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०५ - पंचम अध्याय

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विषय सूची

तत्त्वार्थ सूत्र प्रवचन

पंचम अध्याय

—मंगलाचरण—
प्रवचन कर्त्री -आर्यिका चंदनामती माताजी
मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्।

ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुण लब्धये।।
सिद्र्धेधाममहारिमोहहननं कीर्ते: परं मंदिरम्।
मिथ्यात्वप्रतिपक्षमक्षयसुखं संशीतिविध्वंसनम्।।
सर्वप्राणिहितं प्रभेन्दुभवनं सिद्धिप्रमालक्षणम्।

संतश्चेतसि चिन्तयंतु सुधिय: श्रीवर्धमानं जिनम्।।

आज तत्त्वार्थ सूत्र की पंचम अध्याय का अध्ययन करना है। इन अध्यायों के माध्यम से आचार्य उमास्वामी ने सात तत्त्वों का निरूपण किया है। प्रारम्भ में मैंने बताया था कि पूरे तत्त्वार्थसूत्र में ३५७ सूत्र हैं जो कि दिगम्बर परम्परा के अनुसार हैं और श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार उन्होंने ३४४ सूत्र माने हैं। इनमें सात तत्त्वों में एक जीव तत्त्व का वर्णन चार अध्यायों के माध्यम से किया इसलिये जीवतत्त्व की विलक्षणता हम समझ सकते हैं। पाँचवीं अध्याय में अजीव तत्त्व का वर्णन है। एक प्रश्न उठता है कि जीव और अजीव तत्त्व में ज्यादा महिमा किसकी है। आज अपने को ज्यादा क्या दिखता है तो उत्तर मिलता है आज जितना कुछ दिख रहा है सब अजीव तत्त्व की महिमा है। मैंने एक सज्जन से पूछा तो बोले—माताजी! आज कम्प्यूटर का निर्माण हुआ है वह भी अजीव है, मिसाइल, एटमबम का निर्माण हुआ वह सब अजीव है अत: ज्यादा महिमा अजीव की ही दिखती है। मगर भैय्या, महिमा तो जीव की ही है असलियत तो यह है कि जब जीव और अजीव दोनों मिलते हैं तो उसकी महिमा का प्रदर्शन होता है। अकेला जीव अपनी महिमा का वर्णन स्वयं नहीं कर सकता, उसकी महिमा तो अपने में ही समाहित हो जाती है अकेला अजीव कुछ भी नहीं कर सकता है जब दोनों का परस्पर में सम्बन्ध होता है तभी संसार चलता है, तभी खोज— अन्वेषण होता है और तभी कुछ अलग दिखता है इसी का मिला-जुला रूप ही संसार कहलाता है।

हमारे ऋषि-मुनियों ने, आचार्यों ने अपने तत्त्वज्ञान, चिंतन और मनन के आधार पर हमें सुन्दर-सुन्दर शास्त्र—ग्रन्थ दिये हैं जिन्हें पढ़-सुनकर हम आनन्दित होते हैं।

जब एक छोटा-सा बच्चा प्रारम्भ में स्कूल जाता है, स्कूल से चिड़ियों की कविता सीख कर आता है उसे चित्र के माध्यम से बताया जाता है कि बेटा! यह चिड़िया है, ये डाल पर बैठी है। स्कूल से आने पर जब वह बताता है तो आप कितने हर्षित होते हैं कि मेरा बेटा कुछ सीख गया। जब वह थोड़ा और आगे बढ़ता है तब वह नहीं पढ़ता, चिड़ियों की कविताएँ नहीं सुनाता, जब उसका ज्ञान थोड़ा और आगे बढ़ता है तो वह कुछ अच्छी कविता याद करता है। धीरे-धीरे आगे बढ़ता हुआ वही बालक, जिसके अन्दर शक्तिरूप ज्ञान छिपा था, अपनी योग्यता के आधार पर चिंतन-अध्ययन करता है, तत्त्वज्ञानी बनता है, वैज्ञानिक, ऋषि-मुनि, दार्शनिक बन जाता है। कब ? जब वह क्रम से पढ़ता हुआ, क्लास को अटेन्ड कर अपनी परीक्षा में उत्तीण होता है, अपने लक्ष्य की सिद्धि कर लेता है तो उसको भी आनन्द होता है और उसके परिवार वालों को भी आनन्द होता है। ठीक उसी प्रकार से हमारे सन्तों ने, ऋषि-मुनियों ने हमें जो ग्रन्थ दिये हैं हमें भी उसे पढ़ने की कला सीखनी पड़ेगी। हम कैसे पढ़ें कि वह ज्ञान हमारे अन्दर अवतरित हो जाए, हम कैसे सीखें कि आगे आने वाले समय में भूलने नहीं पाएं, हम कैसे याद रखें कि हमारा वह ज्ञान सम्यग्ज्ञान बना रहे, मिथ्याज्ञान नहीं बनने पाएं वरना आज शास्त्र की बात पढ़ी और कल उससे उल्टी कुछ बात देख ली तो श्रद्धान परिवर्तित हो गया, सम्यग्ज्ञान से आपका ज्ञान मिथ्याज्ञान हो गया। बन्धुओं! श्रद्धान ऐसा करना जिसके बाद कोई अश्रद्धान न हो, ज्ञान ऐसा प्राप्त करना जिसके बाद कभी अज्ञान न हो, सुख ऐसा प्राप्त करना कि सुख के बाद कभी दु:ख की प्राप्ति न हो। वास्तव में वही ज्ञान, वही सुख, वही तत्त्वज्ञान प्राप्त करना हमारे लिये कार्यकारी होता है। रामचन्द्र के जीवन की एक घटना याद आती है कि सीता ने बचपन से कितना तत्त्वज्ञान संचित किया था।

कहते हैं कि जब कृतान्तवक्र सेनापति को रामचन्द्र ने सीता को वन में छोड़ने की आज्ञा दी तब वह सीता को तीर्थयात्रा के बहाने ले गए और घने जंगल के बीच में ले जाकर सीता को उतार दिया कि राम की यही आज्ञा है। सीता ने कहा कि मेरे साथ ऐसा धोखा क्यों किया गया ? मैं गर्भवती हूँ। कहीं इस जंगल के अन्दर कोई चीता, बाघ आ गया तो मेरे साथ-साथ दो और जीवों की हत्या होगी, ऐसा कहकर वह करुण विलाप करने लगी लेकिन थोड़ा विलाप करने के बाद उसका तत्त्वज्ञान जागृत हो जाता है। उधर कृतान्तवक्र सेनापति उसकी इस दशा को देखकर बहुत दु:खी होता है और सोचता है—अहो! इस सीता के कर्मों की गति कैसी विचित्र है, महलों में पली-बढ़ी यह सीता जैसे ही विवाह करके आई, राम के साथ उसे वनवास जाना पड़ा। राजमहल के सुखों का त्यागकर वनवास भी गयी, वहाँ भी प्रकृति ने उसे चैन से नहीं रहने दिया। रावण की दृष्टि खराब हो गयी, उसने उसका अपहरण कर लिया कितना मानसिक दु:ख सहना पड़ा उसे, रामचन्द्र से बिछुड़कर रावण के महल में जाकर उसने ११-११ उपवास कर लिए कि जब तक रामचन्द्र का समाचार नहीं मिलेगा, अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगी, ऐसा मेरा नियम है। आई थी राजमहल से, पट्टरानी बनने जा रही थी और कहाँ क्या हो गया ? किसी तरह रामचन्द्र युद्ध करके लाए भी तो एक धोबी के कहने मात्र से, जनता के अपवाद मात्र से उसे जंगल में निकाल दिया, उसके बाद भी मैं कुछ नहीं कर सकता। उसने माता सीता से कहा—‘‘हे देवी! हे माता! मैं तो िंककर मात्र हूँ, मैं आपके लिये कुछ भी नहीं कर सकता लेकिन इतना जरूर है कि आप कोई सन्देश प्रभु राम के लिये देवें तो मैं अवश्य ही उन तक पहुँचा दूँगा। तब सीता जो अत्यन्त दु:खी थीं, बोलीं—हे सेनापति! आप राम से मेरा एक ही संदेश कह देना कि जिस प्रकार लोकापवाद के भय से आपने अपनी पत्नी को छोड़ दिया है, कभी ऐसा अवसर आने पर धर्म को मत छोड़ देना, मेरा मात्र इतना ही सन्देश है। आप उनसे यह मत कहना कि वह जंगल में दु:खी थी अथवा रो रही थी। यह सुनकर कृतान्तवक्र दु:खी मन से विलाप करने लगा और पुन:-पुन: सीता को देखते हुये लौट गया।

ऐसी थी वह सीता! धन्य है वह देवी, जिसने घर में रहकर भी इतना तत्त्वज्ञान प्राप्त किया था कि दु:ख के क्षण आने पर वह विचलित नहीं हुई। आज भी लोग अपनी बेटी को पढ़ाते हैं भले ही वह गरीब हों, शायद इसलिये कि मेरी बेटी पर कभी संकट आ जाये तो वह उसका सामना कर सके, उसकी हिम्मत न टूटे लेकिन बी.ए., एम.ए., एम. एस. सी., ग्रेजुएट आदि होने के बाद भी क्या वह सीता बन सकती है ? क्या आज किसी लड़की में इतना धैर्य आ सकता है ? मैं तो कहती हूँ कि अगर आज ऐसा राम पैदा हो जाए तो वह सीता कोर्ट का दरवाजा खटखटाने लगती है, वह नहीं सहन करने वाली है, आज का राम तो सीता के पीछे-पीछे घूमता है। उस सीता ने कर्मसिद्धान्त के बल पर किस प्रकार के दु:ख सहन किए, कहाँ तक उसकी कहानी सुनाई जाए। वहाँ से आने के बाद जब राम का पुन: मिलन हुआ तो लोकापवाद के भय से ही राम ने उसकी अग्निपरीक्षा ली। नारद ने उन्हें बहुत समझाया, लक्ष्मण ने समझाया, लव-कुश ने समझाया कि सीता निर्दोष है लेकिन राम ने कहा कि अग्निपरीक्षा दिये बिना सीता को मेरे महल में जाने का अधिकार नहीं है, आखिर अग्निपरीक्षा हुई और अग्नि जलमयी सरोवर बन गया। सती सीता के शील की परीक्षा तो हो गयी लेकिन उसे वास्तविक तत्त्वज्ञान हो गया था। उधर राम भी जानते थे कि मेरी सीता निर्दोष है लेकिन जनता को दिखाने के लिये उन्होंने सीता की अग्निपरीक्षा ले डाली।

