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०२. इन्द्रियमार्गणा में अल्पबहुत्व

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इन्द्रियमार्गणा में अल्पबहुत्व

अथ इन्द्रियमार्गणाधिकार:


अधुना इन्द्रियमार्गणायामल्पबहुत्वनिरूपणाय सूत्रमवतरति-इंदियाणुवादेण पंचिंदिय-पंचिंदियपज्जत्तएसु ओघं। णवरि मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१०३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकेन्द्रियेषु विकलेन्द्रियेषु चैकगुणस्थानं मिथ्यात्वमेवास्तेषामल्पबहुत्वं न कथितं। पंचेन्द्रियअसंयतसम्यग्दृष्टिभ्य: पंचेन्द्रियमिथ्यादृष्टय: असंख्यातगुणा: सन्ति न च अनंतगुणा: पंचेन्द्रियाणामनन्त-त्वाभावात्।
इति षट्खंडागमस्य प्रथमखंडे पंचमग्रंथे अल्पबहुत्वानुगमे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां इन्द्रियमार्गणानाम-द्वितीयोऽधिकार: समाप्त:।

अथ इन्द्रियमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब यहाँ इन्द्रियमार्गणा में अल्पबहुत्व का निरूपण करने हेतु सूत्र अवतरित हो रहा है- सूत्रार्थ- इन्द्रियमार्गणा के अनुवाद से पञ्चेन्द्रिय और पञ्चेन्द्रियपर्याप्तकों में अल्पबहुत्व गुणस्थान के समान है। विशेषता केवल यह है कि असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणे हैं।।१०३।। सिद्धान्तचिंतामणिटीका- एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीवों में एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही होता है, इसलिए उनका अल्पबहुत्व नहीं कहा गया है। पञ्चेन्द्रिय असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों से पञ्चेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणे होते हैं, अनंतगुणे नहीं होते हैं, क्योंकि पञ्चेन्द्रिय जीवों में अनन्तपने का अभाव पाया जाता है। अर्थात् पञ्चेन्द्रिय जीव अनन्त नहीं होते हैं।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ वके अल्पबहुत्वानुगम प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में

इन्द्रियमार्गणा नामका द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।