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०२. चतुर्थ महाधिकार-गति मार्गणाधिकार

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विषय सूची

चतुर्थ महाधिकार-गति मार्गणाधिकार

अथ चतुर्थो महाधिकार:

अथ क्षेत्रानुगमे चतुर्थ महाधिकारे मार्गणासुक्षेत्रप्ररूपणायां चतुर्दशाधिकारा: सन्ति। तत्र तावत् प्रथमत: चतुःस्थलैः द्वादशसूत्रैः गतिमार्गणानाम प्रथमाधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले नरकगतौ नारकाणां क्षेत्रप्ररूपणपरत्वेन ‘‘आदेसेण गदियाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तदनु द्वितीयस्थले तिरश्चां गुणस्थानापेक्षया क्षेत्रकथनत्वेन ‘‘तिरिक्खगदीए’’ इत्यादि-सूत्रचतुष्टयं। ततः परं तृतीयस्थले मनुष्याणां गुणस्थानेषु क्षेत्रप्रतिपादनपरत्वेन ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले देवेषु गुणस्थानापेक्षया क्षेत्रनिरूपणत्वेन ‘‘देवगदीए’’ इत्यादिसूत्रत्रयं कथ्यते इति समुदायपातनिका सूचिता भवति।
संप्रति नरकगतौ नारकाणां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
आदेसेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइएसु मिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्माइट्ठि त्ति केवडि खेत्ते? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।५।।
सूत्रस्यार्थः सुगमः। अत्र सूत्रे अनुवादपदेन सूत्रस्याकर्तृत्वकथनफलं ज्ञातव्यं अस्यायमर्थः-श्रीभूतबलिसूरिःकथयति अस्य सूत्रार्थस्य वक्तारो जिनेंद्रदेवा गणधरदेवा वा, नाहं, अहं तु केवलं अस्यानुवादमेव करिष्यामीति।
उक्तं च श्रीवीरसेनाचार्येण-‘‘अणुवादगहणं सुत्तस्स अकट्टिवुत्तपरूवणफलं१।’’ अतो विस्तरः-
स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगतनारकमिथ्यादृष्टिजीवाः कियत् क्षेत्रे निवसन्ति?
सामान्यलोकादिचतुर्लोकानामसंख्यातभागप्रमाणक्षेत्रे, सार्धद्वयद्वीपप्रमाणमानुषलोकस्य संख्यातगुणे क्षेत्रे च तिष्ठन्ति।
अत्र नारकाणां अवगाहना ज्ञातव्या भवति-प्रथमनरकपृथिव्यां प्रथमप्रस्तरे नारकाणामुत्सेधाः त्रयोहस्ताः। सप्तमपृथिव्यां पंचशतधनुःप्रमाणाः। अत्र उत्सेधाष्टमभागो विष्कंभोऽस्ति तेषामिति ज्ञातव्यं। अत्रावगाहनापेक्षया सप्तमपृथिवी प्रधाना, प्रथमपृथिवीअवगाहनातः सप्तमपृथिव्यावगाहनायाः संख्यातगुणत्वोपलम्भात्। द्रव्यं प्रति प्रथमपृथिवी प्रधाना, शेषद्वितीयादिपृथिवीद्रव्यात् प्रथमपृथिवीद्रव्यस्य असंख्यातगुणितोपलंभात्।
स्वस्थानस्वस्थानराशिःमूलनारकराशेः संख्यातबहुभागप्रमाणास्ति। विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगतराशयो मूलराशेः संख्यातभागप्रमाणाः सन्ति। अत्रास्ति विशेषः-वेदनाकषाय-समुद्घातयोः अवगाहना सर्वत्र नवगुणा, वैक्रियिकसमुद्घाते अवगाहना च सर्वत्र संख्यातगुणा ज्ञातव्या। तथा च मारणान्तिकसमुद्घातगतजीवानां अत्र विग्रहगतौ रज्जु-असंख्यातभागप्रमाणा दीर्घता उपलभ्यते अतोऽस्मिन् समुद्घाते प्रथमपृथिवीद्रव्यं प्रधानं कर्तव्यम्।
एवमेव सासादनसम्यग्दृष्टिनारकाणां स्वस्थानस्वस्थानादयो ज्ञातव्याः। अस्ति विशेषस्तेषां उपपादो न वर्तते।
इत्थमेव सम्यग्मिथ्यादृष्टिनारकाणामपि स्वस्थानस्वस्थानादयोऽवगन्तव्याःतत्रापि मारणान्तिकसमुद्घातो नास्ति। असंयतसम्यग्दृष्टिनारकाणां स्वस्थानस्वस्थानादयः सासादननारकाणां स्वस्थानस्वस्थानादिवत्, अत्र विशेषः एषामुपपादोऽस्ति। मारणान्तिकसमुद्घातोपपादयोः सम्यग्दृष्टिनारकाः संख्याता एवोपलभ्यन्ते।
संप्रति सप्तपृथिवीगतनारकाणां क्षेत्रप्ररूपणाय सूत्रावतारो भवति-
एवं सत्तसु पुढवीसु णेरइया।।६।।
अनेनैव प्रकारेण सप्तसु पृथिवीषु नारकाः लोकस्य असंख्यातभागप्रमाणे क्षेत्रे वसन्ति।इदं सूत्रं द्रव्यार्थिकनयमवलम्ब्य स्थितं। पर्यायार्थिकनयावलम्बनेन तु प्रथमपृथिवीगतनारकाणां प्ररूपणा ओघप्ररूपणा तुल्या अस्ति, किं स्वस्थानस्वस्थानादिपदापेक्षया द्वितीयादिपंचपृथिवीगतनारकाणां प्ररूपणासु असंयत-सम्यग्दृष्टीनामुपपादो नास्ति। तथा च सप्तमपृथिव्यां सासादनसम्यग्दृष्टिषु मारणान्तिकपदाभावो वर्तते, असंयतसम्यग्दृष्टीनां मारणान्तिकोपपादयोरभावोऽस्ति।
एवं प्रथमस्थले नारकाणां क्षेत्रकथनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।


