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07. छठी चूलिका अधिकार ( उत्कृष्ट स्थितिबंध )

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विषय सूची

छठी चूलिका अधिकार (उत्कृष्ट स्थितिबंध)

अथ उत्कृष्टस्थितिबंध:

षष्ठचूलिकााधकार:
मंगलाचरणम्
आयुश्चतुरशीत्यामा, लक्षपूर्व-प्रमाणक:।
इक्ष्वाकुवंशभास्वान् य:, पुरुदेवो पुनातु न:।।१।।
युगादौ येन कर्मभूमिसृष्टे: स्रष्टा भूत्वा धर्मतीर्थप्रवर्तनं कृत्वा मोक्षमार्गस्य विधाता बभूव, यस्य च जन्मजयन्तीमहामहोत्सवस्य संदर्भेऽद्य तस्यैव भगवत: जीवनदर्शनमाश्रित्य संगोष्ठी संप्रति१ चलति, तस्मै श्रीऋषभदेवाय अस्माकं नमो नम:।
अथ षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे जीवस्थानचूलिकाया: अन्तर्गतायां षष्ठ्यां उत्कृष्टस्थितिबंध-चूलिकायां दशभि: स्थलै: चतुश्चत्वािंरशत्सूत्राणि वक्ष्यन्ते। प्रथमतस्तावत् प्रकृतिसमुत्कीर्तनस्थानसमुत्कीर्तनाभ्यां प्रकृतिबंधस्य प्ररूपणं कृत्वा अधुना स्थितिबंधस्य कथनं कर्तव्यं। कीदृशि स्थितिबंधे वा सम्यक्त्वं न लभ्यते इति जिज्ञासायां इयं चूलिका अवतारिता। तत्र प्रथमस्थले उत्कृष्टस्थितिबंधे सति सम्यक्त्वं लभते न वा तथा चास्य बंधस्य कथनप्रतिज्ञारूपेण ‘‘केवडि कालट्ठिदीएहि’’ इत्यादिना सूत्रद्वयं। तत: परं द्वितीयस्थले ज्ञानावरणादि-विंशतिकर्मणां उत्कृष्टस्थितिबंधस्य आबाधायाश्च प्रतिपादनार्थं ‘‘तं जहा’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं। तदनंतरं तृतीयस्थले सातावेदनीयादिचतु:प्रकृतीनां सर्वोत्कृष्टस्थितिप्रतिपादनाय ‘‘सादावेदणीय’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले मिथ्यात्वषोडशकषायाणां उत्कृष्टस्थितिसूचनार्थं ‘‘मिच्छत्तस्स’’ इत्यादिसूत्रषट्कं। ततश्च पंचमस्थले पुरुषवेदादिपंचदशप्रकृति-उत्कृष्टबंधकथनत्वेन ‘‘पुरिसवेद’’-इत्यादिसूत्रत्रयं। अनंतरं षष्ठस्थले नपुंसकवेदादित्रिचत्विंरशत्प्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिबंधसूचकत्वेन ‘‘णउंसयवेद-’’ इत्यादि सूत्रत्रयं। तत: परं सप्तमस्थले चतुर्विधायु:कर्मणामुत्कृष्टस्थितिबंधनिरूपणत्वेन ‘‘णिरयाउ’’ इत्यादिसूत्राष्टकं। पुनश्च अष्टमस्थले द्वीन्द्रियाद्यष्टप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिबंधकथनत्वेन ‘‘वीइंदिय’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत्पश्चात् नवमस्थले आहारशरीर-आहारांगोपांग-तीर्थकरप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिबंधप्ररूपणत्वेन ‘‘आहारसरीर’’इत्यादिसूत्रत्रयं। पुनश्च दशमस्थले न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थानादि-त्रिसंस्थान-त्रिसंहननप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिबंधप्रतिपादनपरत्वेन ‘‘णग्गोध’’ इत्यादिना नव सूत्राणि कथ्यन्ते इति षष्ठीचूलिकाया इयं समुदायपातनिका सूचिता भवति।
संप्रति तृतीयप्रश्नस्योत्तरं प्रयच्छता श्रीमद्भूतबलिसूरिवर्येण उत्कृष्टस्थितिबंधप्रतिपादनप्रतिज्ञापनाय च सूत्रद्वयमवतार्यते-केवडि कालट्ठिदीएहि कम्मेहि सम्मत्तं लभदि वा ण लभदि वा, ण लभदि त्ति विभासा।।१।।
एत्तो उक्कस्सयट्ठिदिं वण्णइस्सामो।।२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कालापेक्षया कियत्स्थितिमत्कर्मभि: जीव: सम्यक्त्वं लभ्यते कियत्स्थितिमत्कर्मभि: सम्यक्त्वं न लभ्यते इति एषा पृच्छा वर्तते। एतस्य पृच्छासूत्रस्य द्रव्यार्थिकनयमवलम्ब्य अवस्थानात् संगृहीताशेषपदार्थस्य व्याख्याने क्रियमाणे तत्र यत्सम्यक्त्वं न लभ्यते इति पदं तस्य विभाषा क्रियते। तासां स्थितीनां प्ररूपणां कुर्वता उत्कृष्टस्थितिवर्णनार्थं उत्तरसूत्रमवतारितं।
एत्तो-एतस्मादग्रे उत्कृष्टस्थितिं वर्णयिष्याम:।
किमर्थमत्र स्थितिप्ररूपणा क्रियते ?
न, संगृहीतार्थशेषस्थितिविशेषकर्मस्थितौ अनवगतायां एषा स्थिति: सम्यक्त्वग्रहणयोग्या एषापि न योग्या इति प्ररूपणाया: उपायाभावात्, उत्कृष्टस्थितिं बध्नन् जीव: प्रथमसम्यक्त्वं न प्रतिपद्यते इति ज्ञापनार्थं वा उत्कृष्टस्थितिप्ररूपणा क्रियते।
का स्थिति: इति चेत् ?
योगवशेन कर्मस्वरूपेण परिणतानां पुद्गलस्कंधानां कषायवशेन जीवे एकस्वरूपेण अवस्थानकाल: स्थिति: नाम।
उक्तं चान्यत्रापि-‘प्रकृति: स्वभाव:। निंबस्य का प्रकृति:? तिक्तता। गुडस्य का प्रकृति:? मधुरता। तथा ज्ञानावरणस्य का प्रकृति:? अर्थानवगम:। इत्यादि:। तदेवं लक्षणं कार्यं प्रक्रियते प्रभवत्यस्या इति प्रकृति:। तत्स्वभावदप्रच्युति: स्थिति:। यथा-अजागोमहिष्यादिक्षीराणां माधुर्यस्वभावादप्रच्युति: स्थिति:। तथा ज्ञानावरणादीनामर्थावगमादिस्वभावादप्रच्युति: स्थिति:।’’ तद्रसविशेषोऽनुभव: यथा अजागोमहिष्यादिक्षीराणां तीव्रमंदादिभावेन रसविशेष:। तथा कर्म पुद्गलानां स्वगतसामथ्र्यविशेषोऽनुभव:। इयत्तावधारणं प्रदेश:। कर्मभावपरिणतपुद्गलस्कंधानां परमाणु परिच्छेदेनावधारणं प्रदेश:।’’ इति प्रकृतिस्थिति-अनुभवप्रदेशभेदात् चतुर्विधो बंध: उच्यते।
तासां उत्कृष्टस्थितिश्चैव प्रथमं किमर्थमुच्यते ?
न, उत्कृष्टस्थितौ संगृहीताशेषस्थितिविशेषायां प्ररूपितायां सर्वस्थितीनां प्ररूपणा सिद्धे:।
एवं प्रथमस्थले उत्कृष्टस्थितिनिरूपणसूचकत्वेन द्वे सूत्रे गते।
अधुना ज्ञानावरणादिविंशतिप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-तं जहा।।३।।
पंचण्हं णाणावरणीयाणं णवण्हं दंसणावरणीयाणं असादावेदणीयं पंचण्हमंतराइयाणं उक्कस्सओ ट्ठिदिबंधो तीसं सागरोवमकोडाकोडीओ।।४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतेषां उक्तकर्मणां उत्कृष्टा स्थिति: त्रिंशत्सागरोपमकोटाकोटिमात्रा भवति।
तत्र एकसमयप्रबद्धपरमाणुपुद्गलानां किं सर्वेषामपि त्रिंशत्सागरोपमकोटाकोटिस्थितिर्भवति आहोस्वित् न भवति इति ? प्रथमपक्षे उपरि उच्यमाणाबाधानिषेकसूत्रयोरभावप्रसंगात्। समानस्थितिकर्मस्कंधेषु आबाधानिषेकविशेषाणामस्तित्वविरोधात्। द्वितीयपक्षे ज्ञानावरणादीनां त्रिंशत्सागरोपमकोटाकोटिस्थितिरिति न घटते, तत: समयोनादिस्थितीनामपि तत्रोपलंभात् ?
अत्र परिहार: उच्यते, तद्यथा-न तावदेकसमयप्रबद्धपरमाणुपुद्गलानां पृथक्-पृथक् ज्ञानावरण-विवक्षात्रास्ति, ज्ञानावरणस्य अनन्तत्वप्रसंगात्। न निषेकं प्रति ज्ञानावरणव्यपदेशोऽस्ति, तस्यासंख्येयत्वप्रसंगात्। तत: मतिश्रुतावधिमन:पर्ययकेवलज्ञानावरणसामान्यस्य मतिश्रुतावधिमन:पर्ययकेवलज्ञानावरणत्वमिष्यते, अन्यथा ज्ञानावरण प्रकृतीनां पंचकत्वविरोधात्। अत्रापि न प्रथमपक्षोक्तदोष:, अनभ्युपगमात्। न द्वितीयपक्षोक्तदोषोऽपि, तत: समयोनादिस्थितीनां उत्कृष्टस्थिते: द्रव्यार्थिकनयावलंबने अपृथग्भूतानां पृथग्निर्देशानुपपत्ते:। संप्रति द्रव्यार्थिकनयदेशनाया: व्याकुलितचित्तस्य पर्यायार्थिकनयशिष्यस्य मतिव्याकुलत्वविनाशनार्थं पर्यायार्थिकनयदेशना अग्रिमसूत्रे क्रियते।
एषां कर्मणां उत्कृष्टस्थिति: मयाऽपि बहुबारं बद्धासीत् अधुना आसां स्थितीनां अध्ययनं मननं चिंतनं कृत्वा श्रुतज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमबलेन मनाग् ज्ञानं संप्राप्य पुन: पुन: मया चिन्त्यते यत् एषा उत्कृष्टा स्थिति: कदाचिदपि मयि न बध्येत मध्यमां स्थितिं अवलंब्य इयं जघन्यरूपा भवेदिति भाव्यते, जिनेन्द्रदेववचनस्य पठनस्य सार एष एव।

अथ उत्कृष्टस्थितिबंध (छठी चूलिका अधिकार)

मंगलाचरण

जिनकी आयु चौरासी लाख वर्ष पूर्व की थी, ऐसे इक्ष्वाकुवंश के सूर्य जो पुरुदेव-श्रीऋषभदेव भगवान हैं वे हम सभी को पवित्र करें।

भावार्थ-एक लाख वर्ष को चौरासी से गुणा करने पर एक पूर्वांग होता है।।१।।

इस पूर्वांग को चौरासी लाख से गुणा करने पर एक पूर्व होता है। ऐसे चौरासी लाख पूर्व की भगवान ऋषभदेव की आयु थी। यहाँ उत्कृष्टस्थितिबंध के अधिकार में इस अवसर्पिणी में तीर्थंकर परम्परा में उत्कृष्टस्थिति को प्राप्त ऐसे प्रथम तीर्थंकर प्रभु को नमस्कार किया है। यद्यपि कर्मभूमि में चतुर्थकाल में उत्कृष्टस्थिति एक करोड़ वर्ष पूर्व की है, जिसमें यह मध्यम स्थिति कहलायेगी फिर भी चौबीस तीर्थंकरों में सबसे अधिक आयुस्थिति इन्हीं की थी।

युग की आदि में कर्मभूमिरूप सृष्टि व्यवस्था के स्रष्टा-विधाता अथवा व्यवस्था बनाने वाले-बतलाने वाले जो धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करके मोक्षमार्ग के विधाता हुये हैं और जिनके जन्मजयंती महामहोत्सव के संदर्भ में आज यहाँ (अहमदाबाद में) उन्हीं भगवान के जीवन दर्शन का आश्रय लेकर संगोष्ठी-धर्मचर्चा चल रही है, उन श्रीऋषभदेव भगवान को हमारा बारम्बार नमस्कार होवे।

अर्थात् जिस समय यह अधिकार शुरु किया है, मैं ससंघ अहमदाबाद-सोला, गुजरात में थी, वहाँ कल्पद्रुम विधान, श्री ऋषभदेव संगोष्ठी आदि कार्यक्रम संपन्न हुये हैं।

अब षट्खण्डागम ग्रन्थराज के प्रथम खण्ड में छठे ग्रन्थ में-छठी पुस्तक में जीवस्थान चूलिका के अन्तर्गत ‘उत्कृष्टस्थितिबंध चूलिका’ नाम की इस छठी चूलिका में दश स्थलों द्वारा चवालीस सूत्र कहेंगे। उसमें प्रथम ही प्रकृतिसमुत्कीर्तन और स्थानसमुत्कीर्तन के द्वारा प्रकृतिबंध का प्ररूपण करके अब स्थितिबंध का कथन करना चाहिये।

अथवा ‘किस प्रकार के स्थितिबंध के होने पर सम्यक्त्व की प्राप्ति नहीं होती है’, ऐसी जिज्ञासा होने पर यह चूलिका अवतरित हुई है।

उसमें प्रथम स्थल में उत्कृष्टस्थितिबंध के होने पर सम्यक्त्व प्राप्त होता है या नहीं, तथा उस बंध के कथन की प्रतिज्ञारूप से ‘‘केवडि कालट्ठिदीएहि’’ इत्यादिरूप से दो सूत्र कहेंगे। पुन: दूसरे स्थल में ज्ञानावरणादि बीस कर्मों के उत्कृष्टस्थितिबंध का और उनकी आबाधा का प्रतिपादन करने के लिये ‘‘तं जहा’’ इत्यादि चार सूत्र कहेंगे। इसके बाद तीसरे स्थल में सातावेदनीय आदि चार प्रकृतियों की सर्वोत्कृष्ट स्थिति का प्रतिपादन करने के लिये ‘‘सादावेदणीय’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। इसके पश्चात् चौथे स्थल में मिथ्यात्व और सोलह कषायों की उत्कृष्टस्थिति को सूचित करने के लिये ‘‘मिच्छत्तस्स’’ इत्यादि छह सूत्र कहेंगे। इसके बाद पाँचवें स्थल में पुरुषवेद आदि पन्द्रह प्रकृतियों की उत्कृष्टस्थिति सूचित करने के लिये ‘‘पुरिसवेद-’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। इसके अनन्तर छठे स्थल में नपुंसकवेद आदि तेतालीस प्रकृतियों का उत्कृष्टस्थितिबंध सूचित करने के लिये ‘‘णउंसयवेद-’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। इसके बाद सातवें स्थल में चार प्रकार की आयु कर्मों के उत्कृष्टस्थितिबंध को निरूपित करने के लिये ‘‘णिरयाउ’’ इत्यादि आठ सूत्र कहेंगे। पुन: आठवें स्थल में द्वीन्द्रिय आदि आठ प्रकृतियों का उत्कृष्टस्थितिबंध कहने के लिये ‘‘वीइंदिय-’’ आदि तीन सूत्र कहेंगे। पुन: नवमें स्थल में आहारकशरीर, आहारक-अंगोपांग और तीर्थंकर प्रकृति का उत्कृष्टस्थितिबंध प्ररूपित करते हुये ‘‘आहारसरीर-’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। इसके बाद दशवें स्थल में न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान आदि तीन संस्थान और तीन संहनन प्रकृतियों का उत्कृष्टस्थितिबंध प्रतिपादित करने के लिये ‘‘णग्गोध-’’ इत्यादि नवसूत्र कहेंगे। इस प्रकार छठी चूलिका की यह समुदायपातनिका सूचित की गई है।

