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०३ - तृतीय अध्याय

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विषय सूची

तत्त्वार्थ सूत्र प्रवचन

तृतीय अध्याय
प्रवचन कर्त्री -आर्यिका चंदनामती माताजी
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—मंगलाचरण—


मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्।
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुण लब्धये।।

अर्हंत भगवान के नमस्कार स्वरूप मंगलाचरण के कथन के द्वारा आचार्य उमास्वामी ने जहाँ दो अध्यायों में जीवतत्त्व का विशेष प्रतिपादन किया वहीं तृतीय अध्याय के माध्यम से वे भव्यात्माओं को बतलाना चाहते हैं, उन्हें चिन्तन का एक विषय देना चाहते हैं कि हे प्राणी! तू समझ कि तू कौन है ? कहाँ से आया है ? तुझे क्या करना है और तू क्या कर रहा है ? इस तृतीय अध्याय के अन्दर ऊध्र्वलोक और मध्यलोक का वर्णन किया जाएगा अर्थात् तीन लोक में सम्पूर्ण सृष्टि मानी गयी है, उस तीन लोक के आकार को बहुत सारी जगह आप लोगों ने देखा होगा। नीचे अधोलोक है, बीच में मध्यलोक है और ऊपर स्वर्ग और सिद्धशिला आदि को बतलाने वाला ऊध्र्वलोक है। इनमें से जीव तत्त्व की अवस्थिति कहाँ-कहाँ है ? उसको बताने के लिए तृतीय अध्याय में दो लोकों का वर्णन करेंगे, पुन: चतुर्थ अध्याय में ऊध्र्वलोक का वर्णन किया जायेगा।

जिस प्रकार जब कोई व्यक्ति अपने घर से बाहर उसी शहर में निकलता है तब उससे अगर प्रश्न होता है कि—आप कहाँ से आये हैं ? तो वह अपना परिचय देते हुए कहता है कि मैं इस गली नं. से आया हूँ, क्योंकि शहर के अन्दर उस गली का परिचय ही पर्याप्त होता है। जब वही व्यक्ति किसी दूसरे शहर-गाँव में पहुँचता है तो उससे पूछा जाता है कि आप कहाँ से आये हैं ? उसे बताना पड़ता है कि मैं अमुक गाँव से अथवा अमुक शहर से आया हूँ। उसके बाद जब आप और आगे बढ़ते हैं, दूसरे प्रदेश में जाते हैं तो आपकी दृष्टि में वह गली, वह शहर भी गौण हो जाता है, आपको बताना होता है कि मैं अमुक राज्य से आया हूँ। अभी आप राजस्थान से, मध्यप्रदेश से, उत्तरप्रदेश से यहाँ आये हैं। आपसे यहाँ कोई पूछता है, आपका परिचय लेता है तो आप कहते हैं कि हम उत्तरप्रदेश से आये हैं, हम राजस्थान से आये हैं। उस समय आपके लखनऊ और उदयपुर आदि स्थान गौण हो जाते हैं और उसके बाद आप अपने को छोड़कर और आगे बढ़ते हैं अर्थात् अपने भारत देश को छोड़कर विदेश में जाते हैं और आपसे परिचय पूछा जाता है कि आप कहाँ से आये हैं ? तो गली की बात तो बहुत दूर की हो गयी, गाँव, शहर भी छूट गया। तब आप बोलते हैं कि मैं भारत से आया हूँ। कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते गये, जैसे-जैसे आपका दायरा बढ़ता गया वैसे-वैसे ही आपका मन भी उदार होता चला गया। आप सोचें कि मैं अपनी गली नं. में ही बँधा रहूँगा तो यह भ्रांति होगी क्योंकि जैसे-जैसे सीमा रेखा बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे ही आपकी दृष्टि महान बनती चली जाएगी।

आचार्यों ने इसी उदाहरण के माध्यम से यह बात बताई कि तू तीनों लोकों की अवस्थिति को पहले समझ ले और उसके बाद जान कि मैं कहाँ से आया हूँ, कहाँ रह रहा हूँ, मुझे क्या करना था और मैं क्या कर रहा हूँ और इस करनी के द्वारा भी कर्मसिद्धान्त के दर्पण में देखना कि मुझे आगे कहाँ जाना पड़ेगा। इसीलिये सात तत्त्वों में इन अध्यायों का विभाजन किया है कि हर प्राणी इस बात को जरूर जाने कि मैं किस कर्म को करूँगा तो कौन सी गति की प्राप्ति होगी।

पहले करणानुयोग के विषय का प्रतिपादन करने वाले इस तृतीय अध्याय के प्रारम्भ में अधोलोक का वर्णन करते हुए प्रथम सूत्र के अन्दर आचार्य उमास्वामी ने सात नरकों की बात बताई है— अधोलोक का वर्णन—सात नरक पृथ्वियाँ

रत्नशर्कराबालुकापंकधूमतमोमहातम:प्रभाभूमयो घनाम्बु-वाताकाशप्रतिष्ठा: सप्ताऽधोऽध:।।१।।

अर्थ — रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तम:प्रभा और महातम:प्रभा ये सात भूमियाँ हैं और क्रम से नीचे-नीचे घनोदधिवातवलय, घनवातवलय, तनुवातवलय और आकाश के आधार हैं।

अधोलोक में सात पृथ्वियाँ हैं, उनके नाम हैं—रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तम:प्रभा और महातम:प्रभा। जो एक के नीचे एक, ऐसे अध:—अध: मतलब नीचे-नीचे हैं। सबसे पहले पहला नरक, इसके नीचे दूसरा नरक, पुन: क्रम—क्रम से सातवाँ नरक सबसे नीचे है और उसके नीचे एक नित्य निगोद नाम का स्थान है जहाँ पर निगोदिया जीवों की खानि है, उसी अवस्था का वर्णन छहढालाकार ने किया है—‘‘एक श्वांस में अठ-दस बार, जन्म्यो मर्यो भर्यो दु:खभार’’।

निगोदिया जीव एक श्वांस में अठारह बार जनम-मरण करते हैं अर्थात् केवल जनम-मरण करना ही उनका कार्य होता है और वह गति केवल मिथ्यात्व कर्म के उदय से मिलती है। कोई कषाय कर ले, विषयभोग कर ले, कितना भी कुछ कर ले उसे नरकगति में या तिर्यंचगति में जाना पड़ेगा, लेकिन निगोद पर्याय मिथ्यात्व के कारण ही मिलती है।

सच को झूठ कहना, जो विद्यमान है उसे अविद्यमान कहना, ऐसी कितनी मिथ्या धारणाएँ इस जीव ने बना रखी हैं और इसी मिथ्यात्व के फलस्वरूप उसे निगोद में जाना पड़ता है। निगोदिया जीवों की बात अवधिज्ञानी को दिखती नहीं, इसलिए हे भव्यात्मन्! इस निगोद में अपने को नहीं जाना है, निगोदिया जीव की पर्याय को नहीं धारण करना है। वहाँ न तो कोई सम्बोधन है और न ही, किसी प्रकार का कोई उपदेश मिल सकता है। जब स्वयं में कर्म मन्द पड़ेंगे तब वहाँ से जीव निकलता है। जो सात पृथ्वियाँ बताई हैं वह बहुत बड़े—बड़े देश और उसके अन्दर स्थित अलग—अलग राज्यों के समान हैं। उन पृथ्वियों के अन्दर बिल के समान नरकों की संख्या बताई है जहाँ नारकी औंधे मुँह जाकर गिरते हैं।

उन नरकों के बिलों की संख्या बताते हैं—

तासु िंत्रशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशत-सहस्राणि पञ्च चैव यथाक्रमम्।।२।।

अर्थ — उन पृथ्वियों में क्रम से पहली पृथ्वी में तीस लाख बिल हैं, दूसरी पृथ्वी में पच्चीस लाख, तीसरी पृथ्वी में पन्द्रह लाख, चौथी पृथ्वी में दस लाख, पाँचवीं पृथ्वी में तीन लाख, छठी पृथ्वी में ५ कम १ लाख और सातवीं पृथ्वी में केवल ५ बिल हैं।

ये बिल जमीन में गड़े हुए ढोल की पोल के समान होते हैं। इस प्रकार इन सात नरकों की संख्या बताई गयी है जिसमें सातवीं पृथ्वी में बहुत हिंसक या व्रूâरकर्मा प्राणी ही जाते हैं। पंचमकाल में इस भरतक्षेत्र में जन्म लिया हुआ कोई भी प्राणी अर्थात् कोई भी मनुष्य या तिर्यंच इस सातवें नरक को प्राप्त नहीं कर सकता है क्योंकि उत्तम संहनन के द्वारा ही यह सम्भव है। जिस संहनन से मोक्ष की प्राप्ति होती है उसी संहनन से सातवें नर्वâ की प्राप्ति होती है अर्थात् अगर उस संहनन को प्राप्त कर तपस्या की तो मोक्ष की प्राप्ति और उसी संहनन से व्रूर कर्म किये तो सातवें नरक में जाना पड़ेगा। आज के मनुष्य छठे नरक तक तो जा सकते हैं पर सातवें नरक तक जाने की उनकी योग्यता नहीं है।

