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04. आधुनिक पीढ़ी में खान-पान शुद्धि’’

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आधुनिक पीढ़ी में खान-पान शुद्धि’’

-प्रो. (डॉ.) विमला जैन ‘विमल’, फिरोजाबाद (उ.प्र.)


आधुनिक पीढ़ी दिखे, सुन्दर, सभ्य, विशिष्ट,

खान-पान भी शुद्ध हो, धर्म-समाज अभिष्ट ।

किन्तु विडम्बना आज की, रहा न हृदय विवेक,
भक्ष्याभक्ष्य अज्ञात सब, आमिष-मिष हैं एक ।

जन्मत ‘मधु’ दिया मात ने, मदिरा दयी चटाय,
माँ उरोज नहीं दूध था, डिब्बा दूध पिलाय ।

मैगी, पिज्जा, केक खा, ब्रेड-बटर, फास्टफूड,
कोका-कोला, कोल्डड्रिंक, बीयर पी भये श्रूड ।

होटल खाना खा रहे, दम्पत्ति बच्चों संग,
फैशन के इस दौर में, सभी विदेशी रंग ।

इधर गरीबों के लिए, ‘मिड-डे-मील’ तैयार,
भक्ष्याभक्ष्य चले सभी, खायें शिशु नर नारि ।

नव पीढ़ी अपसंस्कृति, वहकी हुई अशुद्ध,
शासन-सत्ता लक्ष्य है, हो जाओ सब गिद्ध ।

रोटी-बेटी शुचिरता, पोंगा-पन्थी होय,
कुल मर्यादा-धर्म की, बात न माने कोय ।

धर्म-समाज अरु शिष्ट जन, देखें मुख लटकाय,
अब पुरुषारथ चाहिए, भव्य बढ़े सत्कार्य ।

डिब्बे और बाजार का, खाना सभी अभक्ष्य,
जैनी हो, टल जा अभी, यहाँ नहीं कुछ भक्ष्य ।

जैसा खाता अन्न है, वैसी चर्या, मन्न,
तामस खान रु पान से, मानवता चढ़ा जिन्न ।

आधुनिक पीढ़ी को यदि, परिजन दें संस्कार,
शिक्षक और समाज मिल, शुचि चर्या-व्यापार ।

नारी माँ, संस्कार युत, खाये और खिलाय,
शुचि आहार-विहार से, बचपन देय सजाय ।

शुद्ध क्षेत्र द्रव्य, काल में, भोजन बने विशुद्ध,
घर की नारी दे खिला, प्यार अरु प्रीति शुद्ध ।

स्वस्थ-बलिष्ट शरीर हो, चारित्र-भाव विशुद्ध,
पाप-व्यसन अरु भ्रष्टता, मानव बने न गिद्ध ।

दिन खाना, पानी छना, जिन दर्शन हो नित्य,
‘विमल’ नई पीढ़ी रहे, खिले धर्म आदित्य ।