Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का मंगल चातुर्मास टिकैतनगर-बाराबंकी में चल रहा है, दर्शन कर लाभ लेवें |

पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे तक देखें जिनाभिषेक एवं शांतिधारा पुन: ज्ञानमती माताजी - चंदनामती माताजी के प्रवचन ।

० ४ - अभीक्ष्णज्ञानोपयोग भावना

ENCYCLOPEDIA से
Jainudai (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित १८:५६, ९ जुलाई २०१७ का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
सोलह कारण भावना

अभीक्ष्णज्ञानोपयोग भावना

ज्ञानभावनायां नित्ययुक्तता ज्ञानोपयोग:।।४।।

Shanti-Kunthunath-Arahnath .jpg

जीवादि पदार्थों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जानने वाले मति, श्रुत, अवधि आदि पाँच ज्ञान हैं। इनमें से जो जिनेन्द्र भगवान् के मुखकमल से निकले हुए वचन हैं, उन्हें ही गणधर आदि ऋषियों ने आगम रूप से गूँथा है। उन्हीं की परम्परागत अंश आज भी ग्रंथों में अनुबद्ध है। उन ग्रंथों को गुरुमुख से पढ़ना-पढ़ाना, अभ्यास करना आदि अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग है। इन मति, श्रुत आदि ज्ञानों का साक्षात् फल है अज्ञान का दूर हो जाना तथा हित की प्राप्ति, अहित का परिहार और उपेक्षा का होना यह भी फल है और आगे चलकर इस अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग का फल है पूर्ण ज्ञानस्वरूप अपने आत्मा की उपलब्धि कर लेना अर्थात् अक्षय सुख को प्राप्त कर लेना।

श्री कुन्दकुन्द आदि महान आचार्यों ने हमेशा ग्रंथ रचना में अपना समय बिताया है। इससे स्पष्ट है कि उन महान् आचार्यों ने ग्रंथ रचना के पहले चारों अनुयोगों का बहुत ही गहरा अध्ययन किया था। उनकी रचनाओं से उनका सर्वांगीण महान् ज्ञान लक्षित हो जाता है। ज्ञानाभ्यास से असंख्यात गुण श्रेणी कर्मों की निर्जरा होती है जैसा कि धवला में कहा है-‘‘सुत्तं पुण समयं पडि असंखेज्जगुणसेढीए पावं गालिय पच्छा सव्वकम्मक्खयकारणमिदि।’’१ सूत्र प्रतिसमय असंख्यात गुणित श्रेणीरूप से पापों का नाश करके उसके बाद संपूर्ण कर्मों के क्षय का कारण होता है। श्री कुन्दकुन्द देव कहते हैं-

‘‘सम्मत्तस्स णिमित्तं जिणसुत्तं तस्स जाणया पुरिसा।
अंतरहेऊ भणिदा दंसणमोहस्स खयपहुदी।।

जिनसूत्र और उनके जानने वाले पुरुष सम्यक्त्व के लिये निमित्त हो जाते हैं तथा दर्शनमोह का क्षय, क्षयोपशम आदि होना यह अंतरंग हेतु है। जब जिनवचन में इतनी सामर्थ्य है कि जो मिथ्यात्व का अभाव कर दे तो कहना ही क्या? ये जिनवचन परम औषधि स्वरूप हैं। विषय सुख का विरेचन कराने वाले हैं और अमृत स्वरूप रसायन हैं; जन्म, जरा और मरणरूप व्याधि के तथा सर्व दु:खों के भी क्षय करने में समर्थ हैं। मुनियों के लिए दिन-रात में चार बार स्वाध्याय का विधान है और तो क्या यह स्वाध्याय सर्व बारह प्रकार के तपों में महान् सर्वश्रेष्ठ तप है। एक बार भी विनयपूर्वक पढ़ा गया शास्त्र यदि भूल भी जावें तो भी वह कालांतर में ज्यों की ज्यों उपलब्ध हो जाता है और केवलज्ञान तक को प्राप्त करा देता है। एक वीरभद्र मुनिराज अर्द्धरात्रि में अकाल में स्वाध्याय कर रहे थे। एक देवी ग्वालिन का वेष लेकर वहाँ छाछ बेचने लगी। मुनिराज ने कहा कि ‘‘तू क्या पागल हो गई है? अरे इस निर्जन वन में और रात्रि में छाछ कौन लेगा?’’ उसने कहा ‘‘मुनिवर्य! मुझे तो आप ही पागल दिख रहे हैं चूँकि अकाल में अध्ययन कर रहे हैं।’’ मुनिराज ने अर्धरात्रि के अकाल को समझकर स्वाध्याय बंद कर दिया। पुन: प्रात: गुरु के पास प्रायश्चित्त लेकर शुद्धि करके काल में अध्ययन के प्रभाव से उत्तम देवपद को प्राप्त किया है।