उन नारकियों के दु:खों का वर्णन करते हुए आचार्यश्री उमास्वामी कहते हैं—

नारका नित्याशुभतरलेश्या परिणामदेहवेदना विक्रिया:।।३।।

अर्थ — नारकी जीव हमेशा ही अत्यन्त अशुभ लेश्या, परिणाम, शरीर, वेदना और विक्रिया के धारक होते हैं। नारकी जीव नित्य ही अशुभ लेश्या वाले हैं अर्थात् उनके अशुभ ही परिणाम रहते हैं, अशुभ ही लेश्या रहती है, उनके शरीर का रंग एकदम काला-काला रहता है और अशुभ वेदना—तीव्र वेदना है, अशुभ ही विक्रिया करते हैं, शुभ विक्रिया नहीं कर सकते कि कोई राजकुमार अथवा देव का रूप धारण कर लें, वे तो भाला, बरछी, नदी, पेड़, तलवार इन्हीं चीजों के रूपों को धारण करते हैं अर्थात् वहाँ सब कुछ अशुभ ही अशुभ होता है। यहाँ लेश्याओं से द्रव्य लेश्याओं का वर्णन है जो कि आयु पर्यन्त रहती हैं। भाव लेश्याएँ अन्तर्मुहूर्त में बदलती रहती हैं परन्तु वह परिवर्तन अपने ही अवान्तर भेद में होता है। पहली और दूसरी पृथ्वी के नारकियों के कापोत लेश्या होती है, तीसरी में ऊपर के बिलों में कापोत और नीचे के बिलों में नील लेश्या होती है। चौथी में नील लेश्या ही होती है। पाँचवीं में ऊपर के बिलों में नील और नीचे के बिलों में कृष्ण लेश्या होती है। छठी में कृष्ण लेश्या ही है और सातवीं में परम कृष्ण लेश्या है। इस तरह नीचे-नीचे अधिक-अधिक अशुभ लेश्या होती है। स्पर्श, गंध, वर्ण और शब्द को परिणमन कहते हैं। स्पर्श, रस, वर्ण, गन्ध, शब्द, संस्थान आदि अनेक प्रकार के पौद्गलिक परिणमन वहाँ के क्षेत्र की विशेषता के निमित्त से नीचे-नीचे अधिक-अधिक दु:ख के कारण होते गये हैं। पहली पृथ्वी में देह की ऊँचाई ७ धनुष, ३ हाथ और ६ अंगुल है। नीचे के नरकों में क्रम-क्रम से दूनी-दूनी ऊँचाई होती है। सातवें नरक में ऊँचाई ५०० धनुष होती है। पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी पृथ्वी में सिर्पâ उष्ण वेदना, पाँचवीं पृथ्वी के ऊपरी भाग में उष्ण और निचले भाग में शीत तथा छठी और सातवीं पृथ्वी में महाशीत की वेदना है। भूख-प्यास की वेदना अकथनीय है। वहाँ खाने को एक दाना भी नहीं है तथा पीने को एक बूँद पानी भी नहीं मिलता है, वहाँ उन्हें केवल वहाँ की महादुर्गन्धयुक्त मिट्टी ही खाकर रहना पड़ता है। भूमि के स्पर्श आदि की वेदना महादु:खदायी है। यह तो वहाँ क्षेत्रजनित वेदना है, वहाँ की पारस्परिक वेदना तथा असुर कुमारों द्वारा दी हुई वेदना अलग है।

नारकी जीवों की विक्रिया नीचे अधिक-अधिक खोटी है। वे चाहते तो हैं करना शुभ विक्रिया, किन्तु उनके अशुभ कर्मोदय के कारण वह उनके तथा दूसरे नारकियों के लिए दुख:दायी है। छठे नरक तक तो अनेक प्रकार की विक्रिया हैं, वहाँ के नारकी अपने ही शरीर को नाना हथियार, जानवर रूप से बना लेते हैं किन्तु सातवें नरक में केवल एक गाय जैसे जानवर के समान ही पुन: विक्रिया कर सकते हैं।

पुन: नारकियों के पारस्परिक दु:खों को बताते हुए सूत्र का अवतार होता है—

परस्परोदीरितदु:खा:।।४।।

अर्थ — वे नारकी जीव परस्पर में एक-दूसरे को दु:खों को उत्पन कराते हैं।

नारकी जीव न तो स्वयं शांति से बैठते हैं और न ही दूसरों को शांति से बैठने देते हैं। बन्धुओं! इस अध्याय को एकाग्रचित्त होकर आपको सुनना है कि वहाँ पर कैसा दु:ख है ? कैसे वे एक दूसरे को दु:खी करते रहते हैं ? कहते रहते हैं कि मैं अगर दु:खी हूँ तो कोई भी सुखी न रहने पाये।

आपस में वे कुअवधिज्ञान द्वारा एक दूसरे के वैर को याद करके कुत्तों के समान लड़ते हैं। वे बिल्ली-चूहा, सांप-नेवला की तरह एक दूसरे के जन्मजात शत्रु हैं। अपने शरीर से ही विक्रिया के द्वारा बनाए गए तलवार, वसूला, फरसा और बरछी आदि से तथा अपने हाथ-पाँव और दाँतों से छेदना, भेदना, छीलना और काटना आदि के द्वारा परस्पर अति तीव्र दु:ख को उत्पन्न करते हैं। एक-दूसरे के टुकड़े-टुकड़े कर डालने पर भी उनका अकालमरण नहीं होता है, वे पुन: पारे के समान जुड़ जाते हैं और लड़ते रहते हैं, दु:खी होते रहते हैं।

नरकों में असुरकृत दु:ख भी है, उसका वर्णन करते हुए कहते हैं—

संक्लिष्टाऽसुरोदीरितदु:खाश्चप्राक् चतुथ्र्या:।।५।।

अर्थ — वे नारकी चौथी पृथ्वी से पहले-पहले अर्थात् तीसरी पृथ्वी पर्यंत अत्यन्त संक्लिष्ट परिणामों के धारक अम्बावरीष जाति के असुर कुमार देवों के द्वारा उत्पन्न दु:ख से सहित होते हैं। उनके इसी प्रकार की कषाय का उदय रहता है।

इस सूत्र के द्वारा आचार्यश्री ने एक और विशेष बात बताई कि नारकी बेचारे स्वयं में दु:खी तो हैं ही पृथ्वी का असर ही ऐसा है लेकिन असुरकुमार जाति के देव उस तीसरी पृथ्वी तक जाकर—तीसरे नरक तक जाकर उन नारकियों को पूर्व भव की बातें याद दिला-दिला कर उन्हें संक्लिष्ट किया करते हैं, उन्हें और भी ज्यादा दु:खी किया करते हैं। देवता भी अगर चाहें तो उपकार के निमित्त से वहाँ पर सम्बोधन करने जा सकते हैं, जैसे—सीता का जीव रावण को संबोधित करने गया।

आज भी इस पृथ्वीतल पर कोई लड़ाई लगवाता है तो उससे कहते हैं तुम असुरकुमार जाति के देव हो। वह असुरकुमार जिनका कार्य ही होता है लड़ाने का, वह नरक में भी पहुँच जाते हैं और वहां नारकियों से कहते हैं— अरे! इसने तो तेरी आँख में सुरमा अथवा काजल नहीं लगाया था बल्कि इसने तो सलाई चुभा दी थी, ऐसा कहकर उन्हें वैर भाव याद दिलाते हैं जिससे कि उनका वैर और बढ़ता चला जाता है और वे दु:खी ही दु:खी होते चले जाते हैं।

नारकियों की उत्कृष्ट आयु बताई है—

तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वािंवशतित्रयिंस्त्रशत्सागरोपमा सत्त्वानां परा स्थिति:।।६।।

अर्थ — उन नरकों में नारकी जीवों की उत्कृष्ट स्थिति क्रम से एक सागर, तीन सागर, सात सागर, दश सागर, सत्रह सागर, बाईस सागर और तेतीस सागर है।

प्रश्न यह हुआ कि हे प्रभो! उन नरकों में कितने-कितने दिनों तक दु:खों को भोगना पड़ता है तो उस आयु के बारे में आचार्य श्री कहते हैं कि प्रथम नरक में नारकियों की उत्कृष्ट आयु एक सागर की है।

सागर बहुत बड़ा होता है अगर आप छोटी-सी परिभाषा के रूप में भी उसको समझ लें तो दो लाख योजन का लवण समुद्र है उस समुद्र के पास में यदि कोई व्यक्ति बैठ जाये और सुई की नोक के अग्रभाग से लवण समुद्र का जल निकालने में लग जाये तो कितने दिन में वह जल निकलेगा लवण समुद्र का जल ? वह यहाँ के समुद्र का जल नहीं यहाँ तो पम्प खोल देते हैं थोड़ी देर में जल निकल जाता है और वहाँ सुई की नोंक के अग्रभाग से दो लाख योजन (अस्सी करोड़ मील) विस्तार वाला लवण समुद्र का जल कोई निकालने लगे। जितने समय में वह जल निकलेगा उतने समय का एक सागर है और उस सागर की उत्कृष्ट आयु को पहले नरक में भोगना पड़ता है। किसी ने वहाँ जाते समय उत्कृष्ट आयु का बंध कर लिया तो वहाँ से वह जीव नाना प्रयत्न करके भी किसी तरह से अकालमरण नहीं कर सकता, पूरी आयु उसको भोगनी ही पड़ेगी। दूसरे नरक में ३ सागर की आयु, तीसरे में ७ सागर, चौथे में १० सागर, पाँचवें में १७ सागर, छठे में २२ सागर और सातवें नरक की उत्कृष्ट आयु ३३ सागर है। नारकी ज्यादा से ज्यादा इतनी उत्कृष्ट आयु भोग सकता है।

चूँकि नरक गति का प्रकरण चल रहा है अत: यहाँ यह बात आपको विशेष रूप से जानना है कि कौन-कौन से जीव मरकर किन-किन नरकों में जा सकते हैं और किन नरकों से निकलकर किस-किस गति को प्राप्त कर सकते हैं ?

असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीव पहले नरक तक जा सकता है। दूसरे में सरीसृप (एक विशेष जाति का सर्प), पक्षी तीसरे नरक तक, सर्प चौथे नरक तक, िंसह पाँचवें नरक तक, स्त्री छठे नरक तक, मनुष्यों में पुरुष, स्वयंभूरमण द्वीप में रहने वाला महामत्स्य तथा उसके कान में रहने वाला तंदुल मत्स्य सातवें नरक तक जा सकते हैं परन्तु वर्तमान में चूँकि उत्तम संहनन का अभाव है अत: सातवें नरक में कोई भी जीव नहीं जा सकते हैं। नारकी मरकर न तो पुन: नारकी होता है और न ही देवगति में जाता है, वह मरकर नियम से कर्मभूमि का पंचेन्द्रिय तिर्यंच और मनुष्य ही होता है, उसमें भी पहले के तीन नरकों से आकर तीर्थंकर भी हो सकते हैं। चौथे नरक से निकले जीव मनुष्य होकर निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं। पाँचवें नरक से निकलकर मनुष्य हुए तो मुनि तक हो सकते हैं। छठे नरक से निकलकर मनुष्य हों या पशु, देशव्रती तक हो सकते हैं और सातवें नरक से निकले हुए जीव नियम से क्रूर पंचेन्द्रिय तिर्यंच होते हैं और वह पुन: नरक अवश्य जाते हैं। विशेषतय: किसी भी नरक से आए हुए जीव चक्रवर्ती, बलभद्र, नारायण अथवा प्रतिनारायण नहीं हो सकते, ऐसा नियम है।

मध्यलोक का वर्णन

अब मध्यलोक का वर्णन किया गया है। मध्यलोक की उस रचना के साक्षात् दर्शन आपको हस्तिनापुर में सुलभ हैं जिसे जम्बूद्वीप कहा जाता है उसके दर्शन कर आप उसे और अच्छी तरह से समझ सकते हैं। सर्वप्रथम कुछ द्वीप और समुद्रों के नाम बताते हैं—

जम्बूद्वीपलवणोदादय: शुभनामानोद्वीपसमुद्रा:।।७।।

अर्थ — इस मध्यलोक में अच्छे-अच्छे नाम वाले जम्बूद्वीप आदि द्वीप और लवण समुद्र आदि समुद्र हैं।

इस मध्यलोक में जम्बूद्वीप आदिक नाम वाले अच्छे-अच्छे द्वीप हैं और लवण आदि नाम वाले अनेक समुद्र हैं। पहला द्वीप चूँकि जम्बूद्वीप है और पहला समुद्र लवण समुद्र है इसलिये उसका नाम लिया है कि ऐसे नाम वाले असंख्यात द्वीप और असंख्यात समुद्र मध्यलोक के अन्दर हैं।

चित्रा पृथ्वी पर बीचोंबीच में थाली के आकार का एक लाख योजन व्यास वाला पहला द्वीप जम्बूद्वीप है। उसके चारों ओर पहला समुद्र लवण समुद्र है। उसके चारों ओर धातकीखण्ड द्वीप है। उसके चारों ओर कालोदधि समुद्र है। उसके चारों ओर पुष्करवर द्वीप, उसके चारों ओर पुष्करवर समुद्र है। पुष्करवर द्वीप के आधे के परे मानुषोत्तर पर्वत है। मानुषोत्तर पर्वत के पहले-पहले ढाई द्वीप कहलाता है जिसका विस्तार ४५ लाख योजन है। मनुष्य के आने-जाने की सीमा यहीं तक है, इसके आगे नहीं है। पुष्करवर समुद्र को घेरे हुए वारुणीवर द्वीप तथा वारुणीवर समुद्र है। फिर क्षीरवर द्वीप-क्षीरवर समुद्र है, इसी समुद्र के जल से देवगण भगवान का अभिषेक करते हैं और इसी में भगवान के केश विसर्जित करते हैं। छठा द्वीप घृतवर तथा छठा समुद्र घृतवर है, सातवां इक्षुवर द्वीप, इक्षुवर समुद्र, आठवाँ नन्दीश्वर द्वीप है, यहीं पर चारों दिशाओं में कुल ५२ अकृत्रिम चैत्यालय हैं, प्रत्येक आष्टान्हिक पर्व में देवगण जहाँ पूजा करते हैं। आगे नन्दीश्वर समुद्र, नवमां अरुणवर द्वीप, अरुणवर समुद्र, दसवाँ अरुणाभासवर द्वीप तथा अरुणाभासवर समुद्र है। ग्यारहवाँ कुण्डलवर द्वीप, कुण्डलवर समुद्र है। बारहवाँ शंखवर द्वीप तथा शंखवर समुद्र है। तेरहवाँ रुचकवर द्वीप है जिसके बीच में रुचक पर्वत है। इस पर्वत की निवासिनी ४८ देवियाँ तीर्थंकर माता की सेवा के लिए आती हैं। इस प्रकार एक-दूसरे को घेरे हुए असंख्यात द्वीप-समुद्र हैं। सबसे अन्त में स्वयंभूरमण द्वीप और स्वयंभूरमण समुद्र है। मनुष्य क्षेत्र के बाहर सभी द्वीपों में जघन्य भोगभूमि की रचना है परन्तु स्वयंभूरमण द्वीप के उत्तरार्ध में, स्वयंभूरमण समुद्र की और चारों कोनों की रचना कर्मभूमि जैसी है क्योंकि विकलत्रय जीव कर्मभूमि में ही हैं, भोगभूमि में नहीं हैं।

द्वीप और समुद्रों के विस्तार तथा आकार के बारे में बताते हैं—

द्विद्र्विर्विष्कम्भा: पूर्व-पूर्वपरिक्षेपिणोवलयाकृतय:।।८।।

अर्थ — प्रत्येक द्वीप दूने-दूने विस्तार वाले, पहले-पहले के द्वीप समुद्र को घेरे हुए तथा चूड़ी के आकार वाले हैं। इन द्वीप और समुद्रों का आकार बताया है। गोलाकार, वलयाकार मतलब चूड़ी, थाली के समान गोल ये द्वीप-समुद्र एक-दूसरे को घेरे हुए हैं अर्थात् सबसे पहले द्वीप फिर उसको घेरकर समुद्र फिर उसको घेरकर द्वीप, फिर उसको घेरकर समुद्र ऐसे द्वीप-समुद्र असंख्यात समुद्र तक चले जाते हैं। पहले द्वीप का जितना विस्तार है उससे दूना विस्तार दूसरे द्वीप का है और उससे दूना विस्तार दूसरे समुद्र का है। इसी प्रकार आगे-आगे दूने-दूने होते चले गये हैं।

सर्वप्रथम जम्बूद्वीप का विस्तार तथा आकार बताते हैं—

तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तोयोजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीप:।।९।।

अर्थ — उन सब द्वीप—समुद्रों के बीच में सुदर्शन मेरू रूप नाभि से युक्त थाली के समान गोल और एक लाख योजन विस्तार वाला जम्बूद्वीप है।

उन सभी द्वीप—समुद्रों के बीच में जो पहला द्वीप जम्बूद्वीप है उस जम्बूद्वीप के मध्य भाग में जैसे शरीर के बीचों-बीच में नाभि है ऐसे ही ‘‘मेरोर्नाभिर्वृत्तो’’ बिल्कुल बीच में सुमेरु पर्वत है जिसकी ऊँचाई ‘‘योजन शतसहस्राणि’’ अर्थात् एक लाख योजन है और उसमें जो सुमेरु पर्वत है वह भी एक लाख योजन है अर्थात् जब उसका विस्तार मील में निकाला तो ४० करोड़ मील विस्तार वाला जम्बूद्वीप है और उसके बीच में जो सुमेरु पर्वत है वह भी इतनी ऊँचाई वाला है। हस्तिनापुर में केवल उस सुमेरु पर्वत को १०१ पुâट ऊँचा बनाया गया है।

उस जम्बूद्वीप में सात क्षेत्र हैं, जिसका वर्णन इस प्रकार है—

भरत-हैमवत-हरि-विदेह-रम्यक-हैरण्यवतैरावतवर्षा:-क्षेत्राणि।।१०।।

अर्थ — इस जम्बूद्वीप में भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत ये क्षेत्र सात हैं।

उनके नाम हैं—भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत। ये सात क्षेत्र क्रम से हैं, बीचोंबीच में सुमेरु पर्वत है। अभी जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर के सुमेरु पर्वत को आप आधार मान करके चलें। सुमेरु पर्वत में सारी रचना दक्षिण से शुरु होती है, दक्षिण में सबसे पहला भरतक्षेत्र, फिर हैमवत, फिर हरि क्षेत्र इस प्रकार तीन क्षेत्र तो सुमेरु पर्वत के दक्षिण में आ जाते हैं। सुमेरु पर्वत के पूरब और पश्चिम में विदेह क्षेत्र है उसके बाद उत्तर में तीन क्षेत्र आ जाते हैं—रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत, इस प्रकार ये सात क्षेत्र हुए।

अब मैं अकृत्रिम सुमेरु के बारे में आपको बताती हूँ—भरतक्षेत्र के उत्तर में हिमवान् पर्वत है। पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिण में लवण समुद्र है। भरतक्षेत्र के बीच में विजयार्ध पर्वत है वह पूर्व-पश्चिम लम्बा, २५ योजन ऊँचा तथा ५० योजन चौड़ा है। भूमि से १० योजन ऊपर जाने पर उस विजयार्ध पर्वत के दक्षिण तथा उत्तर में दो श्रेणियाँ हैं जिसमें विद्याधरों के नगर बसे हुए हैं। आगे १० योजन और जाने पर पर्वत के ऊपर दोनों ओर पुन: दो श्रेणियाँ हैं जिनमें व्यंतरदेव रहते हैं। वहाँ से ५ योजन ऊपर जाने पर विजयार्ध पर्वत का शिखरतल है जिस पर अनेक कूट बने हुए हैं। इस पर्वत में दो गुफाएँ हैं, हिमवान पर्वत से गिरकर गंगा-सिन्धु नदियाँ इन्हीं गुफाओं के नीचे से निकलकर दक्षिण भरत में आती हैं। विजयार्ध पर्वत तथा इन दोनों नदियों के कारण ही भरतक्षेत्र के छह खण्ड हो गये हैं जिसमें तीन खण्ड विजयार्ध के उत्तर में और तीन दक्षिण में हैं। दक्षिण के तीन खण्डों के बीच का खण्ड आर्यखण्ड कहलाता है, शेष ५ म्लेच्छ खण्ड हैं। इन्हीं गुफाओं के द्वारा ही चक्रवर्ती उत्तर के तीन खण्डों को जीतने जाते हैं और वहीं से वापस आते हैं, इसी से इस पर्वत का नाम विजयार्ध सार्थक हैं क्योंकि यहाँ पहुँचने पर चक्रवर्ती की आधी विजय हो जाती है। उत्तर के तीन खण्डों के बीच के खण्ड में वृषभाचल पर्वत है, उस पर चक्रवर्ती पूर्ण दिग्विजय कर अपनी प्रशस्ति लिखते हैं। भरतक्षेत्र की भांति ही ऐरावत क्षेत्र की व्यवस्था हैं वहाँ विजयार्ध पर्वत और रक्ता-रक्तोदा नदी के कारण उसके भी सात खण्ड हो गये हैं।