अथ चतुर्थ महाधिकार प्रारम्भ

अब क्षेत्रानुगम में चतुर्थ महाधिकार में मार्गणाओं के अन्तर्गत क्षेत्रप्ररूपणा में चौदह अधिकार हैं। उनमें सर्वप्रथम चार स्थलों में बारह सूत्रों के द्वारा गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में नरकगति में नारकी जीवों की क्षेत्रप्ररूपणा को बतलाने वाले ‘‘आदेसेण गदियाणुवादेण’’ इत्यादि दो सूत्र कहेंगे। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में तिर्यंचों का गुणस्थान की अपेक्षा क्षेत्र कथन करने हेतु ‘‘तिरिक्खगदीए ’’इत्यादि चार सूत्र हैं। उसके आगे तृतीय स्थल में मनुष्यों का गुणस्थानों में क्षेत्र प्रतिपादन करने हेतु ‘‘मणुसगदीए’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में देवों का गुणस्थान की अपेक्षा क्षेत्रनिरूपण करने की मुख्यता वाले ‘देवगदीए’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। इस प्रकार अधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है।

अब नरकगति में नारकियों का क्षेत्र निरूपण करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

आदेश की अपेक्षा गत्यनुवाद से नरकगति में नारकियों मेें मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान के जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं? लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं ।।५।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। यहाँे सूत्र में अनुवाद पद के ग्रहण करने का अर्थ सूत्र के अकर्तृकत्व का प्ररूपण करना है। इसका अर्थ यह है-श्रीभूतबली सूरि कहते हैं कि इस सूत्र के वक्ता-अर्थ के कहने वाले जिनेन्द्रदेव अथवा गणधरदेव हैं, न कि मैं। मैं तो केवल इसका अनुवाद ही करूँगा अर्थात् श्रीभूतबली आचार्य ने इस सूत्र की प्रामाणिकता बतलाई है कि साक्षात् जिनेन्द्र भगवान के मुख से निकले हुए ये वचन हम सभी के लिए ग्रहण करने योग्य हैं।

धवला टीका में श्रीवीरसेनाचार्य ने कहा है-‘‘अनुवाद पद को ग्रहण करने का फल सूत्र के अकर्तृकत्व का प्ररूपण करना है।’’ इसी का विस्तार करते हैं-

स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त हुए मिथ्यादृष्टि नारकी जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं? सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं और अढ़ाईद्वीपप्रमाण मानुषलोक से संख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। अब इसके अर्थ के प्ररूपण करने के लिए यहाँ पर नारकियों की अवगाहना कहते हैं।

सातवीं पृथिवी के नारकियों का उत्सेध पाँच सौ धनुष है। यहाँ नारकियों में उत्सेध के आठवें भाग- प्रमाण विष्कम्भ होता है, ऐसा जानना चाहिए। अवगाहना की अपेक्षा यहाँ सातवीं पृथिवी प्रधान है क्योंकि पहली पृथिवी की अवगाहना से सातवीं पृथिवी की अवगाहना संख्यातगुणी पाई जाती है तथा द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा पहली पृथिवी प्रधान है, शेष छह पृथिवियों के द्रव्यप्रमाण से पहली पृथिवी का द्रव्य असंख्यातगुणा पाया जाता है। स्वस्थानस्वस्थान राशि मूल नारकराशि के संख्यात बहुभाग है। विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त राशियां मूलराशि के संख्यातवें भागप्रमाण हैं। इतनी विशेषता है कि वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात में सर्वत्र अवगाहना को नौगुणी और वैक्रियिकसमुद्घात में अवगाहना को सर्वत्र संख्यातगुणी कर लेना चाहिए। मारणान्तिक समुद्घात से परिणत हुए जीव के यहाँ विग्रहगति में राजु के असंख्यातवें भागप्रमाण दीर्घता भी पाई जाती है इसलिए इस समुद्घात में प्रथम पृथिवी का द्रव्य प्रधान करना चाहिए।

इसी प्रकार सासादन सम्यग्दृष्टि नारकियों के भी स्वस्थानस्वस्थान आदि समझना चाहिए। इतनी विशेषता है कि उनके उपपाद नहीं पाया जाता है। इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकियों के भी स्वथानस्वस्थान आदि जानना चाहिए। यहाँ इतनी विशेषता है कि इनके मारणान्तिक समुद्घात नहीं होता है। असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियों के स्वस्थानस्वस्थान आदि सासादनसम्यग्दृष्टि नारकियों के स्वस्थानस्वस्थान आदि के समान हैं। यहाँ इतनी विशेषता है कि इनके उपपाद पाया जाता है। मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद में सम्यग्दृष्टि नारकी संख्यात ही पाये जाते हैं।

अब सप्तमपृथिवी के नारकियों की क्षेत्रप्ररूपणा बताने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

इसी प्रकार सातों पृथिवियों मेें नारकी जीव लोक के असंख्यातवेें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं।।६।।

