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०५. वेदमार्गणा में अल्पबहुत्व

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वेदमार्गणा में अल्पबहुत्व

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अथ वेदमार्गणाधिकार:

अथ चतु:स्थलै: त्रिपञ्चाशत्सूत्रै: वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले स्त्रीवेदेषु गुणस्थानापेक्षया सम्यक्त्वमाश्रित्यापि अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि अष्टादशसूत्राणि वक्ष्यन्ते। तदनु द्वितीयस्थले पुरुषवेदेषु गुणस्थानापेक्षया सम्यक्त्वं प्रतीत्य च अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन ‘‘पुरिसवेदएसु’’ इत्यादि त्रयोदशसूत्राणि कथ्यन्ते। तत: परं तृतीयस्थले नपुंसकभाववेदिषु गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘णउंसय’’ इत्यादि षोडशसूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले अपगतवेदानामल्पबहुत्वकथनमुख्यत्वेन ‘‘अवगदवेदएसु’’ इत्यादिषट्सूत्राणि इति पातनिका सूचिता भवति।
संप्रति वेदमार्गणायां भावस्त्रीवेदधारिणां उपशमादि-अधस्तनमिथ्यादृष्टिजीवानां अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-वेदाणुवादेण इत्थिवेदएसु दोसु विअद्धासु उवसमा पवेसणेण तुल्ला थोवा।।१४४।।
खवा संखेज्जगुणा।।१४५।।
अप्पमत्तसंजदा अक्खवा अणुवसमा संखेज्जगुणा।।१४६।।
पमत्तसंजदा संखेज्जगुणा।।१४७।।
संजदासंजदा असंखेज्जगुणा।।१४८।।
सासणसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१४९।।
सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१५०।।
असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१५१।।
मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१५२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भावस्त्रीवेदधारिद्रव्यपुरुषवेदिषु अपूर्वानिवृत्तिकरणगुणस्थानयो: दशपरिमाणत्वात् प्रवेशेन तुल्या: अल्पाश्च भवन्ति। इमे एव क्षपका: विंशतिपरिमाणत्वात् अल्पा एव। शेषसूत्राणि सुगमानि। संयतासंयतेभ्य: सासादना: असंख्यातगुणा:, अशुभसासादनगुणस्थानस्य सुलभत्वात्। एभ्य: सम्यग्मिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा:, सासादनायात् संख्यातगुणायसंभवात्। असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा:, सम्यग्मिथ्यादृष्टि-आयं अपेक्ष्य असंख्यातगुणायत्वात्। एभ्य: मिथ्यादृष्टयोऽसंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: जगत्प्रतरस्य असंख्यातभाग: ज्ञातव्य:।
अधुना गुणस्थानापेक्षया स्त्रीवेदेषु अल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठि-संजदासंजदट्ठाणे सव्वत्थोवा खइयसम्मादिट्ठी।।१५३।।
उवसमसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१५४।।
वेदगसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१५५।।
पमत्त-अप्पमत्तसंजदट्ठाणे सव्वत्थोवा खइयसम्मादिट्ठी।।१५६।।
उवसमसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१५७।।
वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१५८।।
एवं दोसु अद्धासु।।१५९।।
सव्वत्थोवा उवसमा।।१६०।।
खवा संखेज्जगुणा।।१६१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। भावस्त्रीवेदिनां श्रेण्यां अपूर्वानिवृत्तिगुणस्थानयो: सर्वस्तोका: क्षायिकसम्यग्दृष्टय: उपशमसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:। सर्वस्तोका: उपशामका:, क्षपकाश्च संख्यातगुणा:।
एतत्सूत्रं पुनरुक्तं किन्न भवति ?
न, अत्र प्रवेशै: अधिकाराभावात्। संचयेनात्राधिकारोऽस्ति, न स: पूर्वं प्ररूपित:। ततो न पुनरुक्तत्वमिति।
एवं प्रथमस्थले भावस्त्रीवेदिनां अल्पबहुत्वकथनत्वेन अष्टादश सूत्राणि गतानि।