इधर तत्त्वज्ञान होते ही सीता राम से कहती है—हे राम! तुम्हारा कोई दोष नहीं है, तुम विवाह के पहले कितने सुखी थे। मैं तुम्हारे जीवन में आई और तुमको वनवास जाना पड़ा, रावण से मेरे लिए संघर्ष झेलने पड़े, फिर जनता का अपवाद झेलना पड़ा, इनके पीछे मैं निमित्त हूँ और मेरा कर्मसिद्धान्त है जो मुझे कष्ट दे रहा है आपने मुझे कोई कष्ट नहीं दिया। अब मैंने संसार को पहचान लिया है अत: अब मैं महल में नहीं जाना चाहती हूँ मैं अपनी आत्मा के महल को प्राप्त करना चाहती हूँ। रामचन्द्र कहते हैं—हे सीते! ऐसा मत कहो। मुझे क्षमा करो। तुम महल में वापस चलो, वहाँ की पट्टरानी बनकर रहना और मेरे ऊपर भी साम्राज्य करना लेकिन सीता एक बात भी नहीं सुनती और केशलोंच करके बाल उखाड़ कर राम के हाथों में रख देती है। राम मूर्छित हो जाते हैं, उसने उसका भी ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसे वास्तविक वैराग्य हो गया था। राम को होश आवे इससे पूर्व ही वह महेन्द्रोदय उद्यान में जाकर पृथ्वीमती आर्यिका माताजी से दीक्षा ले लेती है। वह दशरथ की माता और सीता की दादी सासु थीं जो पृथ्वीमती माताजी बन गयीं थीं। वैदिक रामायण में माना जाता है कि सीता पृथ्वी में समा गयीं। अरे! जो पापी होते हैं वह पृथ्वी में समाते हैं न कि सती। शब्द के अर्थ का थोड़ा-सा अनर्थ हो गया। फर्वâ इतना था कि सीता पृथ्वीमती माताजी की गोद में समा गर्इं अर्थात् अपने को समर्पित कर दिया। यह सब उसने कैसे किया ? तत्त्वचिंतन के बल पर, उसके द्वारा उसने अपनी आत्मा को परमात्मा बना लिया और राम ने आकर उन्हें नमस्कार करके उनकी बारम्बार स्तुति की।

आपको भी जैन रामायण का अध्ययन करना है और इन शास्त्रों के स्वाध्याय के बल पर इन सभी बातों को समझना है कि सीता ने भी जीव, अजीवादि द्रव्यों का अध्ययन किया था लेकिन बाद में उनमें विलक्षण जीवतत्त्व को ही जाना और तत्त्वज्ञान के बल पर की गयी अनुभूति से वह अपना कल्याण करने में सक्षम हुर्इं थीं।

मैं आज आपको उसी अजीव तत्त्व का व्याख्यान करने वाले पंचम अध्याय की ओर ले चलती हूँ जहाँ आचार्य उमास्वामी ने अजीव तत्त्व का व्याख्यान करते हुए सारांश रूप में यह बताया है कि जीव और अजीव के माध्यम से, इन दोनों के संयोग से जो संसार चलता है, संसार का परिभ्रमण होता है हमें इन दोनों को पुरुषार्थ के बल पर अलग करना है।

पंचम अध्याय में प्रथम सूत्र का अवतरण करते हुए श्री उमास्वामी आचार्य कहते हैं—

अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गला:।।१।।

अर्थधर्म, अधर्म, आकाश और पुद्गल ये चार अजीव तथा बहुप्रदेशी हैं। अजीव के चार भेद होते हैं—धर्म, अधर्म, आकाश और काल। अजीव और पुद्गल में क्या अन्तर है ? अजीव इन चार भेद वाला होता है और पुद्गल एक भेद वाला होता है। अजीव का भेद पुद्गल है अर्थात् जिसके अन्दर पूरण-गलन स्वभाव पाया जाये, वह पुद्गल कहलाता है। पुद्गल अजीव रूप है लेकिन सारे अजीव पुद्गल रूप हों यह बात नहीं है।

अहमदाबाद के शिविर में द्रव्य संग्रह की कक्षा चलती थी, मैं उसका प्रतिपादन करती थी। जब एक दिन मैं वहाँ अजीव और पुद्गल का प्रतिपादन करने लगी, वहाँ एक आर्यिका माताजी भी विराजमान थीं, बोलीं—जीवन में पहली बार मैंने सुना है कि अजीव और पुद्गल में भेद होता है। यह बात आप लोगों को भी जानना है कि पुद्गल अजीव है लेकिन सारा अजीव पुद्गल नहीं है। अधर्म द्रव्य अजीव है लेकिन वह पुद्गल नहीं है, धर्म द्रव्य अजीव है पर वह पुद्गल नहीं है, काल द्रव्य अजीव है लेकिन वह पुद्गल नहीं है, आकाश द्रव्य अजीव है लेकिन वह भी पुद्गल नहीं है। जिसमें केवल पूरण-गलन स्वभाव पाया जाता है वह कहलाता है पुद्गल/अजीव तो और भी हो सकते हैं जिसमें मात्र चेतना नहीं होती है वह अजीव कहलाता है। यह अपना हाड़-माँस पुद्गल है। पूरण-गलन अर्थात् पहले बना है फिर उसके परमाणु विकसित हुए हैं और उसके बाद उसका गलन हो जायेगा। इन सबके भीतर हमारी चैतन्य आत्मा विराजमान है।

मूलत: द्रव्य छह हैं, उनमें ५ अजीव हैं मात्र एक द्रव्य जीव है तथा ६ द्रव्यों में ५ द्रव्य अस्तिकाय हैं और एक काल द्रव्य अस्तिकाय नहीं है अत: जीवद्रव्य काय रूप है किन्तु अजीव नहीं है और कालद्रव्य अजीव है किन्तु कायरूप नहीं है इसलिये जीव और काल के अतिरिक्त शेष ४ द्रव्य अजीव भी हैं और काय भी हैं।

इनमें से यदि धर्मद्रव्य न हो तो सभी वस्तुएँ एक ही स्थान पर स्थिर हो जायेंगी, गमन करते हुए जीव और पुद्गल को चलने में जो सहकारी हो वह धर्म द्रव्य है। जो जीव और पुद्गल को ठहरने में सहकारी हो वह अधर्म द्रव्य है, यदि यह न हो तो सब वस्तुएँ चलती ही रहेंगी। समस्त द्रव्यों को अवकाश देने में जो सहायक द्रव्य हो उसे आकाश कहते हैं, जो ऊपर नीला-नीला दिखता है, हम उसे आकाश कहते हैं लेकिन वह तो पुद्गल वायुकाय है, आकाश तो एक अखण्ड सर्वव्यापी पदार्थ है, अमूर्त है, लोक-अलोक में सब जगह व्याप्त है और जिसमें रूप, रस, गंध और स्पर्श के गुण पाये जाते हैं उसे पुद्गल द्रव्य कहते हैं। पुद्गल द्रव्य एकप्रदेशी है पर उसमें दूसरे पुद्गलों के साथ मिलने की और बहुप्रदेशी होने की शक्ति है इसीलिए उसे काय संज्ञा दी है।

द्रव्यों की गणना करते हुए कहते हैं—

द्रव्याणि।।२।।

अर्थ उक्त चार पदार्थ द्रव्य हैं।

जो त्रिकाल अपने गुण पर्याय को प्राप्त होता है उसे द्रव्य कहते हैं। पदार्थ परिवर्तनशील होकर भी अनादिनिधन हैं। हाँ, द्रव्यों में जो परिणमन होता है वह अपने-अपने रूप ही होता है। जो धर्मादिक बताए हैं ये सब द्रव्य हैं अर्थात् मूल में द्रव्य के दो भेद हैं और अन्य भेद से छह भेद हो जाते हैं—जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। अब चूँकि अजीव द्रव्य की बात चल रही थी इसलिये अजीव के चार भेद बताए थे और आकाश समेत उसके ५ भेद हो गए थे।

जीव द्रव्य के लिए बताते हुए आचार्य श्री ने कहा है—

जीवाश्च।।३।।

अर्थजीव भी द्रव्य है।

जीव भी द्रव्य है और बहुप्रदेशी है, उन सबकी अलग-अलग सत्ता है। वे संसारी-मुक्त, त्रस-स्थावर आदि अनेक प्रकार के हैं। जो ५ द्रव्य बताए गए हैं इनमें एक जीव चेतन और शेष ४ अजीव—अचेतन हैं। चूँकि यह सब हैं अर्थात् इनका अस्तित्व है और यह पाँचों ही बहुप्रदेशी हैं अत: इन पाँचों को पंचास्तिकाय कहा है।

द्रव्यों की विशेषता बताते हुए कहते हैं—

नित्यावस्थितान्यरूपाणि।।४।।

अर्थऊपर कहे हुए सभी द्रव्य नित्य, अवस्थित और अरूपी हैं। जिस द्रव्य का जो स्वभाव है वह सदैव बना रहता है, ये द्रव्य कभी नष्ट नहीं होते इसलिये नित्य हैं, इनकी संख्या भी निश्चित है अत: अवस्थित हैं और रूप, रस, गंध, स्पर्श से रहित हैं अत: अरूपी हैं।

अब प्रश्न उठा कि पुद्गल द्रव्य तो अलग से दिखाई देता है तो आचार्य ने उसका भी समाधान करते हुए कहा कि—

रूपिण: पुद्गला:।।५।।

अर्थपुद्गल द्रव्य रूपी—अमूर्तिक है।

पुद्गल द्रव्य रूपी अर्थात् मूर्तिक है और बाकी द्रव्य अरूपी हैं, चूँकि उसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श पाया जाता है। इस लोक में जितने भी पदार्थ दिखाई देते हैं वह सभी रूपी हैं, इन्द्रियों से जाने जाते हैं, मूर्तिक हैं, जैसे—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति। र्इंट, पत्थर, महल, झोंपड़ी, खेत-खलिहान और साथ में यह शरीर भी पुद्गल है, अजीव पदार्थ है। इस पुद्गल के दो प्रकार हैं—१. अणु अर्थात् परमाणु, २. स्वंध। जिसका दूसरा हिस्सा न किया जा सके वह अणु कहलाता है। यह पुद्गल द्रव्य का सबसे छोटा अविभागी कण है, इसलिये इन्द्रियों द्वारा न दिखने पर भी उसमें असाधारण पौद्गलिक गुण रूप, रस, गंध, स्पर्श सदैव विद्यमान रहे हैं। पुद्गल के इन ४ गुणों के २० भेद हो जाते हैं, जिसमें स्पर्श के ८ भेद हैं—हल्का, भारी, कड़ा, नरम, रूखा, चिकना, ठण्डा, गरम। रस के ५ भेद हैं—खट्टा, मीठा, कड़ुआ, चरपरा और कषायला। गंध दो प्रकार की होती है—सुगंध और दुर्गन्ध एवं वर्ण के ५ भेद हैं—काला, नीला, पीला, लाल और सफेद।

