०८ - आठवी अध्याय

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विषय सूची

तत्त्वार्थ सूत्र प्रवचन

अष्टम अध्याय

—मंगलाचरण—
प्रवचन कर्त्री -आर्यिका चंदनामती माताजी
मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्।

ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुण लब्धये।।
जिनके उर में कल—कल बहती गंगा की निर्मल धारा।
त्याग और शुभ ज्ञान मणी से जिनने निज को शृंगारा।।
वचनों के मोती बिखराती युग की पहली बालसती।

मेरा शत वन्दन स्वीकारो गणिनी माता ज्ञानमती।।

महानुभावों! आपको कर्मों की बात सुनकर घबराहट होने लगी थी किन्तु जब मैं इस आठवीं अध्याय में बन्ध का प्रकरण पढ़ रही थी तो सचमुच एक अजीब सी घबराहट हुई। वास्तव में बन्धन के नाम से जीव घबराने लगता है जैसे—अभी किसी को पता चल जाये कि मेरे नाम से वारंट आने वाला है, किसी ने मेरे नाम से एफ.आई.आर. दर्ज करवायी है तो चाहे वह जेल में नहीं भी जाता है लेकिन एक बार घबरा जाता है। मैं सोचने लगी कि हमारे आचार्यगण जब इतने उपकारी होते थे तो उन्होंने हमें बंधन की बात क्यों बताई? अच्छी-अच्छी बात बताते, अभी तक तो हम खुश थे दर्शन, ज्ञान, चारित्र की बात पढ़ते थे, मोक्षमहल की ओर हमारी दृष्टि टिकी हुई थी। हमने आस्रव को पढ़ा कि कर्म वैâसे आते हैं ? लेकिन अब इस आठवीं अध्याय में आपको ध्यान देना है कि बन्ध वैâसे होता है ? और बन्ध का वर्णन क्यों किया गया ? बात यह है कि जब कर्म आयेंगे तो निश्चित ही बंधेंगे और जब बंधेंगे तो उस बन्धन को जिस तरह से केवलज्ञानी ने देखा है उनको उसका प्रतिपादन करना ही पड़ेगा। इस तत्त्वार्थसूत्र की टीकाओं के अन्दर आचार्य अकलंकदेव, आचार्य पूज्यपादस्वामी आदि ने कहा है कि मोक्ष बंधपूर्वक ही होता है। अगर बंधन नहीं हो तो उसके तोड़ने का उपाय क्या होगा ? जब आपके जेल में जाने की बात आती है तभी जमानत लेने की बात आती है और तभी उससे छूटने का उपाय सोचा जाता है। अभी आप कहीं जेल में नहीं जा रहे हैं, आराम से बैठे हैं तो कोई जमानत की बात नहीं है, छूटने की कोई बात नहीं की जाती है। ऐसे ही जीव कर्म से बंधा है और जब बंधन अकड़ेगा, सांकलों से उसके शरीर छिल जाएंगे, उसको तकलीफ होगी, वेदना होगी तो वह किसी न किसी तरह से उससे छूटने का उपाय सोचेगा कि वैâसे मुझे छूटना है, वैâसे मुझे सांकल को काटना है, वैâसे मुझे यहां से मुक्ति पाना है तब वह उस प्रक्रिया से गुजरेगा और पहले एक सांकल काटेगा, दो सांकल काटेगा, तीन सांकल काटेगा और फिर सारी सांकलों को काट कर आचार्य मानतुंग जैसा मुक्त होकर छूट जाएगा। बन्धन की बात नहीं रुचते हुए भी हमें चिंतन करना है कि जो बात हमें नहीं अच्छी लग रही है हम उसी में अटके पड़े हैं, कितने बंधन हमारे पीछे चल रहे हैं, देखा जाए तो हमारा भारत देश अहिंसा प्रधान देश है, यहाँ बंधन और हिंसा की बात करना एक अपराध है। इस अहिंसाप्रधान देश का इतिहास देखने से पता चलता है कि यहाँ से हमेशा अहिंसा और करुणा का एक्सपोर्ट लोगों ने किया है और हर देशवासियों को बताया है कि हमारा देश अिंहसाप्रधान देश है। हम गौरव से गाते हैं— हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। वह पावन गंगा जिस देश के अन्दर बहती है हम उस देश के वासी हैं, यह बात गौरव से कही जाती रही है, लेकिन आज तो उससे विपरीत गीत बन गये हैं—राम तेरी गंगा मैली हो गयी, पापियों के पाप धोते-धोते।

वास्तव में राम की गंगा मैली हो गयी है। जो अनादिकाल से हमने पाप किये हैं, उन पापों को धोते-धोते वह गंगा मैली हो गयी है, फिर हम वैâसे कहें कि हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है, अब तो थोड़े उल्टे शब्द हो गये हैं कि—हम उस देश के वासी हैं, जहाँ खून की नदियाँ बहती हैं।

हमारे देश के नेताओं के ऊपर ऐसा भूत सवार हो गया है कि वे अपनी संस्कृति के ऊपर स्वयं ही कुठाराघात कर रहे हैं। जिस देश में प्रेम, वात्सल्य और अहिंसा की नदी बहती थी आज उस देश के अन्दर कत्लखाने, बूचड़खाने खुले हुए हैं और वहाँ पर खून की नदी बहती है। कहाँ गया वह अिंहसा के एक्सपोर्ट का सिद्धान्त, कहाँ गया करुणा के निर्यात का सिद्धान्त, देश में गरीबी तो अपने आप होगी। जब कभी कोई राजनेता हमारे यहाँ आता है, तब हमारी माताजी उसको आशीर्वाद प्रदान करते एक ही मूलमंत्र देती हैं कि हमारा देश एक अिंहसाप्रधान देश है और आप चूँकि नेता हैं, शासन संभाल रहे हैं, आपके ऊपर जिम्मेदारी है कि जो हिंसा का बोलबाला चल रहा है उस पर आप रोक लगायें। एक बार एक राजनेता से ऐसे ही बात हुई कि हमारा देश इतना गरीब है और आप विदेशी मुद्राओं को कमाने के लिये अपने देश से मांस का निर्यात करते हैं, बन्दरों के मांस और जीवित बंदर वहाँ मारने के लिये भेजते हैं, सूकर का मांस और पता नहीं क्या-क्या कहाँ-कहाँ से भेजा जाता है, निर्यात किया जाता है और वहाँ से गोबर मंगाया जाता है, वैâसी विडम्बना हो गयी है ? तब वह नेता कहने लगे कि माताजी! गरीबी की बात तो आप जाने दीजिये, यहाँ तो अब गरीबी की बजाय गैर बराबरी हो गयी है, समाजवाद खत्म हो गया है। एक व्यक्ति चाहता है मैं उसको भी चूस लूँ, मैं इसको भी चूस लूँ, अपने धन के कोठार भर लूँ, मेरी सात पीढ़ियाँ सुखी हो जायें लेकिन पड़ोसी भोजन कर रहा है या नहीं, उसे पता ही नहीं है। पड़ोसी के ऊपर उसे कभी दया नहीं आती ऐसी गैर बराबरी हो गयी है। उन्होंने तो बड़े निवेदनपूर्वक कहा कि इस गैर बराबरी को हम नेता लोग कभी भी दूर नहीं कर सकते, चाहे कितना भी भाषण हम अपने मंच से कर लें, अगर इसको दूर कर सकते हैं तो आप साधु लोग दूर कर सकते हैं। सबको समता परिणति का सबक सिखा कर, सबको आदर्शवाद सिखाकर, सदाचार सिखा कर, सबके अन्दर मैत्री की भावनाएं भर कर और करुणा, दया, अिंहसा की भावना को जब आप भरेंगे तब जाकर वह समाजवाद आ सकता है वर्ना तो यह गैर बराबरी बनी रहेगी और हमारा देश गरीब ही रहेगा।

हम सोचते हैं कि आज किसी अपेक्षा से तो हमारा देश आधुनिक बन गया है, माडर्न हो गया है, दूसरे देशों से हाथ मिलाने लगा है, लेकिन हमारे लिए यह विचारणीय विषय है क्योंकि इससे हमारा देश बड़ा नहीं हुआ है अपितु देश की अस्मिता, देश की लाज, उसकी संस्कृति को धक्का पहुँचा है और उस देश में हम जी रहे हैं। आपको पता है कि सबसे बड़ी जेल कहाँ है ? मैं तो अभी मध्यलोक की ही बात पूछती हूँ कि विश्व की सबसे बड़ी जेल कहाँ है ? मैंने तो यही सुना है कि दिल्ली की तिहाड़ जेल सबसे बड़ी जेल कहलाती है। एक बार मैं गुजरात में थी वहाँ महिलाओं के मुख से मैंने एक गीत सुना—

