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आज शीतलनाथ भगवान का केवलज्ञान कल्याणक हैं |

५. गुरु ग्रह अरिष्ट निवारक श्री महावीर जिनेन्द्र पूजा

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श्री महावीर जिनेन्द्र पूजा

गुरुग्रहारिष्ट निवारक

पूजा नं. ६

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-स्थापना-
तर्ज-आने से जिसके आए बहार........

दर्शन से जिनके कटते हैं पाप, पूजन से मिटते हैं गुरुग्रह ताप,
मूरत सुहानी है-तेरी महावीरा, छवि जगन्यारी है-प्रभु महावीरा।।टेक.।।

भक्ति करके तेरी, मैं संताप मन का मिटाऊँ।
अपने मन में तेरी, प्रतिमा नाथ कैसे बिठाऊँ।।
तुम भगवन्, अतिपावन,
महिमा निराली है-तेरी महावीरा, छवि जग न्यारी है-तेरी महावीरा।।१।।

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आज इस मण्डल पर, स्थापित करूँ नाथ! तुमको।
शांति गुरुग्रह की कर, स्वस्थ कर दो प्रभो आज मुझको।।
तुम भगवन्, अतिपावन,
महिमा निराली है-तेरी महावीरा, छवि जग न्यारी है-प्रभु महावीरा।।२।।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं।
ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं स्थापनं।


-अष्टक (स्रग्विणी छंद)-
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क्षीरसिन्धु नीर को मैं भरूँ भृंग में।
तीन धारा करूँ वीर पद पद्म में।।
वीर महावीर वर्धमान की अर्चना।
नाथ! ग्रह वृहस्पती दुःख दे रंच ना।।१।।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
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काश्मीर की सुगन्धियुक्त केशर लिया।
घिस के नाथ के चरण में उसे चर्चिया।।
वीर महावीर वर्धमान की अर्चना।
नाथ! ग्रह वृहस्पती दुःख दे रंच ना।।२।।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
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वासमती के धुले तंदुलों को लिया।
श्रीजिनेन्द्र के निकट पुंज को चढ़ा दिया।।
वीर महावीर वर्धमान की अर्चना।
नाथ! ग्रह वृहस्पती दुःख दे रंच ना।।३।।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।
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भाँति भाँति के गुलाब पुष्प मैंने चुन लिया।
पुष्पमाल को बनाय प्रभु के पद चढ़ा दिया।।
वीर महावीर वर्धमान की अर्चना।
नाथ! ग्रह वृहस्पती दुःख दे रंच ना।।४।।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्राय कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
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शुद्ध नैवेद्य को बनाय थाल भर लिया।
स्वस्थता की प्राप्ति हेतु प्रभु समीप धर लिया।।
वीर महावीर वर्धमान की अर्चना।
नाथ! ग्रह वृहस्पती दुःख दे रंच ना।।५।।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
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स्वर्णथाल में जले रत्नदीप जगमगे।
आरती उतारते ही मोह का तिमिर भगे।।
वीर महावीर वर्धमान की अर्चना।
नाथ! ग्रह वृहस्पती दुःख दे रंच ना।।६।।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
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धूप कर्पूर मिश्रित जला अग्नि में।
नाथ चाहूँ जलाना आज कर्म मैं।।
वीर महावीर वर्धमान की अर्चना।
नाथ! ग्रह वृहस्पती दुःख दे रंच ना।।७।।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
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सेव अंगूर अमरूद भर थाल में।
पादपद्म में चढ़ाय नाऊँ निज भाल मैं।।
वीर महावीर वर्धमान की अर्चना।
नाथ! ग्रह वृहस्पती दुःख दे रंच ना।।८।।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
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जलफलादिक अष्टद्रव्य को सजाय के।
‘‘चन्दनामती’’ अनघ्र्यपद मिले चढ़ाय के।।
वीर महावीर वर्धमान की अर्चना।
नाथ! ग्रह वृहस्पती दुःख दे रंच ना।।९।।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्राय अनघ्र्यपदप्राप्तये अघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।



- शांतिधारा -

शांतिधारा करूँ नाथ के पाद में।
शांति हो विश्व में यही मेरी आश है।।
वीर महावीर वर्धमान की अर्चना।
नाथ! ग्रह वृहस्पती दुःख दे रंच ना।।
शांतये शांतिधारा।

