Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


परम पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ का ऋषभदेवपुरम् मांगीतुंगी से अयोध्या की ओर मंगल विहार चल रहा है |

मगसिर कृष्णा दशमी को भगवान महावीर का दीक्षा कल्याणक एवं स्वस्ति श्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी का ८वां पीठाधीश पदारोहण दिवस मनाया गया |

संस्कार, संस्कृति और संन्यास

ENCYCLOPEDIA से
Jainudai (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित १४:१२, २० जुलाई २०१७ का अवतरण

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

संस्कार, संस्कृति और संन्यास

अच्छे संस्कारों से संस्कृति की रक्षा होती है अगर हम संस्कारवान बनकर संस्कृति की रक्षा करते हैं तो फिर निश्चित ही धर्म परायण बनकर संन्यास की ओर बढ़ेंगे। संस्कार, संस्कृति और संन्यास की ओर से हमारी विमुखता गंभीर चिन्तन का विषय है। भौतिकता की चकाचौंध में व्यक्ति पाश्चात्य संस्कृति में रच बस गया है, प्राचीन भारतीय संस्कृति से विमुख हो गया है।

बचपन से बालक को हम अच्छे संस्कार देंगे तो वह महान बनेगा, अगर संस्कार बुरे मिले तो पथभ्रष्ट हो जायेगा। प्रात:काल हम बालक को हाथ पकड़कर मंदिर में भगवान के दर्शन करने ले जायेंगे तथा मंदिर के भंडार में कुछ रुपये अपनी जेब से निकालकर बेटे के हाथ से डालने देंगे तो वह जीवन भर भगवान के दर्शन करने सब काम छोड़कर जायेगा तथा दानपेटी में कुछ रुपये डालने की दान की आदत उसे आयेगी। हमारे घर में तुलसी का पौधा लगा है उसे प्रतिदिन हम पवित्र जल डालकर जीवित रखते हैं इसके विपरीत अगर हम तुलसी के पौधे को पानी के स्थान पर शराब से सीचेंगे तो वह पौधा सूख जायेगा। माता—पिता बालक को बचपन में जो कहते हैं बालक उसी का अनुसरण करता है। सत्य बोलना एवं झूठ बोलना बालक को हम ही सिखाते हैं। एक बार पिताजी ने बेटे से कहा बेटा मेरे मित्र आयेंगे तो उनसे कह देना पिताजी घर पर नहीं है। बेटे ने मित्र के आने पर कह दिया—पिताजी घर पर नहीं हैं। मित्र ने पूछा बेटा पिताजी घर कब आयेंगे ? इस प्रश्न का उत्तर पिता ने बेटे को नहीं बताया था। बेटे न कहा—रुको इस प्रश्न का उत्तर अंदर पिताजी से पूछकर आता हूँ। इस प्रकार हम अपनी संतान को झूठ बोलना सिखा रहे हैं। बालक को बचपन से दूध पीने की आदत डालेंगे तो वह दूध पियेगा और हम उसे अपने साथ बैठाकर बीड़ी, सिगरेट एवं शराब पिलायेंगे तो वह जीवन भर इन गंदी आदतों में पड़कर जीवन बर्बाद करेगा।

संस्कारवान बनकर संस्कृति की रक्षा करना एवं संन्यास की ओर बढ़ने के लिये हमें भगवान श्रीराम, सीता एवं लक्ष्मण के चरित्र से प्रेरणा लेना चाहिए। राजा दशरथ द्वारा चौदह वर्ष का वनवास देने पर श्री राम ने तत्काल गमन का निर्णय लिया। पतिव्रता पत्नी का दायित्व निभाते हुए सीताजी ने भी पति के साथ वनवास एवं भाई लक्ष्मण ने भी भाई के साथ वनवास का संकल्प लिया। दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यासागरजी के प्रिय शिष्य मुनि प्रमाणसागरजी महाराज ने कलकत्ता में प्रवचन देते हुए—कुछ महिलाओं से पूछा ‘आज आपके पति चौदह वर्ष के वनवास को जायेंगे तो आप उनका साथ देने वनवास जायेंगी ? चार महिलाओं ने कहा हम अपने पति के साथ वनवास पर चौदह वर्ष क्या जीवन भर के लिए चले जायेंगे। उन महिलाओं का तर्क था वनवास जाना हम पसंद करेंगे, परिवार में तीन–तीन सासों के बीच रहने की अपेक्षा पति के साथ वनवास सहन कर लेंगे। मुनिश्री ने आगे कहा—वर्तमान परिवेश में पत्नि से कहा जाये कि वनवास पर चलना है तो वह तत्काल विवाह विच्छेद पत्रों पर हस्ताक्षर करने हेतु पति से कह देगी तथा जीवन निर्वाह भत्ता की मांग का दावा न्यायालय में दायर कर देगी।

भगवान महावीर सत्य अहिंसा के प्रतीक हैं, भगवान श्रीराम मर्यादा के प्रतीक है, स्वामी विवेकानन्द आध्यात्मिकता के प्रतीक हैं, महात्मा गाँधी शान्ति के प्रतीक हैं, सत्य, अहिंसा, मर्यादा, आध्यात्मिकता एवं शांति भारतीय संस्कृति के अमर पहलु हैं।

तीर्थ उद्धारक संत मुनि सुधासागरजी ने गुना में प्रवचन करते हुए संस्कार एवं प्राचीन संस्कृति का स्मरण कराया। आपने कहा एक जनवरी को नववर्ष ईसाई धर्म का है। एक अप्रैल को नया वर्ष मनाना गलत है यह तो मूर्ख दिवस है। आपने कहा कि जैन धर्म के अनुसार श्रावण कृष्णा एकम नये वर्ष की शुरुआत का दिवस है। चतुर्थकाल की समाप्ति के बाद पंचम काल का शुभारंभ इसी दिन हुआ था। आपने आह्वान किया इसी दिन अपने मित्रों को नववर्ष की बधाई की परम्परा प्रारंभ करें।

सुधासागरजी ने कहा सारे विश्व की पाश्चात्य संस्कृति खारे समुद्र की भाँति है और भारत की संस्कृति मीठे गंगाजल के समान है। आपने आह्वान किया यदि हमने इस मीठे जल की गंगा रूपी संस्कृति को नहीं बचाया तो यह समुद्र के खारे जल में विलय हो जायेगी।

अच्छे संस्कारों से हम संस्कृति की रक्षा करेंगे। मुनिराज ने कहा हमारे देश को गर्व से भारत कहें इण्डिया कहना बंद करें। भारतीय संस्कारों एवं संस्कृति की रक्षा के लिये हजारों अमर शहीदों ने प्राणों की आहूति दी। वर्षों तक जेल में रहकर यातनायें सही। लेकिन भारतवासी अब विदेशी अंग्रेजों द्वारा स्थापित नववर्ष मनाकर हमारे शहीदों को अपमान कर रहे हैं।

सुसंस्कारों से संस्कृति की रक्षा होगी एवं हम संन्यास की ओर बढ़ेगे। भगवान महावीर, भगवान श्रीराम, भगवान बुद्ध, महात्मा गाँधी, स्वामी विवेकानन्द आदि महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेना चाहिए। जिन्होंने संस्कारों से संस्कृति की रक्षा की ओर संन्यास ग्रहण किया।



—प्रस्तुति : स्वराज जैन, टाइम्स ऑफ इंडिया
जैन प्रचारक सितम्बर अक्टूबर नवम्बर २०१४