इसके विपरीत एक उदाहरण है

एक शिवनंदी नाम के मुनिराज थे। गुरु ने उन्हें बताया था कि रात्रि में श्रवणनक्षत्र का उदय हो जाने पर स्वाध्याय का समय होता है उसके पहले अकाल है। उन्हें ऐसा मालूम होते हुये भी वे अपने तीव्रकर्म के उदय से उस गुरु-आज्ञा की अवहेलना करके अकाल में स्वाध्याय किया करते थे। फलस्वरूप अंत में असमाधि से मरण करके पापकर्म के निमित्त से गंगा नदी में महामत्स्य हो गये। आचार्यों ने ठीक ही कहा है कि-

‘जिनाज्ञालोपने नैव पाणी दुर्गतिभाग्भवेत्।’

जिनेन्द्रदेव की आज्ञा का लोप करने पर यह प्राणी दुर्गति में चला जाता है। पुन: उस नदी के तट पर स्थित एक महामुनि उच्च स्वर से स्वाध्याय कर रहे थे। इस मत्स्य ने उस पाठ को सुना तो इसे जातिस्मरण हो गया ‘‘ओहो! मैं भी इन्हीं के सदृश मुनिवेष में ऐसे ही स्वाध्याय करता रहता था पुन: मैं इस तिर्यंच योनि में कैसे आ गया? हाय! हाय ! मैं जिनागम की और गुरु की आज्ञा को कुछ न गिनकर अकाल में भी स्वाध्याय करता रहा जिसके फलस्वरूप मुझे यह निकृष्ट योनि मिली है। सच में आगम के पढ़ने का फल तो यही है कि उसके अनुरूप प्रवृत्ति करना, अब मैं क्या करूँ ? कुछ क्षण सोचकर वह मत्स्य किनारे पर आकर गुरु के सन्मुख पड़ गया। गुरु ने उसे भव्य जीव समझकर सम्यक्त्व ग्रहण कराया तथा पंच अणुव्रत दिये। उस मत्स्य ने भी सम्यक्त्व के साथ-साथ अणुव्रत को पालते हुये जिनेन्द्र भगवान के चरण कमलों को अपने हृदय में धारण किया और आयु पूर्ण करके मरकर स्वर्ग में महर्धिक देव हो गया।

‘‘स्वाध्याय के लिये काल और अकाल कब-कब होते हैं ?’’

प्रात:, सायं, मध्यान्ह और अर्धरात्रि के मध्य के डेढ़-डेढ़ घण्टे का समय अकाल है, ऐसे दिग्दाह, उल्कापात, दुर्दिन, संक्राति का दिन आदि भी अकाल है। इनसे अतिरिक्त काल सुकाल है। यह व्यवस्था सिद्धांत ग्रंथादिकों के लिये बताई गई है किन्तु आराधना ग्रंथ, कथा ग्रंथ या स्तुति ग्रंथों को अकाल में पढ़ने का निषेध नहीं है। इस काल और अकाल का विशेष वर्णन मूलाचार, अनगार धर्मामृत एवं धवला की नवमी पुस्तक में देख लेना चाहिए।

अत: इन उदाहरणों से सुकाल में अध्ययन करना चाहिये और इतर समय में सामायिक, स्तवन, वंदना आदि क्रिया करके पढ़े हुए ग्रंथों का मनन, चिंतवन करना चाहिये।