हिन्दी टीका-इसी उपर्युक्त प्रकार से सातों नरक पृथिवियों में नारकी जीव लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में निवास करते हैं। यह सूत्र द्रव्यार्थिक नय का अवलंबन लेकर स्थित है। पर्यायार्थिक नय का अवलम्बन करने पर तो पहली पृथिवी की प्ररूपणा नारकियों की ओघप्ररूपणा के तुल्य है क्योंकि पहली पृथिवी मेें सामान्यप्ररूपणा से सर्व गुणस्थानों की सर्वपदों की अपेक्षा समानता पाई जाती है किंतु स्वस्थान- स्वस्थान आदि पदों की अपेक्षा द्वितीयादि पाँच पृथिवियों की प्ररूपणा ओघप्ररूपणा के समान नहीं है क्योंकि उन पृथिवियों में असंयतसम्यग्दृष्टियों का उपपाद नहीं होता है। इसी प्रकार सातवीं पृथिवी की प्ररूपणा भी नारक सामान्य प्ररूपणा के तुल्य नहीं है क्योंकि सातवीं पृथिवी में सासादनसम्यग्दृष्टिसंबंधी मारणान्तिक पद का और असंयतसम्यग्दृष्टिसंबंधी मारणान्तिक और उपपाद पद का अभाव है। इस प्रकार प्रथम स्थल में नारकियों का क्षेत्र कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।


संप्रति तिर्यग्गतौ मिथ्यादृष्टिजीवानां क्षेत्रप्रतिपादनाय सूत्रावतारो भवति-

तिरिक्खगदीए तिरिक्खेसु मिच्छादिट्ठी केवडि खेत्ते? सव्वलोए।।७।।

सूत्र सुगमं।
 अत्र एष विशेषः-वैक्रियिकसमुद्घातगतजीवाः तिर्यग्लोकस्य असंख्यातभागे। किंच, तिर्यक्षु विक्रियमाणराशिः पल्योपमस्य असंख्यातभागमात्रघनांगुलैः गुणितश्रेणिमात्रः इति गुरुपदेशोऽस्ति।
सासादनादिसंयतासंयततिर्यञ्चः कियत् क्षेत्रे इति प्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
सासणसम्माइट्ठिप्पहुडि जाव संजदासंजदा त्ति केवडि खेत्ते? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।८।।
सूत्रं सुगमं। स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदैः परिणतसासादन-सम्यग्दृष्टितिर्यञ्चः कियत् क्षेत्रे सन्ति? चतुर्लोकानामसंख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे क्षेत्रे तिष्ठन्ति। अत्रास्ति विशेषः-वैक्रियिकसमुद्घातराशिः मूलराशेरसंख्यातभागः, तिर्यक्षु विक्रियमाणजीवानां प्रचुरं संभवाभावात्।
एवं सम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयतानां ज्ञातव्यं। उपपादगतसासादनतिर्यञ्चः चतुर्लोकस्यासंख्यातभागक्षेत्रे, सार्धद्वयद्वीपस्य असंख्यातगुणितक्षेत्रे निवसन्ति। उपपादपदे असंयतसम्यग्दृष्टयः तिर्यञ्चः संख्याताः एव। किं च यैः कैश्चित् मनुष्यैः सम्यग्दर्शनात् प्राक् तिर्यगायुःबन्धो कृतः तेषामेव तिर्यक्षूपपादो नान्येषां। सम्यग्मिथ्यादृष्टि-संयतासंयतानां उपपादो नास्ति।
संप्रति पञ्चेन्द्रियतिरश्चां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
पंचिंदियतिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्त-पंचिंदियतिरिक्खजोणिणीसु मिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव संजदासंजदा केवडि खेत्ते? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।९।।
सूत्रस्यार्थः सुगमः। इदं सूत्रं देशामर्शकं, संगृहीतानेकसूत्रत्वात्। तद्यथा-स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषायसमुद्घातगतपंचेन्द्रिय-तिर्यग्मिथ्यादृष्टिजीवाः कियत् क्षेत्रे? सामान्योध्र्वाधः-त्रिलोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे क्षेत्र तिष्ठन्ति। अत्र पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तराशिरेव गृहीतव्यः। अपर्याप्तावगाहनातः पर्याप्तावगाहनायाः असंख्यात-गुणितत्वोपलम्भात्। तत्रापि स्वस्थानस्वस्थानराशिः मूलराशेः संख्यातबहुभागमात्रः, शेषराशयः तस्य संख्यातभागमात्राः। एवं पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तयोनिमतीमिथ्यादृष्टीनां ज्ञातव्यं।
वैक्रियिकसमुद्घातगतमिथ्यादृष्टयः कियत् क्षेत्रे?
चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे क्षेत्रे निवसन्ति। एवं पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिमती-मिथ्यादृष्टीनां ज्ञातव्यं।
मारणान्तिकसमुद्घातगतपंचेन्द्रियतिर्यग्मिथ्यादृष्टयः कियत् क्षेत्रे?
त्रयाणां लोकानां असंख्यातभागे सन्ति, किंच, पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तराशेः पल्योपमस्य असंख्यात-भागमात्रभागहारस्य सत्त्वात्।
पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्त-पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिमती जीवाः मारणान्तिकसमुद्घातगताः तिर्यग्लोकस्य मनुष्यलोकस्य चासंख्यातगुणे क्षेत्रे तिष्ठन्ति। एष विशेषोऽत्र-योनिनीनां असंयतसम्यग्दृष्टितिरश्चीनां उपपादो नास्ति।

अब तिर्यंचगति में मिथ्यादृष्टि जीवों का क्षेत्र प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता हैै-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति में तिर्यंचों में मिथ्यादृष्टि जीव कितने क्षेत्र मेें रहते हैं? सर्वलोक में रहते हैं।।७।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। यहाँ विशेष यह है-

वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त तिर्यंच जीव तिर्यग्लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं क्योंकि तिर्यंचों में विक्रिया करने वाली राशि पल्योपम के असंख्यातवें भागमात्र घनांगुलों से गुणित जागत्श्रेणीप्रमाण है, ऐसा गुरु का उपदेश है।