आज के विज्ञान ने भी परमाणु में दो तत्त्व माने हैं—इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन। इन्हीं दो प्रकार के परमाणु तत्त्वों से पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु बनते हैं। यह चारों भिन्न-भिन्न पदार्थ नहीं हैं। पुद्गल परमाणुओं का एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन हुआ करता है जैसे मिट्टी के परमाणु में से जल होता है, पानी से बिजली-अग्नि होती है, वायु के मिश्रण से जल होता है। अणु का आकार समषट्कोण घन—ठोस पुद्गल द्रव्य कहा है, फिर भी अणु का आदि, मध्य एवं अन्त नहीं है। अणुओं के समूहरूप पिण्ड को स्कंध कहते हैं, अणुओं की हीनाधिकता से स्कं]ध के छह भेद हैं जिसमें—१. स्थूल-स्थूल अर्थात् जिसका छेदन-भेदन हो सके और अन्य पदार्थ की सहायता से ही जुड़े, जैसे—लकड़ी, र्इंट, कागज, कपड़ा आदि। २. स्थूल—बहने वाले वे द्रव्य पदार्थ जिनका छेदन-भेदन तो हो किन्तु मिलाया जाए तो एकमेक हो जावें, जैसे—तेल, पानी, दूध आदि। ३. स्थूलसूक्ष्म—जिसका छेदन-भेदन हो जाए, जैसे—छाया, धूप, चाँदनी आदि। ४. सूक्ष्मस्थूल—जो आँखों से तो दिखे किन्तु स्पर्शन, रसना, घ्राण और कर्ण इन चार इन्द्रियों द्वारा जाने जा सकें, जैसे—रस, गंध, शब्द आदि। ५. सूक्ष्म—जिसका इन्द्रियों द्वारा भी ग्रहण न हो सके जैसे—कार्माण वर्गणा। ६. सूक्ष्मसूक्ष्म—इसमें अविभागी पुद्गल परमाणु आएगा। पुद्गल किसे कहते हैं ? ‘पूरयन्ति गलयन्ति इति पुद्गला:’ अर्थात् जिसमें पूरण-गलन स्वभाव पाया जावे वह पुद्गल है। पुद् ± गल · मिल जाना और बिछुड़ जाना। आज जो परमाणु बम बनाया जा रहा है वह अणुओं का समूह है न कि एक अणु-परमाणु। द्रव्यों के स्वभेद की गणना करते हुए कहते हैं—

आ आकाशादेक द्रव्याणि।।६।।

अर्थ आकाशपर्यन्त सभी द्रव्य १-१ हैं अर्थात् धर्म, अधर्म और आकाश द्रव्य १-१ ही हैं, जीवद्रव्य अनन्त हैं। पुद्गल द्रव्य अनंतानंत हैं और काल द्रव्य असंख्यात माने गये हैं।

इन तीनों द्रव्यों को एक-एक बतलाने से यह स्पष्ट है कि बाकी के द्रव्य अनेक हैं। जैन सिद्धान्त में बताया है कि जीव द्रव्य अनंतानंत हैं क्योंकि प्रत्येक जीव एक स्वतन्त्र द्रव्य है, जीवों से अनंतगुणे पुद्गल द्रव्य हैं क्योंकि एक-एक जीव के उपभोग में अनंत पुद्गल द्रव्य हैं। कालद्रव्य असंख्यात हैं क्योंकि लोकाकाश के असंख्यात प्रदेश हैं और एक-एक प्रदेश पर एक-एक कालाणु स्थित रहता है तथा धर्म, अधर्म और आकाश द्रव्य एक-एक हैं। विशेष बात यह है कि एकत्व की अपेक्षा धर्म, अधर्म और आकाश में समानता है। अनेकत्व की अपेक्षा जीव, पुद्गल और काल में समानता है और एकत्व-अनेकत्व पहले तीनों की दूसरे तीनों से भिन्नता है।

धर्मादिक तीन द्रव्यों की निष्क्रियता के बारे में बताते हैं—

निष्क्रियाणि च।।७।।

अर्थ धर्म, अधर्म और आकाश ये तीनों द्रव्य क्रियारहित हैं अर्थात् धर्म, अधर्म और आकाश द्रव्य तीनों ही क्रियारहित होते हैं स्वयमेव क्रिया नहीं करते, ये एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्वयं नहीं जाते, निष्क्रिय होते हैं। इनमें दूसरे का कुछ न कुछ निमित्त बनता है उसमें वे सहायक बन जाते हैं और उनमें से भी धर्म और अधर्म द्रव्य को सहायक मान लेते हैं बाकी स्वयं ये कोई कार्य नहीं करते हैं। उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप अवस्थाएं छहों द्रव्यों में होती हैं किन्तु क्रिया संसारी जीव और पुद्गल इन दो में ही होती है इसलिये इन दो द्रव्यों के अतिरिक्त शेष द्रव्यों को निष्क्रिय कहा है। धर्म और अधर्म द्रव्य समस्त लोकाकाश में व्याप्त हैं तथा आकाश द्रव्य लोक और अलोक दोनों जगह व्याप्त है इसलिये अन्य क्षेत्र का अभाव होने से इनमें क्रिया नहीं होती। एक स्थान से दूसरे स्थान को प्राप्त होने को क्रिया कहते हैं।

द्रव्यों के प्रदेशों का वर्णन करते हुए बताया है—

असंख्येया: प्रदेशा धर्माधर्मैकजीवानाम्।।८।।

अर्थधर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य और एक जीवद्रव्य इनमें से प्रत्येक के असंख्यात-असंख्यात प्रदेश होते हैं।

जितने क्षेत्र को पुद्गल का एक परमाणु रोकता है उस स्थान को प्रदेश कहते हैं वह बहुत सूक्ष्म है हमारे चक्षुगम्य नहीं है केवलीगम्य है। धर्म द्रव्य और अधर्म द्रव्य तो निष्क्रिय हैं और समस्त लोकाकाश में व्याप्त हैं अत: लोकाकाश के असंख्यात प्रदेशों में व्याप्त होने से वे दोनों असंख्यात-असंख्यात प्रदेशी हैं। जीव भी उतने ही प्रदेशी हैं किन्तु उसका स्वभाव संकुचन और फैलने का है, नामकर्म के उदय से जिस जीव को जितना बड़ा अथवा जितना छोटा शरीर प्राप्त होता है वह उतने में फैल जाता है। इसमें सबसे छोटी अवगाहना वाला जीव ऋजुगति जन्म से तीसरे समय वाला लब्ध अपर्याप्तक निगोदिया है जो जघन्य असंख्यात प्रदेशी है और जब केवलज्ञान प्राप्त करके यही जीव लोकपूरण समुद्घात करता है तब यह समस्त लोकाकाश में व्याप्त हो जाता है अत: वह भी उत्कृष्ट असंख्यात प्रदेशी ही है। शेष बीच की अवगाहना वाले जीव मध्यम असंख्यात प्रदेशी हैं।

अब आकाश द्रव्य के प्रदेश को बताते हैं—

आकाशस्यानन्ता:।।९।।

अर्थ आकाश के अनंत प्रदेश हैं परन्तु लोकाकाश के असंख्यात ही हैं। आकाश द्रव्य के अनंत प्रदेश हैं लेकिन यहाँ आकाश द्रव्य से मतलब है—लोकाकाश और अलोकाकाश। जहाँ पर छहों द्रव्य हों वह लोकाकाश और जहाँ केवल एक आकाश द्रव्य हो वह अलोकाकाश है। लोकाकाश को जब लेंगे तो तीन लोक के अन्दर जितना आकाश है वह असंख्यात प्रदेशी है और बाहर का जो लोकाकाश है उसको मिला लेंगे तो अनंत प्रदेशी है।

पुद्गल द्रव्य के प्रदेश को बताया है—

संख्येयाऽसंख्येयाश्च पुद्गलानाम्।।१०।।

अर्थ पुद्गल द्रव्यों के संख्यात, असंख्यात और अनंत प्रदेश होते हैं। शुद्ध पुद्गल द्रव्य तो एक अविभागी परमाणु है जिसका कि दूसरा हिस्सा नहीं हो सकता है किन्तु परमाणुओं में इतनी शक्ति है कि वह बंध भी सकते हैं और बिछुड़ भी सकते हैं अत: परमाणुओं के मिलने से स्वंध बनता है, कोई स्वंध दो परमाणु से, कोई तीन, कोई संख्यात और कोई असंख्यात परमाणुओं के मिलने से बनता है। उसी हिसाब से कोई स्वंध संख्यातप्रदेशी, कोई असंख्यात और कोई अनंतप्रदेशी होता है। जैसे—एक कमरे में एक दीपक का प्रकाश भी रहता है, सैकड़ों दीपकों का प्रकाश भी रह सकता है। छोटे से गुलाब की खुशबू बहुत दूर तक फैल जाती है, बहुत बड़ी वायु के कण एक-दूसरे में समाकर छोटे से साइकिल आदि के ट्यूब में एक स्थान में आ जाते हैं। एक्स-रे मशीन से निकली किरण शरीर के आर-पार हो जाती है और सामने की प्लेट पर उस शरीर का फोटो आ जाता है आदि-आदि।

अब परमाणु के प्रदेश बताये हैं—

नाणो:।।११।।

अर्थ पुद्गल परमाणु के दो आदिक प्रदेश (खण्ड) नहीं होते अर्थात् वह एकप्रदेशी ही है।

जैसे आज परमाणु बम है उसे वैज्ञानिकों ने शक्ति की अपेक्षा परमाणु बम की संज्ञा दे दी है लेकिन जैन सिद्धान्त की भाषा में वह स्कन्ध का रूप है क्योंकि वह दिखता है। पुद्गल का परमाणु हमें दिख नहीं सकता। जिसका दूसरा हिस्सा ही नहीं किया जा सके, दूसरा खण्ड न हो सके वह परमाणु है। एक अणु के अन्दर १४ राजू गमन करने की शक्ति होती है, उसी शक्ति की अपेक्षा आज पुद्गल के परमाणुओं को एकत्रित करके बम बना दिया गया है। कहते हैं कि एक परमाणु बम को दबाने से आधी दुनिया एक साथ नष्ट हो सकती है। यह सब परमाणुओं के अन्दर विद्युत्शक्ति का प्रवाह है, उस विद्युत्शक्ति का परीक्षण करके जब एकत्रीकरण किया गया, स्कन्ध का रूप दे दिया गया तो उसको वैज्ञानिकों ने परमाणु बम बना दिया जो विश्व के लिये विनाशकारी सिद्ध हुआ है। यह अणु, परमाणु, जीव-अजीव, इन सबको बताने का आचार्यों का मतलब यह नहीं है कि आप इसके द्वारा भौतिकता का वातावरण पैदा करके अपने लिये ही विनाश की स्थिति उत्पन्न कर लें लेकिन आज वैज्ञानिक तो आध्यात्मिक ज्ञान से रहित होकर लौकिक ज्ञान की ओर बढ़ गए हैं और भौतिकता की चकाचौंध के अन्दर फसकर आज हम भी उन्हीं चीजों में, उन्हीं कम्प्यूटर, मिसाइल में, उन्हीं परमाणुओं में और उन्हीं तोप आदि के युग में घुल-मिल गये हैं जिससे कि हम भी अपनी आत्मा के ज्ञान से शून्य हैं। शारीरिक सौन्दर्य, पंचेन्द्रिय विषय भोगों की कामना, धन कमाने की इच्छा, परिवार का पोषण, अपनी स्वार्थपरता आदि में मानव इतना लिप्त है कि आत्मा नाम की चीज क्या है ? वह नहीं जानता। इसलिये एक कवि ने कहा—

भौतिकता की चकाचौंध में, मानव निज को भूल गया है।

दुनिया की झूठी माया और, वैभव में ही फूल गया है।।
क्षणभंगुर लक्ष्मी की खातिर, मानवता भी आज रो रही।
दुनिया की हर साँसों में, हिंसा अधर्म की बात हो रही।।
फिर हम क्या करें ? तो उसी ने फिर प्रेरणा दी है—
वीतराग गुरुओं की वाणी, सुनकर अपनी प्यास बुझाओ।
त्याग और संयम की ज्योती, अपने जीवन में चमकाओ।।
वीतरागता ही प्राणी के, उन्नति की आधारशिला है।