अब श्रीमान् भूतबलि आचार्यवर्य तृतीय प्रश्न का उत्तर देते हुये और उत्कृष्टस्थितिबंध के प्रतिपादन की प्रतिज्ञा करते हुये दो सूत्र अवतरित करते हैं-

सूत्रार्थ-

‘काल की अपेक्षा यह जीव कितनी स्थिति वाले कर्मों के द्वारा सम्यक्त्व को प्राप्त करता है अथवा नहीं प्राप्त करता है’ इस वाक्य के अन्तर्गत ‘अथवा नहीं प्राप्त करता है’ इस पद की व्याख्या करते हैं।।१।।

अब इससे आगे उत्कृष्टस्थितिबंध का वर्णन करेंगे।।२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-काल की अपेक्षा कितनी स्थिति वाले कर्मों के होते हुए जीव सम्यक्त्व को प्राप्त करता है और काल की अपेक्षा कितनी स्थिति वाले कर्मों के होते हुए सम्यक्त्व को नहीं प्राप्त करता है, यह एक प्रश्न है। इस पृच्छासूत्र का द्रव्यार्थिकनय का अवलम्बन लेकर अवस्थान होने से संगृहीत समस्त प्रकृत अर्थ का व्याख्यान किये जाने पर उसमें जो ‘सम्यक्त्व को नहीं प्राप्त करता है’ यह पद है, उसकी विभाषा की जाती है। उन स्थितियों का प्ररूपण करते हुये आचार्य ने कर्मों की उत्कृष्टस्थिति के वर्णन के लिये उत्तर सूत्र अवतरित किया है। जैसे कि-‘एत्तो’ अर्थात् इसके आगे उत्कृष्टस्थिति का वर्णन करेंगे।

शंका-यहाँ पर कर्मों की स्थिति का निरूपण किसलिए किया जा रहा है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि समस्त स्थिति विशेषों का संग्रह करने वाली कर्मस्थिति के ज्ञात नहीं होने पर, यह स्थिति सम्यक्त्व को ग्रहण करने के योग्य है और यह स्थिति सम्यक्त्व को ग्रहण करने के योग्य नहीं है। इस प्रकार की प्ररूपणा करने का और कोई उपाय न होने से अथवा कर्मों की उत्कृष्टस्थिति को बांधने वाला जीव प्रथमोपशमसम्यक्त्व को नहीं प्राप्त करता है, इस बात का ज्ञान कराने के लिए कर्मों की उत्कृष्टस्थिति का निरूपण किया जा रहा है।

शंका-स्थिति किसे कहते हैं ?

समाधान-योग के वश से कर्मस्वरूप से परिणत पुद्गल-स्कन्धों का कषाय के वश से जीव में एक स्वरूप से रहने के काल को स्थिति कहते हैं।

सर्वार्थसिद्धि ग्रन्थ में कहा भी है-प्रकृति अर्थात् स्वभाव। नीम की क्या प्रकृति है अर्थात् क्या स्वभाव है ? तिक्त होना-कड़ुवा होना। गुड़ का क्या स्वभाव है ? मीठा होना। उसी प्रकार से ज्ञानावरणकर्म का क्या स्वभाव है ? अर्थ का ज्ञान न होना, इत्यादि। इस लक्षण वाला कार्य जो किया जाता है वह प्रकृति है अथवा जिससे होता है वह प्रकृति है। जिसका जो स्वभाव है उससे च्युत न होना स्थिति है, जैसे-बकरी, गाय, भैंस आदि के दूध का माधुर्य स्वभाव से च्युत न होना स्थिति है, उसी प्रकार से ज्ञानावरण आदि कर्मों के अर्थ का ज्ञान न होने देना आदि स्वभाव से च्युत न होना स्थिति है।

इन कर्मों के रस विशेष का नाम अनुभव है-अनुभाग है, जैसे-बकरी, गाय, भैंस आदि के दूध का अलग-अलग तीव्र मंद आदि रूप से रस विशेष होता है, उसी प्रकार कर्म पुद्गलों का अलग-अलग स्वगत सामथ्र्य-विशेष अनुभव है। तथा इयत्ता-कालमर्यादा का अवधारण करना प्रदेश है। कर्मरूप से परिणत पुद्गलस्कंधों के परमाणुओं की जानकारी करके निश्चय करना प्रदेशबंध है। इस प्रकार प्रकृति, स्थिति, अनुभव और प्रदेश के भेद से बंध चार प्रकार का है।

शंका-इन कर्मों की उत्कृष्टस्थिति ही पहले क्यों कही गयी है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि, समस्त स्थिति विशेषों का संग्रह करने वाली उत्कृष्टस्थिति के प्ररूपित करने पर सर्वस्थितियों के निरूपण की सिद्धि हो जाती है।

इस प्रकार प्रथमस्थल में उत्कृष्टस्थिति के निरूपण की प्रतिज्ञारूप से दो सूत्र पूर्ण हुये।

अब ज्ञानावरण आदि बीस प्रकृतियों की उत्कृष्टस्थिति का प्रतिपादन करने के लिये दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

वह उत्कृष्टस्थिति किस प्रकार है।।३।।

पाँचों ज्ञानावरणीय, नवों दर्शनावरणीय, असातावेदनीय और पाँचों अन्तराय, इन कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इन सूत्रोक्त कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण होती है।

शंका-इस स्थितिबंध में एक समय में बंधे हुए क्या सभी पुद्गल-परमाणुओं की स्थिति तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम होती है अथवा सबकी नहीं होती है ? प्रथम पक्ष के मानने पर आगे कहे जाने वाले आबाधा और निषेक सम्बन्धी सूत्रों के अभाव का प्रसंग आता है, क्योंकि, समान स्थिति वाले कर्म-स्कन्धों में आबाधा, निषेक और विशेष अर्थात् हानिवृद्धि को सूचित करने वाले चय के अस्तित्व मानने में विरोध आता है। द्वितीय पक्ष के मानने पर ज्ञानावरणादि कर्मों की सूत्रोक्त तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण स्थिति घटित नहीं होती है, क्योंकि उस उत्कृष्टस्थिति से एक समय कम आदि स्थितियाँ भी उन कर्मों में पायी जाती हैं ?

समाधान-यहाँ पर उक्त आशंका का परिहार कहते हैं। वह इस प्रकार है-यहाँ पर न तो एक समय में बंधे हुए पुद्गल-परमाणुओं के पृथक्-पृथक् ज्ञानावरण कर्म की विवक्षा है, क्योंकि वैसा मानने पर ज्ञानावरणकर्म के अनन्तता का प्रसंग आता है। न यहाँ पर एक-एक निषेक के प्रति ‘ज्ञानावरण’ ऐसा व्यपदेश (नाम) दिया गया है, क्योंकि, वैसा मानने पर ज्ञानावरण कर्म के असंख्येयता का प्रसंग आता है। इसलिये मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय और केवलज्ञान के आवरण सामान्य के मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय और केवलज्ञानावरणता मानी गई है। अर्थात् यहाँ मति, श्रुत आदि ज्ञानावरणों के भेद-प्रभेदों की विवक्षा नहीं की गई है किन्तु मति, श्रुत आदि पाँच भेदों की सामान्य से ही विवक्षा की गई है। यदि ऐसा न माना जाये, तो ज्ञानावरण की प्रकृतियों के ‘पाँच’ इस संख्या का विरोध आता है। तथा ऐसा मानने पर भी प्रथम पक्ष में कहा गया दोष नहीं आता है, क्योंकि वैसा माना नहीं गया है। अर्थात् एक समय में बंधे हुए पाँचों ज्ञानावरणीय कर्मों के समस्त पुद्गल-परमाणुओं की स्थिति तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण ही स्वीकार नहीं की गई है। इसी प्रकार द्वितीय पक्ष में कहा गया दोष नहीं आता है, क्योंकि, द्रव्यार्थिक नय का अवलम्बन करने पर उस उत्कृष्टस्थिति से अपृथग्भूत एक समय कम, दो समय कम आदि स्थितियों के पृथक् निर्देश की आवश्यकता नहीं रहती।

अब द्रव्यार्थिक नय की देशना से व्याकुलित चित्त वाले, पर्यायार्थिकनयी शिष्य की बुद्धि व्याकुलता को दूर करने के लिये आचार्य पर्यायार्थिकनय की देशना करते हैं।

इन कर्मों की उत्कृष्टस्थिति मैंने भी बहुत बार बांधी है, अब इस समय इन स्थितिबंधों का अध्ययन, मनन, चिन्तन करके श्रुतज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम के बल से किंचित् ज्ञान प्राप्त करके मेरा यह चितन हो रहा है कि ये उत्कृष्ट स्थितियाँ मुझमें कभी न बंधें। मैं मध्यम स्थिति का अवलम्बन लेकर इन्हें जघन्यरूप कर दूँ, ऐसी भावना मेरे द्वारा भायी जा रही है, क्योंकि जिनेन्द्रदेव के वचनों के पढ़ने का सार यही है।

संप्रति एषां कर्मणामाबाधाप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-

तिण्णि वाससहस्साणि आबाधा।।५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-न बाधा अबाधा, अबाधा चैव आबाधा। यस्मिन् समयप्रबद्ध त्रिंशत्कोटाकोटिसागरस्थितिका: परमाणुपुद्गला: सन्ति, न तत्र एकसमयकालास्थितिका: परमाणुपुद्गला: संभवन्ति, विरोधात्। एवं तदुत्कृष्टस्थितिमत्समयप्रबद्धे द्वौ त्रीन् समयान् आदिं कृत्वा त्रिसहस्रवर्षप्रमित-कालस्थितिका अपि पुद्गलपरमाणव: न सन्ति।
कुत एतत् ?
स्वभावात्। ‘ न हि स्वभावा: परपर्यनुयोगार्हा:’ एषा उत्कृष्टा आबाधा।
अस्यायमर्थ:-एकसमयप्रबद्ध: त्रिंशत्सागरोपमकोटाकोटिस्थितिपुद्गलस्कंधै: आत्मन: असंख्यातभागै: सहित: अपकर्षणेन विना स्थितिक्षयेण एतावत्कालं उदयं नागच्छति इति ज्ञातव्यं। समयोन-द्विसमयोनादित्रिंशत्कोटाकोटिसागराणामपि एषा चैवाबाधा भवति यावत् समयोनाबाधाकाण्डकेनोन-उत्कृष्टस्थिति: इति।
कथमाबाधाकाण्डकस्योत्पत्ति: ?
उत्कृष्टाबाधाकालं विरलय्य उत्वृृष्टस्थिते: समखण्डं कृत्वा एकैकरूपं प्रतिदाने आबाधाकाण्डकप्रमाणं प्राप्नोति।
कल्पनारूपेण अंकसंदृष्ट्या तस्य उदाहरणं दीयते-
यदि उत्कृष्टस्थिति: त्रिंशत्समया:, आबाधा त्रिसमया:। तर्हि उत्कृष्टस्थिते: समखंडा: ‘दश दश दश’ तत्र एकैकरूपं दाने आबाधाकांडकप्रमाणंअर्थात् भवति, अस्य स्थितिबंधस्याभ्यन्तरे आबाधाया: त्रिभेदा: संजाता:।
तत्र रूपोनाबाधाकाण्डकमात्रस्थितय: उत्कृष्टस्थिते: यावत् हीना भवन्ति तावत्सा चैव त्रिसहस्रवर्षप्रमिता उत्कृष्टाबाधा भवति। एकाबाधाकाण्डकेन न्यूनोत्कृष्टस्थितिं बध्नत: समयोनत्रिसहस्रवर्षप्रमाणं आबाधा भवति। एतेन स्वरूपेण सर्वस्थितीनामपि आबाधाप्ररूपणं ज्ञात्वा कर्तव्यं। विशेषेण तु-द्वाभ्यामाबाधा-काण्डकाभ्यामूनां उत्कृष्टस्थितिं बध्नत: जीवस्य आबाधा उत्कृष्टा द्विसमयोना भवति। त्रिभिराबाधाकाण्ड-कैरूनामुत्कृष्टस्थितिं बध्नत: आबाधा उत्कृष्टा त्रिसमयोना। चतुर्भिराबाधाकाण्डकै: ऊनामुत्कृष्टस्थितिं बध्नत: आबाधा उत्कृष्टा चतु:समयोना। एवं नेतव्यं यावत् जघन्यस्थिति: इति। सर्वाबाधाकाण्डकेषु वीचारस्थानत्वं प्राप्तेषु समयोनाबाधाकाण्डकमात्रस्थितीनामवस्थिता आबाधा भवति इति गृहीतव्यम्।
अस्योदाहरणमंकसंदृष्ट्या प्रदश्र्यते-यदि उत्कृष्टस्थिति: चतु:षष्टिसमया: तस्य उत्कृष्टाबाधा षोडश समया: सन्ति। अतएव आबाधाकाण्डकप्रमाणं चतु:समया:।
कदाचित् मन्येत् जघन्यस्थितय: पंचचत्वािंरशत्समया: सन्ति। अतएव स्थिते: भेदा: षष्टित: पंचचत्वािंरशत्पर्यंता भवन्ति। येषां रचना आबाधाकांडकानुसारेण एवं भवति-
(१) ६४, ६३, ६२, ६१-उत्कृष्टाबाधा।
(२) ६०, ५९, ५८, ५७-एकसमयोना।
(३) ५६, ५५, ५४, ५३-द्विसमयोना।
(४) ५२, ५१, ५०, ४९-त्रिसमयोना।
(५) ४८, ४७, ४६, ४५-चतु:समयोना।
इमे पंच भेदा: आबाधाया: सन्ति। आबाधाकांडका: ४²५ (आबाधाभेदा:) ·२० स्थितिभेदा:। स्थितिभेदेषु विंशतिषु एकरूपोनं वीचारस्थानं २०-१·१९ वीचारस्थानि।
इमानि वीचारस्थानानि उत्कृष्टस्थितिभ्य: अपनीते सति जघन्यस्थिति: प्राप्नोति। स्थितीनां क्रमहानिरपि इयत्सु स्थानेषु एव भवति।
संप्रति कर्मनिषेकलक्षणप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-निषेचनं निषेक: कर्मपरमाणुस्कंधनिक्षेप: निषेको नाम।
अत्र कश्चिदाह-आबाधायामवगतायां तदुपरि कर्मनिषेको भवति इति अनुत्तेऽपि ज्ञायते ततो नेदं सूत्रं वक्तव्यं ?
नैतत् कथयितव्यं, किंच-प्रवचने अनुमानस्य प्रमाणस्य प्रमाणत्वाभावात्।
उक्तं च-‘‘आगमो हि णाम केवलणाणपुरस्सरो पाएण अणिंदियत्थविसओ अचिंतियसहावो जुत्तिगोयरादीदो। तदो ण लिंगबलेण विंâचि वोत्तुं सक्किज्जदि तम्हा सुत्तमिदमाढवेदव्वं चेव।’’
अत्र निषेकानां अंकसंदृष्टि: विस्तरेण धवलाटीकायां द्रष्टव्यास्ति। संक्षेपेण यदि मन्येत-कस्यचित् कर्मण:स्थिति: उत्कृष्टेन चतु:षष्टि: समया:, आबाधा षोडशसमया:। निषेकस्थितिचतु:षष्टित: आबाधाकालस्य षोडशसमयेषु अपनीतेषु निषेकस्थिति: अष्टचत्वािंरशत्समयप्रमाणास्ति। तथा च समयप्रबद्धेषु पुद्गलपरमाणूनां संख्या त्रिषष्टिशतानि। एषां कोष्टकरचना टीकाग्रन्थे पठितव्या।
एवं द्वितीयस्थले ज्ञानावरणादि कर्मप्रकृतीनामुत्कृष्टस्थितिबंध-आबाधानिषेक कथनत्वेन सूत्र चतुष्टयं गतम्।
संप्रति सातावेदनीयादिप्रकृतिचतुष्कोत्कृष्टस्थितिप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-सादावेदणीय-इत्थिवेद-मणुसगदि-मणुसगदिपाओग्गाणुपुव्विणामाण-मुक्कस्सओ ट्ठिदिबंधो पण्णारस सागरोवमकोडाकोडीओ।।७।।
पण्णारस वाससदाणि आबाधा।।८।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेगो।।९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। अयं स्थितिबंध: पारिणामिकोऽस्ति। पंचदशसागरोपमकोटाकोटिमात्रस्थितिसमयप्रबद्धे कर्मप्रदेशानां मध्ये सुष्ठु यदि जघन्यस्थितय: कर्मप्रदेशा: भवेयु: तर्हि अपि समयाधिकपंचदशवर्षशतमात्रस्थितयो भवेयु:, नोऽध:, तत्र तथाविधपरिणामप्रदेशानाम-संभवात्। संप्रति त्रैराशिकक्रमेण पंचदशवर्षशतमात्राबाधायां आनयनविधि: उच्यते-त्रिंशत्कोटाकोटि-सागरमात्रकर्मस्थिते: यदि आबाधा त्रिसहस्रवर्षमात्रा लभ्यते, तर्हि पंचदशकोटाकोटिसागरमात्रस्थिते: किं लभ्येत इति फलेन इच्छाराशिं गुणयित्वा प्रमाणराशिना अपवर्तिते पंचदशशतवर्षमात्रा आबाधा भवति इति ज्ञातव्यं।
एवं तृतीयस्थले सातावेदनीयादिउत्कृष्टस्थिति-आबाधानिषेकप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
अधुना मिथ्यात्वोत्कृष्टस्थिति-आबाधा-निषेकप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-मिच्छत्तस्स उक्कस्सओ ट्ठिदिबंधो सत्तरि सागरोवमकोडाकोडीओ।।१०।।
सत्तवाससहस्साणि आबाधा।।११।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी णिसेगो।।१२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अतीवाप्रशस्तत्वात् अस्य मिथ्यात्वस्य स्थिति: सर्वाधिका वर्तते। सप्तसहस्रवर्षै: मिथ्यात्वोत्कृष्टस्थितौ भागे कृते आबाधाकाण्डकमागच्छति। इदं च सर्वकर्मणां सदृशं, यथान्यायं भाज्य-भागहारयो: वृद्धिहानिदर्शनात्।

