08.ज्ञानमार्गणा अधिकार

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ज्ञानमार्गणा अधिकार

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अथ ज्ञानमार्गणाधिकार:

संप्रति ज्ञानमार्गणायां लब्धिप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
णाणाणुवादेण मदिअण्णाणी सुदअण्णाणी विभंगणाणी आभिणि-बोहियणाणी सुदणाणी ओहिणाणी मणपज्जवणाणी णाम कधं भवदि ?।।४४।।
खओवसमियाए लद्धीए।।४५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र प्रथमतस्तावत् मतिअज्ञानस्य कथनं क्रियते-मत्यज्ञानकारणं द्विविधं-द्रव्यकारणं भावकारणं च। तत्र द्रव्यकारणं मत्यज्ञाननिमित्तद्रव्यं, तद् द्विविधं—कर्मनोकर्मभेदेन। कर्म त्रिविधं-बंधोदयसत्त्वभेदेन, अवग्रहावरणादिभेदेन अनेकविधं वा। नोकर्मद्रव्यं त्रिविधं—सचित्ता-चित्तामिस्रमिति। एतेषां द्रव्याणां या मत्यज्ञानोत्पादनशक्तिः तद्भावकारणंंं। एतेभ्यः उत्पन्नं मत्यज्ञानं तद् यस्य जीवस्य अस्ति सः मत्यज्ञानी। एवं शेषज्ञानानामपि वक्तव्यं।
अत्र कश्चिदाह-अज्ञानमिति कथिते किं ज्ञानस्य अभावो गृह्यते आहोस्वित् न गृह्यते ?
तस्य समाधानं-न अत्राभावो गृह्यते, मतिज्ञानाभावे ‘मतिपूर्वकं श्रुतज्ञानं’ इत्यपि न घटते, ततः श्रुतज्ञानाभावोऽपि भवेत्। तयोर्मतिश्रुतयोरभावे सर्वज्ञानानामभावप्रसंगात्। ज्ञानाभावे न दर्शनमपि संभवेत्, द्वयोज्र्ञानदर्शनयोरन्योन्याविनाभावात्। ज्ञानदर्शनयोरभावे न जीवोऽपि, तस्य तल्लक्षणत्वात्। अत एव अत्र यत् स्व-परविवेकरहितं पदार्थज्ञानं तदेवाज्ञानं कथ्यते। विपरीतश्रद्धोत्पादकमिथ्यात्वोदयेन यत्पदार्थ-विषयकश्रद्धानं नोत्पद्यते। तस्य पदार्थस्य विषये यज्ज्ञानं तदेवाज्ञानं भण्यते, ज्ञानफलाभावात्। ततश्च स्थंभादिविषये यथावगमं श्रद्धधानस्यापि अज्ञानं उच्यते श्रद्धानाभावात् जिनदेववचनानां।
कथं मत्यज्ञानिनः क्षायोपशमिका लब्धिः ?
मत्यज्ञानावरणस्य देशघातिस्पर्धकानामुदयेन मत्यज्ञानित्वोपलंभात्। आवरणे सत्यपि आवरणीयस्य ज्ञानस्य एकदेशो यस्मिन् उदये उपलभ्यते, तस्य भावस्य क्षयोपशमव्यपदेशो भवति, ततः क्षायोपशमिकत्व-मज्ञानस्य न विरुध्यते। अथवा ज्ञानस्य विनाशः क्षयो नाम, तस्य उपशमः एकदेशक्षयः, तस्य क्षयोपशमसंज्ञा। तत्र ज्ञानमज्ञानं वा उत्पद्यते इति क्षायोपशमिका लब्धिरुच्यते।
एवं श्रुताज्ञानं विभंगज्ञानं, आभिनिबोधिकज्ञानं श्रुतज्ञानं अवधिज्ञानं मनःपर्ययज्ञानं अपि क्षायोपशमिको भावो ज्ञातव्यः। केवलं तु आत्मात्मनः आवरणानां देशघातिस्पर्धकानामुदयेन क्षायोपशमिका लब्धिर्भवति इति वक्तव्यं ।
सप्तानां ज्ञानानां सप्तैवावरणानि किन्न भवन्ति ?
न भवन्ति, पंचज्ञानव्यतिरिक्तज्ञानानुपलंभात्। मत्यज्ञान-श्रुताज्ञान-विभंगज्ञानानामभावोऽपि नास्ति, यथाक्रमेण आभिनिबोधिक-श्रुतावधिज्ञानेषु तेषामन्तर्भावात्।
संप्रति केवलज्ञानस्य स्वामिप्रतिपादनाय प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते-
