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पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी ससंघ पोदनपुर बोरीवली में विराजमान है।

30 सितम्बर 2017 प्रवचन

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पूज्य ज्ञानमती माताजी के 84 वें जन्म जयंती पर सभी भक्तों की तरफ से सादर वंदामि ...

पूज्य चंदनामती माताजी ने गणिनी ज्ञानमती माताजी के 84 वे जन्मजयंती महामहोत्सव के बारे में बताया-

सरयू नदी की एक बिन्दु आज ज्ञान की सिन्धु बन गई है, शरदपूर्णिमा का यह चाँद आज अहर्निश सारे संसार को सम्यग्ज्ञान के दिव्य प्रकाश से आलोकित कर रहा है।

विक्रम संवत् १९९१ (२२ अक्टूबर ईसवी सन् १९३४) की शरदपूर्णिमा (आश्विन शु. पूर्णिमा) की रात्रि के प्रथम प्रहर में जिला बाराबंकी के टिकैतनगर ग्राम में श्रेष्ठी श्री छोटेलाल जी की धर्मपत्नी श्रीमती मोहिनी देवी ने इस कन्या को जन्म देकर अपना प्रथम मातृत्व धन्य कर लिया था। उनके दाम्पत्य जीवन की बगिया का यह प्रथम पुष्प सारे संसार को अपनी मोहक सुगंधि से सुवासित करेगा, यह बात तो वे कभी सोच भी नहीं सके थे किन्तु सरस्वती के इस अवतार को जन्म देने मे उनके जन्म-जन्मान्तर के संचित पुण्य कर्म ही मानो सहायक बने थे।

अवध प्रान्त में जन्म लेने वाली इस नारीरत्न का परिचय बस यही तो है कि सरयू नदी की एक बिन्दु आज ज्ञान की सिन्धु बन गई है, शरदपूर्णिमा का यह चाँद आज अहर्निश सारे संसार को सम्यग्ज्ञान के दिव्य प्रकाश से आलोकित कर रहा है। बालिका का नाम रखा गया-मैना! मैना पक्षी की भाँति मधुरवाणी जो घर से निकलकर गली-मोहल्ले और सारे नगर में गुंजायमान होने लगी थी। पूर्व जन्मों की तपस्या एवं माँ की घूंटी से जो नैसर्गिक धर्म-संस्कार प्राप्त हुए थे, उन्होंने किशोरावस्था आते ही इन्हें ब्राह्मी और चन्दना का अलंकरण पहना दिया। परिवार में प्रथम कन्या के जन्म से सभी हर्षित थे। कन्या के जन्मते ही प्रसूतिगृह में फैले अलौकिक प्रकाश को देखकर बूढ़ी दादी के मुँह से निकला कि अवश्य ही आज मेरे घर मे कन्या के बहाने कोई देवी ने अवतार लिया है। बस, आशीर्वाद की फुलझड़ियाँ वृद्धा के मुख से फूट पड़ीं-इसी प्रकाश से सदैव प्रकाशित रहे मेरी नन्हीं बेटी, मेरी बहू का प्रथम पुष्प चिरंजीवी हो तथा उसकी सुगंधि से दोनों कुल सुवासित होवें इत्यादि।

इधर अपनी नन्हीं कली के जन्म की विशेषताओं को सुनकर माँ मोहिनी भी अपनी प्रसव पीड़ा भूलकर अपने अतीत और भविष्य का चिन्तन कर रही थीं। वे भी अपनी सासू जी का आशीर्वाद प्राप्त करके कहने लगीं-माँ! मैं तो इसे अपने पूज्य पिताजी का प्रसाद समझती हूँ क्योंकि उन्होंने मुझे विदा करते समय एक अमूल्य दहेज जो दिया था-‘‘पद्मनंदिपंचविंशतिका’’। मैंने विवाह के बाद प्रतिदिन उस ग्रंथ का स्वाध्याय कर-करके न जाने कितनी शुभ भावनाएँ भायी थीं, उसी के फलस्वरूप मुझे यह कन्यारत्न प्राप्त हुई है। कन्या के जन्म पर भी पुत्र जन्मोत्सव जैसी खुशियाँ मनाई गर्इं। पिता छोटेलाल जी भी अपनी सन्तान की प्रशंसा सुन-सुनकर फूले नहीं समाते थे। प्र्काम भी नाम के अनुसार ही- बचपन से ही ‘‘पद्मनंदिपंचविंशतिका’’ ग्रंथ के स्वाध्याय से इनके मन में वैराग्य के अंकुर प्रस्पुटित हो चुके थे इसलिए गुरु उपदेश के बिना ही त्यागमार्ग पर अग्रसर होने का इन्होंने पुरुषार्थ प्रारंभ कर दिया।

