01.शाकाहार बनाम मांसाहार

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शाकाहार बनाम मांसाहार

हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि विश्व के सभी धर्मों के प्रणेता व महापुरुषों ने हिंसा, क्रूरता, असत्य, क्रोध, द्वेष व अन्य जीवों को अकारण कष्ट व पीड़ा पहुँचाने को गुनाह बताया है व अहिंसा, दया, क्षमा, सत्य, करुणा आदि को धर्म बताया है । उनकी मुख्य शिक्षा हर प्राणी मात्र में उस परम पिता परमात्मा की झलक देख कर सब के साथ अच्छा व्यवहार करने की ही है । उन महापुरुषों ने न केवल मांसाहार की निन्दा की बल्कि सब जीव, जन्तुओं, पशु, पक्षियों के साथ दया व करुणा पूर्ण व्यवहार की शिक्षा दी व अनाज आदि खिला कर उनका पालन पोषण करने को शुभ कर्म बताया है ।

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प्रकृति ने भी जंहाँ मानव के आहार के लिए अनेक वनस्पति व स्वादिष्ट पदार्थ उत्पन्न किए वहीं उसकी सेवा व सहायता के लिए विभिन्न पशु पक्षियों की सृष्टि की । वे पशु, पक्षी जो एक ओर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं तो दूसरी ओर मानव की तनिक सी दया व प्रेम पाकर उसके मनुष्यों से भी अधिक स्वामीभक्त व वफादार बन कर उसकी जी जान से सेवा करते हैं ।

वही मानव जिसकी शरीर रचना भी प्रकृति ने मांसाहारी प्राणियों जैसी न बना कर शाकाहारी प्राणियों जैसी बनाई, यदि प्रकृति, धर्म व महापुरूषों के निर्देशों की अवहेलना कर, मांसाहार करता है तो यह उसकी कितनी बड़ी कृतघ्नता व दुष्कर्म है । संसार के सभी जीव जन्तु हमारी ही भांति उस परम पिता परमात्मा की सन्तान हैं । क्या वह परम पिता अपनी एक सन्तान द्वारा दूसरी सन्तान को अकारण मारने के अपराध को सहन करेगा? नहीं, कभी नहीं । कर्म का फल तो मिलेगा ही । शुभ या अशुभ कोई भी कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाता, उसका पुरस्कार व दण्ड हमे देर सवेर अवश्य ही मिलता है, और मिलेगा । यह निश्चित व अटल सत्य है ।

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आज जब विश्व के हर कोने से वैज्ञानिक व डाक्टर यह चेतावनी दे रहे हैं कि मांसाहार कैंसर आदि असाध्य रोगों को देकर आयु क्षीण करता है और शाकाहार अधिक पौष्टिकता व रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है, फिर भी मानव, यदि नकल या आधुनिकता की होड़ में मांसाहार करके अपना सर्वनाश करे, तो यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा । पशुओं को मारने से पूर्व उनके शरीर में पल रहे रोगों की उचित जांच नहीं की जाती और उनके शरीर में पल रहे रोग मांस खाने वाले के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, फिर जिस त्रास व यन्त्रणा पूर्व वातावरण में इनकी हत्या की जाती है उस वातावरण से उत्पन्न हुआ तनाव, भय, छटपटाहट, क्रोध आदि पशुओ के मांस को जहरीला बना देता है । वह जहरीला. रोग ग्रस्त मांस, मांसाहारी के उदर में जाकर उसे असाध्य रोगों का शिकार बनाता है और मानों दम तोड़ते हुए पशु का यह प्रण पूरा करता हैं कि जैसे तुम मुझे खाओगे मैं तुम्हें खाऊँगा । हे मांसाहारी बंधुओं!, कृपया अगली बार मांसाहार से पूर्व एक बार बूचड़खाने व मुर्गीखाने (poultry farm)' (गुणा) में जाकर इन मूक प्राणियों पर किए जाने वाले अत्याचार, उनकी वेदना व उन पशुओं के चेहरों के भावों को अपनी आँखों से अवश्य देखें और मांसाहार के समय अपने ही गले को धीरे- धीरे कटते, उसमें से रक्त की धारा को बाहर निकलते अपनी ही ओंसुओं से भरी आखों से देखने की कल्पना करें और फिर अपनी अन्तरात्मा से पूछें कि क्या हमारी श्रेष्ठता व मानवता इसी में हैं कि हम केवल अपने स्वाद के लिये निरपराध प्राणियों का वह जीवन उन से सदा के लिए छीन लें जो हम उन्हें दे नहीं सकते ।

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प्रिय बंधुओं, कृपया अपने हानि लाभ का ही विचार करें, मांसाहार पौष्टिकता की जगह, असाध्य रोग देकर आयु घटाता है, यह मन, बुद्धि को दूषित कर सुख शांति नष्ट कर हमारा नैतिक व चारित्रिक पतन कर, न केवल हमें अपितु हमारी आने वाली पीढ़ी को भी असाध्य रोगों व अपार कष्टो की ओर धकेल रहा है । अपनी प्राणो से भी प्रिय सन्तान को मांसाहार जनित रोगों हृदय रोग. कैंसर आदि से व अन्य सामाजिक हानियों से बचाने के लिए आज ही मांसाहार का परित्याग करें । भूल सुधार के लिए हर पल उत्तम है, शास्त्रो' के अनुसार मांसाहार का परित्याग करने वाले को भी यन् करने वाले के समान फल मिलता है