अथ वेदमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब चार स्थलों में त्रेपन सूत्रों के द्वारा वेदमार्गणा नामका पंचम अधिकार प्रारंभ होता है। उसमें से प्रथम स्थल में स्त्रीवेदी जीवों में गुणस्थान की अपेक्षा सम्यक्त्व का आश्रय लेकर अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने हेतु ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि अट्ठारह सूत्र कहेंगे। पुन: द्वितीय स्थल में पुरुषवेदी जीवों में गुणस्थान की अपेक्षा और सम्यक्त्व के आश्रय से अल्पबहुत्व का निरूपण करने हेतु ‘‘पुरिसवेदएसु’’ इत्यादि तेरह सूत्र हैं। उसके पश्चात् तृतीय स्थल में नपुंसकवेदी जीवों में गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने वाले ‘‘णउंसय’’ इत्यादि सोलह सूत्र कहेंगे। तत्पश्चात् चतुर्थस्थल में अपगतवेदी-वेदरहित जिन भगवन्तों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले ‘‘अवगदवेदएसु’’ इत्यादि छह सूत्र हैं। अध्याय के प्रारंभ में सूत्रों की यह समुदायपातनिका हुई।

अब वेदमार्गणा में भावस्त्रीवेदी उपशमश्रेणी से लेकर अधस्तन मिथ्यादृष्टि गुणस्थान तक के जीवों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने हेतु नौ सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वेदमार्गणा के अनुवाद से स्त्रीवेदियों में अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन दोनों ही गुणस्थानों में उपशामक जीव प्रवेश की अपेक्षा तुल्य और अल्प हैं।।१४४।।

स्त्रीवेदियों में उपशामकों से क्षपक जीव संख्यातगुणित हैं।।१४५।।

स्त्रीवेदियों में क्षपकों से अक्षपक और अनुपशामक अप्रमत्तसंयत जीव संख्यातगुणित हैं।।१४६।।

स्त्रीवेदियों में अप्रमत्तसंयतों से प्रमत्तसंयत जीव संख्यातगुणित हैं।।१४७।।

स्त्रीवेदियों में प्रमत्तसंयतों से संयतासंयत जीव असंख्यातगुणित हैं।।१४८।।

स्त्रीवेदियों में संयतासंयतों से सासादनसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१४९।।

स्त्रीवेदियों में सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१५०।।

स्त्रीवेदियों में सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१५१।।

स्त्रीवेदियों में असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१५२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भावस्त्रीवेद को धारण करने वाले द्रव्य पुरुषवेदियों में अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवर्ती मुनियों की संख्या मात्र दस होने के कारण प्रवेश की अपेक्षा वे एक समान और सबसे कम होते हैं। इन दोनों गुणस्थानों में क्षपक श्रेणी वाले मुनियों की संख्या बीस प्रमाण होने से वह भी कम ही है।

शेष सूत्रों का अर्थ सुगम है।

संयतासंयत गुणस्थानवर्तियों से सासादनसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणे अधिक होते हैं। क्योंकि अशुभ सासादन गुणस्थान का पाना सुलभ है। इनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव संख्यातगुणे होते हैं, क्योंकि सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों की संख्यागुणित आय संभव है। इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणे अधिक होते हैं, क्योंकि सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों की आय से असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों की आय असंख्यातगुणी होती है। इनसे मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणे होते हैं। यहाँ गुणकार जगत्प्रतर का असंख्यातवाँ भाग जानना चाहिए।

अब गुणस्थान की अपेक्षा स्त्रीवेदियों में अल्पबहुत्व का प्रतिपादन करने हेतु नौ सूत्रों का अवतार हो रहा है-

सूत्रार्थ-

स्त्रीवेदियों में असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।१५३।।

स्त्रीवेदियो में असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से उपशम सम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१५४।।

स्त्रीवेदियों में असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुणस्थान में उपशमसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१५५।।

स्त्रीवेदियों में प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।१५६।।

क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से उपशमसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१५७।।

उपशमसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१५८।।

इसी प्रकार अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन दोनों गुणस्थानों में स्त्रीवेदियों का अल्पबहुत्व है।।१५९।।