अब सासादन आदि संयतासंयत गुणस्थानपर्यन्त के तिर्यंच जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं ऐसा प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक के तिर्यंच जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं? लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं ।।८।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घारूप से परिणत सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच जीव किनते क्षेत्र में रहते हैं? सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। इतनी विशेषता है कि वैक्रियिक समुद्घात को प्राप्त राशि मूलराशि के असंख्यातवें भागप्रमाण है क्योंकि तिर्यंचों में विक्रिया करने वाले जीव प्रचुर मात्रा में संभव नहीं है।

इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत तिर्यंचों के भी स्वस्थानस्वस्थान आदि के विषय में समझना चाहिए।

उपपाद को प्राप्त सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र मेें और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र मेें रहते हैं। उपपाद मेें असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंच संख्यात ही होते हैं क्योंकि जिन मनुष्यों ने सम्यग्दर्शन के पहले तिर्यंचायु का बंध कर लिया है, ऐसे मनुष्य सम्यग्दृष्टियों के बिना दूसरे सम्यग्दृष्टियों का तिर्यंचों में उपपाद नहीं होता है। सम्यग्मिथ्यादृष्टि और संयतासंयत तिर्यंचों के उपपाद नहीं होता है।

अब पंचेन्द्रिय तिर्यंच जीवों का क्षेत्रनिरूपण करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रियतिर्यंच, पंचेन्द्रियतिर्यंच पर्याप्त और पंचेन्द्रियतिर्यंच योनिनी जीवों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान के तिर्यंच कितने क्षेत्र में रहते हैं? लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं।।९।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। यह सूत्र देशामर्शक है क्योेंकि इसमें अनेक सूत्रों का अर्थ संंग्रहीत है। उसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात को प्राप्त पंचेन्द्रियतिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं ? सामान्यलोक, ऊध्र्वलोक और अधोलोक, इन तीन लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। यहाँ पर पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीवराशि को छोड़कर पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त राशि का ही ग्रहण करना चाहिए क्योंकि अपर्याप्तोें की अवगाहना से पर्याप्तों की अवगाहना असंख्यातगुणी पाई जाती है। यहाँ पर स्वस्थान स्वस्थान राशि मूलराशि के संख्यात बहुभागप्रमाण होती है। शेष राशियाँ मूलराशि के संख्यातवें भागमात्र होती हैं। इसी प्रकार पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त तथा पंचेन्द्रियतिर्यंच योनिनी मिथ्यादृष्टियों की स्वस्थानस्वस्थानराशि आदि समझना चाहिये। वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं? सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और अढाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। इसी प्रकार पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त तथा पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनी मिथ्यादृष्टियों का वैक्रियिकसमुद्घातगत क्षेत्र जानना चाहिये।

मारणान्तिकसमुद्घात को प्राप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मिथ्यादृष्टि जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं? सामान्यलोक, उध्र्वलोक और अधोलोक इन तीन लोकोें के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र मेें रहते हैं क्योंकि पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्तराशि का भागहार पल्योपम के असंख्यातवें भागमात्र पाया जाता है। मारणान्तिकसमुद्घातगत पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त जीव तिर्यग्लोक और मनुष्यलोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। इतनी विशेषता है कि योनिनी तिर्यंचों में असंयतसम्यग्दृष्टियों का उपपाद नहीं होता है।


संप्रति मनुष्याणां चतुर्दशगुणस्थानापेक्षया क्षेत्र प्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-

मणुसगदीए मणुस-मणुसपज्जत्त-मणुसिणीसु मिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव अजोगिकेवली केवडि खेत्ते? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।११।।

सूत्रस्यार्थः सुगमः।
स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगतमिथ्यादृष्टयः सामान्यमनुष्याः पर्याप्तमनुष्याः योनिमतीमनुष्यिन्यः-भावस्त्रीवेदमनुष्याः इमे त्रिविधा अपि चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागे क्षेत्रे, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे क्षेत्रे च, मनुष्यपर्याप्तमिथ्यादृष्टिक्षेत्रग्रहणात्।
मारणान्तिकगतमिथ्यादृष्टयः इमे मनुष्याः त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्नरलोकाभ्यामसंख्यातगुणे क्षेत्रे निवसन्ति, अत्र प्रधानीकृतमनुष्यापर्याप्तराशित्वात्। एवं उपपादपदस्यापि कथनं ज्ञातव्यं।
सासादनसम्यग्दृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिमनुष्याः स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातैः परिणताः चतुर्लोकानामसंख्यातभागे, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे तिष्ठन्ति। मारणान्तिक-उपपादगताः चतुर्लोकानामसंख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे तिष्ठन्ति।
सम्यग्मिथ्यादृष्टयः स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातपरिणताः चतुर्लोकानामसंख्यातभागे, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे निवसन्ति।
संयतासंयताःस्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातपरिणताः चतुर्लोकानामसंख्यातभागे, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे तिष्ठन्ति। मारणान्तिकसमुद्घातगताः चतुर्लोकानाम-संख्यातभागे मानुषक्षेत्रस्यासंख्यातगुणे क्षेत्रे निवसन्ति।
प्रमत्तसंयतादारभ्य अयोगिकेवलिपर्यन्त मनुष्याणां प्ररूपणा गुणस्थानप्ररूपणावत् ज्ञातव्या। एतत्कथनं त्रिविधमनुष्याणां ज्ञातव्यं। अस्ति कश्चित् विशेषः-भावस्त्रीवेदमनुष्याणां प्रमत्तगुणस्थाने तैजसाहारसमुद्घातौ न स्तः। स्त्रीणां असंयतसम्यग्दृष्टीनां उपपादो नास्तीति।
सयोगिकेवलिक्षेत्रनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सजोगिकेवली केवडि खेत्ते? ओघं।।१२।।
एतस्य सूत्रस्यार्थो मूलौघसूत्रानुसारेण लोकस्य असंख्यातभागे क्षेत्रे, असंख्यातेषु भागेषु वा, सर्वलोके वा इति वक्तव्यः।
अपर्याप्तमनुष्याणां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रावतारः क्रियते-
मणुसअपज्जत्ता केवडि खेत्ते? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।१३।।
इमे लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याः स्वस्थानस्वस्थान-वेदना-कषायसमुद्घातपरिणताः निश्चितक्रमेण चतुर्लोकानामसंख्यातभागे, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागे च निवसन्ति। विन्यासक्रमेण पुनः असंख्यातानि मानुषक्षेत्रपर्यंतक्षेत्राणि गच्छन्ति।
मारणान्तिकगताः लब्ध्यपर्याप्ताः मनुष्याः ओघप्ररूपणावत् ज्ञातव्याः।
एवं तृतीयस्थले मनुष्याणां क्षेत्रनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।