राग द्वेष की लड़ाई, ता में मोहनी चढ़ाई
महावीर स्वामी कर्मों ने पूर्या जेल मा।।

वे महिलाएँ महावीर स्वामी से विनती कर रही थीं कि राग-द्वेष की बहुत लम्बी लड़ाई छिड़ी है और मोह ने उस पर चढ़ाई कर रखी है। हे भगवन्! हम तो ठहरे क्षुद्र प्राणी अब जब एक राजा से मेरी लड़ाई हो गयी है, उसने मेरे ऊपर आक्रमण कर दिया है और उसने मुझे जेल में डाल दिया है तब तो जमानत लेने वाले, मुझे जेल से बचाने वाले, मुक्ति दिलाने वाले अगर कोई हैं तो केवल आप ही हैं। बंधुओं! इस प्राणी का ऐसा स्वभाव हो गया है कि कर्मों की बेड़ियाँ तो खुद डाली हैं और बचाने के लिये महावीर स्वामी की गुहार कर रहा है। यह मानव महावीर स्वामी से कह रहा है कि हे भगवन्! मैंने स्वयं कर्मों का जाल बिछा लिया है, कर्मों की शृंखला से मैं जकड़ गया हूँ और मोह की चढ़ाई के बाद मैं अपने को इतना अशक्त पा रहा हूँ कि मैं उसको जीतने में सक्षम ही नहीं हूँ, आपने तो मोह को मारकर भगा दिया अत: अब आप मेरे भी मोह को भगा दो, मुझे भी युक्ति सिखा दो। वैâसे आपने मोह को भगाया, मैं तो चक्रव्यूह में पंâसा हूँ। प्रभो! मुझे पंâसने की कला मालूम थी, निकलने की कला नहीं मालूम है। जैसे—अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसने की कला मालूम थी, निकलने की कला नहीं मालूम थी। घुस तो गया लेकिन वहाँ जाकर मर गया। बन्धुओं ! उसी प्रकार चक्रव्यूह में घुसने की कला हमको भी मालूम थी लेकिन निकलने की कला नहीं मालूम, इसलिये हम बार-बार मोह राजा के द्वारा मारे जा रहे हैं। निकलने की कला सिखाने वाला कोई है तो आपके सामने जीता-जागता संत है। मैं आप सभी से अनुरोध करती हूँ कि कभी भी किसी आचार्य की, किसी संत की, किसी मुनि की, किसी त्यागी की कोई भी त्रुटि देखें तो आप उसकी निन्दा न करें, आलोचना नहीं करें, उसके बारे में बाहर में प्रचार नहीं करें और उसकी गलती को अपनी डायरी में नोट कर लें। मन के अन्दर संकल्प कर लें कि जब मैं कभी त्यागी, मुनि, आचार्य बनूँगा तो कभी भी यह गलती मेरे अन्दर नहीं आनी है क्योंकि आज तक िढंढोरा पीटने से कभी कोई त्यागी अच्छा नहीं बन सका है। आप उसको अन्दर में समझाने की कोशिश कीजिए क्योंकि कभी-कभी हमारी दृष्टि के अन्दर पेâर आ जाता है त्यागी तो सही होता है लेकिन हम जैसा चश्मा चढ़ा लेते हैं वह हमको वैसा ही दिखने लग जाता है। जुकाम—नजला हो जाता है तो नाक में गुलाब के पूâल की भी खुशबू नहीं आ पाती, ऐसे ही समझो उसको जुकाम हो गया है, उसको खुशबू नहीं आ सकती है। परमात्मा, भगवान, तीर्थंकर एक सूर्य के रूप में थे और उस सूर्य को, परमात्मा को हम साक्षात् रूप में प्राप्त नहीं कर सकते हैं लेकिन जैसे सूर्य की किरणों को प्राप्त कर सकते हैं ऐसे ही ये सन्त सूर्य से निकली हुई किरणों के समान हैं और उनको जहाँ भी देखें श्रद्धा से मस्तक को नत कर लें तो निश्चित ही आपका आस्रव भी कम होगा, बन्ध भी कम होगा और क्रम-क्रम से जो आता हुआ कर्म है उस पर आप रोक लगायेंगे तो संवर हो जायेगा, कर्मों की निर्जरा होने लगेगी। आज मोक्ष नहीं है तो भी आप कर्मों को इतना निर्जीण कर सकते हें कि आगे आने वाले समय में मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। इसी बंधन को बतलाने के लिये आचार्य उमास्वामी इस अष्टम अध्याय के अन्दर प्रथम सूत्र का अवतार करते हुए कहते हैं कि हे प्राणी! तुझे पहले यह समझना है कि किन कारणों से बंध होता है ? किस प्रकार होता है ? वैâसे पाप लगता है ? हमारे एक भाई ने उन कम्पनियों में जाकर पता लगाया जहाँ लिपिस्टिक, नेलपॉलिश आदि बनती हैं। आज महिलाएं जो नेलपॉलिश लगाती हैं, लिपिस्टिक लगाती हैं उसके अन्दर एक चमकीला पदार्थ होता है, उसमें जानवरों का खून डाला जाता है। अपनी चमक को बढ़ाने के लिये दूसरे प्राणी की हिंसा की ओर हम ध्यान भी नहीं देते। हमको खाने के लिये अच्छी-अच्छी चीजें मिल रही हैं, सौंदर्य के प्रसाधन भी अच्छे मिल जाएंगे, आज ऐसी कम्पनियाँ निकल गई हैं जो ऐसे सौंदर्य प्रसाधन भी बनाती हैं जो शुद्ध हैं लेकिन उनकी ओर जब हम दृष्टि डालेंगे और खोज करेंगे तभी मिलेगा। आज के मानव को तो बस माल चाहिये, चाहे वह हिंसा से आया हो या अिंहसा से आया हो, किसी भी तरह से आया हो। अगर चिन्तन चले तो आपको सब कुछ शुद्ध मिल सकता है। पहले लड़की की शादी होने लगती थी तो महीना, पन्द्रह दिन पहले से उसको उबटन लगवाया जाता था और मालिश करवाई जाती थी। धूप-छाँव में ज्यादा बाहर नहीं निकलने दिया जाता था और उसका प्राकृतिक सौंदर्य वृद्धिंगत होता था। आज की लड़कियाँ तो अगर कल शादी है तो शादी के आठ दिन पहले तक शॉपिंग करती हैं, अपना सामान खुद जाकर अपनी पसंद का लाती हैं और जब वरमाला डालने का समय होता है तो एक घण्टे पहले ब्यूटी पॉर्लर में पहुँच जाती हैं। उनको एक महीने पहले से उबटन नहीं लगा, उनके शरीर की जो स्वाभाविक कांति थी वह तो इधर-उधर घूमने से घट गई और उसको बढ़ाने के लिये, क्षणिक रूप में उसको वृद्धिंगत करने के लिये ब्यूटी पॉर्लर में जाना पड़ता है कि अभी मुझे अपने पति के सम्मुख वरमाला डालने के लिये जाना है जरा मेरा चेहरा अच्छा बना देना। यह प्रकृति की विडम्बना है और उस विडम्बना को वैâसे समाप्त करना है ? यह चिन्तन का विषय है। हमें किसी प्रकार से स्वाभाविकता में आना है और वैभाविकता को नष्ट करना है। अरे! जब भूख लगे तब खाना खाना स्वाभाविक है, अगर भूख नहीं लगी है और किसी ने कहा—चाय पी लीजिये। साहब गटागट पी गए, उसने कहा—ठण्डा पी लीजिए, गटागट पी गए। यह क्या है ? यह विकृति है। भूख लगने पर आप खाएंगे तो स्वाभाविकता रहेगी। आपके शरीर को पुष्ट करने में सहायक बनेगा अन्यथा कोई मिठाई लेकर आया है तो भले ही डायबिटीज की चार गोली और ले लेंगे लेकिन मुझे मिठाई खाना है, इसके लिये आत्मानुशासन के अन्दर श्रीगुणभद्र आचार्य ने कहा है कि—

ना सुखानुभवात् पापं तद्धेतु घातकारम्भात्।
नाजीर्णं मिष्ठान्नान्नतु, तन्मात्राद्यतिक्रमणात्।।२७।।

मिष्ठान्न खाना बुरा नहीं है लेकिन उसकी अत्यधिक मात्रा को खाने से अजीर्ण हो जाता है। उस अजीर्ण को करना है तो जो व्यक्ति खाने के लिए कुछ भी लाया, म्युनिसिपलिटी के डिब्बे की तरह डालते जाइये कोई फर्क नहीं पड़ना है और स्वाभाविकता में जीना है तो आपको जब भूख लगे तब अच्छी तरह से भोजन करिये, आपका स्वास्थ्य बनता चला जायेगा। अब हमें यह चिन्तन करना है कि किस कारण से हिंसा हो रही है, कैसे उपाय जुटाएं, किन हेतुओं, किन निमित्तों को हम जुटाएं कि हमारी स्वाभाविकता में भी अन्तर नहीं आए और हमको इस संसार के अन्दर सारा भौतिक वैभव भी मिलता जाए, उन कारणों को, बंध को जानने के लिए आचार्यश्री उमास्वामी प्रथम सूत्र का अवतार करते हुए कहते हैं—

मिथ्यादर्शनाऽविरतिप्रमादकषाययोगाबंधहेतव:।।१।।

अर्थ — मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये कर्मबंध के पाँच कारण हैं।

इन्हें पहले आप सुन चुके हैं लेकिन इस सूत्र में इन सबको एक जगह एकत्र कर दिया है। मिथ्यादर्शन—जीव को जैसा श्रद्धान है वैसा पदार्थ का स्वरूप न हो और जैसा पदार्थ का स्वरूप न हो वैसा ये माने अर्थात् यह जीव स्वयं जिस प्रकार है उसी प्रकार अपने को नहीं मानता किन्तु जैसा नहीं है वैसा मानता है यह मिथ्यादर्शन है। आप जिनेन्द्र भगवान की वाणी के प्रतिकूल बोलेंगे तो आपको कर्म का बन्ध हो जायेगा। अरे! राजा श्रेणिक ने जिनेन्द्र भगवान की वाणी के प्रतिकूल जरा सा काम किया केवल मुनिराज के गले में मरा हुआ सर्प डाला था और कैसा ऑटोमेटिक कार्य चल रहा था। इधर तो हाथों से सर्प डाला और उधर कर्म का बन्ध हो गया, उन्होंने तेतीस सागर की आयु वाले सातवें नर्क का बन्ध कर लिया। यह मिथ्यात्व था, इसी मिथ्यात्व से सहित होने के कारण उन्होंने ऐसी आयु का बन्ध किया था।

अतत्त्वों के श्रद्धान को अथवा तत्त्वों का श्रद्धान न होने को मिथ्यादर्शन कहते हैं। मिथ्यादर्शन के दो भेद हैं—(१) गृहीत मिथ्यात्व तथा (२) अगृहीत मिथ्यात्व। जो मिथ्यात्व कर्म के उदय से दूसरे के उपदेशों के बिना ही अनादिकाल से आत्मस्वरूप की भ्रान्ति रूप लगा हुआ है वह अगृहीत मिथ्यादर्शन है उसे नैसर्गिक या स्वाभाविक भी कहते हैं और जो मिथ्यात्व दूसरे के उपदेश से होता है वह गृहीत है उसके एकान्त, विपरीत, विनय, संशय और अज्ञान ऐसे पाँच भेद हैं। एकांत मिथ्या दर्शन—अनेक धर्मात्मक वस्तुएँ यह इस प्रकार है, इस तरह के एकांत अभिप्राय को एकांत मिथ्यादर्शन कहते हैं। जैसे—बौद्धमत वाले वस्तु को अनित्य ही मानते हैं और वेदांती सर्वथा नित्य ही मानते हैं। विपरीत मिथ्यादर्शन—परिग्रह सहित भी गुरु हो सकता है, केवली कवलाहार करते हैं, स्त्री को भी मोक्ष प्राप्त हो सकता है, इत्यादि उल्टे श्रद्धान को विपरीत मिथ्यादर्शन कहते हैं। विनय मिथ्यादर्शन—सब प्रकार के देवों को तथा सब प्रकार के मतों को समान मानना विनय मिथ्यादर्शन है। संशय मिथ्यादर्शन—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये मोक्ष के मार्ग हैं अथवा नहीं, इस प्रकार से चलायमान श्रद्धान को संशय मिथ्यादर्शन कहते हैं। अज्ञान मिथ्यादर्शन—अहित-अहित की परीक्षा न करके श्रद्धान करना अज्ञान मिथ्यादर्शन है।

छह काय के जीवों की हिंसा का त्याग न करके तथा पाँच इन्द्रिय और मन के विषयों में प्रवृत्ति करने को अविरति कहते हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति एवं त्रस इन षट्काय के जीवों की हिंसा का त्याग नहीं करना, छ: प्रकार की काय अविरति और पाँच इन्द्रिय तथा मन के विषयों से विरक्त नहीं होना यह छ: विषय अविरति है, इस प्रकार यह १२ प्रकार की अविरति है, अविरति को असंयम भी कहते हैं।

जो शुभ कार्य हैं जैसे—जिनेन्द्र भगवान की पूजा, दर्शन, गुरुपास्ति, स्वाध्याय, संयम, तप, दान। इन शुभ कार्यों में अनादर का भाव होना वही प्रमाद है। आप भले ही पूजा नहीं कर रहे हैं लेकिन मन के अंदर बहुत अच्छी जिज्ञासा है कि प्रभु की पूजा करने से बहुत अच्छा फल मिलता है, उससे कर्मों की निर्जरा होती है। यहीं बैठे-बैठे उस सम्मेदशिखर की वंदना कर ली, उस टोंक के दर्शन करने मात्र से जो उपवास का फल मिलता है उतना नहीं तो आधा तो मिल जाता है लेकिन बैठे हैं, सोचने लगे कि क्या पूजा करने से ही फल मिल जाता है तो कर्मबंध हो गया। एक भजन में मैंने सुना है—

कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं, बाद अमृत पिलाने से क्या फायदा।

और उसके बीच-बीच में कुछ छन्द ऐसे आते हैं कि ‘भगवान की पूजा करते-करते मुझे ख्याल आ गया’ अरे! भगवान की पूजा करते-करते अगर तुझे ऐसा ख्याल आया तो कोई अच्छी बात नहीं है लेकिन कुछ सुधारकों ने ऐसे-ऐसे भजन बना दिये हैं। वास्तव में लोगों को अध्यात्म का भूत चढ़ गया है और वे भगवान के सामने ऐसे-ऐसे भजन गाने लग गये। एक महिला एक बार भजन गा रही थी कि भगवन्! माला पेरते-पेरते कुछ भी कल्याण होने वाला नहीं है। अगर आपको हमने अपने मन के अन्दर ध्या लिया तभी जाकर कल्याण हो पायेगा, परन्तु ऐसा एकान्त नहीं है। एक महिला ने कहा कि मैंने माला फेरने का त्याग कर दिया। मैंने कहा—अगर आपने ऐसा किया तो बहुत गलत किया। बोली—क्यों ? जब उसमें मेरा उपयोग ही नहीं लगता तो माला पेâरने से लाभ ही क्या? चूँकि वह मेरी क्लास पेलो थी और मुझे बहुत मानती थी। जब टिकैतनगर में मेरा चातुर्मास हो रहा था तो आई और कहने लगी कि आप तो कहाँ से कहाँ पहुँच गर्इं और मैंने तो माला भी फेरना छोड़ दिया। मैंने उसको एक बात बताई कि माला में १०८ दाने होते हैं। अगर ८ दानों के ऊपर, ५ दानों के ऊपर अथवा एक दाने के ऊपर भी तुम्हारा थोड़ा सा मन टिक गया तो तुम्हारा माला पेâरना सार्थक है, निरर्थक नहीं है। उसने दोबारा आकर कहा कि आपकी यह बात बिल्कुल मेरे अन्तस् में बैठ गयी और मैंने उस दिन से एक माला की जगह दो माला फेरना शुरू कर दिया है। कार्य को जानबूझकर नहीं करना, उसमें आलस्य का होना, उसके प्रति अनादर का होना प्रमाद कहलाता है उससे कर्म का बंध होता है। कषाय—क्रोध, मान, माया, लोभ। यह तो सब जानते हैं कि कषायें कर्म के बंध में मूल हेतु होती हैं। प्रमाद के ५ समिति , ३ गुप्ति, ८ शुद्धि और १० धर्म यह भेद हैं और कषाय के २५ भेद हैं, प्रमाद और कषाय में सामान्य विशेष का अन्तर है। योग के १५ भेद हैं—४ मनोयोग, ४ वचनयोग और ७ काययोग, यह मिथ्यात्व गुणस्थान से लेकर सयोगकेवली गुणस्थान तक किसी न किसी रूप में अवश्य पाया जाता है, योग से कर्म में प्रकृति और प्रदेश बंध होता है। इस प्रकार आचार्यों ने यह पाँच हेतु बताये हैं—मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग। इनके निमित्त से कर्मों का बंध होता है। बंध का लक्षण बताते हैं—