केवलणाणी णाम कधं भवदि ?।।४६।।
खइयाए लद्धीए।।४७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-प्रथमसूत्रे प्रश्नरूपेण कथनं—किमौदयिकेन औपशमिकेन क्षायोपशमिकेन पारिणामिकेन वा केवलज्ञानिनो भवन्ति ?
एतेषां प्रश्नानामुत्तरं कथयन्ति—न पारिणामिकेन भावेन भवति केवलज्ञानी भगवान्, सर्वजीवानां केवलज्ञानोत्पत्तिप्रसंगात्। नौदयिकेन, केवलज्ञानप्रतिबंधिकर्मोदयस्य तदुत्पादनविरोधात्। नौपशमिकं, केवलज्ञानं, मोहनीयस्य इव ज्ञानावरणस्य उपशमाभावात्। न क्षायोपशमिकं केवलज्ञानं, असहायस्य करण-क्रम-व्यवधानादीनां क्षायोपशमिकत्वविरोधात्।
कश्चिदाशंकते-सर्वमपि ज्ञानं केवलज्ञानमेव आवरणविगमवशेन तत्तः विनिर्गतज्ञानकणानामुपलंभात्। न चैषो ज्ञानकणः केवलज्ञानादन्यः, जीवे पंचानां ज्ञानानामभावात्। यदि कथ्येत, तेषां पंचानां ज्ञानानां अभावो जीवे कुतोऽवगम्यते ?
तस्य समाधानं क्रियते-केवलज्ञानं त्रिकालगोचराशेषद्रव्यपर्यायविषयेण अक्रमेण इन्द्रियालोकादि-साधननिरपेक्षेण सूक्ष्म-दूर-समीपादिविघ्नसमूहनिर्मुत्तेन अस्ति। अनेन केवलज्ञानेन व्याप्ताशेषजीवप्रदेशेषु क्रमभावि-साधनसापेक्ष-सप्रतिपक्ष-परिमित-अविशदमतिज्ञानादीनां अस्तित्वविरोधात्। न च केवलज्ञानेन अवगतार्थे शेषज्ञानानां प्रवृत्तिर्मन्तुं योग्या, विशदाविशदयोः एकत्र-आत्मनि एककाले प्रवृत्तिविरोधात्। अवगतार्थेषु पुनरपि अवगमे फलाभावाच्च। केवलज्ञानेनानवगते पदार्थे एषां मतिज्ञानादीनां प्रवृत्तिः भवति, एतदपि न वक्तव्यं तदनवगतार्थाभावात्। ततो जीवे न पंच ज्ञानानि, केवलज्ञानमेकमेव।
न चावरणानि ज्ञानमुत्पादयन्ति, विनाशकानां तदुत्पादनविरोधात्। ततः केवलज्ञानं क्षायोपशमिकं भावं लभते इति न सिद्ध्यति, एतस्य साधनसापेक्षस्य क्षायोपशमिकस्य केवलत्वविरोधात्। न च भस्माच्छा-दिताग्निविनिर्गतवाष्पस्य अग्निव्यपदेशः अग्निबुद्धिर्वा अग्निव्यवहारो वा अस्ति, अनुपलंभात्। ततो न इमानि ज्ञानानि केवलज्ञानं, तेन कारणेन केवलज्ञानं न क्षायोपशमिकं।
कश्चिदाह-न क्षायिकमपि केवलज्ञानं, क्षयो नाम अभावः, तस्य कारणत्वविरोधात् ?
एतान् सर्वान् बुद्धौ कृत्वां केवलज्ञानी कथं भवतीति भणितं पृच्छासूत्रं। तस्योत्तरं प्रायच्छत् श्रीभूतबलि-सूरिवर्यः अग्रिमसूत्रे-
क्षायिकलब्ध्या जीवः केवलज्ञानी भवति।
कश्चिदाशंकते-केवलज्ञानावरणस्य क्षयः तुच्छाभावरूपोऽस्ति, ततो न कार्यकरः ?
तस्य समाधानं क्रियते-केवलज्ञानावरणस्य बंधसत्त्वोदयाभावस्य अनंतवीर्यवैराग्य-सम्यक्त्व-दर्शनादिगुणैः युक्तजीवस्य तुच्छत्वविरोधात्। किंच भावस्याभावत्वं न विरुध्यते, भावाभावयोः अन्योन्यं स्वभावेनैव सर्वात्मना आलिंग्य स्थितयोरुपलंभात्। न च उपलंभमाने विरोधोऽस्ति अनुपलब्धिविषयस्य तस्य उपलब्धेः अस्तित्वविरोधात्।
एवं ज्ञानमार्गणायां स्वामित्वकथनत्वेन चत्वारि सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धांतचिंतामणि-
टीकायां ज्ञानमार्गणानाम सप्तमोऽधिकार: समाप्त:।

