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ॐ ह्रीं शनिग्रहारिष्टशांतिकराय श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय नम:।

अकेलापन

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अकेलापन :

प्रत्येकम् प्रत्येकम् निजभाव्, कर्मफलमनुभवताम्।

क: कस्य जगति स्वजन:? क: कस्य वा परजनो भणित:।।

—समणसुत्त : ५१५

यहाँ प्रत्येक जीव अपने—अपने कर्मफल को अकेला ही भोगता है। ऐसी स्थिति में यहाँ कौन किसका स्वजन है और कौन किसका परजन ?

एगो य मरदि जीवो एगो य जीवदि सयं।

एगस्स जादि मरणं एगो सिज्झदि णीरयो।।

—नियमसार : १०१

जीव अकेला ही मरता है, अकेला ही जन्म लिया करता है। जन्म—मरण अकेले का ही होता है और वह अकेला ही कर्म—रज—रहित सिद्ध हुआ करता है।