स्त्रीवेदियों में उपशामक जीव सबसे कम हैं।।१६०।।

स्त्रीवेदियों में उपशामकों से क्षपक जीव संख्यातगुणित हैं।।१६१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्रों का अर्थ सरल है। भावस्त्रीवेदी मुनि श्रेणी में अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण गुणस्थानों में क्षायिकसम्यग्दृष्टि सबसे कम होते हैं, उपशमसम्यग्दृष्टि उनसे संख्यातगुणे अधिक हैं।

सबसे कम उपशामक मुनियों की संख्या है और क्षपक मुनि संख्यातगुणे होते हैं।

शंका-यह सूत्र पुनरुक्त क्यों नहीं है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि यहाँ प्रवेश की अपेक्षा इस सूत्र का अधिकार नहीं है किन्तु संचय की अपेक्षा यहाँ अधिकार है और वह संचय पूर्व में प्ररूपित नहीं किया गया है इसलिए यहाँ उस सूत्र के कहने से पुनरुक्तता का दोष नहीं आता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में भावस्त्रीवेदी जीवों का अल्पबहुत्व बतलाने वाले अठारह सूत्र पूर्ण हुए।

'संप्रति पुरुषवेदेषु गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वकथनाय सूत्रनवकमवतार्यते

संप्रति पुरुषवेदेषु गुणस्थानापेक्षया अल्पबहुत्वकथनाय सूत्रनवकमवतार्यते-पुरिसवेदएसु दोसु अद्धासु उवसमा पवेसणेण तुल्ला थोवा।।१६२।।

खवा संखेज्जगुणा।।१६३।।
अप्पमत्तसंजदा अक्खवा अणुवसमा संखेज्जगुणा।।१६४।।
पमत्तसंजदा संखेज्जगुणा।।१६५।।
संजदासंजदा असंखेज्जगुणा।।१६६।।
सासणसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१६७।।
सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१६८।।
असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१६९।।
मिच्छादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१७०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पुरुषवेदेषु उपशमश्रेण्यां चतु:पंचाशत्प्रमाणा: मुनय: सन्ति। क्षपकश्रेण्यां क्षपका: अष्टोत्तरशतमात्रा: सन्ति। शेषसूत्राणि सुगमानि।
संप्रति एषु एव वेदेषु गुणस्थानापेक्षयाल्पबहुत्वनिरूपणाय सूत्रचतुष्कमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठि-संजदासंजद-पमत्त-अप्पमत्तसंजदट्ठाणे सम्मत्तप्पाबहु-अमोघं।।१७१।।
एवं दोसु अद्धासु।।१७२।।
सव्वत्थोवा उवसमा।।१७३।।
खवा संखेज्जगुणा।।१७४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंयतसम्यग्दृष्ट्यादि-अप्रमत्तगुणस्थानेषु सम्यक्त्वस्याल्पबहुत्वं यथागुणस्थानेषु प्रोत्तंâ तथैव वक्तव्यं। पुन: अपूर्वानिवृत्तिगुणस्थानयो: सर्वस्तोका: उपशमसम्यग्दृष्टय:, क्षायिकसम्यग्दृष्टय: संख्यातगुणा:। सर्वस्तोका: उपशमश्रेण्यारोहका:, क्षपकाश्च तत: संख्यातगुणा: सन्ति।
एवं द्वितीयस्थले पुरुषवेदेषु अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन त्रयोदशसूत्राणि गतानि।
नपुंसकवेदेषु उपशामकाद्यधस्तनमिथ्यादृष्टिपर्यन्तानामल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-णउंसयवेदएसु दोसु अद्धासु उवसमा पवेसणेण तुल्ला थोवा।।१७५।।
खवा संखेज्जगुणा।।१७६।।
अप्पमत्तसंजदा अक्खवा अणुवसमा संखेज्जगुणा।।१७७।।
पमत्तसंजदा संखेज्जगुणा।।१७८।।
संजदासंजदा असंखेज्जगुणा।।१७९।।
सासणसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१८०।।
सम्मामिच्छादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१८१।।
असंजदसम्मादिट्ठी असंखेज्जगुणा।।१८२।।
मिच्छादिट्ठी अणंतगुणा।।१८३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भावनपुंसकवेदिद्रव्यपुरुषवेदेषु द्वयो:गुणस्थानयो: उपशमा: प्रवेशेन तुल्या: स्तोकाश्च, पंचपरिमाणत्वात्। क्षपका: दश परिमाणा: भवन्ति। अप्रमत्तसंयता: संचयराशिपरिग्रहात् संख्यातगुणा:। तत: प्रमत्तसंयता: संख्यातगुणा:। संयतासंयतानां पल्योपमस्य असंख्यातभाग: गुणकार: अत: असंख्यातगुणा:। सासादना: असंख्यातगुणा: अत्र गुणकार: आवलिकाया: असंख्यातभाग:। सम्यग्मिथ्यादृष्टय: संख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: संख्यातसमया:। असंयतसम्यग्दृष्टय: असंख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: आवलिकाया: असंख्यातभाग:। मिथ्यादृष्टयोऽनंतगुणा:, अत्र गुणकार: अभव्यैरनन्तगुण:, सिद्धैरपि अनंतगुण:, यस्तु अनंतानि सर्वजीवराशिप्रथमवर्गमूलानि। तात्पर्यमेतत्-प्रथमगुणस्थानात् पंचमगुणस्थानपर्यंता द्रव्येण नपुंसकवेदिनो भवन्ति किंतु षष्ठगुणस्थानादारभ्य उपरिमा: सर्वे भावनपुंसकवेदिन: द्रव्येण पुरुषवेदा: एव इति ज्ञातव्यं।