अब मनुष्यों के चौदह गुणस्थानों की अपेक्षा क्षेत्र का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

मनुष्यगति में मनुष्य, मनुष्यपर्याप्त और मनुष्यिनियों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान में जीव कितने क्षेत्र में रहते हैं? लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र मेें रहते हैं ।।११।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सरल है। स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त हुए मिथ्यादृष्टि सामान्य मनुष्य, पर्याप्त मनुष्य और मनुष्यिनी मिथ्यादृष्टि अर्थात् भावस्त्रीवेदी मनुष्य, ये तीनों प्रकार के मनुष्य भी सामान्य लोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और मनुष्य क्षेत्र के संख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं क्योंकि यहाँ पर मनुष्य पर्याप्त मिथ्यादृष्टियों के क्षेत्र का ग्रहण किया है। मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त हुए मनुष्य और मनुष्यिनी मिथ्यादृष्टि जीव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और तिर्यग्लोक तथा मनुष्यलोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं क्योंकि यहाँं पर मनुष्य अपर्याप्तराशि की प्रधानता है। इसी प्रकार उपपाद का भी कथन करना चाहिए। स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात से परिणत हुए सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि सामान्यमनुष्य सामान्यलोक आदि चार लोकोें के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और मानुषक्षेत्र के संख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं। मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद को प्राप्त हुए सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि सामान्यमनुष्य सामान्यलोक आदि चार लोकोें के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात रूप से परिणत हुए सम्यग्मिथ्यादृष्टि उक्त मनुष्य सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और मनुष्यक्षेत्र के संख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्र में रहते हैं।

स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात इन पदों से परिणत हुए संयतासंयत उक्त मनुष्य सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और मनुष्यक्षेत्र के संख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं। मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त हुए संयातासंयत सामान्य मनुष्य सामान्यलोक आदि लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और मनुष्य क्षेत्र से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक सामान्य मनुष्यों के यथासंभव स्वस्थानस्वस्थान आदि पदों को क्षेत्र मूलोघ अर्थात् गुणस्थान प्ररूपणा के समान जानना चाहिए। यह समस्त कथन तीन प्रकार के मनुष्यों में भी जानना चाहिए।

यहाँ इतनी विशेषता है कि भावस्त्रीवेदी मनुष्यों के प्रमत्तगुणस्थान में तैजस और आहारक समुद्घात नहीं होते हैं। असंयतसम्यग्दृष्टि स्त्रियों के उपपाद नहीं होेता है।

अब सयोगिकेवली भगवन्तोें के क्षेत्र का निरूपण करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

सयोगिकेवली भगवान कितने क्षेत्र में रहते हैं ? ओघप्ररूपणा में सयोगिजिनों का जो क्षेत्र कह आये हैं, तत्प्रमाण क्षेत्र मेें रहते हैं ।।१२।।

हिन्दी टीका-इस सूत्र का अर्थ मूलोघ अर्थात् गुणस्थान प्ररूपणा के कथन करने वाले सूत्र के अनुसार इस प्रकार किया जाता है कि सयोगिकेवली भगवान लोक के असंख्यातवें भाग क्षेत्र में, लोक के असंख्यात बहुभागप्रमाण क्षेत्र में अथवा सर्वलोक में रहते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

अब अपर्याप्त मनुष्यों का क्षेत्र निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य कितने क्षेत्र में रहते हैं ? लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं।।१३।।

हिन्दी टीका-ये लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्य स्वस्थानस्वस्थान, वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात से परिणत हुए निश्चित क्रम-संचित क्रम से चारों लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और मनुष्यक्षेत्र के संख्यातवें भाग क्षेत्र में निवास करते हैं। विन्यासक्रम से तो असंख्यात मनुष्यक्षेत्रपर्यन्त लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों का क्षेत्र होता है। मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का क्षेत्र मनुष्यों की ओघप्ररूपणा-गुणस्थानप्ररूपणा के समान जानना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में मनुष्यों का क्षेत्र निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।


अधुना देवगतौ क्षेत्रप्रतिपादनाय सूत्रावतारः क्रियते-

देवगदीए देवेसु मिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव असंजदसम्मादिट्ठि त्ति केवडि खेत्ते? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।१४।।