कौन जानता था कि एक छोटे से ग्राम में जन्मी इस बालिका में एक दिन इतना साहस प्रगट हो जाएगा कि सारे संसार में अपनी प्रतिभा के द्वारा ‘‘’’ का नाम अमर कर देगी। किन्तु संसार में एक लोकोक्ति है-‘‘फूल अपनी सुगंधि दशों दिशाओं में बिखेरने के लिए दूसरों की खुशामद नहीं करते, बादल कभी मोर के पास अपना कमीशन एजेंट नहीं भेजते हैं कि हम आकाश के आंगन में छा गए हैं, तुम थिरको और नाचो। फूल खिलते हैं वातावरण स्वयं महक उठता है, बादल छाते ही मोर नाचने लगते हैं। उसी प्रकार महानता किसी के दरवाजे पर कभी प्रचार, प्रसार या प्रशंसा की भीख मांगने नहीं जाती, यह सब तो स्वयमेव उसकी झोली में आ गिरते हैं। महानता, गुरुता और गुणों की पूजा-अर्चना की व्यवस्था सदियों से प्रकृति करती चली आ रही है।

पूज्य ज्ञानमती माताजी भी उन्हीं महान आत्माओं मे से एक हैं, जिनकी गुणसुरभि से सम्पूर्ण जगत सुगंधि प्राप्त कर रहा है। समय के सूक्ष्म तन्तुओं ने उस बाल प्रतिभा को निखारना प्रारंभ किया, माता के द्वारा पिलाई गई जन्मघूंटी से मैना का धार्मिक स्वास्थ्य वृद्धिंगत होने लगा और वह अपने यौवन की पगडंडी पर कदम रखने लगी। मैना अपने प्रारंभिक जीवन के सत्रह वर्षों को पूर्ण कर अट्ठारहवें वर्ष में प्रवेश कर रही थी, इसके साथ ही वह नारी जीवन के चरमलक्ष्य को भी सिद्ध करने के लिए प्रयत्नशील थी जबकि माता-पिता एवं समस्त परिवार अपनी उस गुणवती कन्या के हाथ पीले करने के समस्त उद्यम कर चुके थे। शरदपूर्णिमा तिथि तो प्रतिवर्ष आती और जनश्रुति के अनुसार अमृत बरसाकर चली जाती थी किन्तु सन् १९३४ की शरदपूर्णिमा ने धरती पर अपनी अमिट छाप छोड़ दी और मानों यहाँ के निवासियों से यह कहकर चली गई कि इस पूर्णिमा के चाँद के समक्ष मेरी शीतल रश्मियाँ भी व्यर्थ हैं, मैंने स्वयं भी अब इस चन्द्रमा से अमृत ग्रहण करने का निर्णय किया है जिसने मुझे भी धन्य और अमर कर दिया है, क्या मैं इनका उपकार जन्म-जन्म में भी भूल सकती हूँ? अर्थात् अब इस अवनीतल पर ‘‘पूर्णा तिथि की प्रतीक’’ कन्यारत्न के जन्म ने शरदपूर्णिमा तिथि को अक्षय पद प्राप्त करा दिया, जिसे युगों-युगों तक कोई मिटा नहीं सकता। महापुरुषों के भविष्य को बताने हेतु शुभ-अशुभ स्वप्नों का दिग्दर्शन भी हुआ करता है। जैसे-भगवान ऋषभदेव कोआहार देने से पूर्व हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस ने सुमेरु पर्वत, कल्पवृक्ष आदि सात स्वप्न देखे थे। नारी इतिहास को प्रारंभ करने वाली मैना ने भी रात्रि के पिछले प्रहर में एक स्वप्न देखा- ‘‘'मैं पूजन की थाली लेकर मंदिर जा रही हूँ, मेरे साथ आकाश में चन्द्रमा और नीचे उसकी शुभ्र चाँदनी पीछे-पीछे चल रही है, सभी नर-नारी मुझे आश्चर्यचकित हो देख रहे हैं।’’' त्याग के लिए मैना का अन्तरंग पुरुषार्थ तो चल ही रहा था, इस स्वप्न ने उन्हें संंबल प्रदान किया और प्रात:काल मैना सोचने लगी-मेरी विजय अवश्य होगी।

