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०३. द्वितीय महाधिकार-गतिमार्गणा में तिर्यंचगति का वर्णन

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द्वितीय महाधिकार-गतिमार्गणा में तिर्यंचगति का वर्णन

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अथ तिर्यग्गतिनामान्तराधिकार:

अथानंतरं स्थलचतुष्टयेन षोडशसूत्रपर्यंतं तिर्यग्गतिनाम द्वितीयोऽन्तराधिकार: प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले सामान्यपंचेन्द्रियजीवानां गुणस्थानेषु द्रव्यकालक्षेत्रापेक्षया संख्यानिरूपणपरत्वेन ‘‘तिरिक्खगईए’’ इत्यादिसूत्रपंचकेन व्याख्यानं करोति। तदनु द्वितीयस्थले पंचेन्द्रियपर्याप्ततिरश्चां गुणस्थानव्यवस्थायां संख्याप्रतिपादनत्वेन ‘‘पंचिंदियतिरिक्ख’’ इत्यादिसूत्रादारभ्य सूत्रचतुष्टयं। तत: परं तृतीयस्थले पंचेन्द्रिय-तिर्यग्योनिमतीषु गुणस्थानव्यवस्थायां प्रमाणनिरूपणत्वेन ‘‘पंचिंंदियतिरिक्खजोणिणीसु’’ इत्यादि सूत्रात् चत्वारि सूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तानां प्रमाणप्ररूपणपरत्वेन ‘‘पंचिंदिय’’ इत्यादिसूत्रादारभ्य त्रीणि सूत्राणि कथ्यन्त इति समुदायपातनिका।
अधुना तिर्यग्गतौ गुणस्थानेषु सामान्येन प्रमाणप्रतिपादनाय सूत्रावतार: क्रियते श्रीभूतबलिसूरिवर्येण-
तिरिक्खगईए तिरिक्खेसु मिच्छाइट्ठिप्पहुडि जाव संजदासंजदा त्ति ओघं।।२४।।
तिरिक्खगईए-तिर्यग्गतौ तिर्यक्षु मिथ्यादृष्टिप्रभृति यावत् संयतासंयता इति ओघवत्-गुणस्थानवत् संख्या ज्ञातव्या।
तिर्यञ्चो मिथ्यादृष्टय: प्रथमगुणस्थानवत् अनन्ता: सन्ति। अत्र द्रव्यार्थिकनयमाश्रित्य सामान्यतिरश्चां प्ररूपणा ओघवत् संभवति। किन्तु पर्यायार्थिकनयमवलम्ब्य तेषां अस्ति विशेष:।
तदेवोच्यते१-संपूर्णजीवराशे: अनंतेषु भागेषु कृतेषु तत्र बहुभागा: तिर्यञ्चो भवन्ति। शेषस्य अनंतेषु भागेषु कृतेषु तत्र बहुभागा: सिद्धा: भवन्ति। शेषस्य असंख्यातेषु भागेषु कृतेषु तत्र बहुभागा देवा भवन्ति। शेषस्य असंख्यातेषु भागेषु कृतेषु तत्र बहुभागा नारका: भवन्ति। शेषैकभागो मनुष्या: सन्ति२।’’
एवमेव तिरश्चां गुणस्थानेष्वपि विशेष: अस्त्येव। तत्र मिथ्यादृष्टयोऽनंतानन्ता:। सासादनादिदेश-संयतपर्यंता: प्रत्येवंâ पल्यासंख्येयभागमिता:३ इति।

अब तिर्यंचगति नाम का द्वितीय अन्तराधिकार प्रारंभ होता है।

इसके पश्चात् चार स्थलों के द्वारा सोलह सूत्रपर्यन्त तिर्यंचगति नाम का द्वितीय अन्तराधिकार प्रारम्भ होता है। उसमें प्रथम स्थल में सामान्य पञ्चेन्द्रिय जीवों का गुणस्थानों में द्रव्य, काल, क्षेत्र की अपेक्षा संख्यानिरूपण की मुख्यता से ‘‘तिरिक्खगईए’’ इत्यादि पाँच सूत्रों के द्वारा व्याख्यान किया जाएगा। उसके बाद दूसरे स्थल में पंचेन्द्रिय पर्याप्त तिर्यंचों की गुणस्थान व्यवस्था में संख्या के प्रपिपादन की मुख्यता से ‘‘पंचिंदिय तिरिक्ख’’ इत्यादि सूत्र से आरम्भ करके चार सूत्र हैं। उससे आगे तृतीयस्थल में स्त्रीवेदी पंचेन्द्रिय तिर्यंच जीवों में गुणस्थान व्यवस्था में उनके प्रमाण-संख्या का निरूपण करने की मुख्यता से ‘‘पंंचिंदिय तिरिक्ख जोणिणीसु ’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीवों के प्रमाण का प्ररूपण करने की मुख्यता से ‘‘ पंचिंदिय ’’ इत्यादि सूत्र से आरम्भ करके तीन सूत्र हैं ऐसी यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब तिर्यंचगति में गुणस्थानों में सामान्य से प्रमाण का प्रतिपादन करने हेतु श्रीभूतबली आचार्य के द्वारा सूत्र का अवतार किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति का आश्रय करके तिर्यंचों में मिथ्यादृष्टि से लेकर संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती तिर्यंच सामान्यप्ररूपणा के समान हैं।।२४।।

हिन्दी टीका-तिर्यंचगति के मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक जो तिर्यंच जीव हैं, उन सभी की संख्या गुणस्थान के समान जानना चाहिए।

मिथ्यादृष्टि तिर्यंच जीव प्रथम गुणस्थान में स्थित जीवों के समान संख्या में अनंत हैं। यहाँ द्रव्यार्थिक नय का आश्रय लेकर सामान्य तिर्यंचों की प्ररूपणा ओघ-गुणस्थान के समान संभव है किन्तु पर्यायार्थिक नय के अवलम्बन से उनमें कुछ विशेषता पाई जाती है।

उसी का वर्णन करते हैं-

सम्पूर्ण जीवराशि के अनन्त भाग करने पर उनमें से बहुभाग तिर्यंच होेते हैं। शेष एक भाग के अनन्त भाग करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण सिद्ध होते हैं। शेष एक भाग के असंख्यात भाग करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण देव होते हैं। शेष एक भाग के असंख्यात भाग करने पर उनमें से बहुभागप्रमाण नारकी होते हैं। शेष एक भागप्रमाण मनुष्य होते हैं।

इसी प्रकार तिर्यंच जीवों के गुणस्थानों में भी विशेषता पाई जाती है। उनमें मिथ्यादृष्टि तिर्यंच अनन्तानन्त हैं। आगे सासादन गुणस्थान से लेकर देशसंयत नामक पंचम गुणस्थानपर्यन्त प्रत्येक गुणस्थान में तिर्यंच जीव पल्य के असंख्यातवें भागप्रमाण हैं ऐसा जानना चाहिए।