अब पुरुषवेदियों में गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व बतलाने हेतु नौ सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

पुरुषवेदियों में अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन दोनों गुणस्थानों में उपशामक जीव प्रवेश की अपेक्षा तुल्य और अल्प हैं।।१६२।।

पुरुषवेदियों में उक्त दोनों गुणस्थानों में उपशामकों से क्षपक जीव संख्यातगुणित हैं।।१६३।।

पुरुषवेदियों में दोनों गुणस्थानों में क्षपकों से अक्षपक और अनुपशामक अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणित हैं।।१६४।।

पुरुषवेदियों में अप्रमत्तसंयतों से प्रमत्तसंयत जीव संख्यातगुणित हैं।।१६५।।

पुरुषवेदियों में अप्रमत्तसंयतों से संयतासंयत जीव असंख्यातगुणित हैं।।१६६।।

पुरुषवेदियों में संयतासंयतों से सासादनसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१६७।।

पुरुषवेदियों में सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१६८।।

पुरुषवेदियों में सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१६९।।

पुरुषवेदियों में असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१७०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पुरुषवेदी मुनियों की संख्या उपशमश्रेणी पर चौवन (५४) होती है। क्षपक श्रेणी में क्षपक मुनियों की संख्या एक सौ आठ (१०८) मात्र है। शेष सूत्र सुगम हैं।

अब इस वेद में गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व निरूपण करने हेतु चार सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

सूत्रार्थ-

पुरुषवेदियों में असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में सम्यक्त्वसंबंधी अल्पबहुत्व गुणस्थान के समान है।।१७१।।

इसी प्रकार पुरुषवेदियों में अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन दोनों गुणस्थानों में सम्यक्त्वसंबंधी अल्पबहुत्व है।।१७२।।

पुरुषवेदियों से उपशामक जीव सबसे कम हैं।।१७३।।

उपशामकों से क्षपक जीव संख्यातगुणित हैं।।१७४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अप्रमत्तसंयत तक गुणस्थानों में सम्यक्त्व का अल्पबहुत्व जैसा गुणस्थानों में पहले कहा गया है वैसा ही यहाँ भी जानना चाहिए। पुन: अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण दोनों गुणस्थानों में सबसे कम उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं, क्षायिकसम्यग्दृष्टि उनसे संख्यातगुणित हैं। उपशमश्रेणी पर चढ़ने वाले मुनियों की संख्या सबसे कम है और क्षपक श्रेणी पर आरोहण करने वाले क्षपक महामुनि उनसे संख्यातगुणे हैं।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में पुरुषवेदी जीवों में अल्पबहुत्व का निरूपण करने वाले तेरह सूत्र पूर्ण हुए।