सकषायत्वाज्जीव: कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्ते स बन्ध:।।२।।

अर्थ — कषाय से सहित होने से जीव जो कर्म के योग्य पुद्गलों को ग्रहण करता है वह बन्ध है।

कषाय से सहित जीव को सकषायी कहते हैं। अभी हम सब सकषायी हैं, किसी में तीव्र कषाय है और किसी में मन्द। आप और हम इनसे रहित नहीं हैं । कषाय से सहित इस जीव में ‘‘कर्मणो योग्यान्’’ कर्म के योग्य जो पुद्गल की वर्गणाएं आती हैं उनको जब यह आत्मा ग्रहण करता है तो उसी का नाम है बन्ध। दो का संयोग हो जाना बन्ध है, वे दो कौन हैं ? आत्मा और कर्म, इनका संयोग हो जाना बन्ध है।

ये पुद्गल वर्गणाएं जो कर्म रूप से बंध सकती हैं वे जब आत्मा के साथ आती हैं और उनको ऐसे निमित्त मिलते हैं तो बंध हो जाता है। पुद्गल वर्गणाएं तो तीनों लोकों में घूम रही हैं लेकिन केवली भगवान के पास आती हैं और चक्कर लगाकर चली जाती हैं क्योंकि उनके पास उन्हें स्थान नहीं मिलता है और हमारे पास आती हैं तो हम उन्हें मेहमान के समान अपने पास बैठा लेते हैं क्योंकि उनसे हमारी बड़ी घनिष्ठ मित्रता है और अनादिकाल से यही मित्रता बन्ध है। जो उनसे वैर कर लेते हैं कि हमारे पास तुम्हारे लिये जगह नहीं है, वे कर्मों की निर्जरा कर मोक्ष सुख की प्राप्ति कर लेते हैं। जैसे—आग से तपा हुआ लोहे का गोला जल में पड़कर सब ओर से पानी को खींचता है वैसे ही आत्मा योग और कषाय के द्वारा कर्म के योग्य पुद्गलों को ग्रहण करता है और उनसे संक्लेश रूप सम्बन्ध को प्राप्त हो जाता है, इसी का नाम बन्ध है।

बन्ध के भेद बताते हैं—

प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशास्तद्विधय:।।३।।

अर्थ — बन्ध के चार भेद हैं—प्रकृति बन्ध, स्थिति बन्ध, अनुभाग बन्ध और प्रदेश बन्ध।

कर्मों के स्वभाव को प्रकृति बन्ध कहते हैं, जैसे नीम की प्रकृति (स्वभाव) कड़वापन, गुड़ की प्रकृति मीठापन, अग्नि की प्रकृति उष्णता, जल की प्रकृति शीतलता और आत्मा की प्रकृति ज्ञाता-दृष्टा होना है। जिस कर्म का जैसा स्वभाव है उसका उस रूप से बंध करवाना यह प्रकृति बंध का कार्य है। ज्ञानावरण का कार्य है ज्ञान के ऊपर एक चादर डाल देना, पर्दा डाल देना। दर्शनावरण का कार्य है आत्मा के दर्शनगुण को ढक देना, यह अपने-अपने नाम के अनुरूप कार्य करते हैं। उनका नाम है प्रकृति बंध। ज्ञानावरणादि कर्मों का अपने स्वभाव से च्युत नहीं होना, उनकी कैसी स्थिति बंधी है आदि स्थिति बंध है। जैसे—गाय, भैंस आदि का दूध जब तक अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता है तब तक उसकी स्थिति कहलाती है। ज्ञानावरणादि कर्मों की तीव्र या मन्द फल देने की शक्ति अनुभाग बन्ध है, जैसे—बकरी, गाय या भैंस के दूध में कम ज्यादा शक्ति होती है। ज्ञानावरण आदि कर्म रूप से होने वाले पुद्गल स्कन्धों के परमाणुओं की संख्या प्रदेश बन्ध है। यह चार प्रकार का बन्ध प्रत्येक आत्मा के अन्दर हुआ करता है।

बन्ध की यह स्थिति तेरहवें गुणस्थान में भी चल रही है पर वहाँ का बंध बिल्कुल अकार्यकारी है, अबंध रूप है जैसे—जली हुई रस्सी देखने में रस्सी रूप है पर छूने पर उसका अस्तित्व ही नहीं है, ऐसा ही बंध वहाँ पर होता है और वह कार्यकारी नहीं होता है एवं आगे अयोगकेवली गुणस्थान में तो किसी तरह का बंध होता ही नहीं है। कितने पुद्गल के परमाणु आए उनकी गिनती कौन रखता है, कोई एकाउण्ट है? जरूर होगा कि इतने प्रदेश हमने भेजे हैं वे इतना फल देने के बाद ही जाएंगे। उन प्रदेशों की जो संख्या है उसका उस रूप से बंध हो जाना प्रदेश बंध है।

अब प्रकृतिबंध का वर्णन करते हुए प्रकृतिबंध के मूल भेद बताते हैं—

आद्योज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तराया:।।४।।

अर्थ — पहला प्रकृति बंध ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय ऐसे ८ प्रकार का है।

इन सब विशेषताओं को जब लोगों ने सुना तो लोगों के मन में एक शंका उत्पन्न हो गयी कि आत्मा के अन्दर इतने छोटे-छोटे भी कार्य होते हैं, कर्म के प्रदेश गिने जाते हैं? कौन है जो यह करता है? अपने व्यापार के एकाउण्ट को तो हम गिन नहीं पाते, उसके लिये एकाउण्टेन्ट रखना पड़ता है और जैनधर्म मानता है कि अपने आप यह सब होता है, सब प्राकृतिक व्यवस्था है। तभी तो किसी ने कहा है कि ईश्वर सृष्टि का कर्ता है, वह हमको सुख-दु:ख देता है, कोई कुछ मानता है, कोई कुछ मानता है, यही सब देखकर ही लोगों के मन में ऐसी शंकाएं बैठ गयीं। आपने कभी अपनी घड़ी पर सूक्ष्मता से दृष्टि डाली है जैसे—सेकेण्ड की सुई जल्दी-जल्दी चलती है वैसे ही मानव के जीवन का बचपन खूब तेजी से गुजरता जाता है। दूसरी सुई मिनट की है जो सेकण्ड की सुई की रफ्तार से कम चलती है। जैसे मिनट की सुई चलती है वैसे ही युवावस्था की सुई चल रही है और जो बिल्कुल ही नहीं दिखती, देखते-ही-देखते पूरी हो जाती है, वह वृद्धावस्था है। अगर सुई चलती नहीं तो दिखती वैâसे ? इसका मतलब आपने एक सेकेण्ड के अस्तित्व को स्वीकार किया और जब उस सुई के अस्तित्व को स्वीकार किया तो घण्टे की सुई बुढ़ापे की सुई की तरह है जो चली जाती है तो पता नहीं कब काल आ जाता है और दबोच लेता है। अत: इन व्यवस्थाओं को हमें समझना है, इन कर्मों को जानना है जो हमारी आत्मा में निरन्तर चलते हैं। कौन सा कर्म क्या कार्य करता है। अब आपको उसे समझना है—जो आत्मा के ज्ञान गुण को ढके वह ज्ञानावरण कर्म है, आत्मा के दर्शन गुण को ढकने वाला दर्शनावरण है। जो बाह्य सामग्री के द्वारा सुख-दु:ख का अनुभव कराने में निमित्त है वह वेदनीय कर्म है। जो मोह, राग और द्वेष भाव के उत्पन्न होने में निमित्त हो वह मोहनीय कर्म है। जो आत्मा को नरक, तिर्यञ्च, मनुष्य या देव के शरीर में रोके रखे वह आयु कर्म है। जो नाना प्रकार के शरीर और शारीरिक विविध अवस्थाओं के होने में निमित्त हो उसे नाम कर्म कहते हैं। जो ऊँच-नीच कुल में पैदा होने में निमित्त हो वह गोत्र कर्म है और जो दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य में विघ्न डालता है वह अन्तराय कर्म है।

प्रकृति बंध के उत्तर भेद बताते हैं—

पंचनवद्वयष्टाविंशतिचतुद्र्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदा यथाक्रमम्।।५।।

अर्थ — प्रकृति बंध के उत्तर भेद निम्न हैं—ज्ञानावरण के ५ भेद, दर्शनावरण के ९ भेद, वेदनीय के २ भेद, मोहनीय के २८ भेद, आयु के ४ भेद, नामकर्म के ४२ भेद, गोत्र के २ और अन्तराय के ५ उत्तर भेद हैं।

इस प्रकार कर्मों की कुल १४८ प्रकृतियाँ हैं।

ज्ञानावरण के ५ भेद कौन-कौन से हैं, उसको बताते हैं—

मतिश्रुतावधिमन:पर्ययकेवलानाम्।।६।।

अर्थ — मति ज्ञानावरण, श्रुत ज्ञानावरण, अवधि ज्ञानावरण, मन:पर्यय ज्ञानावरण और केवल ज्ञानावरण ये ज्ञानावरण के पाँच भेद हैं।

जैसा जिसका नाम है वैसा-वैसा उन-उन ज्ञानों को वह प्रगट नहीं होने देता है। हमारे ऊपर भी आवरण पड़े हुए हैं लेकिन मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञानावरण का पर्दा थोड़ा-थोड़ा हट रहा है। जितना हट रहा है उतना ज्ञान प्रगट हो रहा है। जब किसी ने शंका की कि भगवन्! आपने पहले अध्याय में भी यही बात बताई और यहाँ भी यही बताया है तब आचार्यश्री कहते हैं कि वहाँ पर नय और प्रमाण की बात थी और यहाँ ज्ञानावरण के पाँच भेदों को बताया है। आज भी हम देखते हैं कि अपने से कितने ज्यादा ज्ञानी लोग आज भी विद्यमान हैं। आपके सामने ज्ञानमती माताजी बैठी हैं। हम इनके चरणों की धूल भी नहीं हैं, लेकिन फिर भी जितना कुछ है उतना आवरण हमने हटाया था इसलिये उतना ज्ञान हमेें मिल गया। अभी जितना आवरण था प्रवचन सुनते-सुनते थोड़ा-सा आवरण हो सकता है हट गया हो, थोड़ा ज्यादा ज्ञान आ गया हो क्योंकि मन के अन्दर शंका हुई वैâसे नीच गोत्र बंधा ? अपने को अपनी आत्मप्रशंसा नहीं सुहाएगी। कभी अपने सामने कोई प्रशंसा करने लगेगा तो आंखें नीची हो जाएंगी, हमको वह नहीं सुहाएगा तब समझो उच्च गोत्र का आस्रव हो सकता है लेकिन हमें अपनी प्रवृत्तियाँ बदलनी पड़ेंगी। आप कहेंगे—क्या करूँ माताजी! ऐसा स्वभाव पड़ गया है। जिसे आपने स्वभाव मान रखा है वह स्वभाव नहीं विभाव है। विभाव को स्वभाव मानना, स्वभाव को विभाव मानना, इसलिये आत्मभाव कभी भी प्राप्त नहीं हो पाया है। जिसे हमें इन प्रवचनों के माध्यम से गुरुओं के माध्यम से प्राप्त करना है।