अधुना मिथ्यादृष्टिपंचेन्द्रियतिरश्चां संख्यानिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-

पंचिंदियतिरिक्खा मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।२५।।

पंचेन्द्रियतिर्यञ्चो मिथ्यादृष्टयो जीवा द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? इति प्रश्ने सति असंख्याता: सन्ति। अत्रापि मध्यमासंख्यातासंख्याता: गृहीतव्या:।
संप्रति कालापेक्षया मिथ्यादृष्टितिरश्चां संख्याकथनाय सूत्रमवतरति-
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।२६।।
कालेण-कालापेक्षया मिथ्यादृष्ट्य: पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: असंख्यातासंख्यातारभ्यो अवसर्पिणी-उत्सर्पिणीभ्यां अपहृता: भवन्ति।
कश्चिदाह-कदाचित् असंख्यातासंख्यातावसर्पिणी-उत्सर्पिणीकालेषु अतिक्रमेषु तिर्यग्गतौ पंचेन्द्रियतिरश्चां व्युच्छेदो भविष्यति, पंचेन्द्रियतिर्यक्स्थिते: उपरि तत्र अवस्थानाभावात्?
आचार्य: प्राह-नैष दोष:, एकेन्द्रिय-विकलेन्द्रियेभ्यो देवनारकमनुष्येभ्यश्चागत्य पंचेन्द्रियतिर्यक्षु उत्पद्यमानजीवसंभवात्। या राशि: आयविरहिता व्ययसहिता च तस्या एव व्युच्छेदो भवति, किन्तु एषा पुन: पंचेन्द्रियतिर्यङ्मिथ्यादृष्टिजीवराशि: व्ययसहिता आयसहिता चेति अतो न व्युच्छेदं प्राप्नोति। ततश्च ‘‘णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा’’ इति सूत्राद्वा अस्या: राशे: विरहाभावो ज्ञायते१। एवं कालप्ररूपणा गता।
अधुना क्षेत्रापेक्षया एषां पंचेन्द्रियतिर्यङ्मिथ्यादृष्टीनां प्रमाणकथनार्थं सूत्रमवतरति-
खेत्तेण पंचिंदियतिरिक्खमिच्छाइट्ठीहि पदरमवहिरदि देव-अवहारकालादो असंखेज्ज-गुणहीणेण कालेण।।२७।।
क्षेत्रापेक्षया पंचेन्द्रियतिर्यङ्मिथ्यादृष्टिभि: देवानामवहारकालात् असंख्यातगुणहीनेन कालेन जगत्प्रतरं अपह्रियते।
अत्र अलौकिक गणितज्ञेन जिज्ञासुना धवला टीका विलोकनीया।

अब मिथ्यादृष्टि पंचेन्द्रिय तिर्यंचों की संख्या निरूपण के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं? असंख्यात हैं ।।२५।।

हिन्दी टीका-पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण से कितने हैं?

ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर मिलता है कि द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा से मिथ्यादृष्टि पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच जीव असंख्यात होते हैं। यहाँ भी असंख्यात शब्द से मध्यम असंख्यातासंख्यात ग्रहण करना चाहिए ।

अब काल की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि तिर्यञ्च जीवों की संख्या कथन के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

काल की अपेक्षा पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियोंं के द्वारा अपहृत होते हैं ।।२६।।

हिन्दी टीका-यहाँ आचार्य श्रीभूतबली स्वामी ने बताया है कि काल की अपेक्षा से पञ्चेन्द्रिय तिर्यंचों में जो प्रथम मिथ्यादृष्टि गुणस्थानवर्ती तिर्यंच हैं वे असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों से अपहृत होते हैं। इस सूत्र के सम्बन्ध में श्रीवीरसेनाचार्य देव ने धवला टीका में स्पष्ट किया है कि मूलसूत्र में मिथ्यादृष्टि पद का कथन न होने पर भी अनुवृत्ति से मिथ्यादृष्टि जीवों का चूँकि प्रकरण चला आ रहा है, इसलिए अध्याहार से उसका ग्रहण हो जाता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-

कदाचित् असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के निकल जाने पर तिर्यंचगति के पञ्चेन्द्रिय तिर्यंचों का विच्छेद हो जाएगा क्योंकि पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच की स्थिति के ऊपर तिर्यंचगति में उनका अवस्थान नहीं रह सकता है ?

इसका उत्तर आचार्यदेव ने दिया है कि -

यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि एकेन्द्रियों और विकलेन्द्रियों में से तथा देव, नारकी और मनुष्यों में से आकर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंचों में उत्पन्न होने वाले जीव संभव हैं। जो राशि आयरहित और व्ययसहित होती है उसका ही सर्वथा विच्छेद होता है परन्तु यह पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीवों की राशि तो आय और व्यय इन दोनों से सहित है,इसलिए इसका कभी विच्छेद नहीं होता है। अथवा ‘‘नाना जीवों की अपेक्षा पञ्चेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि जीव सर्वकाल रहते हैं’’ इस सूत्र से पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टियों के विरह का अभाव पाया जाता है। इस प्रकार कालप्ररूपणा समाप्त हुई।

अब क्षेत्र की अपेक्षा इन्हीं मिथ्यादृष्टि पञ्चेन्द्रिय तिर्यंचों के प्रमाण को बताने हेतु सूत्र का अवतरण होता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टियों के द्वारा देवों के अवहारकाल से असंख्यातगुणे- हीन काल से जगत्प्रतर अपहृत होता है ।।२७।।

हिन्दी टीका-क्षेत्र की अपेक्षा से पञ्चेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि तिर्यंच जीवों के द्वारा देवों के अवहार काल से असंख्यातगुणा हीन काल के द्वारा जगत्प्रतर अपहृत होता है। यहाँ अलौकिक गणित को जानने वाले जिज्ञासु पाठकों को धवला टीका देखना चाहिए अर्थात् उसका स्वाध्याय करना चाहिए।

विशेषार्थ-

यहाँ प्रसंगोपात्त धवला टीका के आधार से इस विषय का स्पष्टीकरण किया जा रहा है। जिसे सर्वप्रथम शंका-समाधान के द्वारा प्रस्तुत किया है कि-

देवों का प्रमाण लाने के लिए जो अवहारकाल कहा है वह असिद्ध है अतः असिद्धदेव-अवहारकाल से पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टियों का अवहारकाल कैसे साधा जाता है ?

