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०३. अष्टम भव पूर्व-"राजा वज्रजंघ"

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राजा वज्रजंघ

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इस जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में पुष्कलावती देश है, उसमें उत्पलखेट नाम का नगर है। वहाँ के राजा वज्रबाहु की रानी वसुंधरा ने शुभ दिन पुत्ररत्न को जन्म दिया, जिसका नाम ‘वज्रजंघ’ रखा गया। वह वज्रजंघ अपनी रूप संपत्ति से मानो ललितांग देव के रूप को भी हँस रहा था।

एक दिन केवली भगवान् के पूजार्थ देवों के आगमन को देखकर श्रीमती को ललितांग देव का स्मरण हो गया। अनन्तर उसने एक चित्रपट पर ललितांग देव संबंधी घटनाएँ बनाकर अपनी धाय को दे दिया और वह पंडिता धाय महापूत जिनालय में जाकर वह चित्रपट लेकर बैठ गई। अनेकों राजकुमारों के अनंतर कदाचित् वह वज्रजंघ राजकुमार वहाँ दर्शनार्थ आये और चित्रपट को देखते ही उन्हें जातिस्मरण हो गया। कुमार वज्रजंघ ने भी अपना परिचय देकर और अपना चित्रपट देकर उस पंडिता को विदा कर दिया।

चक्रवर्ती वज्रदंत की वसुंधरा बहन थी और वज्रबाहु बहनोई तथा वङ्काजंघ भानजा था। बड़े ही आदर से वज्रजंघ के साथ श्रीमती का विवाह सम्पन्न हो गया।

चक्रवर्ती की कन्या को ब्याह कर राजकुमार वज्रजंघ दूसरे दिन सायंकाल में अनेक दीपकों का प्रकाश कर रानी श्रीमती के साथ महापूत जिनालय में दर्शनार्थ आये और स्वर्णमयी जिनप्रतिमा का अभिषेक करके अष्टद्रव्यों से पूजा की, अनेकों स्तुतियों से जिनेन्द्र भगवान् की स्तुति करके राजमहल में आ गये।

किसी समय अपनी ससुराल जाते हुए राजा वज्रजंघ ने वन में डेरा डाल दिया। वहीं पर आकाश में गमन करने वाले दमधर और सागरसेन मुनिराज आहारार्थ पधारे। उन्होंने वन में ही आहार लेने की प्रतिज्ञा कर रखी थी। राजा वज्रजंघ ने रानी श्रीमती के साथ उनको भक्ति से पड़गाहा और विधिवत् आहारदान दिया, उसी समय देवों ने पंचाश्चर्य वृष्टि कर दी। अनन्तर कंचुकी के कहने से यह मालूम हुआ कि ये तुम्हारे ही अंतिम युगल पुत्र हैं अर्थात् बाबा वज्रबाहु के साथ वज्रजंघ के अट्ठानवे पुत्रों ने दीक्षा ग्रहण कर ली थी। उनमें से ये अंतिम युगल पुत्र थे। यह जानकर राजा-रानी के हर्ष का पार नहीं रहा।

उनकी भक्तिपूजा करके उनसे धर्म का स्वरूप सुना, पुनः अपने और श्रीमती के तथा औरों के पूर्व भव पूछे। दमधर मुनिराज ने बताया कि हे राजन् ! आप इससे आठवें भव में भरतक्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव होंगे और श्रीमती का जीव राजा श्रेयांस होकर दान तीर्थ का प्रवर्तक होगा। ये मतिवर मंत्री आदि जो बड़े प्रेम से आहारदान देख रहे थे, इनमें से क्रमशः मतिवर मंत्री का जीव भरत चक्रवर्ती होगा, आनन्द पुरोहित का जीव बाहुबलि होगा, अकंपन सेनापति ऋषभसेन पुत्र होगा एवं धनमित्र सेठ अनन्तविजय पुत्र होगा। ये सिंह, सूकर, वानर और नकुल जो बड़े प्रेम से आहारदान देख रहे थे, ये इस दान की अनुमोदना से उन्नति करते हुए आपकी ऋषभदेव की पर्याय में क्रमशः विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित नाम के पुत्र होंगे। ये सभी जीव आपके तीर्थ में ही मोक्ष को प्राप्त करेंगे। इन सबका संबंध सुनकर राजा वज्रजंघ आदि सभी को महान हर्ष हुआ।

राजा वज्रजंघ ने एक बार में ही आहारदान देकर इतना महान् पुण्य संचय कर लिया था।

किसी समय वे राजा अपनी रानी श्रीमती के साथ महल में सोए हुए थे। नौकरों ने कमरों को सुगंधित करने के लिए धूप खेई थी। अनन्तर खिड़कियाँ खोलना भूल गए। बस अंदर में धुएँ के रुक जाने से दोनों के कंठ रुँध गए और वे दीर्घ निद्रा में सो गये अर्थात् मर गये।

अहो! देखो, जो भोगापभोग की वस्तुएँ आनन्दमयी होती हैं, वे ही मृत्यु का कारण बन गर्इं, इसलिए इन भोगों को धिक्कार हो! इस दान के प्रभाव से वे दोनों मरकर उत्तरकुरु नामक उत्तम भोगभूमि में दम्पत्ति हो गये और वहाँ पर दस प्रकार के कल्पवृक्षों के भोगों का अनुभव करने लगे।