरगुणस्थानं गतः। एवं सप्तानां पृथिवीनां मिथ्यादृष्टिजीवस्य जघन्यकालो गतः।
अस्यैवोत्कृष्टकालनिरूपणाय सूत्रमवतरति-उक्कस्सेण सागरोवमं तिण्णि सत्त दस सत्तारस वावीस तेत्तीसं सागरोव-माणि।।४२।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-
प्रथमपृथिव्यां एकं सागरोपमं, द्वितीयपृथिव्यां त्रीणि सागरोपमाणि, तृतीयपृथिव्यां सप्त, चतुथ्र्यां दश, पंचम्यां सप्तदश, षष्ठ्यां द्वाविंशतिः, सप्तम्यां च त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि मिथ्यादृष्टेरुत्कृष्टकालः। एतेभ्योऽधिकायुर्बन्धाभावात्।
एवं चतुर्थस्थले सप्तपृथिवीषु मिथ्यादृष्टिकालकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
सासादनमिश्रयोः कालप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-सासणसम्मादिट्ठी सम्मामिच्छादिट्ठी ओघं।।४३।।
सूत्रं सुगमं एतत्।
एवं पंचमस्थले सप्तपृथिवीगतसासादनमिश्रकालकथनेन एकं सूत्रं गतं।
सप्तपृथिवीनां असंयतसम्यग्दृष्टिनानाजीवकालकथनाय सूत्रमवतरति-असंजदसम्मादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा।।४४।।
सूत्रं सुगमं।
एकजीवापेक्षया जघन्यकालनिरूपणाय सूत्रमवतरति-एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।४५।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सप्तसु पृथिवीषु स्थितः बहुशः सम्यक्त्वचरः अष्टाविंशतिसत्कर्मी मिथ्यादृष्टिः सम्यग्मिथ्यादृष्टिर्वा सम्यक्त्वं प्रतिपद्य अंतर्मुहूर्तं स्थित्वा मिथ्यात्वं सम्यग्मिथ्यात्वं वा प्रतिपन्नः। एष सप्तसु पृथिवीसु असंयतसम्यग्दृष्टिजघन्यकालः प्ररूपितः।
एकजीवापेक्षया उत्कृष्टकालप्ररूपणाय सूत्रमवतरति-उक्कस्सं सागरोवमं तिण्णि सत्त दस सत्तारस वावीस तेत्तीसं सागरोवमाणि देसूणाणि।।४६।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-एकः तिर्यङ् मनुष्यो वा अष्टाविंशतिसत्कर्मसहितः मिथ्यादृष्टिः प्रथमायां पृथिव्यां वा एवं यावत्सप्तम्यां वा उत्पन्नः। षट्पर्याप्तैः पर्याप्तगतः (१) विश्रान्तः (२) विशुद्धो (३) वेदसम्यक्त्वं प्रतिपन्नः (४)। सम्यक्त्वेन स्व-स्वोत्कृष्टायुःस्थितिं स्थित्वा निर्गत्य ततः मनुष्येषु उत्पन्नः। एवं त्रिभिरन्तर्मुहूर्तैः ऊन: स्वस्वोत्कृष्टायुःस्थितिप्रमाणं असंयतसम्यग्दृष्टिउत्कृष्टकालो भवति।
केवलं-सप्तम्यां षट्अंतर्मुहूर्तैः ऊना उत्कृष्टस्थितिरिति वक्तव्यं, तत्र मिथ्यात्वगुणेन विना निर्गमनाभावात्।
असंयतसम्यग्दृष्टौ आगामिभवायुः बंधं कृत्वा विश्रान्तः भूत्वा मिथ्यात्वं गत्वा सप्तमपृथिव्याः निःसृते सम्यक्त्वकालो बहुको लभ्यते?
न, सप्तमपृथिवीनारकाणां मनुष्येषूपपादाभावात्। तथा असंयतसम्यग्दृष्टीनामपि नरकतिर्यगायु-र्बंधाभावात्। येन गुणस्थानेनायुर्बन्धस्य संभवोऽस्ति, तेनैव गुणस्थानेन निर्गमनाच्च।
एवं षष्ठस्थले असंयतसम्यग्दृष्टिकालनिरूपणमुख्यत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि। इति नरक-गतिनामान्तराधिकारः समाप्तः।

अब उन्हीं चतुर्थ गुणस्थानवर्ती नारकियों का उत्कृष्ट काल कहने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी का उत्कृष्ट काल कुछ कम तेंतीस सागरोपम है।।३९।।

हिन्दी टीका-एक तिर्यंच अथवा मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीव मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता रखने वाला सातवीं पृथिवी में उत्पन्न हुआ। पुन: छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त हो (१), विश्राम लेता हुआ (२), विशुद्ध होकर (३), वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ। पुन: अन्तर्मुहूर्त काल प्रमाण आयुकर्म की स्थिति के अवशेष रहने पर मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ (४), वहाँ आगामी भव की आयु को बांधकर (५), अन्तर्मुहूर्त काल विश्राम लेकर (६), निकला। इस प्रकार छह अन्तर्मुहूर्तों से कम तेंतीस सागरोपम प्रमाण असंयतसम्यग्दृष्टि का उत्कृष्ट काल होता है। इस प्रकार तृतीय स्थल में सामान्य नारकी और सम्यग्दृष्टि नारकियों का काल प्ररूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब सातों ही पृथिवियों में मिथ्यादृष्टि नाना जीवों का काल कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

प्रथम पृथिवी से लेकर सातवीं पृथिवी तक नारकियों में मिथ्यादृष्टि जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।४०।।

इस सूत्र का अर्थ सुगम है।

अब उपर्युक्त जीवों का जघन्यकाल निरूपित करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