इसका समाधान करते हुए आचार्यश्री ने कहा है-

यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि अनादिनिधन आगम असिद्ध नहीं हो सकता है।

शंका-आगम का ज्ञान नहीं होना ही आगम का असिद्धत्व है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि, व्याख्यान से आगम के ज्ञान की सिद्धि हो जाती है।

अब बतलाते हैं कि दो सौ छप्पन सूच्यंगुल के वर्ग को आवली के असंख्यातवें भाग के वर्ग से भाजित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टियों का अवहारकाल होता है। अथवा, आवली के असंख्यातवें भाग से दो सौ छप्पन सूच्यंगुलों के भाजित करने पर वहाँ जो लब्ध आवे, उसका वर्ग कर देने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टिसंबंधी अवहारकाल होता है। अथवा पहले स्थापित आवली के असंख्यातवें भाग को वर्गित करके जो प्रमाण आवे, उससे पैंसठ हजार पाँच सौ छत्तीस प्रतरांगुलों के भाजित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टिसंबंधी अवहारकाल होता है। अथवा पैंसठ हजार पाँच सौ छत्तीस से आवली के असंख्यातवें भाग के वर्ग को अपवर्तित करके जो लब्ध आवे, उससे प्रतरांगुल के भाजित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टिसंबंधी अवहारकाल आता है । अब यहाँ खंडित आदिक की विधि को बतलाते हैं। वह इस प्रकार है।

प्रतरांगुल के असंख्यात खंड होने पर उनमें से एक खंडप्रमाण पञ्चेन्द्रिय तिर्र्र्यंंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल होता है। इस प्रकार खंडित का वर्णन समाप्त हुआ। आवली के असंख्यातवें भाग से प्रतरांगुल के भाजित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल होता है। इस प्रकार भाजित का वर्णन समाप्त होता है। आवली के असंख्यातवें भाग को विरलित करके और इस विरलित राशि के प्रत्येक एक के प्रति प्रतरांगुल को समान खंड करके देयरूप से दे देने पर उनमें से एक विरलन के प्रति प्राप्त एक खंडप्रमाण पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहार काल होता है। इस प्रकार विरलित का वर्णन समाप्त हुआ। उस आवली के असंंख्यातवें भागरूप अवहारकाल को शलाका रूप से स्थापित करके अनन्तर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल के प्रमाण को प्रतरांगुल में से घटा देना चाहिए। एक बार घटाया इसलिये शलाकाराशि मेें से एक कम कर देना चाहिए। इस प्रकार पुनः पुनः प्रतरांगुल में से आवली के असंख्यातवें भाग को और शलाकाराशि मेंं से एक को उत्तरोत्तर कम करते जाने पर शलाकाराशि और प्रतरांगुल एक साथ समाप्त होते हैं। यहाँ पर आदि में अथवा मध्य में अथवा अंत में एक बार जितना प्रमाण घटाया, उतना पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल होता है। इस प्रकार अपहृत का कथन समाप्त हुआ। उस पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल का प्रमाण प्रतरांगुल के असंख्यातवें भाग है जो असंख्यात सूच्यंगुलप्रमाण होता है। इस प्रकार प्रमाण का वर्णन समाप्त हुआ।

शंका-पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल का प्रमाण असंख्यात सूच्यंगुल किस कारण से है ?

समाधान-सूच्यंगुल से प्रतरांगुल के भाजित करने पर एक सूच्यंंगुल का प्रमाण आता है। सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल से प्रतरांगुल के भाजित करने पर सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल का जितना प्रमाण हो, उतने सूच्यंगुल लब्ध आते हैं। इसी प्रकार असंख्यात वर्गस्थान नीचे जाकर आवली के असंख्यातवें भाग से प्रतरांगुल के भाजित करने पर असंख्यात सूच्यंगुल लब्ध आते हैं। इस प्रकार कारण का वर्णन समाप्त हुआ।

आवली के असंख्यातवें भाग से सूच्यंगुल के भाजित करने पर वहाँ जितना प्रमाण लब्ध आवे, उतने सूच्यंगुलप्रमाण पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल है। अथवा,आवली के असंख्यातवें भाग से सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल को अपहृत करके जो लब्ध आवे, उससे सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल के गुणित करने पर जितना प्रमाणलब्ध आवे, उतने सूच्यंगुलप्रमाण पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल है। इसी प्रकार असंख्यात वर्गस्थान नीचे जाकर आवली के असंख्यातवें भाग से आवली के भाजित करने पर जो लब्ध आवे, उससे आवली को गुणित करके पुनःउस गुणित राशि से प्रतरावली को गुणित करके इसी प्रकार सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल पर्यन्त संपूर्ण वर्गों के निरन्तर परस्पर गुणित करने पर यहाँ जितना प्रमाण लब्ध आवे, उतने सूच्यंगुल आते हैं और यही पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल है। इस प्रकार निरूक्ति का वर्णन समाप्त हुआ ।

विकल्प दो प्रकार का है-अधस्तन विकल्प और उपरिम विकल्प। उनमें से अधस्तन विकल्प को बतलाते हैं-आवली के असंख्यातवें भाग से सूच्यंगुल के भाजित करने पर जो लब्ध आवे, उससे उसी सूच्यंगुल के गुणित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल का प्रमाण होता है। अथवा, उसी आवली के असंख्यातवें भागहार से सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल के भाजित करने पर जो लब्ध आवे, उससे सूच्यंगुल के प्रथम वर्गमूल को गुणित करके जो लब्ध आवे, उससे सूच्यंगुल के गुणित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल होता है। इसीप्रकार असंख्यात वर्गस्थान नीचे जाकर आवली के असंख्यातवें भाग से आवली के भाजित करने पर जो लब्ध आवे, उससे उसी आवली को गुणित करके पुनः उस गुणित राशि से उस आवली के उपरिम वर्ग को गुणित करके इसी प्रकार गुणित करते हुए सूच्यंगुलपर्यन्त संपूर्ण वर्गों के निरन्तर परस्पर गुणित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल होता है। इस प्रकार अधस्तन विकल्प समाप्त हुआ।

अब अष्टरूप में अधस्तन विकल्प बतलाते हैं-आवली के असंख्यातवें भाग से सूच्यंगुल को गुणित करके जो लब्ध आवे, उससे घनांगुल के भाजित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल होता है। उसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-

सूच्यंगुलका घनांगुल में भाग देने पर प्रतरांगुल आता है पुनः आवली के असंख्यातवें भाग से प्रतरांगुल के भाजित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल होता है।

अब घनाघन में अधस्तन विकल्प बतलाते हैं- आवली के असंख्यातवें भाग से सूच्यंगुल को गुणित करके जो लब्ध आवे, उससे घनांगुल के प्रथम वर्गमूल को गुणित करके जो लब्ध आवे उससे घनाघनांगुल के प्रथम वर्गमूल के भाजित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल होता है। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-घनांगुल के प्रथम वर्र्गमूल से के भाजित करने पर घनांगुल का प्रमाण आता है पुनः सूच्यंगुल से घनांगुल के भाजित करने पर प्रतरांगुल का प्रमाण आता है पुनः सूच्यंगुल से घनांगुल के भाजित करने पर प्रतरांगुल का प्रमाण आता है पुनः आवली के असंख्यातवें भाग से प्रतरांगुल के भाजित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल होता है। इस प्रकार अधस्तन विकल्प समाप्त हुआ।