मैना ने सवेरे अपने छोटे भाई वैलाशचंद से स्वप्न की बात बताई तो वे भी एकदम बोल पड़े-‘‘जीजी! ऐसा लगता है कि आप भविष्य में महान साध्वी बनेंगी और आपके पुण्य एवं यश की चाँदनी चारों ओर अपना प्रकाश फैलाएगी।’’ अत्यन्त कुशाग्रबुद्धि वाले लघुभ्राता के मुँह से भी ऐसी अनुकूल बात सुनकर मैना को बहुत ही अच्छा लगा। वे स्वयं तो साध्वी पद प्राप्ति के सपने संजोया ही करती थीं किन्तु इस युग में चल रही नारी की परतन्त्रता देखकर परिवार के समक्ष कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं पड़ती थी। फिर भी उन्होंने अपनी माँ से अपना अडिग संकल्प कई बार बताया था अत: घर में चर्चा तो फैल ही चुकी थी।

पुत्री के त्याग की प्रबल भावना को देखकर एक दिन पिता ने कहा-बेटी! मैंने सुना है श्री सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र पर इन दिनों एक बड़ा मुनि संघ विराजमान है। उसमें कई एक आर्यिकाएँ भी हैं। हम तुम्हें वहाँ ले चलेंगे....। अब क्या था, मैना ने तो वहाँ ले चलने के लिए धुन ही लगा दी। तब पिता ‘‘कुछ दिन बाद ले चलेंगे’’ ऐसा कह-कहकर सान्त्वना देते रहे और समय निकालते रहे चूँकि मोह का उदय भला पुत्री को कैसे भेज सकता था? कन्या के अधिकारों का मूल्यांकन कराने वाली मैना ने जीवन के मधुमास में प्रवेश करने से पूर्व ही नारी उद्धार का संकल्प लिया और स्वयंभू होकर उसकी पूर्ति के सपने संजोने लगीं। न जाने कहाँ से ऐसी-ऐसी बातें ये सीखकर आई थीं क्योंकि तब तक तो इन्हें किसी गुरु का संयोग भी प्राप्त नहीं हुआ था। माता मोहिनी तो तब दंग रह जातीं, जब मैना की सखियाँ उनसे कहतीं कि आज हमें मैना ने शीलव्रत पालन का नियम मंदिर में दिलवाया है। अन्ततोगत्वा विक्रम संवत् २००९ (ईसवी सन् १९५३) में भारत गौरव आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज के मंगल सानिध्य में शरदपूर्णिमा के ही दिन बाराबंकी में उनकी हार्दिक इच्छा की सम्पूर्ति हुई, जिसके फलस्वरूप मैना का मधुमास सप्तमप्रतिमारूप आजन्म ब्रह्मचर्य में परिवर्तित हो गया। उस समय उन्होंने पारिवारिक एवं सामाजिक संघर्षों को झेलकर अपनी ही नहीं प्रत्युत् समस्त कुमारिकाओं के हाथों में जकड़ी परतन्त्रता की बेड़ियाँ तोड़कर असीम साहस और वीरता का परिचय दिया था। इनसे पूर्व बीसवीं शताब्दी की किसी कन्या ने इस कंटीले मार्ग पर कदम नहीं बढ़ाया था। इसीलिए इन्हें ‘‘कुमारिकाओं की पथ प्रदर्शिका’’ कहने में हम सभी गौरव का अनुभव करते हैं।

आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत लेने के पश्चात् ब्रह्मचारिणी कु. मैना मात्र एक श्वेत साटिका में लिपटी आर्यिका की भाँति आचार्यश्री के संघ में रहने लगीं। तभी संघ अतिशयक्षेत्र श्रीमहावीरजी पर पहुँचता है और वहीं मैना की क्षुल्लिका दीक्षा का मुहूर्त निकाला जाता है। अभी विक्रम संवत् २००९ ही चल रहा था कि ईसवी सन् १९५३ में प्रविष्ट हुआ, जब महावीर जी में होली का दीर्घकाय मेला लगा हुआ था, उसी समय माता-पिता को सूचित किये बिना मैना ने चैत्र कृष्णा एकम् को क्षुल्लिका दीक्षा ग्रहण कर ली। आचार्यश्री देशभूषण जी महाराज ने मैना की वीरता और वीरप्रभु की अतिशय भूमि पर दीक्षा होने के कारण शिष्या का नाम ‘‘क्षुल्लिका वीरमती’’ रखा। तभी बालसती क्षुल्लिका वीरमती की जयकारों से अतिशय क्षेत्र का अतिशय द्विगुणित हो गया। अब यहाँ से दो वीरों का इतिहास जुड़ गया-एक तीर्थंकर महावीर का और दूसरा श्री वीरमती जी क्षुल्लिका का। नीचे धरती माता और ऊपर आकाशरूपी पिता के संरक्षण में रहती हुर्इं आज की ज्ञानमती माताजी ने क्षुल्लिका अवस्था में आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज के साथ दो चातुर्मास किये, जिसमें सन् १९५३ का उनका प्रथम चातुर्मास उनकी जन्मभूमि टिवैतनगर में हुआ और दूसरा सन् १९५४ का चातुर्मास जयपुर में हुआ, जहाँ उन्होंने मात्र २ माह में संस्कृत की कातन्त्र रूपमाला व्याकरण पढ़कर अपने सतमंजिले ज्ञान महल की मजबूत नींव डाली। टिवैâतनगर में उन्हें दक्षिण से आई हुई एक क्षुल्लिका विशालमती जी का समागम प्राप्त हुआ। आचार्यश्री के समक्ष क्षुल्लिका वीरमती जी यदा-कदा अपनी आर्यिका दीक्षा के लिए निवेदन किया करती थीं किन्तु आचार्यश्री कहते थे-बेटा! अभी तक मैंने किसी को आर्यिका दीक्षा प्रदान नहीं की है तथा मेरे साथ तुम्हें बहुत अधिक चलना पड़ेगा क्योंकि मैं तेज चाल से प्रतिदिन ३०-४० किमी.चलता हूँ। तुम अत्यन्त कमजोर हो और इस लघुवय में इतना नहीं चल सकती हो। हाँ, यदि तुम्हें आर्यिका दीक्षा लेनी ही है तो चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज के शिष्य आचार्यश्री वीरसागर महाराज के संघ में मैं तुम्हें भेज दूँगा। सुना है, वहाँ वृद्धा आर्यिकाएँ हैं और वे विहार भी थोड़ा-थोड़ा करते हैं अत: वहाँ तुम ठीक से रह सकोगी।

दूसरे संघ से अपरिचित और गुरुवियोग की बात से यद्यपि वीरमती जी कुछ दु:खी हुर्इं किन्तु और कोई चारा भी तो नहीं था उनके समक्ष आर्यिका दीक्षा ग्रहण करने का। खैर! संयोग-वियोग को सरलता से सहन करना तो उन्होंने जन्म से ही सीख लिया था क्योंकि अपने दो वर्षीय भाई रवीन्द्र को, जो उनके बिना सोता ही नहीं था, जीजी की धोती पकड़कर, अंगूठा चूसकर ही जिसकी सोने की आदत थी, उसे किस निर्ममतापूर्वक छोड़कर आई थीं। जब छोटा भैय्या चारपाई पर सो ही रहा था, इन्होंने अपनी धोती धीरे से खींचकर उसके पास दूसरा कपड़ा रख दिया, जिसे जीजी की धोती समझकर वह चूसता रहा और निद्रा के हिलोरें लेता रहा। उस मासूम को हमेशा के लिए छोड़ते हुए एक आँसू भी तो इनकी आँखों में नहीं आया था। २२ दिन की बहन मालती को शायद बाह्य स्नेहवश माँ से लेकर थोड़ा सा प्यार किया और भाईयों के राखी बंधवाई चूँकि रक्षाबंधन का पावन दिवस था। फिर चल दी थीं बाराबंकी की ओर देशभूषण महाराज को अपना पाठ सुनाने। क्या किसी को उस दिन यह पता भी चल सका था कि मेरी बेटी, मेरी बहना, मेरी पोती और मेरी भतीजी अब कभी हमें माँ, भाई, दादी, चाचा आदि कहने इस घर में आएगी ही नहीं! उस १८ वर्ष प्राचीन जन्मजात वियोग के समक्ष दो वर्षों से प्राप्त गुरु सानिध्य का वियोग तो शायद कुछ भी नहीं होगा। हो भी, तो वीरमती जी का वैराग्य हृदय उसे कब स्थान देने वाला था, उसे तो अपनी मंजिल पर पहुँचना जो था।