अथ ज्ञानमार्गणा अधिकार

अब ज्ञानमार्गणा में लब्धि को बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

ज्ञानमार्गणानुसार जीव मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, विभंगज्ञानी, आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी और मन:पर्ययज्ञानी किस कारण से होता है ?।।४४।।

क्षायोपशमिक लब्धि से जीव मतिअज्ञानी आदि होता है।।४५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ सर्वप्रथम मतिअज्ञान का कथन करते हैं-मति अज्ञान का कारण दो प्रकार का है-द्रव्यकारण और भावकारण। उनमें से द्रव्यकारण मतिअज्ञान का निमित्तभूत द्रव्य है, वह कर्म और नोकर्म के भेद से दो प्रकार का है। कर्मद्रव्यकारण तीन प्रकार का है-बंधकर्मद्रव्य, उदयकर्मद्रव्य और सत्वकर्मद्रव्य। अथवा यह कर्मद्रव्य अवग्रहावरण आदि के भेद से अनेक प्रकार का है। नोकर्मद्रव्य तीन प्रकार का है-सचित्त नोकर्मद्रव्य, अचित्त नोकर्मद्रव्य और मिश्र नोकर्मद्रव्य। इन द्रव्यों की जो मतिअज्ञान को उत्पन्न करने वाली शक्ति है, वह भावकारण है। इन सब कारणों से जो मतिअज्ञान होता है, वह जिस जीव के पाया जाता है, वह मति अज्ञानी होता है। इसी प्रकार शेष ज्ञानों के विषय में भी कहना चाहिए।

यहाँ कोई शंकाकार कहता है कि-‘अज्ञान’ ऐसा कहने पर क्या ज्ञान का अभाव ग्रहण किया है या ज्ञान का अभाव नहीं ग्रहण किया है ?

इस शंका का समाधान करते हैं-यहाँ मतिज्ञान का अभाव भी नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि मतिज्ञान का अभाव मानने पर चूंकि ‘मतिपूर्वक श्रुतज्ञान होता है’ इसलिए श्रुतज्ञान के भी अभाव का प्रसंग प्राप्त होता है और ऐसा माना नहीं जा सकता है, क्योंकि मति और श्रुत दोनों ज्ञानों के अभाव में सभी ज्ञानों के अभाव का प्रसंग आता है। ज्ञान के अभाव में दर्शन भी नहीं हो सकता है, क्योंकि ज्ञान और दर्शन परस्पर में अविनाभावी हैं। ज्ञान और दर्शन के अभाव में जीव भी नहीं रहता, क्योंकि जीव का तो ज्ञान और दर्शन यही लक्षण है। यहाँ स्व-पर विवेक से रहित जो पदार्थ का ज्ञान होता है, उसे यहाँ अज्ञान कहा है। अपने द्वारा ज्ञात वस्तु में विपरीत श्रद्धा उत्पन्न कराने वाले मिथ्यात्वोदय के बल से जिस पदार्थ के विषय में जीव के श्रद्धान नहीं उत्पन्न होता है, उस पदार्थ के विषय में जो ज्ञान होता है, वह अज्ञान कहलाता है, क्योंकि उसमें ज्ञान का फल नहीं पाया जाता है।