उपरिम विकल्प तीन प्रकार का है- गृहीत, गृहीतगृहीत और गृहीतगुणकार। उनमें से द्विरूप में गृहीत उपरिम विकल्प को बतलाते हैं- आवली के असंख्यातवें भाग से प्रतरांगुल के भाजित करने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल आता है। उक्त भागहार के जितने अर्धच्छेद हों, उतनी बार उक्त भज्यमान राशि के अर्धच्छेद करने पर भी पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच मिथ्यादृष्टि अवहारकाल होता है। वास्तव में यह मध्यम विकल्प है और इसी की अपेक्षा करके ही अधस्तन और उपरिम संज्ञा संभव है, इसलिए उपचार से यह उपरिम विकल्प कहा जाता है।

अधुना पंचेंद्रियतिरश्चां सासादनादिसंयतासंयतगुणस्थानेषु संख्यां व्यवस्थापयत्सूत्रमवतरति-

सासणसम्माइट्ठिप्पहुडि जाव संजदासंजदा त्ति तिरिक्खोघं।।२८।।

सासादनसम्यग्दृष्टिमादिं कृत्वा संयतासंयतगुणस्थानपर्यंता: पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: प्रत्येकं गुणस्थानेषु सामान्यतिर्यग्वत् पल्योपमस्यासंख्यातभागा: सन्ति।
एवं सामान्यपंचेन्द्रियतिरश्चां मिथ्यादृष्ट्यादिदेशसंयतगुणस्थानपर्यंतं संख्यानिरूपणपरत्वेन पंच सूत्राणि गतानि प्रथमस्थले इति।
संप्रति पर्याप्तनामकर्मोदयसहितपंचेन्द्रियतिरश्चां प्रमाणप्ररूपणाय सूत्रावतार: क्रियते-
पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्तमिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।२९।।
पञ्चेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तमिथ्यादृष्टय: द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? इति प्रश्ने सति असंख्याता: इति कथ्यन्ते।
अत्र सूत्रे पंचेन्द्रियग्रहणं एकेन्द्रियविकलेन्द्रियव्युदासार्थं। तिर्यग्निर्देश: देवनारकमनुष्यनिराकरणार्थ:। पर्याप्तनिर्देशो लब्ध्यपर्याप्त व्युदासार्थ:। मिथ्यादृष्टिनिर्देशेन शेषगुणस्थानव्युदास: कृतो भवति। अतो ज्ञायते पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्ता मिथ्यादृष्टयोऽपि असंख्याता एव, असंख्यातस्यासंख्यातविकल्पत्वात्।
अधुना एषामेव पर्याप्तमिथ्यादृष्टीनां कालापेक्षया प्रमाणनिर्देशनाय सूत्रमवतरति-
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।३०।।
कालापेक्षया पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तमिथ्यादृष्टय: असंख्यातासंख्याताभ्यां अवसर्पिण्युत्सर्पिणीभ्यां अपहृता भवन्ति।
संप्रति अत्यन्तसूक्ष्मक्षेत्रापेक्षया एषामेवतिरश्चां संख्यानिरूपणाय सूत्रावतार: क्रियते-
खेत्तेण पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्तमिच्छाइट्ठीहि पदरमवहिरदि देवअवहार-कालादो संखेज्जगुणहीणेण कालेण।।३१।।
क्षेत्रापेक्षया पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तमिथ्यादृष्टिभि: देवअवहारकालात् संख्यातगुणहीनेन कालेन जगत्प्रतरं अपह्रियते। अत्र सूत्रे प्रतरग्रहणस्य जगत्प्रतरं गृहीतव्यं न च प्रतरांगुलमिति।
अथ गुणस्थानेषु संख्यानिरूपणाय सूत्रावतारो भवति-
सासणसम्माइट्ठिप्पहुडि जाव संजदासंजदा त्ति ओघं।।३२।।
सासादनसम्यग्दृष्टिप्रभृति यावत् संयतासंयता इति ओघवत् ज्ञातव्यं। किं च इमे गुणस्थानवर्तिन: तिर्यञ्च: पर्याप्ता एव भवन्ति। एवं पंचेन्द्रियपर्याप्ततिरश्चां संख्यानिरूपणपरत्वेन द्वितीयस्थले सूत्रचतुष्टयं गतम्।
अधुना स्त्रीवेदीपंचेंद्रियतिरश्चीषु मिथ्यादृष्टिप्रमाणनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
पंचिंदियतिरिक्खजोणिणीसु मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।३३।।
पंचेन्द्रियतिर्यक्स्त्रीवेदिन्य: मिथ्यादृष्टिन्य: द्रव्यप्रमाणेन कियन्त: इति प्रश्ने असंख्याता: सन्ति इत्युत्तरं वर्तते।
तिर्यग्योनिषु द्रव्यपुंनपुंसकस्त्रीवेदधारिषु कदाचित् भाववेदवैषम्यं संभवेत्।
उक्तं च- पुरिसिच्छिसंढवेदोदयेण पुरिसिच्छिसंढओ भावे।
णामोदयेण दव्वे पाएण समा कहिं विसमा१।।
अतएव अत्र भावस्त्रीवेद: गृहीतव्य:।

अब पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच जीवों के सासादन गुणस्थान से लेकर संयतासंयत गुणस्थानपर्यन्त संख्या की व्यवस्था बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादन सम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच प्रत्येक गुणस्थान में सामान्य तिर्यंचों के समान पल्योपम के असंख्यातवें भाग हैं ।।२८।।

हिन्दी टीका-सासादन सम्यग्दृष्टि नामक द्वितीय गुणस्थान को आदि में करके संयतासंयत नामक पंचम गुणस्थानपर्यन्त पञ्चेन्द्रिय जीव प्रत्येक गुणस्थानों में सामान्य तिर्यंच के समान पल्योपम के असंख्यातवेंं भागप्रमाण हैं।

इस प्रकार सामान्य पञ्चेन्द्रिय तिर्यंचों के मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर देशसंयत गुणस्थानपर्यन्त संख्या निरूपण की मुख्यता से प्रथमस्थल में पाँच सूत्र हुए ।

अब पर्याप्त नाम कर्मोदय से सहित पञ्चेन्द्रिय तिर्यंचों का प्रमाण बतलाने के लिए सूत्र का अवतार करते हैं-

सूत्रार्थ-

पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण से कितने हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर वे असंख्यात हैं, ऐसा उत्तर मिलता है।।२९।।