दर्शनावरण कर्म के नौ भेद बताते हैं—

चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानांनिद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचला-स्त्यानगृद्धयश्च।।७।।

अर्थ — चक्षु दर्शनावरण, अचक्षु दर्शनावरण, अवधि दर्शनावरण, केवल दर्शनावरण, निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि ये दर्शनावरण कर्म के ९ भेद हैं।

चक्षु इन्द्रिय के निमित्त से होने वाले दर्शन को जो प्रगट न होने दे उसे चक्षु दर्शनावरण कहते हैं। नेत्र के सिवाय बाकी इन्द्रिय ओर मन के निमित्त से होने वाले अचक्षु दर्शन को जो प्रकट न होने दे वह अचक्षु दर्शनावरण है। जो अवधि दर्शन का आवरण करे उसे अवधि दर्शनावरण कहते हैं। जो केवलदर्शन को न प्रकट होने दे उसे केवलदर्शनावरण कहते हैं। थकान और चिन्ता आदि दूर करने के लिये सोना निद्रा दर्शनावरण है। सोने से दर्शनावरण कर्म का बंध होता है। लोग कहते हैं कि नींद लेने से स्वस्थता प्राप्त हो जाएगी लेकिन जितनी नींद कही गयी है उससे ज्यादा नींद लेने से दर्शनावरणीय कर्म का बंध हो जायेगा और यही कारण है कि जब भोगी सोता है तब योगी जागता है और जब भोगी जागता है तब योगी सोता है। छहढालाकार ने तो शायद भूलवश लिख दिया—

भू मािंह पिछली रयन में कछु शयन एकाशन करन

लेकिन पिछली रात्रि में योगी नहीं सोता पिछली रात्रि में वह जागरण करता है, पहली रात्रि में थोड़ी सी निद्रा लेता है और चूँकि बहुत ऊँचे मुनियों की बात है तो पिछली रात्रि में मत समझना। पिछली रात्रि में तो आप सोते हैं, १२ बजे तक खाते-पीते हैं उसके बाद आपके सोने का समय होता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने और विशेषकर मनोवैज्ञानिकों ने भी कहा है कि आप जल्दी सो जायें और जल्दी उठ जायें तो निश्चित रूप से आपके ज्ञान का विकास होता है। कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों से भी कहा जाता है कि आप सबेरे जल्दी उठकर याद करें। इसका कारण यह है कि प्रात:काल के समय सरस्वती बेला होती है, ब्रह्म मुहूर्त का होता है, जैसे—प्रात:काल सूर्य की किरणें आती हैं वैसे ही ज्ञान की किरणें आती हैं और हमारे मस्तिष्क के अन्दर प्रवेश करती हैं और वह किरण जब प्रवेश कर जाती है तो जल्दी से निकलती नहीं हैं। सबेरे का याद किया हुआ पाठ जल्दी नहीं भूलते। आज मानव की प्रवृत्ति इसलिये उल्टी हो गयी कि उसमें उसको उतना फल नहीं मिल पाता है। दर्शनावरण कर्म का अगर आवरण हटाना है तो इन चीजों का ध्यान रखना पड़ेगा। आचार्य कहते हैं कि सोइए पर ऐसा मत सोइए कि आपको कोई जगा न सके।

सोने में कई व्यक्ति उठकर काम भी कर आते हैं, जाकर व्यापार भी कर आते हैं, जाकर ताला भी लगा आते हैं, फिर सो जाते हैं उनको पता ही नहीं कि मैं रात में व्यापार करके वापस आ गया, मैं नींद में हूँ। स्त्यानगृद्धि, निद्रा-निद्रा, प्रगाढ़ निद्रा, प्रचला-प्रचला जाने कितनी तरह की निद्राएं होती हैं और उनके निमित्त से जीव प्रगाढ़ निद्रा में सोता ही रहता है। यह तो खैर असली निद्रा की बात बताई, वैसे तो मोह की नींद में यह प्राणी अनादिकाल से सोया हुआ है जिससे आत्मा का भान उसे नहीं हो पाता है।

गहरी नींद, जिसमें आँख को खोलना सम्भव न हो, निद्रा-निद्रा कहते हैं। जिस कर्म के उदय से प्राणी कुछ जागता है और कुछ सोता है उसे प्रचला कहते हैं। जिस कर्म के उदय से सोते समय मुँह से लार बहती है और अंगोपांग भी चलते हैं उसे प्रचला-प्रचला कहते हैं। जिस कर्म के उदय से नींद में ही अपनी शक्ति से बाहर कोई काम कर डाले और जागने पर पता भी न चले कि क्या काम किया उसे स्त्यानगृद्धि कहते हैं।

वेदनीय कर्म के दो भेद हैं—

सदसद्वेद्ये।।८।।

अर्थ — वेदनीय कर्म के दो भेद हैं—(१) सातावेदनीय, (२) असातावेदनीय।

जिसके उदय से इन्द्रियसुखरूप अनुभव हो अर्थात् देव आदि गतियों में शारीरिक तथा मानसिक सुख प्राप्त हो, उसे सद्वेद्य कहते हैं, वह सातावेदनीय है तथा जिसके उदय से दु:ख रूप अनुभव हो अर्थात् नरकादि गतियों में तरह-तरह के दु;ख प्राप्त हों, उसे असातावेदनीय कहते हैं।

मोहनीय कर्म के २८ भेद बताते हैं—

दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदा:-सम्यक्त्वमिथ्यात्व-तदुभयान्यकषायकषायौहास्यरत्यरति-शोकभयजुगुप्सास्त्रीपुंनपुंसकवेदा: अनंतानुबंध्यप्रत्याख्यान-प्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पाश्चैकश: क्रोधमानमायालोभ:।।९।।

अर्थ — दर्शनमोहनीय, चारित्रमोहनीय, कषायवेदनीय और अकषायवेदनीय इन चार भेद रूप मोहनीय कर्म क्रम से तीन, दो, नौ और सोलह भेद रूप है। जिनमें से सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और सम्यक्मिथ्यात्व ये तीन दर्शनमोहनीय कर्म के भेद हैं। अकषाय वेदनीय और कषाय वेदनीय ये दो भेद चारित्र मोहनीय के हैं। हास्य, रति आदि ९ भेद अकषाय वेदनीय के हैं और अनन्तानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलन इन चार भेद रूप क्रोध, मान, माया, लोभ ये सोलह भेद कषाय वेदनीय के हैं।

मोहनीय कर्म के दो भेद हैं—दर्शनमोहनीय और चारित्र मोहनीय। दर्शनमोहनीय के तीन भेद हैं—सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व। चारित्र मोहनीय के दो भेद हैं—अकषाय वेदनीय और कषाय वेदनीय। अकषाय वेदनीय के ९ भेद हैं—हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुष वेद और नपुंसक वेद। कषायवेदनीय के १६ भेद हैं—अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ, अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ, प्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया लोभ और संज्वलन क्रोध, मान, माया और लोभ। इस प्रकार मोहनीय कर्म के २८ भेद बताये हैं।

मिथ्यात्व प्रकृति—जिस कर्म के द्वारा सर्वज्ञ कथित मार्ग से परांगमुखता हो अर्थात् मिथ्यादर्शन हो उसे मिथ्यात्व प्रकृति कहते हैं।

सम्यक्त्व प्रकृति—जिस प्रकृति के उदय से आत्मा के सम्यग्दर्शन में दोष उत्पन्न हो उसे सम्यक्त्व प्रकृति कहते हैं।

सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति—जिस प्रकृति के उदय से मिले हुए दही, गुड़ के स्वाद की तरह उभयरूप परिणाम हो उसे सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति कहते हैं।

हास्य—जिसके उदय से हँसी आवे वह हास्य नोकषाय हैं।

रति—जिसके उदय से विषयों में प्रेम हो वह रति है।

अरति—जिसके उदय से विषयों में प्रेम न हो वह अरति है।

शोक—जिसके उदय से शोक चिंता हो वह शोक है।

भय—जिसके उदय से डर लगे वह भय है।

जुगुप्सा—जिसके उदय से ग्लानि हो वह जुगुप्सा है।

स्त्रीवेद—जिसके उदय से पुरुष से रमने के भाव हो वह स्त्रीवेद है।

पुंवेद—जिसके उदय से स्त्री के साथ रमने के भाव हो वह पुंवेद है।

नपुंसक वेद—जिसके उदय से स्त्री पुरुष दोनों से रमने की इच्छा हो वह नपुंसकवेद है।

अनन्तानुबन्धी क्रोध मान माया लोभ—जो आत्मा के सम्यग्दर्शन गुण को प्रकट न होने दे उसे अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ कहते हैं।

अनन्त संसार का कारण होने से मिथ्यात्व को अनन्त कहते हैं उसके साथ ही इसका अनुबन्ध (सम्बन्ध) रहता है इसलिये इसको अनन्तानुबन्धी कहते हैं।

अप्रत्याख्यानावरण क्रोध मान माया लोभ—जिसके उदय से देशचारित्र न हो सके उसे अप्रत्याख्याावरण क्रोध मान माया लोभ कहते हैं।

प्रत्याख्यानावरण क्रोध मान माया लोभ—जो प्रत्याख्यान अर्थात् सकलचारित्र को घाते उसे प्रत्याख्यानावरण क्रोध मान माया लोभ कहते हैं।

संज्वलन क्रोध मान माया लोभ—जिसके उदय से यथाख्यात चारित्र न हो सके उसे संज्वलन क्रोध मान माया लोभ कहते हैं। यह कषाय सम अर्थात् संयम के साथ ज्वलित—जागृत रही आती है, इसलिये इसका नाम संज्वलन है। इन कषायों में आगे—आगे मन्दता है और नीचे—नीचे तीव्रता है।

इन २८ भेदों का वर्णन करते हुए पं. दौलतराम जी ने कहा—

मोह महामद पियो अनादि, भूल आपको भरमत वादि।

मोह एक प्रकार का नहीं है कि आप उससे छुटकारा पा लेंगे। आप पत्नी पुत्र और घर से मोह छोड़ सकते हैं पर जो मिथ्यात्व का दर्शनमोहनीय कर्म आपके पीछे लगा है, क्या उसको छोड़ सकते हैं ? अगर छोड़ सकते हैं तो समझिए आपका जीवन सार्थक है। ऐसे एक से बढ़कर एक मोहनीय कर्म हैं जिन्होंने हमारे ऊपर धावा बोल रखा है। इनसे छुटकारा पाना बहुत मुश्किल होता है। माता-पिता मारने लगते हैं तो दूसरे के पास भाग जाते हैं, गुरु के पास जाते हैं। गुरु अगर मारने लग जाये तो राजा के पास भागते हैं। राजा मारने लग जाये तो कहाँ जायें ? फिर तो बिल्कुल ही अनाथ हो जायेंगे। इसलिये मोहनीय कर्म राजा है लेकिन अगर अपने आत्मा के राजा की स्वयं को पहचान करना है, अपनी निधि को, अपने उस राज्य को स्वाधीन करना है जो परतन्त्र हो गया है जिसके ऊपर कर्म के कौरवों ने अधिकार जमा लिया है। जैसे—पाण्डवों ने पहले बहुत शांति प्रस्ताव भेजा, श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर कौरवों के पास गये और बोले—पाण्डवों का जितना हक है, दे दो। लेकिन कौरवों को पूरे राज्य का उपभोग करने की आदत पड़ गयी थी। उन्होंने कहा कि नहीं हम तिनके भर भी राज्य नहीं दे सकते। दुर्योधन की, दु:शासन की इतनी उच्चाकांक्षाएँ बढ़ गई कि उन्होंने पाण्डवों को राज्य नहीं दिया। आखिर कुरुक्षेत्र के अन्दर महान घमासान युद्ध हुआ और न्याय की विजय हुई। १०० कौरव थे, उनके पास असंख्य सेना थी लेकिन विजय पाण्डवों की हो गयी, राजा दुर्योधन की विजय नहीं हुई, ऐसे ही मोह राजा दुर्योधन है और इस राजा दुर्योधन के ऊपर हमें आक्रमण करना है क्योंकि बहुत दिनों से हम राज्य मांग रहे हैं और वह हमें दे नहीं रहा है। हमारे अधिकार का राज्य वह हड़पे हुए है, जब नहीं दे रहा है तो अपने को आक्रमण करना पड़ेगा और आक्रमण करके उन कर्मरूपी कौरवों को अपनी आत्मा के राज्य से स्वतन्त्रता दिलानी पड़ेगी तब हम अपनी आत्मा के राज्य को प्राप्त करने के अधिकारी बनेंगे।