अब इन्हीं कर्मों की आबाधा का प्रतिपादन करने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

पूर्व सूत्रोक्त ज्ञानावरणीयादि कर्मों का आबाधाकाल तीन हजार वर्ष है।।५।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-बाधा के अभाव को अबाधा कहते हैं और अबाधा ही आबाधा कहलाती है। जिस समयप्रबद्ध में तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थिति वाले पुद्गल परमाणु होते हैं, उस समयप्रबद्ध में एक समय प्रमाण काल-स्थिति वाले पुद्गल परमाणु रहना संभव नहीं है, क्योंकि वैसा मानने में विरोध आता है। इसी प्रकार उस उत्कृष्ट स्थिति वाले समयप्रबद्ध में दो समय, तीन समय को आदि करके तीन हजार वर्ष-प्रमित काल-स्थिति वाले भी पुद्गल परमाणु नहीं हैं।

ऐसा क्यों ?

क्योंकि, ऐसा स्वभाव ही है और स्वभाव अन्य के प्रश्न योग्य नहीं हुआ करते हैं, ऐसा न्याय है। पूर्व सूत्रोक्त कर्मों की यह उत्कृष्ट आबाधा है। एक समयप्रबद्ध अपने असंख्यातवें भाग-प्रमाण तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थिति वाले पुद्गल स्कंधों से सहित होता हुआ अपकर्षण के द्वारा बिना स्थिति क्षय के इतने अर्थात् तीन हजार वर्ष प्रमित काल तक उदय को नहीं प्राप्त होता है, यह अर्थ कहा गया है। एक समय कम तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम, दो समय कम तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम, इत्यादि क्रम से एक समय हीन आबाधाकांडक से कम तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम-प्रमित-उत्कृष्टस्थिति तक के पुद्गल स्कंधों की भी यही, तीन हजार वर्ष प्रमाण आबाधा होती है।

शंका-आबाधाकांडक की उत्पत्ति कैसे होती है ?

समाधान-उत्कृष्ट आबाधाकाल को विरलन करके ऊपर उत्कृष्ट स्थिति के समान खण्ड करके एक-एक रूप के प्रति देने पर आबाधाकांडक का प्रमाण प्राप्त होता है।

कल्पनारूप से अंक संदृष्टि से उसे दिखाते हैं-

उदाहरण-मान लो उत्कृष्टस्थिति ३० समय, आबाधा ३ समय। तो

यह आबाधाकांडक का प्रमाण हुआ और उक्त स्थितिबंध के भीतर ३ आबाधा के भेद हुए।

विशेषार्थ-कर्मस्थिति के जितने भेदों में एक प्रमाण वाली आबाधा होती है, उतने स्थिति भेदों के समुदाय को आबाधाकांडक कहते हैं। विवक्षित कर्म-स्थिति में आबाधाकांडक का प्रमाण जानने का उपाय यह है कि विवक्षित कर्म की उत्कृष्टस्थिति में उसी की उत्कृष्ट आबाधा का भाग देने पर जो भजनफल आता है, तत्प्रमाण ही उस कर्मस्थिति में आबाधाकांडक होता है। यही बात प्रकृत में विरलन-देय के क्रम से समझाई गई है। इस प्रकार जितने स्थिति के भेदों का एक आबाधाकांडक होता है, उतने ही स्थितिभेदों की आबाधा समान होती है। यह कथन नाना समयप्रबद्धों की अपेक्षा से है।

उन कर्मस्थिति के भेदों में एक समय, दो समय आदि के क्रम से जब तक एक समय हीन आबाधाकांडक मात्र तक स्थितियाँ उत्कृष्टस्थिति से कम होती हैं तब तक उन सब स्थिति विकल्पों की वही अर्थात् तीन हजार वर्ष-प्रमित उत्कृष्ट आबाधा होती है। एक आबाधाकांडक से हीन उत्कृष्टस्थिति को बंधने वाले समयप्रबद्ध के एक समय कम तीन हजार वर्ष की आबाधा होती है। इसी प्रकार सभी कर्मस्थितियों की भी आबाधा सम्बन्धी प्ररूपणा जानकर करना चाहिये। विशेषता केवल यह है कि दो आबाधाकांडकों से हीन उत्कृष्टस्थिति को बांधने वाले जीव के समयप्रबद्ध की उत्कृष्ट आबाधा दो समय कम होती है। तीन आबाधाकांडकों से हीन उत्कृष्टस्थिति को बांधने वाले जीव के समयप्रबद्ध की उत्कृष्ट आबाधा तीन समय कम होती है। चार आबाधाकांडकों से हीन उत्कृष्टस्थिति को बांधने वाले समयप्रबद्ध की उत्कृष्ट आबाधा चार समय कम होती है। इस प्रकार यह क्रम विवक्षित कर्म की जघन्य स्थिति तक ले जाना चाहिये। इस प्रकार सर्व आबाधाकांडकों के वीचारस्थानत्व अर्थात् स्थिति भेदों को प्राप्त होने पर एक समय कम आबाधाकांडक मात्र स्थितियों की आबाधा अवस्थित अर्थात् एक सी होती है, यह अर्थ जानना चाहिये।

इसका उदाहरण अंक संदृष्टि से दिखाते हैं-

उदाहरण-मान लो उत्कृष्टस्थिति ६४ समय और उत्कृष्ट आबाधा १६ समय है। अतएव आबाधाकांडक का प्रमाण होगा।

मान लो जघन्य स्थिति ४५ समय है। अतएव स्थिति के भेद ६४ से ४५ तक होंगे जिनकी रचना आबाधाकांडकों के अनुसार इस प्रकार होगी-

(१) ६४, ६३, ६२, ६१-उत्कृष्ट आबाधा

(२) ६०, ५९, ५८, ५७-एक समय कम उत्कृष्ट आबाधा

(३) ५६, ५५, ५४, ५३-दो समय कम उत्कृष्ट आबाधा

(४) ५२, ५१, ५०, ४९-तीन समय कम उत्कृष्ट आबाधा

(५) ४८, ४७, ४६, ४५-चार समय कम उत्कृष्ट आबाधा

ये पाँच आबाधा के भेद हुए। आबाधाकांडक ४ ² ५ (आबाधा-भेद) · २० स्थितिभेद।

स्थितिभेद २० — १ · १९ वीचारस्थान।

इन्हीं वीचारस्थानों को उत्कृष्टस्थिति में से घटाने पर जघन्यस्थिति प्राप्त होती है। स्थिति की क्रम हानि भी इतने ही स्थानों में होती है। अर्थात् इस प्रकार ‘जेट्ठाबाहोवट्टिय’ (गो.क. १४७) के अनुसार गणित क्रम से निकले हुये स्थिति के भेदों को वीचारस्थान समझना चाहिये।

अब कर्मों के निषेकलक्षण का प्रतिपादन करने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

पूर्वोक्त ज्ञानावरणादि कर्मों का आबाधाकाल से हीन कर्मस्थितिप्रमाण कर्मनिषेककाल होता है।।६।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जो कर्म परमाणु निषिक्त होते हैं-उदय में आते हैं उन्हें निषेक कहते हैं अर्थात् कर्म परमाणुओं के स्कंध की रचना का नाम निषेक है।

शंका-कोई शंका करता है-आबाधा के जान लेने पर उसके ऊपर अर्थात् आबाधाकाल के पश्चात् कर्मनिषेक होता है, यह बात नहीं कहने पर भी जानी जाती है, अतएव यह सूत्र नहीं कहना चाहिये ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि प्रवचन (परमागम) में अनुमान प्रमाण के प्रमाणता नहीं मानी गई है। श्री वीरसेन स्वामी ने धवला टीका में कहा है कि-‘‘जो केवलज्ञानपूर्वक उत्पन्न हुआ है, प्राय: अतीन्द्रिय पदार्थों को विषय करने वाला है, अचिन्त्य-स्वभावी है और युक्ति के विषय से परे है, उसका नाम आगम है।’’ अतएव उस आगम में िंलग अर्थात् अनुमान के बल से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। इसलिए यह सूत्र बनाना ही चाहिये।

यहाँ जो निषेक रचना की अंकसंदृष्टि है, उसे विस्तार से धवला टीका में देखना चाहिये। संक्षेप में यदि मान लो-किसी कर्म की उत्कृष्ट स्थिति चौंसठ समय और आबाधा सोलह समय है तो निषेक स्थिति चौंसठ समय में आबाधाकाल की सोलह समय घटाने पर अठतालीस समय शेष रहते हैं। ये ही कर्मों के निषेक हैं तथा समयप्रबद्ध-बंधे हुये कर्मस्कंधों में पुद्गल परमाणुओं की संख्या त्रेसठ सौ है। इनकी कोष्टक रचना भी टीका ग्रन्थ में देखना चाहिये।

विशेषार्थ-यहाँ निषेक क्रम को कहते हैं१। वह इस प्रकार है-नानागुणहानि शलाका प्रमाण जो गच्छ तत्प्रमाण एक से लेकर दुगनी-दुगनी संख्या लो और उसका योग कर लो। इस संकलन का जो फल आवे, उससे समयप्रबद्ध में भाग देने पर जो लब्ध होगा उससे पूर्वोक्त दुगुण क्रम के अंतिम आदिधन में गुणा करने से क्रमश: प्रथम, द्वितीय आदि गुणहानियों का द्रव्य प्राप्त होता है। उदाहरण-समयप्रबद्ध · ६३००, नानागुणहानि शलाका · ६, अतएव गुणहानि-शलाका माण गच्छका एकादि-द्विगुण संकलन हुआ-

१ २ ३ ४ ५ ६

१ ± २ ± ४ ± ८ ± १६ ± ३२ · ६३ या

अत: छह गुणहानियों का द्रव्य इस प्रकार होगा-

१०० ² ३२ · ३२०० प्रथम गुणहानि का द्रव्य

१०० ² १६ · १६०० द्वितीय गुणहानि का द्रव्य

१०० ² ८ · ८०० तृतीय गुणहानि का द्रव्य

१०० ² ४ · ४०० चतुर्थ गुणहानि का द्रव्य

१०० ² २ · २०० पंचम गुणहानि का द्रव्य

१०० ² १ · १०० षष्ठ गुणहानि का द्रव्य

· ६३०० समस्त द्रव्य का प्रमाण

इन गुणहानियों के द्रव्यों में से किसी भी एक गुणहानि सम्बन्धी द्रव्य में गुणहानि प्रमाण (आयाम) के त्रिचतुर्थांश में एक रूप का चतुर्थ भाग (१/४) और मिलाकर उसका भाग देने पर विवक्षित गुणहानि का प्रथम निषेक होता है।

उदाहरण-गुणहानि आयाम · ८ ·

८ ² इसका पूर्वोक्त गुणहानि द्रव्यों में भाग देने से निकलेगा-

प्रथम गुणहानि का प्रथम निषेक

द्वितीय गुणहानि का प्रथम निषेक

तृतीय गुणहानि का प्रथम निषेक

चतुर्थ गुणहानि का प्रथम निषेक

पंचम गुणहानि का प्रथम निषेक

षष्ठ गुणहानि का प्रथम निषेक

प्रत्येक गुणहानि के प्रथम निषेक में दो गुणहानियों का भाग देने से उस गुणहानि का गोपुच्छों का विशेष (चय-प्रमाण) आता है।

उदाहरण-दो गुणहानि (निषेकहार) · ८ ² २ · १६

अतएव प्रत्येक गुणहानि का विशेष (चय) इस प्रकार होगा-

प्रथम गुणहानि का विशेष या चय का प्रमाण

द्वितीय गुणहानि का विशेष या चय का प्रमाण

तृतीय गुणहानि का विशेष या चय का प्रमाण

चतुर्थ गुणहानि का विशेष या चय का प्रमाण

पंचम गुणहानि का विशेष या चय का प्रमाण

षष्ठ गुणहानि का विशेष या चय का प्रमाण

विशेषार्थ-गौ की पूँछ मूल में विस्तीर्ण और क्रमश: नीचे की ओर संक्षिप्त होती है। अतएव जहाँ किसी संख्या-समुदाय में संख्याएं उत्तरोत्तर घटती हुई पाई जाती हैं वहाँ उन संख्याओं को उपमान का उपमेय में उपचार से गोपुच्छ कहते हैं। उन संख्याओं के बीच जो व्यवस्थित हानि प्रमाण होता है उसे विशेष या चय कहते हैं।