इसी प्रकार स्तंभादि पदार्थों में यथार्थज्ञान का श्रद्धा करता हुआ भी अज्ञानी कहा जाता है, क्योंकि उसके जिन भगवान के वचन में श्रद्धान का अभाव है, अत: वह ज्ञान अज्ञान कहलाता है।

शंका-मति अज्ञानी जीव के क्षायोपशमिक लब्धि कैसे हो सकती है ?

समाधान-क्योंकि उस जीव के मत्यज्ञानावरण कर्म के देशघाती स्पर्धकों के उदय से मत्यज्ञानादिपना पाया जाता है। आवरण के रहते हुए भी आवरणीय ज्ञान का एक देश जहाँ पर उदय में पाया जाता है, उसी भाव को क्षायोपशमिक नाम दिया गया है। इसलिए अज्ञान को क्षायोपशमिकपना विरोध को प्राप्त नहीं होता अथवा ज्ञान के विनाश का नाम क्षय है। उस क्षय के उपशम का नाम एकदेश क्षय है। उसके क्षयोपशम होने पर जो ज्ञान या अज्ञान उत्पन्न होता है उसी को क्षायोपशमिक लब्धि कहते हैं।

इसी प्रकार श्रुताज्ञान, विभंगज्ञान, आभिनिबोधिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान और मन:पर्ययज्ञान को भी क्षायोपशमिक भाव कहना चाहिए। विशेषता यह है कि इन सब ज्ञानों में अपने-अपने आवरणों के देशघाती स्पर्धकों के उदय से क्षायोपशमिक लब्धि होती है ऐसा कहना चाहिए।

शंका-इन सातों ज्ञानों के सात ही आवरण क्यों नहीं होते ?

समाधान-नहीं होते हैं, क्योंकि पाँच ज्ञानों के अतिरिक्त अन्य कोई ज्ञान नहीं पाये जाते। किन्तु इससे मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान और विभंगज्ञान का अभाव भी नहीं होता है, क्योंकि उनका यथाक्रम से आभिनिबोधिकज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान में अन्तर्भाव हो जाता है।

अब केवलज्ञान के स्वामी का प्रतिपादन करने हेतु प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव केवलज्ञानी किस कारण से होते हैं ?।।४६।।

क्षायिक लब्धि से जीव केवलज्ञानी होते हैं।।४७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथम सूत्र में प्रश्नरूप से कथन है-क्या औदयिक भाव से, क्या औपशमिक भाव से, क्या क्षायोपशमिक भाव से, क्या पारिणामिक भाव से जीव केवलज्ञानी होते हैं ?

इन प्रश्नों का उत्तर देते हैं-पारिणामिक भाव से केवलज्ञानी भगवान नहीं होते हैं, यदि ऐसा माना जाएगा, तो सभी जीवों के केवलज्ञान की उत्पत्ति का प्रसंग आ जाएगा। औदायिक भाव से भी केवलज्ञान नहीं होता है, क्योंकि केवलज्ञान के प्रतिबंधक कर्मोदय से उसकी उत्पत्ति होने में विरोध आता है। केवलज्ञान औपशमिक भी नहीं है, क्योंकि मोहनीय कर्म के समान ज्ञानावरण का उपशम नहीं होता है। केवलज्ञान क्षायोपशमिक भी नहीं है, क्योंकि असहाय और करण, क्रम एवं व्यवधान से रहित ज्ञान को क्षायोपशमिक होने में विरोध आता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-समस्त ज्ञान केवलज्ञान ही हैं, क्योंकि आवरण के दूर हो जाने से अज्ञानों में इसी से निकलने वाले ज्ञान के कण पाये जाते हैं और यह ज्ञान के कण केवलज्ञान से भी भिन्न नहीं हैं, क्योंकि जीव में पाँच ज्ञानों का अभाव है। यदि कहा जाये कि जीव में पाँच ज्ञानों का अभाव है, यह किस प्रमाण से जाना जाता है ?