सूत्रं सुगमं।
स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकसमुद्घातगतदेवमिथ्यादृष्टयः त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागे, मानुषक्षेत्रादसंख्यातगुणे निवसन्ति, प्रधानीकृत-ज्योतिष्कराशित्वात्। मारणान्तिकउपपादपरिणतमिथ्यादृष्टयः त्रयाणां लोकानामसंख्यातभागे, नरतिर्यग्लोकाभ्याम-संख्यातगुणे क्षेत्रे च तिष्ठन्ति। शेषगुणस्थानानामोघवत्।
एतत्कथनं सामान्यदेवानां वर्तते। अग्रे चतुर्णिकायदेवानां क्षेत्रं वक्ष्यते।
संप्रति भवनवास्यादि ग्रैवेयकपर्यंतदेवानां क्षेत्रप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
एवं भवणवासियप्पहुडि जाव उवरिम-उवरिमगेवज्जविमाणवासियदेवा त्ति।।१५।।
एतेन देशामर्शकसूत्रेण सूचितार्थः उच्यते-स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-उपपादपरिणतभवनवासिमिथ्यादृष्टयः चतुर्लोकानामसंख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे क्षेत्रे विहरन्ति। उपपादपरिणतभवनवासिनः तिर्यग्लोकस्य असंख्यातभागे क्षेत्रे निवसन्ति। मारणान्तिकगत-भवनवासिमिथ्यादृष्टयः सामान्यलोकादित्रयाणां लोकानां असंख्यातभागे, तिर्यग्लोकस्य असंख्यातगुणे सार्धद्वयद्वीपस्यासंख्यातगुणे क्षेत्रे च विहरन्ति। शेषकथनमोघवत्। अस्ति विशेषः-असंयतसम्यग्दृष्टीनां भवनवासिदेवेषूपपादो नास्ति। वानव्यन्तर-ज्योतिष्कदेवयोः क्षेत्रं देवसामान्यक्षेत्रवत्। अत्रापि असंयत-सम्यग्दृष्टीनां अनयोर्देवयोरुपपादो नास्ति।
सौधर्मैशानकल्पयोः स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकप्राप्तमिथ्यादृष्टिदेवाः चतुर्लोकानामसंख्यातभागे, मानुषक्षेत्रस्यासंख्यातगुणे क्षेत्रे च निवसन्ति। अत्र सर्वपदगतानां क्षेत्रस्य वर्णनं भवनवासिवत् ज्ञातव्यम्। अनयोः मिथ्यादृष्टिदेवानां मारणान्तिकोपपादसंबंधिक्षेत्रं देवसामान्यवत्। शेषगुणस्थानानां स्वस्थानस्वस्थानक्षेत्रं देवसामान्यवत्।
सानत्कुमारकल्पादारभ्य उपरिम-उपरिमग्रैवेयकपर्यंतमिथ्यादृष्टिदेवानां स्वस्थानस्वस्थानादिक्षेत्रं ओघसासादन-स्वस्थानस्वस्थानादिक्षेत्रवत्। एवमेव सासादनादीनां ओघवत् ज्ञातव्यं।
अधुना नवानुदिशपंचानुत्तरवासिदेवानां क्षेत्रनिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
अणुदिसादि जाव सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवा असंजदसम्मादिट्ठी केवडि खेत्ते? लोगस्स असंखेज्जदिभागे।।१६।।
सूत्रं सुगमं। स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिक-मारणान्तिक-उपपादगत असंयतसम्यग्दृष्टयः चतुर्णां लोकानामसंख्यातभागे, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणे निवसन्ति इति ज्ञातव्यं। अस्ति विशेषः-सर्वार्थसिद्धौ स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपदेषु देवा मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागप्रमाणे क्षेत्रे विहरन्ति। किं च, सर्वार्थसिद्धौ वेदना-कषाय-समुद्घातयोः तन्निमित्तेन उत्पद्यमानस्तोकविस्फूर्जनं भवति-उभयोः समुद्घातयोः आत्मप्रदेशानां बाह्यविसर्पणं किंचिदेव भवति एतत् प्रतीत्य तथोपदेशात्, कारणे कार्योपचारात् वा।
तात्पर्यमेतत्-नव अनुदिश-पंचानुत्तरेषु सर्वे देवा-अहमिन्द्रा सम्यग्दृष्टय एव। तत्र इन्द्रियसुखानां पराकाष्ठा वर्तते तथापि असातावेदनीयोदस्य अस्तित्वापेक्षया वेदनासमुद्घातः कथ्यते न च तत्र वेदनासद्भावः, अतएव कारणे कार्यस्योपचारः क्रियते। एतज्ज्ञात्वा सम्यग्दर्शनरत्नं कदाचिदपि न त्यक्तव्यम् अस्माभिरिति।
एवं चतुर्थस्थले देवानां क्षेत्रप्ररूपणपराणि त्रीणि सूत्राणि गतानि।
एवं षट्खण्डागमे तृतीयग्रन्थे क्षेत्रानुगमनाम्नि तृतीयप्रकरणे गणिनी-ज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिन्तामणिटीकायां गतिमार्गणा नाम प्रथमोऽधिकारः समाप्तः।


अब देवगति में क्षेत्र का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

देवगति में देवों में मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान के देव कितने क्षेत्र में रहते हैं ? लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं ।।१४।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषाय- समुद्घात और वैक्रियिक समुद्घात को प्राप्त हुए देव मिथ्यादृष्टि जीव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में, तिर्यग्लोक के संख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और मानुषक्षेत्र से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं क्योंकि यहाँ पर ज्योतिष्क देवराशि प्रधान है। मारणान्तिक समुद्घात और उपपादरूप से परिणत हुए मिथ्यादृष्टि देव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और मनुष्यलोक तथा तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। देवों के शेष गुणस्थानों की प्ररूपणा ओघप्ररूपणा के समान है। यह कथन सामान्य देवों का है। आगे चारोें निकाय के देवों का क्षेत्र कहेंगे।