कल्पवृक्ष के सुमन हैं नहीं पास में।
ये ही कोमल कुसुम मैं लिया हाथ में।।
वीर महावीर वर्धमान की अर्चना।
नाथ! ग्रह वृहस्पती दुःख दे रंच ना।।

-दिव्य पुष्पांजलि-
(अब मण्डल के ऊपर गुरुग्रह के स्थान पर श्रीफल सहित अघ्र्य चढ़ावें)

महावीर प्रभू के चरणों में, श्रीफलयुत अघ्र्य चढ़ाएँ हम।
श्रद्धा से प्रभु पद कमलों में, भावों के कुसुम चढ़ाएँ हम।।
यदि जन्मकुंडली में गुरुग्रह, कुछ निम्नश्रेणी में रहता है।
गुण भी अवगुण की तरह बनें, अपमान भी सहना पड़ता है।।
‘‘चन्दनामती’’ ग्रह कष्ट न दें, बस यही भावना भाएँ हम।
श्रद्धा से प्रभु पदकमलों में, भावों के कुसुम चढ़ाएँ हम।।१।।
शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलिः।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्री महावीरजिनेन्द्राय पूर्णाघ्र्यं निर्वपामीति स्वाहा।

जाप्य मंत्र- ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्री महावीरजिनेन्द्राय नमः।



-जयमाला-
तर्ज-फिरकी वाली........

वीरा वीरा, मेरे महावीरा, मेरे अतिवीरा, सन्मति वर्धमान है।
मैंने पूजन रचाई भगवान है।।टेक.।।

चैत्र सुदी तेरस के दिन जब, जन्मकल्याणक आया था।
स्वर्गों से इन्द्रों ने आकर, उत्सव खूब मनाया था।।
ऐरावत पर, तुमको लाकर, चला इन्द्र सह परिकर,
वीरा तुमको, सुमेरूपर्वत की, पांडुकशिला पर, किया विराजमान है।
जन्म अभिषव कर पुकारा तेरा नाम है।
वीरा वीरा, मेरे महावीरा, मेरे अतिवीरा, सन्मति वर्धमान है।
 मैंने पूजन रचाई भगवान है।।१।।

यौवन में ही दीक्षा लेकर, बालयती कहलाए थे।
केवलज्ञान प्राप्त कर प्रभु जी, समवसरण में आए थे।।
दिव्यध्वनि से, सारे जग के,जीव हुए प्रतिबोधित,
वीरा तेरी, सुहानी वाणी, को सुनकर ज्ञानी, बने भगवान हैं।।
सारे जग का सितारा वर्धमान है।।
वीरा वीरा, मेरे महावीरा, मेरे अतिवीरा, सन्मति वर्धमान है।
 मैंने पूजन रचाई भगवान है।।२।।

कार्तिक कृष्ण अमावस के दिन, सिद्ध अवस्था पाई थी।
पावापुरि नगरी में सबने, दीपावली मनाई थी।।
युग के अंतिम, तीर्थंकर तुम, करे ‘‘चन्दना’’ वन्दन,
वीरा तेरी, अमर है कहानी, सभी ने जानी, न तुझ सी कोई शान है।
सारे जग का सितारा वर्धमान है।
वीरा वीरा, मेरे महावीरा, मेरे अतिवीरा, सन्मति वर्धमान है।
मैंने पूजन रचाई भगवान है।।३।।

गुरु ग्रह के स्वामी महावीरा, मेरा गुरु ग्रह उच्च करो।
धर्म में रुचि हो ज्ञान बढ़े, गुरु सम प्रभु रक्षा स्वयं करो।
ऋद्धि सिद्धि में, होवे वृद्धी, पाऊँ धन समृद्धी,
वीरा तेरी, सुखद है कहानी, जगत कल्याणी, सभी को मान्य है।
मैंने पूजन रचाई भगवान है।।४।।

ॐ ह्रीं गुरुग्रहारिष्टनिवारक श्रीमहावीरजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णाघ्र्यम् निर्वपामीति स्वाहा।

शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलिः।




-दोहा-
महावीर भगवान की, पूजा भक्ति महान।
इनकी पूजा से मिले, क्रमशः पद निर्वाण।।

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इत्याशीर्वादः पुष्पांजलिः।