सभी क्षेत्रों के बीच में विदेह क्षेत्र है, जहाँ मनुष्य आत्मध्यान करके कर्मों को नष्ट कर सदैव देह के बन्धन से छूटकर देवालय—सिद्धालय में विराजमान हो जाते हैं इसीलिए इसका ‘विदेह’ यह सार्थक नाम है। यह निषध और नील के बीच में स्थित है, इसी विदेह क्षेत्र के बीचोंबीच में सुमेरु पर्वत है। सुमेरु के पूर्व दिशा भाग को पूर्व विदेह और पश्चिम दिशा भाग को पश्चिम विदेह कहते हैं। नील पर्वत से निकलकर सीता नदी पूर्व विदेह के मध्य तथा निषध पर्वत से निकलकर सीतोदा नदी पश्चिम विदेह के मध्य बहती है। इन्हीं नदियों के कारण पूर्व विदेह के २ एवं पश्चिम विदेह के २ ऐसे ४ भाग हो गये हैं और ८-८ उपविभाग हो गये हैं। प्रत्येक उपविभाग एक-एक स्वतन्त्र देश की तरह हैं अत: विदेह क्षेत्र के ३२ भाग हो गए, विदेह क्षेत्र के २० विहरमाण तीर्थंकरों में से जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में सीमन्धर और युगमन्धर ऐसे दो तीर्थंकर और पश्चिम विदेह में बाहु-सुबाहु नाम के दो तीर्थंकर आज विद्यमान हैं।

जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में सम्पूर्ण विश्व है, जिसमें अयोध्या नगरी बिल्कुल मध्य में है। हैमवत, हरि, रम्यक और हैरण्यवत क्षेत्र मेेंं भोगभूमि हैं जिसमें हैमवत और हैरण्यवत में जघन्य भोगभूमि, हरि और रम्यक में मध्यम तथा विदेह के देवकुरु और उत्तरकुरु में उत्तम भोगभूमि है।

तिलोयपण्णत्ति ग्रन्थ में वर्णन आया है कि भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में पृथ्वी ५ हजार मील ऊँची उठी हुई है, उसका क्षेत्र आधी गेंद के समान है जो छठे काल के अन्त में बिखर जाता है, आज के वैज्ञानिक पृथ्वी को गेंद के समान गोल कहते हैं किन्तु जैन सिद्धान्त के अनुसार यह सही नहीं है।

अब षट् कुलाचलों के बारे में बताते हैं—

तद्विभाजिन: पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनील-रुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वता:।।११।।

अर्थ — उन सात क्षेत्रों को विभक्त करने वाले छह वर्षधर अर्थात् कुलाचल पर्वत हैं—हिमवान्, महाहिमवान्, निषध, नील, रुक्मी और शिखरी ये उनके नाम हैं।

क्षेत्रों के विभाग को बनाये रखने के कारण इनको वर्षधर कहा है। भरत और हैमवत क्षेत्र के बीच में हिमवान् पर्वत है जो १०० योजन ऊँचा है, हैमवत-हरि के बीच में महाहिमवान् है जो २०० योजन ऊँचा है। हरि और विदेह के मध्य निषध पर्वत ४०० योजन ऊँचा है। पुन: विदेह और रम्यक् क्षेत्र के बीच में नील पर्वत ४०० योजन ऊँचा है। रम्यक् और हैरण्यवत के मध्य रुक्मी पर्वत २०० योजन ऊँचा है तथा हैरण्यवत और ऐरावत क्षेत्र के बीच में शिखरी पर्वत १०० योजन ऊँचा है। ये सभी पर्वत पूर्व समुद्र से लेकर पश्चिम समुद्र तक लम्बे हैं, जिसे हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप के अन्दर दर्शाया गया है।

कुलाचलों के वर्ण बताते हैं—

हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममया:।।१२।।

अर्थ — उन पर्वतों के रंग क्रम से सोने के समान, चाँदी के समान, तपाये हुए स्वर्ण के समान, वैडूर्यमणि अर्थात् नीलमणि के समान और उसके बाद चाँदी और स्वर्ण के समान वर्ण वाले हैं।

उन पर्वतों की क्या विशेषता है सो ही बताते हैं—

मणि-विचित्र-पाश्र्वा उपरि मूले च तुल्य विस्तारा:।।१३।।<

अर्थ — वह पर्वत अगल-बगल से अर्थात् दोनों ओर से अनेक प्रकार की विचित्र और सुन्दर-सुन्दर मणियों से बने हुए ऊपर, नीचे और मध्य में एक समान विस्तार वाले हैं।

उन कुलाचलों पर स्थित सरोवरों के नाम क्या हैं—

पद्ममहापद्मतिगिञ्छकेसरिमहापुण्डरीकपुण्डरीका हृदास्तेषामुपरि।।१४।।

अर्थ — उन पर्वतों पर क्रम से पद्म, महापद्म, तिगिञ्छ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक नाम के हृद—सरोवर हैं। हिमवान पर्वत पर पद्म सरोवर, महाहिमवान पर्वत पर महापद्म, निषध पर तिगिञ्छ, नील पर केसरी, रुक्मि पर्वत पर महापुण्डरीक सरोवर तथा शिखरी पर्वत पर पुण्डरीक सरोवर है।

प्रथम सरोवर की लम्बाई-चौड़ाई बताई है—

प्रथमो योजन-सहस्रायामस्तदद्र्धविष्कम्भो हृद:।।१५।।

अर्थ — पहला सरोवर एक हजार योजन लम्बा और ५०० योजन चौड़ा है। हिमवान पर्वत पर जो पद्म नाम का सरोवर है उसकी लम्बाई और चौड़ाई इसमें बताई है।

इसकी गहराई कितनी है, इस प्रश्न के उत्तर में बताया है—

दशयोजनावगाह:।।१६।।

अर्थ — इस पद्म सरोवर की गहराई दस योजन है।

उसके मध्य में क्या है ? सो ही बताते हैं—

तन्मध्ये योजनं पुष्करम्।।१७।।

अर्थ — उसके बीच में एक योजन विस्तार वाला कमल है।

तालाब की शोभा कमल से होती है, बिना कमल के तालाब की शोभा नहीं होती। उन अकृत्रिम रचनाओं के अन्दर जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमाओं के साथ-साथ प्राकृतिक सौन्दर्य भरपूर है। कोई चीज ऐसी नहीं है कि जो उन अकृत्रिम रचनाओं में नहीं हो। उस सरोवर में किसी इन्द्र ने आकर उस कमल की रचना नहीं की वह तो अकृत्रिम है, अनादिनिधन है न तो उसको किसी ने बनाया है और न ही उसको कोई नष्ट कर सकता है। वह कमल वनस्पतिकायिक नहीं हैं पृथ्वीकायिक हैं, पद्म सरोवर के बीच में जो कमल है वह एक योजन लम्बा-चौड़ा है। इसमें कमल के एक हजार पत्ते हैं।

महापद्म आदि सरोवर तथा उसमें स्थित कमलों का प्रमाण बताया है—

तद्द्विगुणद्विगुणा हृदा: पुष्कराणि च।।१८।।

अर्थ — आगे के सरोवर और कमल क्रम से प्रथम सरोवर तथा उसके कमल से दूने-दूने विस्तार वाले हैं।

अर्थात् आगे-आगे जो पर्वत हैं, उन पर्वतों पर बने सरोवर में जो कमल हैं वह सबके द्विगुण-द्विगुण अर्थात् पहले तालाब से आगे के तालाब के कमल दूने विस्तार वाले हैं। तालाबों की लम्बाई-चौड़ाई भी दूने-दूने विस्तार वाली है ऐसा जानना। सुमेरु पर्वत से आगे-आगे जितनी लम्बाई-चौड़ाई आदि का विस्तार बढ़ गया है वहीं तक बढ़ेगा उसके बाद उत्तर में ठीक वैसे ही दक्षिण के समान रचना हो जायेगी अर्थात् यह दूने-दूने का क्रम तिगिञ्छ नामक तीसरे सरोवर तक ही है। उसके आगे तीन सरोवर और कमल दक्षिण सरोवर के कमलों के समान विस्तार वाले हैं।

उन कमलों में रहने वाली देवियों के बारे में बताया है—

तन्निवासिन्यो देव्य: श्रीह्रीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्य: पल्योपम स्थितय: ससामानिक परिषत्का:।।१९।।

अर्थ — एक पल्य की आयु वाली तथा सामानिक और पारिषद जाति के देवों से सहित श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नाम की देवियाँ क्रम से उन सरोवरों के कमलों पर निवास करती हैं।

उन कमलों की कर्णिका के मध्य भाग में एक कोस लम्बे, आधा कोस चौड़े और कुछ कम एक कोस ऊँचे सपेâद रंग के महल हैं। उन भवनों के अन्दर यह व्यंतर जाति की देवियाँ निवास करती हैं। उनके नाम हैं—श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी। इन देवियों की आयु एक पल्य की है और वे सामानिक और पारिषद जाति के देवों के साथ उन कमलों के ऊपर निवास करती हैं। इन्हीं सरोवरों में जो अन्य छोटे परिवार कमल हैं, उन पर सामानिक और पारिषद देव रहते हैं। यह वही देवियाँ हैं जिन्हें सौधर्म इन्द्र भगवान के पंचकल्याणक में गर्भकल्याणक से लेकर जन्मकल्याणक तक दिक्कुमारियों के रूप में माता की सेवा करने के लिये लाते हैं।

चौदह महानदियों के नाम बताते हैं—

गंगासिन्धुरोहिद्रोरोहितास्याहरिद्धहरिकान्तासीतासीतोदानारी-नरकान्तासुवर्णरुप्यवूâलारक्तारक्तोदा: सरितस्तन्मध्यगा:।।२०।।

अर्थ — गंगा, सिन्धु, रोहित, रोहितास्या, हरित, हरिकान्ता, सीता-सीतोदा, नारी-नरकांता, सुवर्णवूâला-रुप्यवूâला, और रक्ता-रक्तोदा ये चौदह नदियाँ जम्बूद्वीप के पूर्वोक्त ७ क्षेत्रों के बीच में बहती हैं।

