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१. आस्रव के भेद

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मंगलाचरण


पणमिय सुरेन्द्रपूजियपयकमलं वड्ढमाणममलगुणं।
पच्चयसत्तावण्णं वोच्छ़े हं सुणह भवियजणा।।१।।

प्रणम्य सुरेंद्रपूजितपदकमलं वर्धमानं अमलगुणं।
प्रत्ययसप्तपंचाशत वक्ष्येऽहं शृणुत भव्यजनाः।।

सुरेन्द्र से पूजित हैं चरण कमल जिनके,ऐसे अमल गुणों से सहित श्री वर्धमान जिनेन्द्र को नमस्कार करके आस्रव के कारणभूत सत्तावन भेदों को मैं कहूँगा| हे भव्यजीवों! तुम उन्हें सावधानचित्त होकर सुनो!

आस्रव के भेद


मिच्छत्तं अविरमणं कसाय जोगा य आसवा होंति।
पण बारस पणवीसा पण्णरसा होंति तब्भेया।।२।।

मिथ्यात्वमविरमणं कषाया योगाश्च आस्रवा भवन्ति।
पंच द्वादश पंशविंशति: पंचदश भवन्ति तद्भेदा:।।

मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग ये आस्रव कहलाते हैं। ये आस्रव के लिए कारणभूत हैं अत: इन्हें आस्रव कह देते हैं। इनके उत्तर भेद क्रम से मिथ्यात्व के पाँच, अविरति के बारह, कषाय के पच्चीस और योग के पंद्रह भेद होते हैं।।२।।

मिथ्यात्व का लक्षण एवं भेद


मिच्छोदयेण मिच्छत्तमसद्दहणं तु तच्चअत्थाणं।
एयंतं विवरीयं विणयं संसयिदमण्णाणं।।३।।

मिथ्यात्वोदयेन मिथ्यात्वमश्रद्धानं तु तत्त्वार्थानां।
एकांतं विपरीतं विनयं संशयितमज्ञानम्।।

मिथ्यात्व के उदय से जो तत्वों का अश्रद्धान है वह मिथ्यात्व कहलाता है उसके ५ भेद हैं-एकांत, विपरीत, विनय, संशय और अज्ञान।।३।।

अविरति का लक्षण एवं भेद


छिंस्सदिएसुऽविरदी छज्जीवे तह य अविरदी चेव।
इंदियपाणासंजम दुदसं होदित्ति णिद्दिट्ठं।।४।।

षट्स्विन्द्रियेष्वविरति: षड्जीवेषु तथा चाविरतिश्चैव।
इन्द्रियप्राणासंयमा द्वादश भवन्तीति निर्दिष्टं।।

पाँच इंद्रिय और मन इन छह इंद्रियों के विषयों से विरक्त नहीं होना और पाँच स्थावर एवं त्रस ऐेसे षट्काय जीवों की विराधना से विरक्त नहीं होना अविरति है। इस प्रकार से इंद्रिय असंयम और प्राणी असंयम के भेद से अविरति के १२ भेद होते हैं।।४।।

कषाय के भेद


अणमप्पच्चक्खाणं पच्चक्खाणं तहेव संजलणं।
कोहो माणो माया लोहो सोलस कसायेदे।।५।।

अनमप्रत्याख्यान: प्रत्याख्यान: तथैव संज्वलन:।
क्रोधो मानो माया लोभ: षोडश कषाया एते।।

अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण, संज्वलन इन चारों के क्रोध, मान, माया, लोभ के भेद से कषाय के १६ भेद होते हैं।।५।।

हस्स रदि अरदि सोयं भयं जुगंछा य इत्थिपुंवेयं।

संढं वेयं च तहा णव एदे णोकसाया य।।६।।'
हास्यं रति: अरति: शोक: भयं जुगुप्सा च स्त्री-पुंवेदौ।
षंढो वेद: च तथा नवैते नोकषायाश्च।।

एवं हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद ये नव नोकषायें मिलकर कषाय के २५ भेद होते हैं।।६।।

योग के भेद

मणवयणाण पउत्ती सच्चासच्चुभयअणुभयत्थेसु।

तण्णामं होदि तदा तेहिं दु जोगा हु तज्जोगा।।७।।
मनोवचनानां प्रवृत्ति: सत्यासत्योभयानुभयार्थेषु।
तन्नाम भवति तदा तैस्तु योगाद्धि तद्योगा:।।

सत्य, असत्य, उभय और अनुभय अर्थों में मन, वचन की प्रवृत्ति सत्य मन, सत्य वचन आदि नाम से कही जाती है। इन सत्य मन, असत्य मन की प्रवृत्तियों के निमित्त से जो आत्मा के प्रदेशों में हलन, चलन होता है वह योग कहलाता है अत; इन सत्यमन, वचन के योग से सत्य मनोयोग, असत्य मन, वचन के योग से असत्य मनोयोग आदि उन-उन नाम वाले योग कहलाते हैं। इनके नाम-सत्यमनोयोग, असत्य मनोयोग, उभय मनोयोग, अनुभय मनोयोग, सत्यवचन योग, असत्यवचन योग, उभयवचन योग, अनुभय वचन योग, ये मनोयोग, वचनयोग के आठ भेद हुये।।७।।

ओरालं तंमिस्सं वेगुव्वं तस्स मिस्सयं होदि।

आहारय तंमिस्सं कम्मइयं कायजोगेदे।।८।।
औदारिकं तन्मिश्रं वैक्रियिकं तस्य मिश्रकं।
आहारकं तन्मिश्रं कार्मणकं काययोगा एते।।

औदारिक काययोग, औदारिकमिश्र काययोग, वैक्रियक काययोग, वैक्रियकमिश्र काययोग, आहारक काययोग, आहारकमिश्र काययोग और कार्मणयोग ये काययोग के ७ मिलकर योग के पंद्रह भेद होते हैं।।८।।

किन-किन गुणस्थानों में कौन-कौन से आस्रव हैं ?


मिच्छे खलु मिच्छत्तं अविरमणं देससंजदो त्ति हवे।
सुहुमो त्ति कसाया पुणु सजोगिपेरंत जोगा हु।।९।।
मिथ्यात्वे खलु मिथ्यात्वं अविरमणं देशसंयतमिति भवेत्।
सूक्ष्ममिति कषाया: पुन: सयोगिपर्यन्तं योगा हि।।

मिथ्यात्व गुणस्थान तक मिथ्यात्व रहता है, देशसंयत गुणस्थान तक अविरति रहती है, सूक्ष्मसांपराय गुणस्थान तक कषायें रहती हैं एवं सयोगकेवली पर्यंत योग रहते हैं।।९।।

कौन-कौन से विशेष आस्रव किन-किन गुणस्थानों में होते हैं?


मिच्छदुगविरदठाणे मिस्सदुकम्मइयकायजोगा य।
छट्ठे हारदु केवलिणाहे ओरालमिस्सकम्मइया।।१०।।

मिथ्यात्वद्विकाविरतस्थाने मिश्रद्विककार्मणकाययोगाश्च।
षष्ठे आहारद्विकं केवलिनाथे औदारिकमिश्रकार्मणा:।।

मिथ्यात्व, सासादन और असंयत गुणस्थानों में औदारिकमिश्र, वैक्रियक- मिश्र और कार्मण काययोग होते हैं। छठे गुणस्थान में आहारक, आहारकमिश्र योग होते हैं एवं केवली भगवान के औदारिक मिश्र और कार्मण योग होते हैं।।१०।।

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