पुन: प्रथम निषेक को एक कम गुणहानि प्रमाण स्थानों में रखकर उनमें से एकादि एकोत्तर क्रम से गोपुच्छों के विशेषों को यथाक्रम से घटाने पर द्वितीय, तृतीय आदि निषेक प्राप्त होते हैं।

यहाँ पर सर्व निषेकों की संदृष्टि इस प्रकार है-

गुणहानि प्रथम द्वितीय तृतीय चतुर्थ पंचम षष्ठ

आयाम गुणहानि गुणहानि गुणहानि गुणहानि गुणहानि गुणहानि

१ ५१२ २५६ १२८ ६४ ३२ १६

२ ४८० २४० १२० ६० ३० १५

३ ४४८ २२४ ११२ ५६ २८ १४

४ ४१६ २०८ १०४ ५२ २६ १३

५ ३८४ १९२ ९६ ४८ २४ १२

६ ३५२ १७६ ८८ ४४ २२ ११

७ ३२० १६० ८० ४० २० १०

८ २८८ १४४ ७२ ३६ १८ ९

सर्वद्रव्य ३२०० ± १६०० ± ८०० ± ४०० ± २०० ± १०० · ६३००

इस प्रकार द्वितीयस्थल में ज्ञानावरण आदि प्रकृतियों के उत्कृष्ट स्थितिबंध का और आबाधा का कथन करते हुये चार सूत्र पूर्ण हुये।

अब सातावेदनीय आदि चार प्रकृतियों की उत्कृष्टस्थिति का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

सातावेदनीय, स्त्रीवेद, मनुष्यगति और मनुष्यगति प्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्म, इन प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबंध पन्द्रह कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।७।।

उक्त सातावेदनीय आदि चारों कर्म प्रकृतियों की उत्कृष्ट स्थिति का आबाधाकाल पन्द्रह सौ वर्ष है।।८।।

आबाधाकाल से हीन कर्मस्थिति प्रमाण उन कर्मों का कर्म-निषेक होता है।।९।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। यह स्थितिबंध पारिणामिक है-स्वाभाविक है। पन्द्रह कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमाण स्थिति वाले समयप्रबद्ध में कर्मप्रदेशों के भीतर यदि अच्छी तरह जघन्य स्थितिवाले कर्म प्रदेश होवें, तो भी एक समय अधिक पन्द्रह सौ वर्ष प्रमाण स्थिति वाले कर्म प्रदेश ही होंगे, इससे नीचे की स्थिति वाले कर्म प्रदेश नहीं होंगे, क्योंकि उन कर्म प्रकृतियों में उस प्रकार के परिणाम वाले प्रदेशों का होना असंभव है। अब त्रैराशिक क्रम से पन्द्रह सौ वर्ष प्रमाण आबाधा के लाने की विधि कहते हैं-यदि तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण कर्म-स्थिति की आबाधा तीन हजार वर्ष प्रमाण प्राप्त होती है, तो पन्द्रह कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण कर्म-स्थिति की आबाधा कितनी प्राप्त होगी। इस प्रकार फलराशि से इच्छाराशि को गुणित करके प्रमाणराशि से अपवर्तित करने पर पन्द्रह सौ वर्ष प्रमाण आबाधा प्राप्त होती है।

इस प्रकार तृतीयस्थल में सातावेदनीय आदि की उत्कृष्ट स्थिति और आबाधा तथा निषेक के प्रतिपादन रूप से तीन सूत्र पूर्ण हुये।

अब मिथ्यात्व की उत्कृष्ट स्थिति-आबाधा और निषेक का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मिथ्यात्व कर्म का उत्कृष्ट स्थितिबंध सत्तर कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।१०।।

मिथ्यात्व कर्म के उत्कृष्ट स्थितिबंध का आबाधाकाल सात हजार वर्ष है।।११।।

मिथ्यात्व कर्म के आबाधाकाल से हीन कर्म-स्थिति प्रमाण उसका कर्म-निषेक होता है।।१२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-मिथ्यात्व कर्म की उत्कृष्ट स्थिति सबसे अधिक है, क्योंकि यह अत्यन्त अप्रशस्त है। सात हजार वर्षों से मिथ्यात्व कर्म की उत्कृष्टस्थिति में भाग देने पर आबाधाकाण्डक का प्रमाण आता है। यह आबाधाकाण्डक सभी कर्मों का समान है, क्योंकि भाज्य और भागहारों में यथान्याय-अनुरूप वृद्धि और हानि देखी जाती है।

संप्रति षोडशकषायाणां उत्कृष्टस्थिति-आबाधा-निषेकप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

सोलसण्हं कसायाणं उक्कस्सगो ट्ठिदिबंधो चत्तालीसं सागरोवमकोडा-कोडीओ।।१३।।

चत्तारि वाससहस्साणि आबाधा।।१४।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेगो।।१५।।
'सिद्धान्तचिंतामणिटीका-'सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। एषां षोडशकषायाणां उत्कृष्टा स्थितिरपि दर्शनमोहनीयापेक्षया मिथ्यात्वस्य हीना एव चारित्रमोहनीयत्वात्।
मोहनीयत्वं प्रति सामान्यत्वात् मिथ्यात्वस्थितिसमाना कषायस्थिति: विंâ न संजायते ?
नैतद् वक्तव्यं, सम्यक्त्व-चारित्रयो: भेदेन भेदमुपगतकर्मणोरपि समानत्वविरोधात्। एषां आबाधा चतु:सहस्रवर्षमात्रा भवति।
एवं चतुर्थस्थले मिथ्यात्व-षोडशकषायस्थिति-आबाधा-निषेकप्ररूपणत्वेन सूत्रषट्कं गतम्।
अधुना पुरुषवेदादिपंचदशप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थिति-आबाधा-निषेकप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-पुरिसवेद-हस्स-रदि-देवगदि-समचउरससंठाण-वज्जरिसहसंघडण-देवगदिपाओग्गाणुपुव्वी-पसत्थविहायगदि-थिर-सुभ-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज-जसकित्ति-उच्चागोदाणं उक्कस्सगो ट्ठिदिबंधोदससागरोवमकोडा-कोडीओ।।१६।।
दसवाससदाणि आबाधा।।१७।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।१८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पुरुषवेदादिपंचदशप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिबंध: दशकोटाकोटिसागरप्रमाणं, प्रकृतिविशेषात्। शेषं सुगमं वर्तते।
एवं पंचमस्थले पंचदशप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिआदिनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
संप्रति नपुंसकवेदादित्रिचत्वािंरशत्प्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिबंधाबाधानिषेकप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-णउंसयवेद-अरदि-सोग-भय-दुगुंछा णिरयगदी तिरिक्खगदी एइंदिय-पंचिंदियजादि-ओरालिय-वेउव्विय-तेजा-कम्मइयसरीर-हुंडसंठाण-ओरालिय-वेउव्वियसरीर-अंगोवंग-असंपत्तसेवट्टसंघडण-वण्ण-गंध-रस-फास-णिरियगदि-तिरिक्खगदिपाओग्गाणुपुव्वी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सास-आदाव-उज्जोव-अप्पसत्थविहायगदि-तस-थावर-बादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीर-अथिर-अशुभ-दुब्भग-दुस्सर-अणादेज्ज-अजसकित्ति-णिमिण-णीचागोदाणं उक्कस्सगो ट्ठिदिबंधो वीसं सागरोवमकोडा-कोडीओ।।१९।।
वेवाससहस्साणि आबाधा।।२०।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेगो।।२१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रकृतिविशेषात् सूत्रोक्तानां प्रकृतीनां अयं स्थितिबंध: कथित:। न च सर्वाणि कार्याणि एकान्तेन बाह्यार्थमपेक्ष्य एव उत्पद्यन्ते, शालिबीजात् यवांकुरस्यापि उत्पत्तिप्रसंगात्। किंतु तादृशानि द्रव्याणि त्रिष्वपि कालेषु कदाचिदपि न सन्ति, यत् येषां बलेन शालिबीजस्य यवांकुरस्योत्पादनशक्तिर्भवेत्। अनवस्थाप्रसंगात्। तस्मात् कुत्रापि अंतरंगकारणात् चैव कार्योत्पत्तिर्भवतीति निश्चय: कर्तव्य:। शेषं सुगमं अस्ति।
एवं षष्ठस्थले नपुंसकवेदादिप्रकृतीनांस्थित्यादिप्ररूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति चतुर्विधायु:स्थिति-आबाधा-निषेकप्रतिपादनाय सूत्राष्टकमवतार्यते-णिरयाउ-देवाउअस्स उक्कस्सओ ट्ठिदिबंधो तेत्तीसं सागरोवमाणि।।२२।।
पुव्वकोडितिभागो आबाधा।।२३।।
आबाधा।।२४।।
कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।२५।।
तिरिक्खाउ-मणुसाउअस्स उक्कस्सओ ट्ठिदिबंधो तिण्णि पलिदोव-माणि।।२६।।
पुव्वकोडितिभागो आबाधा।।२७।।
आबाधा।।२८।।
कम्मट्ठिदी कम्मणिसेगो।।२९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति, नारकायुष: देवायुषश्चोत्कृष्टस्थिति: त्रयस्त्रिंशत्सागर-प्रमाणा, एषा देवनारकयो: आयुष्कस्य उत्कृष्टनिषेकस्थिति: ज्ञातव्या। देवनारकयो: सम्यग्दृष्टिमिथ्यादृष्ट्यो: गुणस्थानस्थिते: कालानुयोगद्वारे त्रयस्त्रिंशत्सागरप्रमाणमेव निर्दिष्टं। यथा ज्ञानावरणादीनामाबाधा निषेकस्थितिपरतन्त्रा, एवमायुष: आबाधा निषेकस्थिति: अन्योन्यायत्ता: न भवन्ति इति ज्ञापनार्थं निषेकस्थितिश्चैव प्ररूपिता। पूर्वकोटित्रिभागमादिं कृत्वा यावत् आसंक्षेपाद्धा इति एतेषु आबाधाविकल्पेषु देवनारकयो: आयुष: उत्कृष्टनिषेकस्थिति: संभवति इति उक्तं भवति।
पूर्वकोटित्रिभागमादिं कृत्वा यावत् आसंक्षेपाद्धा इति यदि एते आबाधाविकल्पा: आयुष: सर्वनिषेकस्थितिषु भवन्ति। तर्हि पूर्वकोटित्रिभागश्चैव उत्कृष्टनिषेकस्थितौ किमर्थं उच्यते ?
न, उत्कृष्टाबाधया विना उत्कृष्टनिषेकस्थितौ चैव उत्कृष्टस्थिति: न भवति इति ज्ञापनार्थं उत्कृष्टाबाधोत्ते:।
आबाधाकाले नरकायुष: देवायुषश्च निषेकस्थिति: बाधारहिता एव। पूर्वोक्ताबाधाकालस्याभ्यन्तरे विवक्षितस्य कस्यापि आयु:कर्मण: निषेकस्थितौ बाधा न भवति।
अत्र कश्चिदाह-यथा ज्ञानावरणादीनां आबाधाप्ररूपकसूत्रेण बाधाभावो सिद्ध:, एवमत्रापि सिद्ध्यति, किमर्थं द्विवारमाबाधा उच्यते ?
न, यथा ज्ञानावरणादिसमयप्रबद्धानां बंधावलिव्यतिक्रान्तानां अपकर्षण-परप्रकृतिसंक्रमणाभ्यां बाधा अस्ति, तथा आयुष: अपकर्षण-परप्रकृतिसंक्रमणादिभि: बाधाभावप्ररूपणार्थं द्वितीयवारमाबाधानिर्देशात्।
अत्र सूत्रे उभयायुष: कर्मस्थितिप्रमाणं कर्मनिषेक: भवति इति कथितं।
आबाधोना कर्मस्थिति: कर्मनिषेक: इति किमर्थमत्र न प्ररूपितं ?
न, द्वितीयवारमाबाधानिर्देशेन आबाधोना कर्मस्थिति: कर्मनिषेको भवतीति सिद्धे:।
कुत: ?
अन्यथा द्वितीयवार-आबाधानिर्देशानुपपत्ते:।
तिर्यगायुष: मनुष्यायुषश्च उत्कृष्ट: स्थितिबंध: त्रीणि पल्योपमानि सन्ति। एषापि निषेकस्थितिश्चैव निर्दिष्टा। तिर्यग्मनुष्ययो: त्रिपल्योपममात्रा-औदारिक शरीरोत्कृष्टस्थिते: उपलंभात्।
किमर्थमाबाधया सह निषेकोत्कृष्टस्थितिर्न प्ररुपिता ?
न, निषेकाबाधाकाला: अन्योन्यायत्ता: न भवन्ति इति ज्ञापनार्थं तथा निर्देशात्। एतस्य भाव:-उत्कृष्टाबाधया सह जघन्यनिषेकस्थितिमादिं कृत्वा यावदुत्कृष्टनिषेकस्थितिस्तावत् बध्नाति। एवं समयोन-द्विसमयोनोत्कृष्टाबाधादीनां अपि प्ररूपयितव्यं यावत् आसंक्षेपाद्धा इति।
कश्चिदाह-पूर्वकोटित्रिभागात् आबाधा अधिका किन्न भवति ?
उच्यते-न तावत् देवनारकयो: बहुसागरोपमायु:स्थितिकेषु पूर्वकोटित्रिभागादधिका आबाधा अस्ति तेषां देवनारकाणां भुज्यमानायुषि षण्मासावशेषे असंक्षेपाद्धापर्यवसाने सति परभवसंबंधि-आयुर्बध्यमानानां तदसंभवात्। न तिर्यग्मनुष्ययो: अपि ततोऽधिका आबाधा अस्ति, तत्र पूर्वकोट्य: अधिकभवस्थितेरभावात्।
असंख्यातवर्षायुष्का: तिर्यग्मनुष्या: सन्ति इति चेत् ?
न, तेषां देवनारकाणामिव भुज्यमानायुष: षण्मासादधिके सति परभवसंंबंधिआयुष: बंधाभावात्। संख्यातवर्षायुष्का अपि तिर्यग्मनुष्या: कदलीघातेन वा अर्धस्थितिगलनेन वा यावत् यावत् भुज्य-अवभुक्तायु:स्थितिकेषु अद्र्धप्रमाणेन तत: हीनप्रमाणेन वा भुज्यमानायु: न कृतं तावत् न परभवसंबंधि आयु: बध्नन्ति, पारिणामिकात्। तस्मात् उत्कृष्टाबाधा पूर्वकोटित्रिभागादधिका नास्तीति गृहीतव्यं।
तिर्यग्मनुष्यायुषो: उत्कृष्टाबाधा पूर्वकोटित्रिभागोऽस्ति। आबाधाकाले तिर्यगायुष: मनुष्यायुषश्च निषेकस्थिति: बाधारहिता अस्ति।
कश्चिदाह-‘‘पूर्वकोटित्रिभाग: आबाधा’’ इति सूत्रेण पूर्वकोटित्रिभागे बाधाभावे ज्ञाते सति पुन: ‘‘आबाधा’’ इति सूत्रं किमर्थं उच्यते ?
नैतत् वक्तव्यं, यथा ज्ञानावरणादीनां आबाधाया: अभ्यन्तरे अपकर्षणोत्कर्षणपरप्रकृतिसंक्रमणै: निषेकानां बाधा भवति, तथा आयुष: बाधा नास्तीति ज्ञापनार्थं पुन: ‘आबाधाप्ररूपणा’ क्रियते, अतो नास्ति दोष:।
तिर्यगायुष: मनुष्यायुषश्च कर्मस्थितिप्रमाणमेव कर्मनिषेका: भवन्ति।
एवं सप्तमस्थले आयुषां स्थिति-आबाधा-निषेकरचनाप्रतिपादनत्वेन अष्टौ सूत्राणि गतानि।