अब भवनवासी आदि देवों से लेकर ग्रैवेयकपर्यन्त देवों का क्षेत्र प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

भवनवासी देवों से लेकर उपरिम-उपरिम ग्रैवेयक के विमानवासी देवों तक का क्षेत्र इसी प्रकार होता है।।१५।।

हिन्दी टीका-इस देशामर्शक सूत्र से सूचित हुए अर्थ को कहते हैं- स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिकसमुद्घात और उपपादन रूप से परिणत हुए भवनवासी मिथ्यादृष्टि देव सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं।

उपपादपरिणत भवनवासी देव तिर्यग्लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं। मारणान्तिक समुद्घात को प्राप्त हुए मिथ्यादृष्टि भवनवासी देव सामान्यलोक आदि तीन लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में, तिर्यग्लोक से असंख्यातगुणे क्षेत्र में और ढाईद्वीप से भी असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। शेष कथन ओघ-गुणस्थानप्ररूपणा के समान है। इतनी विशेषता है कि असंयतसम्यग्दृष्टियों का भवनवासियों में उपपाद नहीं होता है। वानव्यंतर और ज्योतिषी देवों का क्षेत्र देवसामान्य के क्षेत्र के समान है। इतनी विशेषता है कि असंयत- सम्यग्दृष्टियों का वानव्यन्तर और ज्योतिषियों में उपपाद नहीं होेता है।

सौधर्म और ईशानकल्प में स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात को प्राप्त हुए मिथ्यादृष्टि देव सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और मानुषक्षेत्र से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं। यहाँ पर सर्व पदगत जीवों के क्षेत्रों का वर्णन भवनवासियों के क्षेत्र के समान करना चाहिए । सौधर्म और ईशानकल्प में देवमिथ्यादृष्टियों के मारणान्तिक समुद्घात और उपपादसम्बन्धी क्षेत्र देवसामान्य के मारणान्तिक समुद्घात और उपपादगत के समान जानना चाहिए।

सनत्कुमारकल्प से लेकर उपरिम-उपरिम ग्रैवेयक तक मिथ्यादृष्टि देवों का स्वस्थानस्वस्थान आदि क्षेत्र ओघ सासादनसम्यग्दृष्टि के स्वस्थानस्वस्थान आदि क्षेत्र के समान है।

इसी प्रकार सासादनसम्यग्दृष्टि आदि जीवों का क्षेत्र ओघ-गुणस्थानप्ररूपणा के समान जानना चाहिए।

अब नव अनुदिशविमानों एवं पाँच अनुत्तरविमानवासी देवों का क्षेत्र निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

नौ अनुदिशों से लेकर सर्वार्थसिद्धि विमान तक के असंयतसम्यग्दृष्टि देव कितने क्षेत्र में रहते हैं? लोक के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं।।१६।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सरल है। स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात, वैक्रियिकसमुद्घात, मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद को प्राप्त हुए उक्त असंयतसम्यग्दृष्टि देव सामान्यलोक आदि चार लोकों के असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणे क्षेत्र में रहते हैं, ऐसा यहाँ कथन करना चाहिए। इतनी विशेषता है कि सर्वार्थसिद्धि में स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदनासमुद्घात, कषायसमुद्घात और वैक्रियिकसमुद्घात इन स्थानों में देव मानुषक्षेत्र के संख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में रहते हैं क्योंकि सर्वार्थसिाद्ध में वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात देवों के उनके निमित्त से उत्पन्न होने वाला स्तोक उस्फूर्जन होता है अर्थात् उक्त दोनों समुद्घातों में आत्मप्रदेशों का बाह्य विस्तार बहुत कम होता है, इस अपेक्षा उक्त प्रकार का उपदेश दिया है अथवा कारण में कार्य के उपचार से उक्त प्रकार का उपदेश दिया है। तात्पर्य यह है कि नव अनुदिश विमान एवं पाँच अनुत्तरविमानोंं में सभी देव-अहमिन्द्र सम्यग्दृष्टि ही होते हैं। वहाँ अहमिन्द्र देवों के इन्द्रियसुखों की पराकाष्ठा है अर्थात् सांसारिक सुख की चरम सीमा उनमें पाई जाती है, फिर भी असातावेदनीय कर्म के उदय का अस्तित्व होने से उसकी अपेक्षा से वेदना समुद्घात कहा जाता है, न कि वहाँ वेदना का सद्भाव रहता है। इसलिए कारण में कार्य का उपचारमात्र किया गया है, ऐसा जानकर सम्यग्दर्शनरूपी रत्न को कदाचित् भी हम लोगों को नहीं छोड़ना चाहिए ।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में देवों की क्षेत्रप्ररूपणा का कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

विशेषार्थ-

इस गतिमार्गणा के वर्णन में संसार की चारों गतियों के पश्चात् पंचम सिद्धगति को प्राप्त करने की प्रेरणा दी गई है, क्योंकि सिद्धगति में जाने के बाद यह जीव कभी भी सांसारिक गतियों में पुनः परिभ्रमण नहीं करता है। यद्यपि वर्तमान हुण्डावसर्पिणी के इस पंचमकाल में उस पंचमगति की प्राप्ति भरतक्षेत्र के किसी भी मनुष्य को नहीं हो सकती है, फिर भी उसके मार्ग का ज्ञान कराने के लिए गणधर आदि महामुनियों ने विभिन्न ग्रंथों की रचना की है। उनमें से ही जैनधर्म के महान् प्रभावक आचार्य श्रीकुन्दकुन्दस्वामी ने मोक्षपाहुड़ ग्रंथ में कहा है-