यह जो मोहनीय कर्म की २८ प्रकृतियाँ हैं, इनमें मिथ्यात्व भी शामिल है। दर्शनमोहनीय की सात प्रकृतियाँ हैं—अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ, मिथ्यात्व, सम्यक््âमिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति, उनके उपशम, क्षय, क्षयोपशम से सम्यक्त्व प्रगट होता है और इन तीन प्रकृतियों मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति के उपशम, क्षय, क्षयोपशम से चारित्र प्रगट होता है इसलिये जब हम चारित्र को धारण कर लेंगे तो यह मोहनीय कर्म थोड़ा-थोड़ा पीछे-पीछे हटने लग जाएंगे। मैं आपको एक प्रेरणा दूँगी कि आप ज्यादा कुछ नहीं कर सकते, पिच्छी कमण्डलु नहीं ले सके तो कम से कम अगर इस बंध से बचना है तो अणुव्रती जरूर बन जाना, अणुव्रतों में कुछ भी खर्चा नहीं करना है। आपको कोई पहाड़ा, कोई इतिहास नहीं पढ़ना है, कोई भूगोल का माप नहीं करना है, केवल आपको थोड़ा सा मन को परिवर्तित करना है और आप अणुव्रती बन जाएंगे।

एक सज्जन ने मुझसे प्रश्न किया कि अणुव्रत का मतलब क्या है ? मैंने उनसे पूछा—पहले आप मुझे अणुबम का मतलब बता दो। अणुबम वैâसा होता है ? अणुबम के अन्दर इतनी दाहक शक्ति मौजूद है कि अगर हम किसी के ऊपर प्रयोग करना चाहें तो उसको मार सकते हैं। जैसे इसके अन्दर दूसरों को खत्म करने की शक्ति है, शत्रु का संहार करने की शक्ति है, ऐसे ही जो अणुव्रत को प्राप्त कर लेता है, अपने जीवन में धारण कर लेता है उसके कर्मरूपी शत्रु को मारने की शक्ति प्रगट हो जाती है। अणुबम और अणुव्रत को अगर एक दृष्टि से देखते हैं तो अणुबम पुद्गल की शक्ति को दिखाता है और अणुव्रत आत्मा की शक्ति को दिखाता है। कुछ भी नहीं है इसमें, केवल संकल्पी िंहसा का त्याग करना पड़ता है कि हम संकल्पपूर्वक किसी भी जीव को नहीं मारेंगे। हमें कोई अगर एक लाख रुपये भी देगा कि आप एक चींटी को मसल दीजिये, तो नहीं मसल सकते। भले ही झाड़ू लगाते-लगाते आपसे कितनी चीटियाँ मर गर्इं लेकिन आपकी भावना नहीं है कि मैं संकल्पपूर्वक इस चींटी को मारूँगा, मच्छर को मारूँगा, कॉकरोच को मारूँगा, यह संकल्पी िंहसा का त्याग है। आज कितने-कितने उपाय बाजारों में आ गए हैं। मैंने आज तक नहीं देखा कि जो अपने घरों में चूहा मारने की दवा डालते हों, उसके घर में चूहे नहीं आते हैं बल्कि उनके घर में ज्यादा चूहे मिलेंगे। जो अपने घरों में हीट करते हैं उनके घर में सबसे ज्यादा मच्छर मिलेंगे।

मांगीतुंगी में श्रेयांसमती माताजी कहतीं कि ज्ञानमती माताजी जबसे मांगीतुंगी में आई हैं मच्छर खत्म हो गये, बरसात में कितने कीड़े आते थे वह नहीं आ रहे हैं। माताजी ने दवा डाली थी क्या ? यह सब तपस्या की किरणों के परमाणु का प्रभाव है। अयोध्या में जब हम गये तो वहाँ इतने बिच्छू थे कि हम देखकर परेशान हो गये। हम तो पटरे पर सोते हैं इसलिये हमने तो डर के मारे जल्दी से इन बालिकाओं के लिये पटरे की व्यवस्था कराई और कहा कि तुम भी पटरों पर सोना, लोगों के चप्पल-जूतों के अन्दर बिच्छू घुस जाते थे। सब परेशान थे कि क्या होगा? एक सज्जन ने आकर कहा कि माताजी! यहाँ तो बहुत बिच्छू हैं, क्या करें ? उस समय माताजी ने थोड़ी सी सरसों ली, जरा सा महामंत्र को पूँâका और एक भाई को दिया कि जाकर बाहर डाल दो, सब लोग निश्चिन्त होकर धरती पर सो जाओ, कोई परेशानी नहीं होगी। इतना अतिशय हो गया उसके बाद से एक बिच्छू नहीं दिखा, आश्चर्य हो गया, चमत्कार हो गया। यह क्या है ? मन्त्रों के अन्दर, तपस्या के अन्दर, साधना के अन्दर इतनी शक्ति है कि हम चाहें तो बिना हिंसा के उन पर काबू पा सकते हैं, अधिकार पा सकते हैं लेकिन अन्दर से भावना होनी चाहिये।

मैं आपको अणुव्रत के बारे में बता रही थी कि अिंहसाणुव्रत में केवल संकल्पी हिंसा का त्याग करना है। आरम्भी, उद्योगिनी, विरोधिनी ये हिंसा आपके लिये क्षम्य हैं।

सत्याणुव्रत—स्थूल रूप में सत्य बोलने का नियम लेना, झूठ बोलने का त्याग करना, जैसे—किसी-किसी की प्रवृत्ति होती है कि बात-बात में झूठ बोलकर दूसरे को ठगते रहना। इतना मात्र त्याग कर देने से आपका सत्याणुव्रत हो जाता है। अचौर्याणुव्रत—मैं किसी की रखी हुई चीज को बिना पूछे नहीं उठाउँâगा, इस चोरी का त्याग कर देने मात्र से अचौर्याणुव्रत हो जाता है।

ब्रह्मचर्याणुव्रत—अपनी स्त्रीमात्र को छोड़कर किसी परस्त्री पर अपनी दृष्टि को खराब नहीं करना ब्रह्मचर्याणुव्रत है। ऐसे ही स्त्रियों को अपने पति को छोड़कर शेष के प्रति गलत नजर नहीं रखना, यह उनके लिये ब्रह्मचर्याणुव्रत है।

परिग्रहपरिमाण अणुव्रत—आप ३ करोड़, ५ करोड़, १० करोड़ कितना भी रुपया रख लीजिए, दो फैक्ट्री रख लीजिये, जितनी इच्छा हो, उतने खेत रख लीजिये लेकिन कम से कम तीन लोक के परिग्रह से तो छुटकारा मिल जायेगा। आप डायरी के अन्दर परिग्रह का प्रमाण लिख लीजिये। हमको सौ, दो सौ, चार सौ तोला सोना रखना है, इतने किलो चाँदी रखनी है, १०-२० खेत रखने हैं, ४ फैक्ट्री डालनी हैं, १० मकान रखने हैं, १२ करोड़ की सम्पत्ति रखनी है इस प्रकार आप एक लिमिट के अन्दर आ जायेंगे तो तीन लोक की सम्पत्ति का जो पाप आपके ऊपर चढ़ रहा है, उस पाप से आप बच जायेंगे, यही अणुव्रत है।

अब आप बताइये आपको कठिन लगा क्या ? बिल्कुल सरल है, सुनने में भी कठिन नहीं है, पालन में भी कठिन नहीं है और इतना धारण करने के बाद जितने अधिक कर्मों की निर्जरा हो रही है उससे असंख्यातगुणी अधिक कर्मों की निर्जरा अणुव्रती को हो जायेगी और अणुव्रती का यह नियम है कि वह देवगति में ही जाएगा। नरकगति, स्त्रीपर्याय, नपुंसक, एकेन्द्रिय, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय नहीं होगा, असंज्ञी नहीं होगा, दुष्कुल में नहीं जायेगा, विकृत अंग वाला नहीं होगा, अल्पायु नहीं होगा, अतएव अगर आपको अच्छा लगे तो अणुव्रत को ग्रहण करना और अपने जीवन के अन्दर असंख्यात गुणी कर्मों की निर्जरा करते हुए मोक्ष के निकट पहुँचने की कोशिश करना।

आयु कर्म के चार भेद हैं—

नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि।।१०।।

अर्थ — नरक आयु, तिर्यंच आयु, मनुष्य आयु और देव आयु यह आयु कर्म के ४ भेद हैं।

जिनके उदय से आत्मा नारक शरीर में रुका रहे वह नरकायु है। जिसके उदय से आत्मा तिर्यंच के शरीर में रुका रहे वह तिर्यंचायु है। जिसके उदय से आत्मा मनुष्य के शरीर में रुका रहे वह मनुष्यायु है और जिसके उदय से आत्मा देव के शरीर में रुका रहे वह देवायु है।

अभी अपनी मनुष्य आयु है। अगर हम बहुत अच्छे-अच्छे कार्य कर रहे हैं तो लोग कहते हैं कि हम यहीं पर देवायु को भोग रहे हैं लेकिन सिद्धान्त इस बात को कभी नहीं मानता। जिस आयु का आपने बंध किया है। जैसे—अगर आपके आज आयु की त्रिभागी पड़ करके आयु का बंध हो चुका है तो आपको जितने कर्म बंध रहे हैं उसमें से आगे वाली आयु को कुछ हिस्सा मिलता जायेगा। जैसे आप भोजन करते हैं तो भोजन करने के बाद उस भोजन का कई रूप में परिणमन हुआ। वह भोजन मलरूप बना, मूत्ररूप बना, पसीना बना, पेट में बना, पीठ में बना, मांस में बना, रुधिर में बना, हर प्रकार से उसकी परिणति हो गयी, ऐसे ही कर्म तो एक बांध रहे हैं, जैसे—अभी आप पढ़ रहे हैं तो शुभ कर्म का बंध चल रहा है, ज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम चल रहा है। जिस कर्म का बंध हो रहा है उस समय जिस भाव की प्रबलता है उसको थोड़ा ज्यादा हिस्सा मिल जाता है बाकी सब कर्मों को थोड़ा-थोड़ा हिस्सा मिलता है और वे इस आयु और आगे की आयु में बंट जाते हैं।

नामकर्म की ४२ प्रकृतियाँ बताते हैं—

गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणबंधनसंघातसंस्थानसंहननस्पर्शरसगंध-वर्णानुपूव्र्यागुरुलघूपघात-परघातातपोद्योतोच्छ्वास-विहायोगतय: प्रत्येकशरीरत्रस-सुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्ति-स्थिरादेय-यश:कीर्तिसेतराणितीर्थकरत्वं च।।११।।

अर्थ — गति, जाति, शरीर, अंगोपांग, निर्माण, बंधन, संघात, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, आनुपूर्व, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास, विहायोगति, प्रत्येक शरीर, त्रस, सुभग, सुस्वर, शुभ, सूक्ष्म, पर्याप्ति, स्थिर, आदेय, यश:कीर्ति और इन दशों के प्रतिपक्षी अर्थात् साधारण शरीर, स्थावर, दुर्भग, दुस्वर, अशुभ, बादर, अपर्याप्ति, अस्थिर, अनादेय और अयश:कीर्ति तथा तीर्थंकर प्रकृति यह नामकर्म के ४२ भेद हैं।