जब हम कहीं पिकनिक स्पॉट पर जाते हैं, वहां हरियाली, फल-पूâल, अच्छे-अच्छे लॉन दिख जाते हैं, तो हम खुश हो जाते हैं लेकिन उसके साथ एक बार दृष्टि दौड़ जाती है कि कहीं स्विमिंग पुल बना है क्या ? कहीं कोई झरना बना है क्या ? वह आँखें उस सुन्दरता को और भी अच्छी तरह से देखना चाहती हैं उसी प्रकार इन अकृत्रिम चैत्यालयों को भी इनसे अछूता नहीं रखा गया। पर्वतों से भी नदियाँ निकलती हैं, जम्बूद्वीप के अन्दर चौदह नदियाँ बहती हैं जिनके नाम बताये हैं—गंगा-सिन्धु, रोहित-रोहितास्या, हरित-हरिकान्ता, सीता-सीतोदा, नारी-नरकान्ता, सुवर्णवूâला-रूप्यकूला, रक्ता-रक्तोदा। आप हस्तिनापुर के जम्बूद्वीप में भी देखेंगे कि बराबर इन नदियों के नाम लिखे हुए हैं। जब भरतक्षेत्र के पास आते हैं जहाँ से नाव में बैठना शुरू करते हैं उस जगह से खड़े होकर आप देखें तो अन्दर की ओर सुन्दर सा नक्शा रखा हुआ है जो विश्व का नक्शा है, आर्यखण्ड की सृष्टि को दर्शाता है। वहाँ से हिमवन पर्वत दिखता है जहाँ से दो नदियाँ निकलती हैं वहाँ लिखा हुआ है गंगा नदी-सिन्धु नदी। हिमवन पर्वत से जाने वाली नदी जो पूर्व की ओर जा रही है वह गंगा नदी है, पश्चिम लवण समुद्र की ओर निकलने वाली सिन्धु नदी है और उसी सरोवर के पीछे की ओर जो नदी निकलती है वह रोहित नदी है, इस प्रकार इस पर्वत से ये तीन नदियाँ निकलती हैं।

इसी प्रकार पुण्डरीक नामक सरोवर से रक्ता-रक्तोदा और सुवर्णवूâला ये तीन नदियाँ निकलती हैं तथा शेष सरोवरों से क्रमश: दो-दो नदियाँ निकलती हैं।

इनमें से जो नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं, उनके बारे में बताते हैं—

द्वयो द्र्वयो: पूर्वा: पूर्वगा:।।२१।।

अर्थ — गंगा-सिन्धु इत्यादि दो-दो नदियों में से पहली-पहली नदी पूर्व समुद्र की ओर जाती है अर्थात् गंगा, रोहित, हरित, सीता, नारी, सुवर्णवूâला और रक्ता ये सात नदियाँ पूर्व समुद्र में जाकर मिलती हैं।

इन दो-दो नदियों का जोड़ा है गंगा-सिन्धु का जोड़ा है, रोहित-रोहितास्या का जोड़ा है इत्यादि, इन युगल में से पूर्वा पूर्वगा:—जो पहले-पहले की नदी है जैसे—गंगा नदी है, रोहित नदी है वह पूर्व की ओर बहती है और जो लवण समुद्र में पूर्व की ओर से जाकर मिलती है।

पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों के बारे में बताते हैं—

शेषास्त्वपरगा:।।२२।।

अर्थ — बाकी बची हुई सात नदियाँ पश्चिम की ओर जाती हैं। जैसे—गंगा-सिन्धु में सिन्धु आदि। इस सूत्र में कहा है कि जो दूसरी-दूसरी नदियाँ हैं—सिन्धु, रोहितास्या, हरिकान्ता, सीतोदा, नरकान्ता, रूप्यवूâला और रक्तोदा नदी, ये पश्चिम समुद्र की ओर आती हैं। मिलती तो सारी लवण समुद्र में ही हैं लेकिन इनके बहने का केवल क्रम बताया है कि एक पूरब की ओर जाती है तो एक पश्चिम की ओर जाती है।

इन महानदियों की सहायक नदियाँ कितनी हैं, सो ही बताते हैं—

चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृतागंगासिन्ध्वादयो नद्य:।।२३।।

अर्थ — गंगा, सिन्धु आदि नदियों के युगल चौदह हजार सहायक नदियों से घिरे हुए हैं।

चौदह महानदियाँ हैं और इन दो-दो युगल अर्थात् गंगा-सिन्धु आदि चौदह नदियों की चौदह-चौदह हजार परिवार नदियाँ हैं जो छोटी-छोटी नदियों के रूप में बहती हैं। इन सहायक नदियों की संख्या का क्रम भी विदेह क्षेत्र तक आगे-आगे के युगलों में पहले युगलों से दूना-दूना है और उत्तर के तीन क्षेत्रों में दक्षिण के तीन क्षेत्रों के समान है। जैसे—गंगा-सिन्धु की १४ हजार, रोहित-रोहितास्या की २८ हजार, हरित-हरिकान्ता की ५६ हजार, सीता-सीतोदा की १ लाख १२ हजार, नारी-नरकांता की ५६ हजार, सुवर्णकूला-रुप्यकूला की २८ हजार तथा रक्ता-रक्तोदा की १४ हजार।

अब भरतक्षेत्र का विस्तार बताते हैं—

भरत: षड्विंशतिपंचयोजनशतविस्तार:षट्चैकोनविंशति-भागा: योजनस्य।।२४।।

अर्थ — भरतक्षेत्र ५२६ योजन विस्तार वाला और एक योजन के उन्नीसवें भागों में से छह भाग अधिक है।

इतनी सारी रचना के बीच में अपना भरत क्षेत्र कहाँ हैं ? हम लोग कहाँ रहते हैं ? इस बात को बताने के लिये यह सूत्र मुख्य रूप से कहा है कि जम्बूद्वीप के बीचों-बीच में जो सुमेरु पर्वत है उसके ठीक दक्षिण में भरतक्षेत्र है अर्थात् यह भरतक्षेत्र ५२६—६/१९ योजन विस्तार वाला है और सुमेरु पर्वत के दक्षिण में स्थित है। पूरे जम्बूद्वीप के बहुत छोटे से हिस्से में भरतक्षेत्र है जिसके अन्दर छह खण्ड हैं—पाँच म्लेच्छखण्ड तथा एक आर्यखण्ड। उसी आर्यखण्ड में आज का सारा उपलब्ध विश्व है। हम सभी से यदि पूछा जाये कि हम कहाँ रहते हैं ? तो हम भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में रहते हैं, यह आपको बताना पड़ेगा। जो छह महाद्वीप हैं सबके सब जैन आगम के अनुसार इसी आर्यखण्ड के अन्दर हैं।

तद्द्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ता:।।२५।।

अर्थ — विदेह क्षेत्र पर्यन्त यह सारे पर्वत और क्षेत्र भरत क्षेत्र से दूने-दूने विस्तार वाले हैं।

जैसे भरतक्षेत्र का जो विस्तार बताया है, हैमवत क्षेत्र उससे दूने विस्तार वाला है, हैमवत के बाद हरि क्षेत्र उससे दूने विस्तार वाला है और ‘‘तद्द्विगुण द्विगुण विस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ता:’’ अर्थात् विदेह क्षेत्र तक यह दूने विस्तार वाले हैं।

विदेह क्षेत्र के आगे के पर्वत और क्षेत्रों का विस्तार कितना-कितना है, यह बताने के लिये आगे का सूत्र कहा है—

उत्तरा दक्षिण तुल्या:।।२६।।

अर्थ — विदेह क्षेत्र के उत्तर के तीन पर्वत व तीन क्षेत्र दक्षिण के पर्वत और क्षेत्रों के समान विस्तार वाले हैं। इधर के समान ही जितना भरत क्षेत्र का विस्तार है उतना ऐरावत क्षेत्र का विस्तार है, ऐसे दक्षिण के समान उत्तर की रचना हो जाती है।

भरत और ऐरावत क्षेत्र में कालचक्र के परिवर्तन के बारे में बताते हुए आचार्यश्री सूत्र कहते हैं—

भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यव-सर्पिणीभ्याम्।।२७।।

अर्थ — छह कालों से युक्त उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के द्वारा भरत और ऐरावत क्षेत्र में जीवों के अनुभव आदि की वृद्धि और न्यूनता होती रहती है।