यहाँ सूत्र में पञ्चेन्द्रिय पद का ग्रहण एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रियों के निराकरण करने के लिए किया है तथा तिर्यंच पद का कथन देव, नारकी और मनुष्यों के निराकरण करने के लिए किया है। पर्याप्त शब्द का निर्देश लब्ध्यपर्याप्त जीवों के निराकरण के लिए है तथा सूत्र में मिथ्यादृष्टि पद के निर्देश से शेष गुणस्थानों का निराकरण हो जाता है अतः यह ज्ञात होता है कि पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मिथ्यादृष्टि जीव भी असंख्यात ही हैं, क्योंकि असंख्यात के भी असंख्यात विकल्प-भेद होते हैं।

अब इन्हीं पर्याप्त मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों के काल की अपेक्षा प्रमाण बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

काल की अपेक्षा पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं ।।३०।।

हिन्दी टीका-यहाँ सूत्र में आचार्य श्रीभूतबली स्वामी ने बताया है कि काल की अपेक्षा पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों के द्वारा अपहृत होते हैं।

इस सूत्र में असंख्यातासंख्यात के ग्रहण करने का निमित्त कालप्ररूपणा है। अथवा कालप्ररूपणा पल्य,सागर और कल्प से ऊपर की संख्या से विशिष्ट जीवों के ग्रहण कराने में निमित्त है, इसलिए द्रव्यप्ररूपणा से कालप्ररूपणा सूक्ष्म है।

अब अत्यन्त सूक्ष्म क्षेत्र की अपेक्षा इन्हीं तिर्यंचों की संख्या निरूपण के लिए सूत्र का अवतार किया जाता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मिथ्यादृष्टियों के द्वारा देव अवहार काल से संख्यातगुणे हीन काल से जगत्प्रतर अपहृत होता है ।।३१।।

'हिन्दी टीका'-क्षेत्र की अपेक्षा पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मिथ्यादृष्टि जीवोें से देव अवहारकाल से संख्यातगुणे हीनकाल के द्वारा जगत्प्रतर अपहृत होता है। यहाँ सूत्र में ‘‘ प्रतर ’’ शब्द के ग्रहण से जगत्प्रतर का ग्रहण किया है, प्रतरांगुल का नहीं ।

विशेषार्थ-धवलाकार के अनुसार यदि ऐसा नहीं माना जाएगा तो ‘‘देव अवहारकाल की अपेक्षा संख्यातगुणे हीनकाल से’’ यह वचन नहीं बन सकता है। देवोें के अवहारकाल में संख्यात का भाग देने पर जो लब्ध आवे, वह प्रतरांगुल का संख्यातवां भाग होता है।

यहाँ शंका होती है कि यह कैसे जाना जाता है ? इसका उत्तर देते हुए श्रीवीरसेन स्वामी ने कहा कि संविग्न होकर जिन्होंने पदार्थों का निरूपण किया है, ऐसे आचार्यों के अविरुद्ध उपदेश से जाना जाता है कि देवों के अवहारकाल में संख्यात का भाग देने पर प्रतरांगुल का संख्यातवां भाग लब्ध आता है और यही पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मिथ्यादृष्टि का अवहार काल है । अथवा संख्यात से सूच्यंगुल से भाजित करने पर जो लब्ध आएगा, उसका वर्ग कर देने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मिथ्यादृष्टियों का अवहारकाल होता है। अथवा उस योग्य संख्यात का वर्ग करके और उस वर्गित राशि का प्रतरांगुल में भाग देने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मिथ्यादृष्टियों का अवहारकाल होता है। इस अवहार काल के खंडित आदि भेदोें को समझकर कथन करना चाहिए।

अब गुणस्थानों में संख्या का निरूपण करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादन सम्यग्दृष्टिगुण स्थान से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त जीव ओघप्ररूपणा के समान पल्योपम के असंख्यातवें भाग हैं ।।३२।।

हिन्दी टीका-सासादन सम्यग्दृष्टि से प्रारंभ करके जो संयतासंयत गुणस्थान तक जीव हैं, उनकी संख्या यथायोग्य गुणस्थान के समान जानना चाहिए । इसमें विशेष बात यह है कि सभी गुणस्थानवर्ती तिर्यंच पर्याप्तक ही होते हैं।

इस प्रकार पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त तिर्यंचों की संख्या निरूपण की मुख्यता से द्वितीय स्थल में चार सूत्र पूर्ण हुए ।

अब स्त्रीवेदी पञ्चेन्द्रिय तिर्यंचों में मिथ्यादृष्टि जीवों का प्रमाण बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती जीवों मेें मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? असंख्यात हैं ।।३३।।

हिन्दी टीका-स्त्रीवेदी पञ्चेन्द्रिय तिर्यंचों में मिथ्यादृष्टि जीवों की संख्या द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितनी है ? ऐसा प्रश्न होने पर उनकी संख्या असंख्यात है, यह उत्तर प्राप्त होता है।

तिर्यंच योनि के जीवों में द्रव्यवेदोें की अपेक्षा पुरुष, नपुंसक और स्त्रीवेदधारियों में कदाचित् भाववेद की विषमता भी संभव पाई जाती है। जैसा कि कहा भी है-

गाथार्थ-पुरुष, स्त्री और नपुंसकवेद कर्म के उदय से भावपुरुष, भावस्त्री,भावनपुंसक होता है और नामकर्म के उदय से द्रव्यपुरुष, द्रव्य स्त्री, द्रव्यनपुंसक होता है। सो यह भाववेद और द्रव्यवेद प्रायः करके समान होते हैं परन्तु कहीं-कहीं विषम भी होते हैं।

अतएव यहाँ पर भावस्त्रीवेद को ग्रहण करना चाहिए ।

भावार्थ-यहाँ वेद के प्रकरण में विशेष बात यह समझना है कि वेदनामक नोेकषाय के उदय से जीवोें के भाववेद होता है और निर्माण नामकर्म सहित आंगोपांग नामकर्म के उदय से द्रव्यवेद होता है। ये दोनों वेद प्रायः करके तो समान ही होते हैं, अर्थात् जो भाववेद है वही द्रव्यवेद रहता है परन्तु कहीं-कहीं विषमता भी हो जाती है अर्थात् भाववेद दूसरा और द्रव्यवेद दूसरा भी रह सकता है। यह विषमता तो देवगति और नरकगति में तो सर्वथा नहीं पाई जाती है। मनुष्य और तिर्यंचगति में जो भोगभूमिज हैं, उनमें भी नहीं पाई जाती है। बाकी के तिर्यंच-मनुष्यों में क्वचित्-कहीं-कहीं वैषम्य भी पाया जाता है।