उन ४२ भेदों के अनुसार आपके और हमारे अभी वर्तमान में भी उन-उन कर्मों का उदय चल रहा है। त्रस नामकर्म के उदय से आपको त्रस पर्याय मिली है, मनुष्यगति नाम कर्म के उदय से मनुष्यगति मिली है। सुस्वर नामकर्म के उदय से अच्छा स्वर मिला है। आपके जीवन का प्रत्येक क्षण कर्मों से ही बना हुआ है जैसे बिल्डिंग का एक-एक परमाणु, एक-एक हिस्सा किसी न किसी मैटीरियल से बना है, कुछ र्इंट से, कुछ गारे से, कुछ सीमेंट से, कहीं पत्थर से, कहीं लकड़ी से सब मिल करके बना हुआ है। ऐसे ही शरीर में केवल एक मिस्त्री नहीं लगा कई कारीगर लगे हैं और उन्होंने पूरे शरीर की रचना कर दी है। आपने कभी मोमबत्ती जलती हुई देखी है ? जलती हुई मोमबत्ती को जरा ध्यान से देखें क्या होता है ? मोमबत्ती जलती है तो बीच का जलता हुआ धागा हमें रोशनी देता है और मोम पिघलता रहता है। कुछ मोम पिघलकर जमीन पर आ जाता है और कुछ मोम हमको रोशनी देता रहता है। जो मोम पिघलकर नीचे आ गया वह तो बेकार हो गया और जो मोम पिघलकर पानी के रूप में, द्रव के रूप में रहता है वह हमको रोशनी देता रहता है। ठीक इसी प्रकार से आपकी आत्मा की मोमबत्ती जल रही है। उसमें इन कर्मों ने मोम का कार्य किया है, जो पंचेन्द्रिय के विषय भोग हैं पिघल-पिघल कर आपकी आयु के माध्यम से नीचे आ रहे हैं, जीवन के वे क्षण बेकार हो रहे हैं और जो आपने प्रभु की भक्ति में, स्वाध्याय में, ध्यान में, तप में, गुरु के उपदेश आदि में, भगवान की पूजन में अपने क्षणों को व्यतीत किया वह आपका मोम पिघलकर आपके जीवन की ज्योति को जला रहा है। इसी प्रकार आपके जीवन की मोमबत्ती जलती रहे और वेस्टेज उसमें कम से कम हो, सार्थक ज्यादा से ज्यादा हो, ऐसा प्रयास आपको करते रहना है। मैं आपको क्रमश: इन ४२ प्रकृतियों के बारे में बताती हूँ— जिसके उदय से जीव दूसरे भव को प्राप्त करता है उसे गति नामकर्म कहते हैं। नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति के भेद से यह चार प्रकार का है। जिस कर्म के उदय से जीव नरक आदि गतियों में एकेन्द्रिय आदि सादृश्य धर्म सहित उत्पन्न हो, वह जाति नामकर्म है, इसके ५ भेद हैं—एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रिय जाति, त्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रिय जाति और पंचेन्द्रिय जाति। जिसके उदय से जीव एकेन्द्रिय जाति में पैदा हो, उसे एकेन्द्रिय जाति नामकर्म कहते हैं, इसी प्रकार से अन्य में भी समझना चाहिए। जिस कर्म के उदय से शरीर की रचना हो, उसे शरीर नामकर्म कहते हैं इसके औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्माण ऐसे ५ भेद हैं, जिसके उदय से अंग और उपांगों की रचना हो, उसे अंगोपांग नामकर्म कहते हैं, इसके औदारिक, वैक्रियिक और आहारक ऐसे ३ भेद हैं। जिस कर्म के उदय से अंगोपांग यथास्थान और यथाप्रमाण हों, उसे निर्माण नामकर्म कहते हैं। शरीर नामकर्म के उदय से ग्रहण किये हुए पुद्गल स्वंâधों का परस्पर संबंध जिस कर्म के उदय से होता है, उसे बंधन नामकर्म कहते हैं। जिस कर्म के उदय से औदारिक आदि शरीरों के प्रदेशों का छिद्ररहित बंधन हो, उसे संघात नामकर्म कहते हैं। जिस कर्म के उदय से शरीर का संस्थान अर्थात् आकार बने उसे संस्थान नामकर्म कहते हैं, इसके ६ भेद हैं—समचतुरस्रसंस्थान, न्यग्रोधपरिमण्डल संस्थान, स्वाति संस्थान, कुब्जक संस्थान, वामन संस्थान और हुण्डक संस्थान। समचतुरस्र संस्थान में जीव का शरीर ऊपर नीचे तथा बीच में समान, एकदम सुडौल रहता है, न्यग्रोधपरिमंडल संस्थान में जीव का शरीर वटवृक्ष की तरह नाभि के नीचे पतला और ऊपर मोटा रहता है। जो सर्प की वामी की तरह ऊपर पतला और नीचे मोटा हो उसे स्वाति संस्थान कहते हैं। कुबड़ा शरीर प्राप्त होना कुब्जक संस्थान है, बौना शरीर जिसका हो उसे वामन संस्थान कहते हैं और जिस कर्म के उदय से शरीर के अंगोपांग किसी खास आकृति के न हों उसे हुण्डक संस्थान नामकर्म कहते हैं। जिस कर्म के उदय से हड्डियों के बंधन में विशेषता हो उसे संहनन नामकर्म कहते हैं, इसके वङ्कावृषभनाराच, वङ्कानाराच, नाराच, अर्धनाराच, कीलक और असंप्राप्तसृपाटिका संहनन ऐसे छह भेद हैं। जिसके उदय से शरीर में स्पर्श हो उसे स्पर्श नामकर्म कहते हैं, उसके भारी, हल्का, कड़ा, नरम, रूखा, चिकना, ठण्डा, गरम ऐसे आठ भेद हैं, जिसके उदय से शरीर में रस हो वह रसनामकर्म है, उसके खट्टा, मीठा, कड़ुआ, चरपरा और कषायला ऐसे ५ भेद हैं जिसके उदय से शरीर में गंध हो वह गंध नामकर्म है, उसके सुगंध और दुर्गन्ध ऐसे दो भेद हैं। जिसके उदय से शरीर में वर्ण हो वह वर्ण नामकर्म है, उसके काला, नीला, पीला, लाल, सपेâद ऐसे ५ भेद हैं। जिसके उदय से विग्रहगति में मरण से पहले के शरीर के आकाररूप आत्मा के प्रदेश रहते हैं वह आनुपूव्र्य नामकर्म है, उसके नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देवगत्यानुपूर्व ऐसे ४ भेद हैं। जिस कर्म के उदय से जीव का शरीर लोहे के गोले की तरह भारी और आक के तूल की तरह हल्का न हो वह अगुरुलघु नामकर्म है। जिसकर्म के उदय से अपने अंगों से अपना घात हो उसे उपघात नामकर्म कहते हैं, जिसके उदय से दूसरे का घात करने वाले अंगोपांग हों उसे परघात नामकर्म कहते हैं। जिससे आतपरूप शरीर हो वह आतप नामकर्म है, जिसके उदय से उद्योत शरीर हो वह उद्योत नामकर्म है, शरीर में उच्छ्वास का होना उच्छ्वास नामकर्म है। जिसके उदय से आकाश में गमन हो वह विहायोगति नामकर्म है। इसके प्रशस्त, अप्रशस्त ऐसे दो भेद हैं, जिसके उदय से शरीर का एक ही जीव स्वामी हो वह प्रत्येक शरीर नामकर्म है। जिसके उदय से शरीर के अनेक जीव स्वामी हों वह साधारण शरीर नामकर्म है। एकेन्द्रिय जीवों में जन्म लेना स्थावर नामकर्म और द्वीन्द्रियादि में जन्म लेना त्रस नामकर्म है। दूसरे जीवों को अपने से प्रीति सुभग नामकर्म से होती है और अप्रीति हो तो समझिए दुर्भग नामकर्म है। अच्छा स्वर होना सुस्वर नामकर्म और खराब स्वर होना दु:स्वर नामकर्म है। शरीर के अवयवों का सुन्दर होना शुभ नामकर्म है और शरीर के अवयव देखने में सुन्दर न लगें वह अशुभ नामकर्म है। जिसके उदय से ऐसा शरीर मिले जो न किसी को रोके और न किसी से रुके वह सूक्ष्म शरीर नामकर्म है और जो शरीर दूसरे को रोके तथा दूसरे से रुके वह वह बादर शरीर नामकर्म है। अपने योग्य पर्याप्तियों का पूर्ण होना पर्याप्ति नामकर्म है और शरीर के योग्य पर्याप्तियों का पूर्ण न होना अपर्याप्ति नामकर्म है, जिस कर्म के उदय से शरीर की धातुएँ तथा उपधातुएँ अपने-अपने स्थान में स्थिरता को प्राप्त हों, उसे स्थिर नामकर्म कहते हैं। जिसके उदय से प्रभा सहित शरीर हो उसे आदेय नामकर्म कहते हैं, जिसके उदय से प्रभारहित शरीर हो उसे अनादेय नामकर्म कहते हैं। जिसके उदय से संसार में जीव की प्रशंसा हो उसे यश:कीर्ति नामकर्म कहते हैं और जिससे संसार में निंदा हो उसे अयश:कीर्ति नामकर्म कहते हैं। अरहंत पद के कारणभूत कर्म को तीर्थंकर नामकर्म कहते हैं। इस प्रकार यह नामकर्म के ४२ भेद हुए।

गोत्र कर्म की प्रकृतियों के बारे में बताते हैं—

उच्चैर्नीचैश्च।।१२।।

अर्थ — उच्च गोत्र और नीच गोत्र के भेद से गोत्र कर्म के दो भेद हैं।

जिसके उदय से जीव अच्छे कुल में जन्म धारण करे वह उच्च गोत्र है और जिसके उदय से जीव लोक में निन्द्य कुल में देह धारण करे वह नीच गोत्र है। चारों गतियों के जीवो में देवों और भोगभूमि के मनुष्यों के उच्च गोत्र और नारकी व तिर्यंचों के नीच गोत्र ही होता है परन्तु कर्मभूमि के मनुष्यों के उच्च और नीच दोनों गोत्र होते हैं।

यह पर्याय से होता है, जन्म से होता है लेकिन कर्म से भी अगर हम नीच गोत्र का बन्ध कर लें जैसे—पर्याय तो मनुष्य की पाई लेकिन व्यसन, जुआ आदि में जीवन को बर्बाद कर रहे हैं तो कर्म से वह नीचगोत्री हैं, जन्म से भले ही वे उच्चगोत्री हों। आप सभी को यह ध्यान रखना है कि यह नशाबाजी, तम्बाकू, गुटखा आदि जीवन का विनाश करने वाले हैं। इससे आज आपके जीवन का, कल परिवार के जीवन का और परसों देश के जीवन का निश्चित रूप से विनाश होने वाला है। अन्तराय कर्म के ५ भेद हैं, उसको बताते हुए आचार्यश्री कहते हैं—

दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम्।।१३।।

अर्थ — दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय और वीयान्तराय ये अन्तराय कर्म के ५ भेद हैं। जो कर्म दान, लाभ आदि में विघ्न डालें वह अन्तराय कर्म हैं। जिस अन्तराय का आस्रव होता है उसका उदय आ जाता है जैसे—दान में विघ्न आया तो दान नहीं दे पाये, लाभ की इच्छा होते हुए भी लाभ नहीं होता है, भोग की इच्छा तथा भोग्य वस्तु होते हुए भी भोग न कर सके, घर में खाने योग्य सारी सामग्री है पर बीमारी आ गयी, डॉ. ने सब खाना बन्द कर दिया, यह भी भोगान्तराय है। उपभोग्य वस्तु होते हुए भी उपभोग न कर सके वह उपभोगान्तराय कर्म है, जिसके उदय से बल प्राप्ति के साधन होते हुए भी बल-शक्ति, उत्साह न हो वह वीर्यान्तराय कर्म है।

जिस अंतराय कर्म का उदय आता है उसमें अपने को विघ्न पड़ता है। जैसे—साधु के आहार में विघ्न आ गया, श्रावक बेचारा बहुत दु:खी हो जाता है। कहता है—माताजी मेरे से बहुत बड़ी गलती हो गयी। अरे! गलती आपसे कहाँ हुई ? हमारे लाभान्तराय कर्म का उदय आया तो हमको आहार का लाभ नहीं मिला और आपके दानान्तराय कर्म का उदय आया जिससे कि आपके दान में विघ्न पड़ गया, लेकिन उसको खुशी-खुशी झेलना चाहिए, ऐसे नहीं कि अंतराय आ गया और साधु ने गुस्सा करना शुरू कर दिया, इतने नाराज हो गए कि आपे से बाहर हो गए । वह अन्तराय अपने ही जीवन का घात करने वाला होता है और उस अन्तराय को सामान्य रूप से सहन किया कि मेरे तो अन्तराय कर्म का उदय था तो वह हमारे कर्म की निर्जरा में कारण होता है।