एक जीव की अपेक्षा उक्त पृथिवियों के नारकी मिथ्यादृष्टि जीवों का जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त है।।४१।।

हिन्दी टीका-अपनी-अपनी पृथिवियों में स्थित तथा जिसने पहले भी बहुत बार मिथ्यात्व को प्राप्त किया है ऐसा कोई असंयतसम्यग्दृष्टि अथवा सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव, परिणामों के निमित्त से मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। वहाँ पर सर्व जघन्य अन्तर्मुहूर्त काल रह करके पूर्वोक्त दोनों गुणस्थानों में से किसी एक गुणस्थान को प्राप्त हुआ। इस प्रकार से सातों पृथिवियों के प्रत्येक मिथ्यादृष्टि जीव के जघन्य अन्तर्मुहूर्त काल की प्ररूपणा की गई है।

अब उन्हीं जीवों का उत्कृष्ट काल निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

उक्त सातों पृथिवियों के मिथ्यादृष्टि जीवों का उत्कृष्टकाल क्रमश: एक सागरोपम, तीन, सात, दस, सत्तरह, बाईस और तेंतीस सागरोपम प्रमाण है।।४२।।

हिन्दी टीका-प्रथम पृथिवी में एक सागरोपम, द्वितीय पृथिवी में तीन सागरोपम, तृतीय पृथिवी में सात सागरोपम, चौथी पृथिवी में दश सागरोपम, पांचवी पृथिवी में सत्तरह सागरोपम, छठी पृथिवी में बाईस सागरोपम और सातवीं पृथिवी में तेंतीस सागरोपम मिथ्यादृष्टि नारकों का उत्कृष्टकाल है, क्योंकि इनसे अधिक आयु बंध का अभाव है।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में सातों पृथिवियों में मिथ्यादृष्टि नारकियों का काल कथन करने की मुख्यता वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब सासादन और मिश्र गुणस्थानवर्ती जीवों का कालप्ररूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सातों पृथिवियों के सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का नाना और एक जीव संबंधी जघन्य और उत्कृष्ट काल ओघ के समान है।।४३।।

सूत्र का अर्थ सुगम है।

इस प्रकार पंचमस्थल में सातों नरक पृथिवियों के सासादन और मिश्र गुणस्थानवर्तियों का काल बतलाने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब सातों पृथिवियों के असंयतसम्यग्दृष्टि नाना जीवों का काल कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सातों पृथिवियों में असंयतसम्यग्दृष्टि जीव कितने काल तक होते हैं? नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होते हैं।।४४।।

सूत्र सरल है।

अब एक जीव की अपेक्षा जघन्यकाल का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

एक जीव की अपेक्षा सातों पृथिवियों के असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी जीवों का जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त है।।४५।।

हिन्दी टीका-सातों ही पृथिवियों में स्थित पूर्व में अनेक बार सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला मिथ्यादृष्टि अथवा सम्यग्दृष्टि जीव सम्यक्त्व को प्राप्त होकर और अन्तर्मुहूर्त काल रहकर पुन: मिथ्यात्व को अथवा सम्यग्मिथ्यात्व को प्राप्त हुआ। यह सातों ही पृथिवियों में असंयतसम्यग्दृष्टि का जघन्य काल प्ररूपण किया गया।

अब एक जीव की अपेक्षा उत्कृष्टकाल प्ररूपण करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सातों पृथिवियों के असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी जीवों का उत्कृष्टकाल क्रमश: कुछ कम एक सागरोपम, तीन, सात, दश, सत्तरह, बाईस और तेंतीस सागरोपम है।।४६।।

हिन्दी टीका-मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता रखने वाला एक तिर्यंच अथवा मनुष्य मिथ्यादृष्टि जीव पहली पृथिवी में अथवा दूसरी पृथिवी में, इस प्रकार से लगाकर सातवीं पृथिवी में उत्पन्न हुआ। छहों पर्याप्तियों से पर्याप्त हो (१), विश्राम लेता हुआ (२), विशुद्ध होकर (३) वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त हुआ (४) सम्यक्त्व के साथ अपनी-अपनी पृथिवी की उत्कृष्ट आयुकर्म की स्थिति प्रमाण रह करके वहाँ से निकलकर मनुष्यों में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार से तीन अन्तर्मुहूर्तों से कम अपनी-अपनी पृथिवी की उत्कृष्ट आयु स्थिति ही उस-उस पृथिवी के असंयतसम्यग्दृष्टि का उत्कृष्ट काल होता है। विशेष बात केवल यह है कि सातवीं पृथिवी में छह अन्तर्मुहूर्तों से कम उत्कृष्ट स्थिति होती है, ऐसा कहना चाहिए, क्योंकि वहाँ से मिथ्यात्व गुणस्थान के बिना निर्गमन का अभाव है, अर्थात् मिथ्यात्व के अतिरक्त अन्य गुणस्थानों से निकलना नहीं हो सकता है।

शंका-असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान में आगामी भव की आयु को बांधकर विश्रान्त होता हुआ मिथ्यात्व को प्राप्त होकर सातवीं पृथिवी से निकलने पर सम्यक्त्व का काल बहुत प्राप्त होता है?

समाधान-नहीं, क्योंकि सातवीं पृथिवी के नारकों का मनुष्यों में उत्पाद नहीं होता है तथा असंयतसम्यग्दृष्टियों के भी नारक और तिर्यंच आयु के बंध का अभाव है। दूसरी बात यह भी है कि जिस गुणस्थान से आयु का बंध संभव है, उस ही गुणस्थान से उसका निर्गमन भी होता है।

इस प्रकार छठे स्थल में असंयत सम्यग्दृष्टि नारकियों का काल निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

यह नरकगति नाम का अन्तराधिकार समाप्त हुआ।