भरत और ऐरावत यह जो दो क्षेत्र हैं उनमें वृद्धि और ह्रास चला करता है। ‘षट्समयाभ्याम्’’ अर्थात् षट्काल परिवर्तन, वह कैसे? उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के विभाजन से उसमें षट्काल का परिवर्तन चलता है। आज उसी काल परिवर्तन के अनुसार आपके इस भरतक्षेत्र में पंचमकाल चल रहा है। इस काल का नाम क्या है ? ‘‘दु:षमाकाल’’। एक अवसर्पिणी काल होता है तथा एक उत्सर्पिणी काल होता है। उत्सर्पिणी काल में मनुष्य की आयु, शरीर और सभी चीजें वृद्धि को प्राप्त होती चली जाती हैं और जिसमें यह सब चीजें ह्रास को प्राप्त होती चली जाती है वह अपसर्पिणी काल है। अवर्सिपणी काल में भी असंख्यात अवसर्पिणी के बीत जाने पर एक हुण्डावसर्पिणी काल आता है जो अत्यन्त खराब माना जाता है। उसी हुण्डावसर्पिणी काल का यह पंचमकाल अभी प्रवर्तन कर रहा है। इस बात को हमें विशेष रूप से जानना पड़ेगा कि यह काल २१ हजार वर्ष का है और अभी इसमें केवल ढ़ाई हजार साल बीते हैं। भगवान महावीर को मोक्ष गए हुए लगभग २५३९ वर्ष हुए बाकी लगभग साढ़े अठारह हजार साल इस पंचम काल में अभी शेष रहे हैं तब तक बराबर धर्म चलता रहेगा। कई बार लोग हस्तिनापुर में आकर जम्बूद्वीप की रचना देखकर माताजी से पूछते हैं कि माताजी! यह जम्बूद्वीप कहाँ की रचना है ? यह स्वर्ग में बनी है क्या ? विदेह क्षेत्र में बनी है क्या ? उनके प्रश्नों को सुनकर मुझे हंसी आ जाती है लेकिन माताजी कहती हैं कि स्वाध्याय के अभाव में ऐसा प्रश्न निकलता है। जम्बूद्वीप का वर्णन तो बहुत दिनों से सुनते थे चाहे वह जैन ग्रन्थ हों या वैदिक परम्परा के ग्रन्थ, आज भी अगर छोटा-सा भी काम हुआ तो भी मंत्र पढ़ा जाता है ‘‘अथाद्ये जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे भारतदेशे अमुक प्रदेशे अमुकस्य ग्रामे एतत कार्यम् करोम्यहम्’’, लेकिन दृष्टि नहीं जाती है कि क्या है जम्बूद्वीप ? उसमें कहाँ है भरतक्षेत्र ? कहाँ है आर्यखण्ड ? अगर हम स्वाध्याय करने लग जाएं और इस तीसरी अध्याय को पूरी तरह से वंठस्थ कर लें और पूरी तरह से आँखों के सामने प्रत्यक्ष रूप से उसका ध्यान कर लें तो हमारा प्रश्न बदल जायेगा फिर हम पूछेंगे माताजी! जम्बूद्वीप में हमारा प्रदेश कहाँ हैं और प्रदेश के अन्दर शहर कहाँ है ? जम्बूद्वीप तो विशाल सृष्टि का नाम है। श्रीमती इन्दिरा गाँधी जी से सन् १९८२ में ‘जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति’ का प्रवर्तन कराना था। पूज्य माताजी की इच्छा थी कि देश के प्रधानमन्त्री द्वारा इसका उद्घाटन कराया जाये, हम लोग डेपुटेशन लेकर इंदिरा गाँधी के पास गये कि आपको ‘‘जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति’’ नाम के एक रथ का उद्घाटन करना है। उन्होंने जम्बूद्वीप का स्वरूप समझा कि यह क्या है ? हमने कहा कि जम्बूद्वीप बहुत बड़े भूमण्डल का नाम है। वह सोचने लगीं कि कहीं ऐसा न हो कि जैनी लोग भूमण्डल पर अधिकार जमाने के लिये ऐसा कह रहे हों, वे बोलीं कि हमें सोचने दीजिये। उसके बाद दूसरी बार हम लोग उनसे मिलने के लिये गये और इटली से प्रकाशित एक पुस्तक उनको दिखाई जो अभी भी हस्तिनापुर की लाइब्रेरी में है ‘‘जैन कॉस्मोलॉजी’’, इसके लेखक रवि जैन हैं। उन्होंने बहुत ही पौराणिक ग्रन्थों का आधार लेकर उसमें बहुत सारे चित्र दिये हैं और रंगीन चित्रों के माध्यम से जम्बूद्वीप के एक-एक पार्ट की बात बताई है। उस पुस्तक को देख इन्दिरा जी खुश होकर कहने लगीं—अरे! मैं स्वयं ब्राह्मण कुल में पैदा हुई हूँ और मैंने तो जन्म से ही इस मन्त्र को सुना है। क्या यह वही जम्बूद्वीप है ? हमने कहा—हाँ, यह वही जम्बूद्वीप है। फिर उन्होंने कुछ भी नहीं सोचा और बोलीं मैं ४ जून को आऊँगी, लाल किला मैदान से इसका उद्घाटन होगा, पुन: ४ जून को चिलचिलाती धूप के अन्दर इन्दिरा जी आर्इं और उस ज्ञानज्योति का उद्घाटन करते हुए उन्होंने बहुत ही अच्छे उद्गार व्यक्त किये कि मेरी मंगल कामना है कि जहाँ-जहाँ यह ज्योति जाएगी, जम्बूद्वीप के बारे में सबको ज्ञान का प्रकाश प्रदान करेगी।

बन्धुओं! मुख्य बात यह है कि जब तक हम किसी बात से अनभिज्ञ रहते हैं, तब तक ऐसी ही विचारधाराएँ बनी रहती हैं। मैं स्वयं बताती हूँ कि आज से ३०-३५ साल पहले जब चर्चायें चलती थीं, माताजी मोतीचंद जी और रवीन्द्र जी को जम्बूद्वीप की बात बताती थीं कि ऐसे नक्शा बनाना है, ऐसे यहाँ पर यह नदी देनी है, यह पर्वत देना है, यह चैत्यालय देना है, मैं सोचती थी कि पता नहीं यह क्या है ? बैठने का मन भी नहीं करता था, कोई रुचि भी नहीं लेती थी लेकिन जब धीरे-धीरे वह धरती पर उतरने लगा और उसके बारे में ज्ञान हो गया तो असीम आनन्द की अनुभूति हुई। अब जब मैं आपको इस अध्याय का पारायण करके सुना रही हूँ तो पारायण यहाँ हो रहा है लेकिन मेरी अन्तर्दृष्टि सारी की सारी वहाँ पहुँच जाती है इसलिये कि हमने उसको हृदयंगम किया है कि कहाँ है हिमवान पर्वत, कहाँ है भरत क्षेत्र, कहाँ है ऐरावत क्षेत्र, सारी की सारी चीज यहाँ बैठे हुए भी मन के अन्दर दिख जाती है। मैं चाहती हूँ कि आप लोग इस अध्याय का अध्ययन करने के बाद जम्बूद्वीप में जाएँ, एक-एक पार्ट को सूक्ष्मता से देखें ताकि आप अपने बच्चों को बता सवेंâ कि हमने जम्बूद्वीप में क्या-क्या देखा, यह अध्याय केवल शास्त्रों में सीमित नहीं है बल्कि वह धरती पर साकार हो गयी है और उसका ज्ञान हम लोगों को प्राप्त हो गया है।

एक लेखक ने अज्ञानता के बारे में लिखा है कि—

जब आकाश में तारे भी नहीं हों, चाँद भी नहीं हो तो वह बिल्कुल अंधियारी रात कही जाती है, उस मस्तिष्क को भी अंधियारी रात की उपमा दी है कि अज्ञानता मन की वह अंधेरी रात है जिसमें न चाँद है और न तारे।’

वास्तव में देखा जाए तो जितना-जितना ज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम होता है उतना-उतना अज्ञान छंटने लग जाता है और उतना-उतना प्रकाश हमारे मन के अन्दर प्रगटित होने लग जाता है। अब मैं आपको कालचक्र के बारे में विस्तार से बताती हूँ—

बीस कोड़ाकोड़ी सागर का एक कल्पकाल होता है, उसके अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी ऐसे दो भेद हैं। जिस काल में जीवों के अनुभव, उपयोग, आयु और शरीर आदि की उत्तरोत्तर उन्नति हो वह उत्सर्पिणी और जिसमें जीवों के ज्ञान, आयु आदि का ह्रास होता है वह अवसर्पिणी है।

अवसर्पिणी के छह भेद हैं

  1. सुषमासुषमा
  2. सुषमा
  3. सुषमादु:षमा
  4. दु:षमासुषमा
  5. दु:षमा
  6. अतिदु:षमा और उत्सर्पिणी अतिदु:षमा के क्रम से छह प्रकार की है।

अवसर्पिणी एवं उत्सर्पिणी दोनों ही १० कोड़ाकोड़ी सागर की होती है। इस प्रकार २० कोड़ाकोड़ी सागर का एक कल्पकाल होता है।

इन छ: भेदों के काल का नियम इस प्रकार है—

  1. सुषमासुषमा—४ कोड़ाकोड़ी सागर
  2. सुषमा—३ कोड़ाकोड़ी सागर
  3. सुषमादु:षमा—२ कोड़ाकोड़ी सागर
  4. दु:षमासुषमा—४२ हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर
  5. दु:षमा—२१ हजार वर्ष
  6. अतिदु:षमा—२१ हजार वर्ष।

इसमें पहले काल में उत्तम भोगभूमि, दूसरे काल में मध्यम भोगभूमि और तीसरे काल में जघन्य भोगभूमि होती है। चौथे काल में केवल आर्यखण्ड में तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण आदि शलाका पुरुष होते हैं। इनके प्रारम्भ में मनुष्य विदेह क्षेत्र के समान होते हैं।

वर्तमान में पंचमकाल चल रहा है फिर २१ हजार वर्ष का छठा काल आयेगा जिसमें मुनि, श्रावक तथा धर्म का अभाव रहता है। इस छठे काल के अन्त में भरत और ऐरावत क्षेत्र के आर्यखण्ड में प्रलयकाल आता है, इसमें ७-७ दिन तक होने वाली ७ प्रकार की वर्षा के वेग से पहाड़ तक चूर-चूर हो जाते हैं, मनुष्य मर जाते हैं। बहुत से मनुष्य युगल पर्वतों की गुफाओं में छिपकर अपनी रक्षा कर लेते हैं। विष और आग की वर्षा से तो एक योजन नीचे तक भूमि चूर्ण हो जाती है। इसके बाद उत्सर्पिणी अतिदु:षमा काल से प्रारम्भ होती है उसके आरम्भ में सात सप्ताह तक सात-सात प्रकार की सुवृष्टि होती है, उससे पृथ्वी की गर्मी शान्त हो जाती है और लता-वृक्ष आदि उगने लगते हैं। तब तक वे छिपे हुए मनुष्य युगल अपने-अपने स्थानों से निकलकर पृथ्वी पर बसने लगते हैं। दूसरे दुषमाकाल में २० हजार वर्ष बीतने पर जब एक हजार वर्ष शेष रहते हैं तो कुलकर पैदा होते हैं जो मनुष्यों को अनेक प्रकार के कुलाचार, भोजन पकाने आदि की शिक्षा प्रदान करते हैं। पुन: तीसरा दु:षमा-सुषमा काल आता है इसमें ६३ श्लाका पुरुष उत्पन्न होते हैं। इसके पश्चात् चौथे सुषमा-दु:षमा काल में जघन्य भोगभूमि, पाँचवें सुषमाकाल में मध्यम भोगभूमि और सुषमा-सुषमा काल में उत्तम भोगभूमि की व्यवस्था रहती है। उत्सर्पिणी काल समाप्त होने पर पुन: अवसर्पिणी काल प्रारम्भ हो जाता है। असंख्यात अवसर्पिणी बीत जाने पर एक हुण्डावसर्पिणी काल आता है जो अभी चल रहा है। इसमें असम्भव घटनायें जैसे—तीर्थंकर पर उपसर्ग, चक्रवर्ती का अपमान आदि अघटित घटनायें घटती रहती हैं।