अग्रे पंचेन्द्रिययोनिमतीतिर्यग्जीवानां कालापेक्षया प्रमाणप्ररूपणाय सूत्रस्यावतारो भवति-

असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अवहिरंति कालेण।।३४।।

कालापेक्षया पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिमतीमिथ्यादृष्टिजीवा असंख्यातासंख्याताभ्यां अवसर्पिण्युत्सर्पिणीभ्यां अपहृता भवन्ति।
क्षेत्रापेक्षया तासामेव तिरश्चीनां संख्याप्रतिपादनार्थं सूत्रस्यावतारो भवति-
खेत्तेण पंचिंदियतिरिक्ख जोणिणिमिच्छाइट्ठीहि पदरमवहिरदि देवअवहारकालादो संखेज्जगुणेण कालेण।।३५।।
क्षेत्रापेक्षया पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिनी मिथ्यादृष्टिभि: देवानामवहारकालात् संख्यातगुणेन कालेन जगत्प्रतरं अपह्रियते।
योनिमतीषु सासादनादिगुणस्थानेषु संख्यानिरूपणार्थं सूत्रावतारो भवति-
सासणसम्माइट्ठिप्पहुडि जाव संजदासंजदा त्ति ओघं।।३६।।
सासादनसम्यग्दृष्टिप्रभृति यावत् संयतासंयता: इति प्रत्येकं गुणस्थानेषु पंचेन्द्रियतिर्यक्योनिमतीजीवा: तिर्यक्सामान्यप्ररूपणावत् पल्योपमस्यासंख्यातभागा: सन्ति। परन्तु पर्यायार्थिकनयापेक्षया अंतरमस्त्येव।
एवं तिरश्चां स्त्रीभाववेदिनां संख्यानिरूपणपरत्वेन चत्वारि सूत्राणि गतानि।
अधुना अपर्याप्ततिरश्चां संख्यानिरूपणायसूत्रद्वयस्यावतारो भवति-
पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्ता दव्वपमाणेण केवडिया? असंखेज्जा।।३७।।
असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहिं अवहिरंति कालेण।।३८।।
पंचेंद्रियतिर्यगपर्याप्ता द्रव्यप्रमाणेन कियन्त:? इति प्रश्ने असंख्याता: इति उत्तरं वर्तते। कालापेक्षया इमे अपर्याप्ता: असंख्यातासंख्याताभ्यां अवसर्पिण्युत्सर्पिणीभ्यां अपहृता भवन्ति।
अत्र अपर्याप्तनामकर्मोदयेन सहिता अपर्याप्ता: पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: ज्ञातव्या:।
क्षेत्रापेक्षया तेषामेव संख्याप्रतिपादनार्थं सूत्रमवतरति-
खेत्तेण पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्तेहि पदरमवहिरदि देवअवहारकालादो असंखेज्ज-गुणहीणेण कालेण।।३९।।
क्षेत्रापेक्षया पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्तै: देवावहारकालात् असंख्यातगुणहीनेन कालेन जगत्प्रतरमपह्रियते।
अस्यालौकिकगणितस्य किंचिदवबोधनार्थं भागाभागं कथयिष्यामि।
‘‘पूर्वकथिततिर्यग्राशिं अनंतखण्डे कृते तत्र बहुखण्डा एकेन्द्रियविकलेन्द्रिया: सन्ति।
शेषस्य संख्यातखण्डे कृते तत्र बहुखण्डा: पंचेन्द्रियतिर्यग्लब्ध्यपर्याप्ता भवन्ति। शेषस्यासंख्यातखण्डे कृते तत्र बहुखण्डा: पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्तमिथ्यादृष्टयो भवन्ति। शेषस्यासंख्यातखण्डे कृते तत्र बहुखण्डा: पंचेंद्रियतिर्यग्योनिमतीमिथ्यादृष्टयो भवन्ति। शेषस्यासंख्यातखंडे कृते तत्र बहुखण्डा: पंचेन्द्रियतिर्यक्त्रि-वेदासंयतसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। शेषस्यसंख्यातखण्डे कृते तत्र बहुखण्डा: पंचेन्द्रियतिर्यक्त्रिवेदसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यो भवन्ति। शेषस्यासंख्यातखण्डे कृते तत्र बहुखण्डा पंचेन्द्रियतिर्यक्त्रिवेदसासादनसम्यग्दृष्टयो भवन्ति। शेषस्यैकखण्डा: संयतासंयता: भवन्ति१।’’
तिरश्चां पंचभेदा: कथ्यन्ते-
सामण्णा पंचिंदी, पज्जत्ता जोणिणी अपज्जत्ता।
तिरिया णरा तहा वि य, पंचिंदियभंगदो हीणा२।।
सामान्यतिर्यञ्च: पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: पर्याप्ततिर्यञ्च: योनिमतीतिर्यञ्च: अपर्याप्ततिर्यञ्चश्च। एषु सामान्यतिर्यक्षु एकेन्द्रिद्वीन्द्रियत्रीन्द्रियचतुरिन्द्रियपञ्चेन्द्रियपर्यन्ता सर्वे भवन्ति।
श्रीमद्गौतमस्वामिभिर्मुनीनां दैवसिकप्रतिक्रमणे एषां संख्या निरूपिता।
उक्तं च-तत्थ पढमे महव्वदे पाणादिवादादो वेरमणं, से पुढविकाइया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, आउकाइया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, तेउकाइया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, वाउकाइया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा, वणप्फदिकाइया जीवा अणंताणंता, हरिया वीआ इत्यादय:।
वेइंदिया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा कुक्खिकिमि इत्यादय:।
तेइंदिया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा कुंथुद्देहिय......इत्यादय:।
चउरिंदिया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा दंसमसय.......इत्यादय:।
पंचिंदिया जीवा असंखेज्जासंखेज्जा अंडाइया पोदाइया.......इत्यादय:।
तात्पर्यमेतत्-पृथिवीजलाग्निवायुचतुष्का एकेन्द्रिया असंख्यातासंख्याता: द्वीन्द्रियत्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रियपंचेन्द्रिया जीवा असंख्यातासंख्याता: सन्ति, केवलं वनस्पतिकायिका एव अनंतानंता: सन्ति।
एषु असंख्यातासंख्यातेषु असंख्यातविकल्पत्वात् न च सर्वे समाना: इति ज्ञातव्यं भवद्भि:।
एवं अपर्याप्ततिर्यङ्निरूपणपरत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
इत्थं स्थलचतुष्टयेन षोडशभि: सूत्रै: तिर्यग्गतिप्ररूपको नाम द्वितीयोऽन्तराधिकार: समाप्त:।

आगे योनिमती पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच जीवों का काल की अपेक्षा प्रमाण बतलाने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

काल की अपेक्षा पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती (स्त्रीवेदी) मिथ्यादृष्टि जीव असंख्याता-संख्यात अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं ।।३४।।