कथनी को करनी में बदलो, शुभ अवसर यह आज मिला है।।

समयसार कह गया, नियमसार कह गया, कुन्दकुन्द स्वामी कह गए लेकिन जिस प्रकार उन्होंने कथनी को अपनी आत्मा के अन्दर उतारा उस प्रकार से हमको भी उतारने की आवश्यकता है केवल कहने से कुछ होने वाला नहीं है। सर्वप्रथम हमें अपना उद्धार करना है, जग के उद्धार की बात तो जाने दीजिये जैनधर्म तो आत्महित की प्राथमिक बात करता है हमें आत्महित की ओर जागृत होना है। ऐसा तो नहीं है कि कहीं हम आत्महित को छोड़कर परहित को करते-करते आत्महित से विमुख हो गए हैं। अगर वास्तव में देखा जाए तो आज यही हो रहा है कि इन अणुओं को प्राप्त करके अनुसन्धान करते-करते पश्चिमी देशों ने इतनी उन्नति कर ली है कि हमारी आध्यात्मिकता के ऊपर भी कुठाराघात होने लगा है। वह हमें भी अध्यात्म की ओर बढ़ने नहीं देना चाहते हैं और ऐसा भौतिकता का वातावरण बन गया है कि हर देश सोचता है कि हमारे पास युद्ध की इतनी सामग्री हो गई है तो मैं धनी हो गया हूँ, मैं आगे आ गया हूँ। वह देश जिसके पास युद्ध की सामग्री नहीं है वह सोचता है कि मेरा देश पिछड़ा देश है, गरीब देश है लेकिन आपको देखना है कि हमारे भारत देश में जहाँ आध्यात्मिकता की गंगा बह रही है वह देश कभी गरीब नहीं हो सकता, कभी पिछड़ा नहीं हो सकता क्योंकि हमारे पास भी अमूल्य सिद्धान्त हैं, इन एक-एक सिद्धान्त को भी अगर हम विक्रय करें तो हम बहुत शक्तिशाली बन सकते हैं लेकिन सिद्धान्त कोई विक्रय करने वाली चीज नहीं है, यह हमारे देश की, समाज की धरोहर है, हमारे लिये अमूल्य निधि है।

समस्त द्रव्यों के रहने के स्थान के बारे में बताते हुए आचार्यश्री कहते हैं—

लोकाकाशेऽवगाह:।।१२।।

अर्थऊपर कहे हुए समस्त द्रव्यों का अवगाह अर्थात् स्थान लोकाकाश में है अर्थात् समस्त द्रव्यों को अवगाह देने वाला आकाश द्रव्य है। अगर आकाश द्रव्य नहीं हो तो हम और आप यहाँ नहीं रुक सकते हैं। सब द्रव्यों को आश्रय देने का श्रेय लोकाकाश को प्राप्त है अर्थात् आकाश तो सर्वत्र है उसके बीच के जितने भाग में धर्म आदि छहों द्रव्य पाए जाते हैं उतने भाग को लोकाकाश कहते हैं और उसके बाहर जो आकाश है उसे अलोकाकाश कहते हैं।

धर्म और अधर्म द्रव्य के रहने के स्थान को बताया है—

धर्माधर्मयो: कृत्स्ने।।१३।।

अर्थ धर्म और अधर्म द्रव्य का अवगाह तिल में तेल की तरह समस्त लोकाकाश में है अर्थात् धर्म और अधर्म द्रव्य का अवगाह सम्पूर्ण क्षेत्र के अन्दर भरा हुआ है जैसे तिल में तेल ठसाठस भरा हुआ है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि तिल के इस कोने में तेल है या इस कोने में तेल है, तिल के तो हर कोने में तेल है ऐसे ही धर्म और अधर्म द्रव्य का अवगाह पूरे लोकाकाश में तिल में तेल की तरह व्याप्त है।

पुद्गल के रहने के स्थान को बताते हुए उमास्वामी आचार्य ने कहा है—

एकप्रदेशादिषु भाज्य: पुद्गलानाम्।।१४।।

अर्थपुद्गल द्रव्य का अवगाह लोकाकाश के एक प्रदेश से लेकर संख्यात-असंख्यात प्रदेशों में भी विभाजित करने योग्य है।

पुद्गल द्रव्य संख्यात प्रदेशी भी है, असंख्यात प्रदेशी भी है और संख्यात-असंख्यात दोनों प्रदेशों में रहता है क्योंकि तीन लोक में असंख्यात प्रदेश होते हैं अर्थात् लोक के असंख्यात भाग करके, उनमें से एक भाग लोक का असंख्यातवाँ भाग है जो असंख्यात प्रदेशी है। कम से कम उस एक असंख्यातवें भाग में एक जीव रहता है, यहाँ तक कि केवली सम्पूर्ण लोक में व्याप्त हो जाते हैं। यह सभी अवगाहना एक जीव की अपेक्षा है यदि सभी जीवों की अपेक्षा से कहा जाये तो अवगाह क्षेत्र समस्त लोक को प्राप्त होता है क्योंकि जीवराशि सम्पूर्ण लोक को व्याप्त करके स्थित है।

अब प्रश्न यह उठता है कि जब एक जीव द्रव्य असंख्यातप्रदेशी है तब वह लोक के असंख्यातवें भाग में कैसे रह सकता है उसका उत्तर देते हुए आचार्यश्री कहते हैं—

असंख्येय भागादिषु जीवानाम्।।१५।।

अर्थ जीवों का अवगाह लोकाकाश के असंख्यातवें भाग से लेकर सम्पूर्ण लोकाकाश क्षेत्र में है अर्थात् लोक के असंख्यातवें भाग में भी जीव रह सकता है इतनी उसके अन्दर शक्ति है और पूरे लोक के अन्दर भी जीव रह सकता है।

प्रदेशसंहारविसर्पाभ्याम् प्रदीपवत्।।१६।।

अर्थ दीपक के प्रकाश की तरह जीव के प्रदेशों में संकोच और विस्तार होने से जीव लोकाकाश के असंख्यातवें आदि भागों में रहता है।

किसी ने प्रश्न कर दिया कि ऐसे कैसे जीव हैं, जो छोटे भी बन जाएं और इतना बड़े भी बन जाएं कि पूरे तीन लोक में व्याप्त हो जाएं। तब आचार्यश्री ने बताया कि जैसे दीपक का प्रकाश एक घड़े में रखें तो छोटा हो जाएगा और यदि एक कमरे में रख दें तो पूरे कमरे में प्रकाश भर जाएगा दीपक का प्रकाश संकुचित भी किया जा सकता है और फैलाया भी जा सकता है। जैसे दीपक का प्रकाश संकुचित व विस्तीर्ण हो सकता है ऐसे ही जीव भी है, यह अखण्ड ज्योति है इसका प्रकाश चाहे संकुचित कर दें चाहे फैला दें। देखो! चींटी के शरीर में वही जीव गया तो इतना छोटा बन गया और हाथी के शरीर में वही जीव गया तो कितना बड़ा बन गया। वही जीव जब केवली समुद्घात करता है, लोकपूरण समुद्घात करता है तो उसकी आत्मा के प्रदेश पूरे लोकाकाश में फैल जाते हैं और सिद्ध अवस्था में अन्तिम शरीर से कुछ कम रहता है।

मूल शरीर को न छोड़कर आत्मा के प्रदेशों के बाहर निकलने को समुद्घात कहते हैं।

इसके सात भेद होते हैं—

  1. आहारक
  2. वैक्रियिक
  3. तैजस
  4. कषाय
  5. वेदना
  6. मारणान्तिक
  7. केवली लोकपूरण समुद्घात।

धर्म और अधर्म द्रव्य का उपकार या लक्षण बताते हैं—

गति स्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकार:।।१७।।

अर्थ स्वयमेव गमन तथा स्थिति को प्राप्त हुए जीव और पुद्गलों को गति तथा स्थिति में सहायता देना क्रम से धर्म और अधर्म द्रव्य का उपकार है।

द्रव्य अजीव भले ही है फिर भी कैसे उपकार करता है ? यह जीव और पुद्गलों की गति और स्थिति में निमित्त बनता है। हम चल रहे हैं अर्थात् जीव और पुद्गल मिलकर चल रहे हैं, उसमें अज्ञात रूप से धर्म द्रव्य का सहयोग है। उनसे आपने कहा नहीं है कि आप चलिए लेकिन जब आप चले तो चलने में धर्मद्रव्य निमित्त बन गया। जैसे आप यहाँ बैठे हैं आपको यहाँ ठहराने में आकाश द्रव्य निमित्त है, आकाश द्रव्य नहीं हो तो कोई भी द्रव्य रह नहीं सकता है। इस बात को हमने नहीं केवली भगवान ने जाना और बताया कि जीव और पुद्गल के पीछे कोई तीसरी शक्ति भी है और उसका नाम है धर्मद्रव्य। यहाँ धर्म और अधर्म द्रव्य से आप पुण्य-पाप को नहीं लेना कि हम पूजा करें तो धर्म हो जायेगा, िंहसा करें तो पाप हो जायेगा, यहाँ द्रव्य हैं जो उदासीन रूप से निमित्त बनते हैं। जैसे मछली जल में चलती है तो पानी उसको चलने में सहकारी निमित्त बनता है ऐसे ही हमारे चलने में धर्म द्रव्य निमित्त बनता है। हम जाकर एक पेड़ के नीचे ठहर गये तो हमको छाया देने में पेड़ सहायक निमित्त है, ऐसे ही ठहराने में अधर्म द्रव्य निमित्त है, यही हमारे ऊपर धर्म और अधर्म द्रव्य का उपकार माना गया है।

आकाश द्रव्य का क्या उपकार है ? इस बात को बताते हुए कहा है—

आकाशस्यावगाह:।।१८।।

अर्थ सब द्रव्यों को अवकाश देना आकाश का उपकार है। आकाश द्रव्य का क्या उपकार है ? समस्त द्रव्यों को अवकाश देना यह आकाश द्रव्य का उपकार है। यह कहते नहीं हैं कि हमने तुम पर उपकार किया है, हमने तुमको ठहराया है, हमने तुमको चलाया है, यह उदासीन रहते हैं। हमें इन द्रव्यों से सीखना है कि हम किसी के उपकार को बार-बार कहें नहीं, हमें पर का उपकार करके उदासीन रहना है। अगर किसी से हम बार—बार कहते हैं कि अगर हम नहीं होते तो तुम ऐसा नहीं कर सकते थे, अगर हमने तुमको ५०० रुपये नहीं दिए होते तो तुम बिजनेस कर सकते थे क्या ? उतना कहने से वह सारा उपकार व्यर्थ हो जाता है। उपकार करने वाले का फर्ज है कि वह अपने उपकार को बार-बार कहे नहीं और जिसका उपकार किया जाए उसका फर्ज है कि ‘‘निंह कृतं उपकारं साधवो विस्मरन्ति’’ वह किये हुये उपकार को कभी भूले नहीं। जैसे—जीवन्धर कुमार ने मरते हुये कुत्ते को णमोकार मन्त्र सुनाया था, जब भी उनके ऊपर संकट आया तो वह कुत्ता जो यक्षेन्द्र का जीव था हरदम आकर उसकी रक्षा करता था पर जीवन्धर कुमार ने कभी नहीं कहा कि मैंने ही तुझे देव बनाया है। बन्धुओं! महापुरुष कभी भी किए हुये उपकार को कहते नहीं हैं। यहाँ उनके माध्यम से और बहुत सी शिक्षाएं मिल जाती हैं किन्तु यहाँ तो अजीव द्रव्य की बात चल रही है कि अजीव द्रव्य भी वैâसे जीव द्रव्य का उपकार करने में सक्षम है।