अब नपुंसकवेदियों में उपशमश्रेणी से लेकर अधस्तन मिथ्यादृष्टि गुणस्थान तक के जीवों का अल्पबहुत्व प्रतिपादन करने हेतु नौ सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

नपुंसकवेदियों में अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन दोनों गुणस्थानों में उपशामक जीव प्रवेश की अपेक्षा तुल्य और अल्प हैं।।१७५।

नपुंसकवेदियों में अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण इन दोनों गुणस्थानों में उपशामकों से क्षपक जीव प्रवेश की अपेक्षा संख्यातगुणित हैं।।१७६।।

नपुंसकवेदियों में क्षपकों से अक्षपक और अनुपशामक अप्रमत्तसंयत जीव संख्यातगुणित हैं।।१७७।।

नपुंसकवेदियों में अप्रमत्तसंयतों से प्रमत्तसंयत जीव संख्यातगुणित हैं।।१७८।।

नपुंसकवेदियों में प्रमत्तसंयतों से संयतासंयत जीव असंख्यातगुणित हैं।।१७९।।

नपुंसकवेदियों में संयतासंयतों से सासादनसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१८०।।

नपुंसकवेदियों में सासादनसम्यग्दृष्टियों से सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१८१।।

नपुंसकवेदियों में सम्यग्मिथ्यादृष्टियों से असंयतसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं।।१८२।।

नपुंसकवेदियों में असंयतसम्यग्दृष्टियों से मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तगुणित हैं।।१८३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भावनपुंसकवेदी, द्रव्यपुरुषवेदी जीवों में आठवें-नवमें दोनों गुणस्थानों में प्रवेश की अपेक्षा उपशमसम्यग्दृष्टि जीव एक समान और सबसे कम हैं, क्योंकि उनका प्रमाण पाँच की संख्यामात्र है। क्षपकों की संख्या दश प्रमाण है। अप्रमत्तसंयत संचयराशि को ग्रहण करने के कारण संख्यातगुणे हैं। प्रमत्तसंयत उनसे संख्यातगुणे हैं। संयतासंयत जीवोें का गुणकार पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है अत: उनकी संख्या असंख्यातगुणी है। सासादनसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं, यहाँ आवली का असंख्यातवाँ भाग गुणकार है। सम्यग्मिथ्यादृष्टि उनसे संख्यातगुणे हैं, यहाँ संख्यात समय गुणकार है।

असंयतसम्यग्दृष्टि उनसे असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है। इनसे अनंतगुणी संख्या मिथ्यादृष्टि जीवों की है, यहाँ अभव्यों से अनन्तगुणा गुणकार है और सिद्धों से भी अनंतगुणा है, जो सर्वजीवराशि के अनन्त प्रथम वर्गमूलप्रमाण है।

तात्पर्य यह है कि प्रथम गुणस्थान से लेकर पंचम गुणस्थान तक द्रव्य से नपुंसकवेदी होते हैं, किन्तु छठे गुणस्थान से लेकर ऊपर के सभी गुणस्थानों में मनुष्य भाव से तो नपुंसक वेदी हो सकते हैं किन्तु द्रव्य से उनके पुरुषवेद ही जानना चाहिए।

अधुना असंयतसम्यग्दृष्टि-आदिगुणस्थानेषु सम्यक्त्वस्याल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते

अधुना असंयतसम्यग्दृष्टि-आदिगुणस्थानेषु सम्यक्त्वस्याल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-असंजदसम्मादिट्ठि-संजदासंजदट्ठाणे सम्मत्तप्पाबहुअमोघं।।१८४।।