यह जो काल परिवर्तन है यह मात्र भरत और ऐरावत क्षेत्र के आर्यखण्ड में होता है और प्रलय आदि भी यहीं होती है, विदेह क्षेत्र के आर्यखण्डों में नहीं। भरत और ऐरावत क्षेत्र सम्बन्धी म्लेच्छखण्डों तथा विजयार्ध पर्वत की श्रेणियों में अवसर्पिणी काल के समय चतुर्थकाल के आदि से लेकर अन्त तक परिवर्तन होता है और उत्सर्पिणी काल के समय तृतीय काल के अन्त से लेकर आदि तक परिवर्तन होता है और इनमें प्रलयकाल भी नहीं होता। विशेष बात यह है कि मोक्षमार्ग केवल आर्यखण्डों में है, म्लेच्छखण्डों में नहीं है।

अन्य भूमियों की व्यवस्था बताते हैं—

ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिता:।।२८।।

अर्थ — भरत और ऐरावत के सिवाय अन्य क्षेत्रों में एक समान व्यवस्था रहती है—उनमें काल का परिवर्तन नहीं होता है।

उन भरत और ऐरावत से अतिरिक्त अन्य जो क्षेत्र हैं वहाँ पर आयु आदि घटती-बढ़तीरहित होती है। केवल इन दो ही क्षेत्रों में षट्काल का परिवर्तन होता है बाकी कहीं भी परिवर्तन नहीं होता।

हैमवत आदि क्षेत्रों में आयु की व्यवस्था बताई है—

एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिवर्षकदैव-कुरवका:।।२९।।

अर्थ — हैमवत, हरि और देवकुरु के निवासी मनुष्य, तिर्यंच क्रम से एक पल्य, दो पल्य और तीन पल्य की आयु वाले हैं।

हस्तिनापुर में निर्मित जम्बूद्वीप में सुमेरू पर्वत के आजू-बाजू में दो वृक्ष हैं—जम्बूवक्ष और शाल्मलि वृक्ष। जम्बूवृक्ष में जामुन लटक रहे हैं कई बार लोग आते हैं उन्हें तोड़ लेते हैं। बहुत सारे जामुन कम हो गये, लोग तोड़ करके ले गये, लेकिन करेंगे क्या ? खाया नहीं जायेगा क्योंकि वह तो धातु के बने हैं लेकिन बिल्कुल सचमुच के जामुन की तरह दिखते हैं। बन्दर भी सचमुच के जामुन समझकर तोड़कर ले जाते हैं। वहाँ जो पेड़ लगे हुए हैं उसमें एक ओर देवकुरू और एक ओर उत्तरकुरू है जहाँ उत्तम भोगभूमि की व्यवस्था है उसी भोगभूमि की व्यवस्था बताते हुये कहा है कि वहाँ के निवासी मनुष्य और तिर्यंच एक पल्य, दो पल्य और तीन पल्य की आयु वाले हैं। जघन्य भोगभूमि में एक पल्य की, मध्यम में दो पल्य की और उत्तम भोगभूमि में तीन पल्य की आयु होती है। इसी भोगभूमि के बारे में आदिपुराण में कथानक आता है कि राजा वङ्काजंघ और रानी श्रीमती कमरे में सोते हुए मर गये थे, सिर्पâ आहारदान के प्रभाव से उन्होंने जो पुण्यकर्म संचित किया था उसके पुण्यफल से वह जाकर इसी भोगभूमि में उत्पन्न हुए वस्तुत: त्यागियों को दिया हुआ दान कभी भी बेकार नहीं जाता, उत्कृष्ट भोगभूमि के अन्दर उन्होंने तीन पल्य की आयु व्यतीत की थी।

भोगभूमि की यह विशेषता है कि वहाँ के मनुष्य युवा, रोगरहित, वेदनारहित हैं। मरते समय पुरुषों को जम्भाई और स्त्री को छींक आती है जिससे उनका मरण हो जाता है और शरीर कपूर की भांति उड़ जाता है। यहाँ पुण्य-पाप विशेष नहीं हैं, सम्यक्त्व किसी-किसी को होता है। मरने पर मिथ्यादृष्टि भवनत्रिक में और सम्यग्दृष्टि सौधर्म-ईशान स्वर्ग में जन्म लेते हैं। भोगभूमि में सभी कल्पवृक्षों द्वारा अपना जीवन सानन्द व्यतीत करते हैं।

तथोत्तरा:।।३०।।

अर्थ — उत्तर के क्षेत्रों में मनुष्यों तथा तिर्यंचों की आयु हैमवत आदि क्षेत्रों के मनुष्यों व तिर्यंचों के समान होती है। जैसे इधर के तीन क्षेत्र बताये हैं कि उनमें उत्तम, मध्यम और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था है ऐसे ही सुमेरू पर्वत की उत्तर दिशा में भी उत्तरकुरू, हरिक्षेत्र और रम्यकक्षेत्र हैं। उनमें भी दक्षिण की व्यवस्था के समान ही उत्तम भोगभूमि, मध्यम भोगभूमि और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था है।

विदेह क्षेत्र में आयु कितनी है, इस बात को बताया है—

विदेहेषु संख्येयकाला:।।३१।।

अर्थ — विदेह क्षेत्र में मनुष्य और तिर्यंच संख्यात वर्ष की आयु वाले होते हैं।

अर्थात् विदेह क्षेत्र में संख्यात वर्ष की आयु होती है वहाँ भोगभूमि नहीं है अपितु शाश्वत कर्मभूमि है। वहाँ पर आदि से अन्त तक चतुर्थकाल की सारी व्यवस्था रहती है, कभी परिवर्तन नहीं होता है। वहाँ के मनुष्यों की आयु संख्यात वर्ष की ही रहती है। जिस समय इस धरती पर तृतीयकाल के अन्त में भोगभूमि समाप्त होने लगी, कर्मभूमि का प्रादुर्भाव हुआ तब भगवान ऋषभदेव ने अपने अवधिज्ञान से उसी विदेहक्षेत्र की सारी व्यवस्था को जाना और इन्द्र को आज्ञा दी कि उस विदेहक्षेत्र के समान ही इस भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में कर्मभूमि की व्यवस्था कर दी जाए। उस समय आर्यखण्ड में नगर, ग्राम, पत्तन, द्रोणमुख इन सब की व्यवस्था करके यहाँ ग्राम आदि बसाए गए और तब से ही यहाँ पर विदेहक्षेत्र के समान कर्मभूमि चल रही है।

पाँच महाविदेह सम्बन्धी १६० नगरियाँ हुर्इं जहाँ सदैव चतुर्थकाल ही है। यहाँ के मनुष्यों के शरीर की ऊँचाई ५०० धनुष होती है, जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट आयु एक कोटिपूर्व की होती है।

अब प्रश्न आया कि पूर्व किसे कहते हैं ? ८४ लाख वर्ष का एक पूर्वांग होता है और ८४ लाख पूर्वांग का एक पूर्व होता है। अत: ८४ लाख को ८४ लाख से गुणा करने पर ७०५६०००००००००० संख्या आती है, इतने वर्षों का एक पूर्व हुआ।

भरतक्षेत्र का दूसरी तरह से विस्तार बताते हैं—

भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभाग:।।३२।।

अर्थ — भरतक्षेत्र का विस्तार जम्बूद्वीप के १९०वाँ भाग है।

जम्बूद्वीप के १९०वें भाग में भरत क्षेत्र है। जम्बूद्वीप एक लाख योजन का है उसका १९०वाँ भाग केवल भरत क्षेत्र को मिला है जो कि बहुत छोटा-सा भाग है। चूँकि जम्बूद्वीप ७ क्षेत्र और ६ पर्वतों में बँटा हुआ है, उसमें भरत क्षेत्र का एक भाग, हिमवान के २ भाग, हैमवत के ४ भाग, महाहिमवान के ८ भाग, हरिवर्ष के १६ भाग, निषध पर्वत के ३२ भाग, विदेह के ६४ भाग, नील पर्वत के ३२ भाग, रम्यक् के १६ भाग, रुक्मी पर्वत के ८ भाग, हैरण्यवत क्षेत्र के ४ भाग, शिखरी पर्वत के २ भाग और ऐरावत का एक भाग है, इन सबका जोड़ १९० होता है।

धातकीखण्ड का वर्णन करते हैं—

द्विर्धातकी खण्डे।।३३।।

अर्थ — धातकीखण्ड नामक दूसरे द्वीप में क्षेत्र, कुलाचल, मेरु, नदी आदि समस्त पदार्थों की रचना जम्बूद्वीप से दूनी-दूनी है।

धातकीखण्ड नामक जो दूसरा द्वीप है उसके अन्दर जितनी रचना है वह जम्बूद्वीप से दूनी-दूनी है। जैसे जम्बूद्वीप में एक भरतक्षेत्र है वहाँ दो भरत क्षेत्र हैं, इसलिये कि धातकीखण्ड के दो टुकड़े हो जाते हैं पूर्व धातकीखण्ड और पश्चिम धातकीखण्ड। दोनों में ही जम्बूद्वीप के समान पूरी-पूरी रचना होती है।

धातकीखण्ड द्वीप में दो मेरु, २८ नदी, १२ ह्रद आदि हैं। इन सबमें नाम भी वे ही हैं जो जम्बूद्वीप में बतलाये हैं केवल मेरु के नाम विजय और अचल भिन्न हैं। धातकीखण्ड द्वीप वलयाकृति है। इसके पूर्वाद्र्ध और पश्चिमाद्र्ध इस प्रकार दो विभाग हैं। यह विभाग इष्वाकार नाम वाले दो पर्वत करते हैं। प्रत्येक भाग में एक मेरु, ७ क्षेत्र, ६ पर्वत, १४ नदियाँ आदि हैं। इस प्रकार ये सब दूने हो जाते हैंं। इस द्वीप की यह विशेषता है कि यहाँ के पर्वत आरे के समान हैं और क्षेत्र आरों के बीच में स्थित विवर के समान है। जम्बूद्वीप के जिस स्थान पर जामुन का वृक्ष है धातकीखण्ड में उसी स्थान पर धातकी—आंवले का एक विशाल वृक्ष है, उसके कारण इस द्वीप का नाम धातकीखण्ड पड़ा है।

