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०५. द्वितीय महाधिकार-वेदमार्गणा

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विषय सूची

द्वितीय महाधिकार - वेदमार्गणा

अथ वेदमार्गणाधिकार:

अथ त्रिभिस्थलैः अष्टादशसूत्रैः वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले स्त्रीपुरुषवेदयोः गुणस्थानापेक्षया स्पर्शननिरूपणत्वेन ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादिनवसूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले नपुंसकवेदे गुणस्थानापेक्षया स्पर्शनकथनत्वेन ‘‘णउंसय-’’ इत्यादि सप्त सूत्राणि। ततः परं तृतीयस्थले अपगतवेदानां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन द्वे सूत्रे इति समुदायपातनिका।
अधुना वेदमार्गणायां स्त्री-पुरुषवेदयोः मिथ्यादृष्टिस्पर्शनकथनाय सूत्रावतारः क्रियते-
वेदाणुवादेण इत्थिवेद-पुरिसवेदएसु मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१०२।।
सूत्रं सुगमं।
पुनरपि तेषां एव स्पर्शनप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
अट्ठ चोद्दसभागा देसूणा, सव्वलोगो वा।।१०३।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। अत्र वानव्यन्तर-ज्योतिष्कावासे संख्यातयोजनबाहल्यं रज्जुप्रतरं च गृहीत्वा तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः साधयितव्यः। विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपरिणतैः अष्ट चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः, अष्टरज्जुबाहल्यं रज्जुप्रतरप्रमाण-परिभ्रमणशक्तियुक्तदेवस्त्री-पुरुष-वेदमिथ्यादृष्टी-नामुपलंभात्। मारणान्तिकोपपादपरिणतैः सर्वलोकः स्पृष्टः, एतद्द्विपदपरिणतमिथ्यादृष्टीनामगम्यप्रदेशाभावात्।
सासादनैः स्पर्शितक्षेत्रनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
सासणसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्ज-दिभागो।।१०४।।
सूत्रं सुगमं वर्तते।
पुनरपि एभिः स्पर्शितक्षेत्रनिरूपणाय सूत्रमवतरति-
अट्ठ णव चोद्दसभागा वा देसूणा।।१०५।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सामान्येन सुगमोऽर्थः, विशेषेण तु वक्ष्यते-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपरिणतैः अष्ट चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः (८/१४) अष्टरज्जुबाहल्यरज्जुपदस्याभ्यन्तरे देवस्त्री-पुरुषसासादनानां गमनागमनं प्रति प्रतिषेधाभावात् ‘मारणान्तिकपरिणतैः नव चतुर्दशभागा देशोनाः स्पृष्टाः (९/१४)।
अधः पंच रज्जुस्पर्शनं किन्न लभ्यते?
न, नारकेभ्यः स्त्री-पुरुषवेदतिर्यग्मनुष्ययोः मारणान्तिकपरिणतसासादनानां अभावात्। तथा च नरकगतिं प्रति मारणान्तिकपरिणत स्त्री-पुरुषवेदितिर्यक्-सासादनानां अभावात्।
उपपादपरिणतसासादनैः एकादश चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः। नारकेभ्यः आगच्छद्भिः पंच- रज्जवः, देवेभ्यः आगच्छद्भिः षट् रज्जवः स्पृष्टाः, इति एकादश चतुर्दशभागाः स्पर्शनक्षेत्रं भवति।


अथ वेदमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब तीन स्थलों में अठारह सूत्रों के द्वारा वेदमार्गणा नाम का पंचम अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में स्त्री और पुरुष वेदी जीवों गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शन निरूपण करने हेतु ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि नौ सूत्र कहेंगे। उसके बाद द्वितीय स्थल में नपुंसकवेदी जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शनक्षेत्र बतलाने वाले ‘‘णउंसय’’ इत्यादि सात सूत्र हैं पुन: आगे तृतीय स्थल में अपगतवेदी अरिहंतों और सिद्धों का स्पर्शन बतलाने वाले दो सूत्र हैं। इस प्रकार अधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है।

अब वेदमार्गणा में मिथ्यादृष्टि स्त्री-पुरुष वेदी जीवों का स्पर्शन कथन करने के लिए सूत्र का अवतार किया जा रहा है-