पमत्त-अप्पमत्तसंजदट्ठाणे सव्वत्थोवा खइयसम्मादिट्ठी।।१८५।।
उवसमसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१८६।।
वेदगसम्मादिट्ठी संखेज्जगुणा।।१८७।।
एवं दोसु अद्धासु।।१८८।।
सव्वत्थोवा उवसमा।।१८९।।
खवा संखेज्जगुणा।।१९०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंयतसम्यग्दृष्ट्षिु सर्वस्तोका: उपशमसम्यग्दृष्टय:। क्षायिकसम्यग्दृष्टयोऽ-संख्यातगुणा:, अत्र गुणकार: आवलिकाया: असंख्यातभाग:, प्रथमपृथिवीगतक्षायिकसम्यग्दृष्टीनां प्रधानत्वाभ्युपगमात्। वेदकसम्यग्दृष्टय: असंख्यातगुणा:, गुणकार: आवलिकाया: असंख्यातभाग:।
संयतासंयतेषु सर्वस्तोका: क्षायिकसम्यग्दृष्टय:, मनुष्यपर्याप्तनपुंसकवेदिजीवान् मुक्त्वा तेषामन्यत्राभावात्। उपशमसम्यग्दृष्टय: असंख्यातगुणा:, गुणकार: पल्योपमस्यासंख्यातभाग:। वेदकसम्यग्दृष्टयोऽसंख्यातगुणा:, गुणकार: आवलिकाया: असंख्यातभाग:।
प्रमत्ताप्रमत्तयो: सर्वस्तोका: क्षायिकसम्यग्दृष्टय: अप्रशस्तवेदोदयेन बहूनां दर्शनमोहनीयक्षपणाभावात्। शेषे सूत्रे द्वे सुगमे स्त:। द्वयो: श्रेणिगुणस्थानयो: सर्वस्तोका: क्षायिकसम्यग्दृष्टय:, तत: संख्यातगुणा: उपशमसम्यग्दृष्टय:। सर्वस्तोका: उपशामका:, तत: संख्यातगुणा: क्षपका: इति ज्ञातव्या:। एवं तृतीयस्थले नपुंसकवेदिनामल्पबहुत्वं गुणस्थानापेक्षया प्रतिपादनत्वेन षोडशसूत्राणि गतानि।
संप्रति वेदविरहितानां गुणस्थानापेक्षयाल्पबहुत्वप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-अवगदवेदएसु दोसु अद्धासु उवसमा पवेसणेण तुल्ला थोवा।।१९१।।
उवसंतकसायवीदरागछदुमत्था तत्तिया चेव।।१९२।।

खवा संखेज्जगुणा।।१९३।।
खीणकसायवीदरागछदुमत्था तत्तिया चेव।।१९४।।
सजोगिकेवली अजोगिकेवली पवेसणेण दो वि तुल्ला तत्तिया चेव।।१९५।।
सजोगिकेवली अद्धं पडुच्च संखेज्जगुणा।।१९६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-षण्णामपि सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। सयोगिकेवलिन: अयोगिकेवलिनश्च प्रवेशापेक्षया अष्टोत्तरशतप्रमाणा:, संचयापेक्षया पंचशत-अष्टानवतिप्रमाणा: सन्ति। सयोगिकेवलिन: स्वकालेन समुदिता: संख्येयगुणा:-अष्टलक्ष-अष्टानवतिसहस्र-पंचशत-द्विसंख्याप्रमाणा: भवन्ति। एभ्य: सर्वकेवलि-भ्योऽस्माकं नमोऽस्तु अनंतश: इति।
एवं चतुर्थस्थले अपगतवेदिनां अल्पबहुत्वनिरूपणत्वेन षट् सूत्राणि गतानि।
इति षट्खंडागमस्य प्रथमखंडे पंचमग्रंथे अल्पबहुत्वानुगमे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकार: समाप्त:।

अब असंयतसम्यग्दृष्टि आदि गुणस्थानों में सम्यक्त्व का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु सात सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

नपुंसकवेदियों में असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत गुणस्थान में सम्यक्त्व सम्बन्धी अल्पबहुत्व गुणस्थान के समान है।।१८४।।

नपुंसकवेदियों में प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं।।१८५।।

नपुंसकवेदियों में प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टियों से उपशमसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१८६।।

उपशमसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव संख्यातगुणित हैं।।१८७।।

इसी प्रकार नपुंसकवेदियों में अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण, इन दोनों गुणस्थानों में सम्यक्त्वसम्बन्धी अल्पबहुत्व है।।१८८।।