अब सोलह कषायों की उत्कृष्ट स्थिति, आबाधा एवं निषेकों का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

अनन्तानुबन्धी आदि सोलह कषायों का उत्कृष्ट स्थितिबंध चालीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।१३।।

अनन्तानुबन्धी आदि सोलहों कषायों का उत्कृष्ट आबाधाकाल चार हजार वर्ष है।।१४।।

सोलहों कषायों के आबाधाकाल से हीन कर्म-स्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।१५।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। इन सोलह कषायों की उत्कृष्ट स्थिति भी दर्शनमोहनीय कर्म की अपेक्षा मिथ्यात्व से कम ही है, क्योंकि ये चारित्रमोहनीय हैं।

शंका-मोहनीयत्व की अपेक्षा समान होने से मिथ्यात्व कर्म की स्थिति के समान ही कषायों की स्थिति क्यों नहीं होती है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि सम्यक्त्व और चारित्र में भेद होने से भेद को प्राप्त हुये कर्मों के भी समानता का विरोध है। इन कर्मों की आबाधा चार हजार वर्ष मात्र है।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में मिथ्यात्व और सोलह कषायों की उत्कृष्ट स्थिति, आबाधा तथा निषेक का निरूपण करते हुये छह सूत्र पूर्ण हुये।

अब पुरुषवेद आदि पन्द्रह प्रकृतियों की उत्कृष्ट स्थिति, आबाधा व निषेकों का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

पुरुषवेद, हास्य, रति, देवगति, समचतुरस्रसंस्थान, वङ्कावृषभनाराचसंहनन, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, प्रशस्तविहायोगति, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यश:कीर्ति और उच्चगोत्र, इन प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबंध दश कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।१६।।

पुरुषवेद आदि उक्त कर्मप्रकृतियों की आबाधा दश सौ वर्ष है।।१७।।

उक्त प्रकृतियों के आबाधाकाल से हीन कर्मस्थिति प्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।१८।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-पुरुषवेद आदि पन्द्रह प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबंध दश कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है, क्योंकि, ये प्रकृतियां विशेष हैं। शेष अर्थ सुगम है।

इस प्रकार पाँचवें स्थल में पन्द्रह प्रकृतियों की उत्कृष्ट स्थिति आदि के निरूपणरूप से तीन सूत्र पूर्ण हुये।

अब नपुंसकवेद आदि तेतालीस प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबंध, आबाधा और निषेकों का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नपुंसकवेद, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, नरकगति, तिर्यग्गति, एकेन्द्रिय जाति, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक शरीर, वैक्रियिक शरीर, तैजस शरीर, कार्मण शरीर, हुण्डकसंस्थान, औदारिक शरीर-अंगोपांग, वैक्रियिक शरीर-अंगोपांग, असंप्राप्ता-सृपाटिकासंहनन, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यग्गति-प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, आतप, उद्योत, अप्रशस्त-विहायोगति, त्रस, स्थावर, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दु:स्वर, अनादेय, अयश:कीर्ति, निर्माण और नीच गोत्र इन प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबंध बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।१९।।

नपुंसकवेदादि पूर्व सूत्रोक्त प्रकृतियों की उत्कृष्ट कर्म-स्थिति का आबाधाकाल दो हजार वर्ष है।।२०।।

नपुंसकवेदादि पूर्व सूत्रोक्त प्रकृतियों के आबाधाकाल से हीन कर्म-स्थिति प्रमाण उनका कर्मनिषेक होता है।।२१।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-प्रकृति विशेष होने से सूत्र में कथित प्रकृतियों का यह स्थितिबंध कहा गया है। सभी कार्य एकान्त से बाह्य अर्थ की अपेक्षा करके ही नहीं उत्पन्न होते हैं, अन्यथा शालि-धान्य के बीज से जौ के अंकुर की भी उत्पत्ति का प्रसंग प्राप्त होगा। किन्तु उस प्रकार के द्रव्य तीनों ही कालों में किसी भी क्षेत्र में नहीं हैं कि जिनके बल से शालि-धान्य के बीज के जौ के अंकुर को उत्पन्न करने की शक्ति हो सके। यदि ऐसा होने लगेगा तो अनवस्था दोष प्राप्त होगा। इसलिये कहीं पर भी अंतरंग कारण से ही कार्य की उत्पत्ति होती है, ऐसा निश्चय करना चाहिये।

शेष अर्थ सुगम है।

इस प्रकार छठे स्थल में नपुंसकवेद आदि प्रकृतियों का स्थिति आदि के कथनरूप से तीन सूत्र पूर्ण हुये।

अब आयु के चारों भेदों की स्थिति, आबाधा और निषेक का प्रतिपादन करने के लिये आठ सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नारकायु और देवायु का उत्कृष्ट स्थितिबंध तेतीस सागरोपम है।।२२।।

नारकायु और देवायु का उत्कृष्ट आबाधाकाल पूर्वकोटि वर्ष का त्रिभाग (तीसरा भाग) है।।२३।।

आबाधाकाल में नारकायु और देवायु की निषेक-स्थिति बाधारहित है।।२४।।

नारकायु और देवायु की कर्मस्थिति प्रमाण उन कर्मों का कर्म-निषेक होता है।।२५।।

तिर्यगायु और मनुष्यायु का उत्कृष्ट स्थितिबंध तीन पल्योपम है।।२६।।

तिर्यगायु और मनुष्यायु का उत्कृष्ट आबाधाकाल पूर्वकोटी का त्रिभाग है।।२७।।

आबाधाकाल में तिर्यगायु और मनुष्यायु की निषेक-स्थिति बाधारहित है।।२८।।

तिर्यगायु और मनुष्यायु की कर्मस्थिति प्रमाण ही उनका कर्म-निषेक होता है।।२९।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यहाँ सूत्रों का अर्थ सुगम है। नारकियों की आयु और देवों की आयु की उत्कृष्टस्थिति तेतीस सागर प्रमाण है। यही देव-नारकियों के आयु की उत्कृष्ट निषेक स्थिति है ऐसा जानना, क्योंकि देव और नारकियों में यथाक्रम से सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवों की गुणस्थान सम्बन्धी स्थिति का ‘‘कालानुयोग द्वार सूत्र’’ मे तेतीस सागरोपम प्रमाण ही निर्देश किया गया है। जिस प्रकार ज्ञानावरण आदि कर्मों की आबाधा निषेकस्थिति के आधीन है, उसी प्रकार आयुकर्म की आबाधा और निषेकस्थिति परस्पर में एक दूसरे के आधीन नहीं है, इस बात को बतलाने के लिये यहाँ आयु कर्म की निषेकस्थिति की ही प्ररूपणा की गई है।

इसका अर्थ यह होता है कि पूर्वकोटि वर्ष के त्रिभाग-तीसरे भाग से लेकर आसंक्षेपाद्धा-जिससे छोटा कोई काल न हो सके, ऐसे काल तक जितने आबाधा के विकल्प-भेद होते हैं, उनमें देव और नारकियों के आयु की उत्कृष्ट निषेक-स्थिति संभव है।

विशेषार्थ-देवायु का बंध मनुष्य या तिर्यंचगति में हो सकता है, नरक या देवगति में नहीं और आगामी आयु का बंध शीघ्र से शीघ्र भुज्यमान आयु के २/३ भाग व्यतीत होने पर तथा अधिक से अधिक मृत्यु के पूर्व होता है। कर्मभूमिज मनुष्य या तिर्यंच की उत्कृष्ट आयु एक कोटिपूर्व वर्ष की है। अतएव देवायु का बंध भुज्यमान आयु के १/३ भाग शेष रहने पर हो सकता है और यही काल देवायु के स्थितिबंध का उत्कृष्ट आबाधाकाल होगा। मरते समय ही आयु का बंध होने से आसंक्षेप-अद्धारूप जघन्य आबाधाकाल प्राप्त होता है। इन दोनों मर्यादाओं के बीच देवायु की आबाधा के मध्यम विकल्प संभव हैं। भोगभूमिज प्राणियों के आगामी आयु के केवल ६ मास तथा अन्यमतानुसार ९ मास शेष रहने पर होता है।

शंका-यदि पूर्वकोटि वर्ष के त्रिभाग से लेकर आसंक्षेपाद्धा काल तक संभव सब आबाधा के भेद आयुकर्म की सर्व निषेक-स्थितियों में होते हैं तो पूर्वकोटि वर्ष के त्रिभागप्रमाण ही यह उत्कृष्ट आबाधाकाल उत्कृष्ट निषेक-स्थिति में किसलिए कहते हैं ?

समाधान-नहीं, क्योंकि उत्कृष्ट आबाधाकाल के बिना उत्कृष्ट निषेक-स्थितिसम्बन्धी उत्कृष्ट कर्मस्थिति प्राप्त नहीं होती है, यह बात बतलाने के लिये यह उत्कृष्ट आबाधाकाल कहा गया है अर्थात् यद्यपि आयुकर्म के संबंध में उत्कृष्ट निषेकस्थिति और उत्कृष्ट आबाधाकाल का अविनाभावी सम्बन्ध नहीं है, जैसा कि अन्य कर्मों का है। तथापि आयुकर्म की उत्कृष्टस्थिति तो तभी जानी जा सकती है जब उत्कृष्ट आबाधा के साथ उत्कृष्ट निषेकस्थिति का योग किया जाए। इसीलिए इन दोनों उत्कृष्टस्थितियों का मेल करना आवश्यक है।

आबाधाकाल में नारकायु और देवायु की निषेक-स्थिति बाधारहित है। पूर्व सूत्रोक्त आबाधाकाल के भीतर विवक्षित किसी भी आयुकर्म की निषेकस्थिति में बाधा नहीं होती है।

यहाँ कोई कहता है-जिस प्रकार ज्ञानावरणादि कर्मों की आबाधा का प्ररूपण करने वाले सूत्र से बाधा का अभाव सिद्ध है, उसी प्रकार यहाँ पर भी बाधा का अभाव सिद्ध होता है, फिर दूसरी बार ‘आबाधा’ यह सूत्र किसलिए कहा है ?

आचार्य उत्तर देते हैं-नहीं, क्योंकि जिस प्रकार बंधावलि-व्यतिक्रान्त अर्थात् जिनका बंध होने पर एक आवलीप्रमाण काल व्यतीत हो गया है, ऐसे ज्ञानावरणादि कर्मों के समयप्रबद्धों के अपकर्षण और पर-प्रकृति-संक्रमण आदि के द्वारा बाधा होती है, उस प्रकार आयुकर्म के आबाधाकाल के पूर्ण होने तक अपकर्षण और पर-प्रकृति-संक्रमण आदि के द्वारा बाधा का अभाव है अर्थात् आगामी भवसम्बन्धी आयुकर्म की निषेकस्थिति में कोई व्याघात नहीं होता है, इस बात के प्ररूपण करने के लिये दूसरी बार ‘आबाधा’ इस सूत्र का निर्देश किया है।

इस सूत्र में दोनों आयु के कर्म-स्थितिप्रमाण कर्मनिषेक होते हैं, ऐसा कहा गया है।

अर्थात् नारकायु और देवायु की कर्म-स्थितिप्रमाण उन कर्मों का कर्म-निषेक होता है।

शंका-यहाँ पर ‘आबाधा काल से रहित कर्मस्थिति ही उन कर्मों की निषेक-स्थिति है’ इस प्रकार प्ररूपण किसलिए नहीं किया ?

समाधान-नहीं, क्योंकि दूसरी बार ‘आबाधा’ इस सूत्र के निर्देश द्वारा ‘आबाधा-काल से रहित कर्मस्थिति ही उन कर्मों की निषेक-स्थिति होती है’ यह बात सिद्ध हो जाती है। क्यों ? क्योंकि यदि वैसा न माना जाए तो दूसरी बार ‘आबाधा’ इस सूत्र के निर्देश की उपपत्ति बन नहीं सकती है।

तिर्यगायु और मनुष्यायु का उत्कृष्टस्थितिबंध तीन पल्योपम है। यह भी निषेकस्थिति ही कही गई है, क्योंकि तिर्यंचों और मनुष्यों में तीन पल्योपममात्र औदारिक शरीर की उत्कृष्टस्थिति पाई जाती है।

शंका-आबाधा के साथ निषेकों की उत्कृष्टस्थिति किसलिए नहीं निरूपण की गई ?

समाधान-नहीं, क्योंकि यहाँ निषेककाल और आबाधाकाल परस्पर एक-दूसरे के आधीन नहीं होते हैं, यह बतलाने के लिए उस प्रकार से निर्देश किया गया है अर्थात् आबाधा के साथ निषेकों की उत्कृष्टस्थिति नहीं बतलाई गई है।

इस उपर्युक्त कथन का भाव यह है कि-उत्कृष्ट आबाधा के साथ जघन्य निषेक-स्थिति को आदि करके उत्कृष्ट निषेक-स्थिति तक जितनी निषेक स्थितियाँ हैं, वे सब बंधती हैं। इसी प्रकार एक समय कम, दो समय कम (इत्यादि रूप से उत्तरोत्तर एक-एक समय कम करते हुए) आसंक्षेपाद्धा काल तक उत्कृष्ट आबाधा आदि की प्ररूपणा करनी चाहिये।

शंका-आयुकर्म की आबाधा पूर्वकोटि के त्रिभाग से अधिक क्यों नहीं होती है ?

समाधान-कहते हैं-न तो अनेक सागरोपमों की आयुस्थिति वाले देव और नारकियों में पूर्वकोटि के त्रिभाग से अधिक आबाधा होती है, क्योंकि उनकी भुज्यमान आयु के (अधिक से अधिक) छह मास अवशेष रहने पर (तथा कम से कम) आसंक्षेपाद्धा काल के अवशेष रहने पर आगामी भवसम्बन्धी आयु को बांधने वाले उन देव और नारकियों के पूर्वकोटि के त्रिभाग से अधिक आबाधा का होना असंभव है। न तिर्यंच और मनुष्यों में भी इससे अधिक आबाधा संभव है, क्योंकि उनमें पूर्वकोटि से अधिक भवस्थिति का अभाव है।

शंका-(भोगभूमियों में) असंख्यात वर्ष की आयु वाले तिर्यंच और मनुष्य होते हैं फिर उनके पूर्वकोटि के त्रिभाग से अधिक आबाधा का होना संभव नहीं है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि उनके देव और नारकियों के समान भुज्यमान आयु के छह मास से अधिक होने पर पर-भवसम्बन्धी आयु के बंध का अभाव है अतएव पूर्वकोटि के त्रिभाग से अधिक आबाधा का होना संभव नहीं है।

तथा संख्यात वर्ष की आयु वाले भी तिर्यंच और मनुष्य कदलीघात से अथवा अध:स्थिति के गलन से अर्थात् बिना किसी व्याघात के समय-समय प्रति एक-एक निषेक के खिरने से, जब तक भुज्य और अवभुक्त आयुस्थिति में भुक्त आयु स्थिति के अर्धप्रमाण से अथवा उससे हीन प्रमाण से भुज्यमान आयु को नहीं कर देते हैं, तब तक परभवसम्बन्धी आयु को नहीं बाँधते हैं, क्योंकि यह नियम पारिणामिक है। इसलिये आयुकर्म की उत्कृष्ट आबाधा पूर्वकोटि के त्रिभाग से अधिक नहीं होती है, ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिये।

तिर्यगायु और मनुष्यायु का उत्कृष्ट आबाधाकाल पूर्वकोटि का त्रिभाग है। अर्थात् अनेक आबाधा विकल्पों के संभव होने पर भी यहाँ पूर्वकोटी-त्रिभागमात्र ही आबाधा होती है यह कथन किया गया है अन्यथा उत्कृष्टस्थिति बन नहीं सकती है, इस बात को बतलाने के लिए ही यह कथन है। क्योंकि आबाधाकाल में तिर्यगायु और मनुष्यायु की निषेध-स्थिति बाधारहित है।

कोई कहता है-तिर्यगायु और मनुष्यायु की उत्कृष्ट आबाधा पूर्वकोटि का त्रिभाग है।’’ इस पूर्वोक्त सूत्र से ही पूर्वकोटी के त्रिभाग में बाधा का अभाव जान लेने पर पुन: ‘आबाधा’ यह सूत्र किसलिए कहते हैं ?