सूत्रार्थ-

वेदमार्गणा के अनुवाद से स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीवों में मिथ्यादृष्टियों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।१०२।।

सूत्र का अर्थ सरल है। इसलिए कोई विशेष व्याख्यान नहीं किया जा रहा है।

अब आगे भी उन्हीं स्त्री-पुरुषवेदियों का स्पर्शन कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी मिथ्यादृष्टि जीवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग तथा सर्वलोक स्पर्श किया है।।१०३।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है।

यहाँ पर वानव्यन्तर और ज्योतिष्क देवों के आवासों को तथा संख्यात योजन प्रमाण बाहल्यवाले राजुप्रतर को ग्रहण करके तिर्यग्लोेक का संख्यातवाँ भाग साध लेना चाहिए। विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घात परिणत उक्त जीवों ने आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किये हैं, क्योंकि आठ राजु बाहल्यवाले राजु प्रतर प्रमाण क्षेत्र में परिभ्रमण की शक्ति से युक्त देव, स्त्री और पुरुषवेदी मिथ्यादृष्टि जीव पाये जाते हैं।

मारणान्तिकसमुद्घात और उपपादपद से परिणत उक्त जीवों ने सर्वलोक का स्पर्श किया है, क्योंकि मारणान्तिक और उपपादपद इन दोनों पदों से परिणत स्त्री और पुरुषवेदी मिथ्यादृष्टि जीवों के अगम्यप्रदेश का अभाव है।

अब सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के द्वारा स्पर्शित क्षेत्र का निरूपण करने के लिए सूत्र अवतरित होात है-

सूत्रार्थ-

स्त्री और पुरुषवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।१०४।।

सूत्र का अर्थ सरल है।

पुनरपि उपर्युक्त उन्हीं जीवों से स्पर्शित क्षेत्र का निरूपण करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

स्त्री और पुरुषवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह तथा नौ बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।१०५।।

हिन्दी टीका-सामान्यरूप से सूत्र का अर्थ सुगम है और विशेषरूप से वर्णन इस प्रकार है-विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घातपरिणत उक्त जीवों ने कुछ कम आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किये हैं, क्योंकि आठ राजु बाहल्य वाले राजुप्रतर के भीतर देव-स्त्री और पुरुषवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों के गमनागमन के प्रति प्रतिषेध का अभाव है। मारणान्तिक समुद्घातपरिणत उक्त जीवों ने कुछ कम नौ बटे चौदह (९/१४) भाग स्पर्श किए हैं।

शंका-मेरुतल से नीचे पाँच राजु प्रमाण स्पर्शनक्षेत्र क्यों नहीं पाया जाता है?

समाधान-नहीं, क्योंकि नारकियों से स्त्री और पुरुषवेदी तिर्यंचों और मनुष्यों में मारणान्तिक समुद्घात करने वाले सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का अभाव है तथा नरकगति के प्रति मारणान्तिक समुद्घात करने वाले स्त्री और पुरुषवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंच जीवों का भी अभाव है।

उपपादपद स्त्रे परिणत उक्त जीवों ने कुछ कम ग्यारह बटे चौदह (११/१४) भाग स्पर्श किये हैं। नरकगति से आने वाले जीवों की अपेक्षा पाँच राजु और देवगति से आने वाले जीवों की अपेक्षा छह राजु स्पर्श किये हैं। इस प्रकार ग्यारह बटे चौदह (११/१४) भाग उपपाद का स्पर्शनक्षेत्र है।


सम्यग्मिथ्यादृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टिस्पर्शननिरूपणाय सूत्रद्वयमवतरति-

सम्मामिच्छादिट्ठि-असंजदसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१०६।।