हिन्दी टीका-काल की अपेक्षा पञ्चेन्द्रिय स्त्रीवेदी तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों के द्वारा अपहृत होते हैं।

यहाँ मिथ्यादृष्टि शब्द पूर्व के सूत्र से ग्रहण करना है तभी सूत्र का अर्थ समुचित बैठता है। शेष सम्पूर्ण वर्णन पर्याप्त पञ्चेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि तिर्यंचजीवों का प्रमाण कहने वाले सूत्रानुसार जानना चाहिए।

अब क्षेत्र की अपेक्षा उन्हीं पंचेन्द्रिय स्त्रीवेदी मिथ्यादृष्टि जीवों की संख्या का प्रतिपादन करने हेतु सूत्र का अवतार होेता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा स्त्रीवेदी पञ्चेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि तिर्यंचों के द्वारा देवों के अवहारकाल से संख्यातगुणे अवहारकाल से जगत्प्रतर अपहृत होता है ।।३५।।

हिन्दी टीका-इस सूत्र का अभिप्राय यह है कि पञ्चेन्द्रिय योनिमती तिर्यंच जीव, जो मिथ्यादृष्टि गुणस्थानवर्ती हैं, वे काल की अपेक्षा देवों के अवहारकाल से संख्यातगुणे अवहारकाल के द्वारा जगत्प्रतर रूप में अपहृत होते हैं।

विशेषार्थ-यहाँ धवला टीकाकार के अनुसार इस सूत्र का व्याख्यान इस प्रकार किया गया है।

तीन लाख चौबीस हजार करोड़ संख्या से देवोें के अवहारकाल के गुणित करने पर जो लब्ध आवे, उससे भी संख्यातगुणा पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच योनिनी मिथ्यादृष्टि संबंधी अवहारकाल है। अथवा, छह सौ योजन के अंगुल करके वर्ग करने पर इक्कीस सौ कोड़ा कोड़ी, छत्तीस लाख कोड़ी और चौसठ हजार कोड़ी प्रतरांगुल प्रमाण पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनी मिथ्यादृष्टियों का अवहारकाल है। अथवा, इक्कीस सौ कोड़ाकोड़ी, तेईस कोड़ाकोड़ी, छत्तीस लाख कोड़ी और चौसठ हजार कोड़ी प्रमाण संख्या से प्रतरांगुल को अपवर्तित करके जो लब्ध आवे, उसका प्रतरांगुल के उपरिम वर्ग में भाग देने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच योनिनी मिथ्यादृष्टियों का अवहारकाल होता है। एक योजन के चार कोस, एक कोस के दो हजार धनुष, एक धनुष के चार हाथ और एक हाथ के चौबीस अंगुल होते है, इसलिये एक योजन के अंगुल करने पर १²४²२०००²४²२४²·७६८००० प्रमाण अंगुल आते हैं। ७६८००० को ६०० से गुणा कर देने पर ६०० योजन के ४६,०८,००००० प्रमाण अंगुल हो जाते हैं।

४६,०८,००००० संख्यात का वर्ग कर लेने पर २१,२३,३६,६४,०००००००००० प्रमाण प्रतरांगुल होते हैं। इनका भाग जगत्प्रतर में देने पर पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच योनिनी मिथ्यादृष्टियों का प्रमाण आता है।

पञ्चेन्द्रिय तिर्यंच योनिनियों के अवहारकाल से संबंध रखने वाला यह कितने ही आचार्यों का व्याख्यान घटित नहीं होता है, क्योंकि तीन सौ योजनों के अंगुलोें का वर्गमात्र व्यंतर देवों का अवहारकाल होता है, ऐसा आगे व्याख्यान देखा जाता है।

शंका-यह पूर्वोक्त पंचेंन्द्रि तिर्यंच योनिनियों के अवहारकाल का व्याख्यान असत्य है और वाणव्यंतर देवोें का अवहारकाल के प्रमाण का व्याख्यान सत्य है, यह कैसे जाना जाता है?

समाधान-इस विषय में पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनीसंबंधी अवहारकाल का व्याख्यान असत्य ही है और व्यंतर देवों के अवहारकाल का व्याख्यान सत्य ही है, ऐसा कुछ हमारा एकांत मत नहीं हैं, किंतु हमारा इतना ही कहना है कि उक्त दोनों व्याख्यानोें में से कोई एक व्याख्यान असत्य होना चाहिए। अथवा, उक्त दोनों ही व्याख्यान असत्य हैं, यह हमारी प्रतिज्ञा है।

शंका-उक्त दोनों व्याख्यान असत्य हैं, अथवा उक्त दोनों व्याख्यानों में से एक व्याख्यान तो असत्य है ही, यह कैसे जाना जाता है?

समाधान-पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनियों से वाणव्यंतर देव असंख्यातगुणे हैं और उनकी देवियाँ वाणव्यन्तर देवों से संख्यातगुणी हैं, इस खुद्रदाबंध के सूत्र से उक्त अभिप्राय जाना जाता है। सूत्र को अप्रमाण करके व्याख्यान प्रमाण है, ऐसा तो कहा नहीं जा सकता है, अन्यथा, अतिप्रसंग दोष आ जायेगा। यदि एक-एक देव में एक-एक ही देवी होती है, यह युक्ति दी जाए, सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि, भवनवासी देवों के बहुत सी देवियों का आगम में उपदेश पाया जाता है और देवों से देवियाँ बत्तीस गुणी होती हैं ऐसा व्याख्यान भी देखा जाता है इसलिए वाणव्यंतर देवोें का अवहारकाल तीन सौ योजन के अंगुलों का वर्गमात्र है,यदि ऐसा निर्णय है तो पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनियों के अवहारकाल के उत्पन्न करने के लिए तीन सौ योजन के अंगुलोें के वर्ग में जो राशि जिनदेव ने देखी हो, तदनुसार बत्तीस अधिक सौ आदि रूप गुणकार का प्रवेश कराना चाहिए। अथवा पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनियों का अवहारकाल छह सौ योजनों के अंगुलों का वर्गमात्र हैै, ऐसा निश्चित है तो वाणव्यंतर देवोें का अवहारकाल उत्पन्न करने के लिये तेतीस आदि जो संंख्या जिनेन्द्रदेव ने देखी हो, उससे छह सौ योजनों के अंगुलों के वर्ग को अपवर्तित करना चाहिए। अथवा, वाणव्यंतर और पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनी इन दोनों के अवहारकालोें के लिए दोनोें स्थानों में भी प्रतरांगुल के उसके योग्य गुणकार दे देना चाहिये।

अब स्त्रीदेवी सासादन गुणस्थानवर्ती तिर्यंचोें की संख्या निरूपण हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

सासादन सम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान में पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती जीव तिर्यंच सामान्य प्ररूपणा के समान पल्योपम के असंख्यातवें भाग हैं ।।३६।।

