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०२.इन्द्रिय मार्गणा अधिकार

ENCYCLOPEDIA से
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इन्द्रिय मार्गणा अधिकार

अथ इन्द्रियमार्गणाधिकार:

अथ त्रिभि:स्थलैः चतुर्दशसूत्रैः इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकारः प्रारभ्यते । तत्र तावत् प्रथमस्थले क्षेत्रानुगमे एकेन्द्रियजीवानां क्षेत्रकथनपरत्वेन ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रषट्कं । तदनु द्वितीयस्थले विकलत्रयाणां क्षेत्रनिरूपणत्वेन ‘‘बेइंदिय’’इत्यादिसूत्रद्वयं। तदनंतरं तृतीयस्थले पंचेन्द्रियाणां क्षेत्रप्रतिपादनत्वेन ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादिषट्सूत्राणि इति समुदायपातनिका।
अधुना एकेन्द्रियाणां क्षेत्रप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
इंदियाणुवादेण एइंदिया सुहुमेइंदिया पज्जत्ता अपज्जत्ता सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।१८।।
सव्वलोगे।।१९।।
बादरेइंदिया पज्जत्ता अपज्जत्ता सत्थाणेण केवडिखेत्ते ?।।२०।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।२१।।
समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।२२।।
सव्वलोए।।२३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र एकेन्द्रियेषु विहारवत्स्वस्थानं नास्ति, स्थावराणां विहारभावविरोधात्। समुद्घातेषु तैजसाहारकेवलिसमुद्घाता न संति। सूक्ष्मैकेन्द्रियेषु वैक्रियिकसमुद्घातोऽपि नास्ति। अतः स्वस्थान-वेदना-कषाय-मारणान्तिक-उपपादपरिणताः सूक्ष्मैकेन्द्रियास्तेषां पर्याप्ताः अपर्याप्ताश्च सर्वलोके संति, आनन्त्यात्।
बादरैकेन्द्रियाः पर्याप्ताः अपर्याप्ताश्च त्रयाणां लोकानां संख्यातभागे, नर-तिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुणे च तिष्ठन्ति।
किं कारणं ?
मंदरपर्वतमूलादुपरि यावत् शतारसहस्रारकल्प इति पंचरज्जु-उत्सेधेन समचतुरस्रा लोकनाली वातेन आपूर्णा। तस्मिन् ‘एकोनपंचाशद्रज्जुप्रतराणां यदि एवंâ जगत्प्रतरं लभ्यते तर्हि पंचरज्जुमात्ररज्जुप्रतराणां किं लभामः’ इति फलगुणितमिच्छितं प्रमाणेनापवर्तिते द्वे पंचभागोन-एकोनसप्ततिरूपैः घनलोके भागे हते एकभागः आगच्छति। पुनः तस्मिन् लोकपर्यन्तस्थितवातक्षेत्रं संख्यातयोजनबाहल्यजगत्प्रतरप्रमाणं, अष्टपृथिवीक्षेत्रं बादरजीवाधारभूतं संख्यातयोजनबाहल्यजगत्प्रतरप्रमाणं, अष्टपृथिवीनां अधः- स्थितसंख्यातयोजनबाहल्यजगत्प्रतरप्रमाणवातक्षेत्रं आनीय प्रक्षिप्ते लोकस्य संख्यातभागमात्रं अनन्तानंतबादरैकेन्द्रिय-बादरैकेन्द्रियपर्याप्त-बादरैकेन्द्रियापर्याप्तजीवापूरितं क्षेत्रं जातं ।
तेन इमे त्रयोऽपि बादरैकेन्द्रियाः स्वस्थानेन त्रयाणां लोकानां संख्यातभागे तिष्ठन्ति इति कथितं भवति।
कश्चिदाह-एते त्रयोऽपि बादरैकेन्द्रियाः मारणान्तिक-उपपादपदाभ्यां सर्वलोके भवन्ति। वेदना-कषायसमुद्घाताभ्यां त्रयाणां लोकानां संख्यातभागे, नरतिर्यग्लोकाभ्यां असंख्यातगुणे। वैक्रियिकपदेन बादरैकेन्द्रियापर्याप्तव्यतिरिक्त-बादरैकेन्द्रियाः चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागे भवन्ति। ततः‘समुद्घातेन सर्वलोके’ इति वचनं न घटते ?
नैष दोषः, देशामर्शकत्वात्।
एवं प्रथमस्थले एकेन्द्रियाणां क्षेत्रनिरूपणत्वेन सूत्रषट्कं गतम्।
संप्रति द्वीन्द्रियादिविकलत्रयाणां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
बेइंदिय-तेइंदिय-चउिंरदिय तस्सेव पज्जत्त-अपज्जत्ता सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।२४।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।२५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-स्वस्थानस्वस्थानविहारवत्स्वस्थानवेदनाकषायसमुद्घातगता एते द्वीन्द्रियादयः षडपि वर्गाः त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे तिष्ठन्ति, पर्याप्तक्षेत्रस्य प्राधान्यात्। एतेषां चैव त्रयोऽपर्याप्ताः चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागः सार्धद्वयद्वीपाद-संख्यातगुणः, पल्योपमस्य असंख्यातभागेन खण्डितोत्सेधघनांगुलमात्रावगाहनत्वात्। मारणान्तिक-उपपादगताः नवापि वर्गाः त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे नर-तिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुणे तिष्ठन्ति। वैक्रियिकपदं विकलत्रयेषु नास्ति, स्वाभाविकत्वात्।
एवं द्वितीयस्थले विकलत्रयजीवानां क्षेत्रनिरूपणत्वेन द्वे सूत्रे गते ।