यद्यपि अवगाह गुण समस्त द्रव्यों में है तथापि आकाश में यह गुण सबसे बड़ा है क्योंकि यह समस्त पदार्थों को एक साथ अवकाश देता है। वैसे तो अलोकाकाश में भी अवगाह हेतु है किन्तु वहाँ अवगाह लेने वाला कोई द्रव्य नहीं है और इससे आकाश का अवगाह देने का गुण नष्ट नहीं हो जाता, क्योंकि द्रव्य अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता।

पुद्गल द्रव्य जीवों पर क्या उपकार करता है अथवा पुद्गल द्रव्य का क्या कार्य है ? इस बात को बताने के लिए अगला सूत्र अवतरित होता है—

शरीरवाङ्मन:प्राणापाना: पुद्गलानाम्।।१९।।

अर्थ औदारिक आदि शरीर, वचन, मन तथा श्वासोच्छ्वास ये पुद्गल द्रव्य के उपकार हैं अर्थात् शरीर की रचना पुद्गल से ही होती है।

जीवों के शरीर आदि की रचना का उपादान कारण पुद्गल है और निमित्त कारण जीव है। परमाणु से लेकर महास्वंâध तक पुद्गल द्रव्य के आहार आदि २३ वर्गणा समूह हैं, इनमें से आहार, भाषा, मन, तैजस और कार्माण इन पाँच प्रकार की पुद्गल वर्गणाओं के समूह से जीवों के ५ शरीर—औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्माण तथा वचन, मन और श्वासोच्छ्वास का निर्माण होता है।

वचन दो प्रकार का है—भाव वचन और द्रव्य वचन। मति, श्रुत, ज्ञानावरण कर्म, वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम से और आंगोपांग नामकर्म के उदय से बोलने की शक्ति का होना भाववचन है। वास्तव में भाववचन जीव की अवस्था है पर पुद्गल के निमित्त से होने के कारण तथा जीव का त्रिकाली स्वभाव न होने से भाववचन रूप अवस्था अलग हो जाती है और निश्चयनय से देखें तो भाववचन जीव के न होकर पुद्गल शब्द हैं तथा बोलने की शक्ति से सहित जीव के गला, तालू आदि के संयोग से जो भाषा वर्गणा के पुद्गलरूप शब्द बनते हैं वह द्रव्य वचन हैं वह भी पौद्गलिक ही हैं। जैसे—किसी जीव की आवाज चली जाए तो वह परेशान हो जाता है, आवाज का बने रहना यह पुद्गल का कार्य है, पुद्गल का उपकार है। मन भी दो प्रकार का है—भाव मन और द्रव्य मन। गुण दोष रूप विचार की शक्ति का होना अथवा लब्धि और उपयोग रूप भाव मन कहलाता है। यह शक्ति भी पुद्गल कर्म के क्षयोपशम से ही प्राप्त होती है तथा ज्ञानावरण और वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम से और आंगोपांग नामकर्म के उदय से हृदय स्थान में जो पुद्गल मनरूप से परिणमन करे वह द्रव्य मन है, इसमें भी पुद्गल ही निमित्त कारण है। वायु को अन्दर से बाहर करना उच्छ्वास है, इसे प्राणवायु कहते हैं तथा बाहर की वायु को अन्दर ले जाना निश्वांस है इसे अपानवायु कहते हैं। ये दोनों ही पौद्गलिक हैं। अगर प्राणापान अर्थात् श्वासोच्छ्वास चली जाये तो सारा काम ही खत्म हो जायेगा, श्वांस अथवा नि:श्वांस के बिना प्राणी जीवित ही नहीं रह सकता है।

पुद्गल द्रव्य और भी किस प्रकार उपकार करता है, इस बात को बताते हुए कहते हैं—

सुखदु:खजीवितमरणोपग्रहाश्च।।२०।।

अर्थ इन्द्रियजनित सुख-दु:ख, जीवन-मरण ये भी पुद्गल द्रव्य के उपकार हैं।

आचार्यश्री तो आगे बढ़ते चले गए परन्तु शिष्य तो इतने में ही परेशान था कि अजीव द्रव्य के कितने-कितने उपकार हैं, इस बात पर उसे सम्बोधित करते हुए आचार्य कहते हैं—सुख, दु:ख, जीवन-मरण सब तेरे ऊपर उपकार कर रहे हैं। क्या दु:ख भी उपकार कर सकता है ? हाँ, दु:ख भी अपने ऊपर उपकार कर रहा है यह मानना पड़ेगा, सिद्धान्त का अटल नियम है। आप भजन में पढ़ते हैं—

दु:ख ही मानव की सम्पति है, तू दु:ख से क्यों घबराता है,

दु:ख आया है तो जाएगा, सुख आया है तो जाएगा।

दु:ख जाएगा तो सुख देकर, सुख जाएगा तो दु:ख देकर,

सुख देकर जाने वाले से, रे मानव क्यों घबराता है।

हम इन पंक्तियों को पढ़ते हैं लेकिन क्या हम वास्तव में दु:ख को उपकारी मानते हैं ? दु:ख आता है तो हम अपने पथ से विचलित हो जाते हैं, जाने किनके-किनके चक्कर चलाने लगते हैं, हम भगवान से तो कहते हैं—चत्तारि शरणं पव्वज्जामि, अरिहंत शरणं पव्वज्जामि, सिद्ध शरणं पव्वज्जामि, साहू शरणं पव्वज्जामि, केवलि पण्णत्तो धम्मो शरणं पव्वज्जामि, पर भगवान्! आपत्तिकाले डॉक्टर शरणं पव्वज्जामि। आपत्ति के काल में आप डॉक्टर की शरण में पहुँच जाते हैं तब कहाँ भान रहेगा कि दु:ख हमारी सम्पत्ति है, उसके लिए आचार्यश्री कहते हैं कि थोड़ा-सा सहन करना सीखें। भागवत में मैंने एक कथानक पढ़ा था—

नाारायण श्रीकृष्ण एक दिन अपने दरबार में बैठे थे, वह सभा में उपस्थित सभी लोगों से बोले कि आज मैं बहुत अच्छे मूड में हूँ जिसको जो वरदान माँगना है, माँग लो। सबने इतनी-इतनी सुन्दर वस्तुएँ माँगी कि सात जन्मों तक की दरिद्रता दूर हो जाये और वह सुखी रहें। उनमें से एक व्यक्ति ऐसा था जिसने कुछ नहीं माँगा। सबने कहा कि आज बहुत सुनहरा मौका है, कुछ तो माँग ले, स्वयं नारायण श्रीकृष्ण ने कहा कि तूने कुछ क्यों नहीं माँगा, माँग तुझे क्या चाहिये। तो उसने कहा—महाराज! मुझे कुछ नहीं चाहिये। नारायण बोले कि शायद तू बहुत घबरा गया है। जीवन में दो ही आदमी कुछ नहीं माँगते हैं या तो कोई ज्यादा सुखी हो या फिर कोई जीवन, परिवार, पत्नी आदि सबसे घबरा जाता है और आत्महत्या के अभिमुख हो जाता है तो कहता है कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। दिखने में तो ऐसा लगता था कि बेचारा सुबह खाएगा तो शाम को रोटी भी नसीब नहीं होगी लेकिन फिर भी कुछ नहीं माँगा। जब नारायण श्रीकृष्ण ने बहुत बार कहा कि अवसर है कुछ माँग ले तो उसने सोचा कि तीन खण्ड के अधिपति मुझसे बार-बार कह रहे हैं तो कुछ माँग लूँ। अत: उसने कहा कि मुझे देना ही है तो दु:ख दे दीजिए। सब सुनकर आश्चर्यचकित थे कि इसने यह क्या माँगा। जब नारायण ने पूछा कि तुमने दु:ख क्यों माँगा ? तो उसने कहा कि स्वामी! मैंने दु:ख इसलिये माँगा कि सुख में लोग पूâल जाते हैं, जाने क्या-क्या करते हैं ? और मेरे ऊपर जब दुख की घड़ियाँ आती हैं तो मैं भगवान का स्मरण करता हूँ, मन्दिर में जाकर बैठता हूँ, गुरुओं की शरण लेता हूँ। मेरे मन में हमेशा धर्म ही आता है इसलिये मैंने सोचा कि दु:ख ही माँग लूँ ताकि जीवन में हमेशा धर्ममय रहूँ, जीवन में कभी दूसरे की शरण में जाने की कोशिश नहीं करूँ।

वास्तव में उसने दु:ख को अपना उपकारी माना कि सुख से ज्यादा दु:ख उपकारी है। बन्धुओं! राग से बढ़कर द्वेष अच्छा होता है क्योंकि वह हमारे वैराग्य भाव को प्रज्ज्वलित करता है। भरत-बाहुबली युद्ध में, युद्धक्षेत्र में भरत ने बाहुबली पर चक्र नहीं चलाया होता तो क्या पता उनके अन्दर ऐसी वैराग्य की भावना नहीं आई होती, सब कुछ पाकर सब कुछ छोड़ दिया और ज्ञानी हो गये कि मेरे कारण आज भरत को इतना घिनौना कृत्य करना पड़ा जबकि वह जानते थे कि अपने वंशज के ऊपर कभी चक्र नहीं चलता है लेकिन ऐश्वर्य का मद और राजसत्ता इतनी बुरी होती है कि वहाँ व्यक्ति सब कुछ भूल जाता है। मैं कई बार कहा करती हूँ कि जीवन के अन्दर तीन ककार हैं—वंâचन, कामिनी और कीर्ति। इन तीन में पड़कर व्यक्ति माता-पिता, गुरु-शिष्य का सब भेद समाप्त कर देता है। वंâचन के पीछे झगड़े हो गए, महाभारत का युद्ध हो गया, कामिनी के पीछे रामायण बन गयी और कीर्ति के पीछे आप देख ही रहे हैं कि कितने बड़े युद्ध हो रहे हैं। जहाँ भी चुनाव हो रहे हैं वहाँ की दशा किसी से छिपी नहीं है। कीर्ति का झगड़ा तो वंâचन और कामिनी से भी ज्यादा होता है। वहाँ हर क्षण लगा रहता है कि मैं किसको किस प्रकार से हरा दूँ, वोटों की राजनीति हो गई है। हम देखते हैं कि कोई नेता सपा में है, कोई बसपा में है, कोई कांग्रेस में है थोड़ा-सा गठबन्धन करके तीसरी नई सरकार बन जाती है, उसका कारण क्या है ? आज लोगों की कहीं भी किसी भी जगह आस्था नहीं रह गयी है, एक जगह उनका विश्वास नहीं रह गया है, यह राजनीति है कि कोई नेता कभी किसी का विरोध कर रहा है और कभी उसी को माला पहना रहा है और जब यह राजनीति धर्मनीति में प्रवेश कर जाती है तो बहुत बुरा होता है। धर्मनीति राजनीति में प्रवेश करती है तो राजनीति थोड़ा स्वच्छ हो जाती है लेकिन धर्मनीति में राजनीति आ जाती है तो ध्यान रखना कि बहुत कटु—वूâटनीति बन जाती है। वस्तुत: यह सुख-दु:ख, जीवन-मरण सब हमारे लिये उपकारी हैं।