अब ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अन्तराय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति बताते हैं—

आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपम कोटीकोट्य: परास्थिति:।।१४।।

अर्थ — आदि के तीन (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय) और अन्तराय इन चार कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति तीस कोड़ाकोड़ी सागर की है।

ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अन्तराय इन चार घातिया कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति ३० कोड़ा-कोड़ी सागर प्रमाण है। वास्तव में प्रत्येक कर्मों की स्थिति की—कर्म बंधने की एक लिमिट होती है। जैसे—बैंक में धन रखने की एक लिमिट होती है कि २ साल तक रखेंगे, ५ साल रखेंगे, १० साल रखेंगे। ऐसे ही जो कर्म बंधा उसकी भी लिमिट बंधी तो इन चार कर्मों की स्थिति—उत्कृष्ट मर्यादा ३० कोड़ाकोड़ी सागर पड़ सकती है, पड़ती ही है ऐसी बात नहीं है लेकिन उत्कृष्ट स्थिति के बारे में अवगत कराया है। यह उत्कृष्ट स्थिति मिथ्यादृष्टि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों के ही पड़ती है जो पूरी तरह से हेय-उपादेय के ज्ञान से सहित होते हैं।

मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति बताते हैं—

सप्ततिर्मोहनीयस्य।।१५।।

अर्थ — मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति ७० कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है।

आठों कर्मों में सबसे ज्यादा स्थिति मोहनीय कर्म की है। अगर यह बंध जाये तो सम्यग्दर्शन, सम्यक्चारित्र नहीं हो सकता। पता नहीं कब ऐसी स्थिति बंध जाये अत: व्रतादि में हमें सावधान रहना चाहिये। भावों को बनाने में सावधान रहें ताकि हमारी ऐसी उत्कृष्ट स्थिति बंधने नहीं पावे।

नाम व गोत्र कर्म की उत्कृष्ट स्थिति क्या है, सो ही बताते हैं—

विंशतिर्नामगोत्रयो:।।१६।।

अर्थ — नामकर्म और गोत्रकर्म की उत्कृष्ट स्थिति २० कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण है।

यह स्थितिबंध मिथ्यादृष्टि, संज्ञी, पंचेन्द्रिय, पर्याप्तक जीवों के होता है अन्य के नहीं।

आयु कर्म की उत्कृष्ट स्थिति बताते हैं—

त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुष:।।१७।।

अर्थ — आयु कर्म का उत्कृष्ट स्थितिबंध ३३ सागर का है।

यह उत्कृष्ट स्थितिबंध संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि दोनों के होता है। यह स्थिति या तो सातवें नर्वâ में पड़ती है या सर्वार्थसिद्धि के विमान में पड़ती है और वहीं पर उन जीवों को यह उत्कृष्ट स्थिति प्राप्त होती है। वेदनीय कर्म का जघन्य स्थितिबन्ध बताते हैं—

अपरा द्वादशमुहूर्ता वेदनीयस्य।।१८।।

अर्थ — वेदनीय कर्म की जघन्य स्थिति १२ मुहूर्त अर्थात् ९ घण्टे ३६ मिनट की है।

पहले अलौकिक घड़ी चलती थी। आज समय घण्टे, सेकेण्ड में चलता है। पहले के हिसाब से एक मुहूर्त ४८ मिनट का होता था। आज भी विद्यालयों में बराबर यह नियम है कि क्लॉस में एक पीरियड ४५ मिनट का होता है, हमारे समय में घण्टा लगता था और दूसरा टीचर आकर खड़ा होता था, हमें दूसरी किताब खोलनी पड़ती थी कि अब दूसरा पीरियड आ गया है अर्थात् १-१ मुहूर्त के साथ पीरियड बदलते थे। ऐसे १-१ मुहूर्त के बाद में साधुओं के भावों में परिवर्तन आता है। १ मुहूर्त में वह एक नींद में सोता है, दूसरे मुहूर्त में उसको परिवर्तन लाना पड़ता है। कहीं ऐसा न हो कि प्रगाढ़ निद्रा में सो जाए और उसके कर्म की स्थिति ज्यादा पड़ जाए इसलिये साधुजन सोते हुए भी जागते रहते हैं, ऐसी उनकी स्थिति है। यहाँ वेदनीय कर्म की स्थिति बताते हुए कहा है कि १२ मुहूर्त की जघन्य स्थिति वेदनीय कर्म की है और वेदनीय की उत्कृष्ट स्थिति ऊपर बता ही दी थी कि बीस कोड़ाकोड़ी सागर की है अब निर्णय आपको करना है कि हमको सागरों की आयु का बंध करना है या फिर मुहूर्तों की आयु का बन्ध करना है, शुभ आयु का बन्ध करना है या अशुभ आयु का बन्ध करना है। हम साधुओं को १-१ मिनट में अपनी निद्रा में बदलाव लाना पड़ता है। प्रत्येक साधु सोते हुए भी जागते रहते हैं।

नाम और गोत्र कर्म के जघन्य स्थितिबन्ध को बताते हैं—

नामगोत्रयोरष्टौ।।१९।।

अर्थ — नाम और गोत्र दोनों कर्मों की जघन्य स्थिति ८ मुहूर्त अर्थात् ६ घण्टे २४ मिनट की है।

वेदनीय, नाम और गोत्र कर्मों की जघन्य स्थितियों का बंध क्षपक श्रेणी में सूक्ष्मसांपराय नामक दशवें गुणस्थान में ही होता है।

शेष ५ कर्मों की जघन्य स्थिति क्या है ? उसको बताया है—

शेषाणामन्तर्मुहूर्ता।।२०।।

अर्थ — शेष कर्म अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, आयु और अन्तराय कर्म की जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है। इनमें से मोहनीय कर्म की जघन्य स्थिति नवमें गुणस्थान में ही बंधती है। आयुकर्म की जघन्य स्थिति संख्यात वर्ष की आयु वाले कर्मभूमि के मनुष्य और तिर्यंचों के ही होती है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्मों का जघन्य स्थितिबंध क्षपक श्रेणी के दशवें गुणस्थान में ही होता है, मध्यम स्थिति बंध असंख्यात प्रकार का है। यहाँ तक स्थितिबंध का वर्णन किया है। अब अनुभाग बन्ध को कहते हैं—

विपाकोऽनुभव:।।२१।।

अर्थ — कषायों की तीव्रता, मन्दता अथवा मध्यमता से जो आस्रव में विशेषता होती है, उससे होने वाले विशेष पाक को विपाक कहते हैं अथवा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भाव के निमित्त के वश से नानारूपता को प्राप्त होने वाले पाक को विपाक कहते हैं और इस पाक को ही अनुभव अर्थात् अनुभाग बंध कहते हैं।

अनुभाग किसे कहते हैं ? अनुभव में आना अनुभाग है। जो हमने कर्म बांधा वह कभी न कभी तो उदय में आयेगा ही, उसने फल दिया और हमको अनुभव आया उसी स्थिति का नाम अनुभाग है अर्थात् कर्मों में कषाय के अनुसार तीव्र-मंद फल देने की शक्ति को अनुभाग बन्ध कहते हैं।

जब हम इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि उस अंजना सती का जीवन कितना रोमांचक है। जब वह वन में रोती थी, विलाप करती थी तब अपनी सखी बसंतकान्ता से कहती थी कि हे सखी! मुझे याद नहीं है कि मैंने कभी किसी को जीवन में वियोग कराया हो, किसी को रंचमात्र भी दु:ख दिया हो फिर दैव मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहा है? मुझे इतना दु:ख क्यों दिया है? पहले मेरे पति का वियोग करवा दिया, किसी तरह से पति का संयोग हुआ तो इस प्रकार से झूठा कलंक लगाकर मुझे सास—श्वसुर द्वारा निकाल दिया गया। माँ के घर के अन्दर भी मुझे स्थान नहीं दिया गया और मैं जंगल में यत्र-तत्र भ्रमण कर रही हूँ। कौन से कर्म का उदय आया है मुझे नहीं पता है। मैंने तो जीवन में कभी किसी पति-पत्नी का, किसी माता-पुत्र का स्वप्न में भी वियोग नहीं करवाया फिर मेरा यह वियोग क्यों चल रहा है ? वह बेचारी ऐसे ही रोती थी, बिलखती थी, विलाप करती थी, तभी उसको एक दिगम्बर मुनिराज मिले, उसने उनके सामने भी ऐसा ही दुख व्यक्त किया, तब मुनिराज कहते हैं—बेटी! तूने इस जन्म में किसी को दु:ख नहीं दिया, तूने पूर्व जन्मों में अपनी सौत की ईष्र्या के भाव से जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा को थोड़े से क्षणों के लिये बावड़ी में पेंâक दिया था। आप सबको पता होगी यह कहानी कि रानी कनकोदरी की पर्याय में उसने जिनप्रतिमा का जरा सा अपमान कर दिया, प्रतिमा के अपमान की भावना नहीं थी, केवल सौत की ईष्र्या थी कि यह भगवान की पूजन नहीं कर पावे और जैसे ही एक आर्यिका माताजी का सम्बोधन मिला कि तूने अपने नर्व का द्वार खोल लिया है उसने तुरन्त बावड़ी से प्रतिमा को निकाला और यथास्थान उनको विराजमान किया, प्रायश्चित्त किया, जीवन भर पश्चाताप किया लेकिन ऐसा कर्म का बन्ध पड़ गया कि अंजना की पर्याय में २२ वर्ष तक पति के वियोग के रूप में वह उदय में आया, इसको कहते हैं अनुभाग। वह उदय में आ गया यह अनुभाग कहलाता है।

शुभ परिणामों की अधिकता होने पर श्ुाभ प्रकृतियों में अधिक और अशुभ प्रकृतियों में हीन अनुभाग होता है तथा अशुभ परिणामों की अधिकता होने पर अशुभ प्रकृतियों में अधिक और शुभ प्रकृतियों में हीन अनुभाग होता है।

अनुभाग बंध कर्मों के नामानुसार होता है, उसको बताते हुए कहते हैं—

स यथानाम।।२२।।

अर्थ — वह अनुभाग बंध कर्मों के नामानुसार ही होता है।

जिस कर्म प्रकृति का जैसा नाम है उसके अनुसार उसका अनुभाग बंध होता है। जैसे—ज्ञानावरण प्रकृति में ज्ञान को और दर्शनावरण में दर्शन को ढकने का फल प्राप्त होता है। ऐसे ही हर कर्म अपने-अपने नामानुरूप फल को देने वाला होता है।

फल के उदय में आने के बाद कर्मों की वैâसी दशा होती है, उसको बताते हुए आचार्यश्री कहते हैं—

ततश्च निर्जरा।।२३।।

अर्थ — तीव्र, मंद या मध्यम फल दे चुकने के बाद कर्मों की निर्जरा हो जाती है अर्थात् कर्म उदय में आकर आत्मा से पृथक् हो जाते हैं।

तीव्र, मध्यम या मंद फल देने के बाद उन कर्मों की निर्जरा हो जाती है। जैसे—खाया हुआ आहार पचकर झड़ जाता है वैसे ही कर्म पककर झड़ जाते हैं अर्थात् फल देने के बाद हमारे कर्मों की वैसी ही निर्जरा हो जाती है। यह निर्जरा दो प्रकार की होती है—१. सविपाक निर्जरा, २. अविपाक निर्जरा। कर्मों के उदय काल आने पर कर्म का अपना फल देकर झड़ जाना सविपाक निर्जरा है और जिस कर्म का उदय काल तो नहीं आया किन्तु तपस्या आदि से पुरुषार्थ द्वारा समय से पहले ही निर्जीर्ण हो जावे, वह अविपाक निर्जरा अर्थात् अकामनिर्जरा है।