अट्ठ चोद्दसभागा वा देसूणा फोसिदा।।१०७।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रयोरर्थः सुगमः। विशेषतया-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकमारणान्तिकपरिणतैः अष्ट चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः। केवलं-सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां मारणान्तिकं नास्ति। उपपादपरिणतैः षट्चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः, सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां उपपादो नास्ति। स्त्रीवेदेषु असंयतसम्यग्दृष्टीनां उपपादो नास्तीति।
अनयोः द्वयोः वेदयोः पंचमगुणस्थानवर्तिनोः स्पर्शननिरूपणाय सूत्रद्वयं अवतरति-
संजदासंजदेहिकेवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।१०८।।
छ चोद्दसभागा वा देसूणा।।१०९।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रे सुगमे। सर्वं पूर्ववद्ज्ञातव्यं यः कश्चिद् विशेषः स एवोच्यते-मारणान्तिकपरिणतैः षट् चतुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः, अच्युतकल्पादुपरि तिर्यक्संयतासंयता-नामुपपादाभावात्।
अनयोः वेदयोः प्रमत्तसंयताद्यनिवृत्तिकरणपर्यंतानां स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतार्यते-
पमत्तसंजदप्पहुडि जाव अणियट्टि उवसामग-खवएहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।११०।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-एतस्य सूत्रस्य वर्तमानप्ररूपणा क्षेत्रवत्। अतीतकाले एतैः स्वस्थानस्वस्थान-विहारवत्स्वस्थान-वेदना-कषाय-वैक्रियिकपरिणतैः चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, मानुषक्षेत्रस्य संख्यातभागः स्पृष्टः। प्रमत्तसंयते तैजसाहारौ अपि चैव एवं वक्तव्यं। केवलं-स्त्रीवेदे तैजसाहारो न स्तः। मारणान्तिकपदेन चतुर्लोकानामसंख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः।
अत्र भाववेदिस्त्रीवेदानामेव ग्रहणं ज्ञातव्यं, द्रव्यस्त्रीवेदेभ्यः पंचमगुणस्थानादुपरि गमनाभावात्।
एवं प्रथमस्थले भावस्त्री-पुरुषवेदयोः स्पर्शनकथनेन नव सूत्राणि गतानि।
अधुना नपुंसकवेदमिथ्यादृष्टिस्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
णउंसयवेदएसु मिच्छादिट्ठी ओघं।।१११।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रं सुगमं। स्वस्थानाद्यपेक्षया त्रिष्वपि कालेषु सर्वलोकः स्पृष्टः, विहारवत्स्वस्थानगतै: त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः। तेनेदं ओघत्वं युज्यते। किन्तु वैक्रियिकपदं तु वर्तमानकाले तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागमात्रं, अत्र घनतिर्यग्लोकस्य असंख्यातभागमात्रं। अतीतकाले ओघादेशयोरपि अष्ट चतुर्दशभागाः, पंच चतुर्दशभागाः ज्ञातव्याः।
अस्मिन् वेदे सासादनस्पर्शनप्ररूपणाय सूत्रद्वयमवतरति-
सासणसम्मादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदि भागो।।११२।।
बारह चोद्दसभागा वा देसूणा।।११३।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रे सुगमे स्तः। स्वस्थानादिपरिणत-नपुंसकवेदिसासादनैः अतीतानागतयोः त्रिलोकानामसंख्यातभागः, तिर्यग्लोकस्य संख्यातभागः, सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः, प्रधानीकृततिर्यक्सासादनराशित्वात्। उपपाद परिणतैः एकादश चतुर्दशभागा देशोनाः स्पृष्टाः, नपुंसकवेदतिर्यक्-सासादनेषु उत्पद्यमानदेवनाकाणां षट्पंचरज्जुबाहल्यतिर्यक्प्रतरस्पर्शनोपलंभात्। मारणान्तिकपरिणतैः द्वादश चतुर्दशभागाः स्पृष्टाः, नारकाणां पंचरज्जवः, तिरश्चां सप्तरज्जवः, एतत्पंच-सप्तरज्जुबाहल्यरज्जुप्रतर-स्पर्शनोपलंभात्।

अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयत सम्यग्दृष्टि जीवों के स्पर्शनक्षेत्र का निरूपण करने के लिए दो सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी सम्यग्मिथ्यादृष्टि तथा असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।१०६।।

उक्त जीवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं।।१०७।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। विशेषरूप से विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय, वैक्रियिक और मारणान्तिकपद से परिणत उक्त जीवों ने कुछ कम आठ बटे चौदह (८/१४) भाग स्पर्श किये हैं। केवल विशेष बात यह है कि सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों के मारणान्तिकसमुद्घातपद नहीं होता है। उपपादपद से परिणत उक्त जीवों ने कुछ कम छह बटे चौदह (६/१४) भाग स्पर्श किये हैं। विशेषता यह है कि सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों के उपपादपद नहीं होता है। स्त्रीवेदी जीवों में असंयतसम्यग्दृष्टियों का उपपाद नहीं होता है।