अथ इन्द्रियमार्गणा अधिकार

अब तीन स्थलों में चौदह सूत्रों के द्वारा इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथल स्थल में क्षेत्रानुगम में एकेन्द्रिय जीवों के क्षेत्रकथन की मुख्यता वाले ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में विकलत्रय जीवों का क्षेत्रनिरूपण करने वाले ‘‘बेइंदिय’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। तदनंतर तृतीय स्थल में पंचेन्द्रिय जीवों का क्षेत्र प्रतिपादन करने वाले ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब एकेन्द्रिय जीवों का क्षेत्र प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

इन्द्रियमार्गणानुसार एकेन्द्रिय, एकेन्द्रिय पर्याप्त, एकेन्द्रिय अपर्याप्त, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त और सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।१८।।

पूर्वोक्त एकेन्द्रिय जीव उक्त पदों से सर्वलोक में रहते हैं।।१९।।

बादर एकेन्द्रिय, बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त और बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव स्वस्थान से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।२०।।

उक्त बादर एकेन्द्रिय जीव लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।२१।।

उक्त बादर एकेन्द्रिय जीव समुद्घात और उपपाद से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।२२।।

उक्त बादर एकेन्द्रिय जीव समुद्घात और उपपाद पदों से सर्वलोक में रहते हैं।।२३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ एकेन्द्रियों में विहारवत्स्वस्थान नहीं होता, क्योंकि स्थावर जीवों के विहार का विरोध है। समुद्घातों में तैजससमुद्घात, आहारकसमुद्घात और केवलिसमुद्घात एकेन्द्रियों में नहीं है। सूक्ष्म एकेन्द्रियों में वैक्रियिकसमुद्घात भी नहीं है। अत: स्वस्थान, वेदनासमुदघात, कषायसमुद्घात, मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद इन पदों से परिणत सूक्ष्म एकेन्द्रिय व उनके पर्याप्त व अपर्याप्त जीव सर्वलोक में रहते हैं, क्योंकि वे अनन्त हैं।

बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त और अपर्याप्त जीव तीन लोकों के संख्यातवें भाग में तथा मनुष्यलोक व तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं।

शंका-उक्त क्षेत्रप्रमाण का कारण क्या है ?