ऐसा नहीं कहना, क्योंकि जिस प्रकार ज्ञानावरणादि कर्मों की आबाधा के भीतर अपकर्षण-उत्कर्षण और पर-प्रकृति संक्रमण के द्वारा निषेकों के बाधा होती है, उस प्रकार आयुकर्म की बाधा नहीं होती है, यह बतलाने के लिये पूर्वसूत्र द्वारा आबाधा के कहे जाने पर भी पुन: आबाधा का प्ररूपण किया गया है। अत: कोई दोष नहीं है।

तिर्यगायु और मनुष्यायु की कर्मस्थिति प्रमाण ही उनके कर्मनिषेक होते हैं।

इस प्रकार सातवें स्थल में आयुकर्मों की स्थिति, आबाधा और निषेक रचना का प्रतिपादन करते हुये आठ सूत्र पूर्ण हुये।

संप्रति द्वीन्द्रियाद्यष्टकर्मणां उत्कृष्टस्थिति-आबाधा-कर्मनिषेकप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

वीइंदिय-तीइंदिय-चउिंरदिय-वामणसंठाण-खीलियसंघडण-सुहुम-अपज्जत्त-साधारणणामाणं उक्कस्सगो ट्ठिदिबंधो अट्ठारससागरोवमकोडा-कोडीओ।।३०।।

अट्ठारसवाससदाणि आबाधा।।३१।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेगो।।३२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। एककोटाकोटिसागरस्य आबाधा शतवर्षप्रमाणं अस्ति। तत्त्रैराशिकक्रमेण आगताष्टादशरूपै: गुणिते अष्टादशकोटाकोटिसागरस्थितिककर्मणां अष्टादशशतवर्षप्रमाणमाबाधा भवति।
तासु निषेकस्थितिषु किंचिन्न्यून-द्व्यद्र्धगुणहान्या समयप्रबद्धे भागे कृते प्रथमनिषेक: भवति। द्वितीयनिषेकभागहार: पूर्वभागहारत: सातिरेको भवति। एवं गुणहान्यभ्यन्तरसर्वनिषेकानां भागहारा: साधयितव्या:।
एवं अष्टमस्थले द्वीन्द्रियादीनां उत्कृष्टस्थिति-आबाधा-निषेकप्रतिपादनपरत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति आहारद्विक-तीर्थकरप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थिति-आबाधा-निषेकप्ररूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-आहारसरीर-आहारसरीरंगोवंग-तित्थयरणामाणमुक्कस्सगो ट्ठिदिबंधो अंतोकोडा-कोडीए।।३३।।
अंतोमुहुत्तमाबाधा।।३४।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेगो।।३५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आसां त्रिप्रकृतीनां सम्यग्दृष्टेरेव बंधो भवति, तथा च सम्यग्दृष्टेर्जीवस्य अन्त:कोटाकोट्यधिकबंधो नास्ति। अत्र अन्त: कोटाकोटिप्रमाणे कथिते एककोटाकोटिसागरस्य संख्यातकोटिभि: खंडिते एकखण्डं भवतीति ज्ञातव्यं।
अन्तर्मुहूर्तमात्राबाधाया: अस्या: स्थिते: ज्ञातुमुपायोऽयं कथ्यते-दशकोटाकोटिसागरप्रमितकर्मस्थिते: आबाधावर्षसहस्रं स्थापयित्वा तेषां मुहूर्ते कृते अष्टलक्षाधिककोटिमात्रा मुहूर्ता भवंति। तेषां प्रमाणमिदं-१०८०००००।
एतै: मुहूर्तै: अपवर्तितदशकोटाकोटिसागरमात्रस्थिति: यदि एतेषां त्रयाणां कर्मणां भवेत्, तर्हि अस्या: स्थिते: एकमुहूर्तमात्रा आबाधा प्राप्नोति। पूर्वोक्तभागहारेण दशगुणेन अपवर्तितदशकोटाकोटिसागरमात्रा स्थिति: यदि भवति, तर्हि मुहूर्तस्य दशमभाग: आबाधा भवेत्। न च एतेषां इयन्मात्रा आबाधा भवति, अन्यथा असंयतसम्यग्दृष्टे: उत्कृष्टबंधात् उत्कृष्टस्थितिसत्त्वादपि संख्यातगुणमिथ्यादृष्टिध्रुवस्थिते: संख्यातान्तर्मुहूर्तमात्राबाधाप्रसंगात्। किन्तु नैवं, तस्मात् संख्यातगुणितपंचेन्द्रियापर्याप्तोत्कृष्टस्थितेरपि अन्तर्मुहूर्तमात्राबाधोपलंभात्। तत: संख्यातकोटिभि: खण्डितदशकोटाकोटिसागरप्रमाणा उत्कृष्टस्थिति-र्भवतीति सिद्धम्।
इदं व्याख्यानं ‘पाहुडचुण्णिसुत्तेण’ अपूर्वकरणप्रथमसमयस्थितिबंधस्य सागरोपमकोटिलक्षपृथक्त्वप्रमाणं प्ररूप्यता विरुध्यते ?
नैतत् आशंकनीयं, तस्य तन्त्रान्तरत्वात्। अथवा स्वक-स्वकजातिप्रतिबंधस्थितिबंधेषु आबाधासु च एष: त्रैराशिकनियम:, नान्यत्र, क्षपकश्रेण्यां अन्तर्मुहूर्तस्थितिबंधानां आबाधाभावप्रसंगात्। तस्मात् स्वक-स्वकोत्कृष्टस्थितिबंधेषु स्वक-स्वकोत्कृष्टाबाधाभि: अपवर्तितेषु आबाधाकाण्डकानि आगच्छन्ति इति गृहीतव्यं। अतएव अत्र त्रिकर्मणां स्थितिषु अन्तर्मुहूर्तमात्राबाधायां सन्त्यां अपि स्थितिबंध: अन्त:कोटाकोटिप्रमाणं भवतीति।
आसां त्रिप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिबंधस्वामिनां कथनं क्रियते-
आहारकद्विकस्योत्कृष्टस्थितिं बध्नाति षष्ठगुणस्थानाभिमुखोऽप्रमत्तगुणस्थानवर्ती संयत:। तीर्थकरप्रकृते: उत्कृष्टस्थितिबंधक: बद्धनरकायुष्क: अविरतसम्यग्दृष्टिर्मनुष्य: कर्मभूमिज:।
उक्तं च- देवाउगं पमत्तो आहारयमप्पमत्तविरदो दु।
तित्थयरं च मणुस्सो अविरदसम्मो समज्जेइ।।१३६।।
एवं नवमस्थले आहारकद्वयतीर्थकरप्रकृति-उत्कृष्टस्थिति-आबाधा-निषेकप्ररूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
अधुना न्यग्रोधपरिमण्डलादिप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थिति-आबाधा-निषेकप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-णग्गोधपरिमंडलसंठाण-वज्जणारायणसंघडणणामाणं उक्कस्सगो ट्ठिदिबंधो वारस सागरोवमकोडाकोडीओ।।३६।।
वारसवाससदाणि आबाधा।।३७।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेगो।।३८।।
सादियसंठाण-णारायसंघडणणामाणमुक्कस्सओ ट्ठिदिबंधो चोद्दससागरोवम-कोडाकोडीओ।।३९।।
चोद्दसवाससदाणि आबाधा।।४०।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।४१।।
खुज्जसंठाण-अद्धणारायणसंघडणणामाणमुक्कस्सओ ट्ठिदिबंधो सोलस-सागरोवमकोडाकोडीओ।।४२।।
सोलसवाससदाणि आबाधा।।४३।।
आबाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ।।४४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। नामत्वेन भेदे इतरनामकर्मभ्य: असत्यपि किमर्थं स्थितिभेद: ?
नैतत् वक्तव्यं, प्रकृतिविशेषण भिन्नानां स्थितिभेदं प्रति विरोधाभावात्।
एकेन आबाधाकाण्डकेन अर्पितोत्कृष्टस्थितौ भागे हृते द्वादशशतवर्षमात्रा आबाधा भवति स्वातिसंस्थान-नाराचसंहननयो: उत्कृष्टाबाधाकाल: चतुर्दशवर्षशतानि।
तद्यथा-
दशकोटाकोटिसागरोपमानां यदि दशवर्षशतमात्राबाधा लभ्यते, तर्हि चतुर्दशकोटाकोटीसागरोपमेषु किं लभामहे इति फलगुणितेच्छाराशिं प्रमाणराशिना अपवर्तिते चतुर्दशशतवर्षाणि आबाधा भवति।
स्वातिसंस्थान-नाराचसंहननयो: आबाधोना कर्मस्थिति: कर्मनिषेको भवति।
कुब्जकसंस्थान-अद्र्धनाराचसंहननयो: उत्कृष्ट: स्थितिबंध: षोडशसागरोपमकोटाकोटि प्रमाणास्ति। अनयोराबाधा षोडशवर्षशतानि ज्ञातव्या:।
अनयो: कर्मणो: आबाधाकालेन ऊना कर्मस्थिति: कर्मनिषेको भवतीति ज्ञातव्यम्।
इतो विस्तर:-तिर्यग्मनुष्यदेवायुर्भि: विना सप्तदशोत्तरशतप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिबंध: उत्कृष्टसंक्लेश-परिणामेन भवति।
उक्तं च- सव्वट्ठिदीणमुक्कस्सओ दु उक्कस्ससंकिलेसेण।
विवरीदेण जहण्णो आउगतियवज्जियाणं तु।।१३४।।
जघन्यस्थितिबंधस्तु उत्कृष्टविशुद्धपरिणामेन भवति। त्रि-आयुषां तु उत्कृष्टविशुद्धपरिणामेन उत्कृष्टस्थितिबंध: जघन्यस्थितिबंधस्तु उत्कृष्टसंक्लेशपरिणामेन।
एतयो: उत्कृष्टजघन्यबंधयो: स्वामिन: के सन्तीति ?
सव्वुक्कस्सठिदीणं मिच्छाइट्ठी दु बंधगो भणिदो।
आहारं तित्थयरं देवाउं वा विमोत्तूण ।।१३५।।
एतेनैव ज्ञायते आहारद्विकतीर्थकरदेवायुषां प्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिबंध: सम्यग्दृष्टीनामेव।
अत्र एतदपि ज्ञातव्यं-भोगभूमिजानामेव उत्कृष्टायु: त्रिपल्योपमानि, कर्मभूमिजानां पूर्वकोटिवर्षमेव मनुष्याणां तिरश्चां च। अत एषां भुज्यमानायुषां अपि उदीरणारूपेण कदलीघातमरणं संभवति इति ज्ञातव्यं।
तात्पर्यमेतत्-उत्कृष्टस्थितिबंधे सति कर्मणां सम्यक्त्वलाभो न भवति, न च जघन्यस्थितिबंधे सति, मध्यमस्थितिबंधे सत्येव सम्यक्त्वग्रहणयोग्यता संभवतीति ज्ञातव्यं।
उक्तं च श्रीमदकलंकदेवेन-‘‘अपरा कर्मस्थितिका काललब्धि:-उत्कृष्ट स्थितिकेषु कर्मसु जघन्यस्थितिकेषु प्रथमसम्यक्त्वलाभो न भवति।
क्व तर्हि भवति ?
अन्त:कोटाकोटिसागरोपमस्थितिकेषु कर्मसु बंधमापद्यमानेषु, विशुद्धिपरिणामवशात् सत्कर्मसु च तत: संख्येयसागरोपमसहस्रोनायामन्त:कोटाकोटिसागरोपमस्थितौ स्थापितेषु प्रथमसम्यक्त्वयोग्यो भवति।’’
एतज्ज्ञात्वा यावत्कषायाणां क्रोधमानमायालोभादीनां समूलनाशो न भवेत् तावत्पुरुषार्थबलेन वैराग्यज्ञानभावनाबलेन च यथा भवति तथा कषाया: कृशीकरणीया:, एवमेवात्मविशुद्धिर्बोधि:समाधि: सिद्धिश्च भवति।
दर्शनमोहनीयचारित्रमोहनीयकर्मणां यानि कानिचित् कारणानि, तेभ्योऽपि अपसर्तव्या अस्माभि:।
कानि तानि कारणानि इति चेत् ?
केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य।।१३।।
कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य।।१४।।
निरावरणज्ञाना: केवलिन:। तदुपदिष्ठं बुद्ध्यतिशयद्र्धियुक्तगणधरानुस्मृतं ग्रन्थरचनं श्रुतं भवति। रत्नत्रयोपेत: श्रमणगण: संघ:। अहिंसालक्षणस्तदागमदेशितो धर्म:। देवाश्चतुर्णिकाया उक्ता:। गुणवत्सु महत्सु असद्भूतदोषोद्भावनमवर्णवाद:। एतेष्ववर्णवादो दर्शनमोहस्यास्रवहेतु:। कवलाभ्यवहारजीविन: केवलिन: इत्येवमादिवचनं केवलिनामवर्णवाद:। मांसभक्षणाद्यनवद्याभिधानं श्रुतावर्णवाद:। शूद्रत्वा-शुचित्वाद्याविर्भावनं संघावर्णवाद:। जिनोपदिष्टो धर्मो निर्गुणस्तदुपसेविनो ये ते चासुरा: भविष्यन्तीत्येव-माद्यभिधानं धर्मावर्णवाद:। सुरामांसोपसेवाद्याघोषणं देवावर्णवाद:।
अधुना चारित्रमोहनीयास्रवभेदा: कथ्यन्ते-
कषाया उक्ता:। उदयो विपाक:। कषायाणामुदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्यास्रवो वेदितव्य:। तत्र स्वपरकषायोत्पादनं तपस्विजनवृत्तदूषणं संक्लिष्टलिंगव्रतधारणादि: कषायवेदनीयस्यास्रव:। सद्धर्मोपहसन-दीनातिहास-कंदर्पोपहासबहुविप्रलापोहासशीलतादिर्हास्यवेदनीयस्य। विचित्रक्रीडनपरताव्रतशीलारुच्यादि: रतिवेदनीयस्य। परारतिप्रादुर्भावनरतिविनाशन-पापशीलसंसर्गादि: अरतिवेदनीयस्य। स्वशोकोत्पादन-परशोकप्लुताभिनंदनादि: शोकवेदनीयस्य। स्वभयपरिणाम-परभयोत्पादनादिर्भयवेदनीयस्य। कुशलक्रियाचार-जुगुप्सापरिवादशीलत्वादिर्जुगुप्सावेदनीयस्य। अलीकाभिधायिता-तिसंधानपरत्व-पररन्ध्रपे्रक्षित्वप्रवृद्धरागादि: स्त्रीवेदनीयस्य। स्तोकक्रोधानुत्सुकत्वस्वदारसंतोषादि: पुँवेदनीयस्य। प्रचुरकषायागुह्येन्द्रियव्यपरोपण परांगनावस्कंदादिर्नपुंसकवेदनीयस्य।’’
एतादृशान्येव सर्वकर्मणां आस्रवकारणानि सर्वार्थसिद्धितत्त्वार्थवृत्तितत्त्वार्थवार्तिकादिग्रन्थेभ्य: ज्ञातव्यानि भवन्ति। सर्वास्रवकारणानि अवबुध्य पुन: पुन: चिन्तयद्भि: अस्माभिरीदृशी भावना कर्तव्या यत् एतासु कर्मप्रकृतिषु कस्याश्चिदपि प्रकृते: मयि उत्कृष्टस्थितिबंधो मा भवेत् केवलं देवायुर्विहाय, किंच देवायुरुत्कृष्टस्थिति: सर्वार्थसिद्धौ उत्पन्नाहमिन्द्राणामेव ते चाहमिन्द्रा: एकभवावतारिण:, अथवा ‘‘विजयादिषु द्विचरमा:’’ इति सूत्रेण तेषामपि आयुषि लभ्यमाने च काचिद् हानिर्मम ते द्विभवावतारिणोऽपि नियमेन मोक्षं गमिष्यंति। तीर्थकरप्रकृतेरुत्कृष्टस्थितिस्तु बद्धनरकायुष्कस्यैवात: सापि न याच्यते मया, केवलं देवायुरुत्कृष्टस्थितिरेव प्राथ्र्यते उत्कृष्टस्थितिबंधचूलिकामभ्यस्य, अथवा न किमपि याच्यते केवलं बोधि: समाधिरेव वाञ्छ्यते।
उक्तं च श्रीमत्वुकुन्दकुन्दवेन-
‘‘दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो, सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं।’’
श्रीमत्पूज्यपाददेवनन्दिसूरिणापि तथैव याच्यते-
‘‘गुरुमूले यतिनिचिते चैत्यसिद्धान्तवार्धिसद्घोषे।
मम भवतु जन्मजन्मनि सन्यसन-समन्वितं मरणम्।।
पुनरपि अतीवोत्कटभावनया कथ्यते-
आबाल्याज्जिनदेवदेव! भवत: श्रीपादयो: सेवया।
सेवासक्तविनेयकल्पलतया कालोऽद्य यावद्गत:।।
त्वां तस्या: फलमर्थये तदधुना प्राणप्रयाणक्षणे।
त्वन्नाम-प्रतिबद्धवर्णपठने कंठोऽस्त्वकुण्ठो मम।।’’
ईदृशीं भावना पुन: पुन: भावयित्वा परंपरया स्वात्मातीन्द्रियसुखमयं सिद्धिधाम प्राप्स्यते।
यै: भगवद्धि: ब्राह्म्यै अक्षरविद्यां सुंदर्यै अंकविद्यां च ददु: तेभ्य: युगादिपुरुषेभ्य: श्रीऋषभदेवेभ्य: अस्माकं नमोऽस्तु, ब्राह्मीं प्रथमगणिनीं मातरं सुन्दरीमार्यिकां च वन्दामहे अहर्निशम् भक्तिभावेन।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखंडे षष्ठग्रन्थे श्रीमद्भूतबलि-विरचितजीवस्थानचूलिकायां श्रीवीरसेनाचार्यरचितधवलाटीकाप्रमुखनानाग्रन्था-धारेण विरचितायां विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्य: चारित्रचक्रवर्ती श्रीशांतिसागर: तस्य प्रथमपट्टाधीश: श्रीवीरसागराचार्य: तस्य शिष्या-जंबूद्वीपरचनाप्रेरिका गणिनी ज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां उत्कृष्टस्थितिबंध-चूलिकानाम षष्ठोऽधिकार: समाप्त:।