उपर्युक्त इन दोनों वेदों में पंचमगुणस्थानवर्ती जीवों का स्पर्शनक्षेत्र निरूपण करने हेतु दो सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी संयतासंयत जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।१०८।।

स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी संयतासंयत जीवों ने अतीत और अनागतकाल की विवक्षा से कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं।।१०९।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्र सुगम हैं। सम्पूर्ण कथन पूर्ववत् जानना चाहिए। जो कुछ विशेषता है उसे कहते हैं-मारणान्तिकपद से परिणत जीवों ने कुछ कम छह बटे चौदह (६/१४) भाग स्पर्श किये हैं, क्योंकि अच्युतकल्प से ऊपर तिर्यंच संयतासंयत जीवों का उपपाद नहीं होता है।

इन दोनों वेदों में प्रमत्तसंयत से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान पर्यंत जीवों का स्पर्शननिरूपण करने हेतु सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

स्त्रीवेदी और पुरुषवेदियों में प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण उपशामक और क्षपक गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।११०।।

हिन्दी टीका-इस सूत्र की वर्तमानकालिक स्पर्शन प्ररूपणा क्षेत्रप्ररूपणा के समान है। अतीतकाल में स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक समुद्घात परिणत इन्हीं उक्त जीवों ने सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और मनुष्यक्षेत्र का संख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है। प्रमत्तसंयत गुणस्थान में तैजससमुद्घात और आहारकसमुद्घात, इन दोनों ही पदों में इसी प्रकार से स्पर्शनक्षेत्र कहना चाहिए। केवल विशेष बात यह है कि स्त्रीवेद में तैजस और आहारकसमुद्घात, ये दोनों पद नहीं होते हैं। मारणान्तिकपद से परिणत उक्त जीवों ने सामान्यलोक आदि चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है। यहाँ भाव स्त्रीवेदी जीवों का ग्रहण करना चाहिए। क्योंकि द्रव्यस्त्रीवेदी जीवों में पंचम गुणस्थान से ऊपर गमन का अभाव पाया जाता है। इस प्रकार प्रथम स्थल में भावस्त्री और भावपुरुष वेदी जीवों का स्पर्शन बतलाने वाले नौ सूत्र पूर्ण हुए।

अब नपुंसकवेदी मिथ्यादृष्टियों का स्पर्शन कथन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

नपुंसकवेदी जीवों में मिथ्यादृष्टि जीवों का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान सर्वलोक हैै।।१११।।

हिन्दी टीका-सूत्र का अर्थ सुगम है। स्वस्थान आदि की अपेक्षा नपुंसकवेदी मिथ्यादृष्टि जीवों के द्वारा तीनों ही कालों में सम्पूर्ण लोक स्पर्शित है एवं विहारवत्स्वस्थान पद से परिणत उक्त जीवों ने तीनों ही कालों में सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवां भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है, इसलिए सूत्र में कहा गया ओघपना घटित हो जाता है।

वैक्रियिकपद तो वर्तमानकाल में तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भागमात्र है और यहाँ पर घन तिर्यग्लोक का असंख्यातवां भाग है। अतीतकाल में दोनों ही स्थलों पर अर्थात् ओघप्ररूपणा में और आदेशप्ररूपणा के अन्तर्गत, वेदप्ररूपणा में आठ बटे चौदह (८/१४) तथा पाँच बटे चौदह (५/१४) भाग प्रमाण स्पर्शनक्षेत्र जानना चाहिए।

इसी नपुंसकवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों का स्पर्शन बतलाने के लिए दो सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

नपुंसकवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।११२।।

नपुंसकवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा कुछ कम बारह बटे चौदह भाग स्पर्श किए हैं।।११३।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्र सुगम हैंं। स्वस्थानादि पदों से परिणत नपुंसकवेदी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों ने अतीत और अनागतकाल में सामान्यलोक आदि तीन लोकों का असंख्यातवाँ भाग, तिर्यग्लोक का संख्यातवाँ भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है, क्योंकि यहाँ पर तिर्यंच सासादन जीवराशि की प्रधानता है। उपपादपद से परिणत उक्त जीवोें ने कुछ कम ग्यारह बटे चौदह (११/१४) भाग स्पर्श किये हैं। क्योंकि, नपुंसकवेदी तिर्यंच सासादनसम्यग्दृष्टि जीवों में उत्पन्न होने वाले देवों की अपेक्षा छह राजु और नारकियों की अपेक्षा पांच राजु, इस प्रकार मिलकर ग्यारह राजु बाहल्य वाले तिर्यकप्रतर प्रमाण स्पर्शनक्षेत्र पाया जाता है। मारणान्तिकपद से परिणत उक्त जीवों ने बारह बटे चौदह (१२/१४) भाग स्पर्श किये हैं, क्योंकि नारकियों के पाँच राजु और तिर्यंचों के सात राजु इस प्रकार बारह राजु बाहल्य वाला राजुप्रतरप्रमाण स्पर्शनक्षेत्र पाया जाता है।

सम्यग्मिथ्यादृष्टि-स्पर्शननिरूपणाय सूत्रमवतरति-

सम्मामिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदि भागो।।११४।।

सूत्रं सुगमं। वर्तमानातीतयोः प्ररूपणा क्षेत्रवत् ज्ञातव्यं। विशेषेण मारणान्तिकोपपादौ न स्तः।
असंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयतस्पर्शननिरूपणाय सूत्रद्वयं अवतरति-
असंजदसम्मादिट्ठि-संजदासंजदेहि केवडियं खेत्तं फोसिदं? लोगस्स असंखेज्जदिभागो।।११५।।
छ चोद्दसभागा वा देसूणा।।११६।।
सिद्धान्तचिन्तामणिटीका-सूत्रे सुगमे स्तः। सामान्येन पूर्ववत्। विशेषेण तु मारणान्तिकपरिणतैः षट् चतुुर्दशभागाः देशोनाः स्पृष्टाः, अच्युतकल्पादुपरि तिर्यगसंयतसम्यग्दृष्टि-संयतासंयतयोः गमनाभावात्। उपपादपदं नास्ति। केवलं असंयतसम्यग्दृष्टिभिः उपपादपरिणतैः चतुर्लोकानामसंख्यात भागः सार्धद्वयद्वीपादसंख्यातगुणश्च स्पृष्टः।
प्रमत्ताद्यनिवृत्तिकरणपर्यन्तानां अस्मिन् वेदे स्पर्शनकथनाय सूत्रमवतरति-
पमत्तसंजदप्पहुडि जाव अणियट्टि त्ति ओघं।।११७।।
सूत्रं सुगमं। प्रमत्ते तैजसाहारसमुद्घातौ न स्तः, नपुंसकवेदेषु इति ज्ञातव्यं। अत्रापि भाववेदापेक्षया कथनं ज्ञातव्यं।
एवं द्वितीयस्थले नपुंसकवेदवतां स्पर्शनप्रतिपादनत्वेन सप्त सूत्राणि गतानि।
अपगतवेदानां गुणस्थानापेक्षया स्पर्शननिरूपणाय सूत्रे द्वे अवतरतः-
अपगतवेदएसु अणियट्टिप्पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ओघं।।११८।।
सजोगिकेवली ओघं।।११९।।
द्वयोरपि सूत्रयोरर्थः सुगमः।
अत्र एकमेव सूत्रं कर्तव्यमासीत्?
न, पूर्वक्षेत्रेण सयोगिक्षेत्रस्य अतीतवर्तमानकालयोः तुल्यत्वाभावात् एकसूत्रत्वानुपपत्तेः।
तात्पर्यमेतत्-येन केनापि प्रकारेण द्रव्यपुरुषवेदं संप्राप्य षष्ठसप्तमादिगुणस्थानानि प्राप्तव्यानि अस्माभिः इति वेदमार्गणापठनस्य सारं, अथवा द्रव्यस्त्रीवेदेऽपि उपचारमहाव्रतानि लब्ध्वा सिद्धान्तग्रन्थानभ्यस्याभ्यस्य सम्यक्त्वरत्नं महता प्रयत्नेन रक्षणीयमस्माभिरिति।
एवं तृतीयस्थले अपगतवेदस्पर्शननिरूपणत्वेन सूत्रे द्वे गते।
इति षट्खंडागमस्य प्रथमखण्डे चतुर्थग्रन्थे स्पर्शनानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिन्तामणिटीकायां वेदमार्गणानाम-पंचमोऽधिकारः समाप्तः।