इसका समाधान करते हैं कि-त्रिकालगोचर, समस्त द्रव्यों और उनकी पर्यायों को विषय करने वाला, अक्रमभावी, इन्द्रिय और आलोकादि साधनों से निरपेक्ष, सूक्ष्म, दूर और समीपवर्ती आदि विघ्नसमूह से मुक्त केवलज्ञान होता है। ऐसे केवलज्ञान से व्याप्त समस्त जीवप्रदेशों में क्रमभावी, साधन सापेक्ष, सप्रतिपक्ष, परिमित और अविशद मतिज्ञान आदि का अस्तित्व होने में विरोध आता है और केवलज्ञान से अवगत पदार्थों में शेषज्ञानों की प्रवृत्ति भी नहीं होती है, क्योंकि विशद और अविशद ज्ञानों की एक आत्मा में एक काल में प्रवृत्ति होने में विरोध आता है और जाने हुए पदार्थ को पुन: जानने में कोई फल भी नहीं है। केवलज्ञान से न जाने हुए पदार्थों में मति आदि ज्ञानों की प्रवृत्ति होती है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि केवलज्ञान से न जाना गया हो, ऐसा कोई पदार्थ ही नहीं है। इसलिए जीव में एक साथ पाँच ज्ञान नहीं होते हैं, केवलज्ञान एक अकेला ही होता है। तथा आवरण ज्ञान को उत्पन्न नहीं करते हैं, क्योंकि जो विनाशक है, उन्हें उत्पादक मानने में विरोध आता है। इसलिए ‘केवलज्ञान क्षायोपशमिक भाव को ही प्राप्त होता है’ ऐसा भी नहीं है, क्योंकि क्षायोपशमिक भाव साधनसापेक्ष होता है, अत: उसके केवलरूप होने में विरोध आता है। क्षार (भस्म) से ढकी हुई अग्नि से निकले हुए वाष्प को अग्नि नाम नहीं दिया जा सकता है, न उसमें अग्नि की बुद्धि उत्पन्न होती है और न उसमें अग्नि का व्यवहार ही होता है, क्योंकि वैसा पाया नहीं जाता है। अतएव ये सब मति आदि ज्ञान केवलज्ञान नहीं हो सकते हैं। इस कारण से केवलज्ञान क्षायोपशमिक भी नहीं है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-केवलज्ञान क्षायिक भी नहीं हैं, क्योंकि क्षय तो अभाव को कहते हैं, और अभाव को कारण होने में विरोध आता है ? इन सब विकल्पों को मन में जान करके जीव केवलज्ञानी किस कारण से होता है ? यह प्रश्न किया गया है अर्थात् यह पृच्छा सूत्र है। उसका उत्तर अगले सूत्र में श्रीभूतबलि आचार्य ने दिया है-

क्षायिकलब्धि से जीव केवलज्ञानी होता है।

यहाँ कोई शंका करता है-केवलज्ञानावरण कर्म का क्षय तुच्छाभावरूप होता है, अत: वह कोई कार्य करने में समर्थ नहीं हो सकता है ?

उसका समाधान करते हैं-ऐसा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि केवलज्ञानावरण के बंध, सत्व और उदय का अभाव होने पर अनन्तवीर्य, वैराग्य, सम्यक्त्व व दर्शन आदि गुणों से युक्त जीव द्रव्य को तुच्छ मानने में विरोध आता है। दूसरी बात यह है कि भाव का अभावरूप होना विरोध को प्राप्त नहीं होता है, क्योंकि भाव और अभाव स्वभाव से ही एक-दूसरे को सर्वात्मरूप से आलिगन करके स्थित होते हैं। जो बात पाई है उसमें विरोध नहीं होता है, क्योंकि विरोध का विषय अनुपलब्धि है, इसलिए जहाँ जिस बात की उपलब्धि होती है, उसमें फिर विरोध का अस्तित्व मानने में ही विरोध आता है।

इस प्रकार ज्ञानमार्गणा में स्वामित्व का कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में ज्ञानमार्गणा नाम का सातवाँ अधिकार समाप्त हुआ।