सातावेदनीय के उदय से बाह्य द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के निमित्त से आत्मा में प्रसन्नता का होना सुख है, असातावेदनीय के उदय से संक्लेश रूप परिणामों का—भावों का होना दु:ख है। आयुकर्म के उदय से एक भव में स्थित जीव के श्वासोच्छ्वास का चलना जीवन है और वही जब रुक जाए तो मरण हो जाता है। ये सुख, दु:ख आदि जीव की अवस्थाएँ हैं परन्तु उनके होने में पुद्गल निमित्त है इसलिये यह सब पुद्गल के ही उपकार कहे गये हैं। चूँकि इस सूत्र में उपग्रह शब्द का प्रयोग किया गया है अत: उससे यही जानना है कि पुद्गल परस्पर में एक दूसरे का उपकार करते हैं। जैसे—राख कांसे का, पानी लोहे का, साबुन कपड़े का आदि। उपकार शब्द का अर्थ यहाँ परोपकार से नहीं लेना है अपितु निमित्त मात्र ही समझना है। जीवों के उपकार के बारे में बताते हुए बहुत ही सुन्दर सूत्र का अवतार हुआ है—

परस्परोपग्रहो जीवानाम्।।२१।।

अर्थ जीवों का परस्पर उपकार है अर्थात् जीव कारणवश एक-दूसरे का उपकार करते हैं।

अब शिष्य ने प्रश्न किया कि भगवन! पुद्गल आदि द्रव्य जीव का इतना-इतना उपकार करते हैं तो जीव का क्या कत्र्तव्य है ? तब आचार्यश्री ने कहा—परस्पर में एक-दूसरे का उपकार करना हर जीव का कत्र्तव्य है। एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक के सभी जीवों का यही कत्र्तव्य है। जैसे—शिष्य गुरु का उपकार करता है, गुरु शिष्य का उपकार करता है। पति पत्नी का उपकार करता है, पत्नी पति का उपकार करती है। माता पुत्र में या किसी और रूप में ले लीजिये सांसारिक व्यवस्थाओं के अनुसार भी यही होना चाहिये। यह सब तो मनुष्य हैं हम देखते हैं कि एक छोटा-सा पौधा हम बोते हैं उसके बाद वह बड़ा होकर हमारा कितना उपकार करता है। हम गाय को सूखी घास खिलाते हैं, गाय हमारा कितना उपकार करती है हमें अमृतमय दूध प्रदान करती है लेकिन मानव एक ऐसा प्राणी बन गया है इतना हिताहित का विवेक होने के बावजूद भी एक गाय जैसा पशु, जो हमारा उपकार करती है उसको भी रिटायर होने के बाद उसकी गर्दन पर छुरी चला देता है, उसे कत्लखाने में भेज देता है। कितने कत्लखाने आज हमारे देश के अन्दर खुल गये हैं। यह मानवता के प्रति अपराध है, पर्यावरण के प्रति प्रदूषण है और क्या मानव को प्रकृति कभी क्षमा कर पायेगी ? आज हमारे देश में कहीं न कहीं भूकम्प आ रहे हैं, बाढ़ आ रही हैं, ये क्या हैं ? प्रकृति हमारे अपराधों को कहाँ तक क्षमा करती रहेगी ? जब बहुत ज्यादा पाप हो जाते हैं तब प्राकृतिक प्रकोप भी आते हैं लेकिन अगर सन्तुलन बराबर चलता रहे, हम एक-दूसरे का उपकार करते रहें, तो ऐसी स्थिति ही न आवे। अगर पेड़-पौधे हमारा उपकार करते हैं तो हम पेड़-पौधों का उपकार करते रहें, तिर्यंच यदि हमारा उपकार करते हैं तो हम उनका उपकार करते रहें, हम उनको तिनका नहीं दे सकते हैं, हम उनके लिये कुछ नहीं कर सकते हैं तो कम से कम उनको जंगल में तो रहने दें, उनको स्वच्छन्दता से अपनी प्रवृत्ति तो करने दें पर नहीं, उसके लिये तो मानव ने अपने रास्ते बना लिये हैं, उपकार करने के बजाय उसने अपकार करने का ठेका ले लिया है। हम इन पंक्तियों को भूल जाते हैं—

यदि भला किसी का कर न सको, तो बुरा किसी का मत करना।

अमृत न पिलाने को घर में, तो जहर पिलाने से डरना।।

परन्तु अपकार करने का जहर तो आज प्राणी के रग-रग में भर गया है। किस तरह से उसका अपकार हो जाए, वह चुनाव में हार जाए मेरा प्रत्याशी जीत जाए, आप यहाँ बैठे-बैठे यह भावना करने लगते हैं। आपको तो न जीतना है न हारना है लेकिन मन में सोचने लगते हैं इसमें भी दोष लगता है। इसलिये हमें इन सिद्धान्तों को पढ़कर यही सोचना है कि हम अगर उपकार नहीं कर सकते हैं तो अपकार भी न करें।

काल द्रव्य का क्या उपकार है, इस बात को बताया है—

वर्तनापरिणामक्रिया: परत्वापरत्वे च कालस्य।।२२।।

अर्थ वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व ये कालद्रव्य के उपकार हैं।

इन सूत्रों में हमारे आचार्यों ने जो गूढ़ अर्थ संजोया है अगर हम इनकी सर्वार्थसिद्धि, तत्त्वार्थवृत्ति, तत्त्वार्थराजवार्तिक, तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकालंकार आदि टीकाएं लेकर बैठें तो हम विस्तार से समझ सकते हैं कि किस प्रकार से आचार्यों ने अपनी प्रतिभाशक्ति के आधार पर १-१ सूत्र का १००-१००, २००-२०० पृष्ठों में वर्णन किया है।

वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व ये काल द्रव्य के उपकार हैं। हम जब पैदा हुए तो छोटे से थे आज इतने बड़े हो गये तो हमारे ऊपर यह किसने उपकार किया, काल द्रव्य ने। कालद्रव्य इतना उपकार करता है कि हमारी काया जीर्ण हो गयी तो उसको आज बदल दीजिए लेकिन उसको हम मानने लगते हैं कि हम मर गये, मरना भी उपकार है अगर नहीं मरे तो वह हाड़-माँस की काया लेकर आप कहाँ तक घूमते रहेंगे, बदलना भी आवश्यक है, जैसे—जब कपड़ा एकदम जीर्ण हो जाता है तो उसको बदलना जरूरी होता है, ऐसा ही यह काल द्रव्य छोटे से बड़ा, युवा से जवानी, जवानी से बुढ़ापा हमारे अन्दर लाता है, परिणमन कराता है। परत्व-अपरत्व भी काल द्रव्य की क्रियाएं होती हैं ये भी हमारे ऊपर उपकार हैं।

जो द्रव्यों को बरतावे उसे वर्तना कहते हैं। एक धर्म के त्यागरूप और दूसरे धर्म के ग्रहणरूप जो पर्याय है उसे परिणाम कहते हैं, जैसे—जीवों में ज्ञानादि और पुद्गलों में वर्णादि। हलन-चलन रूप परिणति को क्रिया कहते हैं। छोटे-बड़े के व्यवहार को परत्वापरत्व कहते हैं, जैसे—२५ वर्ष के मनुष्य को बड़ा और २० वर्ष के मनुष्य को उसकी अपेक्षा छोटा कहते हैं।

पुद्गल द्रव्य का लक्षण बताया है—

स्पर्शरसगन्धवर्णवन्त: पुद्गला:।।२३।।

अर्थ जिसमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण होता है, उसे पुद्गल कहते हैं। यह चार गुण हर एक पुद्गल में एक साथ और अवश्य ही रहते हैं।

इनके उत्तर भेद बीस हो जाते हैं। स्पर्श के आठ भेद—हल्का, भारी, कड़ा, नरम, रूखा, चिकना, ठण्डा, गरम। गन्ध के दो भेद हैं—सुगन्ध और दुर्गन्ध। रस के पाँच भेद हैं—खट्टा, मीठा, कड़ुवा, चरपरा और कषायला और वर्ण के पाँच भेद हैं—काला, नीला, पीला, लाल और सपेâद। ये पुद्गल के बीस गुण कहलाते हैं।

पुद्गल का अर्थ क्या है ? व्याकरण की व्युत्पत्ति के अनुसार जिसमें पूरण और गलन स्वभाव हो, वह पुद्गल है। परन्तु यहाँ बता रहे हैं कि जिसमें स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण पाए जाएं वह पुद्गल कहलाता है। इसे छू करके भी जान सकते हैं, इसके अन्दर रस है, चख करके देखें, आपके आँसू गिरते हैं, मुँह में जाते हैं, वैâसे लगते हैं ? खारे लगते हैं। पसीना मुँह में जाता है खारा लगता है। मेरे मन में एक प्रश्न उठा कि हमारे शरीर से निकलने वाली यह मन की परिणति, यह क्षारीय तत्त्व क्यों है ? इनमें नमक क्यों है ? हर एक के अन्दर नमक भी है, शक्कर भी है, सोडा भी है, जो भी चीज हैं आपके शरीर में हैं और जब संताप के द्वारा वह बाहर निकलते हैं तो खारे बन जाते हैं, क्षार बन जाते हैं। जवाखार वैâसे बनता है ? जौ को जलाकर असली जवाखार बनता है। जब ऐसा क्षारीय तत्त्व हमारे शरीर, आँखों, पसीने या किसी भी माध्यम से निकलता है, नमकीन लगता है। तीर्थंकर के शरीर में पसीना नहीं होता, कोई क्षारीय तत्त्व नहीं होता उनका तो खून भी सपेâद होता है और आज के मानव के खून के अन्दर अगर ज्यादा सपेâद ‘सेल’ आ जाएं तो उसे वैंâसर हो जाता है। वास्तव में हमारे और तीर्थंकर के शरीर में अन्तर है, मानव का शरीर हमारा भी है और मानव का शरीर उनका भी है लेकिन हमारे अन्दर दु:ख, शोक, ताप, आक्रन्दन न जाने क्या-क्या लगा हुआ है और उसके सन्ताप से जब ये चीजें पैदा होती हैं तो क्षारीय तत्त्व आ जाता है। एक व्यक्ति ने कहा कि क्या कारण है कि आँखों से आँसू ही निकलते हैं, खुश होते हैं तो आँसू निकलते हैं और दु:खी होते हैं तो भी आँसू ही निकलते हैं तो मैंने उनको कहा कि—

आँखों में आँसू हैं तो मुस्कान भी है,

धागों में टूटन है तो संधान भी है।
एक सिक्के के होते हैं पहलू दो,
जीवन में समस्या है तो समाधान भी है।।