बारह भावना में कहा है—

ज्यों सरवर जल रुका सूखता, तपन पड़ै भारी।

संवर रोके कर्म निर्जरा, ह्वै सोखनहारी।।
उदय भोग सविपाक समय, पक जाए आम डाली।

दूजी है अविपाक पकावे, पाल विषै माली।।

उदाहरणस्वरूप पेड़ पर लगा हुआ आम जब स्वयं पककर गिर जाता है तो वह सविपाक है और जब पेड़ से तोड़कर पाल में दबाकर पका दिया जाता है तो वह अविपाक है। ऐसे ही तपस्या का मसाला लगाकर कर्मों को निर्जीर्ण करना अविपाक निर्जरा है।

प्रदेश बंध का वर्णन करते हुए उसका लक्षण बताते हैं—

नाम प्रत्यया: सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिता: सर्वात्म-प्रदेशेष्वनन्तानन्त-प्रदेशा:।।२४।।

अर्थ — ज्ञानावरण आदि कर्मप्रकृतियों के कारणभूत सब ओर से अथवा देव, नारक, मनुष्य आदि समस्त भवों में मन, वचन, कायरूप योग विशेष से सूक्ष्म तथा दूध पानी के समान एक ही क्षेत्र में स्थान रखने वाले ठहरे हुए आत्मा के सम्पूर्ण प्रदेशों में जो कर्मरूप पुद्गल के अनंतानंत प्रदेश हैं उनको प्रदेशबंध कहते हैं।

वर्तमान में हमारी आपकी क्या स्थिति है ? कर्म और हमारी आत्मा का क्षेत्रावगाही सम्बन्ध है। कभी-कभी किसी मित्र से अधिक प्रीति हो तो हम कह देते हैं कि हम दो शरीर एक आत्मा हैं, पर ऐसा नहीं है, यह गलत है, आत्मा अलग-अलग है और कर्म का अलग शरीर है। केवल मित्रता को दिखाने के लिये आप इतना कह देते हैं कि हम दो शरीर एक आत्मा हैं। ऐसे ही हमारी आत्मा के साथ कर्मों ने इतनी ज्यादा दोस्ती, घनिष्टता प्राप्त कर ली है कि उनका एक क्षेत्रावगाही सम्बन्ध हो गया है। दूध में जैसे पानी मिला दिया गया तो पानी दूध के भाव बिकने लग गया। क्यों ? क्योंकि दूध का संपर्क प्राप्त कर लिया। जिस पानी की कोई कीमत नहीं थी वह दूध रूप से परिणत होकर दूध की कीमत में बिक गया। ऐसे ही आत्मा और कर्म का एक क्षेत्रावगाही सम्बन्ध हो गया है। असलियत में तो वह दो शरीर एक आत्मा है, आत्मा का अलग शरीर है, कर्म का अलग शरीर है लेकिन हमने उनको इस तरह से जोड़ दिया है कि एक आत्मा और दो शरीर दिख रहे हैं, इसको कहते हैं एक क्षेत्रावगाही सम्बन्ध। एक क्षेत्रावगाही हो करके आत्मा के सम्पूर्ण प्रदेशों में जो कर्मरूप पुद्गल के स्कन्ध आते हैं उन कर्मरूप पुद्गलों के जो अनंतानंत प्रदेश हैं बस उनको ही कहते हैं प्रदेश बंध, इनका परस्पर में मिल जाना प्रदेश बन्ध कहलाता है। आपको विशेषरूप से इस सूत्र में यह ध्यान देना है कि प्रदेश बंध के विषय में होने वाले निम्नलिखित प्रश्नों का इसमें समाधान किया गया है—

जैसे संसारी जीवों के प्रदेश बंध किसमें कारण हैं? तो उत्तर देते हुए आचार्यश्री उमास्वामी ने कहा कि कर्मप्रदेश ज्ञानावरण आदि सभी कर्म प्रकृतियों के कारण हैं, वे जैसे ही बंधते हैं, वैसे ही आयु को छोड़कर शेष सात कर्मरूप हो जाते हैं और यदि उस समय आयु कर्म का भी बंधकाल है, तो आठों कर्म रूप हो जाते हैं। दूसरा प्रश्न आया कि वे कर्म प्रदेश कब और कहाँ बंधते हैं? तो उसका उत्तर देते हुए कहा कि वे सब भवों में बंधते हैं, ऐसा कोई भव नहीं और एक भव में ऐसा कोई समय नहीं, जब कर्मबंध न होता हो। तीसरा प्रश्न आया कि वे कर्म वैâसे बंधते हैं? तो बताया कि वे योग विशेष से बंधते हैं। उन कर्मों का स्वभाव वैâसा है?, ऐसा प्रश्न आने पर आचार्यश्री कहते हैं कि कर्म सूक्ष्म होते हैं, स्थूल नहीं होते हैं। पाँचवा प्रश्न आया कि बंधने वाले वे कर्म रहते कहाँ हैं? तो उत्तर दिया कि एक क्षेत्रावगाह—जीव प्रदेश के क्षेत्रवर्ती कर्म परमाणुओं का ही ग्रहण होता है, जो कर्म परमाणु उसके बाहर के क्षेत्र में स्थित हैं, उनका ग्रहण नहीं होता है। अगला प्रश्न हुआ कि बंध के समय कर्म गतिशील होते हैं या ठहरे हुए होते हैं? तब उसका समाधान किया कि ठहरे हुए कर्मों का बंध होता है, गतिशील का नहीं। पुन: सातवांं प्रश्न हुआ यह बंध सभी आत्म प्रदेशों में होता है या कुछ हिस्से में होता है? तब उत्तर आया कि सभी आत्म प्रदेशों में बंध होता है, वे कर्म प्रदेश आत्मा के किसी एक ही हिस्से में नहीं होते अपितु दूध और पानी की तरह एक होकर रहते हैं। अन्तिम आठवाँ प्रश्न हुआ कि वे कर्मस्कंध कितने परिमाण वाले होते हैं तब उसका उत्तर देते हुए आचार्यश्री उमास्वामी ने बताया कि बंधने वाले सभी कर्मयोग्य स्कंध अनंतानंत परमाणुओं के बने होते हैं, उनमें से कोई भी स्वंâध संख्यात, असंख्यात अथवा अनन्त परमाणुओं का नहीं होता है, एक आत्मा के असंख्यात प्रदेश होते हैं और प्रत्येक प्रदेश में प्रतिसमय अनंतानंत प्रदेशी पुद्गल स्वंâध बंधरूप होते रहते हैं, यही प्रदेशबंध है।

कर्मों की पुण्य प्रकृतियाँ कितनी हैं, उसके बारे में बताते हैं—

सद्वेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम्।।२५।।

अर्थ — सातावेदनीय, शुभ आयु, शुभ नाम और शुभ गोत्र ये पुण्य प्रकृतियाँ हैं।

आठ कर्मों के भेद करने से १४८ कर्म बंधते हैं। उनमे से आचार्यों ने छांटा कि कुछ कर्मों की शुभ प्रकृतियाँ कहीं हैं और कुछ कर्मों की अशुभ प्रकृतियाँ कहीं हैं। घातिया कर्म की ४७ प्रकृतियाँ तो सभी पाप रूप हैं क्योंकि वे आत्मा के अनुजीवी गुणों का घात करती हैं और अघातिया कर्मों की १०१ प्रकृतियों में दोनों प्रकृतियाँ पुण्य पाप रूप हैं।

साता वेदनीय, शुभ आयु, शुभ नाम और उच्च गोत्र ये पुण्य प्रकृतियाँ हैं। जो सुख को प्रदान करने वाली हैं, जिनसे हमें हर्ष, आनन्द होता है और जो शुभ गति में ले जाने वाली हैं, शुभ आयु हैं—उनमें देवगति, मनुष्यगति ये शुभ आयु कहलाती हैं। नरकगति, तिर्यंचगति यह अशुभ आयु कहलाती हैं। सातावेदनीय शुभ कर्म कहलाता है, असातावेदनीय अशुभ कर्म कहलाता है। ऐसे ही नामकर्म में भी तीर्थंकर प्रकृति नामकर्म की प्रकृति है।

गोम्मटसार ग्रन्थ में बताया है—

पढमुवसमिये सम्मे सेसतिये अविरदादि चत्तारि।
तित्थथरबंधपारंभया णरा केवलिदुगंते।।३३।।

तीर्थंकर प्रकृति भी नामकर्म की प्रकृति है। जब यह प्रकृति बंधती है तो उसके निमित्त से तीर्थंकर शिशु के माता के गर्भ में आने के छह माह पहले ही उनके आंगन में रत्नवृष्टि होने लगती है। पुद्गल प्रकृति का इतना प्रबल निमित्त पड़ता है। लोग कहते हैं निमित्त कुछ नहीं करता, अगर नहीं करता तो तीर्थंकर प्रकृति क्या कर रही है ? क्यों होती है १५ महीने तक रत्नों की वर्षा ? आपके जन्म में तो रत्नवृष्टि नहीं हुई परन्तु उन्होंने रिजर्व में रखी है, तीर्थंकर प्रकृति अभी उदय में भी नहीं है। फिर भी जैसे सेठ का धन तिजोरी में रखा है फिर भी वह सेठ है इसलिये कि पता है कि भारत की तमाम बैंकों में उसका पैसा जमा है और ज्यादा पता लगे कि विदेशों की बैंकों में भी उसका पैसा जमा है तो वह उद्योगपति है। वह भले ही वंâजूस हो लेकिन सेठ ही कहलाता है और उसमें भी बहुत बड़ा सेठ कहलाता है, कारण केवल बैंक बैलेंस है। अगर कभी आप उससे दान लेने के लिये जाएंगे तो भले ही वह आपको एक पैसा नहीं दे। लेकिन वह उसका पुण्य परमाणु है। उसी प्रकार तीर्थंकर प्रकृति रिजर्व में है और वो इतना अतिशय दिखाती है कि माता के गर्भ में आने के छह माह पूर्व से ही रत्नों की वृष्टि होने लगती है। कितने आश्चर्य की बात है कि राजा श्रेणिक का जीव अभी नर्वâ में हैं परन्तु जब आपके मध्यलोक में तीर्थंकर के रूप में माता के गर्भ में आएंगे, उसके छह महीने पहले वह जीव तो नरक में ही रहेगा और यहाँ रत्नों की वृष्टि शुरू हो जाएगी। ये पुण्य प्रकृतियाँ हैं जिन्हें इसलिये बताया है कि आप इनको जानकर पुण्य कार्य को करें।

इस अध्याय के अन्तिम सूत्र में अशुभ प्रकृतियों के बारे में बताते हुए आचार्यश्री कहते हैं—

अतोऽन्यत् पापम्।।२६।।

अर्थ — इन पुण्य प्रकृतियों से अन्य अर्थात् असाता वेदनीय, अशुभ आयु, अशुभ नाम और अशुभ गोत्र ये पाप प्रकृतियाँ हैं।

पाप प्रकृतियाँ १०० हैं, जिसमें घातिया कर्म की ४७ प्रकृतियाँ, असातावेदनीय, नरकायु, नीच गोत्र और नामकर्म की ५० प्रकृतियाँ इस प्रकार कुल १०० हैं। वैसे भेद विवक्षा से ये १०० पाप प्रकृतियाँ हैं परन्तु अभेद विवक्षा से ८४ हैं क्योंकि वर्णादिक के १६ उपभेद घटाने से ८४ रहते हैं। इनमें से भी सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक्त्व मोहनीय प्रकृति इन दो प्रकृतियों का बंध नहीं होता है अत: इन दो को कम करने से भेद विवक्षा से ९८ और अभेद विवक्षा से ८२ पाप प्रकृतियों का बंध होता है परन्तु इन दोनों का सत्त्व तथा उदय होता है इसलिए सत्त्व और उदय भेद विवक्षा से १०० का तथा अभेद विवक्षा से ८४ प्रकृतियों का होता है।

इन पुण्य और पाप प्रकृतियों को जान कर आप सभी को पाप से मुख मोड़ना है, इन्हें हटाना है और पुण्य को एकत्रित करके अपने मानव जीवन को सफल बनाना है।

।।इति तत्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे अष्टमोऽध्याय: समाप्त:।।