अब सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंं का स्पर्शन बतलाने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

नपुंसकवेदी सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।११४।।

सूत्र का अर्थ सुगम है। वर्तमान और अतीतकाल की प्ररूपणा क्षेत्रवत् जानना चाहिए। विशेषरूप से उनके मारणान्तिक और उपपाद ये दोनों पद नहीं होते हैं।

अब असंयतसम्यग्दृष्टि एवं संयतासंयत जीवों का स्पर्शन निरूपण करने के लिए दो सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

नपुंसकवेदी असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत जीवों ने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है? लोक का असंख्यातवाँ भाग स्पर्श किया है।।११५।।

उक्त जीवों ने अतीत और अनागतकाल की अपेक्षा कुछ कम छह बटे चौदह भाग स्पर्श किये हैं।।११६।।

हिन्दी टीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। सामान्यरूप से सम्पूर्ण कथन पूर्ववत् है। विशेषरूप से मारणान्तिक पद से परिणत जीवों ने कुछ कम छह बटे चौदह (६/१४) भाग स्पर्श किये हैं, क्योंकि अच्युतकल्प से ऊपर असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत तिर्यंचों के गमन का अभाव है। यहाँ पर उपपादपद नहीं होता है। विशेष बात यह है कि उपपादपदपरिणत असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों ने चार लोकों का असंख्यातवाँ भाग और अढ़ाईद्वीप से असंख्यातगुणा क्षेत्र स्पर्श किया है।

अब प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक के मुनियों का इस वेद के अन्तर्गत स्पर्शन कथन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

उक्त नपुंसकवेदी जीवों में प्रमत्तसंयत गुणस्थान से लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवों का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान लोक का असंख्यातवाँ भाग है।।११७।।

हिन्दी टीका-यह सूत्र सरल है। प्रमत्त गुणस्थान में नपुंसकवेदी जीवों के तैजस और आहारक समुद्घात नहीं होते हैं। यहाँ भी भाववेद की अपेक्षा ही कथन जानना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीयस्थल में नपुंसकवेदी जीवों का स्पर्शन बतलाने वाले सात सूत्र पूर्ण हुए।

अब अपगतवेदी जिनों का गुणस्थान की अपेक्षा स्पर्शन निरूपण करने के लिए दो सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

अपगतवेदी जीवों में अनिवृत्तिकरण गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवों का स्पर्शन क्षेत्र ओघ के समान है।।११८।।

अपगतवेदी सयोगिकेवली जिनों का स्पर्शनक्षेत्र ओघ के समान है।।११९।।

हिन्दी टीका-दोनों ही सूत्रों का अर्थ सरल है।

प्रश्न-यहाँ एक सूत्र का ही कथन करना चाहिए था?

उत्तर-नहीं, क्योंकि पूर्व क्षेत्र के साथ-प्रमत्तसंयतादि के क्षेत्र से सयोगिकेवली के क्षेत्र का अतीत और वर्तमानकाल में समानता का अभाव होने से दोनों सूत्रों का एक योगपना नहीं बन सकता है।

तात्पर्य यह है कि जिस किसी भी प्रकार से द्रव्य पुरुषवेद को प्राप्त करके हम लोगों को छठे-सातवें गुणस्थान को प्राप्त करना चाहिए, यही वेदमार्गणा को पढ़ने का सार है।

अथवा द्रव्य स्त्रीवेद में भी उपचार महाव्रतों को-आर्यिका पद को प्राप्त करके सिद्धान्त ग्रंथों का बारम्बार अभ्यास कर-करके महान पुरुषार्थ के द्वारा सम्यक्त्वरत्न की रक्षा करनी चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में अपगतवेदियों का स्पर्शन बतलाने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में चतुर्थग्रंथ में स्पर्शनानुगम नाम के चतुर्थ प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में वेदमार्गणा नामक पंचम अधिकार समाप्त हुआ।