अत: समस्याओं को समाधान के रूप में परिवर्तित करते हुए ही हमें इन १-१ सूत्र के ऊपर चिन्तन करना है कि कितने-कितने उपकारों को हम अपने ऊपर लेकर बैठे हैं। अजीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश सबने हमारा उपकार किया, सब हमारे उपकारी बन जाते हैं।

पुद्गल की पर्यायों के बारे में बताया है—

शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायातपोद्योत-वन्तश्च।।२४।।

अर्थउक्त लक्षण वाले पुद्गल—शब्द, बंध, सूक्ष्मता, स्थूलता, संस्थान अर्थात् आकार, भेद, अन्धकार, छाया, आतप और उद्योत सहित हैं अर्थात् पुद्गल की पर्याय हैं। शब्द निकलते हैं और नष्ट हो जाते हैं यह पुद्गल की पर्याय है, बन्ध होता है नष्ट भी हो जाता है, यह भी पुद्गल की पर्याय है। पुद्गल के परमाणु घूमते रहते हैं और जब वह आपस में मिल जाते हैं, आत्मा के साथ आ जाते हैं तब बन्ध हो जाता है। सूक्ष्मता, स्थूलता अर्थात् छोटापन-बड़ापन, जैसे—गेहूँ का पीस छोटा भी हुआ, बड़ा भी हुआ। बड़े कण को दलिया बोल दिया और छोटे कण को आटा बोल दिया। यह सब परिवर्तनशील हैं, पुद्गल की पर्याय हैं। संस्थान, आकार, भेद, छाया, आतप और उद्योत ये सब पुद्गल की पर्याय हैं, नष्ट होती रहती हैं, इनमें पूरण और गलन होता रहता है इसलिये इनको पुद्गल की पर्याय कह दिया है और पर्याय इसलिये कहा गया है क्योंकि ये होकर नष्ट होती हैं, गुण कभी भी नष्ट नहीं होता और पर्याय कभी भी स्थिर नहीं रहती। इन अवस्थाओं में कितनी तो परमाणु और स्कन्ध दोनों में होती हैं और कई स्कन्ध में ही होती हैं।

पुद्गल के भेद बताये हैं—

अणव: स्वंधाश्च।।२५।।

अर्थ पुद्गल द्रव्य के दो भेद मुख्य रूप से बताये हैं—अणु और स्कन्ध। अविभागी—जसका कोई भाग न हो सके उस एकप्रदेशी पुद्गल द्रव्य को अणु या परमाणु कहते हैं। दो, तीन, संख्यात, असंख्यात तथा अनंन्त परमाणुओं के पिण्ड को स्कन्ध कहते हैं। सारे पुद्गल इन अणु और स्कन्ध में समा जाते हैं।

स्कन्धों की उत्पत्ति का कारण बताते हुए कहा है—

भेद-संघातेभ्य: उत्पद्यन्ते।।२६।।

अर्थपुद्गल द्रव्य के स्कन्ध भेद—बिछुड़ने, संघात—मिलने और भेद संघात—दोनों से उत्पन्न होते हैं।

जैसे १०० परमाणुओं वाला स्कन्ध है उसमें से १० परमाणु बिखर जाने से ९० परमाणु वाला स्कन्ध बन जाता है और उसी में १० परमाणु मिल जाने से ११० परमाणु वाला स्कन्ध बन जाता है और उसी में एक साथ १० परमाणुओं के बिछुड़ने और १५ परमाणुओं के मिल जाने से १०५ परमाणु वाला स्कन्ध बन जाता है।

यह स्कन्ध आदि कैसे उत्पन्न होते हैं ? यह स्कन्ध भेद, संघात और भेद संघात दोनों से उत्पन्न होते हैं। कोई बड़ी चीज है उसको हमने तोड़ दिया तो भेद हो गया इससे स्कन्ध की उत्पत्ति होती है, छोटी चीज को मिला दिया तो बड़ा बन गया अत: भेद से अर्थात् तोड़ने से, संघात से अर्थात् मिलने से स्कन्ध बन गया। जैसे—आटे के कण को हमने एक साथ उसन कर मिला दिया तो पिण्ड बन गया, स्कन्ध बन गया ऐसे ही परमाणुओं से, भेद से या भेद संघात से स्कन्ध की उत्पत्ति होती है।

अणु की उत्पत्ति का कारण बताते हुए कहते हैं—

भेदादणु:।।२७।।

अर्थअणु की उत्पत्ति भेद से होती है।

अणु की उत्पत्ति कभी मिलने से नहीं होती, अणु की उत्पत्ति तो भेद से ही हो सकती है। जहाँ मिलन हुआ स्कन्ध बन गया और जहाँ भेद हुआ, वह भी ऐसा भेद हुआ कि जिसका टुकड़ा नहीं हो सके वह कहलाता है अणु। यह पुद्गल द्रव्य की स्वाभाविक अवस्था है।

चाक्षुष अर्थात् देखने योग्य स्थूल स्कन्ध की उत्पत्ति का कारण बताया है—

भेदसंघाताभ्यां चाक्षुष:।।२८।।

अर्थ चक्षु इन्द्रिय से दिखने योग्य जो स्कन्ध हैं वे भेद और संघात दोनों से ही उत्पन्न होते हैं केवल भेद से नहीं उत्पन्न हो सकते हैं।

केवल भेद से ही कोई स्कन्ध चक्षु इन्द्रिय से देखने योग्य नहीं हो जाता किन्तु भेद और संघात दोनों से ही होता है। जैसे—एक सूक्ष्म स्कन्ध है, वह टूटा और दो टुकड़े हो जाने पर भी वह सूक्ष्म ही बना रहता है। इस तरह वह चक्षु इन्द्रिय के द्वारा नहीं देखा जा सकता है किन्तु जब वह सूक्ष्म स्कन्ध दूसरे स्कन्ध में मिलकर अपने सूक्ष्मपने को छोड़ देता है और स्थूल रूप धारण कर लेता है तो वही चक्षु इन्द्रिय का विषय हो जाता है अर्थात् उसे आँखों से देखा जा सकता है।

आचार्यश्री द्रव्य का लक्षण बताते हुए अगले सूत्र में कहते हैं—

सद्द्रव्यलक्षणम्।।२९।।

अर्थद्रव्य का लक्षण सत् (अस्तित्व) है।

सत् अर्थात् जो हमेशा विद्यमान रहता है वह द्रव्य कहलाता है। आज हम मनुष्य पर्याय में हैं, कल देव पर्याय में जा सकते हैं, आगे तिर्यंच पर्याय में जा सकते हैं, नरक में जा सकते हैं तो पर्याय बदल गयी लेकिन उसके अन्दर जो आत्मा थी वह नहीं बदली उसको कहते हैं—द्रव्य।

यह सूत्र बहुत ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सत् रूप वस्तु का ही विचार किया जाता है। जिसका अस्तित्व हो वह द्रव्य है यदि द्रव्य हो तो ही दूसरे गुण हो सकते हैं।

सत् का मतलब क्या है, उसे बताते हैं—

उत्पाद-व्यय-ध्रौव्ययुत्तं सत्।।३०।।

अर्थजो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त है वही सत् है। जिसमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ये तीनों चीजें रहें वह सत् है। मान लीजिये आपके पास एक सोने की चेन है। आपने सुनार के पास ले जाकर उसको गलवाकर अंगूठी बनवा दी तो चेन का तो विनाश हो गया, अंगूठी का उत्पाद हो गया और दोनों ही अवस्थाओं में सोना वह भी था और सोना यह भी है अर्थात् विनाश, उत्पाद और ध्रौव्य यह तीनों एक ही चीज में लागू हुए। मस्तक से घड़ा गिरा, टूट गया अब घड़ा टूटा तो किस चीज की उत्पत्ति हुई ? कपालों की उत्पत्ति हो गई, घड़े के टुकड़े-टुकड़े हो गये घड़े का विनाश हुआ, कपाल की उत्पत्ति हुई और दोनों में मिट्टी रूप पुद्गल विद्यमान रहा यही सत् है। चेतन या अचेतन द्रव्य में अपनी पर्याय का त्याग किए बिना नवीन पर्याय की प्राप्ति को उत्पाद कहते हैं। जैसे—मिट्टी के पिण्ड में घड़े रूप पर्याय का होना। पूर्व पर्याय का त्याग व्यय है, जैसे—घट रूप पर्याय उत्पन्न होने पर पिण्ड—मिट्टी रूप पर्याय का व्यय—विनाश होना। ध्रौव्य—पूर्व पर्याय का नाश और नई पर्याय का उत्पाद होने पर भी अपने अनादि स्वभाव को नहीं छोड़ना, जैसे—पिण्ड-मिट्टी के आकार के नष्ट हो जाने पर और घड़े रूप पर्याय में उत्पन्न होने पर भी मिट्टी ध्रौव्य रूप में विद्यमान है। प्रत्येक द्रव्य में ये तीनों ही धर्म एक साथ पाए जाते हैं क्योंकि नई पर्याय का उत्पन्न होना ही पहली पर्याय का नाश है और पहली पर्याय का नाश होना ही नई पर्याय का उत्पाद है तथा उत्पाद होने पर भी द्रव्य वही रहता है और व्यय होने पर भी द्रव्य वही रहता है।

श्लोकवार्तिक ग्रन्थ में आचार्य श्री विद्यानन्द स्वामी ने इस उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यात्मक वस्तु स्वरूप को एक श्लोक द्वारा समझाते हुए बताया—

घट मौलि सुवर्णार्थी नाशोत्पाद स्थितिष्वयम्।
शोक प्रमोद माध्यस्थं जनो याति सहेतुकम्।।

नित्य का लक्षण बताते हैं—

तद्भावाव्ययं नित्यम्।।३१।।

अर्थजो द्रव्य तद्भाव रूप से अव्यय है वही नित्य है। तद्भाव अर्थात् अपनी जातिरूप भाव से जो अव्यय है वह नित्य है, वह कभी नष्ट नहीं होता है। नित्य का पर्याय यह नहीं है कि जो वस्तु जिस रूप में है वह सदा उसी रूप में बनी रहे और उसमें कुछ भी परिणमन न हो किन्तु परिणमन के होते हुए भी उसमें ऐसी एकरूपता का बने रहना ही नित्यता कहलाती है जिसे देखते ही हमें तुरन्त यह ज्ञान हो जाये कि वही वस्तु है जिसे पहले देखा था। प्रत्यभिज्ञान के हेतु को सद्भाव कहते हैं।

अब शंका हुई कि एक ही द्रव्य में दो चीजें अर्थात् नित्यता और अनित्यता ये दो विरुद्ध धर्म किस प्रकार उत्पन्न होंगे तो सूत्र आया—

अर्पितानर्पितसिद्धे:।।३२।।

अर्थमुख्य वस्तु को अर्पित और गौण वस्तु को अनर्पित कहते हैं। मुख्यता और गौणता से ही अनेक धर्म वाली वस्तु का कथन सिद्ध होता है।