समाधान-क्योंकि मन्दर पर्वत-सुमेरु पर्वत के मूलभाग से ऊपर शतार-सहस्रार कल्प तक पाँच राजु ऊँची, समचतुष्कोण लोकनाली वायु से परिपूर्ण है। उनमें उनचास प्रतररज्जुओं का यदि एक जगत्प्रतर प्राप्त होता है, तो पाँच राजु प्रमाण राजुप्रतरों का कितना जगत्प्रतर प्राप्त होगा, इस प्रकार फलराशि से गुणित इच्छाराशि को प्रमाणराशि से अपवर्तित करने पर दो बटे पाँच भाग कम उनहत्तर रूपों से घनलोक को भाजित करने पर लब्ध एक भागप्रमाण प्राप्त होता है। पुन: उसमें संख्यात योजन बाहल्यरूप जगत्प्रतरप्रमाण लोकपर्यन्त स्थित वातक्षेत्र को संख्यात योजन बाहल्यरूप जगत्प्रतरप्रमाण ऐसे बादर जीवों के आधारभूत आठ पृथिवी क्षेत्र को और आठ पृथिवियों के नीचे स्थित संख्यात योजन बाहल्यरूप जगत्प्रतरप्रमाण वातक्षेत्र को लेकर मिला देने पर लोक के संख्यातवें भागमात्र अनन्तानन्त बादर एकेन्द्रिय, बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त व बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों से परिपूर्ण क्षेत्र होता है।

इस कारण ये तीनों ही बादर एकेन्द्रिय स्वस्थान से तीन लोकों के संख्यातवें भाग में एवं मनुष्य लोक व तिर्यग्लोक से संख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, ऐसा कहा है।

यहाँ कोई करता है कि-ये तीनों ही बादर एकेन्द्रिय जीव मारणान्तिकसमुद्घात और उपपाद पदों से सर्वलोक में रहते हैं। वेदना और कषाय समुद्घात से तीनों लोकों के संख्यात भाग में रहते है तथा मनुष्यलोक एवं तिर्यग्लोक से असंख्यात गुणे क्षेत्र में रहते हैं। वैक्रियिक पद से बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्तों को छोड़ शेष दो बादर एकेन्द्रिय चार लोकों के असंख्यातवें भाग में रहते हैं इस कारण ‘समुद्घात से सर्वलोक में रहते हैं’ यह कथन घटित नहीं होता है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यह सूत्र देशामर्शक है।

इस प्रकार से प्रथम स्थल में एकेन्द्रिय जीवों का क्षेत्रनिरूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

अब दो इन्द्रिय आदि विकलत्रय जीवों का क्षेत्र निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और इन तीनों के पर्याप्त व अपर्याप्त जीव स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद पद से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।२४।।

उक्त द्वीन्द्रियादिक जीव उक्त पदों से लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।२५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-स्वस्थान स्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात को प्राप्त ये द्वीन्द्रियादिक छहों वर्ग तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, क्योंकि यहाँ पर्याप्त क्षेत्र की प्रधानता है। इन्हीं के तीन अपर्याप्त जीव चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, क्योंकि वे पल्योपम के असंख्यातवें भाग से भाजित उत्सेध घनांगुलप्रमाण अवगाहना से युक्त होते हैं। मारणान्तिकसमुद्घात व उपपादपद को प्राप्त नौ ही जीवराशियाँ तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में तथा मनुष्यलोक व तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। वैक्रियिक पद विकलत्रय जीवों में नहीं होता है, क्योंकि उनका वैसा ही स्वभाव है।

इस प्रकार से द्वितीय स्थल में विकलत्रय जीवों का क्षेत्र निरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।


इदानीं पंचेन्द्रियाणां क्षेत्रप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-