एक दिन सुना, ‘‘चारित्र चक्रवर्ती श्री शान्तिसागर महाराज वुंâथलगिरि सिद्धक्षेत्र पर यमसल्लेखना ले रहे हैं’’ तब ये आतुर होकर गुरु आज्ञापूर्वक क्षुल्लिका विशालमती जी के साथ उस जीवन्त तीर्थ के दर्शनार्थ निकल पड़ीं और दक्षिण भारत के ‘नीरा’ ग्राम में पहुँचकर युगप्रमुख आचार्र्यश्री के प्रथम दर्शन किये। क्षुल्लिका विशालमती जी से इनका परिचय सुनकर वे करुणा के सागर आचार्यश्री बहुत प्रसन्न हुए और ‘उत्तर की अम्मा’ कहकर इन्हें कुछ लघु सम्बोधन प्रदान किए। क्षुल्लिका वीरमती जी तो मानो यहाँ साक्षात् तीर्थंकर भगवान् महावीर की छत्रछाया पाकर कृतार्थ ही हो गई थीं। बार-बार गुरुदेव की पदरज मस्तक पर चढ़ाती हुई उनकी गुरु भक्ति अन्तर्हृदय की पावनता दर्शा रही थी। कुछ देर की मूक भक्ति के पश्चात् वेदना की शब्दावलियाँ पूâटती हैं, जो गुरुवर्य से चिरकालीन भव भ्रमण कथा कह देना चाहती हैं किन्तु वीरमती जी उन्हें अपने एक वाक्य में समेटकर व्यक्त करती हैं- ‘हे संसार तारक प्रभो! मैं आपके करकमलों से आर्यिका दीक्षा लेना चाहती हूँ।’ अनुकम्पा की साक्षात् मूर्ति आचार्यश्री की देशना मिली- अम्मा! मैंने अब दीक्षा देने का त्याग कर दिया है, मैं समाधि ग्रहण करने कुंथलगिरि जा रहा हूँ। तुम मेरे शिष्य मुनि वीरसागर जी के पास जाकर आर्यिका दीक्षा प्राप्त करो, मेरा तुम्हें पूर्ण आशीर्वाद है।