पुष्कर द्वीप का वर्णन करते हुए आचार्यश्री कहते हैं—

पुष्करार्धे च।।३४।।

अर्थ — पुष्कर द्वीप में भी जम्बूद्वीप की अपेक्षा सब रचना दूनी-दूनी है।

पुष्कर द्वीप में भी जो आधा पुष्कर द्वीप है उसके अन्दर एक इष्वाकार पर्वत पड़ने से पूर्व पुष्करार्ध और पश्चिम पुष्करार्ध ऐसे दो भेद हो जाते हैं, वहाँ पर भी जम्बूद्वीप से दूनी-दूनी सारी रचना बताई गई है। पुष्करवर द्वीप का विस्तार १६ लाख योजन है, उसके ठीक बीच में चूड़ी के आकार का मानुषोत्तर पर्वत है जिससे इस द्वीप के दो हिस्से हो गए हैं। पूर्वाद्र्ध में सब रचना धातकीखण्ड के समान है और जम्बूद्वीप से दूनी-दूनी है। इस द्वीप के उत्तरकुरु में एक पुष्कर—कमल है, उसके संयोग से ही इसका नाम पुष्करवर द्वीप पड़ा है।

मनुष्य क्षेत्र की सीमा के बारे में बताते हैं—

प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्या:।।३५।।

अर्थ — मानुषोत्तर पर्वत के पहले अर्थात् ढाईद्वीप में ही मनुष्य होते हैं। मानुषोत्तर पर्वत के आगे ऋद्धिधारी मुनि व विद्याधर भी नहीं जा सकते।

अब आपको अपनी स्थिति जाननी है कि मनुष्य कहाँ तक जा सकते हैं? ढाई द्वीप की सीमा बताने वाला एक गोलाकार पर्वत है,उसे कहते हैं—मानुषोत्तर पर्वत। जैसे जम्बूद्वीप है, जम्बूद्वीप के बाद लवण समुद्र, उसके बाद धातकीखण्ड द्वीप, धातकीखण्ड के बाद कालोदधि समुद्र और कालोदधि समुद्र के बाद पुष्करार्ध द्वीप आया तो आधे पुष्कर द्वीप में एक मानुषोत्तर पर्वत है इसलिये पुष्कर द्वीप को आधा लिया तो दो तथा आधा मिलकर ढ़ाई द्वीप हो गये और उस ढाई द्वीप तक ही मनुष्यों का आवागमन रहता है उसके बाहर न तो मनुष्य उत्पन्न होते हैं और न ही मनुष्य जा सकते हैं इसलिये आप नन्दीश्वर द्वीप की पूजा में पढ़ते हैं—‘‘हमें शक्ति सो नाहिं इहां करि थापना’’ अर्थात् उस नन्दीश्वर द्वीप तक जाने की हमारी शक्ति नहीं है इसलिये हम यहाँ पर उनको स्थापित करके नन्दीश्वर द्वीप के बावन जिनालयों की पूजा कर लेते हैं। मानुषोत्तर पर्वत मनुष्यलोक की सीमा पर स्थित है इसीलिए इसका ‘‘मानुषोत्तर’’ यह नाम सार्थक है। इस ढाई द्वीप में १५ कर्मभूमि और ३० भोगभूमि हैं तथा १७० आर्यखण्ड हैं।

मनुष्यों के भेद बताते हुए कहा है—

आर्या म्लेच्छाश्च।।३६।।

अर्थ — मनुष्य के दो भेद हैं—आर्य और म्लेच्छ।

जो आचार-विचार से सहित होते हैं, विवेक बुद्धि से सहित होते हैं उन्हें तो आर्य कहा है और जिनका आचार-विचार भ्रष्ट होता है, धर्म-कर्म का कोई विवेक नहीं होता वह म्लेच्छ कहलाते हैं, ऐसे दो प्रकार के मनुष्यों का विभाजन किया है।

आर्य मनुष्य दो प्रकार के होते हैं—एक ऋद्धिधारी और दूसरे बिना ऋद्धि वाले। जो अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा आदि आठ प्रकार की ऋद्धियों में से किसी एक ऋद्धि के धारी होते हैं उन्हें ऋद्धिप्राप्त आर्य कहते हैं और जिन्हें कोई भी ऋद्धि नहीं प्राप्त है वे बिना ऋद्धि वाले आर्य हैं। उनके भी पाँच भेद हैं—क्षेत्र आर्य, जाति आर्य, कर्म आर्य, चारित्र आर्य और दर्शन आर्य।

काशी, कोशल आदि क्षेत्रों में जन्म लेने वाले मनुष्य क्षेत्र आर्य हैं। इक्ष्वाकु, नाथ आदि वंशों में जन्म लेने वाले मनुष्य जाति आर्य हैं। कर्म आर्य तीन प्रकार के हैं—सावद्यकर्म आर्य, अल्पसावद्यकर्म आर्य और असावद्यकर्म आर्य। सावद्यकर्म आर्य असि, मसि आदि के भेद से छह प्रकार के हैं। उनमें जो अणुव्रती श्रावक हैं वे अल्प सावद्यकर्म आर्य और पूर्ण संयमी साधु असावद्यकर्म आर्य हैं। चारित्र आर्य—एक जो बिना उपदेश के स्वयं ही चारित्र पालन करते हैं और दूसरे जो पर के उपदेश से चारित्र का पालन करते हैं, यह दो भेद चारित्र आर्य के हैं। ऋद्धिप्राप्त आर्यों के भी आठ प्रकार की ऋद्धि तथा अवान्तर भेद की अपेक्षा बहुत भेद हैं।

म्लेच्छ दो प्रकार के हैं—अन्तद्र्वीपज और कर्मभूमिज। लवण समुद्र और कालोदधि समुद्र के भीतर ९६ कुभोगभूमि हैं। उनमें रहने वाले मनुष्य अन्तद्र्वीपज म्लेच्छ हैं तथा म्लेच्छ खण्डों में रहने वाले मनुष्य कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं। इनके एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही रहता है। भरत क्षेत्र के ५ म्लेच्छ खण्ड, ऐरावत क्षेत्र के ५ म्लेच्छ खण्ड और विदेह के ८०० म्लेच्छ खण्ड, इस प्रकार ८१० म्लेच्छ खण्ड हैं। उनमें उत्पन्न मनुष्य कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं।

अब कर्मभूमि के विभाग के बारे में बताया है—

भरतैरावत-विदेहा: कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरुत्तर-कुरुभ्य:।।३७।।

अर्थ — पाँचों मेरु सम्बन्धी ५ भरत क्षेत्र, ५ ऐरावत क्षेत्र, देवकुरू और उत्तरकुरू को छोड़कर पाँच विदेह क्षेत्र आ जाते हैं। इस प्रकार से ढाई द्वीप के अन्दर १५ कर्मभूमियाँ बताई हैं।

यह अभेद विवक्षा से हैं वैसे जब विदेहक्षेत्र में ३२ विदेह के भेद करेंगे तो १८० कर्मभूमियाँ हो जायेंगी और अभेद विवक्षा से ढ़ाई द्वीप के अन्दर १५ कर्मभूमियाँ होती हैं। कर्मभूमि किसे कहते हैं ? जहाँ सातवें नरक तक ले जाने वाले अशुभ कर्म और सर्वार्थसिद्धि तक ले जाने वाले शुभकर्म का अर्जन होता है, जहाँ असि, मसि, कृषि आदि षट्कर्म और दानादि की व्यवस्था है और जहाँ मोक्षमार्ग की प्रवृत्ति आज भी विद्यमान है वह कर्मभूमि है।

मनुष्यों की उत्कृष्ट और जघन्य आयु के बारे में बताया है—

नृस्थिति पराऽवरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते।।३८।।

अर्थ — मनुष्यों की उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त की है।

नारकियों की तो उत्कृष्ट आयु बतायी थी अब यहाँ मनुष्यों और तिर्यंचों की जघन्य आयु का वर्णन करते हैं। नृस्थिति—नृ अर्थात् मनुष्य, स्थिति अर्थात् आयु, मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु तीन पल्य है और जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त है। गर्भ में जाते ही मर जाते हैं वह अन्तर्मुहूर्त की आयु हुई तथा जो तीन पल्य की पूरी आयु भोगते हैं वह उत्कृष्ट आयु है। देवकुरू उत्तरकुरू नाम की भोगभूमि में उत्कृष्ट आयु तीन पल्य है।

स्थिति दो प्रकार की होती है—भवस्थिति और कायस्थिति। एक पर्याय में रहने में जितना काल लगे वह भवस्थिति है तथा पुन:-पुन: उसी पर्याय में निरन्तर उत्पन्न होना, दूसरी जाति में नहीं जाना, इस प्रकार जितना काल प्राप्त हो वह कायस्थिति है। सूत्र में अवस्थिति बताई गई है।

तिर्यञ्चों की आयु बताते हुए अन्तिम सूत्र अवतार लेता है—

तिर्यग्योनिजानां च।।३९।।

अर्थ — तिर्यंचों की भी आयु उत्कृष्ट और जघन्यस्थितिक्रम से तीन पल्य और अन्तर्मुहूर्त की है।

मनुष्यों के समान ही तिर्यंचों की उत्कृष्ट आयु तीन पल्य और जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त है। इस प्रकार से इन मनुष्यों और नारकियों का वर्णन करने वाला यह तृतीय अध्याय पूर्ण हुआ है।

वास्तव में देखा जाए तो इन अध्यायों को पढ़कर हमें अपनी ही अवस्थिति के बारे में ज्ञात करना है कि मध्यलोक के अन्दर जो प्रथम जम्बूद्वीप है उसमें भरतक्षेत्र है, भरतक्षेत्र के अन्दर आर्यखण्ड और आर्यखण्ड के अन्दर जो छह महाद्वीपों में हमारा भारत देश है उस भारत देश के अलग-अलग प्रदेशों में हम लोग निवास करते हैं। यही समझ करके इन अध्यायों के माध्यम से हमें अपने कर्म की स्थिति को जानकर, कर्मों से डरकर अपने मनुष्य जीवन को सार्थक करना चाहिये।

।।इति तत्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे तृतीयोऽध्याय: समाप्त:।।