अब द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय आदि आठ कर्मों की उत्कृष्टस्थिति, आबाधा और कर्मनिषेक का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, वामनसंस्थान, कीलकसंहनन, सूक्ष्मनाम, अपर्याप्तनाम और साधारणनाम, इन प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबंध अट्ठारह कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।३०।।

पूर्व सूत्र कथित द्वीन्द्रियजाति आदि प्रकृतियों का उत्कृष्ट आबाधाकाल अट्ठारह सौ वर्ष है।।३१।।

उक्त कर्मों के आबाधाकाल से हीन कर्मस्थिति प्रमाण उन कर्मों का कर्म-निषेक होता है।।३२।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। एक कोड़ाकोड़ी सागरोपम की आबाधा सौ वर्ष होती है। उसे त्रैराशिक-क्रम से प्राप्त अट्ठारह रूपों से गुणित करने पर अट्ठारह सौ वर्ष प्रमाण आबाधाकाल की उत्पत्ति होती है।

यहाँ पर, अर्थात् उक्त निषेक-स्थिति में कुछ कम डेढ़ गुणहानि से समयप्रबद्ध में भाग देने पर प्रथम निषेक का प्रमाण होता है। दूसरे निषेक का भागहार पूर्व निषेक के भागहार से सातिरेक होता है। इस प्रकार विवक्षित गुणहानि के भीतर सर्व निषेकों के भागहार सिद्ध करना चाहिये।

इस प्रकार आठवें स्थल में दो इन्द्रिय आदि जीवों की उत्कृष्ट स्थिति, आबाधा और निषेकों का प्ररूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

अब आहारकद्विक और तीर्थंकर प्रकृति की उत्कृष्टस्थिति, आबाधा और निषेक का प्ररूपण करने के लिये तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारकशरीर, आहारकशरीर-अंगोपांग और तीर्थंकर नामकर्म इन प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबंध अन्त:कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।३३।।

पूर्व सूत्रोक्त आहारकशरीरादि प्रकृतियों का आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्तमात्र है।।३४।।

उक्त तीनों कर्मों के आबाधाकाल से हीन कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।३५।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इन तीनों प्रकृतियों का बंध सम्यग्दृष्टि जीव के ही होता है और सम्यग्दृष्टि के अन्त:कोड़ाकोड़ी से अधिक बन्ध होता नहीं है। ‘अन्त:कोड़ाकोड़ी’ ऐसा कहने पर एक कोड़ाकोड़ी सागरोपम को संख्यात कोटियों से खण्डित होने पर जो एक खण्ड होता है, वह अन्त:कोड़ाकोड़ी का अर्थ ग्रहण करना चाहिये। अन्तर्मुहूर्तमात्र आबाधा के द्वारा इस स्थिति के प्रज्ञापन अर्थात् जानने का उपाय यह है-दश कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमित कर्मस्थिति की आबाधा एक हजार वर्ष स्थापित करके उसके मुहूर्त करने पर आठ लाख से अधिक एक कोटिप्रमाण मुहूर्त होते हैं। उनका प्रमाण यह है-१०८०००००।

विशेषार्थ-चूँकि एक अहोरात्र में ३० मुहूर्त होते हैं तो मध्यम प्रतिपत्ति से एक वर्ष के ३६० दिनों में कितने मुहूर्त होंगे, इस प्रकार त्रैराशिक करने पर १०८०० मुहूर्त प्राप्त होते हैं। इस प्रमाण को १००० वर्षों से गुणा करने पर १०८००००० एक करोड़ आठ लाख मुहूर्त सिद्ध हो जाते हैं।

इन मुहूर्तों से अपवर्तन की गई दश कोड़ाकोड़ी सागरोपममात्र स्थिति यदि इन सूत्रोक्त तीनों कर्मों की हो तो इस स्थिति की एक मुहूर्तमात्र आबाधा प्राप्त होती है।

उदाहरण-इतने सागरोपमप्रमित स्थिति की आबाधा एक मुहूर्त होती है।

दश गुणित पूर्वोक्त भागहार से अपवर्तित दश कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमित स्थिति यदि उक्त तीनों कर्मों की हो, तो उनकी आबाधा मुहूर्त का दशवाँ भाग होगी किन्तु इन आहारक-शरीरादि तीनों कर्मों की इतनी आबाधा नहीं होती है अन्यथा असंयतसम्यग्दृष्टि के उत्कृष्ट स्थितिबंध से और उत्कृष्ट स्थितिसत्त्व से भी संख्यातगुणी मिथ्यादृष्टि की ध्रुवस्थिति के संख्यात अन्तर्मुहूर्तप्रमाण आबाधा होने का प्रसंग आता है। किन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि उससे संख्यातगुणी पंचेन्द्रिय अपर्याप्त की उत्कृष्ट स्थिति के भी अन्तर्मुहूर्तमात्र आबाधा पाई जाती है इसलिये संख्यात कोटियों से खण्डित अर्थात् भाजित दश कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमाण उत्कृष्ट स्थिति सूत्रोक्त तीनों कर्मों की पृथक्-पृथक् होती है, यह बात सिद्ध हुई।

विशेषार्थ-सूत्रकार ने जो आहारकशरीरादि तीन प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबंध अन्त:कोड़ाकोड़ी सागरोपम बतलाया है, उसी को धवलाकार ने यहाँ और भी सूक्ष्मता से समझाने का प्रयास किया है कि यहाँ अन्त:कोड़ाकोड़ी से अभिप्राय एक सागरोपम कोड़ाकोड़ी के संख्यातवें भाग से है न कि एक कोटि सागरोपम से ऊपर और एक कोड़ाकोड़ी सागरोपम से नीचे किसी भी मध्यवर्ती संख्या से, जैसा कि सामान्यत: माना जाता है और इसका कारण उन्होंने यह दिया है कि यदि यह अन्त:कोड़ाकोड़ी का प्रमाण सागरोपमों का दशवाँ भाग भी लेवें, तो उसका आबाधाकाल मुहूर्त के १/१०वाँ भाग पड़ेगा किन्तु यदि यही प्रमाण ग्रहण किया जाये तो असंयतसम्यग्दृष्टि, संज्ञी पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि और संज्ञी पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि अपर्याप्तकों के स्थितिबंध का जो संख्यातगुणित क्रम से अल्पबहुत्व बतलाया गया है, उसके अनुसार संज्ञी पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि अपर्याप्तकों का आबाधाकाल संख्यात मुहूर्त प्राप्त होगा। उदाहरणार्थ-धवला में (अ.प्रतिपत्र ९४०-९४३ पर) संयत का उत्कृष्ट, संयतासंयत का जघन्य व उत्कृष्ट, असंयतसम्यग्दृष्टि पर्याप्त का जघन्य, इसी के अपर्याप्त का जघन्य व उत्कृष्ट६, इसी के पर्याप्त का उत्कृष्ट, संज्ञी मिथ्यादृष्टि पंचेन्द्रिय पर्याप्त का जघन्य, इसी के अपर्याप्त का जघन्य और इसी के अपर्याप्त का उत्कृष्ट१० स्थितिबंध उत्तरोत्तर संख्यातगुणा बतलाया गया है। अब यदि हम संयत के अंत:कोड़ाकोड़ी स्थितिबन्ध का प्रमाण एक कोटी सागरोपम ही मान लें और तदनुसार उसके आबाधाकाल का प्रमाण मुहूर्त का १/१०वाँ भाग मान लें तो जघन्य संख्या गुणितक्रम से भी संज्ञी पंचेन्द्रिय अपर्याप्त मिथ्यादृष्टि का उत्कृष्ट स्थितिबंध १ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ · ५१२ कोटी सागरोपम और उसकी आबाधा का प्रमाण १/१० ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ ² २ · ५१२/१० · ५१ (१/५) मुहूर्त होगा किन्तु आगम में संज्ञी पंचेन्द्रिय अपर्याप्त मिथ्यादृष्टि का आबाधाकाल भी अन्तर्मुहूर्त ही माना गया है। इससे सिद्ध हो जाता है कि प्रकृत में अन्त:कोड़ाकोड़ी का प्रमाण एक कोटि सागरोपम से भी बहुत नीचे ही ग्रहण करना चाहिये तभी उससे उत्तरोत्तर संख्यातगुणित स्थितिबंधों की आबाधा भी अन्तमुर्हूर्त ही सिद्ध हो सकेगी। इस प्रकार धवलाकार का यह कथन सर्वथा युक्तिसंगत है कि सूत्रोक्त तीनों कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध संख्यात कोटियों से भाजित सागरोपम कोड़ाकोड़ी ग्रहण करना चाहिये।

शंका-यह व्याख्यान, अपूर्वकरण गुणस्थान के प्रथम समय की स्थितिबंध का सागरोपम कोटिलक्ष-पृथक्त्व प्रमाण के प्ररूपण करने वाले कसायपाहुड़चूर्णिसूत्र से विरोध को प्राप्त होता है ?

समाधान-ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये क्योंकि वह तंत्रान्तर अर्थात् दूसरा सिद्धान्तग्रन्थ या मत है। अथवा, अपनी-अपनी जाति के प्रतिबद्ध स्थितिबंधों में और आबाधाओं में यह त्रैराशिक का नियम लागू होता है अन्यत्र नहीं, अन्यथा क्षपकश्रेणी में होने वाले अन्तर्मुहूर्तप्रमित स्थितिबन्धों की आबाधा के अभाव का प्रसंग प्राप्त होता है। इसलिये अपने-अपने उत्कृष्टस्थितिबन्धों को अपनी-अपनी उत्कृष्ट आबाधाओं से अपवर्तन करने पर आबाधाकांडक आ जाते हैं, ऐसा नियम ग्रहण करना चाहिये। अतएव यह सिद्ध हुआ कि यहाँ पर अर्थात् उक्त दोनों कर्मों की स्थिति में अन्तर्मुहूर्तमात्र आबाधा के होने पर भी स्थितिबंध अन्त:कोड़ाकोड़ी प्रमाण होता है।

इन आहारकद्विक और तीर्थंकर प्रकृतियों की उत्कृष्ट स्थितिबंध के स्वामी का कथन करते हैं-

अप्रमत्तगुणस्थानवर्ती मुनि जो कि छठे गुणस्थान के अभिमुख हैं वे आहारकद्विक की उत्कृष्ट स्थिति को बांधते हैं। जिन्होंने नरक की आयु पहले बांध ली है ऐसे अविरत सम्यग्दृष्टि कर्मभूमिज मनुष्य तीर्थंकर प्रकृति की उत्कृष्टस्थिति बांधते हैं।

कहा भी है-प्रमत्तमुनि देवायु को, अप्रमत्तसंयतमुनि आहारकशरीर को एवं तीर्थंकर प्रकृति को बांधते हैं तथा कर्मभूमिज मनुष्य अविरतसम्यग्दृष्टि भी तीर्थंकर प्रकृति को बांधता है।।

इस प्रकार नवमें स्थल में आहारकद्विक और तीर्थंकर प्रकृति की उत्कृष्टस्थिति का, आबाधा एवं निषेकों का निरूपण करते हुये तीन सूत्र पूर्ण हुये।

अब न्यग्रोधपरिमण्डल आदि प्रकृतियों की उत्कृष्ट स्थिति, आबाधा और निषेकों का प्रतिपादन करने के लिये नव सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान और वङ्कानाराचसंहनन, इन दोनों नामकर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध बारह कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।३६।।

न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान और वङ्कानाराचसंहनन, इन दोनों प्रकृतियों का उत्कृष्ट आबाधाकाल बारह सौ वर्ष है।।३७।।

उक्त दोनों कर्मों के आबाधाकाल से हीन कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्मों का कर्मनिषेक होता है।।३८।।

स्वातिसंस्थान और नाराचसंहनन, इन दोनों नामकर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध चौदह कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।३९।

उक्त दोनों कर्मों का आबाधाकाल चौदह सौ वर्ष है।।४०।।

स्वातिसंस्थान और नाराचसंहनन, इन दोनों नामकर्मों के आबाधाकाल से हीन कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।।४१।।

कुब्जकसंस्थान और अर्धनाराचसंहनन, इन दोनों नामकर्मों का उत्कृष्टस्थितिबन्ध सोलह कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।।४२।।

उक्त दोनों कर्मों का उत्कृष्ट आबाधाकाल सोलह सौ वर्ष है।।४३।।

उक्त दोनों कर्मों के आबाधाकाल से हीन कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्मनिषेक होता है।।४४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है।

शंका-नामत्व की अपेक्षा इतर नामकर्मों से भेद नहीं होने पर भी उक्त प्रकृतियों की स्थिति-भेद किसलिए है ?