आशा की किरणावलियाँ फूटीं वीरमती जी के हृदयांगन में और उन्होंने आर्यिका दीक्षा से पूर्व महामना, उपसर्गविजयी चारित्र चव्रवर्ती आचार्यश्री का पण्डितमरण देखने का निर्णय किया अत: सन् १९५५ का चातुर्मास क्षुल्लिका विशालमती जी के साथ महाराष्ट्र प्रान्त के ‘‘म्हसवड़’’ नगर में किया। म्हसवड़ चातुर्मास के मध्य ही जब उन्होंने सुना कि आचार्यश्री ने कुंथलगिरि में यम सल्लेखना ले ली है, तब वे क्षुल्लिका विशालमती जी के साथ वहाँ अंतिम दर्शन करने और समाधि देखने पहुँच गर्इं। द्वितीय भादों शुक्ला दूज को आचार्यश्री ने बड़े ही शान्तिपूर्वक ‘‘ॐ सिद्धाय नम:’’ मंत्र ध्वनि बोलते एवं सुनते-सुनते अपने नश्वर शरीर का त्याग किया। उस समय पूरे एक माह तक क्षुल्लिका वीरमती जी को वहाँ रहने का सौभाग्य मिला। इस मध्य गुरुदेव के मुख से दो-चार लघु अनमोल शिक्षाएँ भी प्राप्त हुर्इं। पुन: म्हसवड़ का चातुर्मास सम्पन्न करके वीरमती जी अपनी उभय शिष्याओं के साथ जयपुर (खानियाँ) में विराजमान आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के संघ में पहुँचीं। गौरवर्णी, लम्बे कद और प्रतिभासम्पन्न लघुवयस्क व्यक्तित्व को देखकर आचार्यश्री एवं समस्त साधु-साध्वी आश्चर्यचकित थे। मूलाचार ग्रंथानुसार पहले तो सब तरफ से गुप्तरीत्या क्षुल्लिका वीरमती जी की परीक्षाएँ हुर्इं किन्तु साधु-साध्वी, ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी सभी तो एक स्वर से इन्हें प्रथम श्रेणी का प्रमाण-पत्र देते हुए यही कह रहे थे-अरे! यह तो साक्षात् सरस्वती ही प्रतीत हो रही हैं। प्रात: ३ बजे से उठकर रात्रि के १० बजे तक यह न तो पुस्तकों का पीछा छोड़ती हैं और न ही अपनी शिष्याओं को चैन लेने देती हैं, हर वक्त उन्हें ज्ञानाराधना में व्यस्त रखती हैं। इसके साथ ही सामायिक, प्रतिक्रमण और स्वाध्याय आदि समस्त क्रियाएँ शास्त्रोक्त समयानुसार करती हैं। किसी भी पाठ के लिए इन्हें पुस्तक देखने की भी तो जरूरत नहीं है। पूरा दैवसिक-रात्रिक प्रतिक्रमण आदि भी कण्ठस्थ है। आखिर इसे पूर्व जन्म का संस्कार माना जाये या इस जन्म की तपस्या एवं सतत ज्ञानाराधना का फल! कुछ भी हो, आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज ने एक कुशल जौहरी की भाँति इस हीरे को परखा और शीघ्र ही इन्हें आर्यिका दीक्षा प्रदान करने का निर्णय लिया। संघ अब जयपुर से विहार करके राजस्थान के ‘‘माधोराजपुरा’’ नगर में पहुँचा, तब वहीं विक्रम संवत् २०१३ (सन् १९५६) में वैशाख वदी दूज के शुभ मुहूर्त में क्षुल्लिका वीरमती जी को आचार्य श्रीवीरसागर जी महाराज ने आर्यिका दीक्षा प्रदान कर ‘‘ज्ञानमती’’ नाम से सम्बोधित किया। इस प्रकार बीसवीं शताब्दी की प्रथम ज्ञानमती को जन्म दिया आचार्य श्री वीरसागर जी ने। जो नाम कबीरदास जी के निम्न दोहे को असत्य साबित कर रहा है-

रंगी को नारंगी कहते, कहें तत्त्व को खोया।

चलती को गाड़ी कहें, देख कबीरा रोया।।

अर्थात् सार्थक नामधारी ज्ञानमती माताजी को यदि कबीरदास जी देख लेते, तो शायद उनके रोने की नौबत न आती। आचार्यश्री ने अपनी नवदीक्षित शिष्या को अधिक शिक्षाएँ देने की आवश्यकता भी नहीं समझी। उनकी एक वाक्य की लघु शिक्षा ने ही ज्ञानमती माताजी के अन्दर पूर्ण आलोक भर दिया-ज्ञानमती जी! मैंने जो तुम्हारा नाम रखा है, उसका सदैव ध्यान रखना। बस, इसी शब्द ने आज माताजी को श्रुतज्ञान के उच्चतम शिखर पर पहुँचा दिया है, जहाँ आध्यात्मिक आनन्द के समक्ष शारीरिक अस्वस्थता भी नगण्य प्रतीत होने लगी है।

पूज्य माताजी अपने दीर्घकालिक जीवन में निरंतर कार्य की प्रेरणा देती है,माताजी दीर्घायु हो ऐसी पूज्य माताजी के चरणों में वन्दामि|