अज्जवि तिरयणसुद्धा, अप्पा झाएवि लहइ इन्दत्तं।

लोयंतियदेवत्तं, तत्थ चुदा णिव्वुदिं जंति ।।७७।।

अर्थात् आज भी इस पंचमकाल में रत्नत्रय से शुद्ध आत्मा(मुनि)अपनी आत्मा का ध्यान करके इन्द्रत्व और लौकांतिक देव के पद को प्राप्त कर लेते हैं और वहाँ से च्युत होकर निर्वाण को प्राप्त कर लेते हैं।

यहाँ अभिप्राय यह है कि पंचमकाल के अन्त तक दिगम्बर जैन भावलिंगी साधु इस धरती पर विचरण करते हुए भगवान महावीर की जिनमुद्रा को प्रदर्शित करते रहेंगे, अतः जब तक मुनिव्रत धारण करने की पूर्ण क्षमता न प्रगट हो जावे, तब तक उन तपस्वी सन्तों की भक्ति, सेवा, वैयावृत्ति करके अपने संसार को अल्प करना चाहिए। श्री पद्मनंदि आचार्य भी कहते हैं-

संप्रत्यस्ति न केवली किल कलौ, त्रैलोक्यचूडामणिः।

तद्वाचः परमासतेऽत्र भरत-क्षेत्रे जगद्द्योतिकाः ।।
सद्रत्नत्रयधारिणो यतिवरास्तासां समालम्बनं।
तत्पूजा जिनवाचि पूजनमतः, साक्षाज्जिनः पूजितः।।

अर्थात् इस समय भरतक्षेत्र में त्रैलोक्यचूडामणि केवली भगवान् नहीं हैं, फिर भी लोक को प्रकाशित करने वाले उनके वचन तो यहाँ विद्यमान हैं और उनके वचनों का अवलम्बन लेने वाले रत्नत्रयधारी श्रेष्ठ यतिगण भी मौजूद हैं। इसलिए उन मुनियों की पूजा जिनवचनों की पूजा है और जिनवचन की पूजा से साक्षात् जिनदेव की पूजा की गई है, ऐसा समझना चाहिए।

सारांशरूप में यहाँ गतिमार्गणा का सार समझकर चारोें गतियों में सर्वश्रेष्ठ मनुष्यगति का सदुपयोग करते हुए यथाशक्ति संयम धारण कर आत्मकल्याण करना चाहिए, क्योंकि जैसे विशाल समुद्र के अन्दर गिरी हुई मणि को खोजना अत्यन्त कठिन कार्य है, उसी प्रकार अनंतसंसार समुद्र में खोई हुई मनुष्यगति का प्राप्त होना दुर्लभ से दुर्लभ होता है। जिस प्रकार चौराहे पर चिन्तामणि रत्न की प्राप्ति दुर्लभ है, उसी प्रकार मनुष्य जन्म तथा जिनधर्म का शरण आदि मिलना दुर्लभ है, इसलिए इस दुर्लभ मनुष्यपर्याय को पाकर ऐसा काम करना चाहिए जिससे पुनः पंचपरिवर्तनरूप संसार में परिभ्रमण न करना पड़े अन्यथा अन्त मेंं पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ अर्थ नहीं निकलेगा। श्री पद्मनंदिपंचविंशतिका में भी कहा है कि-

स्रग्धराछन्द-

कर्माब्धौ तद्विचित्रोदयलहरिभर व्याकुलेव्याप्तदुग्र ,
भ्राम्यन्नर्कादिकीर्णे मृतिजननलसद्वाडवावर्तगर्ते।
मुक्तः शक्त्या हतांगः प्रतिगति स पुमान् मज्जनोन्मज्जनाभ्या,
मप्राप्यज्ञानपोतं तदनुगतिजडः पारगामी कथं स्यात् ।।१३१।।

अर्थ-जिस प्रकार कोई शक्तिहीन मनुष्य मगरमच्छ आदि से व्याप्त भयंकर समुद्र में पड़ जावे, तो वह नाना प्रकार के गोते खाता है किन्तु यदि उसको जहाज मिल जावे, तो वह शीघ्र ही पार हो जाता है, उस ही प्रकार कर्म (जिसका दूसरा नाम संसार है) इस प्रकार का भयंकर समुद्र है, इसमें भी जब तक जीव ज्ञानरूपी जहाज को प्राप्त नहीं करते, तब तक नाना प्रकार की गतियों में भ्रमण करते हैं किन्तु जिस समय वे उस अनुकूल ज्ञानरूपी जहाज को पा लेते हैं तो वे बात की बात में संसाररूपी समुद्र से पार हो जाते हैं तथा फिर उनको संसाररूपी समुद्र में आना भी नहीं पड़ता इसलिए जिन जीवों को इस संसाररूपी समुद्र को पार करने की अभिलाषा है, उनको अवश्य ही ज्ञानरूपी अखण्ड जहाज का आश्रय लेना चाहिए।

भावार्थ यह है कि जहाँ प्रतिक्षण दुःख ही दुःख है, ऐसी नरक-तिर्यंच आदि गतियों की बात तो जाने दो, किन्तु जहाँ पर सदा अणिमा-महिमा आदि ऋद्धिरूपी लक्ष्मी निवास करती हैं, ऐसी देवगति मेंं हे आत्मन! तेरे लिए अंशमात्र भी सुख नहीं है क्योंकि वहाँ से भी तुझे मरण करके नीचे गिरना ही पड़ता है, इसलिए आचार्य कहते हैं कि हे जीव! तुझे अपनी मनुष्यपर्याय से अविनाशी मोक्षपद के लिए सर्वदा प्रयत्न करना चाहिए।

इस प्रकार षट्खण्डागम में तृतीय ग्रंथ में क्षेत्रानुगम नामक तृतीय प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिन्तामणि नामक टीका में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।