हिन्दी टीका-सासादन सम्यग्दृष्टि गुणस्थान को आदि में लेकर संयतासंयत गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानों में स्त्रीदेवी पंचेन्द्रिय तिर्यंच जीव तिर्यंच सामान्य प्ररूपणा के समान पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण है। परन्तु पर्यायार्थिकनय की अपेक्षा इसमें अंतर है क्योेेंकि तिर्यंच सामान्य प्ररूपणा अथवा पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त सामान्य प्ररूपणा के समान पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती गुणस्थान प्रतिपन्न जीवों की प्ररूपणा नहीं होती है क्योंकि तीन वेदवाली राशि से एक स्त्रीवेदी जीवराशि की समानता नहीं बन सकती है। इसलिए सामान्य प्ररूपणा से यह प्ररूपणा विशेष होना चाहिए ।

इस प्रकार स्त्रीभाव वेदी तिर्यंञ्चों की संख्या निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब अपर्याप्त तिर्यंचों की संख्या निरूपण करने के लिए दो सूत्रों का अवतार होता है-

'सूत्रार्थ-'

पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं? असंख्यात हैं।।३७।।

काल की अपेक्षा पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीव असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत होते हैं ।।३८।।

हिन्दी टीका-पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीव द्रव्यप्रमाण से कितने हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर वे असंख्यात हैं, ऐसा उत्तर प्राप्त होता है। काल की अपेक्षा ये अपर्याप्त जीव असंंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी कालों से अपहृत होते हैं। यहाँ अपर्याप्त नामकर्म के उदय से सहित अपर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच जीव जानना चाहिए।

क्षेत्र की अपेक्षा उन्हीं अपर्याप्त तिर्यंचों की संख्या प्रतिपादन करने के लिए सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

क्षेत्र की अपेक्षा पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तक जीवों के द्वारा देवों के अवहारकाल से असंख्यातगुणे हीनकाल से जगत्प्रतर अपहृत होता है ।।३९।।

हिन्दी टीका-क्षेत्र की अपेक्षा पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तकों के द्वारा देवोें के अवहारकाल से असंख्यातगुणे हीन काल से जगत्प्रतर अपहृत होता है।

यहाँ अलौकिक गणित को किंचित् रूप से जानने के लिए भागाभाग को बताएंगे-

‘‘पूर्व कथित तिर्यंच राशि के अनन्त खण्ड करने पर उनमें से बहुखंडप्रमाण एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय जीव हैं। शेष के संख्यात खण्ड करने पर उनमें से बहुभाग पंचेन्द्रिय तिर्यंच लब्ध्यपर्याप्तक जीव हैं। शेष के असंख्यात खण्ड करने पर उनमें से बहुभाग पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मिथ्यादृष्टि जीव हैं। शेष के असंख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभाग पंचेन्द्रिय योनिमती तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव हैं। शेष के असंख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभाग पंचेन्द्रिय तिर्यंच तीन वेदवाले असंयतसम्यग्दृष्टियों का द्रव्य है। शेष के संख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभाग पंचेन्द्रिय तिर्यंच तीन वेद वाले सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का द्रव्य है। शेष के असंख्यात खंड करने पर उनमें से बहुभाग पंचेन्द्रिय तिर्यंच तीन वेद वाले सासादनसम्यग्दृष्टियों का द्र्रव्य है। शेष के एक खण्डप्रमाण पंचेन्द्रिय तिर्यंच तीन वेद वाले संयतासंयत हैं।

तिर्यंच के पाँच भेद कहते हैं-

गाथार्थ-सामान्य तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पर्याप्तक तिर्यंच, योनिमती तिर्यंच और अपर्याप्त तिर्यंच ये तिर्यंचों के पाँच भेद हैं। मनुष्यों में इनमें से पंचेन्द्रिय वाला भेद नहीं होता हैै क्योंकि मनुष्यों में पंचेन्द्रिय मनुष्य ही होते हैं, एकेन्द्रिय आदि नहीं होते हैं।

सामान्य तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पर्याप्त तिर्यंच, योनिमती तिर्यंच और अपर्याप्त तिर्यंच ये तिर्यंचों के पाँच भेद हैं। इन पाँचों भेदों में जो सामान्य तिर्यंच हैं उनमें एकेन्द्रिय, दोइन्द्रिय, तीनइन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंंचेन्द्रियपर्यन्त सभी प्रकार के जीव होते हैं।

श्रीमान् गौतम स्वामी ने मुनियों के दैवसिक प्रतिक्रमण में इन जीवों की संख्या बताई है। जैसाकि प्रतिक्रमण सूत्रों में कहा है-

उस प्राणातिपात विरमण-अहिंसा महाव्रत नामक प्रथम महाव्रत में हिंसा से विरत होना है, उसमें पृथिवी कायिक के जीव असंख्यातासंख्यात, जलकायिक जीव असंख्यातासंख्यात, तेज-अग्निकायिक जीव असंख्यातासंख्यात, वायुकायिक जीव असंख्यातासंख्यात और वनस्पतिकायिक जीव अनंतानंत हैं.... इन सभी की हिंसा से विरक्ति ही प्रथम महाव्रत है।

इसी प्रकार मुनियों के अहिंसा महाव्रत पालन में पाँचों इन्द्रिय वाले प्राणियों की संख्या बताई है। अर्थात्-

दो इन्द्रिय जीव कुक्षि-कृमि आदि असंख्यातासंख्यात हैं।

कुंथु-देहिक आदि तीन इन्द्रिय जीव असंख्यातासंख्यात हैं।

डांस-मच्छर आदि चार इन्द्रिय जीव असंख्यातासंख्यात हैं।

अंडे से जन्म लेने वाले तथा पोेत,जरायु आदि प्रकार के गर्भ से जन्म लेने वाले पंचेन्द्रिय जीव भी असंख्यातासंख्यात हैं।

तात्पर्य यह है कि पृथिवी, जल, अग्नि, वायु इन चार स्थावरकायिक एकेन्द्रिय जीव असंख्यातासंख्यात हैं, दो इन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक सभी त्रसकायिक जीव असंख्यातासंख्यात हैं तथा केवल वनस्पति कायिक जीव ही अनन्तानन्त होते हैं।

इन असंख्यातासंख्यात जीवोें में भी असंख्यात विकल्प हैं, न कि सभी समान होते हैं ऐसा जानना चाहिए ।

इस प्रकार अपर्याप्त तिर्यंच जीवोें के निरूपण की मुख्यता से तीन सूत्र पूर्ण हुए ।

इस प्रकार चार स्थलों में सोलह सूत्रों के द्वारा तिर्यंचगति का प्ररूपक द्वितीय अन्तराधिकार समाप्त हुआ।