जैन आगम में यह सूत्र अनेकान्तवाद का मूल सूत्र है। उदाहरणस्वरूप आप पत्नी के पास गये तो बहन के लिये भाई रूप गौण हो गये, बहन के पास गये तो पत्नी रूप गौण हो गए। इसी प्रकार मथानी का उदाहरण है, जैसे दही बिलोने के लिये मथानी की एक रस्सी खींचते हैं तब दूसरी ढीली करनी पड़ती है इसी प्रकार पहली रस्सी को ढीला किया तब वह नष्ट हो गयी क्या ? नहीं। वह विद्यमान रही बस गौण मात्र हो गयी। यह सूत्र हमारे जैनागम का प्राण है। यदि इस सूत्र को दुनिया में मान लिया जाए तो आज साम्प्रदायिकता का झगड़ा ही समाप्त हो जाएगा। हम चाहें तो विश्वशांति को जब चाहें तब पा सकते हैं ? बस अनेकान्त और स्याद्वाद को अपने मन में बिठाना होगा।

परमाणुओं के बन्ध होने में कारण क्या है ? इस बात को आगे के सूत्र में बताया है—

स्निग्धरूक्षत्वाद्बन्ध:।।३३।।

अर्थ स्निग्ध अर्थात् चिकनाई और रूक्षता यानी रूखापन इन दोनों के कारण ही पुद्गल परमाणुओं का परस्पर में बन्ध होता है। जैसे धूल का धूल से बन्ध नहीं होता, मीठे अर्थात् चिकनाई के मिलने पर होता है।

पुद्गलों में स्निग्ध और रूक्ष गुण पाए जाते हैं बस किन्हीं परमाणुओं में स्निग्धता ज्यादा होती है और किन्हीं में रूक्षता। इन दोनों के अविभाग प्रतिच्छेद बहुत से होते हैं, शक्ति रूप में सबसे जघन्य अंश को अविभागी प्रतिच्छेद कहते हैं। एक-एक परमाणु में अनंत अविभाग प्रतिच्छेद होते हैं जो घटते-बढ़ते रहते हैं जिससे परमाणुओं में चिकनाई या रूखापन कम या अधिक पाया जाता है जिसका अनुमान हम स्कन्धों को देखकर लगा सकते हैं। जैसे जल से बकरी के दूध में, बकरी के दूध से गाय के दूध में, गाय के दूध से भैंस के दूध में चिकनाई अधिक पाई जाती है। इसी प्रकार धूल से रेत में, रेत से बजड़ी में रूखापन अधिक होता है और यही पुद्गल के बन्ध में कारण है, पुद्गल के अन्य गुण या पर्याय बन्ध कराने में कारण नहीं हैं। अनेक पदार्थों में एकपने का ज्ञान कराने वाले सम्बन्ध को बन्ध कहते हैं। आत्मा में कर्मों का बन्ध भी स्निग्ध अर्थात् राग और रूक्षता अर्थात् द्वेष के कारण होता है। यदि राग-द्वेष न हो तो कर्मबन्ध नहीं हो सकता। चूँकि मुक्त जीव कर्मबन्ध से रहित होते हैं अत: फिर संसारी नहीं होते।

एक गुण वाले परमाणु में बंध का अभाव है, ऐसा इस सूत्र में आचार्यश्री बताते हैं—

न जघन्य गुणानाम्।।३४।।

अर्थ जघन्य गुण सहित परमाणुओं का बन्ध नहीं होता। एक गुण वाले परमाणु में बन्ध का अभाव होता है। जघन्य गुण वाले परमाणुओं का बन्ध नहीं होता। जिन परमाणुओं में रूक्षता का अविभागी बन्ध करना चाहें तो नहीं होगा। स्निग्धता और रूक्षता के अविभागी प्रतिच्छेदों को गुण कहते हैं और जिस परमाणु में स्निग्धता और रूक्षता का एक अविभागी अंश हो उसे जघन्य गुण सहित परमाणु कहते हैं।

अब बताते हैं कि बन्ध कब नहीं होता—

गुण साम्ये सदृशानाम्।।३५।।

अर्थ गुणों की समानता होने पर समान जाति वाले परमाणुओं का बन्ध नहीं होता। जैसे—दो गुण वाले स्निग्ध परमाणु का अन्य दो गुण वाले स्निग्ध परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता। दो गुण रूक्षता वाले परमाणु का दो गुण रूक्षता वाले परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता। इसी तरह दो गुण रूक्षता वाले परमाणु का दो गुण स्निग्धता वाले परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता। गुणों की विषमता में समान जाति वाले अथवा भिन्न जाति वाले पुद्गलों का बन्ध हो जाता है।

बन्ध किनका होता है, इस बात को बताते हैं—

द्व्यधिकादि गुणानां तु।।३६।।

अर्थकिन्तु दो अधिक गुण वालों के साथ ही बन्ध होगा अर्थात् जब एक परमाणु से दूसरे परमाणु में दो अधिक गुण होते हैं तभी बन्ध होता है।

जैसे दो गुण वाले परमाणु का चार गुण वाले परमाणु के साथ बन्ध होगा इससे अधिक व कम गुण वाले के साथ नहीं होगा। यह बन्ध स्निग्ध का स्निग्ध के साथ, रूक्ष का रूक्ष के साथ, स्निग्ध का रूक्ष के साथ तथा रूक्ष का स्निग्ध के साथ होता है।

बन्ध होने पर होने वाली अवस्था बताई है—

बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च।।३७।।

अर्थ बन्ध होने पर अधिक गुण वाले परमाणु कम गुण वाले परमाणु को अपने रूप बना लेते हैं जैसे—गुड़ ज्यादा है तो धूल को गुड़ रूप परिवर्तित कर लिया और यदि थोड़ा सा गुड़ ज्यादा सी धूल में चला जाये तो कोई खायेगा क्या ? नहीं खायेगा।

द्रव्य का लक्षण दूसरी प्रकार से भी बताते हैं—

गुणपर्ययवद् द्रव्यम्।।३८।।

अर्थ जिसमें गुण और पर्यायें पाई जाती हैं वह द्रव्य है।

द्रव्य में अनेक परिणमन होने पर भी जो द्रव्य से भिन्न नहीं होता सदा द्रव्य के साथ ही रहता है वह गुण है और जो द्रव्य में आती जाती रहती है वह पर्याय है। गुण पर्याय रूप ही द्रव्य है। जैसे—ज्ञान आदि जीव के गुण हैं और रूप आदि पुद्गल के गुण हैं। हाँ! ज्ञान गुण में भी घट, पट रूप परिणमन होता है, यह परिणमन का ही पर्याय है। ज्ञान नामक आत्मा का गुण नष्ट नहीं होता है। पर्याय में उत्पाद व्यय की और गुण से ध्रौव्य की प्रतीति हो जाती है।

अब बताते हैं कि काल भी द्रव्य है—

कालश्च।।३९।।

अर्थकाल भी द्रव्य है क्योंकि यह भी उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य तथा गुण पर्यायों से सहित है।

काल भी द्रव्य है उसमें भी उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य तथा गुण, पर्याय विद्यमान है। अभी जो साढ़े तीन बजे का समय था, वह नष्ट हो गया, पौने चार बज गया तो समय जरूर रहा पर टाईम बदल गया। यह अमूर्तिक द्रव्य है क्योंकि इसमें रूप, रस आदि गुण नहीं पाए जाते हैं। यह एकप्रदेशी है बहुप्रदेशी नहीं है क्योंकि लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश पर एक-एक कालाणु रत्नों की राशि की तरह अलग-अलग स्थित है। वे आपस में मिलते नहीं हैं अत: कालद्रव्य काय नहीं है और प्रत्येक कालाणु एक-एक कालद्रव्य है अत: कालद्रव्य असंख्यात हैं और वे निष्क्रिय हैं, एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश पर नहीं जाते हैं, जहाँ के तहाँ ही बने रहते हैं।

कालद्रव्य की विशेषता बताई हैै—

सोऽन्तसमय:।।४०।।

अर्थवह कालद्रव्य अनन्त समय वाला है यद्यपि वर्तमान काल एक समय मात्र ही है तथापि भूत, भविष्यत् की अपेक्षा अनन्त समय वाला है।

कालद्रव्य अनन्त समय वाला है। कालद्रव्य के सबसे छोटे हिस्से को समय कहते हैं। मन्द गति से चलने वाला पुद्गल परमाणु आकाश में एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश पर जितने काल में पहुँचता है उतना काल ‘एक समय’ है। इन समयों के समूह से ही आवली, घंटा आदि व्यवहारकाल होता है। यह व्यवहारकाल निश्चय कालद्रव्य की पर्याय है। लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश पर रत्नों की राशि की तरह जो स्थित है उसे निश्चयकाल कहते हैं, वर्तना उसका कार्य है।

गुण का लक्षण क्या है, सो ही बताते हैं—

द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणा:।।४१।।

अर्थ जो सदा द्रव्य के आश्रय से रहता है और जिसमें दूसरे द्रव्य का गुण नहीं रहता है, उन्हें गुण कहते हैं। जैसे—जीव का ज्ञान, दर्शन आदि।

ये जीव द्रव्य के आश्रय से रहते हैं तथा इनमें कोई दूसरा गुण नहीं रहता। गुण तो सदा ही द्रव्य के आश्रय से रहता है, कभी भी द्रव्य को नहीं छोड़ता किन्तु पर्याय अनित्य होती है एक जाती है, दूसरी आती है अत: गुण का उक्त लक्षण पर्याय में नहीं रहता। दीपक को देखने हेतु कोई दीपक नहीं ले जाता, ज्ञानी ज्ञान को देखने नहीं जाता है, वैसे ही द्रव्य को देखने द्रव्य नहीं जाता है।

पर्याय का लक्षण बताते हुए इस अध्याय के अन्तिम सूत्र में आचार्यश्री कहते हैं—

तद्भाव: परिणाम:।।४२।।

अर्थजीवादि द्रव्य जिस रूप हैं उनके उसी रूप रहने को परिणाम या पर्याय कहते हैं जैसे—जीव की नर-नारकादि पर्याय।

पर्याय का होना अर्थात् प्रति समय बदलते रहना परिणाम है। जिस द्रव्य का जो स्वभाव है वही परिणाम है जैसे धर्मद्रव्य का गति.०००००००००००.०.

निमित्तता ही तद्भाव है। सभी द्रव्यों में ऐसा ही समझना।

जैसे—मनुष्य बालक से युवा और युवा से वृद्ध हो जाता है लेकिन मनुष्य पर्याय सदैव विद्यमान रहती है वैसे ही प्रत्येक द्रव्य अपनी धारा के भीतर रहते हुये परिवर्तन करता रहता है। इस पर्याय के दो भेद हैं—१. व्यंजन पर्याय, २. अर्थ पर्याय। प्रदेश तत्त्व गुण के विकार को व्यंजन पर्याय कहते हैं और अन्य गुणों के अविभागी प्रतिच्छेदों के परिणमन को अर्थ पर्याय कहते हैं।

आपने इस प्रकार जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन छहों द्रव्यों को जाना। इनमें से कौन-सा द्रव्य अधिक विलक्षण है हमने जान लिया, वह है—जीव द्रव्य। इसके अस्तित्व को जानकर हमें एक दिन उस परमात्म अवस्था को, मुक्त अवस्था को प्राप्त करना है जिससे पुन:-पुन: इस संसार में इस जीव को भटकना न पड़े।