पंचिंदिय-पंचिंदियपज्जत्ता सत्थाणेण उववादेण केवडिखेत्ते ?।।२६।।

लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।२७।।
समुग्घादेण केवडिखेत्ते ?।।२८।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे असंखेज्जेसु वा भागेसु सव्वलोगे वा।।२९।।
पंचिंदियअपज्जत्ता सत्थाणेण समुग्घादेण उववादेण केवडिखेत्ते  ?।।३०।।
लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।३१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगताः त्रयाणां लोकानां असंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे तिष्ठन्ति, प्रधानीकृतपर्याप्तराशेः संख्यातभागत्वात्। तैजसाहारसमुद्घातगताः चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागे, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे। दण्डगताः चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागे, मानुषक्षेत्राद् असंख्यातगुणे । कपाटसमुद्घातगताः त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे। मारणान्तिकसमुद्घातगताः त्रयाणां लोकानाम-संख्यातभागे, नरतिर्यग्लोकाभ्यामसंख्यातगुणे । एतेषां क्षेत्रविन्यासः ज्ञात्वा कर्तव्यः।
‘लोकस्यासंख्यातभागः’ इति निर्देशेन सूचितार्थाः एते। अथवा लोकस्यासंख्यातभागाः, वातवलयं मुक्त्वा प्रतरसमुद्घाते शेषाशेषलोकमात्राकाशप्रदेशे विसप्र्य स्थितजीवप्रदेशोपलंभात्। सर्वलोके वा, लोकपूरणे केवलिसमुद्घाते सर्वलोकाकाशं विसप्र्य स्थितजीवप्रदेशानामुपलंभात्।
तात्पर्यमेतत्-पंचेन्द्रियजीवानां केवलिभगवतां केवलिसमुद्घाते लोकपूरणे एव सर्वलोकः आपूर्णः ज्ञातव्यः। एकेन्द्रियाः अपि सर्वलोके तिष्ठन्ति अत्र तेषां विवक्षा नास्ति इति निश्चेतव्यः।
एवं तृतीयस्थले पंचेन्द्रियजीवानां क्षेत्रनिरूपणत्वेन षट्सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडे क्षेत्रानुगमनामषष्ठे महाधिकारे गणिनी-ज्ञानमती-कृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां इंद्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकारः समाप्तः ।

अब पंचेन्द्रिय जीवों का क्षेत्र प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीव स्वस्थान और उपपादपदों की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।२६।।

पंचेन्द्रिय व पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीव स्वस्थान और उपपादपद की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।२७।।

पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीव समुद्घात की अपेक्षा कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।२८।।

पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीव समुद्घात की अपेक्षा लोक के असंख्यातवें भाग में अथवा असंख्यात बहुभाग में अथवा सर्वलोक में रहते हैं।।२९।।

पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीव स्वस्थान, समुद्घात और उपपाद से कितने क्षेत्र में रहते हैं ?।।३०।।

पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीव उक्त पदों से लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं।।३१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त उक्त जीव तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, क्योंकि वे प्रधानभूत पर्याप्तराशि के संख्यातवें भाग हैंं। तैजससमुद्घात और आहारक समुद्घात को प्राप्त उक्त जीव चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और मानुष क्षेत्र के संख्यातवें भाग में रहते हैं। दण्ड समुद्घात को प्राप्त उक्त जीव चार लोकों के असंख्यातवें भाग में और मानुषक्षेत्र से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। कपाटसमुद्घात को प्राप्त वे ही जीव तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भाग में और ढाई द्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त उक्त जीव तीन लोकों के असंख्यातवें भाग में तथा मनुष्यलोक व तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। इनका क्षेत्रविन्यास जानकर करना चाहिए।

लोक के असंख्यातवें भाग में रहते हैं ‘‘इस निर्देश से यह अर्थ सूचित है अथवा उक्त जीवों का क्षेत्र लोक के असंख्यात बहुभाग प्रमाण है, क्योंकि प्रतरसमुद्घात में वातवलय को छोड़कर शेष समस्त लोकमात्र आकाश प्रदेश में फैलकर स्थित जीवप्रदेश पाये जाते हैं। अथवा सर्वलोक में रहते हैं, क्योंकि लोकपूरणसमुद्घात में सर्वलोकाकाश में फैलकर स्थित जीव प्रदेश पाये जाते हैं।

तात्पर्य यह है कि-पंचेन्द्रिय जीवों में केवली भगवन्तों के केवलीसमुद्घात में लोकपूरणसमुद्घात काल में ही आत्मा के प्रदेश सम्पूर्ण लोक में व्याप्त होते हैं ऐसा जानना चाहिए। एकेन्द्रिय जीव भी सर्वलोक में रहते हैं यहाँ उनकी विवक्षा नहीं है, ऐसा निश्चय कर लेना चाहिए।

इस प्रकार से तृतीय स्थल में पंचेन्द्रिय जीवों का क्षेत्र निरूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में क्षेत्रानुगम नामके छठे महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।