नपुंसकवेदियों में उपशामक जीव सबसे कम हैं।।१८९।।

उपशामकों से क्षपक जीव संख्यातगुणित हैं।।१९०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंयतसम्यग्दृष्टियों में उपशमसम्यदृष्टि सबसे कम हैं। क्षायिकसम्यग्दृष्टि उनसे असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है, क्योंकि यहाँ पर प्रथम पृथिवी के क्षायिक सम्यग्दृष्टि नारकी जीवों की प्रधानता रहती है। वेदकसम्यग्दृष्टि उनसे असंख्यातगुणे हैं, यहाँ गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है।

संयतासंयतों में क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव सबसे कम हैं, क्योंकि मनुष्यपर्याप्त नपुंसकवेदी जीवों को छोड़कर उनका अन्यत्र अभाव है। नपुंसकवेदी संयतासंयत क्षायिकसम्यग्दृष्टि से उपशमसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं। गुणकार पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण है, अर्थात् वह पल्योपम के असंख्यातप्रथम वर्गमूलप्रमाण है। नपुंसकवेदी संयतासंयत उपशमसम्यग्दृष्टियों से वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंख्यातगुणित हैं। गुणकार आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण है।

प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थान में क्षायिकसम्यग्दृष्टि सबसे कम हैं, क्योंकि अप्रशस्त वेद के उदय के साथ दर्शनमोहनीय कर्म के क्षपण करने वाले बहुत जीवों का वहाँ अभाव पाया जाता है।

शेष दो सूत्रों का अर्थ सुगम है। दोनों श्रेणी वाले गुणस्थानों में सबसे कम क्षायिक सम्यग्दृष्टि होते हैं, उनसे संख्यातगुणे उपशमसम्यग्दृष्टि होते हैं।

उपशमश्रेणी पर चढ़ने वाले उपशामक मुनि सबसे कम हैं, उनसे संख्यातगुणे क्षपकश्रेणी पर चढ़ने वाले मुनियों की संख्या होती है ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में नपुंसकवेदियों का गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व बतलाने वाले सोलह सूत्र पूर्ण हुए।

अब वेदरहित-अपगतवेदी जीवों का गुणस्थान की अपेक्षा अल्पबहुत्व प्रतिपादित करने हेतु छह सूत्र अवतरित हो रहे हैं-

अपगतवेदियों में अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्पराय इन दोनों गुणस्थानों में उपशामक जीव प्रवेश की अपेक्षा तुल्य और अल्प हैं।।१९१।।

उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थ जीव पूर्वोक्त प्रमाण ही हैं।।१९२।।

अपगतवेदियों में उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थों से क्षपक जीव संख्यातगुणित हैं।।१९३।।

अपगतवेदियों में क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थ पूर्वोक्त प्रमाण ही हैं।।१९४।।

सयोगिकेवली और अयोगिकेवली ये दोनों प्रवेश की अपेक्षा तुल्य और पूर्वोक्त प्रमाण ही हैं।।१९५।।

सयोगिकेवली संचयकाल की अपेक्षा संख्यातगुणित हैं।।१९६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त छहों सूत्रों का अर्थ सरल है। सयोगिकेवली और अयोगिकेवली जिनेन्द्र प्रवेश की अपेक्षा एक सौ आठ संख्याप्रमाण हैं। संचय की अपेक्षा यह संख्या पाँच सौ अट्ठानवे (५९८) प्रमाण है। सयोगिकेवली अपने काल की अपेक्षा समुदायरूप से संख्यातगुणे हैं-आठ लाख अट्ठानवे हजार पाँच सौ दो (८,९८,५०२) संख्याप्रमाण हैं। उन सभी केवली भगवन्तों को मेरा अनंत बार नमस्कार होवे।

इस तरह से चतुर्थस्थल में अपगतवेदियों का अल्पबहुत्व का निरूपण करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में पंचम ग्रंथ के अल्पबहुत्वानुगम प्रकरण में गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिन्तामणि टीका में वेदमार्गणा नामका पंचम अधिकार समाप्त हुआ।