समाधान-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि प्रकृतिविशेष की अपेक्षा से भिन्नता को प्राप्त प्रकृतियों के स्थिति-भेद मानने में कोई विरोध नहीं है।

एक आबाधाकांडक से विवक्षित उत्कृष्टस्थिति में भाग देने पर बारह सौ वर्ष प्रमाण आबाधा प्राप्त होती है। स्वाति संस्थान और नाराच संहनन का उत्कृष्ट आबाधाकाल १४०० चौदह सौ वर्ष प्रमाण है। वह इस प्रकार है-दश कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थिति वाले कर्मों की आबाधा यदि दश सौ (१०००) वर्ष प्रमाण होती है, तो चौदह कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थिति वाले कर्मों में कितनी आबाधा प्राप्त होगी ? इस प्रकार इच्छाराशि को फलराशि से गुणा करके प्रमाणराशि से अपवर्तन करने पर चौदह सौ (१४००) वर्ष प्रमाण आबाधा प्राप्त होती है।

स्वातिसंस्थान और नाराचसंहनन, इन दोनों नामकर्मों के आबाधाकाल से हीन कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्म-निषेक होता है।

कुब्जकसंस्थान और अर्धनाराचसंहनन, इन दोनों नामकर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध सोलह कोड़ाकोड़ी सागरोपम है।

उक्त दोनों कर्मों का उत्कृष्ट आबाधाकाल सोलह सौ वर्ष है।

उक्त दोनों कर्मों के आबाधाकाल से हीन कर्मस्थितिप्रमाण उनका कर्मनिषेक होता है।

यहाँ विस्तार से कहते हैं-

तिर्यंचायु, मनुष्यायु और देवायु के बिना एक सौ सत्रह प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबंध, उत्कृष्ट संक्लेश परिणामों से होता है।

कहा भी है, गोम्मटसार कर्मकाण्ड ग्रन्थ में-

तीन आयु को छोड़कर सभी कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध उत्कृष्ट संक्लेश परिणामों से होता है और इसके विपरीत-उत्कृष्ट विशुद्ध परिणामों से जघन्य स्थितिबंध होता है।।३४।।

इन कर्मों का-एक सौ सत्रह प्रकृतियों का जघन्य स्थितिबंध उत्कृष्ट विशुद्ध परिणामों से होता है तथा तीनों आयु का उत्कृष्ट स्थितिबंध उत्कृष्ट विशुद्ध परिणामों से एवं जघन्य स्थितिबंध उत्कृष्ट संक्लेश परिणामों से होता है।

शंका-इन आयु के उत्कृष्ट और जघन्य स्थितिबंध के स्वामी कौन हैं ?

समाधान-आहारकद्विक, तीर्थंकर और देवायु को छोड़कर सभी प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबंध करने वाले मिथ्यादृष्टि ही कहे गये हैं।।३५।।

इस गाथा से ही जाना जाता है कि आहारकद्विक, तीर्थंकर और देवायु इन चार प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थितिबंध सम्यग्दृष्टियों के ही होता है। यहाँ यह भी जानना चाहिये कि भोगभूमिया मनुष्यों के ही उत्कृष्टायु तीन पल्योपम है। कर्मभूमिया मनुष्यों और तिर्यंचों के उत्कृष्टायु पूर्वकोटि वर्ष प्रमाण ही है। इसलिये इन कर्मभूमियों के ही भुज्यमान आयु में भी उदीरणारूप से कदलीघात मरण संभव है, ऐसा जानना चाहिए।

यहाँ तात्पर्य यह है कि-कर्मों की उत्कृष्ट स्थितिबंध के होने पर सम्यक्त्व का लाभ नहीं होता है और न जघन्य स्थितिबंध के होने पर ही, किन्तु मध्यम स्थितिबंध के होने पर ही सम्यक्त्व ग्रहण की योग्यता संभव है, ऐसा जानना चाहिये।

श्रीमान अकलंकदेव ने कहा भी है-

दूसरी कर्मस्थिति वाली काललब्धि है-जब कर्म उत्कृष्टस्थिति में बंध रहे हों या जघन्य स्थिति में बंध रहे हों, उस समय प्रथम सम्यक्त्व का लाभ नहीं होता।

प्रश्न-कैसी कर्म स्थिति में सम्यग्दर्शन का लाभ होता है ?

उत्तर-जब कर्म अन्त:कोड़ाकोड़ी सागरोपम स्थिति के बंध रहे हों तथा पूर्वबद्ध कर्म परिणामों की निर्मलता के द्वारा संख्यात हजार सागर कम अन्त:कोड़ाकोड़ी सागर की स्थिति वाले कर दिये गये हों तब प्रथम सम्यक्त्व के ग्रहण करने की योग्यता होती है।

यह जानकर जब तक क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायों का जड़मूल से नाश न हो जावे तब तक पुरुषार्थपूर्वक वैराग्य भावना और ज्ञान भावना के बल से जैसे बने वैसे कषायों को कृश करना चाहिये, इसी प्रकार से आत्मा की विशुद्धि, बोधि-रत्नत्रय की प्राप्ति, समाधि एवं सिद्धि-आत्मा की उपलब्धि होती है।

दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय कर्मों के जो कोई कारण हैं, हमें और आपको उन्हें भी दूर करना चाहिये। वे कारण कौन-कौन से हैं ?

केवली, श्रुत, संघ, धर्म और देव इनका अवर्णवाद दर्शनमोहनीय कर्म का आस्रव है।।१३।।

कषाय के उदय से होने वाला तीव्र आत्मपरिणाम चारित्रमोहनीय का आस्रव है।।१४।।

जिनका ज्ञान आवरणरहित है, वे केवली कहलाते हैं। अतिशय बुद्धि वाले गणधरदेव उनके उपदेशों का स्मरण करके जो ग्रन्थों की रचना करते हैं, वह श्रुत कहलाता है। रत्नत्रय से युक्त श्रमणों का समुदाय संघ कहलाता है। सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित आगम में उपदिष्ट अिंहसा ही धर्म है। चार निकाय वाले देवों का कथन पहले कर आये हैं। गुण वाले बड़े पुरुषों में जो दोष नहीं है उनका उनमें उद्भावन करना अवर्णवाद है। इन केवली आदि के विषय में किया गया अवर्णवाद दर्शनमोहनीय के आस्रव का कारण है। यथा-केवली कवलाहार से जीते हैं इत्यादि रूप से कथन करना केवलियों का अवर्णवाद है।

शास्त्र में माँस भक्षण आदि को निर्दोष कहा है इत्यादि रूप से कथन करना श्रुत का अवर्णवाद है। ये शूद्र हैं, अशुचि हैं इत्यादि रूप से अपवाद करना संघ का अवर्णवाद है। जिनदेव के द्वारा उपदिष्ट धर्म में कोई सार नहीं, जो इसका सेवन करते हैं वे असुर होंगे, इस प्रकार कथन करना धर्म का अवर्णवाद है। देव सुरा और माँस का सेवन करते हैं इस प्रकार का कथन करना देवों का अवर्णवाद है।

अब मोहनीय का दूसरा भेद जो चारित्रमोहनीय है उसके आस्रव के भेदों का कथन करने के लिये आगे कहते हैं-

कषाय का व्याख्यान पहले कर आये हैं। विपाक को उदय कहते हैं। कषायों के उदय से जो आत्मा का तीव्र परिणाम होता है, वह चारित्रमोहनीय का आस्रव जानना चाहिये। स्वयं कषाय करना, दूसरों में कषाय उत्पन्न करना, तपस्वीजनों के चारित्र में दूषण लगाना, संक्लेश को पैदा करने वाले लिंग (वेष) और व्रत को धारण करना आदि कषायवेदनीय के आस्रव हैं। सत्य धर्म का उपहास करना, दीन मनुष्य की दिल्लगी उड़ाना, कुत्सित राग को बढ़ाने वाला हंसी-मजाक करना, बहुत बकने और हंसने की आदत रखना आदि हास्यवेदनीय के आस्रव हैं। नाना प्रकार की क्रीड़ाओं में लगे रहना, व्रत और शील के पालन करने में रुचि न रखना आदि रतिवेदनीय के आस्रव हैं। दूसरों में अरति उत्पन्न हो और रति का विनाश हो, ऐसी प्रवृत्ति करना और पापी लोगों की संगति करना आदि अरतिवेदनीय के आस्रव हैं। स्वयं शोकातुर होना, दूसरों के शोक को बढ़ाना तथा ऐसे मनुष्यों का अभिनन्दन करना आदि शोकवेदनीय के आस्रव हैं। भयरूप अपना परिणाम और दूसरे को भय पैदा करना आदि भयवेदनीय के आस्रव के कारण हैं। सुखकर क्रिया और सुखकर आचार से घृणा करना और अपवाद करने में रुचि रखना आदि जुगुप्सावेदनीय के आस्रव हैं। असत्य बोलने की आदत, अतिसन्धानपरता, दूसरे के छिद्र ढूँढना और बढ़ा हुआ राग आदि स्त्रीवेदनीय के आस्रव हैं। क्रोध का अल्प होना, ईष्र्या नहीं करना, अपनी स्त्री में संतोष करना आदि पुरुषवेदनीय के आस्रव हैं। प्रचुर मात्रा में कषाय करना, गुप्त इन्द्रियों का विनाश करना और पर-स्त्री से बलात्कार करना आदि नपुंसकवेदनीय के आस्रव हैं।

इस प्रकार इन सभी कर्मों के आस्रव कारणों को ‘‘सर्वार्थसिद्धि, तत्त्वार्थवृत्ति और तत्त्वार्थराजवार्तिक’’ आदि तत्त्वार्थसूत्र के टीका ग्रन्थों से जानना चाहिये। इन सभी आस्रव कारणों को समझकर हमें और आप सभी को पुन:-पुन: इनका चिंतन करते हुये ऐसी भावना करना चाहिये कि इन सभी प्रकृतियों में से किसी भी प्रकृति का मुझमें उत्कृष्ट स्थितिबंध नहीं होवे, केवल देवायु को छोड़कर, क्योंकि देवायु की उत्कृष्ट स्थिति सर्वार्थसिद्धि में उत्पन्न होने वाले अहमिन्द्रों के ही होती है और वे अहमिन्द्र एक भवावतारी होते हैं। अथवा तत्त्वार्थसूत्र में कथित सूत्र के अनुसार विजय, वैजयंत, जयंत और अपराजित विमानों में जन्म लेने वाले अहमिन्द्र दो भवावतारी होते हैं। इस नियम से उन अहमिन्द्रों की भी उत्कृष्ट, मध्यम अथवा जघन्य आयु के मिलने पर कुछ भी मेरी हानि नहीं है, क्योंकि वे दो भवावतारी भी नियम से मोक्ष को प्राप्त करेंगे।

तीर्थंकर प्रकृति की उत्कृष्ट स्थिति तो ‘जिसने नरकायु पहले बांध ली है उसी के ही होती है अत: उसकी भी हम याचना नहीं करते हैं, इस उत्कृष्ट स्थितिबंध चूलिका को पढ़कर-अभ्यास करके मात्र हम देवायु की ही उत्कृष्ट स्थिति चाहते हैं। अथवा हम कुछ भी याचना नहीं करते हैं, केवल-मात्र बोधि और समाधि की ही वाञ्छा करते हैं।

श्री कुन्दकुन्ददेव ने कहा भी है-

मेरे दु:खों का क्षय हो, कर्मों का क्षय हो, बोधि का लाभ हो, सुगति में गमन हो, समाधिपूर्वक मरण हो और जिनेन्द्र भगवान के गुणों की संपत्ति मुझे प्राप्त होवे।

श्रीमान् देवनन्दि आचार्य जिनका दूसरा नाम पूज्यपाद आचार्य था, वे भी इसी प्रकार याचना करते हैं-

गुरुओं का पादमूल हो, यतियों का समुदाय हो, जिनप्रतिमाओं की भक्ति एवं जिनआगमरूपी समुद्र का उद्घोष हो रहा है ऐसे स्थान में मेरा समाधिपूर्वक मरण होवे, मैं जन्म-जन्म में ऐसे सन्यासमरण की भावना करता हूँ।

पुनरपि आचार्यदेव इसी समाधिभक्ति में अतीव उत्कट भावना से कहते हैं-

हे जिनदेव देव! बचपन से लेकर आज तक मैंने आपके चरणकमलों की सेवा-भक्ति करते हुए आपकी आराधना में आसक्त होकर, आपकी शिष्यत्वरूपी कल्पलता के द्वारा जो आज तक समय व्यतीत किया। हे भगवन्! आज मैं इस समय उस भक्ति का फल यही माँगता हूँ कि जब मेरे प्राण प्रयाण कर रहे हों-शरीर से निकल रहे हों, उस समय आपके नाममंत्र के उच्चारण में मेरा कंठ अकुंठित बना रहे-कंठ बन्द न हो जावे।

इस प्रकार की भावना को पुन:-पुन: भाते हुये परम्परा से अपनी आत्मा के अतीन्द्रिय सुखमय ऐसे सिद्धिधाम-मोक्षधाम को प्राप्त करेंगे।

जिन तीर्थंकर भगवान ने ब्राह्मी पुत्री को अक्षर विद्या एवं सुन्दरी पुत्री को अंकविद्या प्रदान की-पढ़ायी, उन युगादिपुरुष श्री ऋषभदेव भगवान को हमारा नमस्कार होवे। पुन: प्रथम गणिनी-युग की आदि में प्रथम गणिनी पद प्राप्त ब्राह्मी आर्यिका माताजी को और सुन्दरी आर्यिका माताजी को हम अहर्निश-हमेशा भक्तिभावपूर्वक वंदन करते हैं।

इस प्रकार श्रीमान् भगवान पुष्पदन्त-भूतबलि आचार्य प्रणीत षट्खण्डागम ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में इस छठे ग्रन्थ में श्रीमान् भूतबलि आचार्य विरचित जीवस्थान की चूलिका में श्रीमान् वीरसेनाचार्य रचित धवलाटीका प्रमुख अनेक ग्रन्थों के आधार से विरचित, बीसवीं शताब्दी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागराचार्य, उनके प्रथम पट्टाधीश श्री वीरसागराचार्य, उनकी शिष्या मैं जम्बूद्वीप रचना की प्रेरिका गणिनी ज्ञानमती आर्यिका, मेरे द्वारा कृत सिद्धान्तचिंतामणिटीका में उत्कृष्ट स्थितिबंध चूलिका नाम का यह छठा अधिकार पूर्ण हुआ।